<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><rss xmlns:atom='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' version='2.0'><channel><atom:id>tag:blogger.com,1999:blog-7056011166391074188</atom:id><lastBuildDate>Sun, 20 Dec 2009 17:50:11 +0000</lastBuildDate><title>सबद...</title><description></description><link>http://vatsanurag.blogspot.com/</link><managingEditor>anuragji.kaisehain@gmail.com (anurag vats)</managingEditor><generator>Blogger</generator><openSearch:totalResults>138</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-7056011166391074188.post-4659721370764357973</guid><pubDate>Sun, 20 Dec 2009 17:36:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-12-20T23:20:12.023+05:30</atom:updated><title>सबद विशेष : ९ : मिक्लोश रादनोती</title><description>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/Sy5bZ5vSwQI/AAAAAAAAApw/eViaQcTEn-A/s1600-h/Miklos%20Radnoti%201.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" ps="true" src="http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/Sy5bZ5vSwQI/AAAAAAAAApw/eViaQcTEn-A/s640/Miklos%20Radnoti%201.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;span style="background-color: #b6d7a8;"&gt;&lt;em&gt;( मिक्लोश रादनोती हंगरी के किसी कवि का नाम है और उनकी कवितायें हिंदी में उपलब्ध हैं और यह सिवाय उन कविताओं के अनुवादक के किसी को ध्यान तक नहीं की कवि का यह जन्म शताब्दी वर्ष है, इन्हीं तथ्यों से प्रेरित है सबद की यह &lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/search?updated-max=2009-12-13T19%3A43%3A00%2B05%3A30&amp;amp;max-results=1"&gt;&lt;strong&gt;विशेष&lt;/strong&gt; &lt;/a&gt;पोस्ट&lt;span style="background-color: yellow;"&gt;. &lt;strong&gt;&lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/2009/10/blog-post_10.html"&gt;विष्णु खरे&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; कविता और आलोचना लिखने के बाद जिस काम को बहुत श्रम और सुरुचि से अनेक वर्षों से करते आ रहे हैं उनमें अनुवाद भी है. और हमें उनका ऋणी होना चाहिए की उन्होंने हिंदी में विश्व की अनेक भाषाओं से इतने विपुल अनुवाद किये हैं. रादनोती के ये अनुवाद और उन पर लेख छब्बीस बरस पहले उन्होंने पुस्तकाकार किये थे. बत्तीस पृष्ठों की वह पुस्तक एक लम्बे अरसे से अप्राप्य है. मुझे संयोग से उसकी एक प्रति विष्णुजी की स्टडी में मिल गई थी और कवितायें पढने के फ़ौरन बाद मैं उसे ले उड़ा. क्यों यह आप आगे पढ़कर जानिए. फिलहाल विष्णुजी के सहयोग के लिए आभार. )&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;span style="background-color: #cc0000;"&gt;&lt;span style="background-color: #990000;"&gt;&lt;br /&gt;खंड : क : कवितायें&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #f1c232;"&gt;यहाँ इतनी कारें&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहन, तुम देखती हो कितने सारे भिखारी &lt;br /&gt;और अभागे, और कितने सारे भलेमानस चीथड़े बीनने वाले &lt;br /&gt;सिर्फ़ हम दो हैं : मुट्ठी बंधे भिखारी &lt;br /&gt;और गूंगे अभागे &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहन, अपना हाथ मुझे पकडाओ, यहाँ इतनी कारें &lt;br /&gt;और इतने सारे बड़े लोग चलते हैं कि हमें होशियार रहना होगा &lt;br /&gt;अगर मैंने तुम्हें छोड़ दिया तो अंधे गलियारे तुम्हें ले जायेंगे &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहन, देखो, हम दो हैं : एक पिता के सपने &lt;br /&gt;और दो मांओं की तकलीफें हम में चीखती हैं &lt;br /&gt;दो सुन्दर आलिंगनों की निशानियों की तरह, देखो, &lt;br /&gt;हम बचे हैं, दो महान स्वप्न-स्मृतियाँ, और हमारे ख्वाब &lt;br /&gt;सुबहों में धीरे-धीरे सरकते हैं, दिन के डंठलों के खेतों पर &lt;br /&gt;हम सपने देखते हैं &lt;br /&gt;और जब घूमने जाते हैं तो एक-दूसरे का हाथ पकड़े रहते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;(१२ अक्टूबर १९२८)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #f1c232;"&gt;मद्धिम पंक्तियाँ, सिर झुकाए हुए&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;(अन्ताल फोर्गाच के लिए)&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आधी रात के करीब मेरी मान ने मुझे जन्म दिया &lt;br /&gt;सुबह तक वह मर चुकी थी ; बुखार उसे ले गया &lt;br /&gt;और मैं खलिहानों में अलंकृत शब्दों में &lt;br /&gt;प्रसव और ताकतवर माताओं के बारे में सोचता हूँ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बार, आधी रात को, फिकर मेरे पिता को &lt;br /&gt;अस्पताल के बिस्तर से, मुंह बाए&lt;br /&gt;डॉक्टरों के बीच में से ले गई; मैंने तब &lt;br /&gt;उन लाल आँखों वाले लोगों को वहीँ पीछे छोड़ दिया &lt;br /&gt;और अकेला रहा हूँ, बहुत अरसे से &lt;br /&gt;घरों के बाहर रह रहा हूँ. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने पूर्वजों को मैं भूल गया &lt;br /&gt;मेरे कोई वारिस नहीं होंगे क्योंकि मैं कोई चाहता नहीं &lt;br /&gt;मैं अपनी प्रियतमा की निष्फल गोद &lt;br /&gt;पीले चांद के तले अपनी बाँहों में ले लेता हूँ &lt;br /&gt;और यकीन नहीं कर सकता कि वह मुझे चाहती है, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी-कभी, चुम्बनों के बीच, मैं सोचता हूँ &lt;br /&gt;कि वह ख़राब है, लेकिन वह सिर्फ़ बाँझ है और उदास &lt;br /&gt;लेकिन मैं खुद भी उदास हूँ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और जब दिन उगने के वक़्त सितारे बुलाते हैं &lt;br /&gt;तो सब कुछ के बावजूद &lt;br /&gt;आलिंगन करते हुए हम साथ रवाना होते हैं, हम दोनों, &lt;br /&gt;सूरज के उजाले की तरफ़&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;( २८ सितम्बर १९२९)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #f1c232;"&gt;लोर्का &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्योंकि स्पेन को तुम से प्रेम था &lt;br /&gt;और प्रेम करने वाले तुम्हारी कविताएं पढ़ते थे--&lt;br /&gt;इसलिए जब वे आये तो सिवा इसके और क्या कर सकते थे--&lt;br /&gt;तुम कवि थे इसलिए उन्होंने तुम्हें मार डाला &lt;br /&gt;अब लोग लड़ रहे हैं तुम्हारे बगैर--&lt;br /&gt;फेदरिको गार्सिया लोर्का &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;( १९३७) &lt;br /&gt;&lt;/span&gt;****&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #f1c232;"&gt;सो जाओ&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे हमेशा कहीं न कहीं हत्या करते हैं&lt;br /&gt;घाटी की गोद में, जिसकी पलकें मुंदी रहती हैं,&lt;br /&gt;या खोजती हुई पर्वतों की चोटियों पर,&lt;br /&gt;कहीं भी, और मुझे यह कह कर धधास बंधाने का&lt;br /&gt;कोई मतलब नहीं है कि वह सब मुझसे बहुत दूर हो रहा है.&lt;br /&gt;शंघाई या गुएर्निका &lt;br /&gt;मेरे दिल के ठीक उतने ही पास हैं &lt;br /&gt;जितना तुम्हारा थरथराता हाथ &lt;br /&gt;या वहां ऊपर आकाश में कहीं बृहस्पति. &lt;br /&gt;अभी आकाश की तरफ़ मत देखो. &lt;br /&gt;और धरती की तरफ़ भी नहीं--सिर्फ़ सोओ.&lt;br /&gt;मौत अभी चिंगारी फेंकती हुई आकाशगंगा &lt;br /&gt;की धूल में दौड़ रही है और &lt;br /&gt;गिरते हुए बदहवास सायों को &lt;br /&gt;अपने रुपहली छिडकाव से भिगो रही है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;( २ नवम्बर १९३७ )&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #f1c232;"&gt;शांति, आतंक&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब मैं फाटक से बहार आया तो दस बजे थे &lt;br /&gt;एक डबलरोटी वाला अपनी चमकती हुई साइकल पर गता चला गया &lt;br /&gt;ऊपर एक हवाई जहाज घरघरा रहा था, सूरज चमक रहा था, दस बजे थे,&lt;br /&gt;मेरी बहन जो मर चुकी थी याद आई और वे सारी आत्माएं &lt;br /&gt;जिन्हें मैंने चाहा था, जो अब नहीं थीं, ऊपर मंडराने लगी &lt;br /&gt;मरे हुए मौन लोगों का एक अँधियारा दल ऊपर से गुजर गया &lt;br /&gt;और अचानक दिवार पर एक साया गिरा, &lt;br /&gt;चुप्पी में सुबह सहम गई, दस बजे थे &lt;br /&gt;सड़क पर शांति थी, आतंक की छुअन भी थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;( १९३८)&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #f1c232;"&gt;एक बेचैन घडी में&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं हवा में ऊँचाइयों पर रहताथा, हवा में, जहाँ सूरज था&lt;br /&gt;हंगरी, अब तुम अपने टूटे हुए बेटे को वादियों में बंद करते हो!&lt;br /&gt;तुम मुझे सायों में लपेटते हो और शाम के दृश्य में &lt;br /&gt;सूर्यास्त की तपिश मुझे आराम नहीं देती &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे ऊपर चट्टानें हैं, दमकता आकाश दूर है &lt;br /&gt;मैं गूंगे पत्थरों के बीच गड्ढों में रहता हूँ &lt;br /&gt;शायद मुझे भी चुप हो जाना चाहिए. वह क्या चीज़ है &lt;br /&gt;जो आज मुझसे कविताएं लिखवा रही है? क्या वह मौत है? कौन पूछता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज़िन्दगी को कौन पूछता है, &lt;br /&gt;और इस कविता को--इन चिंधियों को?&lt;br /&gt;जान&amp;nbsp;लो कि एक आवाज़ तक नहीं होगी &lt;br /&gt;कि वे तुम्हें दफनायेंगे भी नहीं, कि घाटी तुम्हें रोक नहीं पायेगी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हवा तुम्हें बिखेर देगी, लेकिन कुछ अरसे के बाद &lt;br /&gt;एक पत्थर से वह गूंजेगा &lt;br /&gt;जो मैं आज कहता हूँ, और बेटे और बेटियां &lt;br /&gt;जब बड़े होंगे तो उसे समझ लेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;( १० जवारी १९३९)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #f1c232;"&gt;अपने संकलन की एक प्रति पर&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं एक कवि हूँ और किसी को मेरी ज़रूरत नहीं है &lt;br /&gt;जब मैं बिना शब्दों के गुनगुनाता हूं हुं हूं हुं हूं&lt;br /&gt;तब भी नहीं. मेरा गीत बदतमीज शैतानों ने &lt;br /&gt;छीन लिया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भरोसा करो, यकीन करो मुझ पर कि मेरे पास इस बात की &lt;br /&gt;अच्छी वजह है कि शक मुझे ज़िन्दा रखे हुए है. &lt;br /&gt;मैं एक कवि हूं जो इसी लायक है कि जला दिया जाये &lt;br /&gt;क्योंकि वह सच्चाई का गवाह है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं वह हूं जो जानता है कि बर्फ सफ़ेद है &lt;br /&gt;खून लाल है और पोस्त भी लाल है &lt;br /&gt;और उसका रोएंदार डंठल खेत की तरह हरा है. &lt;br /&gt;मैं वह हूं जिसे आख़िरकार वे मार देंगे &lt;br /&gt;क्योंकि मैंने खुद को कभी नहीं मारा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;( १ जून १९३९)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #f1c232;"&gt;गीत &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुःख के कोड़े खाता हुआ &lt;br /&gt;मैं रोज चलता हूं &lt;br /&gt;अपने ही देश में ज़लावतन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और इसका शायद ही कोई मतलब है कि कब तक और कहाँ &lt;br /&gt;मैं आता हूं, जाता हूं, बैठता हूं &lt;br /&gt;और आकाश का हर एक तारा &lt;br /&gt;मेरे ख़िलाफ़ है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आकाश के तारे भी &lt;br /&gt;बादलों के पीछे छिपते हैं &lt;br /&gt;और अँधेरे में ठोकरें खाता हुआ &lt;br /&gt;मैं नदी और उसमें झुकी हुई घास तक पहुँचता हूं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहाँ सरकंडे उग रहे हैं &lt;br /&gt;अब मेरे साथ कोई नहीं है &lt;br /&gt;और लम्बे अरसे से &lt;br /&gt;मैंने वाकई नाचना नहीं चाहा है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लम्बे अरसे से ठंडी नाक वाले हिरन ने &lt;br /&gt;मेरा पीछा नहीं किया है &lt;br /&gt;मैं दलदल में से हाथ पैर मारता निकलता हूं &lt;br /&gt;और उसकी सतह से भाफ़ उठती है &lt;br /&gt;उसकी सतह से भाफ़ उठती है &lt;br /&gt;और मैं डूबता हूं, डूबता हूं &lt;br /&gt;मेरे ऊपर गिले लत्तों की तरह &lt;br /&gt;दो बाज़ मंडरा रहे हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;( ७ जून १९३९)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #f1c232;"&gt;अपने सर के नीचे तुम्हारा दायां हाथ&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने सर के नीचे तुम्हारा दायां हाथ रखकर रात मैं लेता रहा. &lt;br /&gt;दिन का दुःख अभी बाकी था. मैंने तुम्हें उसे न हटाने को कहा &lt;br /&gt;मैं तुम्हारी नब्ज़ में चलते हुए खून को सुनता रहा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करीब बारह बजे होंगे जब नींद मुझपर बाढ़ जैसी आई &lt;br /&gt;उसी तरह अचानक जैसे बहुत पहले पंख-भरे उनींदे बचपन में&lt;br /&gt;आई थी और उसी तरह धीरे-धीरे मुझे झुलाने लगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम मुझे बता रही हो कि तीन भी नहीं बजे थे&lt;br /&gt;कि मैं चौंककर उठ बैठा, डरा हुआ &lt;br /&gt;बुदबुदाने लगा, कवितायें पढ़ने लगा, अनर्गल चिल्लाने लगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डरी हुई चिड़िया की तरह मैंने अपने हाथ फैला लिए &lt;br /&gt;जो बगीचे में किसी परछाईं को देखकर अपने पंख फड़फड़ाने लगती है&lt;br /&gt;मैं कहाँ जा रहा था? किस तरह की मौत मुझे डरा रही थी?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी अपनी, तुमने मुझे चुप किया और बैठकर आँखें मूंदे मैं तुमसे चुप होता रहा &lt;br /&gt;मैं चुपचाप लेट गया, आतंकों की राह इंतजार करती रही. &lt;br /&gt;और मैं सपने देखता रहा. शायद किसी और तरह की मौत के.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;( ८ अप्रैल १९४१)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #f1c232;"&gt;तुम्हारी बांहों में&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम्हारी बांहों में झूल रहा हूं मैं &lt;br /&gt;चुपचाप &lt;br /&gt;मेरी बांहों में झूल रही हो तुम &lt;br /&gt;चुपचाप &lt;br /&gt;तुम्हारी बांहों में मैं एक बच्चा हूं&lt;br /&gt;जो चुप है &lt;br /&gt;मेरी बांहों में तुम एक बच्चा हो. &lt;br /&gt;मैं तुम्हें सुनता हूं &lt;br /&gt;तुम मुझे अपनी बांहों में लेटी हो&lt;br /&gt;जब मैं डरता हूं &lt;br /&gt;तो तुम्हें अपनी बांहों में लेता हूं &lt;br /&gt;और मैं डरा हुआ नहीं हूं &lt;br /&gt;मौत का गहरा सन्नाटा भी तुम्हारी बांहों में &lt;br /&gt;मुझे डरा नहीं सकता &lt;br /&gt;तुम्हारी बांहों में मैं &lt;br /&gt;मौत से उबर आऊंगा. &lt;br /&gt;एक सपने की तरह. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;( २० अप्रैल १९४१)&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #f1c232;"&gt;अचानक&lt;/span&gt; &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अचानक एक रात दीवार चलती है &lt;br /&gt;सन्नाटा दिल में बिगुल की तरह गूंजता है और एक कराह फड़फड़ाकर उड़ती है &lt;br /&gt;दर्द पसलियों में चाकू भोंकता है--उनके पीछे वह धड़कन भी चुप हो जाती है&lt;br /&gt;जो तकलीफ देती थी &lt;br /&gt;सिर्फ दिवार चीखती है, शरीर उठता है, गूंगा और बहरा. &lt;br /&gt;और दिल, हाथ और मुंह जानते हैं--हाँ, यह मौत है, यह मौत है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे जब जेल में बिजली झपकती है &lt;br /&gt;तो अदंर सारे कैदी और बाहर पहरा देते सारे संत्री &lt;br /&gt;जानते हैं कि कैसे उस वक़्त एक ही आदमी के शरीर में साड़ी बिजली एक साथ दौड़ रही है &lt;br /&gt;बल्ब को चुप ही रहना है, कोठरी से एक साया गुजरता है &lt;br /&gt;और अब संतरी, कैदी और कीड़े जानते हैं कि जिसे वह सूंघ रहे हैं &lt;br /&gt;वह जले हुए आदमी की मांस है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;( २० अप्रैल १९४२)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #f1c232;"&gt;मैं जान नहीं सकता&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं जान नहीं सकता कि किसी और को यह देश कैसा लगेगा, यह छोटा-सा मुल्क &lt;br /&gt;आग से घिरा हुआ, मेरे लिए यह एक घर है जिसमें दूर मेरे बचपन की दुनिया &lt;br /&gt;झूल रही है, जैसे तने से एक कोमल डाल फूटती है उसमें से मैं उगा&lt;br /&gt;और उम्मीद करता हूं कि एक दिन मेरा शरीर इसी की ज़मीन में मिल जायेगा. &lt;br /&gt;यहाँ कहीं भी रहूँ हमेशा अपने घर में हूं और जब कोई झड़ी &lt;br /&gt;मेरे पैरों पर झुकती है तू मैं उसका नाम जानता हूं और उसके फूल का नाम भी &lt;br /&gt;बता सकता हूं. मैं लोगों को जानता हूं और जानता हूं इस वक़्त &lt;br /&gt;वे कहाँ जा रहे हैं. और जानता हूं गर्मी के सूर्यास्त में &lt;br /&gt;इसका क्या मतलब हो सकता है कि दीवारों से लाल-सा दर्द टपके. &lt;br /&gt;जो हवाबाज़ ऊपर उड़ता है उसके लिए यह देश सिर्फ एक नक्शा है.