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Showing posts from May, 2008

शम'अ हर रंग में

वैद की डायरी में वैद हैं। हर रंग में। जलते-सुलगते। बेलिहाज रोशनी में अपने को टटोलते। अपने लेखन के प्रति समर्पित और शंकालु। लेखकों, किताबों, कलाओं और कलाकारों के प्रति सदय और कभी-कभार सख्त भी। विवरणों में बेहद नपे-तुले। जिक्र अपना हो या दूसरों का, वह अटपटे और आत्ममुग्ध प्रसंगों से परे है। उर्दू कविओं की तरह बात को एक बहर में कहने का सलीका उन्हें खूब आता है। उनका यह विलक्षण गद्य-गुण उनकी पहली औपन्यासिक कृति,''उसका बचपन'' से ही ज़ाहिर हो गया था। इन पचास वर्षों में भी उसकी काव्यात्मक अन्विति और प्रभाव में कोई कमी नहीं आई है। बहुत सफलतापूर्वक उन्होंने निर्भीक औपन्यासिक प्रयोग किए और हिन्दी नाटकों को वैसी नाट्य कृतियाँ दी जो उसके सुदीर्घ विकास में अनहुआ थीं। तीन बरस पहले जब उनकी पहली डायरी,''ख़्वाब है दीवाने का''छप कर आई तब यह भी साफ हो गया कि इस विधा में भी वैद लगा-बंधा न लिखकर वह दर्ज कर रहे हैं जिसकी ज़द्दोजहद में एक लेखक ताउम्र रहता है। यूं यह उनके लंबे अमरीकी प्रवास की डायरी है और इसे उनके हालिया प्रकाशित दूसरी डायरी,''शम'अ हर रंग में'…

और भी ग़म हैं

पहले एक बानगी : ''मैं डायबिटीज की जगह मधुमेह शब्द बोल नहीं पाता। डायबिटीज एक रूखा-सूखा शब्द है जो बीमारी जैसा लगता है, जबकि मधुमेह कान को इतना मीठा लगता है कि अनजाने में इश्क हो सकता है''। यह के.बिक्रम सिंह हैं, अपने खास अंदाजे बयां के साथ। बिक्रम हिन्दी के उन गिने-चुने लेखकों में से हैं, जिनकी ख्याति किसी पोथी से नहीं, बल्कि अखबार में हर दूसरे रविवार लिखे जाने वाले उनके कालम के कारण है। हालांकि अब इन्हें पोथी की शक्ल और और नाम दोनों मिल गए हैं और पहले संकलन,''कुछ गमें दौरां'' के बाद यह दूसरी जिल्द हाल ही में,''और भी ग़म हैं'' नाम से छप कर आई है। जो बात बिक्रम के लेखन को अखबार की एकदिनी ज़िन्दगी से उबार कर उसे स्थाई महत्व का बनाती है, वह उसमें ज़ज्ब हल्दी की गाँठ के पनसारिओं का यह युग ही नहीं, समय के उपलों की आग पर सीझी हुई यादें भी हैं। पहले की तरह कुछ गप्प, घुमक्कडी और उनकी शेखी-शोखी तो खैर है ही। भूलना नहीं चाहिए कि बिक्रम मंजे हुए फिल्मकार भी हैं, इसलिए उनके लेखन में लक्षित बिम्बधर्मिता और उसका लयात्मक संयोजन इतना चुस्त है कि वह तिरस…

आगामी

आने वाले दिनों में सबद कुछ और लेखकों के रचनात्मक सहयोग से समृद्ध होगा। वे यहाँ अपना नियमित स्तम्भ लिखा करेंगे। हम उनके स्तम्भ हर पखवाडे प्रकाशित किया करेंगे। इस कड़ी में कवि-लेखक यतींद्र मिश्र कविता पर, युवा कहानीकार प्रभात रंजन वेदेशी साहित्य पर और हमारे समय की महत्वपूर्ण कवयित्री-कथाकार अनामिका जनसत्ता-चर्चित अपना अनूठा स्तम्भ,''राग-रंग'' यहाँ जारी रखेंगी। हमारी यह कोशिश है कि साहित्य, कला और विचार में जो महत्व का है, उसकी ओर हम लगातार इशारा करते रहें। इससे ज्यादा ( और कम भी ! ) हम नहीं चाहते। अपनी प्रतिक्रियाएं और सुझाव लिखिएगा...शेष फ़िर....

