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Showing posts from June, 2008

कोठार से बीज : 2 : त्रिलोचन

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( यह दुखद है कि हमें अपने दिवंगत मूर्धन्य जयंतियों पर याद आते हैं । यों तो हम डग-डग पर उनकी उन्हीं चंद बातों को कोट करते हुए बखूबी, 'यशवर्धन बज़रिये नाम-जाप' की परम्परा को पुष्ट करने की अपनी निर्ल्लज कोशिशों में लगे रहते हैं, हमने कभी यह परवाह नहीं की कि उनका लिखा कहाँ और किस हालत में है। ' कोठार से बीज' नामक स्तंभ की शुरुआत शमशेर के गद्य से की थी। कहना न होगा कि उनकी वह गद्य पुस्तक एक बार छप कर प्रकाशकों के लिए कम से कम किसी मसरफ का न रही। शमशेर, त्रिलोचन, नागार्जुन सरीखे ऐसे कई कवि-लेखक हैं जिनकी अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों को पाठकों की आगामी पीढ़ियों के लिए सच पूछिए तो जमींदोज किया जा रहा है। इस बार, ''कोठार से बीज'' में त्रिलोचन जी की ऐसी दो लुप्तप्राय पुस्तकों से ही कुछ शब्द। पहली पुस्तक, ''अरघान ''नामक कविता संग्रह है जिसे यात्री प्रकाशन ने १९९४ में छापा था। कविता उसी से ली गई है। दूसरी पुस्तक त्रिलोचन जी की १९५० में लिखी गई डायरी है जिसे बहुत बाद में इलाहाबाद से किसी साहित्यवाणी नाम के प्रकाशक ने ,''रोजनामचा'' नाम से …

कवि की संगत कविता के साथ : 2 : गीत चतुर्वेदी

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( हालाँकि अब यह बात हर दूसरे कवि के लिए कही जाती है कि उसकी कविता सबसे अलग है और बाज़ दफा इस कथन के समर्थन में आसानी से वे तर्क भी गढ़ लिए जाते हैं जो कविता और कवि के मह्त्व-रेखांकन की बजाय उसमें एक हास्यास्पद नुक्ता ही जोड़ता है, गीत चतुर्वेदीऔर उनकी कविताओं के बारे में ऐसा दृढ़कथन इसके बावजूद किया जाना चाहिए। वह इसलिए कि संवेदना के जिस धरातल पर गीत कविता संभव करते हैं, जैसी रेंज उनके पास है ( फिर वह भाषा की हो या थीम की ), जितना उनकी कविता ने अपनी पूर्ववर्ती कविता से मेलजोल रखा है, जैसी संजीवनी वह सहोदर कलाओं से पाती रही है और जितना संयमित और सजग उसका अपना काव्य-विधान है, वह अभी लिखी जा रही युवा कविता में दुर्लभ नहीं तो इतना समर्थ ज़रूर है कि कविता को उसका मौलिक स्वर और कवि को उसकी खास पहचान दे। अकारण नहीं उन्हें युवा कविता का प्रतिष्ठित,''भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार '' मिला है। गीत ने कई बार आग्रह दुहराने के बाद अपना आत्मकथ्य लिखा। दो नई कविताएं भेजी। एक कविता,''असम्बद्ध'' हम अपनी तरफ से दे रहे हैं। सबद का इतना मान रखा उन्होंने, उनका आभार ! कवि की संगत…

मंगलेश डबराल की डायरी

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( हिन्दी के अग्रणी कवि मंगलेश डबराल की डायरियों की ये प्रविष्टियां उनकी शीघ्र प्रकाश्य गद्य पुस्तक,''कवि का अकेलापन'' से ली गई हैं। मंगलेशजी ने इन्हे प्रीतिपूर्वक हमें छापने की इजाज़त दी। हम उनके कृतज्ञ हैं। डायरी के पन्ने कवि सुंदर चन्द ठाकुर ने तत्परता से मुहैया कराया। उनका आभार। हम वक्त-वक्त पर कवि-लेखकों की डायरी या जर्नल वगैरह प्रकाशित करते रहेंगे। )