&lt;br /&gt;वह नहीं जानता कि कवि वोएरोशमार्ती कहाँ रहता था. &lt;br /&gt;उसके लिए इस नक्शे में कारखाने और नाराज़ बैरकें छिपी हुई हैं &lt;br /&gt;मेरे लिए टिड्डे, बैल, गिरजाघरों के कंगूरे, भले मुलायम खेत. &lt;br /&gt;वह दूरबीन के जरिये कारखाने और जुते खेत देखता है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं कांपते हुए मजदूर देखता हूं जिसे अपने काम का डर है &lt;br /&gt;मैं जंगल देखता हूं, गीतों से भरे बागान, अंगूर के खेत, कब्रस्तान &lt;br /&gt;और एक छोटी बहुत बूढी औरत जो कब्रों के बीच रोती जा रही है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और ऊपर से जो रेल की पटरियां दिखती हैं या मशीन्घर जिन्हें मिटा देना है &lt;br /&gt;वह नीचे एक लाइनमैन की झोपड़ी है जिसके सामने वह खड़ा हुआ है &lt;br /&gt;लाल झंडी दिखता हुआ और बच्चे उसे घेरे हुए हैं &lt;br /&gt;मशीनघर के बाड़े में एक कुत्ता लोटपोट होता हुआ खेल रहा है &lt;br /&gt;और वहां पार्क में मेरी पुराणी प्रेमिकाओं के कदम अब भी बने हुए हैं &lt;br /&gt;उनके मीठे चुम्बन अब भी मेरे होठों पर हैं, शहद की तरह साफ. &lt;br /&gt;और एक बार स्कूल जाते वक़्त सड़क के किनारे मैं एक पत्थर पर &lt;br /&gt;बैठ गया था कि उस दिन इम्तहान से बच जाऊँ--&lt;br /&gt;यह रहा वह पत्थर --क्या उतनी ऊँचाई से उसे देख पाते हो?&lt;br /&gt;कितनी भी कोशिश करो नहीं देख सकते उसे &lt;br /&gt;उसकी सारी बारीकियों के साथ--ऐसा कोई यंत्र अभी नहीं बना है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम गुनाहगार हैं बेशक, जैसे दूसरे देश भी हैं &lt;br /&gt;हम जानते हैं कि हमने कैसे हदें तोड़ी हैं, कब कहाँ और किस तरह &lt;br /&gt;लेकीन यहाँ बेगुनाह कामगार भी रहते हैं और कवि भी &lt;br /&gt;और दूध पीते बच्चे जिनमें चेतना अभी जाग रही है &lt;br /&gt;और उनमें उनमें दमकती है; वे उसे बचा रहे हैं, अँधेरे तलघरों में छिपी हुए &lt;br /&gt;जब तक कि शांति अपनी उंगुली से इस देश को फिर से उकेर न दे &lt;br /&gt;और तब वे हमारे घुटे हुए शब्दों को साफ और ऊंचे शब्दों में कहेंगे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात के रखवाले बदल, हम पर अपना विराट पंख फैला ले. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;( १७ जनवरी १९४४)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #f1c232;"&gt;न याद न जादू&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तक मेरे दिल में सारा गुस्सा इस तरह छिपा रहता था &lt;br /&gt;जैसे सेब के बीचोबीच गहरे भूरे रंग के बीज छिपे रहते हैं. &lt;br /&gt;और मैं जानता था कि मेरे पीछे-पीछे हाथ में तलवार लिए एक फ़रिश्ता चलता है &lt;br /&gt;जो मुसीबत के वक़्त मेरी हिफाज़त करता है, मुझे बचाता है. &lt;br /&gt;लेकिन किसी बीहड़ दिन तुम सुबह उठो और पाओ &lt;br /&gt;कि सब कुछ बर्बाद हो चूका है और तुम भूत की तरह निकल जाते हो &lt;br /&gt;अपनी जो थोड़ी बहुत चीजें थीं उन्हें छोड़कर, करीब-करीब नंगे, &lt;br /&gt;तो तुम्हारे खूबसूरत दिल में, जो अब हल्का हो चूका है, &lt;br /&gt;एक वयस्क नम्रता जागने लगती है, संजीदा, संकोची &lt;br /&gt;और अगर तब तुम कहोगे विद्रोह तो दूसरों के लिए कहोगे और वैसा निःस्वार्थ करोगे &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और यह एक ऐसे मुक्त भविष्य की आशा में कहोगे जो दूर से ही दमक रहा है. &lt;br /&gt;मेरे पास कभी कुछ नहीं था और न आगे कभी होगा &lt;br /&gt;जाओ और जरा एक लम्हे के लिए मेरी ज़िन्दगी की इस दौलत पर विचार करो &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे दिल में कोई गुस्सा नहीं है, बदले की मुझे परवाह नहीं &lt;br /&gt;यह दुनिया फिर से बनाई जाएगी--मेरी कविताओं पर रोक लगने दो &lt;br /&gt;मेरी आवाज़ हर नई दीवार की नींव के पास सुनी जाएगी &lt;br /&gt;अपने में मैं वह सब कुछ जी रहा हूँ जो बाकी दिनों में मुझ पर होगा &lt;br /&gt;मैं पीछे मुड़कर नहीं देखूंगा क्योंकि मैं जानता हूँ कि मैं किसी भी तरह नहीं बचता &lt;br /&gt;न मुझे कोई याद बचाएगी न कोई जादू--मेरे ऊपर का आसमान मनहूस है &lt;br /&gt;अगर तुम मुझे कहीं देखो दोस्त तो कंधे झटक देना और मुद जाना &lt;br /&gt;जहाँ पहले तलवार के लिए एक फ़रिश्ता था &lt;br /&gt;वहां शायद अब कोई नहीं है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;( ३० अप्रैल १९४४) &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #f1c232;"&gt;अंश &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं एक ऐसे ज़माने में इस धरती पर रहा &lt;br /&gt;जब आदमी इतना गिर गया था &lt;br /&gt;कि वह अपनी मर्ज़ी से दूसरों की जान लेता था, मज़े के लिए, किसी के हुक्म से नहीं&lt;br /&gt;उसकी ज़िन्दगी पागल इरादों से बनी थी&lt;br /&gt;वह झूठे खुदाओं में यकीन करता था, बदगुमान, उसके मुंह से फेन गिरता था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं एक ऐसे ज़माने में इस धरती पर रहा &lt;br /&gt;जब विश्वासघात और हत्या का आदर होता था &lt;br /&gt;खूनी, गद्दार और चोर हीरो थे&lt;br /&gt;और जो चुप रहता था और ताली नहीं बजाता था &lt;br /&gt;उससे ऐसी नफ़रत की जाती थी जैसे उसे कोढ़ हो. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं एक ऐसे ज़माने में इस धरती पर रहा &lt;br /&gt;जब अगर एक आदमी साफ़-साफ़ कह देता था तो उसे छिपाना पड़ता था &lt;br /&gt;और शर्म से अपनी मुट्ठियाँ चबनी पड़ती थीं &lt;br /&gt;मुल्क पागल हो गया था--खून और गलाज़त में धुत &lt;br /&gt;अपने भयानक अंजाम पर खुश होता था &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं एक ऐसे ज़माने में इस धरती पर रहा &lt;br /&gt;जब मां अपने ही बच्चे पर एक लानत थी &lt;br /&gt;औरतें अपने हमल गिराकर खुश होती थीं &lt;br /&gt;टेबिल पर रखे गाढ़े ज़हर के प्याले से झाग उठता था &lt;br /&gt;और जिंदा थे वे ताबूत में कैद सड़ते हुए मुर्दों से रश्क करते थे &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं एक ऐसे ज़माने में इस धरती पर रहा &lt;br /&gt;जब कवि भी चुप थे &lt;br /&gt;और इसाइया की प्रतीक्षा कर रहे थे--&lt;br /&gt;भयानक शब्दों के जानकार उस पैग़म्बर की--&lt;br /&gt;क्योंकि सिर्फ़ वही एक सही शाप दे सकता था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;( १९ मई १९४४)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: #f1c232;"&gt;&lt;strong&gt;जड़ &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जड़ में ताक़त लहकती है &lt;br /&gt;वह बारिश पीती है, तले की ज़मीन उसका खाना है &lt;br /&gt;और उसके सपने बर्फ की तरह सफ़ेद हैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धरती के नीचे से वह ऊपर फूटती है &lt;br /&gt;ऊपर बढती है, चालाक है यह जड़ &lt;br /&gt;इसका हाथ ठीक रस्सी की तरह है,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जड़ के हाथ पर कीड़ा सोया हुआ है&lt;br /&gt;जड़ के पैर पर कीड़ा चिपका हुआ है &lt;br /&gt;सारी दुनिया कीड़ों से सड़ रही है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन अन्दर जड़ जिंदा है &lt;br /&gt;उसे दुनिया की कोई चिंता नहीं है &lt;br /&gt;सिर्फ़ उस डाल की है जिसे अब पत्तों ने ढक लिया है,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस डाल से ही वह प्यार करती है और उसे ही पोस्ती है &lt;br /&gt;उस तक बढ़िया स्वाद भेजती है &lt;br /&gt;अच्छे, मीठे, आकाश-पके स्वाद &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब मैं खुद एक जड़ हूं&lt;br /&gt;मेरा घर कीड़ों में है &lt;br /&gt;वहीं मैं यह कविता बना रहा हूं &lt;br /&gt;कभी एक फूल था अब मैं जड़ हो गया हूं &lt;br /&gt;भारी&amp;nbsp;और काली ज़मीन मेरे हाथ और पैर पर है &lt;br /&gt;मेरी किस्मत ऐसी ही लिखी थी &lt;br /&gt;और अब मेरे माथे पर आरे की आवाज़ है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;( ८ अगस्त १९४४)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #f1c232;"&gt;जबरन कूच&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह आदमी पागल है जो गिरने के बाद उठे और चलने लगे &lt;br /&gt;घुटनों और टखनों को फिर जगाये, अकेला, भटकते हुए दर्द की तरह &lt;br /&gt;फिर राह पकड़े जैसे उसे पंख उड़ाए लिए जा रहे हों &lt;br /&gt;खंदक बेकार ही उसे आवाज़ देती है, उसमें रुकने की हिम्मत नहीं है &lt;br /&gt;और अगर तुम पूछोगे कि क्यों नहीं है तो शायद वह मुड़कर कहेगा &lt;br /&gt;उसकी पत्नी उसका इंतजार कर रही है और एक ज्यादा सांगत, सुन्दर मौत. &lt;br /&gt;बेवक़ूफ़ अभागा! पिछले लम्बे अरसे से उन घरों पर &lt;br /&gt;सिर्फ़ एक झुलसती हुई हवा बही है &lt;br /&gt;उसके घर की दीवार ढह गई है, बेर का पेड़ टूट चूका है &lt;br /&gt;और घर की साडी रातें दर से चीखती हैं &lt;br /&gt;ओह, बस अगर मैं मान पाता कि जो कुछ भी सहेजने लायक है &lt;br /&gt;वह सिर्फ़ मेरे दिल में ही नहीं है--कि धरती पर अब भी मेरा घर है &lt;br /&gt;काश कि ऐसा है! पहले ही की तरह बेरों का ताज़ा मुरब्बा &lt;br /&gt;पुराने बरामदे में ठंढा होता हुआ, चुप्पी में गुनगुनाती हुई मधुमक्खियां&lt;br /&gt;गर्मियों के अंत की चुप्पी, उनींदी, धुप सेंकती, &lt;br /&gt;वृक्षों पर पत्तियों के बीच झूलते हुए नंगे फल &lt;br /&gt;और सुनहरे बालों वाली मेरी पत्नी मेरा इंतजार कर रही है कत्थई हाते की बाड़ी के पास &lt;br /&gt;जहाँ सुबह धीरे-धीरे छाया पर छाया लिखती है &lt;br /&gt;क्या यह सब हो सकता है ? देखो, आकाश में आज पूरा चंद है &lt;br /&gt;मुझे छोड़कर न गुजर जाओ दोस्त, पुकारो, और मैं फिर उठ चलूंगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;( १५ सितम्बर १९४४)&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #f1c232;"&gt;पिक्चर पोस्टकार्ड&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;१&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;बुल्गारिया से भरी, बेकाबू तोपों की धमक. &lt;br /&gt;वह पहाड़ की रीढ़ से टकराती है, हिचकिचाती है और गिरती है. &lt;br /&gt;आदमी, जानवर, गाडियां और ख़यालों का एक बढ़ता हुआ ढेर. &lt;br /&gt;हिनहिनाकर सड़क अपने पिछले पैरों पर खड़ी होती है &lt;br /&gt;आसमान अपनी अयाल लिए भाग रहा है. चलाचली के इस भूचाल में &lt;br /&gt;तुम मुझमें हो, हमेशा के लिए &lt;br /&gt;मेरे वजूद में तुम दमकती हो, चुप और अचल,&lt;br /&gt;मौत के सामने गूंगे फ़रिश्ते की तरह या &lt;br /&gt;एक सड़े&amp;nbsp;हुए पेड़ के गढ़े में अपने को गड़ाते हुए कीड़े की तरह. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;( ३० अगस्त १९४४)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;२&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;ज्यादा नहीं यहाँ से नौ किलोमीटर दूर &lt;br /&gt;खलिहान और घर जल रहे हैं &lt;br /&gt;खेत की मेड़ पर बैठे हुए डेरे और गूंगे ग़रीब&lt;br /&gt;तमाखू पी&amp;nbsp;रहे हैं &lt;br /&gt;भेड़ चराने वाली एक छोटी लड़की झील में उतारकर &lt;br /&gt;पानी को थरथराती है &lt;br /&gt;और थरथराती हुई भेड़ें पानी में इकठ्ठा होती हुईं &lt;br /&gt;झुककर बादलों से पानी पीती हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;( ६ अक्टूबर १९४४) &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;३ &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;बैलों के थूथन से खूनी फेचकुर लटक रहा है &lt;br /&gt;हर आदमी खून की पेशाब कर रहा है &lt;br /&gt;गारद जंगली गठानों जैसी खड़ी है गंधाती &lt;br /&gt;और ऊपर घिनौनी मौत मंडराती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;(२४ अक्टूबर १९४४)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;४&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;मैं उसके बाजू में गिर पड़ा, उसकी लाश उलट गई &lt;br /&gt;जो अभी से ही उस रस्सी की तरह तन गई थी जो टूटने वाली हो.&lt;br /&gt;उसकी गर्दन में पीछे से गोली मारी गई थी, 'तुम भी इसी तरह ख़त्म होगे' &lt;br /&gt;मैंने फुसफुसाकर अपने से कहा : 'बस अब चुपचाप पड़े रहो' &lt;br /&gt;धीरज अब मौत में फूलने वाला है &lt;br /&gt;डेअर श्प्रिंगट नोख आउफ़ : ये सभी चल सकता है :&lt;br /&gt;मेरे ऊपर एक आवाज़ ने कहा &lt;br /&gt;मेरे कान पर कीचड-सना खून सूखने लगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;( ३१ अक्टूबर १९४४)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;**** &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: #b4a7d6;"&gt;खंड : ख : रदनोती पर विष्णु खरे&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;९&lt;/strong&gt; नवम्बर १९४४ को एक फ़ौजी दस्ते ने मिक्लोश रादनोती को गोली मार दी.&amp;nbsp;रादनोती तब ३५ वर्ष के थे.&amp;nbsp;नात्सी जर्मनी की फ़ौज की निगरानी में वे बेगार करने वाले कैदी मजदूरों की एक बटालियन में थे और उस समय सर्बिया में काम कर रहे थे, लेकिन जब पूर्वी मोर्चे से धुरी शक्तियों की सेनाओं ने पीछे हटना शुरू किया तो वे अपने साथ कम करने वाले इन बंदी मजदूरों को भी हंगरी से होते हुए पश्चिम में खदेड़ कर ले जाने लगीं.&amp;nbsp;उत्तर पश्चिम में अब्दा नामक गाँव के पास जो मजदूर कैदी इतने कमज़ोर हो गए थे कि जर्मनी नहीं जा सकते थे, उनके पहरेदारों ने उनकी हत्या कर दी और एक सामूहिक कब्र में उन सबको दफना दिया.&amp;nbsp;जब विश्व युद्ध समाप्त हो गया और अगले साल वे सारी लाशें खोदकर निकाली गईं तो रादनोती की बरसाती में एक नोटबुक मिली जिसमें कवितायें लिखी हुई थीं--कुछ तो उनकी मौत से कुछ ही दिनों पहले लिखी गई थीं.&amp;nbsp;यह कवितायें मानो एक कठोर क्लासिकी नियंत्रण में लिखी गई कवितायें हैं, नपे-तुले शब्दों वाली, अपने शिल्प में लगभग सम्पूर्ण--ये कवितायें हैं जिन पर युद्ध की भयावह छाया है और जो कवि के इस अहसास से संपृक्त हैं कि उसकी मृत्यु समय से पहले होनी तय है.&amp;nbsp;लेकिन फिर भी ये कवितायें उन मानवीय भावनाओं और मूल्यों के प्रति पूर्णतया प्रतिबद्ध हैं जिन्हें मानव सभ्यता ने पोसा है.&amp;nbsp;दरअसल इन अन्तिम कविताओं की ''रूपवादिता'' और सूक्ष्मता ही उन भावनाओं और मूल्यों की अभ्व्यक्ति है और कवि की प्रतिबद्धता की घोषणा करती है.&amp;nbsp;करीब दस वर्षों से मिक्लोश रादनोती स्वयं को ऐसी मृत्यु के लिए तैयार कर रहे थे.&amp;nbsp;उनकी कविताओं को उनके कालक्रम में पढ़ना उस प्रक्रिया को थोड़ा-बहुत समझना है जिसमें एक व्यक्तिगत प्रतिभा ऐतिहासिक घटनाओं से विकसित होती है--साथ ही यह भी जानना है कि प्रतिभा अपने समय के इतिहास में किस तरह एक अर्थ देख लेती है.&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रादनोती&lt;/strong&gt; का जन्म बुदापेश्त में १९०९ में हुआ था.&amp;nbsp;वे यहूदी थे किंतु ऐसा लगता है कि उन्हें अपने धर्म या जाती से कोई विशेष लगाव नहीं था--यद्दपि ऐसा कहा जा सकता है कि शायद अनजाने ही उनकी कविता पर उनके धर्म ने प्रभाव डाला है.&amp;nbsp;बचपन में उन्हें किसी तरह का स्नेह या सुरक्षा नहीं मिले. उनकी माँ तथा एक जुड़वां भाई की मृत्यु प्रसव के समय ही हो गई थी और पिता भी उसके बाद बहुत ज़्यादा समय तक जीवित नहीं रहे.&amp;nbsp;जिन धनवान चाचा ने मिक्लोश को पाला उनके प्रति मिक्लोश की भावनाएं न बहुत अच्छी थीं और न बुरी, हालाँकि चाचा ने उनके साथ कोई दुर्वयवहार नहीं किया और उचित ढंग से पला-पोसा और पढ़ाया-लिखाया.