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Showing posts from November, 2008

हम उम्मीद करें ...

अभी थोड़ी देर पहले ही मुंबई में धमाके ख़त्म हुए हैं और उसकी पल-पल बदलने और दिल बैठा देने वाली सर्द ख़बरों की ज़द से निकल कर मैं अपने मोर्चे पर आया हूँ। इसे आंकड़ों में कहने की ज़रूरत नहीं कि देश पर हुए इस फ़िदायीन हमले में कितने निर्दोष लोगों का खून बहा। यह ज़रूर है कि इस नाजुक मौके पर सुरक्षा बलों और मीडिया ( एकाध टी आर पी पीड़ित चैनल्स को छोड़कर ) ने जितनी तत्परता और जिम्मेदारी का परिचय दिया वह काबिलेतारीफ है। यह भी गौरतलब है कि इस मौके को कुछ सियासी दलों ने अपनी राजनीति चमकाने के लिए मुफीद समझा पर उनके मंसूबे किस कदर मखौल का विषय बन गए हैं यह किसी से छुपा नहीं है। यह एक लोकतंत्र के रूप में हमारे वयस्क होने का भी प्रमाण है। ऐसी घटनाओं के बाद जिस एक बात की ओर ध्यान जाना लाजिमी है, वह है हमारे नीति-निर्माताओं का बयान। चूँकि वह इतना घिसा-पिटा और दरहकीक़त इतना बेअसर है कि उसे लेकर हमारे मन में गुस्से और तकलीफ का भाव एक साथ जगता है। हम उम्मीद करें कि उनके ये बयान महज कोरी बातें न रहकर स्थिति में बदलाव लाने में भी सक्षम होंगे।

सबद मुंबई में जान गंवाने वाले तमाम निर्दोष लोगों और उन्हें बचाने की …

सबद विशेष : ६ : कुंवर नारायण : नई निगाह में

( यह सबद की ओर से किए गए आग्रह से कहीं ज़्यादा अपनी भाषा के एक बड़े कवि-लेखक के सम्मान में लिखने की अन्तःप्रेरणा ही रही होगी जिसकी वजह से इन युवा कवि-लेखकों ने कुंवरजी के बहुविधात्मक कृतित्व पर इतना त्वरित लेखन किया। इनमें से पंकज चतुर्वेदी पहली बार ब्लॉग की दुनिया की ओर अपना रुख कर रहे हैं, उनका स्वागत ! गीत और गिरिराज ने कुंवरजी की कविता पर ख़ुद को एकाग्र किया है, जबकि प्रभात रंजन ने उनके एकलौते कहानी संग्रह के माध्यम से उनकी कहानियों के अनूठेपन की ओर इशारा किया है। हम इनके शुक्रगुजार हैं। )

आग का वादा
पंकज चतुर्वेदी

कुंवर नारायण पिछले लगभग छह दशकों से रचनारत हैं। आज जब त्रिलोचन और रघुवीर सहाय हमारे बीच नहीं हैं, तो बेशक वह हिन्दी के सबसे बडे़ कवि हैं। मुक्तिबोध ने 1964 में ही उनके महत्त्व को पहचानते हुए लिखा था कि वह 'अंतरात्मा की पीड़ित विवेक-चेतना और जीवन की आलोचना' के कवि हैं। मगर 1964 से 1994, यानी तीस वर्षों का लम्बा वक्फा ऐसा भी रहा है; जिसमें सतत रचनाशीलता के बावजूद कुंवर नारायण को हिन्दी आलोचना में वह सम्मान और शोहरत नहीं मिली, जिसके दरअसल वह हक़दार थे। उलटे, उनकी कवित…

कुंवर नारायण को ज्ञानपीठ

ज्ञानपीठ

इस घोषणा के बाद कि वर्ष २००५ का ज्ञानपीठ पुरस्कार हिन्दी के शीर्षस्थ कवि कुंवर नारायणको दिया जाना है, यह उक्ति दुहराने का मन होता है कि इससे ज्ञानपीठ की ही प्रतिष्ठा बढ़ी है। ज्ञानपीठ पुरस्कार को समस्त भारतीय भाषाओँ के साहित्य में अत्यंत प्रतिष्ठित माना जाता है, पर इसके साथ भी विवाद और चयनित कवि-लेखक को लेकर बिल्कुल फर्क किस्म की बातें सामने आती रही है। इस परिप्रेक्ष्य में कुंवरजी का निर्विवाद चयन कुछ विलंबित ज़रूर है, पर इससे हिन्दी और विशेषकर कविता का सम्मान बढ़ा है। स्वयं कुंवरजी इसके लिए ख़ुद को एक निमित्त भर मानते हैं।

इन दिनों

कुंवर नारायण की कविता ने मुझ जैसे अनेक लोगों को न सिर्फ़ कवित-विवेक बल्कि जीवन विवेक भी दिया है। मैं खुशकिस्मत हूँ की पढ़ने-लिखने के शुरूआती दिनों से ही उनकी कविता और दिल्ली आने के बाद मुझे उनकी संगत भी मिली। अस्सी पार भी उनकी दिनचर्या किसी स्कूली छात्र जैसी है। आंखों की रोशनी कम पड़ने के बावजूद अपनी डेस्क से लगकर वे किताबें लेंस के सहारे देर तक पढ़ते हैं। हजारों पृष्ठों में फैली अपनी अनछपी रचनाओं का सख्ती से संपादन करते हैं। साहित्यिक गोष्ठियों से …

ज़बां उर्दू : २ : सफ़िया अख्तर

जाने अज़ीज़,

कैसे हो ? मेरे कूच के वक्त मेरी तबियत पर जो बार था उसकी फ़िक्र है। खुदा करे अच्छी तरह सो गए हो और सुब्ह बश्शाश (खुश) उठे हो।
इस मर्तबा ग्वालियर के स्टेशन पर हर लहज़ा (क्षण) दिल चाहता था कि काश कोई खारजी कुव्वत (बाह्य शक्ति) जाने से रोक लेती और अपने पर से जिम्मेदारी का बोझ हट जाता, मगर संग-दिल ट्रेन आकर रही और बेरहम लोगों ने टिकट भी हासिल कर लिया और सफ़िया को दूर फेंक दिया, गो कि वो इसके बावजूद तुमसे ज़रा भी दूर नहीं।
जब सोचती हूं तो समझ में नहीं आता कि मेरी गैरमौजूदगी में ज़िन्दगी को किन मशागिल (कामों) से पुर करते होगे ? फातिमा बहन बेचारी मजदूर आदमी, वक्त पर चल देती होगी, फिर घर पर अकेले क्या करते होगे, वक्त कैसे कटता होगा ? घबराओ नहीं, मैं भी तुम्हारे पास हूं, अलबत्ता ये और बात है कि ऐसे में मीना (शराब ) भी आ जाती हो और मुझे उस बज़्म से निकाला मिल जाता हो।
तुम कब आओगे ? मुझे बुलाना या ख़ुद आना। मार्च के पहले हफ्ते में जयपुर जाना तय करो और मुनासिब समझो तो मुझे भी ले चलो। औन के यहां ठहरेंगे और उनकी शाने-मेज़बानी भी देखेंगे। वैसे तुम अपनी मर्ज़ी पर रखो। ये शौक तो महज़ तुम्हारी हमसफरी क…