वाजश्रवा के बहाने

कुछ तो काव्य-वस्तु की समानता और कुछ उसमें सक्रिय काव्य-विवेक के कारण कुंवरजी की हालिया प्रकाशित लम्बी कविता,''वाजश्रवा के बहाने'' उन्हीं के प्रबंध काव्य,''आत्मजयी'' की याद दिलाती है। ''आत्मजयी'' में कवि-दृष्टि के केन्द्र में मृत्यु थी, तो,''वाजश्रवा के बहाने'' में जीवन की ओर से मृत्यु को देखने की कोशिश की गई है। जिस दौर में ''आत्मजयी'' छप कर आई थी उस दौर की हिन्दी आलोचना को कविता के बाहर काव्य-सत्य पाने-जांचने में बड़ी दिलचस्पी थी। अकारण नहीं उसने इस कृति को निरे अस्तित्ववादी दार्शनिक शब्दावलिओं में घटा कर अपने काम से छुट्टी पा ली थी। उम्मीद है बीते वर्षों में वह इतनी प्रौढ़ और जिम्मेदार हो चुकी है कि कविता को उसके अर्जित जैविक अनुभव और काव्य-गुण के आधार पर जांचने की जहमत उठाए। अन्यथा यह एक निर्विवाद तथ्य है कि उसकी तत्कालीन बंद सोच के बावजूद ''आत्मजयी'' आधुनिक हिन्दी कविता की एक उपलब्धि है। ''आत्मजयी'' की तरह हालांकि,''वाजश्रवा के बहाने'' में कवि से प्रबंधत्व…

मेरे युवजन मेरे परिजन

हमारे यहाँ पत्रों को उसके दस्तावेजी महत्व के बावजूद इस लायक नहीं माना गया कि गंभीर सोच-विचार के दायरे में लाकर उसके ज़रिये व्यक्त सचाई को इतिहास सम्मत साचाइओं से मिलाकर देखा-परखा जाए। यह जानने की कोशिश की जाए कि उनमें खुबा व्यक्ति मन किस कदर अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में भी रचने के लिए उद्धत और व्यग्र रहा है। या यह सहज कौतुक ही कि रचना की ओट में रचनाकार की दुनिया और उसमें उसका होना-जीना कैसा रहा है। अपने रचनाकारों के प्रति जिज्ञासा का ऐसा भाव पश्चिम में बहुत उत्कट रहा है और वहाँ ऐसे ढेरों उदाहरण मिलते हैं जब पत्र , डायरी और स्मृतलेख का सहारा लेकर न सिर्फ साहित्येतिहास को गत्यावरोध से उबारा गया बल्कि रचनाकार और उसके बाहर-भीतर के ज्ञात सत्य में भी कुछ नया और सार्थक जोड़ने की कोशिश की गई। इधर जब हिन्दी के बड़े कविओं में से एक मुक्तिबोध को लिखे पचास कवि-लेखकों के करीब तीन सौ पत्रों का संकलन,''मेरे युवजन मेरे परिजन'' नाम से देखने में आया तो लगा कि उन पर हुए पर्याप्त लेखन के बावजूद ऐसा बहुत-कुछ है जो हमसे अनजाना रहा आया था और वह हम शायद कभी न जान पाते यदि अव्वल तो अपनी रच…