&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;इस&lt;/strong&gt; शताब्दी के तीसरे दशक में मध्य यूरोप के प्रायः सरे देशों में राजनेतिक स्थिति बदतर हो काहली थी और मिक्लोश रादनोती को भी अपनी असुरक्षा का अहसास होने लगा.&amp;nbsp;१९२० से १९२४ तक हंगरी पर एडमिरल होर्थी का छद्म-संसदीय शासन था.&amp;nbsp;होर्थी एक अति -प्रतिक्रियावादी, सतर्क तानाशाहनुमा शासक था जिसने&amp;nbsp;हर प्रकार के राजनीतिक विरोध या प्रतिवाद को कुचलने की कोशिश की.&amp;nbsp;अपनी अवसरवादी महत्वाकांक्षा से प्रेरित होकर उसने हंगरी को हिटलर के सुपुर्द कर दिया. समाजवादी तथा बुद्धिजीवी रादनोती के लिए होर्थी सरकार घृणित थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;१९३४&lt;/strong&gt; में जब रादनोती ने सेगेद विश्वविद्यालय से हंगारी और फ्रेंच भाषाओं में विशेष योग्यता के साथ स्नातक उपाधि प्राप्त की तब उनके तीन काव्य-संग्रह प्रकाशित हो चुके थे.&amp;nbsp;उनकी प्रारंभिक कविताओं पर तीन प्रमुख प्रमुख प्रभाव थे--फ्रांसीसी अवां-गार्द, जर्मन अभिव्यक्तिवाद तथा रचनावाद का वह हंगारी संस्करण जिसे प्रसिद्द हंगारी समाजवादी कवि तथा सिद्धांतकार लायोश कस्साक के साथ जोड़ा जाता है. रादनोती की पहली किताब, ''एक मूर्तिपूजक का स्वागत'' ( पोगानी कोसोंतो) अधिकतर भावुकतापूर्ण, वाल्ट विटमैन जैसी जीवन, प्रकृति और शारीरिक प्रेम की कविताओं की है. लेकिन आगामी, वयस्क रादनोती की झलक भी कुछ पंक्तियों में मिल जाती है जिनमें एक अलग ही ऊष्मा, विषाद और इसाई प्रतीकवाद के स्पर्श मिलते हैं. १९३२ के आसपास मिक्लोश रादनोती अपने दिशाहीन, वायवीय विद्रोह से मुक्त हुए और एक ज्यादा ठोस अभिव्यक्ति की ओर मुड़े--राजनीतिक प्रतिवाद उनकी कविता का एक महत्वपूर्ण अंग बन गया. इस दौर में रादनोती पर मार्क्सवाद का प्रभाव पड़ा पर उनमें कठमुल्लापन नहीं था. इसी बीच उन पर कैथलिक कवि-धर्मगुरु शान्दोर शिक का प्रभाव भी पड़ा. धीरे-धीरे रादनोती केवल,''सर्वहारा कवि'' ही नहीं रहे, बल्कि देशी-विदेशी राजनितिक घटनाओं में उनकी दिलचस्पी और उन्हें लेकर उनकी चिंताएं और गहराने लगीं. वे मानो एक भूकंप सूचक यंत्र बन रहे थे--एक ऐसा संवेदनशील औजार जो विस्फोट को होने से बहत पहले महसूस कर लेता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हिटलर&lt;/strong&gt; सरीखी भयावह शक्तियों के उदय को रादनोती जैसे एकदम पहचान गए थे. सितम्बर १९३४ में लिखी एक कविता में वे कहते हैं : &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;उसे बचाने के लिए उसे तुम अपनी बाहों में लेते हो &lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;जबकि तुम्हारे आसपास दुनिया तुम्हारी टाक में छिपी है &lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;आखिरकार अपने लम्बे चाकुओं से तुम्हे ख़त्म कर देने के लिए&lt;/em&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;इसमें &lt;/strong&gt;कोई शक नहीं कि संकेत नात्सी बर्बरता की और है. इसके बाद से रादनोती ने स्वयं को एक अभिशप्त आदमी समझा. उस समय जर्मनी जैसा नात्सीवाद हंगरी से दूर था लेकिन रादनोती एक भयावह भविष्य को देख प् रहे थे. सारे यूरोप में मानव-विरोधी नृशंस शक्तियां सिर उठा रही थीं और रादनोती के मस्तिष्क में अपनी स्वयं की नियति तथा पहले से ही पीड़ित लोगों के प्रति सहानुभूति मानो एकाकार हो गए. स्पेनी गृह युद्ध से पहले वर्ष में प्रकाशित उनके काव्य-संग्रह का शीर्षक इसका गवाह है : 'चलते रहो, तुम मृत्यु-अभिशप्त' ( १९३६). रादनोती ने समस्या का हल खोज निकला था. उनके लिए सवाल यह नहीं था कि 'क्या मैं मरूँगा?' या 'क्या मैं मर सकता हूँ', बल्कि सवाल था, 'मैं कैसे मरूँगा?' एक कविता में वे पूछते हैं, 'और जहाँ तक तुम्हारा सवाल है, नौजवान, किस तरह की मौत तुम्हारी राह देख रही है?' अपनी उम्र के बचे हुए आठ वर्षों में यह 'मृत्यु-शैली' ही उनकी केन्द्रीय चिंता थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रादनोती &lt;/strong&gt;के वयस्क कृतित्व में अपनी क्रूर मृत्यु का यह निर्विकार चिंतन लगभग एक रुग्न ग्रंथि की तरह मौजूद है. इसका कारन क्या है? कुछ मनोविज्ञानंवादी आलोचकों ने इसकी जड़ें एक अपराध-भाव में खोजी हैं--रादनोती को जन्म देते समय ही उनकी मान तथा उनके साथ पैदा होने वाले जुड़वां भाई की मृत्यु हो गई थी. रादनोती इसे कभी भुला नहीं सके और स्वयं को दोषी समझते रहे. कुछ कविताओं में यह अपराध-भाव उपस्थित भी है किन्तु रादनोती की कविताओं में मृत्यु की रुग्न इच्छा अथवा उसका रुग्न वरण कहीं नहीं है. यदि कुछ है तो यह कि उनकी कविता मृत्यु के अहसास में डूबी हुई है. इस अहसास को जिन तत्वों ने गहराया वे हैं उनका यहूदी होना, बलिदान की ईसाई अधर्ना में उनकी दिलचस्पी ( युद्ध के दौरान वे रोमन कैथलिक हो गए थे) और यूरोप के तत्कालीन विनाशकारी संकट के बीच मानवतावादी परंपरा के भविष्य की चिंता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;इस&lt;/strong&gt; बिंदु पर लोर्का का एक महान प्रतीकात्मक महत्व के व्यक्तित्व के रूप में प्रकट होते हैं. अन्य कई लोगों की तरह जिनकी सहानुभूति स्पेनी गणतंत्र से थी, रादनोती को भी विश्वास था कि लोर्का की हत्या राष्ट्रवादियों ने की थी. यदि ऐसा था तो यह भी स्पष्ट था कि लोर्का को उनकी जाती अथवा क्रन्तिकारी आस्था के कारन नहीं मारा गया था. रादनोती की व्याख्या यह थी कि लोर्का को मरना ही था, क्योंकि जनता उन्हें चाहती थी और साफ़ बात तो यह थी कि वे कवि थे--जीवन-शक्तियों के प्रवक्ता थे. उनकी मृत्यु के पीछे एक सदा-सा समीकरण था : फ़ासीवाद यानी युद्ध यानी मृत्यु. फ़ासीवाद कवियों को सिर्फ इसलिए मार डालता है कि वे कवि होते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जब&lt;/strong&gt; रादनोती ने इसे समझ लिया और उसे अपनी नियति के रूप में स्वीकार कर लिया तो भौतिक विश्व के बारे में उनकी पूरी धरना बदल गई. 'एक मूर्तिपूजक स्वागत' के मनोहर प्रकृति-चित्र तिरोहित हो गए. वे बादलों में अपशकुन देखने लगे, शांत बगीचों में विचित्र चीत्कार और सिसकियाँ सुनने लगे और पतझड़ के सौन्दर्य को एक ऐसे व्यक्ति की आँखों से देखने लगे जिसके दिन गिने हुए हैं. ऐसा नहीं था कि उनकी कविताओं से उल्लास चला गया लेकिन वह उनमें एक चिंता के रूप में आया. रादनोती अपने भविष्य के प्रति कभी भी आश्वस्त नहीं हुए किन्तु उन्हें कुछ पारिवारिक सुख अवश्य मिला. १९३५ में उन्होंने अपनी प्रियतमा फान्नी दयारमाती से विवाह किया जिनके प्रेम ने उन्हें आगामी वर्षों की तकलीफों को बर्दाश्त करने की शक्ति दी. रादनोती की अंतिम कविताओं में भी उनमें फान्नी की अदम्य आस्था और अडिग प्रेम प्रतिबिंबित होते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जब&lt;/strong&gt; दूसरा विश्व-युद्ध मंडराने लगा तब हंगरी धीरे-धीरे धुरी शक्तियों के शिविर में शामिल हो गया. जब सरकार ने १९३८ और १९३९ में यहूदी-विरोधी कानून लागू किये तो रादनोती की साडी आशंकाएं सच साबित हुईं. १९४१ में जर्मन फौजों को हंगरी से होकर युगोस्लाविया पर हमला करने की अनुमति दी गई और युगोस्लाविया का जीता हुआ एक हिस्सा हंगरी ने हथिया लिया. इसी वर्ष होर्थी सरकार ने सोवियत रूस से युद्ध की घोषणा कर दी और इस तरह वह खुल्लमखुल्ला धुरी शक्तियों में शामिल हो गई. मार्च १९४४ में जर्मन फौजों का आधिपत्य हो गया और होर्थी को गर्मन राजदूत द्वारा नामजद सरकार को स्वीकार करने पर मजबूर होना पड़ा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;इन&lt;/strong&gt; घटनाओं के बीच रादनोती को जिस भयावह व्यक्तिगत नियति की प्रतीक्षा थी वह धीरे-धीरे पूरी हुई. १९४० के बाद उन्हें कई बलात बनाये गए मजदूरों की बटालियनों में भारती किया गया. बुदापेस्त पर नात्सी कब्जे के फ़ौरन बाद उन्हें युगोस्लाविया में बोर नमक स्थान कि जर्मन-संचालित तांम्बे की खान में भेजा गया. वहां उन्होंने बोर और बोग्रद के बीच रेल-पटरी बिछाने का काम किया. वहीँ उन्होंने अपनी कुछ सर्वश्रेष्ठ कवितायेँ भी लिखीं और जब १९४४ की पतझड़ में बोर का कैदी-शिविर खली किया गया तो रादनोती और उनके मजदूर-साथियों का वह जबरन कूच शुरू हुआ जिसकी परिणति उनकी हत्या में हुई. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अंतिम &lt;/strong&gt;कविताओं में रादनोती को जीवित रहने की चिंता कम ही सता रही थी--वे इतिहास के महान मुक़दमे में एक गवाह बन गए थे. अपने जीवन के अंतिम दशक में वे वह उपलब्ध करने का यत्न कर रहे थे जिसे उनके समकालीन, एक और महान हंगारी कवि, अतिला योझेफ़ में 'हीरक चेतना' कहा है --अपने सरे आध्यात्मिक तथा बौधिक साधनों को काव्यात्मक ऊर्जा की एक्सशाक्त किरण में परिणत कर देना. एक ओर उनकी कविता में यहूदी-ईसाई परम्परा दिखाई देती है तो दूसरी ओर इसे सम्पूर्ण बनती हुई समाजवादी जीवन-दृष्टि. चौथे दशक के अंतिम वर्षों के राद्नोती और १९४४ के राद्नोती में एक मौलिक अंतर है--पहले जहाँ ऐसा लगता था कि कवियों का (लोर्का की तरह) रहस्यमय ढंग से लापता हो जाना अपरिहार्य है, वहां बाद में अपनी मृत्यु के समीप आते-आते रादनोती ने समझ लिया था कि कविता में सत्य का पक्ष लेना चुनौती या आत्म-रक्षा नहीं है बल्कि खतरे में पड़े मूल्यों के साथ एकात्म होना और इस तरह उन्हें जीवित रखना है. कवि के रूप में रादनोती ज्यों-ज्यों वयस्क होते गए--लगता है कि उन पर विपत्ति जितनी बढती गई उनकी प्रतिभा उतनी ही निखरती चली गई--उनकी कविता छंद, मात्रा और लय की एक क्लासिकी शुद्धता की ओर पहुँचती चली गई. सत्य और रूपाकार के प्रति उनकी प्रतिबद्धता चरम सीमा की थी. उनके 'पिक्चर-पोस्टकार्ड', जो मृत्यु की कूच करते हुए लिखे गए हैं, मनो नरक से भेजे हुए छोटे-छोटे सन्देश हैं. युद्ध की विभीषिका के आकलन में वे निर्भीकता से वास्तविकतावादी हैं लेकिन एक बेहतर ज़िन्दगी की सम्भावना का स्वप्न देखना वे कभी नहीं भूलते. युद्ध की आग में गाँव जल रहे हैं लेकिन एक गडडडिया लड़की अभी भी अपनी मामूली ज़िन्दगी के रोजमर्रा काम में लगी हुई है और अपनी अंतिम कविता में, मृत्यु के कुछ दिन पहले, अपनी मौत को बगैर घबराये हुए ठीक-ठीक देख लेते हैं :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;उसकी गर्दन में गोली मरी गई, 'तुम भी इसी तरह ख़त्म होगे'&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;मैंने खुद से फुसफुसाकर कहा : बस चुपचाप पड़े रहो.&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;धीरज अब मौत में फूलता है. &lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रादनोती &lt;/strong&gt;को 'कैदी मजदूरों का' फ़ासीवाद विरोधी' कवि कहा गया है. लेकिन उन्हें सिर्फ इतना ही कहना उनके साथ अन्याय करना है. इसमें संदेह नहीं कि यह जानना अनिवार्य है कि रादनोती की कवितायेँ समसामयिक इतिहास के एक जघन्यतम दौर के निजी अनुभवों की कवितायेँ हैं. लेकिन अधिक महत्व इस बात का है कि रादनोती सरीखा महान कवि ही ऐसे अनुभवों से कवितायेँ बना सकता है और इसके लिए जिस साहस की आवश्यकता होती है वह रादनोती की सर्जनात्मक प्रतिभा का अविभाज्य हिस्सा था. रादनोती की महानतम उपलब्धि यह है कि वे अपने युग की विभीषिकाओं को लेकर मुखर रहे और उन्हें विलक्षण और शांत कविताओं में परिणत कर सके. रादनोती के मित्र तथा प्रसिद्द हंगारी कवि इश्त्वान वाश ने ठीक ही कहा है कि रादनोती के कृतित्व की नैतिक और कलात्मक पूर्णता को, उसके सत्य को, और सौन्दर्य को, अलग-अलग देखना असंभव है. इश्त्वान वाश कहते हैं, '' ( मिक्लोश रादनोती की कवितायें ) उन विरली उत्कृष्ट कृतियों में हैं जिनमें कलात्मक और नैतिक पूर्णता दोनों होती हैं...वे सिर्फ़ रोमांचक कृतियाँ नहीं हैं, सिर्फ़ वाकई महान कविताएं नहीं हैं, बल्कि मानवीय और कलात्मक निष्ठा का एक ऐसा उदाहरण हैं जो जितना विचित्र और संकोच में डालनेवाला है उतना अनिवार्य भी है.''&lt;br /&gt;****&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7056011166391074188-4659721370764357973?l=vatsanurag.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vatsanurag.blogspot.com/2009/12/blog-post_20.html</link><author>anuragji.kaisehain@gmail.com (anurag vats)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/Sy5bZ5vSwQI/AAAAAAAAApw/eViaQcTEn-A/s72-c/Miklos%20Radnoti%201.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-7056011166391074188.post-5214929069863320754</guid><pubDate>Sun, 13 Dec 2009 14:13:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-12-15T08:39:29.987+05:30</atom:updated><title>निधन : दिलीप चित्रे</title><description>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SyTmv_djB2I/AAAAAAAAApo/hOuAiKZxkEc/s1600-h/1397398230_6d13bbc3be.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" ps="true" src="http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SyTmv_djB2I/AAAAAAAAApo/hOuAiKZxkEc/s200/1397398230_6d13bbc3be.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="background-color: #93c47d;"&gt;&lt;strong&gt;ज़िन्दा रहने के साहस की एक अनिवार्य मुद्रा&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/2008/09/blog-post_16.html"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="background-color: #eeeeee;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: yellow;"&gt;दिलीप चित्रे&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/a&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="background-color: #eeeeee;"&gt;कैंसर से पीड़ित थे. लेकिन इतने जिंदादिल कि आप उनसे मुखातिब होकर यह अंदाज़ तक नहीं लगा सकते थे. वो आपसे प्रसन्न गप्प लगाते थे. वो कविताओं के बारे में बात करते थे. राजनीति पर भी. जब राज ठाकरे ने अपनी बदमाशियां शुरू की थी, खासकर हिंदी पट्टी के लोगों को मुंबई में अपनी गुंडई से परेशान करना शुरू किया था, दिलीप ने मेरे आग्रह&amp;nbsp;पर &lt;a href="http://navbharattimes.indiatimes.com/rssarticleshow/3659579.cms"&gt;&lt;span style="background-color: #76a5af;"&gt;नवभारत टाइम्स में&lt;/span&gt;&lt;/a&gt; ''राज-नीति'' का प्रतिवाद करते हुए एक बड़ा लेख लिखा था. दिलीप छोटों को मान देना जानते थे. उससे पहले उन्होंने सबद के लिए अपनी कविताएं दी थी, जिसे युवा कवि &lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/2009/08/blog-post_3995.html"&gt;&lt;span style="background-color: #b6d7a8;"&gt;तुषार धवल&lt;/span&gt;&lt;/a&gt; ने&amp;nbsp;अनूदित किया था. हालाँकि दिलीप की कविताओं से मेरा परिचय उस दुबली-सी कविता-पुस्तक से हुआ था, जिसे &lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/2008/06/sangat-sath.html"&gt;&lt;span style="background-color: #93c47d;"&gt;चंद्रकांत देवताले&lt;/span&gt;&lt;/a&gt; ने मराठी से अनूदित किया था.&amp;nbsp;कविताओं के अनुवाद में&amp;nbsp;राजेंद्र धोड़पकर&amp;nbsp;ने भी सहयोग किया था&amp;nbsp; जिनसे बाद में&amp;nbsp;उनकी कविता पर बात करने के अनेक अवसर&amp;nbsp;आए. दिलीप अंग्रेजी और मराठी में लिखते हुए भी हिंदी के लिए अजाने नहीं थे. हिंदी में उन्हें पसंद करनेवाले, उनसे निकटता महसूस करनेवालों का एक बड़ा जागरूक समाज है, और इस समाज को अब उनका न होना बेतरह सालता है. &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="background-color: #eeeeee;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: #ffd966;"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="background-color: #eeeeee;"&gt;दिलीप की कविताओं के लाउड, लोडेड और एब्सर्ड टेम्परामेंट की ओर लोगों का ध्यान अक्सर गया है, पर इसके भीतर मराठी संत-कवियों ज्ञानदेव, नामदेव और तुकाराम के ज़ज्ब होने की बात लगभग अलक्षित गई है. उन्होंने अपनी कविताओं के बारे में कभी लिखा था : '' मेरी कविता-- चाहे वह मराठी में लिखी गई हो चाहे अंग्रेजी में, मराठी सांस्कृतिक परम्पराओं की गहराइयों से उपजी है...और इसीलिए वह मेरी भारतीयता का विश्वमुखी आविष्कार भी है.'' मेरे ख़याल में दिलीप को पढ़ते हुए दूसरी कई बातों के साथ इसका भी ध्यान रखना चाहिए. उन्होंने कविता को अपने लिए ''ज़िन्दा रहने के साहस की एक अनिवार्य मुद्रा तथा न्यास'' कहा था. उन्होंने अंत तक यह साहस बरकरार रखा.