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जब तक यह पृथ्वी रसवती है ...


हालांकि लग तो यह रहा है कि इस बार कोसी सब लील लेगी, लेकिन यह बची हुई पृथ्वी, घर, ये धेनुएँ, वृक्ष और अपने इर्द-गिर्द अथाह जल में भी अदम्य जिजीविषा में मनुष्य का ऊंचा उठा हुआ हाथ, आश्वाशन हैं जीवन के। बाबा त्रिलोचन की मानें तो ....

जब तक यह पृथ्वी रसवती है
और
जब तक सूर्य की प्रदक्षिणा में लग्न है,
तब तक आकाश में
उमड़ते रहेंगे बादल मंडल बाँध कर ;
जीवन ही जीवन
बरसा करेगा देशों में, दिशाओं में ;
दौड़ेगा प्रवाह
इस ओर उस ओर चारों ओर ;
नयन देखेंगे
जीवन के अंकुरों को
उठकर अभिवादन करते प्रभात काल का।

बाढ़ में
आंखों के आंसू बहा करेंगे,
किंतु जल थिराने पर,
कमल भी खिलेंगे
सहस्त्रदल।

( कवि के संग्रह ताप के ताए हुए दिन से साभार )

Comments

aalekh said…
उम्मीद तो यही करनी चाहिए.
Ek ziddi dhun said…
kavita ummeed deti hai par systum? par ummeed bagair lada bhi nahee ja sakta
महेन said…
अनुराग भाई, इसी संग्रह से एक और कविता है:

नदी ने कहा था: मुझे बाँधो
मनुष्य ने सुना और
तैरकर धारा को पार किया।

नदी ने कहा था: मुझे बाँधो
मनुष्य ने सुना और
सपरिवार धारा को
नाव से पार किया।

नदी ने कहा था: मुझे बाँधो
मनुष्य ने सुना और
आखिर उसे बाँध लिया
बाँधकर नदी को
मनुष्य दुह रहा है

अब वह कामधेनु है।

मगर कामधेनु का मिजाज़ गरम होता है हर साल।
Anonymous said…
दुःख के इन क्षणो मे बाबा त्रिलोचन के शब्द दुर दिखाई दे रही रोशनी की तरफ ध्यान आकृष्ट करते है । आशा बन्धाते है । जीवन क्षमाशील है । लेकिन जीवन के साथ जब हम खिलवाड करने लगते है तो फिर वह भी समाप्त हो जाता है ।
Dilip said…
Anurag ji, Apane Sahi vakt par sahi subject se ru-b-ru karaya hai.Is samay jab, Koshi ke tandav ne sochane tak ka vakt nahin diya hai, yah kavita sahlane ka kam kar rahi hai.
Anurag Bahi, apse namra nivedan hai, un vibhootiyon ki vyaktigat jankari den, jinki rachnayon se hamen abibhoot karate hain.

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