कविता में कभी अच्छा मनुष्य दिख जाता है या कभी अच्छे मनुष्य में कविता दिख जाती है। कभी-कभी एक के भीतर दोनों ही दिख जाते हैं। यही एक बड़ा प्रतिकार है। और अगर यह ऐसा युग है जब कविता में बुरा मनुष्य भी दिख रहा है तब तो कविता में अच्छा मनुष्य और भी ज्यादा दिखेगा। लेकिन क्या ऐसा भी समय आ सकता है कि अच्छे साहित्य की चर्चा ही न हो ? सिर्फ़ दोयम दर्जे की कविता-कहानी को महान, अभूतपूर्व, युगांतकारी मानाजाने लगे ?कोई बहुत अच्छी कविता कहीं छपे और लोग उस पर कोई बात न करें और चुप लगा जाएं। यह कितना भयानक होगा। लेकिन समय की विशाल छलनी भी तो कुछ छानती रहती है। चुपचाप।
**** नेता, इंजीनियर, डॉक्टर, एमबीए, सूचना तकनीक के माहिर लोग, सॉफ्ट…

कला का आलोक : १ : हकु शाह

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स्वभाव से अन्तर्मुखी व मितभाषी युवा लेखक, सम्पादक, अनुवादक व संस्कृतिकर्मी पीयूष दईया का जन्म 27 अगस्त 1973, बीकानेर (राज.) में हुआ। आप हिन्दी साहित्य, संस्कृति और विचार पर एकाग्र पत्रिकाओं ''पुरोवाक्'' (श्रवण संस्थान, उदयपुर) और ''बहुवचन'' (महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा) के संस्थापक सम्पादक रहे हैं और लोक-अन्वीक्षा पर एकाग्र दो पुस्तकों ''लोक'' व ''लोक का आलोक'' नामक दो वृहद् ग्रन्थों के सम्पादन सहित भारतीय लोक कला मण्डल, उदयपुर की त्रैमासिक पत्रिका ''रंगायन'' का भी बरसों तक सम्पादन किया है। पीयूष ने हकु शाह द्वारा लिखी चार बाल-पुस्तकों के सम्पादन के अलावा अंग्रेज़ी में लिखे उनके निबन्धों का भी हिन्दी में अनुवाद व सम्पादन किया है। हकु शाह के निबन्धों की यह संचयिता,''जीव-कृति'' शीघ्र प्रकाश्य है। ऐसी ही एक अन्य पुस्तक पीयूष चित्रकार अखिलेश के साथ भी तैयार कर रहे हैं। काव्यानुवाद पर एकाग्र पत्रिका ''तनाव'' के लिए ग्रीक के महान आधुनिक कवि कवाफ़ी की कव…

पूर्वरंग : हृषीकेश सुलभ

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( हृषीकेश सुलभ पिछले बरस एक लंबे अन्तराल के बाद जब अपनी नाट्य-कृति ''बटोही'' लेकर आए थे तो हममें से शायद ही किसी को अंदाजा था कि वे इतनी जल्दी एक और कृति के साथ सामने होंगे। पर अब ऐसा लगता है कि उनके नाटककार ने एक नई करवट ली है और वे उत्तरोतर उन चरित्रों और युग-सन्दर्भों से अपनी कृतियों में गहरे जुड़ रहे हैं जिनसे हमारा संबंध यूँ तो अटूट होना चाहिए था पर अपनी अहंमन्यता और विस्मृति के आत्मघाती रवैये से हममें जुड़ाव का वह उत्कट बोध तक जाता रहा है। उत्तर सुलभ (!) का यह उद्यम उम्मीद है हममें वह बोध पुनर्जागृत करेगा। पूर्वरंग के तहत हम महान क्रांतिकारी बिरसा मुंडा के जीवन पर आधारित उनके नाटक धरतीआबा की उनके द्वारा लिखी गई पटभूमि से कुछ शब्द दे रहे हैं। प्रसन्नता है कि सबद के लिए उन्होंने आगामी दिनों में नाटक पर अपना स्तंभ लिखने का हमारा आग्रह भी स्वीकार कर लिया है। उनके इस योगदान से सबद और समृद्ध होगा। )
धरती आबाहृषीकेश सुलभ''लौटकर आऊंगा मैं, ...जल्द ही लौटूंगा मैं अपने जंगलों में, अपने पहाड़ों पर। ...मुंडा लोगों के बीच फिर आऊंगा मैं। ...तुम्हें मेरे कारण दुःख न सहना प…

एक कवि एक कविता : 2 : कुंवर नारायण

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( एक कवि एक कविता शीर्षक स्तंभ की यह दूसरी प्रस्तुति है। यह स्तंभ युवा कवि यतीन्द्र मिश्र ने वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह की कविता , ''बर्लिन की टूटी दीवार को देखकर'' पर टिप्पणी लिख कर शुरू की थी। इस बार उन्होंने वरिष्ठ कवि कुंवर नारायण की महत्वपूर्ण कविता,''अमीर खुसरो'' को टिप्पणी के लिए चुना है। हम पहले की तरह ही चयनित कविता भी साथ-साथ दे रहे हैं। हमें आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी। आप हमें कवि और कविता के चयन संबंधी सुझाव भी दे सकते हैं। अगली टिप्पणी श्रीकांत वर्मा की कविता ''कलिंग'' पर । )