&amp;nbsp;इस चंचल समय में दिलीप चित्रे की यह दृढ़ता याद आएगी, कइयों को यह निश्चय ही अनुकरणीय भी जान पड़ेगी&lt;/span&gt;&lt;span style="background-color: #eeeeee;"&gt;. &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="background-color: #eeeeee;"&gt;&lt;span style="background-color: white; font-size: x-small;"&gt;( १० दिसम्बर, २००९ की सुबह दिलीप चित्रे का निधन हो गया. वे ७१ वर्ष के थे. )&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7056011166391074188-5214929069863320754?l=vatsanurag.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vatsanurag.blogspot.com/2009/12/blog-post_13.html</link><author>anuragji.kaisehain@gmail.com (anurag vats)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SyTmv_djB2I/AAAAAAAAApo/hOuAiKZxkEc/s72-c/1397398230_6d13bbc3be.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>5</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-7056011166391074188.post-8896589440236873123</guid><pubDate>Fri, 04 Dec 2009 20:45:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-12-06T15:51:21.357+05:30</atom:updated><title>सबद विशेष : ८ : व्योमेश शुक्ल की लम्बी कविता</title><description>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="background-color: #b6d7a8;"&gt;&lt;span style="background-color: #ffe599;"&gt;(&lt;em&gt;अपने &lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/2009/08/blog-post.html"&gt;&lt;strong&gt;पहले संग्रह&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; की सत्तावन कविताओं के बाद &lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/2009/04/blog-post_15.html"&gt;&lt;strong&gt;व्योमेश &lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;किस तरफ रुख करते हैं, इसका हम कविता-प्रेमी पाठकों को बेसब्री से इंतजार था. उनकी इस ५८ वीं कविता से, जो सबद के साथ-साथ रंग-प्रसंग के नवीनतम अंक की भी शोभा है, यह बात पुष्ट होती है कि वे अपनी कविता का एक सफल चक्र पूरा कर उसे दुहराने की बजाए अभी कुछ और पाने का दुर्लभ यत्न कर रहे हैं और उनकी अब तक की प्राप्ति को उनके रहबर चंद दूसरे कवियों की कविताओं के साथ मिलाकर देखें तो इधर की कविता पर इतरा लेने की पर्याप्त वजहें हमें आसानी से मिल जायेंगीं. व्योमेश के यहाँ शिल्प, भाषा और कथ्य के स्तर पर निरंतर सजगता बरती गई है और यह सजगता ही 'लीलामय' जैसी कविता संभव करती है. इसका विन्यास धोखेबाज़ है. विस्तार हैरत में डालनेवाला. आज और आज से पहले व्योमेश की अन्य कविताओं की तरह यहाँ भी अनिवार्य सन्दर्भ-बिंदु हैं और इनके '' बीच लीला लगातार होती रही - भले ही कुछ दूरी पर, याने जिन घटनाओं, लोगों, परिस्थितियों के ज़रिये इतिहास ख़ुद को घटित कर रहा था या कर रहा है, लीला उनके समानान्तर रहकर हो रही थी या हो रही है - शायद उनसे दूर रहकर ही या उनसे दूर रहकर भी''.कविता इन लीलाओं को दर्ज करती है और हम जो पढ़ते हुए कविता में ऐसी लीलाओं के अभ्यस्त नहीं हैं, उन्हें भी विचित्र ढंग से लीला में लपेटती है. &lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/2009/05/blog-post.html"&gt;&lt;strong&gt;सबद विशेष&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; की इस आठवीं पेशकश में व्योमेश शुक्ल की यह पहली लम्बी कविता. दिया गया चित्र एक इंडोनेशियाई कलाकार का है. )&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;img border="0" er="true" src="http://3.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SxlWKdf0dRI/AAAAAAAAApk/sNdTBjOL4a4/s400/ramayana.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #f1c232;"&gt;लीलामय&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;/div&gt;1&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पानी&lt;/strong&gt; में पांच बत्तख तैर रहे थे। तट पर खड़ा आदमी मछली को खाना खिला रहा था। निषादराज भगवान कीं आरती कर रहे थे। भगवानजी उस पार जाना चाह रहे थे। बच्चे मुहल्लेवाले प्रजा लग रहे थे। कविता गाई जा रही थी। एक आदमी गाय को सानी-पानी दे रहा था। मेला लगा हुआ था। बच्चे को पानी-भगवानजी-मेले-बत्तख-मछलियों-गायों में से हरेक बहुत अच्छा लग रहा था। उसे मालूम नहीं होगा या जो भी हो, वह उस पानी को नदी कहना चाहता था। मैं उससे कहना चाहता था कि ‘नहीं’ तो वह ‘नहीं’ सुनना नहीं चाहता था। वह पानी के बारे में कुछ पुराना सुनना चाहता था। मैं पानी के भविष्य को लेकर परेशान होना चाहता था। वह मुझी को लेकर परेशान होना चाहता था। यह कहने में कि ‘भविष्य में पानी ख़त्म हो जायेगा’, पानी की बड़ी बर्बादी थी। पानी के ख़त्म होने से पहले ही पानी के ख़त्म होने की उदासी में मैं एक अतीत था। पानी के पुराने को जानने में बच्चे की दिलचस्पी पानी का भविष्य थी। कभी-कभी चीज़ें उल्टी दिखाई देती हैं। मैंने पानी को उल्टा करके देखा तो पानी सीधा था । नदी को उल्टा बहा देने से प्रदूषण की समस्या का क्या होगा सोचता हुआ मैं उल्टी गंगा बहाने वाला मुहावरा हो गया था। शहर भर के सीवेज को उल्टा बहा देने से क्या होगा? निपटना दूभर हो जायेगा और क्या? जिन शहरों के किनारे नदियाँ नहीं होतीं, जैसे बंगलोर, वहाँ के लोग क्या टट्टी-पेशाब नहीं करते? आप मान लीजिए कि आपके शहर से होकर कोई नदी नहीं गुज़रती, बस, उसमें मत विसर्जित कीजिए अपनी अशुचि। यह मानते ही कि बनारस के किनारे से नहीं बहती गंगा, गंगा बनारस के किनारे बहने लगेगी। उसकी अनुपस्थिति का यक़ीन ही उसकी उपस्थिति की उम्मीद है। मैं स्मृति की गंगा में नहाकर मुमुक्षु हो जाता हूँ । तुम एक शब्द लिखो साफ़ काग़ज़ पर गंगा। सुबह पाओगे कि वह काग़ज़ फिर से पेड़ हुआ जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लीला&lt;/strong&gt; शुरू हो गई है। राम, लक्ष्मण और सीता वनवास के लिए जा रहे हैं। राजस्व सूखा पत्ता है। अब गिरा कि तब गिरा। अब श्रृंगवेरपुर दूर नहीं और नन्दीग्रामों की ऋतु क़रीब है। निकलने से ठीक पहले भगवान व्यासजी की ओर देखकर मुस्कराते हैं। व्यासजी भी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वाक़ई लीला शुरू हो गई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;3&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रामचन्द्र&lt;/strong&gt; शुक्ल ने पता नहीं रामलीला का केवट प्रसंग देखा था कि नहीं। नहीं तो उनसे पूछा जाता कि भगवान को नाव पर बिठाने से पहले वह कबीर का भजन क्यों गाता था?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;4&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मैं&lt;/strong&gt; पेड़ का अभिनय करना चाहता रहा हूँ। पेड़ की तरह दिखना चाहना&amp;nbsp;भी है मुझमें। लेकिन इतने थोड़े से समय में मैं किस-किस का अभिनय करता फिरूँ? ख़ुद का, नागरिक या दो बच्चों के पिता का, बेटे या दोस्त का। मैं एक लड़की के फूटे हुए माथे का अभिनय करता हूँ जिसकी वजह से उसकी शादी में दिक्क़त आयेगी। एक टीबी-ग्रस्त फेफड़े का भी अभिनय किया है कुछ दिनों तक। उसमें साँस फूलने लगती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;5&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लीला &lt;/strong&gt;में अभिनय नहीं है। अभिनय है टीवी सीरियलों में। यहाँ भगवान की, स्वरूपों की झाँकी है। रामलीला का तर्क यह है कि जो होते हैं वे अभिनय नहीं करते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;6&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;भरत&lt;/strong&gt; बड़े भाई को मनाने आते हैं तो चौदह बरस के वियोग के बाद होने वाले भरतमिलाप के पहले एक बार और भरतमिलाप हो रहा है। अब दो भाई चौदह बरस बाद गले मिलेंगे याने वन जाते ही मिलने का मुहूर्त चौदह वर्षों के लिये स्थगित।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;7&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ये &lt;/strong&gt;भविष्य में होना था कि नहीं होना था। अभी तो होना था। उनकी चोटों और अपने सीने के साथ। लगातार और बेसबब। आदमी होने की ऊब थी। यानी आदमी पुनः अपने होने से ऊब गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;8&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लेकिन&lt;/strong&gt; तुम्हारे सवाल किसी को बेगाने बनाते हुए न हों, जैसे वे अक्सर होते हैं। और अभी कोई ऐसा सवाल मत पूछना जिससे पता लगे कि तुम शामिल नहीं थे या उपस्थित नहीं थे। शामिल न होने का पश्चाताप मौन में है और कहीं से भी, किसी भी छूटे हुए बिन्दु से शामिल हो जाओ, तुम्हारे जवाब अपने आप, कभी न कभी, तुम पर छा जायेंगे और बरस कर तुम्हें भिगो देंगे। तुम्हारे ऊपर ज़ाहिर हो जायेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच कहने में इतनी बाधाएँ थी कि बाधाओं के बारे में बताना ही सच बताना हो गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;9&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;एक&lt;/strong&gt; सज्जन हैं। अतिवृद्ध। रामलीला के दौरान उनके कंधे पर मृदंग टॅंगा रहता है जिसे वह ख़ुद नहीं बजाते। उन्हें मृदंग बजाना आता भी नहीं। मृदंग के लिये उनका कंधा ही प्रासंगिक है, हथेली और उंगलियाँ नहीं। जो लीलाएँ एक से अधिक जगहों पर या दो जगहों के दरम्यान चलते-चलते होती हैं वहाँ उनका कंधा काम आता है। तब मृदंग उनके कंधों पर टंगा रहता है और दूसरा आदमी उसे बजाता है। तब वह कंधा एक चरित्र बन जाता है - एक मूर्तिमान स्वरूप। उसकी वजह से ध्वनि होती है। उसकी मेहनत से संगत संभव होती है। मानस की पंक्तियों के गान में उस कंधे का आकार है। मैं उन सज्जन को करीब बीस साल से जानता हूँ, लेकिन उनके कंधे को कितना जानता हूँ ? कोई भी उस कंधे को कितना जानता है? रामलीला के सुदूर विराट अतीत में उस कंधे को हम कहाँ रखते हैं? और इन कंधों के बग़ैर रामलीला का गुणगान कितना वाजिब होगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परम्परा अक्सर ऐसी ही मुश्किल है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;10&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लीला &lt;/strong&gt;समय के ठीक बीच में घटती घटनाओं में नहीं, उनकी बग़ल में सम्पन्न होती रही है। इस तरह अनुमान लगाना आज कुछ विचित्र, कुछ काव्यात्मक लगता है कि कम से कम साढ़े चार सौ साल पुरानी यह लीला इतिहास के ज़रूरी मौक़ों पर, ख़ास जगहों पर क्या करती होगी? अंग्रेज़ों के बनारस समेत पूरे देश पर कब्ज़ा करते समय भी राम सूपर्णखा की नाक काट रहे होंगे, चन्द्रशेखर आज़ाद जब महात्मा गाँधी की जय-जयकार करते हुए अपनी पीठ पर कोड़े खा रहे थे, तब भी रावण सीता का अपहरण कर रहा होगा। 1942 के भारत छोड़ों के वक़्त भी राम अयोध्या छोड़कर जा रहे होंगे। इसी तरह आज़ाद भारत की प्रमुख घटनाओं के मद्देनज़र भी लीला को सोचा जा सकता है। इस बीच लीला लगातार होती रही - भले ही कुछ दूरी पर, याने जिन घटनाओं, लोगों, परिस्थितियों के ज़रिये इतिहास ख़ुद को घटित कर रहा था या कर रहा है, लीला उनके समानान्तर रहकर हो रही थी या हो रही है - शायद उनसे दूर रहकर ही या उनसे दूर रहकर भी। जैसे इतिहास के यन्त्र से अलग एक छोटा, फालतू-सा लेकिन लगातार चलता पुर्जा। एक कुटीर उद्योग। धाराप्रवाह के बरअक्स एक मौन तटस्थता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;11&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रामलीला&lt;/strong&gt; ने स्वयं को वस्तुओं पर कम से कम निर्भर किया है। जो वस्तुएँ वहाँ हैं, ठोस और पारंपरिक हैं। वे अनिवार्य भी हैं। उन्हें किसी दूसरी वस्तु या युक्ति से ‘रिप्लेस’ नहीं किया जा सकता। उन वस्तुओं की जड़ें&amp;nbsp;लीला के समस्त सन्दर्भों, लीला से जुड़े लोगों, लीला से जुड़े मृतकों, लीला की स्मृति और समाज में लीला के व्यापक विस्मरण तक फैल गई हैं। उन ‘कम’ वस्तुओं का, लीला की ही तरह, व्यक्तित्व है। ये वही वस्तुएँ हैं जो थीं और हमेशा, लगभग हमेशा से हैं। ये वे वस्तुएँ नहीं हैं जो पहले नहीं थीं और अब हो गई हैं। मसलन, लीला में बैकड्राप नहीं है। एक बार किसी आधुनिक नाट्यविद ने इस लीला के संयोजकों से पूछा कि अगर आप लीला में पर्दों का इस्तेमाल नहीं करते तो एक दृश्य को दूसरे दृश्य से अलग कैसे करते हैं और रंगक्षेत्र (थियेट्रिकल स्पेस) को दूसरे आमफ़हम स्पेसेज़ से अलग कैसे करते हैं? जवाब में लीला संयोजकों ने अपने कामकाज जैसी सरल और बुनियादी बातें कहीं। उन्होंने कहा कि हमारी लीला में पर्दा तो है, बस थोड़ा बड़ा और थोड़ा दूर है। वह पर्दा दरअसल आकाश का पर्दा है और हमारा अलग से कोई स्पेस नहीं है जो ज़्यादा नैतिक या ज़्यादा पवित्र हो। समूची सृष्टि ही हमारे भगवान जी की लीला स्थली है- उनका अपना स्पेस। इसलिए हम स्पेस को स्याह-सफ़ेद में विभाजित करके देख नहीं पाते हैं। हम स्पेस को संक्षिप्त और विशिष्ट भी बना नहीं पाते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;12&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;यह &lt;/strong&gt;आश्चर्य है कि आधुनिक रंगप्रयत्नों ने रामलीला की पारंपरीणता से कुछ ख़ास नहीं सीखा, बल्कि कुछ नहीं सीखा। यह दुर्भाग्य भारतेन्दु की उपस्थिति के बावजूद घटित हुआ और बनारस में घटित हुआ। अगर महाकाव्यात्मकता के मंचन की रामलीला जैसी उदार, भगीरथ कोशिश के साथ आधुनिकता की स्वस्थ अंतर्क्रिया सम्भव हुई होती तो जयशंकर ‘प्रसाद’ के नाटकों को अनभिनेय इत्यादि बताकर टालने का पलायन भी न हुआ होता। तब आधुनिक रंगमंच इतना ‘यथार्थवादी’, इतना अभिनय-निर्भर, इतना पूर्वनियोजित, इतना पूर्वानुमेय न हुआ होता। तब रंगमंच में जादू, रहस्य, कल्पना और अप्रत्याशित के लिए ज़्यादा जगह होती। तब ‘मानस’ की तरह दूसरी कविताओं को भी नाटक माना जा सकता। तब नाटक में ‘टेक्स्ट’ की ज़रूरत कुछ कम होती। अगर हिन्दी आधुनिकताएँ रामलीला से सीख पातीं तो आज की कविता कुछ ज़्यादा नाटक होती। और कुछ कम कविता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;13&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नयी &lt;/strong&gt;जिज्ञासाएँ पूछती हैं कि आधुनिक थियेटर की तरह लीला एक ही जगह पर क्यों नहीं होती? वह इधर-उधर घूम-घूमकर, एक से दूसरी जगह जाकर, दो जगहों के बीच के सफ़र में भीड़, ट्रैफिक, शोर, साधारणता और अन्य दिक्कतों के धक्के खाकर क्यों होती है? इसका एक जवाब यह है कि मुगल काल और अंग्रेज़ों के ज़माने में औरतों पर जिस तरह की बन्दिशें थीं उनके भीतर रहकर वे किसी सार्वजनिक स्थल पर जाकर मेला-तमाशा नहीं देख सकती थीं। उनके लिए ही, उनके मनोरंजन की ख़ातिर ही ये लीलाएं अपने स्थायित्व, अपनी रिहाइश में से किसी जुलूस की तरह, किसी प्रभातफेरी की तरह या बंजारों के किसी समूह की तरह निकलकर भटकने लगी होंगी। इसके बाद औरतें घरों, छतों, मुंडेरों और बरामदों से लीला के कुछ हिस्से, लीला की झाँकी देख सकती थीं। अपने घर अर्थात् मंच से लीला के निर्वासन का तर्क स्त्री की कैद को कुछ कम करने की कोशिश में भी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;14&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सूपर्णखा&lt;/strong&gt; की नाक काटने का प्रसंग सभी लीलाओं में जोर-शोर से मनाया जाता है। सूपर्णखा की भूमिका हिजड़ा निभाता है। एक कटोरी में हिजड़ा औरतों के पाँव में लगने वाला महावर लिये खड़ा रहता है। जैसे ही लक्ष्मण अपने तीर का स्पर्श (स्पर्श भर) उसकी नाक से कराते हैं, नाक कट जाती है और कटोरी में रखा महावर खून हो जाता है और सूपर्णखा उसे चीख-पुकार, रोष और विलाप के साथ मिलाकर चारों ओर फेकनें लगती है। फिर बड़ा भारी जुलूस निकलता है - गाजेबाजे और तामझाम के साथ। यह जुलूस कई किलोमीटर लम्बा होता है। बहुत से हाथी, ऊँट, घोड़े, रथ और काली का मुखौटा पहने तलवारबाज़ आगे-आगे चलते हैं। इनके भी आगे खर और दूषण के दैत्याकार पुतले। पीछे बैलगाड़ियों, ट्रालियों, ट्रेक्टरों और ट्रकों पर मिथकों, किंवदंतियों, पुराकथाओं और समकालीन जीवन-समस्याओं पर आधारित झाँकियाँ। ये सैकड़ों होती हैं। अधिकतर झाँकियों में बच्चे ही भूमिकाओं में होते हैं। यह लीला आधी रात से शुरू होती है और सुबह तक चलती है। यह रतजगे की लीला है। लीला-क्षेत्र में पड़ने वाले घर इस रात मित्रों, रिश्तेदारों, ससुराल से पधारी बहनों, बेटियों और उनके बच्चों का उपनिवेश बन