रचने का अचरज

( किसी रचना की जड़ें कब और किन परिस्थितियों में लेखक के मन में फूटती हैं, इसके बारे में बता पाने में स्वयं लेखक को कठिनाई महसूस होती है। अपनी कालजयी कहानी 'परिंदे' के बारे में प्रसिद्ध कथाकार निर्मल वर्मा का कहना था कि वह एक बड़ी हास्यास्पद-सी परिस्थिति में शुरू हुई थी : एक बार जब वे शाम के झुटपुटे में एक गर्ल्स हॉस्टल के सामने से गुजर रहे थे और लड़कियां बारजे पर खड़ी हँस रही थीं, उसी दरमियान इस कहानी का ख़याल उनके मन में आया। बहरहाल, हम यहाँ कुछ नामचीन लेखकों की वे संक्षिप्त टीपें प्रकाशित कर रहे हैं, जिनमें उन्होंने रचने के अचरज को अपने तईं समझने-समझाने की कोशिश की है। इन अंशों का अनुवाद कथाकार राजी सेठने हमारे लिए किया है। उनके प्रति आभार ! साथ में दी गई तस्वीर गूगल से। )


गैब्रियल गार्सिया मारक्वेज
कॉलेज के दिनों में एक रात किसी दोस्त ने फ्रान्ज़ काफ्का की कहानियों की एक किताब लाकर दी। मैं अपने ठिकाने पर लौटा और 'मेटामोर्फोसिस' पढ़ने लगा। पहले वाक्य ने ही मुझे जैसे पलंग से नीचे पटक दिया। मैं बहुत हैरान-परेशान हो गया। पहली पंक्ति थी,''जैसे ही ग्रेगर समसा, बेचैन…

रिल्के पर राजी सेठ

(सबद उन लेखकों के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करता है जिन्होंने इसे अपनी रचनाओं के प्रकाशन के लिए उपयुक्त स्थान माना और शीघ्रता से अपनी रचनाएँ उपलब्ध कराई। लेखकों की रचनाओं के प्रकाशन की शुरुआत हमने वरिष्ठ कवि कुंवर नारायण की कविताओं से की थी। अब इसी क्रम में हमें हिन्दी की वरिष्ठ कथाकार राजी सेठ का सहयोग प्राप्त हुआ है। राजी का रिल्के प्रेम जग ज़ाहिर है। उन्होंने जितनी लगन और काव्यात्मक सूझबूझ से महान जर्मन कवि रिल्के को हिन्दी में गृहस्त बनया है वह अपने-आप में प्रतिमान सरीखा है। उनका रिल्के के पत्रों का अनुवाद पुस्तकाकार प्रकाशित-प्रशंषित हो चुका है। यहाँ हम रिल्के पर लिखा उनका लेख पहली दफा छाप रहे हैं।)

अंतरालों का अन्वेषक - रिल्केएक अच्छी कविता लिखने के लिए तुम्हें बहुत से नगर और नागरिक और वस्तुएं देखनी-जाननी चाहिए। बहुत से पशु और पक्षी ...पक्षियों के उड़ने का ढब , नन्हें फूलों के किसी कोरे प्रात: में खिलने की मुद्रा , अज्ञात प्रदेशों ...अनजानी सड़कों को पलटकर देखने का स्वाद। अप्रत्याशित से मिलन। कब से अनुमानित बिछोह। बचपन के अनजाने दिनों के अबूझ रहस्य , माता-पिता जिन्हें आहत करना पड़ा…

हिन्दोस्तां हमारा

यह हम सब के लिए एक ज़रूरी किताब है। इसलिए नहीं कि अदब और अदीब में हमारी किसी कदर दिलचस्पी है, बल्कि इसलिए इस खूरेंजी वक्त में हमारे हिस्से ऐसी नेमतें कम बची हैं। कभी प्रसिद्ध इतालवी चिन्तक-कथाकार उम्बेर्तो इको ने कहा था : ''वही कौम हिंसा पर उतारू होती है जिसका अपने अदब से रिश्ता कमज़ोर पड़ जाता है''। इस नुक्ते पर गौर करें तो यह समझना मुश्किल न होगा कि कहीं-न-कहीं हमारा भी अपने अदब से रिश्ता कमज़ोर या शिथिल पड़ गया है और इसका फायदा फिरकापरस्तों ने उठायाहै। अन्यथा यह तथ्य है कि खूरेंजी से कहीं बड़ा तो हमारा संग-साथ रहने-निभाने का इतिहास है।