इतिहास के धरातल पर कुछ नैतिक प्रश्न

यतीन्द्र मिश्र
इतिहास की सबसे गौरवशाली ख़ानकाहों में से निकलने वाली अप्रतिम आवाज़ों में एक आवाज़ अमीर खुसरो की भी है, जिसने कई शताब्दियों के बाद भी अपनी उपस्थिति का निर्मल आलोक बचाया हुआ है। यह रोशनी तब और भी प्रासंगिक हो जाती है, जब कुँवर नारायण जैसा संवेदनशील एवं वैचारिक रूप से सजग कवि अमीर खुसरो को अपनी कविता के दायरे में शामिल करता है।

‘अमीर खुसरो’ जैसी रचना इस तथ्य को जानने जनता सन्दर्भ में एक पेचीदा पहल है …

सेवेंटीएमएम

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(विनोद अनुपम हिन्दी की मुख्यधारा की फिल्मों पर लंबे समय से आलोचनात्मक लेखन करते आ रहे हैं। उन्होंने उद्भावना के प्रसिद्ध फिल्म विशेषांक का संपादन भी किया है। विनोद उन गिने-चुने लोगों में से हैं जो हिन्दी फिल्मों के प्रति कटु होने के बावजूद जिम्मेदारी और लगाव से लिखते हैं। सबद के लिए उन्होंने फिल्मों पर सेवेंटीएमएम नामक स्तंभ लिखना स्वीकार कर एक बड़ी कमी पूरी की । गैरज़रूरी पर इन अवसरों साझा कर लेनेवाला तथ्य यह भी है कि उन्हें उनके लेखन के लिए वर्ष २००२ में सर्वश्रेष्ठ फिल्म समीक्षक का राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है।
कवि संगत कविता के साथ स्तंभ की आरंभिक टिप्पणी की ओर कुछ लोगों का ध्यान गया। यह कविता के लिए शुभ है कि उसे लेकर बहसतलब बातें करने की ज़रूरत लोग अब भी महसूस करते हैं। यह प्रक्रिया जारी रहनी चाहिए। इससे बातें कुछ और साफ़ होंगी। हमने पहले ही कहा था, फिर इसरार करते हैं कि प्रकाशित रचनाओं पर वाद-विवाद-संवाद की गुंजाइश हम सदैव बरकरार रखेंगे। संयोगवश ही सही, विनोद का स्तंभ भी इसी ओर इशारा कर रहा है।)

निन्दक नियरे राखिएविनोद अनुपम
सत्यजीत रे कहते थे, मैं सिनेमा अपने लिए बनाता हूं। बावजू…

कवि की संगत कविता के साथ : चंद्रकांत देवताले

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( अपनी कविता में एक जगह चंद्रकांत देवताले ने कहा है,'' आग हर चीज़ में बताई गई थी / पानी-पत्थर-अन्न / और घोड़ों तक में / अग्नि का वास बताया गया था / मनुष्यों में तो आग होती ही और होनी ही थी / पर आज आग का पता नहीं चल रहा है / जीवित आत्माएं बुझी हुई राख या भूसे की तरह नाटक देख रही हैं ''। उनके भीतर की आग और गुस्सा ७३ की वय में भी कमा-थमा नहीं है। उन्होंने इधर फिर दुहराया है,''मेरी किस्मत में यही अच्छा रहा / कि आग और गुस्से ने मेरा साथ कभी नहीं छोड़ा / और मैंने उन लोगों पर यकीन नहीं किया / जो घृणित युद्ध में शामिल हैं / और सुभाषितों से रौंद रहे हैं / अजन्मी और नन्हीं खुशियों को''। यूं तो हिन्दी की गुस्सैल कविता और बड़े बोल बोलने वाले कवियों की एक लम्बी लिस्ट बनाई जा सकती है, पर देवताले और उनकी कविता इन सबसे इसलिए भिन्न है क्योंकि वहाँ यह गुस्सा अनर्जित या बलात, किसी नाटकीय मुद्रा के बतौर नहीं आया है। दूसरी बात यह कि अकविता के प्रभाव में लेखन की शुरुआत करने के बावजूद उनकी कविताओं का भूगोल क्रमशः विस्तृत होता गया है और वह वहाँ तक पहुँच सकी है जहाँ तकलीफ/ गुस्से …