जाते हैं। कुछ लोग खिड़कियों और मुंडेरों की सोहबत में नक्कटैया देखना पसंद करते हैं और कुछ मेले में पैदल भटकते हुए। अरसे तक यह त्योहार प्रेमी-प्रेमिकाओं की आदर्श स्थली बना रहा। बाद में कुछ ज़्यादा ही उद्दाम और उत्तेजक अवसर प्रेम के पैदा हो गये तो इस मोर्चे पर भी नक्कटैया पीछे छूट गई। जुलूस में शामिल झाँकियों में हास्य और व्यंग्य की केन्द्रीयता होती है। कुछ जानकार लोगों का कहना है कि पराधीनता के दौर में ब्रिटिश राज के अन्यायों की हॅंसी उड़ाने के लिए इन झाँकियों को लीला में जोड़ा गया। लीला के विराट में ये आधुनिक और विद्रोही प्रयत्न बहुत सहजता से खप गये हैं। इनकी वजह से लीला का एक भिन्न पाठ भी तैयार होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;15&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मित्र&lt;/strong&gt; साथ था और भरतमिलाप की लीला हो रही थी। बनारस की सभ्यता की लोकप्रियता का स्मारक लक्खी मेला। जिन मेलों में अनिवार्यतः लाखों लोग आते हैं, स्थानीय परम्परा में उन्हें लक्खी मेला कहा जाता है। पन्द्रह मिनट की लीला स्थानीय पुलिस और प्रशासन की तैयारियों की परीक्षा लेती हुई सम्भव होती है। चौदह वर्ष के वियोग को पार कर भाई गले मिले। लोगों ने ‘बोल दे राजा रामचन्द्र की जय’ और ‘हर हर महादेव’ का उद्घोष किया। लोगों ने ‘जय श्री राम’ का उद्घोष नहीं किया। हज़ारों यादवों के कंधे पर आरूढ़ होकर पुष्पक विमान नन्दीग्राम से अयोध्या की ओर उड़ता हुआ-सा चला। मित्र ने गर्वोक्ति के से लहज़े में कहा : ''ओसामा बिन लादेन ने 2015 तक पूरी दुनिया को मुसलमान बनाने की चुनौती दी है। क्या यह मुमकिन है?'' सवाल वाहियात था और मज़ाक या डांट में ही उत्तर दिया जा सकता था। मैंने मज़ाक किया - '‘हम सब लोग तो पहले से ही मुसलमान हैं। हमें कोई क्या बनायेगा?'' बहरहाल, हम विमान के पीछे की विराट भीड़ का हिस्सा होकर आगे चले और मित्र के सवाल का उत्तर सामने आ गया। मुसलमानों की विपुल संख्या मेला देखकर निकल रही थी। चारों ओर टोपियाँ और लुंगियां। मित्र झेंपते हुए मुस्करा रहे थे। उनकी चिढ़ इस हिस्सेदारी के आगे झूठ हो रही थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;16&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लीला &lt;/strong&gt;और प्रकारान्तर से मानस के क़रीब होने में अद्वैत का आकर्षण है। अगुण और सगुण के बीच, ज्ञान और भक्ति के बीच, शंकर और राम के बीच, होने और होने के अभिनय के बीच।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;17&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जानकारों&lt;/strong&gt; को मानस-गान बेसुरा लग सकता है। वहाँ पर्याप्त रफनेस और पराक्रम है भी। कुछ चीखना, कुछ बहरों को सुना डालने की कशिश। तर्क के धरातल पर एक बेसुरापन कभी-भी उसमें साबित किया जा सकता है। लेकिन अगर कानों में थोड़ी बहक हो और कुछ तर्कातीत सुनने का हुनर हो तो वहाँ खजाना है। वहाँ निरे-वर्तमानकालिक सुरीलेपन के फासिल्स हैं। एक आदिम आर्केस्ट्रा के जीवाश्म। और इस प्रकार बेसुरे होते जाने की प्रक्रियाएँ। बीच की धूल। रास्ते का शोर। दुर्घटनाएँ। इस संगीत से इश्क करना आसान नहीं है। यह किसी शुद्ध संगीत का अपभ्रंश है। उसे सुनना और सराहना मूल को खोजने की मेहनत है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;18&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लीला&lt;/strong&gt; के संचालन में आने वाली दिक्कतें विचित्र हैं। पैसे और संसाधन इकट्ठा करना एक चैलेंज है। हिन्दू उच्च वर्गों में रामलीला के प्रति उपेक्षाभाव है। इसी समय होने वाली दुर्गापूजाएँ ज़्यादा चमकीली और उत्तेजक हैं। वे परम फैशनेबल हैं और वक्त के साथ चलने में माहिर। सत्ता-राजनीति और कारपोरेट सेक्टर ने उनके भीतर अपने अभेद्य लालची ठिकाने बना लिये हैं। उनके संगठन में माफिया का बोलबाला है। लोग उनसे डरते हैं और यह वक़्त ऐसा है जिसमें लोग जिस चीज़ से डरते हैं उसी को पसंद करते घूमते हैं। दुर्गापूजाएँ, अजीब ट्रेजिडी है, कि बदनाम होकर प्रतिष्ठित हैं। रामलीला से उनका कोई प्रत्यक्ष टकराव नहीं है, लेकिन टकराव प्रत्यक्ष कहाँ होते हैं? लीलासमितियाँ प्राचीन हैं। उन्हें राजाओं, रईसों और महाजनों से लीला करने के लिए भूखण्ड मिले हैं। उन्हें छीन लेने और उन पर कब्जा कर लेने के षडयंत्र लगातार होते रहे हैं। लेकिन लीलाएँ खुद को बचाना और बढ़ाना जानती हैं। सबसे प्राचीन और समृद्ध रामलीला समिति ने नगर के सर्वाधिक प्रतिष्ठित वकील को अपना सचिव बना लिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह भी एक लीला है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;19&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रामकथा&lt;/strong&gt; में एक बद्तमीज पक्षी है, जयन्त। राम उसकी आँखें&amp;nbsp;फोड़ देते हैं। तुलसी के ‘मर्यादित’ टेक्स्ट में यह प्रसंग कुछ ऐसे घटित होता है कि वह पक्षी सीताजी के चरणों को अपनी चोंच के प्रहार से घायल कर देता है। वाल्मिकी के यहाँ पक्षी ज़्यादा उद्धत है। वह सीता के स्तनों को छलनी करता है। बहरहाल, यह लीला उस पक्षी की चंचलता की तरह घटित होती है। ढलती दोपहर में एक बड़े मैदान में लोग ख़ासकर नौजवान और किशोर - हाथों में पत्थर लेकर नेत्र-भंग की लीला होने का इंतज़ार करते हैं। राम जयन्त के मुखौटे की आँखों में जैसे ही तीर का स्पर्श (स्पर्श-मात्र) कराते हैं, जनसमूह उस बदमाश पक्षी पर पत्थरों की बारिश करने लगता है। जयन्त का मुखौटा पहना आदमी अक्सर लहूलुहान हो जाता है। कई बार वह जान बचाने के लिए भागता हुआ पुलिस थाने में छिप जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी बीच वह पक्षी हेल्मेट पहनकर लीला में आने लगा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;20&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रयोग&lt;/strong&gt; ‘एब्सोल्यूट’ नहीं है। वह हमेशा परम्परा की सापेक्षिकता में घटित होता है। प्रयोग से जिस चीज़ पर सबसे ज़्यादा असर पड़ता है उसका भी नाम परंपरा है। रामलीला के भीतर न जाने कितने प्रयोग उपस्थित हैं और उतने ही ज़्यादा प्रयोगों की संभावनाएँ। हरेक आगामी स्पंदन की जगह वहाँ है और उसके परिसर में पर्याप्त बड़प्पन है। वहाँ भीड़-भड़क्के और शोरगुल का आलम है और नए का स्वागत करने की वत्सल ललक। वह छोटे से छोटे नवाचार से आपादमस्तक थरथरा जाती है और झूमते हुए उसे ख़ुद में शामिल कर लेती है। उसके प्रकांड अतीत के तथ्य देखकर लग सकता है कि वह कोई स्थिर और बंद चीज़ है। लेकिन रामलीला के साक्ष्य से साबित होता है कि ऐसा है नहीं। ‘इम्प्रोवाइजेशन’ के लिए लीला के भीतर मनमानी जगहें हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मसलन्, एक शाम एक पिता अपनी दो साल की बच्ची के साथ लीला में पहुँचे। रावण का दरबार लगा हुआ था और कुछ ही देर में अंगद अपने पाँव जमाकर उसे हिला-भर देने की चुनौती वहाँ उपस्थित राक्षसों को देने वाला था। यह लीला उसी मैदान में होती है जहाँ राम-रावण युद्ध होता है। बगल में युद्धस्थल निर्माण चल रहा था। मूँगफली, गुब्बारों और गरीब खिलौनों की दुकानें लगी हुईं थी। थोड़े सयाने बच्चों का मन इस ठहरी हुई दरबारी लीला में नहीं लग रहा होगा इसलिए वे दौड़धूप के खेल खेल रहे थे। रामायणियों का दल मानस की प्रसंगानुकूल पंक्तियाँ गा रहा था। पिता गोद की बच्ची के साथ रावण-दरबार के करीब पहुँचते गये। एक ही आसन पर तीन राक्षस विराजमान थे। बीच वाला भव्य है इसलिए वही रावण है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो सिर से कमर तक कपड़े का शानदार चेहरा पहने रावण की निगाहें बच्ची से मिलीं। छोटी बच्ची रावण की आँखों की चंचल बदमाशी को समझ&amp;nbsp;नहीं सकी होगी। इसलिए उस पर कोई असर नहीं दिखा। वह डिजिटल ज़माने की बच्ची - तमाम कार्टून चैनल्स पर इस गरीबतर रावण से न जाने कितने गुना वीभत्स डरावने आकार देखने की अभ्यस्त। लीला के रावण का किंचित अपमान हुआ। वह धीरे से उठा। यह बड़ा एकान्त उठाना था। जैसे सृष्टि में कहीं भी इसे नोटिस न किया गया हो। एक सर्वथा अलक्षित मानवीय क्रिया। सिर्फ़ एक पिता और एक बच्ची सरीखे दो ग़ैर ज़रूरी दर्शकों के सामने घटित होता रंगकर्म। मूल कथा से दूर, मूल कथा से भिन्न, कहानी की वयस्क केन्द्रीयता के विरूद्ध ‘अनाख्यान’ के पक्ष में एक किशोर उत्पात। बहरहाल, तलवारधारी रावण ने गोद की बच्ची को दौड़ा लिया। और इस बार बच्ची डर गई। यह संवेदना का ‘वर्चुअल टूर’ नहीं था, जीवन-वास्तव था। यह कला-वास्तव थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;21&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;धर्म&lt;/strong&gt; के विभिन्न मतांतर, परस्पर विरोधी जीवनदृष्टियाँ और भाँति-भाँति के पक्ष-प्रतिपक्ष रामलीला नामक सांस्कृतिक अभियान में साथ-साथ सक्रिय हैं। यह महान तथ्य सुस्थापित है लेकिन इसे अभिनव उदाहरणों के साथ बार-बार दुहराने की ज़रूरत है। मौनीबाबा की रामलीला में मेघनाथ की भूमिका पाँचों वक़्त का&amp;nbsp;नमाज़ी एक मुसलमान अदा करता है। साल भर ‘राधे-राधे’ जपने वाले बल्लभाचार्य संप्रदाय के अनुयायी, गोपाल जी के भक्त, नित्यप्रति गोपाल मंदिर की परिक्रमा करने वाले और सम्भवतः वर्ष में एक बार भी विश्वनाथ जी की ओर रुख़ न करने वाले कट्टर पुष्टिमार्गी बाईस दिनों के लिये राम के हो जाते हैं। यों, ऐसे सारे परस्पर उलझे हुए संदर्भ रामलीला के साथ रहकर, लेकिन उसके समानान्तर, एक और लीलामय जीवनलीला सम्भव करते हैं।&lt;br /&gt;****&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7056011166391074188-8896589440236873123?l=vatsanurag.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vatsanurag.blogspot.com/2009/12/blog-post_05.html</link><author>anuragji.kaisehain@gmail.com (anurag vats)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SxlWKdf0dRI/AAAAAAAAApk/sNdTBjOL4a4/s72-c/ramayana.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>16</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-7056011166391074188.post-8276787475526800703</guid><pubDate>Wed, 02 Dec 2009 18:38:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-12-03T14:53:47.988+05:30</atom:updated><title>बही- खाता : ९ : जयशंकर</title><description>&lt;div class="separator" style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; clear: both; text-align: justify;"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="background-color: #ffe599;"&gt;(हिंदी के जाने-माने कथाकार जयशंकर के अब तक चार कहानी-संग्रह छप चुके हैं. &lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #f1c232; color: black;"&gt;मरुस्थल&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; नामक उनका संग्रह अत्यंत चर्चित रहा था और &lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #a2c4c9;"&gt;बारिश, इश्वर तथा मृत्यु&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; शीर्षक उनका नवीनतम संग्रह बिना किसी हो-हल्ले के हिंदी का बेस्ट-सेलर है, मेरे जाने पिछले पांच वर्ष में आया सबसे अच्छा कहानी-संग्रह भी. जयशंकर आमला जैसी छोटी जगह में रहकर लिखते हैं, यह लेखक-परिचय पढने में दिलचस्पी रखने के अलावा शायद ही कोई जानता हो. स्वयं जयशंकर के संज्ञान में लेखक संगठन या गुट वगैरह नहीं, उनसे सम्बन्ध तो दूर की बात है. ऐसे लेखकों के प्रति मन में एक सम्मान का भाव जगता है. जयशंकर ने कहानियों के अलावा समय-समय पर पत्रिकाओं में अपने जर्नल्स भी प्रकाशित कराये हैं. यह बही-खाता उनमें से ही कुछ वाक्यों का थीमैटिक चयन है. यों &lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/2009/08/blog-post_29.html"&gt;&lt;span style="background-color: #999999;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: black;"&gt;बही-खाता&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/span&gt;&lt;/a&gt;स्तंभ की यह नौवीं प्रस्तुति है. बाद में जयशंकर के जर्नल्स की दूसरी झलकियाँ भी पेश की जाएंगी.&amp;nbsp;)&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SxbHuQPe8mI/AAAAAAAAApg/uRO_bWjYRiM/s1600/writer's%20desk.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" er="true" src="http://3.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SxbHuQPe8mI/AAAAAAAAApg/uRO_bWjYRiM/s320/writer's%20desk.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #ead1dc; color: #cc0000;"&gt;लिखने के बारे में&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लिख &lt;/strong&gt;नहीं पाने की अपनी हार और हताशा, शर्म और पीड़ा से मुंह चुराने के लिए आप अपने रैक से कोई पुस्तक निकालकर&amp;nbsp;पढ़ना शुरू करते हैं। अगर आपके दुर्भाग्य से वह किताब सचमुच की किताब रही तब पढ़ते हुए भी आपकी अपनी व्यथा का विस्तार होता रहता है, आपका अवसाद आकार लेता रहता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जीवन&lt;/strong&gt; में जो अनुभव दुःख देते हैं, जिनके साथ रह पाना असहनीय हो जाता है, उन्हीं अनुभवों को किसी परिपक्व , प्रौढ़ कलाकृति में पढ़ते या देखते हुए गहरी तसल्ली मिलती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;किसी &lt;/strong&gt;भी लेखक के भीतर अधूरी आकांक्षाओं के कितने ही प्रेत बसते होंगे। शायद हर लेखक जिस चीज़ के अभाव को अपनी ज़िन्दगी में पाता होगा, उस चीज़ को अपनी कृति में पाना चाहता होगा।...हर सच्चा लेखक और कलाकार अपनी तरह से अपनी परिस्थिति, मनःस्थिति और अपनी कृति के बीच संतुलन पैदा करने में सफल होता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;वैसे&lt;/strong&gt; तो लिखने का कोई निश्चित नियम कैसे निर्धारित किया जा सकता है ? पर मन में यह संशय उठता रहता है कि लिखने के कर्म की मर्यादाएं न रहें तो यह कर्म एक अराजक कर्म भी हो सकता है।...हजारों बर्षों की सृजनात्मक चेष्टाओं के आलोक में अपनी रचनात्मक असफलताओं, कल्पना की कमजोरियों और अभिव्यक्ति की गरीबी को देखा जा सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;strong&gt;हम &lt;/strong&gt;अपने जीवन के किसी आत्मीय हिस्से में बस जाना चाहते हैं, छिप जाना चाहते हैं, रुक जाना चाहते हैं, लेकिन समय की सनक के सामने हम विवश हो जाते हैं। अपने जीवन के उस मार्मिक प्रसंग को भुलाने की तमन्ना के साथ हम उस प्रसंग को अपनी कहानियों-कविताओं में जगह देने की सफल-असफल कोशिश करते हैं। जीने के वक्त की उत्तेजना, अपने लिखे हुए में बहुत कम नज़र आती है। कल्पना, अभिव्यक्ति और रचना की असफलताओं से निरंतर संघर्ष और संवाद में ही किसी लेखक को तसल्ली का, निष्ठां का, उम्मीद का कोई अज्ञात ज़ोन नज़र आता होगा। शायद हर लेखक तारकोवस्की की फ़िल्म &lt;em&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #ea9999;"&gt;'&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Stalker_(film)"&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #ea9999;"&gt;stalker&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;/a&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #ea9999;"&gt;'&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt; के नायक की तरह एक अज्ञात ज़ोन में जाने का खतरा उठता होगा। &lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;strong&gt;मैं&lt;/strong&gt; पिछले तीन बरसों से धीरे-धीरे, डरते-डरते, रोते-थकते हुए उपन्यास लिखने की कोशिश कर रहा हूँ। अभी तक तो कुछ भी हाथ नहीं आया है। न भाषा, न पात्र, न परिवेश और न ही कोई नई बात या संवेदना। मैं सिर्फ़ लिखता चला जाता हूँ और थकता चला जाता हूँ। कभी-कभी घनी निराशा और हताशा के क्षण आते हैं जब मैं महसूस करता हूँ कि लिखते-लिखते नौ-दस बरस होने को आए हैं और मैं एक अच्छा, जीवंत और सच्चा वाक्य लिख पाने के भी काबिल नहीं बन पाया हूँ। तब यह भी महसूस होता है कि मुझे अपनी लिखने की लालसा और आकांक्षा के बारे में, कभी अपने लेखक हो जाने के स्वप्न के विषय में एक और बार सोचना चाहिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जब&lt;/strong&gt; कोई लिखना चाह रहा हो तो उसके लिए मरे हुए वाक्य से ज्यादा मृत क्या चीज़ हो सकती है?