वर्षों पहले उर्दू के मशहूर शायर जां निसार अख्तर ने इसी संग-साथ को उसके तमाम रंगोबू में ''हिन्दोस्तां हमारा'' नाम से दो खंडों में पेश किया था। संकलन की खूबी ये जानिए कि शुरूआती सफों में ही यह हमें इस सरलदिमागी से निजात दिला देता है कि उर्दू, जिसे हम अक्सर मुसलमानों की भाषा मान लेते हैं, दरअसल खड़ी बोली के विकासक्रम में अर्जित एक खालिस भारतीय भाषा है और इसने यहाँ की भाषिक संस्कृति के अनुरूप ही खुले मन से हिन्दी, संस्कृत, …

देवप्रिया

यह एक खेदजनक सचाई है कि अन्यथा रसिक कहलाने वाला हिन्दी का साहित्य-समाज शास्त्रीय कलाओं और कलाकारों के प्रति बेहद उदासीन रहा है। यही वजह है कि इन पर गहरी रीझ-बूझ के साथ हिन्दी में बहुत कम लेखन देखने को मिलता है। इस उदासीन परिवेश में, बजरिये कलाकारों के ही, जिन चंद लोगों ने धीरज और समझ के साथ लिखा है, उनमें युवा कवि यतींद्र मिश्र का नाम उल्लेखनीय है। ''देवप्रिया'' जो प्रख्यात नृत्यांगना सोनल मानसिंह पर एकाग्र है, के पहले भी वे सुप्रसिद्ध गायिका गिरिजा देवी पर एक बहुप्रशंसित पुस्तक लिख चुके हैं। देवप्रिया में भी पिछली कृति की तरह ही संवाद और विचारों का सुंदर संयोजन है। दूसरे शब्दों में, इसे एक सहृदय कवि और विचारशील नर्तकी के उत्कट बौद्धिक साहचर्य का प्रतिफल भी कहा जा सकता है। देवप्रिया संबोधन नर्तकी के लिए है। वह इसलिए कि सारी नृत्यांगनाएँ देवता को प्रिय हैं। यूं भी नृत्य-कला का उद्गम स्थल मंदिर और उसका अर्घ्य देवताओं को समर्पित रहा है। भरतनाट्यम और ओडिसी में समान रूप से दक्ष सोनल मानसिंह ने बातचीत के क्रम में इन प्राचीनतम नृत्य विधाओं की परम्परा, उसमें प्रयोग के स्थल और …

शहरजाद के नाम

इंतज़ार हुसैन भारतीय उपमहाद्वीप और उर्दू के सबसे बड़े कथाकारों में से एक हैं। उनके फन से हर सजग पाठक गहरे मुत्तासिर है। हुसैन का विपुल लेखन हिन्दी में अनूदित होकर समय-समय पर सामने आता रहा है। इस कड़ी में उनके उपन्यास ''बस्ती'' की बरबस याद आती है जिसे कॉलेज के दिनों में पहली बार पढ़ा था और उसके जादुई असर में हम साथी अर्से तक रहे थे। हुसैन के साथ और समानांतर कथा-साहित्य में बहुत से बदलाव आए। फिर भी उन्होंने अपने को साधे रख कर वह सिरजा जो चिरस्थाई है। उनके पाठकों के लिए उनके गद्य के आस्वाद का एक और अवसर वाणी प्रकाशन ने मुहैया कराया है। खुर्शीद आलम द्वारा ''शहरजाद के नाम'' शीर्षक से उनकी डेढ़ दर्ज़न कहानियों के इस अनूदित संग्रह से गुजरते हुए उनकी ही कही एक उक्ति दुहराने का मन करता है : ''ग़ालिब ने अपने पत्रों में कहीं कहा है कि शायर की इंतहा यह है कि फिरादौसी बन जाए। मेरे हिसाब से कहानीकार की इंतहा यह है कि शहरजाद बन जाए''। बिला शक वे इस इंतहा तक पहुँच सके हैं। वे हमारे शहरजाद हैं। इसलिए उन्हें सुनिए। उनके यहाँ इस तुमुल कोलाहल में भी कहने के ल…

रंग तेंडुलकर की क्षति !