कोठार से बीज : शमशेर

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( इस स्तंभ के तहत हम उन रचनाओं/रचना-अंशों का प्रकाशन करेंगे जिनका बदलते युग संदर्भों में भी एक विशेष महत्व है। इसमें कोई भाषिक बंधन नहीं है। कोशिश हिन्दी और हिन्दीतर भारतीय भाषाओं से लेकर सृजन की हर भाषा और विधा का यत्किंचित मूल्यवान सामने लाने की है। इसी कड़ी में पेश है हिन्दी के विलक्षण कवि शमशेर बहादुर सिंह की डायरियों के कुछ टुकड़े। इन टुकड़ों को उन्हीं की डायरीनुमा क्लैसिक कविता,''टूटी हुई बिखरी हुई'' नाम दिया है। इन्हें कई बरस पहले संभावना प्रकाशन ने, शमशेर के विरल संगतकार मलयज के संपादन में उनकी अन्य गद्य रचनाओं के साथ ही छापा था। )

टूटी हुई, बिखरी हुई

मेरे कमरे पर, इसकी चटाई और दीवारों और अख़बारों और कागज़ों और धूप और सायों पर जो एक मनहूस-सी दुखी रूह खामोश अपराधी की तरह बैठ गई थी...उसका चेहरा खिल कर सुबह के फूलों की तरह खालिस पवित्र खुशी से मुस्करा उठा और हर चीज - दीवार पर धूप और साए की नक्काशियाँ और किताबों और अख़बारों के ज़िन्दा बारीक इशारे और चटाई की बुनावट के तह-ब-तह खाने और मेरी जेबें और मेरे पायजामें और रूमाल और तह्बंद सब मिलकर एक बहुत पवित्र हलकी-फुलकी मुबारकब…

रिल्के पर एक बढ़त : गिरिराज किराडू

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( कुछ दिनों पहले सबद में जर्मन कवि राइनर मारिया रिल्के पर राजी सेठ का लेख छपा था। इस प्रकाशन से युवा कवि और प्रतिलिपि के सम्पादक गिरिराज किराडू को रिल्के पर लिखी अपनी एक रचना की याद हो आई और उन्होंने तत्परता से उसे प्रकाशन के लिए हमें भेज दिया। सबद उनका स्वागत करता है। रचनाओं का ऐसा सखा पाठ बहुत महत्वपूर्ण है। लेखकों की इस पहल का हम खुले मन से स्वागत करेंगे। )
रिल्के का कृति जीवन - विलाप एक मित्र के लिएगिरिराज किराडू*और ठीक इसी छवि में मैंने तुम्हे पाया है सदैव--आईने के भीतर,
बहुत भीतर जहाँ तुम स्वयं को रखती हो--इस संसार से दूर, बहुत दूरफ़िर क्यूं आई हो ऐसे अपने आप को मिथ्या करते हुए,
फ़िर क्यूं मुझे विश्वास दिलाना चाहती हो कि
जो पंख तुमने पहने थे अपनी आत्मछवि में उनमें वो थकान थी
जो नहीं हो सकती अपने आईने के शांत, मंद्र आकाश में ?फ़िर क्यूं ऐसे खड़ी हो कि अपशकुन मंडराता दिखे मुझे तुम्हारे सिर पे,
फ़िर क्यूं अपनी आत्मा के अक्षरों को ऐसे पढ़ रही हो जैसे कोई पढ़ रहा हो हाथ की रेखाओं को
यूँ कि मैं भी न पढ़ पाऊँ उन्हें तुम्हारी नियति के सिवा किसी और तरह से ?और इससे भयभीत न रहो कि मैं अब समझता हूँ इसे--…

अनकहा कुछ : शेक्सपियर

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( वादे के मुताबिक हम अपना दूसरा स्तम्भ शुरू कर रहे हैं। इसे युवा कहानीकार प्रभात रंजन ने हमारे आग्रह पर लिखना स्वीकार किया है। अनकहा कुछ नामक यह स्तम्भ उन अप्रतिम रचनाकारों पर एकाग्र है जिनके लेखन के अलावा जीवन में भी हमारी गहरी और असमाप्य दिलचस्पी रही है। इसके लिए हमें इन लेखकों द्वारा लिखी गई पुस्तकों, आत्मकथा, डायरी, पत्र, संस्मरण और इनके व्यक्तित्व-कृतित्व पर उपलब्ध सुशोधित पुस्तकों को प्रमाणिक आधार बनाना उपयुक्त लगा ताकि बातें वस्तुनिष्ठ हों और लेखन महत्व का बने। आगे तो आप ही तय करेंगे कि हम अपने प्रयासों में कितने सफल रहे। यह जरूर है कि शुरू करने के लिए हमें शेक्सपियर से बेहतर कोई दूसरा लेखक न मिला। )