&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;strong&gt;अपने&lt;/strong&gt; लिखे हुए में कुछ महत्वपूर्ण होना चाहिए, अपनी कृतियों की निजी, विशिष्ट और जीवंत दुनिया होनी चाहिए।...ऐसा कुछ भी लिख सकूँ इसके लिए मुझे साधना करनी चाहिए, प्रतीक्षा करनीचाहिए और मैं अभी तक इन दोनों ही चीज़ों से अपना सहज रिश्ता नहीं बना पाया हूँ. ये दोनों ही चीजें मेरे लिए सिर्फ शब्द हैं।&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7056011166391074188-8276787475526800703?l=vatsanurag.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vatsanurag.blogspot.com/2009/12/blog-post.html</link><author>anuragji.kaisehain@gmail.com (anurag vats)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SxbHuQPe8mI/AAAAAAAAApg/uRO_bWjYRiM/s72-c/writer' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>6</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-7056011166391074188.post-6617669259109433164</guid><pubDate>Sun, 29 Nov 2009 19:02:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-11-30T17:20:00.646+05:30</atom:updated><title>विचारार्थ : २ : इस पुरस्कार के प्रायोजक हैं...</title><description>&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #b6d7a8;"&gt;गुरुदेव की आड़ में अकादेमी का 'सामसुंग' साहित्य प्रायोजन&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: black;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #b4a7d6;"&gt;&lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/search?updated-max=2009-09-17T18%3A43%3A00%2B05%3A30&amp;amp;max-results=1"&gt;विष्णु खरे&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SxLDvoVAVtI/AAAAAAAAApU/iHUczO4MBWM/s1600/samsung-logo.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://3.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SxLDvoVAVtI/AAAAAAAAApU/iHUczO4MBWM/s200/samsung-logo.jpg" yr="true" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;संसार&lt;/strong&gt; भर के लेखक और बुद्धिजीवी, वे वामपंथी हों या न हों, कथित 'खुलापन', 'उदारवाद', 'बाजारवाद', 'उपभोक्तावाद', 'विज्ञापनवाद', 'प्रयोजन्वाद' तथा बहुराष्ट्रीय व्यापार निगमों के विरुद्ध हैं। सामान्यतः राष्ट्रवाद और विशेषतः वामपंथ के कारण, भारतीय साहित्यकार, और उसमें भी हिन्दी के कवि-कथाकार-आलोचक, जो अधिकांशतः 'प्रतिबद्ध' विचारधारा में यकीन करते हैं, वर्तमान नव-पूंजीवाद के ख़िलाफ़ हैं। यहाँ तक कि वे कथित 'नक्सलवाद' की दिग्भ्रमित हिंसा का विरोध तो करते हैं लेकिन उसकी आधारभूत भावना के नैतिक-सैद्धांतिक समर्थक हैं। आज हिन्दी का शायद ही कोई आत्मसम्मानी लेखक हो जो आर्थिक और राजनीतिक नव-साम्राज्यवाद का विरोध अपनी विधा में न कर रहा हो- वह ईमानदारी और कला की शर्तों पर कितना खरा उतर रहा है, उसके पाठक उसे समझदारी और गंभीरता से ले रहे हैं या नहीं, यह अलग बहसों के विषय हैं। लेकिन ऐसी आशंका है कि भारत सरकार और उसके साहित्यिक प्रतिष्ठान या तो भारतीय लेखकों के इन रुझानों को जानते-समझते नहीं, या हैं भी तो उनकी परवाह नहीं करते, या यह जानने के लिए कि अपनी प्रतिबद्धता में साहित्यकार कहाँ तक जा सकते हैं, वे उन्हें उकसाने के लिए कोई अतिवादी हरकत कर बैठते हैं।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पिछले &lt;/strong&gt;लगभग २५ वर्षों से साहित्य अकादेमी अपने उत्तरोत्तर पतन के कारण पर्याप्त कुख्याति अर्जित करती आ रही है और इस प्रक्रिया में उसने हिन्दी तथा शेष भारतीय साहित्यों और लेखकों को भी भ्रष्ट किया ही है, किंतु यदि उसने अपना ताज़ातरीन कारनामा अंजाम न दिया होता तो वह कल्पनातीत ही समझा जाता। &lt;span style="background-color: #ffd966; color: black;"&gt;&lt;em&gt;साहित्य अकादेमी ने पिछले दिनों दक्षिण कोरिया के सबसे बड़े बहुराष्ट्रीय व्यापार निगम 'सामसुंग' के साथ एक समझौते पर दस्तखत किए हैं जिसके तहत वह चौबीस नए साहित्यिक पुरस्कार स्थापित करेगी जो यद्यपि 'रवींद्रनाथ ठाकुर पुरस्कार' के नाम से जाने जायेंगे, किंतु उनकी रकम और पुरस्कार-निर्णय-प्रक्रिया का खर्च 'सामसुंग' देगी।&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हालाँकि&lt;/strong&gt; अपने मोबाइल फ़ोनों, प्लाज्मा टेलीविज़नों, फ्रिजों और अन्य उपभोक्ता उत्पादों के कारण और उनकी बिक्री के लिए करोड़ों रुपयों के अपने विज्ञापनों के ज़रिये 'सामसुंग' अब 'शाइनिंग' और 'इन्क्रेडिबल इंडिया' के लिए कोई अपरिचित छाप-नाम (ब्रांड नेम) नहीं रहा, फिर भी उसके संबंध में कुछ तथ्य शायद उपयोगी हों। कोरियाई भाषा में उसके नाम का हिन्दी अर्थ 'त्रिनक्षत्र ' ( अंग्रेज़ी में 'थ्री-स्टार्स' ) होगा और ये तीन सितारे हैं, 'सामसुंग इलेक्ट्रानिक्स', 'सामसुंग हैवी इंडस्ट्रीज' तथा निर्माण कंपनी 'सैमसंग सी एंड टी'। पिछले वर्ष तक 'सामसुंग' की सकल संपत्ति २५ खरब, 2५ अरब अमेरिकी डॉलर थी, उसका मुनाफा एक खरब सात अरब डॉलर था। आज डॉलर का भाव करीब ४७ रुपये है। 'सामसुंग' दक्षिण कोरिया की सबसे बड़ी कंपनी है, अपने देश का २० प्रतिशत निर्यात करती है, संसार की सबसे बड़ी इलेक्ट्रॉनिक है, 'सोनी' से भी बड़ी, और विश्व की सभी किस्म की कंपनियों में उसका स्थान १९ वां है। दक्षिण कोरिया को परिहास में 'सामसुंग गणराज्य' कहा जाता है और और स्वयं 'सामसुंग' को 'औपनिवेशिक साम्राज्य' और 'भूखा डायनासोर' कहकर पुकारा जाता है। जब वह ईमानदार राष्ट्रों में ही सरकारों को प्रभावित कर सकता है तो संसार के भ्रष्टतम देशों में वह किन व्यक्तियों और संस्थानों को नहीं खरीद सकता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;'सामसुंग'&lt;/strong&gt; का दुस्साहस इतना बढ़ा हुआ है कि उसने चार वर्ष पहले अमेरिका में इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद ' डायनैमिक रैंडम एक्सैस मेमोरी' की कीमतों में हेराफेरी के ज़रिये कई बड़ी अमरीकी कंपनियों को नुक्सान पहुँचाने की कोशिश की लेकिन कानून के शिकंजे में आ गई। अमेरिका के न्याय मंत्रालय ने उस पर ३० करोड़ डॉलर का फौजदारी जुर्माना किया जो अमेरिका में इस तरह के अपराधों के लिए दूसरा सबसे बड़ा दंड है। 'सामसुंग' के तीन अधिकारीयों को, भले ही कुछ महीनों के लिए, लेकिन जेल जाना पड़ा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;दक्षिण&lt;/strong&gt; कोरिया में तो 'सामसुंग' के स्वामी और प्रमुख ली कुन-ही स्वयं को देश का मालिक ही समझते थे लेकिन पिछले वर्ष उन्हें अप्रत्याशित सदमा तब पहुँचा जब टैक्स-चोरी और अन्य अपराधों के लिए सरकार ने उन पर ११ करोड़ ३० लाख डॉलर का जुर्माना किया। वे हवालात भी जा सकते थे लेकिन उससे कोरिआई अर्थव्यवस्था और स्वयं 'सामसुंग' कंपनी डांवाडोल हो जाती, इसलिए उनसे अपने पद से इस्तीफा देने को कहा गया। उनके उपाध्यक्ष ली हाक-सू और ख़ुद उनके बेटे ली जाए-योंग को भी त्यागपत्र देने पड़े। 'सामसुंग' के साथ एक ही हादसा हुआ है, जब पिछले दिनों दिल्ली के समीप नॉएडा में स्थित उसकी वाशिंग मशीन उत्पादन इकाई में जहरीली गैस रिसने से ५० से अधिक कर्मचारी भोपाल के यूनियन कार्बाइड कांड जैसी बीमारी के शिकार हो गए थे, उन्हें अस्पताल ले जन पड़ा था, लेकिन जिन छः लोगों की हालत गंभीर बताई जा रही थी उनका क्या हुआ यह अब तक साफ़ नहीं हुआ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;संभव&lt;/strong&gt; है भारत सरकार और साहित्य अकादेमी को 'सामसुंग' के इस हाल के इतिहास और रिकॉर्ड का कुछ पता न हो, हालाँकि आश्चर्य यह है कि किसी अज्ञात करणवश स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आजकल संस्कृति मंत्रालय का प्रभार भी संभाले हुए हैं और उनके पास उनका एक जागरूक मीडिया विभाग भी होगा ही। इतना तो मानकर ही चलना चाहिए कि साहित्य अकादेमी ने 'सामसुंग' के साथ यह करार यदि प्रधानमंत्री कि सहमति से नहीं तो उनके संज्ञान में तो किया ही होगा। वैसे हम जानते ही हैं कि भारत को नई विश्व अर्थव्यवस्था से जोड़ने का सेहरा हमारे प्रधानमंत्री के सर पर ही जाता है जब वे नरसिंह राव सरकार में वित्त मंत्री थे और इस तरह यदि साहित्य अकादेमी ने संसार की एक सर्वाधिक ताक़तवर कंपनी से जुड़ने का फ़ैसला किया है तो संस्कृति मंत्रालय ने उसका सहर्ष अनुमोदन किया होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लेकिन&lt;/strong&gt; साहित्य अकादेमी के कुछ सूत्रों के से विचित्र बातें सुनाई दे रही हैं। &lt;span style="background-color: #ffd966;"&gt;&lt;em&gt;कहते हैं कि अकादेमी की सर्वशक्तिमान कार्यकारिणी पर पिछले कुछ वर्षों से दबाव था कि वह अपने पुरस्कारों को बड़ी निजी कंपनियों से प्रायोजित करवाए लेकिन उसने ऐसे प्रयासों को ठुकरा दिया। यह मालूम नहीं पड़ रहा है कि यह दबाव संस्कृति मंत्रालय से आया और क्या यह सामान्य सैद्धांतिक दबाव था या एकमात्र 'सामसुंग' के लिए था? अब यह बताया जा रहा है कि दबाव असह्य और अपरिहार्य हो गया और अकादेमी को, जो ख़ुद को लगातार स्वायत्त कहते रही है, अपने पुरस्कारों को 'सैमसंग' को सौंपना पड़ा।&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अकादेमी&lt;/strong&gt; ने अपने संविधान और पुरस्कार-नियमों की हत्या करके ही यह निर्णय लिया है। उसका एक-एक रूपया केन्द्र सरकार से आता है और अब तक उसके नियमों में बाहरी पैसा लेने का कोई प्रावधान नहीं है। फिर उसके जो नियमित २४ पुरस्कार हैं वे ही 'अकादेमी पुरस्कार' के नाम से जाने जाते हैं और उनके दिए जाने की एक लिखित प्रक्रिया और नियमावली है। अनुवाद के लिए दिए जानेवाले पुरस्कारों का स्थान और प्रक्रिया अलग हैं। लेकिन अकादेमी साहित्य&amp;nbsp;के लिए ही दूसरे पुरस्कार दे और उन्हें 'रवीन्द्र पुरस्कार' या 'टैगोर प्राइज़' कहे, यह न संविधानसम्मत है और न तर्कसम्मत।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अकादेमी&lt;/strong&gt; अपनी मतिमंद्ता के जाल में फंसती जा रही है। वह कह रही है कि अपने द्वारा मान्य २४ भाषाओँ के नियमित, वार्षिक पुरस्कार तो वह देगी ही, उनमें से ८ भाषाओँ को प्रतिवर्ष वह 'सामसुंग रवीन्द्रनाथ पुरस्कार' भी देगी। पहले खेप की आठ भाषाएँ होंगी : बांग्ला, हिन्दी, गुजरती, कन्नड़, कश्मीरी, पंजाबी, तेलगु और बोडो। इनके बाद अगले वर्ष आठ और तीसरे वर्ष फिर आठ। चौथा वर्ष फिर भाषाओँ की पहली किश्त से शुरू होगा। 'सामसुंग' का नाम नहीं जाएगा, रवीन्द्रनाथ का जाएगा। गुरुदेव को जोतकर अकादेमी ने बांग्ला साहित्यकारों का तो मुंह शायद बंद कर दिया, ज़ाहिर है कि इसमें अकादेमी के उपाध्यक्ष सुनील गंगोपाध्याय ने भी अपना कहावती 'पाउंड -भर मांस' वसूला होगा, लेकिन &lt;span style="background-color: #ffd966;"&gt;&lt;em&gt;सवाल यह है कि क्या अन्य भारतीय भाषाओँ में महान साहित्यकार हैं ही नहीं कि सिर्फ़ नोबेल पुरस्कार के कारण भारतीय साहित्यों को चिरकाल तक मात्र रवीन्द्र-संगीत गाना पड़े? अकादेमी यह भी कह रही है कि इन 'सामसुंग पुरस्कारों' की रकम उसके नियमित पुरस्कारों से कम होगी। क्यों? क्या इसलिए कि वह इन पुरस्कारों को अभी से दोयम दर्जे का समझती है? या इसलिए कि उसे निर्धन 'सामसुंग' कंपनी को ज़्यादा आर्थिक संघात नहीं पहुँचाना है?&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;'सामसुंग'&lt;/strong&gt; की तो यह घोषित नीति है कि वह अपने छाप-नाम के प्रचार और प्रतिष्ठा के लिए प्रायोजन करेगी। वह कई फुटबाल क्लबों, कर-रेसिंग प्रतियोगिताओं, शीत-ओलंपिकों और नियमित ओलंपिकों की प्रायोजक है। वह भारत की क्रिकेट प्रतियोगिता में भी प्रवेश करनेवाली है। शिक्षा, मीडिया आदि क्षेत्रों में भी उसकी गहरी घुसपैठ है। इसके लिए अरबों डॉलर नियोजित कर देना उसके लिए सुबह के नाश्ते के बराबर है। भारत सर्कार, संस्कृति मंत्रालय और साहित्य अकादेमी ने तो अपनी बौद्धिक का परिचय दिया है कि उसे इतने सस्ते में भारतीय साहित्य और रवीन्द्रनाथ ठाकुर को बेच दिया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;शायद&lt;/strong&gt; 'सामसुंग', उसके लिए साहित्य अकादेमी पर कथित दबाव डालने वाले अधिकारी और मंत्रालय, तथा स्वयं साहित्य अकादेमी का वर्तमान तंत्र यह जानते हों कि विश्वव्यापी नई अर्थव्यवस्था तथा बहुराष्ट्रीय व्यापारिक निगमों का जैसा-जितना भी प्रतिरोध कर रहे हैं वे प्रबुद्ध भारतीय लेखक ही हैं। साहित्य अकादेमी की साधारण सभा में विभिन्न साहित्यों के सौ के करीब प्रतिनिधि होते हैं जिनमें वरिष्ट सरकारी अधिकारी भी पड़ें नामित किये जाते हैं। उनमें से कार्यकारणी चुनी जाती है। अब ये सब 'सामसुंग' के समर्थक हो ही चुके और उनके माध्यम से सैंकड़ों अन्य लेखक, जिसमें भावी 'सामसुंग' विजेता भी होंगे, खुलेपन, उदारता, उपभोक्तावाद, बहुराष्ट्रीय निगमों के लाभ भी देख पाएंगे। ज़ाहिर है कि उनका वामपंथ और नाक्सालवाद आदि से मोहभंग हो सकगा। बहुत सस्ते में बहुत बड़ा काम हो जायेगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: black;"&gt;&lt;span style="background-color: #ea9999;"&gt;&lt;strong&gt;'सामसुंग'&lt;/strong&gt; प्रयोजन के दूरगामी प्रभाव होंगे। ललित कला अकादेमी और संगीत नाटक अकादेमी, जिनका बाज़ार से सामीप्य साहित्य से कई गुना ज्यादा है, अब अपने पुरस्कार, आयोजन, प्रदर्शनियां आदि देशी-विदेशी महकम्पनियों से प्रायोजित करवाने को स्वतंत्र हैं। चित्रकारों, नर्तकों और गायकों-वादकों की अब और बन आएगी। उनकी इन संस्थाओं को सदेबी, कृष्टि, निजी गैलरियां, विदेशी कम्पनियाँ खुलकर प्रायोजित कर सकेंगी। राज्यों की बीसियों ऐसी अकदेमियां और उनके पुरस्कार, स्वयं सरोकारों द्वारा सीधे दिए जानेवालों पुरस्कार, कंपनियों द्वारा 'फंड' किये जायेंगे। जितनी ज्यादा विदेशी कम्पनियाँ दाखिल होंगी उतने ही अधिक विदेशी लाभ होंगे। अन्याय, अत्याचार, गैर-बराबरी, शोषण, अपराध, भ्रष्टाचार आदि के खिलाफ बोलना उतना ही कम होता जायेगा। जनवादी संघर्षों के लिए समर्थन लुप्त होने लगेगा. एक राष्ट्रव्यापी सांस्कृतिक सलवा जुडूम तैयार होगा। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;एक&lt;/strong&gt; ज़माना था जब वामपंथी, जनवादी, प्रगतिवादी ही नहीं, सामान्य प्रबुद्ध लेखक भी 'कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम' के खिलाफ सच्चे-झूठे खड़े होते थे। फिर एक दौर 'सी.आई.ए.' के छिपे हाथ का आया। अब कभी-कभार &lt;span style="background-color: #93c47d; color: black;"&gt;&lt;em&gt;इस बात का विरोध होता है कि कोई लेखक किसी फासिस्ट महंत के मंच पर कैसे पहुँच गया, किसी ने भाजपा सरकारों के विज्ञापन क्यों ले लिए या कोई युवा कवि क्योंकर ताक़तवर पत्रिकाओं को अपनी किसी जेबी संस्था के माध्यम से फोर्ड फाउंडेशन की रिश्वतें देता पकड़ा गया। 'सोवियत लैंड नेहरु साहित्य पुरस्कारों' के ज़रिये शायद सोवियत संघ की 'केजीबी' ने भी कुछ किया होगा।&amp;nbsp;उनमें तो मुफ्त रूस-यात्रा भी होती थी।&amp;nbsp;लेकिन इस क्षेत्र में 'सामसुंग' की आमद, वह भी सरकारी रूप से, खुल्लमखुल्ला, एक बिलकुल अनूठे युग की शुरुआत है।&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&amp;nbsp;यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रगतिशील, जनवादी तथा जन संस्कृति मोर्चा लेखक संगठनों के हमारे मित्र जिनमें सर्वश्री ज्ञानेंद्रपति, लीलाधर जगूड़ी, राजेश जोशी, अरुण कमल, विरेन डंगवाल तथा मंगलेश डबराल जैसे मनसा-वाचा-कर्मणा नई आर्थिक व्यवस्था और नव-साम्राज्यवाद के सक्रिय विरोधी हैं, जो उनके काव्य और गद्य तथा सक्रियता में स्पष्ट दीखता है, उस साहित्य अकादेमी के इस प्रायोज्य &lt;span style="background-color: #cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;'सामसुंग रवीन्द्रनाथ साहित्य पुरस्कार'&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; के बारे में क्या सोचेंगे जिसने उन्हें अपने नियमित पुरस्कार से कभी सम्मानित किया था।&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;span style="background-color: #cccccc;"&gt;( &lt;/span&gt;&lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/2009/11/blog-post_28.html"&gt;&lt;span style="background-color: #cccccc;"&gt;विचारार्थ &lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="background-color: #cccccc;"&gt;स्तंभ की यह दूसरी कड़ी है. यह महत्वपूर्ण लेख जनसत्ता में छपने के साथ-साथ सबद के लिए विष्णुजी के मार्फ़त मिला था. उनका अत्यंत आभार! )&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7056011166391074188-6617669259109433164?l=vatsanurag.