एक उदास ख़बर यह है कि प्रसिद्ध नाटककार विजय तेंडुलकर का 19मई को निधन हो गया। तेंदुलकर को उनके नाटकों ''खामोश अदालत जारी है'' ''घासीराम कोतवाल'' ''गिधाडे'' ''कमला''आदि के लिए जाना जाता है। इसके अलावा उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण फिल्मों की पटकथाएँ भी लिखीं। तेंडुलकर ने मराठी रंगमंच को उसके परंपरागत और ठस रूपबंध से उबार कर बदलते वक़्त से जोड़ा। इसके लिए उन्होंने जो रंगयुक्ति अपनाई वह अप्रत्याशित और विवादास्पद थी। ''गिधाडे'' के बारे में अभिनेता डॉक्टर श्रीराम लागू ने लिखा है : ''सेंसर बोर्ड से नाटक पास हो गया था, पर उसमें करीब डेढ़ सौ आपत्तिजनक शब्दों को हटाने को कहा गया था। रूढ़ अर्थ में जिसे गालियां कहते हैं वे नाटक में बहुत थीं, लेकिन वह गिद्धों की भाषा थी- सुसंस्कृत मानव की नहीं। उन्हें उसी भाषा में बोलना चाहिए। शहरी, सभ्य भाषा में बोलते तो वे गिद्ध नहीं लगते। मनुष्य में गिद्धत्व को प्रखरता से वास्तविक धरातल लाने में इस नाटक की भाषा का बहुत बड़ा योगदान है।'' इस एक टिप्पणी से तेंडुलकर के नाटकों का…

कुंवर नारायण की नई कविताएं

( यह किसी सौभाग्य से कम नहीं है कि सबद को उसकी शुरुआत के दूसरे ही दिन हिन्दी के अत्यन्त प्रतिष्ठित कवि कुंवर नारायण का रचनात्मक सहयोग मिला है। कुंवरजी ने अपनी कुछ कविताएं हमें सहर्ष छापने को दी। यहाँ प्रेम और मृत्यु जैसी शाश्वत थीम पर उनकी कविताएं प्रस्तुत हैं। यह इन कविताओं का पहला ही प्रकाशन है। )
इतना कुछ था
इतना कुछ था दुनिया में
लड़ने झगड़ने को
पर ऐसा मन मिला
कि ज़रा-से प्यार में डूबा रहा
और जीवन बीत गया

अच्छा लगा
पार्क में बैठा रहा कुछ देर तक
अच्छा लगा,
पेड़ की छाया का सुख
अच्छा लगा,
डाल से पत्ता गिरा- पत्ते का मन,
''अब चलूँ'' सोचा,
तो यह अच्छा लगा...


आगाज़

हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
व्यक्ति को मैं नहीं जानता था
हताशा को जानता था
इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया
मैंने हाथ बढ़ाया
मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ
मुझे वह नहीं जानता था
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था
हम दोनों साथ चले
दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे
साथ चलने को जानते थे। 
 ***

[ यह कविता हिन्दी के मूर्धन्य कवि विनोदकुमार शुक्ल की है। 
सबद की शुरुआत इन्हीं शब्दों से।
गुफ्तगू उन सबसे है जिनका एक घर सबद निरंतर में भी है। 
जरिया सबद है। 
गरज इतनी कि लोगों का उससे सम्बन्ध और घना हो। 
ख़ुद भी लिखता रहूँगा और कोशिश रहेगी कि समर्थ रचनाकारों की नई-पुरानी रचनाओं को भी सबद के माध्यम से आपके सामने लाऊं, जिनका होना हमें कई तरह से समृद्ध करता है। ]