शेक्सपियर के इर्द-गिर्द

प्रभात रंजन

बोर्खेज कि एक कहानी है जिसमें मृत्यु के बाद शेक्सपियर से जब यह पूछा जाता है कि तुम कौन हो, तो जवाब में शेक्सपियर कहते हैं कि इसी प्रश्न का उत्तर जानने का प्रयत्न तो मैं जीवन भर करता रहा। मेकबेथ, जुलियस सीजर, हैमलेट जैसे अनेक पात्र गढ़ता रहा। इसके बावजूद मैं जीवन भर यह नहीं समझ पाया कि मैं कौन हूँ। विलियम शेक्सपियर सचमुच अंग्रेजी के ऐसे लेखक हैं जिन…

एक कवि : एक कविता : केदारनाथ सिंह

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( जब सबद की शुरूआत हुई थी तब इस स्नेह-सौजन्य की कल्पना तक मन में न थी जो इतने कम दिनों में इसे मिल रहा है। इसके दो बहुत साफ कारण थे। पहला और प्रमुख तो यही कि इस माध्यम से किसी न किसी प्रकार से जुड़ा हुआ और इससे अपना बहुतेरे कामकाज निपटाने वाला पाठक-वर्ग भी इसे अपने लिए गंभीर पाठ्य-सामग्री, जैसा उसे पत्रिकाएं आदि मुहैया कराती रही हैं, उपलब्ध कराने वाला स्रोत नहीं मानता। दूसरे, हिन्दी में जो-कुछ ब्लॉग के नाम पर परोसा जा रहा है और उसकी वजह से जैसी इसकी छवि लोगों के मन में बन गई है, उससे अच्छी तरह वाकिफ होने के बाद भी यहाँ ऐसा कुछ शुरू करना निरा जोखिम का काम था। स्वीकार करना चाहता हूँ कि यह सुविचारित था। परवाह बस इस बात की थी कि हमारे समय में शब्द-कर्म में संलग्न लेखकों का सहयोग सबद को प्राप्त हो सकेगा अन्यथा नहीं। पर अब जब हर तरफ से आश्वासन और सहयोग मिल रहा है तो सिवाय उसे कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार कर आगे बढ़ने के अलावा मेरी कोई भूमिका यहाँ नहीं है। मुझमें यह अहसास गहरा गया है कि सबद निरंतर रहेगा.....आज इसमें एक महत्वपूर्ण योग युवा कवि-लेखक यतींद्र मिश्र करने जा रहे हैं। यह उन्हीं का सुझाव थ…

नए कवि....तुषार धवल की लम्बी कविता

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( कविता में लंबे समय से गृहस्त तुषार धवल स्वाभाविक संकोच और शिथिलता के कारण छपने से ज्यादा छुपते रहे। लेकिन देर से ही सही, जब उनकी कविताएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं के माधयम से पाठकों तक पहुँचने लगीं तो एक नए कवि के विषय-वस्तुकी रेंज और उस पर उसकी आमूल पकड़ से कुछ अचम्भा ही हुआ। वह शायद इसलिए भी क्योंकि नए कविओं में अधिकतर के पास हरी घास की दूब नहीं, ठूठ थी जिसे वे कविता में रोपने की बेजां कोशिश अब तक कर रहे हैं। तुषार की कविताएं इससे इतर इस अजनबी दौर में मर्माहत मनुष्यता को चिह्न-बुन रही है। उसमें सामने के समय का मोहक आवरण भेदने की दृष्टि और उसे महीन व्यंग्य में व्यक्त करने की सलाहियत है। अनर्जित चीख और गुस्से से उसे गुरेज है। साथ ही वह कोई अवलेह बन जाने की हसरत भी नहीं पालती, ताकि मर्ज़ का इलाज हो सके। उसकी सबसे बड़ी आकांक्षा पाठकों में उस विवेक को उदबुध करने की ही रही है जिससे उनके भीतर मानुस होने का अहसास मुसलसल बना रहे। सबद नए कवि की अपनी सीरीज तुषार धवल से शुरू करने जा रहा है। पत्रिकाओं में तुषार की जो कविताएं अब तक सामने आई हैं, उससे कुछ भिन्न आकार-प्रकार की,''तुम्हें फांसी नह…