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vatsanurag.blogspot.com/2009/11/blog-post_30.html</link><author>anuragji.kaisehain@gmail.com (anurag vats)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SxLDvoVAVtI/AAAAAAAAApU/iHUczO4MBWM/s72-c/samsung-logo.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>15</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-7056011166391074188.post-807650949734154097</guid><pubDate>Sat, 28 Nov 2009 05:48:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-11-29T13:00:45.241+05:30</atom:updated><title>विचारार्थ : १ : इयुजेनियो मोन्ताले</title><description>&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SxC4aFjxBOI/AAAAAAAAApM/pcCN7UDCNlA/s1600/398px-Eugenio_Montale.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://4.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SxC4aFjxBOI/AAAAAAAAApM/pcCN7UDCNlA/s320/398px-Eugenio_Montale.jpg" yr="true" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #e06666;"&gt;वैचारिक प्रतिबद्धता आवश्यक और पर्याप्त शर्त नहीं है&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;strong&gt;नया &lt;/strong&gt;मनुष्य बहुत बूढा पैदा हुआ है. वह नई दुनिया को झेल नहीं सकता.जीवन की मौजूदा स्थितियों ने अब तक अतीत के चिह्नों को मिटाया नहीं है. हम बहुत तेजी से दौड़ते हैं, पर फिर भी कहीं पहुँचते नहीं. दुसरे शब्दों में, नया मनुष्य एक प्रयोगात्मक अवस्था में है. वह देखता है पर विचार करने में असमर्थ है. &lt;br /&gt;*&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सड़क&lt;/strong&gt; पर चलते आदमी को भी विशिष्ट होने का अधिकार है. वह भी अपने बारे में यह भ्रम रख सकता है कि सच्चाई को जिस तरह वह जानता है, वह तमाम बुद्धिजीवियों की उपलब्धियों से ज्यादा मौलिक है. पर भीड़ का मनुष्य भीड़ की तमाम बुराइयों का शिकार है. हममें से कोई इससे बचा नहीं है. &lt;br /&gt;*&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कलाकार&lt;/strong&gt; का अलग-थलग पड़ जाना ( अक्सर यह स्थिति प्रचार पाने का की एक बेहया प्रदर्शनप्रियता में भी बदल जाती है ) एक ऐसे समय में लाजमी है जब कर्म और ज्ञान दो विपरीत दिशाओं के यात्री हैं और कभी-कभार केवल संयोग से ही मिलते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;{ &lt;strong&gt;एक उदाहरण&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; : &lt;em&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;span style="background-color: #6aa84f;"&gt;Just 24 hrs. left to return to my beloved country...but I'm sad inside...scared of those power-centers who might have planned something again to put my life in a state of unwelcome nomad.... Can't there be an end to such 'games' by just a few ? Can I only see a bird singing a welcome song for an author who simply needed a sleep, peace and love....in my land..?&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt; &lt;span style="font-size: x-small;"&gt;यह उक्ति &lt;span style="background-color: yellow;"&gt;उदय प्रकाश&lt;/span&gt; जी की है जो उन्होंने २४ नवम्बर को अपने &lt;/span&gt;&lt;a href="http://www.facebook.com/home.php?#/udayprakash2009?ref=ts"&gt;&lt;span style="background-color: magenta; font-size: x-small;"&gt;फेसबुक वाल&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt; पर लिख छोड़ा है.&amp;nbsp;प्रदर्शनप्रियता के किसी और बेहतर&amp;nbsp;उदाहरण के अभाव में ही उदय जी की उक्ति वहां से साभार ली गई है. बहरहाल!}&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;*&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;एक&lt;/strong&gt; जीवंत काव्य-रचना के लिए वैचारिक प्रतिबद्धता आवश्यक और पर्याप्त शर्त नहीं है, और न ही वह स्वयं में कोई नकारात्मक स्थिति है. हर सच्चे कवि की अपने तरीके से एक प्रतिबद्धता होती है...हाँ, यह स्वाभाविक है कि पेशेवर कवियों ने अक्सर अपने संरक्षकों, युवराजों और अभयदाताओं के प्रति अपने उदगार व्यक्त किये हैं, पर फिर भी कविता का इतिहास ऐसी महान&amp;nbsp;रचनाओं का इतिहास भी है जिन्होंने किसी भी किस्म की निरंकुशता को स्वीकार नहीं किया है. कोई भी कविता अपने समय में प्रचलित प्रतिबद्धता के अर्थ को पूरा करे या न करे पर वह अपने समय का प्रत्युत्तर ज़रूर होती है. &lt;br /&gt;*&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कविता&lt;/strong&gt; आज की कला में बखूबी अंट सकती है पर आज के समाज में कवियों की स्थिति? सामान्यतया वह बहुत अच्छी नहीं है. कुछ कवि भूखे मर जाते हैं, कुछ जो दूसरा कुछ काम करते रहते हैं, वे बेहतर जीवन यापन कर लेते हैं. कुछ कवि निर्वासन में चले जाते हैं, कुछ अपने पीछे बिना कोई निशानी छोड़े अदृश्य हो जाते हैं. बाबेल और मान्देल्स्ताम कहाँ चले गए? ब्लाक और मायकोवस्की यदि खुद को ख़त्म न कर लेते तो क्या करते ? ( यह सूची और भी लम्बी हो सकती है.)...और दूसरे अनेक कवियों की वजह से हमें वह अपकीर्ति भी समझ में आती है --वह खंदक जिसमें आकर&amp;nbsp;आधुनिक कविता का पशु गिर पड़ा है. यह केवल समाज की गलती नहीं है, एक बड़ी हद तक इसमें कवियों का भी दोष है! &lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="background-color: #d9d2e9;"&gt;( उपरोक्त विचार इतालवी कवि &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Eugenio_Montale"&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #d9d2e9;"&gt;इयुजेनियो मोन्ताले&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;/a&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="background-color: #d9d2e9;"&gt; के हैं. कविता और विचार पर केन्द्रित कवि-आलोचक विजय कुमार के संपादन में निकले उद्भावना के कवितांक में मोन्ताले का निबंध पढ़ा था. ये विचार-बिंदु वहीं से साभार लिए गए हैं. सबद पर मोन्ताले के साथ ही विचारार्थ नामक स्तंभ शुरू किया जा रहा है. इसके दायरे में ज़ाहिर है, सिर्फ साहित्य नहीं होगा, हालाँकि उसका होना&amp;nbsp;अनिवार्य होगा. )&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7056011166391074188-807650949734154097?l=vatsanurag.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vatsanurag.blogspot.com/2009/11/blog-post_28.html</link><author>anuragji.kaisehain@gmail.com (anurag vats)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SxC4aFjxBOI/AAAAAAAAApM/pcCN7UDCNlA/s72-c/398px-Eugenio_Montale.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>6</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-7056011166391074188.post-7632182255858844868</guid><pubDate>Sun, 15 Nov 2009 06:55:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-11-16T14:24:26.054+05:30</atom:updated><title>सबद पुस्तिका : २ : कुंवर नारायण</title><description>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/Sv-vrupOUgI/AAAAAAAAAo4/QI6n7GGdVvw/s1600-h/kunwarji.jpg"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="background-color: #cfe2f3;"&gt;&lt;img alt="" border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5404231243658056194" src="http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/Sv-vrupOUgI/AAAAAAAAAo4/QI6n7GGdVvw/s320/kunwarji.jpg" style="float: right; height: 320px; margin: 0px 0px 10px 10px; width: 216px;" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/a&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="background-color: #cfe2f3;"&gt;( &lt;span style="color: #000099;"&gt;&lt;strong&gt;कुंवरजी&lt;/strong&gt; &lt;/span&gt;का यह ताज़ा लेख पहलेपहल &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/search?updated-max=2009-09-17T18%3A43%3A00%2B05%3A30&amp;amp;max-results=1"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="background-color: #cfe2f3;"&gt;सबद पुस्तिका &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/a&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="background-color: #cfe2f3;"&gt;के रूप में यहाँ छप रहा है, यही बहुत खुशी की बात है। ८२ की उम्र में भी उनकी मेधा, चिंतन-प्रक्रिया और कवि-कर्म में कोई शैथिल्य नहीं आया है। इस बात की पुष्टि जितना आगे दिया जा रहा यह लेख करता है, उतना ही उनका नवीनतम काव्य-संग्रह &lt;strong&gt;&lt;span style="color: #006600;"&gt;'हाशिए का गवाह'&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; भी। कविता-संग्रह&amp;nbsp;से कुछ कविताएं यहाँ दी जा रही हैं जल्द ही इसकी एक पढ़त&amp;nbsp;भी सामने होगी होगी।)&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #a64d79;"&gt;खंड : क&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #d9d2e9; color: #990000;"&gt;साहित्य और आज का समाज&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;इक्कीसवीं&lt;/strong&gt; सदी का पहला दशक अब लगभग समाप्ति पर है। पिछले दस वर्षों में हुए परिवर्तनों पर एक उड़ती नज़र डालें तो कुछ ख़ास बातें सामने आती हैं जिनका समाज और साहित्य दोनों के लिए परिवर्तनकारी महत्वा रहा है। जैसे, आर्थिक, राजनीतिक और भाषाई दृष्टियों से एशियाई देशों - ख़ासकर भारत और चीन - का विश्व-शक्तियों के रूप में उभारना। हिन्दी साहित्य और समाज से सम्बंधित ऐसे कुछ सवालों की ओर ध्यान जाता है जो उपरोक्त तीनों विषयों से अलग रख कर नहीं सोचे जा सकते।&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;यह&lt;/strong&gt; तथ्य कि हिन्दी इस समय संसार की प्रमुख भाषाओँ में से है, देश की आर्थिक और राजनीतिक स्थितियों से अनिवार्यतः जुड़ा है। हिन्दी भाषा के विस्तार के पीछे मुख्यतः व्यावसायिक और राजनीतिक कारण हैं, तथा मीडिया और प्रचार-प्रसार की टेक्नोलॉजी में विकास ने हिन्दी भाषा को नई तरह की ज़रूरतों से जोड़ा है। भाषा की क्षमता बढ़ी है। वह एक ज़्यादा बड़े हिन्दी-भाषी समुदाय तक पंहुच रही है। उसके द्वारा जनमानस तक क्या संदेसा पंहुच रहा है- इसके गहरे अध्ययन से समाज के लिए आज साहित्य की उपयोगिता का प्रश्न जुड़ा है। इस संदेशे के पीछे किस तरह के अंदेशे और उद्देश्य काम कर रहे हैं इस पर ही, बहुत कुछ, समाज में साहित्य जैसी चेष्टाओं का महत्व निर्भर है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;शुरू&lt;/strong&gt; में ही 'सामजिक यथार्थ' और सामजिक चेतना' के बीच एक बारीक, किंतु आवश्यक, फ़र्क करते हुए अपनी बात कहना चाहता हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;भारत&lt;/strong&gt; का सामाजिक यथार्थ अत्यन्त जटिल, बहुस्तरीय और रूढिबद्ध है। वह बदल रहा है, लेकिन इतनी तेज़ी से नहीं कि वह 'सामाजिक चेतना' को बदल दे। इससे पहले, और इससे कहीं ज़्यादा तेज़ी से, वे शक्तियां सामाजिक चेतना को बदल रही हैं जिन्हें आज साफ़-साफ़ बाजारवाद और उपभोक्ता संस्कृति के रूप में पहचाना जा सकता है। उनका अपना तिजारती तंत्र है जो अच्छी तरह जानता है कि नई-नई चीजों के लिए आदमी की भूख को कैसे बढ़ाया जाए। वह तंत्र अत्यन्त विक्सित मनोवैज्ञानिक और तकनीकी तरीकों से भौतिक सुख सुविधाओं के प्रति हमारी स्वाभाविक आसक्ति को पुष्ट करता रहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मेरी &lt;/strong&gt;बात से यह नकारात्मक निष्कर्ष निकलने की जल्दी न की जाए कि मैं औधोगिक प्रगति को एक सिरे से खारिज कर रहा हूँ। उसके लाभ भी सब तक पंहुच रहे हैं जिन्हें नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता- लाभ जो हमें एक बेहतर ज़िन्दगी दे रहे हैं। मेरी कोशिश सिर्फ़ उस असंतुलन की ओर ध्यान खींचना है जो आज के समाज में, सारी प्रगति के बावजूद, एक गहरा असंतोष, विसंगति और विषमता भी पैदा कर रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;साहित्य&lt;/strong&gt; एक शाब्दिक-कला है, भाषा से अनिवार्यतः जुड़ी हुई। वह सामजिक-चेतना को सीधे संबोधित करती है, किसी अन्य विषय की भाषा और व्याख्या के मार्फ़तनहीं। वह जीवन की भाषा है- सच्ची और बेबाक़। अपनी तरह विभिन्न विषयों से संपर्क रखते हुए भी वह अपनी बात कहती है। उसका यह अधिकार आज भी सुरक्षित है, लेकिन उसकी आवाज़ जिन कानों तक पहुंचनी चाहिए उन्हें एक ऐसे शोरगुल ने घेर रखा है कि साहित्य, ख़ासकर कविता, जैसी कोशिशों की उपस्थिति ही महसूस नहीं होती। संक्षेप में, सामजिक-चेतना से साहित्यिक-चेतना का सीधा संवाद सम्भव नहीं हो पता रहा। क्या यह सिर्फ़ साहित्य के लिए एक चुनौती है ? या एक शिक्षित समाज के लिए भी कि वह, जाने-अनजाने, मानव-समाज की एक अत्यन्त समृद्ध सांस्कृतिक चेष्टा से वंचित होता न चला जाए ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;थोड़ा&lt;/strong&gt; आत्मचिंतन साहित्य, विशेषतः कविता, की ओर से भी ज़रूरी है। बीसवीं सदी की काव्यचेतना ने जिन कुछ बीज-शब्दों और सन्दर्भ-पदों के आधार पर अपनी एक अलग 'पहचान' बनाई उन पर भी थोड़ा गौर अब ज़्यादा प्रासंगिक जान पड़ता है। या शायद, अब अधिक प्रासंगिक हो गया है। ध्यान देन कि अधिकांश शब्द उन विषयों से लिए हुए शब्द थे जो साहित्य से बहार के विषय थे। 'आधुनिकता' शब्द इतना आधुनिक भी नहीं था जितना हम समझ रहे थे- लगभग ५०० वर्ष पुराना इतिहास है उसका। बोद्लेअर जैसे फ्रेंच कवि ने बहुत पहले ही उसके छिछले आशयों से सावधान रहने की चेतावनी दी थी। 'क्रांति' राजनीति का शब्द था : फ्रेंच और रूसी क्रांतियों से निकला शब्द, जिसके बरक्स 'औद्योगिक क्रांतियों' और गाँधी की 'नैतिक क्रांति' के भी उदाहरण थे। हम सब चाहते थे कि दुनिया बदले : वह बदलती रही, और अब भी बदल रही है- लेकिन उस तरह नहीं जैसे हम चाहते थे : वह कुछ इस तरह बदली कि उसने हमें बदल दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;'परिवर्तन' &lt;/strong&gt;का जूनून चढ़ता उतरता रहा। 'प्रगति' शब्द, ख़ासतौर पर उद्योग-धंधों की दुनिया का शब्द, मानव-समाज में मानो एक नई मशीन की तरह आया, कुछ दिन तेज़ी से चला, फ़िर बराबर मरम्मत मांगता रहा। 'प्रयोग', सीधे किसी वैज्ञानिक प्रयोगशाला से उठाया हुआ शब्द। आकर्षक, लेकिन ज़ल्दी ही किसी 'नए' प्रयोग की ज़रूरत के सामने खारिज हो गया ! इस भीड़ में 'नया' शब्द सबसे निरीह लगता है जिसे देखते-देखते बाज़ारवाद ने और उपभोक्तावाद ने समूचा हड़प लिया ! मानो अब उसका कोई मतलब साहित्य के काम का न हो, सिर्फ़ बाज़ार के मतलब का हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कविता&lt;/strong&gt; में 'तकनीक' और 'शिल्प' वगैरह की पदावली आज की हर क्षेत्र में विकसित टेक्नोलॉजी के सामने फ़ुटनोट की तरह लगती है। नए का मतलब नई-नई चीजें ! 'नई' का 'कविता' के साथ कोई योग नहीं बैठता ! नया कुछ चाहिए तो हम बाज़ार की तरफ़ देखते हैं, नई कविता की तरफ़ नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;तो&lt;/strong&gt; फिर ऐसी कविता, जिसके सारे संदर्भ-साधन छिन चुके, क्या दे सकती है समाज को ? या अभी ऐसा कुछ बचा है, कविता और समाज के बीच, जो दोनों के लिए बेहद ज़रूरी है ? हम नई कोई चीज़ चाहते हैं तो बाज़ार की ओर दौड़ते हैं, लेकिन आत्मिक कुछ चाहते हैं तो कविता की ओर देखते हैं। प्रेम में, दुःख में, उदासी में, अकेलेपन में, मुश्किलों में, बेबसी में, भावुक क्षणों में क्यों हमें अनायास याद आती हैं कविताएं ? वह अजीब-सा, रहस्यमय 'कुछ' जो हमें मिलता है सिर्फ़ कविता से, क्या वह हमें मिल सकता है बाज़ार से ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मैं&lt;/strong&gt; उस कविता-बराबर ज़रा-से 'कुछ' को परिभाषित नहीं करना चाहता- चाहूँ भी तो नहीं कर सकूँगा। पर इतना जानता हूँ कि वह हमारी प्राणवायु की तरह सूक्ष्म है। उसके बिना हम जी नहीं सकते। वह एक सीमारहित, अपरिभाषित दुनिया है। उसकी अपनी शर्तें हैं। हम उसमें जाते हैं हमेशा ही कुछ पाने के लिए नहीं ; कभी-कभी अनायास उसमें खो जाने के लिए - कहीं भी, किसी भी समय में। भाषा में संभव इस अद्भुत कला को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहूँगा। &lt;strong&gt;जिगर साहब&lt;/strong&gt; के इस शेर को अक्सर याद करता हूँ : &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="background-color: yellow;"&gt;ज़रा-सा दिल है लेकिन कम नहीं है &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="background-color: yellow;"&gt;इसी में कौन-सा आलम नहीं है &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आज&lt;/strong&gt; के समाज में मैं कविता की ज़रूरत और उसकी उपस्थिति को कुछ इस तरह सोचता हूँ कि वह मुख्यतः एक 'सूचनापरक' विधा नहीं है। इस माने में वह साहित्य की अन्य विधाओं से बहुत भिन्न है। वह मूलतः अत्यन्त उदार और उदात्त अर्थों में, 'आत्मचिंतन' की भाषा है। आत्मचिंतन को संकुचित करके 'आत्म-केंद्रित' के अर्थों में न लें : निहायत वस्तुनिष्ठ और व्यावहारिक भाषा भी बिल्कुल स्वार्थी अर्थों में आत्म-केंद्रित हो सकती है। कविता जितना कुछ जीवन के बारे में कहती है, उससे कहीं अधिक उस भाषा को ही एक सार्थक रचनात्मक अनुभव बना कर कहती है जिस भाषा में वह काव्य-रचना करती है। इसीलिए कविता हमेशा ही अपने को परिसीमित करनेवाले सन्दर्भ-पदों और शब्दावली का उल्लंघन और अतिक्रमण करने के लिए बाध्य है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रचनात्मक&lt;/strong&gt; ऊर्जा विस्फोटक होती है। अस्तित्व में आने के बाद ही उसकी 'पहचान' और 'नियम' बन पाते हैं। इसीलिए उसकी पारिभाषिक शब्दावली कभी भी उसके स्वरुप-निर्धारण में पर्याप्त नहीं ठहरती। जिस तरह भाषा, व्याकरण के नियमों को तोड़ते हुए, जीवन के साथ-साथ चलते हुए बदलती और विकसित होती है, उसी तरह भाषा में बसी कविता भी, जीवन के 'साथ' चलती है। इस 'साथ-चलने' के अर्थ को विस्तृत करके इस तरह समझें कि वह अपने समय के जीवन के साथ लगातार एक अत्यन्त संवेदनशील संवाद है जिसमें केवल सहमतियाँ ही नहीं प्रतिरोधों की भी पूरी गुंजाइश है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;इस&lt;/strong&gt; अंतरंग संवाद से छन कर जो काव्यविवेक निकलता है उसके पीछे केवल 'तात्कालिक' और 'स्थानिक' सन्दर्भ नहीं होते, एक व्यापक और सर्वकालिक जीवनानुभव से निकली हुई वे ध्वनियाँ और अंतर्ध्वनियां भी होती हैं जिनसे एक सुसभ्य और न्यायप्रिय मानव-समाज की चेतना बनती है। इसे जीवित रखना ज़रूरी है। कविता इसे जीवित रखने की एक विनम्र कोशिश है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;( रचना तिथि : ५ नवम्बर, २००९ )&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;****&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #a64d79;"&gt;खंड : ख&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: orange;"&gt;प्यार की भाषाएँ&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने कई भाषाओँ में प्यार किया है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहला प्यार&lt;br /&gt;ममत्व&amp;nbsp;की तुतलाती मातृभाषा में...&lt;br /&gt;कुछ ही वर्ष रही वह जीवन में : &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरा प्यार &lt;br /&gt;बहन&amp;nbsp;की कोमल छाया में &lt;br /&gt;एक सेनेटोरियम की उदासी तक : &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर नासमझी की भाषा में &lt;br /&gt;एक लौ को पकड़ने की कोशिश में &lt;br /&gt;जला बैठा था अपनी उंगुलियां :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक परदे के दूसरी तरफ़&lt;br /&gt;खिली धुप में खिलता गुलाब &lt;br /&gt;बेचैन शब्द &lt;br /&gt;जिन्हें होठों पर लाना भी गुनाह था &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरे धीरे जाना &lt;br /&gt;प्यार की और भी भाषाएँ हैं दुनिया में &lt;br /&gt;देशी-विदेशी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और विश्वास किया कि प्यार की भाषा &lt;br /&gt;सब जगह एक ही है&lt;br /&gt;लेकिन जल्दी ही जाना &lt;br /&gt;कि वर्जनाओं की भाषा भी एक ही है : &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक-से घरों में रहते हैं &lt;br /&gt;तरह-तरह के लोग&lt;br /&gt;जिनसे बनते हैं &lt;br /&gt;दूरियों के भूगोल...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगला प्यार &lt;br /&gt;भूली बिसरी यादों की &lt;br /&gt;ऐसी भाषा में जिसमें शब्द नहीं होते&lt;br /&gt;केवल कुछ अधमिटे अक्षर&lt;br /&gt;कुछ अस्फुट ध्वनियाँ भर बचती हैं &lt;br /&gt;जिन्हें किसी तरह जोड़कर &lt;br /&gt;हम बनाते हैं &lt;br /&gt;प्यार की भाषा &lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: orange;"&gt;उजास&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: orange;"&gt;&lt;span style="background-color: white;"&gt;तब तक इजिप्ट के पिरामिड नहीं बने थे &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white;"&gt;जब दुनिया में &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="background-color: white;"&gt;पहले प्यार का जन्म हुआ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब तक आत्मा की खोज भी नहीं हुई थी, &lt;br /&gt;शरीर ही सब कुछ था &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काफ़ी बाद विचारों का जन्म हुआ &lt;br /&gt;मनुष्य के मष्तिष्क से &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुभवों से उत्पन्न हुई स्मृतियाँ &lt;br /&gt;और जन्म-जन्मांतर तक &lt;br /&gt;खिंचती चली गईं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माना गया कि आत्मा का बैभव &lt;br /&gt;वह जीवन है जो कभी नहीं मरता &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्यार ने &lt;br /&gt;शरीर में छिपी इसी आत्मा के &lt;br /&gt;उजास को जीना चाहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक आदिम देह में &lt;br /&gt;लौटती रहती है वह अमर इच्छा &lt;br /&gt;रोज़ अँधेरा होते ही &lt;br /&gt;डूब जाती है वह &lt;br /&gt;अँधेरे के प्रलय में &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और हर सुबह निकलती है &lt;br /&gt;एक ताजी वैदिक भोर की तरह &lt;br /&gt;पार करती है &lt;br /&gt;सदियों के अन्तराल और आपात दूरियां &lt;br /&gt;अपने उस अर्धांग तक पहुँचने क लिए &lt;br /&gt;जिसके बार बार लौटने की कथाएँ &lt;br /&gt;एक देह से लिपटी हैं&lt;br /&gt;****&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: orange;"&gt;मामूली ज़िन्दगी जीते हुए &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white;"&gt;जानता हूँ कि मैं &lt;br /&gt;दुनिया को बदल नहीं सकता,&lt;br /&gt;न लड़ कर &lt;br /&gt;उससे जीत ही सकता हूँ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाँ लड़ते-लड़ते शहीद हो सकता हूँ &lt;br /&gt;और उससे आगे &lt;br /&gt;एक शहीद का मकबरा &lt;br /&gt;या एक अदाकार की तरह मशहूर...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन शहीद होना &lt;br /&gt;एक बिलकुल फ़र्क तरह का मामला है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिलकुल मामूली ज़िन्दगी जीते हुए भी &lt;br /&gt;लोग चुपचाप शहीद होते देखे गए हैं&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="background-color: white;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: orange;"&gt;मैं कहीं और भी होता हूँ&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white;"&gt;मैं कहीं और भी होता हूँ&lt;br /&gt;जब कविता लिखता &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ भी करते हुए &lt;br /&gt;कहीं और भी होना &lt;br /&gt;धीरे-धीरे मेरी आदत-सी बन चुकी है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर वक़्त बस वहीं होना &lt;br /&gt;जहाँ कुछ कर रहा हूँ &lt;br /&gt;एक तरह की कम-समझी है&lt;br /&gt;जो मुझे सीमित करती है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज़िन्दगी बेहद जगह मांगती है &lt;br /&gt;फैलने के लिए &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसे फैसले को ज़रूरी समझता हूँ &lt;br /&gt;और अपनी मजबूरी भी &lt;br /&gt;पहुंचना चाहता हूँ अन्तरिक्ष तक &lt;br /&gt;फिर लौटना चाहता हूँ सब तक &lt;br /&gt;जैसे लौटती हैं &lt;br /&gt;किसी उपग्रह को छूकर &lt;br /&gt;जीवन की असंख्य तरंगें... &lt;br /&gt;****&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: orange;"&gt;उदासी के रंग&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदासी भी &lt;br /&gt;एक पक्का रंग है जीवन का &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदासी के भी तमाम रंग होते हैं &lt;br /&gt;जैसे &lt;br /&gt;फक्कड़ जोगिया &lt;br /&gt;पतझड़ी भूरा &lt;br /&gt;फीका मटमैला &lt;br /&gt;आसमानी नीला &lt;br /&gt;वीरान हरा &lt;br /&gt;बर्फीला सफ़ेद &lt;br /&gt;बुझता लाल &lt;br /&gt;बीमार पीला &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी-कभी धोखा होता &lt;br /&gt;उल्लास के इन्द्रधनुषी रंगों से खेलते वक़्त &lt;br /&gt;कि कहीं वे &lt;br /&gt;किन्हीं उदासियों से ही &lt;br /&gt;छीने हुए रंग तो नहीं ?&lt;br /&gt;****&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: white;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: orange;"&gt;नई किताबें&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नई नई किताबें पहले तो &lt;br /&gt;दूर से देखती हैं मुझे &lt;br /&gt;शरमाती&amp;nbsp;हुईं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर संकोच छोड़ कर &lt;br /&gt;बैठ जाती हैं फैल कर &lt;br /&gt;मेरे सामने मेरी पढ़ने की मेज़ पर &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनसे पहला परिचय...स्पर्श &lt;br /&gt;हाथ मिलाने जैसी रोमांचक &lt;br /&gt;एक शुरुआत...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरे धीरे खुलती हैं वे &lt;br /&gt;पृष्ठ दर पृष्ठ &lt;br /&gt;घनिष्ठतर निकटता &lt;br /&gt;कुछ से मित्रता &lt;br /&gt;कुछ से गहरी मित्रता &lt;br /&gt;कुछ अनायास ही छू लेतीं मेरे मन को &lt;br /&gt;कुछ मेरे चिंतन की अंग बन जातीं &lt;br /&gt;कुछ पूरे परिवार की पसंद &lt;br /&gt;ज़्यादातर ऐसी जिनसे कुछ न कुछ मिल जाता &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर भी &lt;br /&gt;अपने लिए हमेशा खोजता रहता हूँ &lt;br /&gt;किताबों की इतनी बड़ी दुनिया में &lt;br /&gt;एक जीवन-संगिनी &lt;br /&gt;थोडी अल्हड़-चुलबुली-सुंदर&lt;br /&gt;आत्मीय किताब &lt;br /&gt;जिसके सामने मैं भी खुल सकूँ &lt;br /&gt;एक किताब की तरह पन्ना पन्ना &lt;br /&gt;और वह मुझे भी &lt;br /&gt;प्यार से मन लगा कर पढ़े..&lt;br /&gt;****&lt;/span&gt;&lt;span style="background-color: white;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7056011166391074188-7632182255858844868?l=vatsanurag.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vatsanurag.blogspot.com/2009/11/blog-post_15.html</link><author>anuragji.kaisehain@gmail.com (anurag vats)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/Sv-vrupOUgI/AAAAAAAAAo4/QI6n7GGdVvw/s72-c/kunwarji.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>10</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-7056011166391074188.post-4520960371599108177</guid><pubDate>Mon, 02 Nov 2009 09:42:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-11-04T09:08:23.887+05:30</atom:updated><title>स्वगत : २ : गीत चतुर्वेदी</title><description>&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="background-color: #b4a7d6;"&gt;( हिंदी के युवा कवि-कथाकार &lt;strong&gt;&lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/2009/01/blog-post_11.html"&gt;गीत चतुर्वेदी&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt; ने&amp;nbsp; कहानी पर अपनी बातें यहाँ एक अलग लहजे में कही हैं. बिना लाग-लपेट के. एक विरल साफगोई और पैनेपन के साथ. परम्परित जार्गन से मुक्त और विमर्श के बेमतलबी होने के खतरे से पूरी तरह बाखबर. आज की हिंदी कहानी के लिए यह शुभ है. लेखक के बही-खाते से एक बार फिर से चीजें निकल रही हैं और उनमें कहानी की तरह ही एक टटकापन है. आश्वस्ति से ज़्यादा विनम्र संदेह. खुद पर और उस पर भी जो कथा के नाम पर पेश्तर दे दिया गया है. अस्तु. &lt;/span&gt;&lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/2008/07/blog-post_7203.html"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #b4a7d6;"&gt;स्वगत&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="background-color: #b4a7d6;"&gt; शीर्षक से यह सबद की दूसरी प्रस्तुति है.&amp;nbsp;&amp;nbsp;)&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/Su6gBk3Ph8I/AAAAAAAAAoQ/ZZJd1a5gZLQ/s1600-h/light+bulb.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/Su6gBk3Ph8I/AAAAAAAAAoQ/ZZJd1a5gZLQ/s320/light+bulb.JPG" vr="true" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="background-color: #ffe599; font-size: large;"&gt;संदेह - दृष्टि&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;बोर्हेस&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; ने ‘द रिडल ऑफ पोएट्री’ में कहा है- ‘सत्तर साल साहित्य में गुज़ारने के बाद मेरे पास आपको देने के लिए सिवाय संदेहों के और कुछ नहीं।‘ मैं बोर्हेस की इस बात को इस तरह लेता हूं कि संदेह करना कलाकार के बुनियादी गुणों में होना चाहिए। संदेह और उससे उपजे हुए सवालों से ही कथा की कलाकृतियों की रचना होती है। इक्कीसवीं सदी के इन बरसों में जब विश्वास मनुष्य के बजाय बाज़ार के एक मूल्य के रूप में स्थापित है, संदेह की महत्ता कहीं अधिक बढ़ जाती है। एक कलाकार को, निश्चित ही एक कथाकार को भी, अपनी पूरी परंपरा, इतिहास, मिथिहास, वर्तमान, कला के रूपों, औज़ारों और अपनी क्षमताओं को भी संदेह की दृष्टि से देखना चाहिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;अपनी&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; बात को स्पष्ट करते हुए एक सूत्र तक पहुंचाने के लिए मैं फिर एक बार बोर्हेस को ही कोट करूंगा। उनकी एक कहानी है-&lt;em&gt;&lt;strong&gt; ‘द रोज़ ऑफ़ पैरासेल्‍सस’&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;, जिसमें एक किरदार राख से गुलाब बनाता है। जब एक व्यक्ति उससे यह हुनर सीखने आता है, तो वह मना कर देता है कि उसके पास ऐसी कोई चमत्कारी शक्ति नहीं है। उस व्यक्ति के जाते ही पैरासेल्‍सस नाम का वह किरदार फिर चमत्कार करते हुए राख से गुलाब बना देता है। बोर्हेस की यह कहानी अपने मेटाफि़जि़कल और मेटाहिस्टॉरिक अर्थों में बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन इंटर-टेक्स्चुअल रीडिंग से ज़रा खेलते हुए मैं बोर्हेस की इस कहानी को हिंदी फि़क्शन के संदर्भ में&amp;nbsp;मेटाकॉमिक तरीक़े से देखता हूं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;कुछ&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; लोग हिंदी कहानी से इसी कि़स्म के राख से गुलाब बना देने वाले चमत्कार का दावा करते हैं, लेकिन अपने किस अकेलेपन में वह यह चमत्कार कर रही है? जैसे ही वह पाठक के सामने जाती है, पैरासेल्‍सस की तरह चमत्कार से इंकार कर देती है, अपना वांछित या प्रोजेक्टेड असर तक नहीं छोड़ती, जबकि बार-बार कहा जा रहा है कि वह चमत्कारी है, तो फिर यह चमत्कार किस निर्जनता या नीरवता में है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;इस&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; समय हिंदी कहानी में जिस तथाकथित रचनात्मक विस्फोट की बात की जाती है, उसे देखकर बरबस मुझे &lt;strong&gt;&lt;em&gt;‘पोएटिक्स ऑफ़ डीफैमिलियराइज़ेशन’&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; की याद आ जाती है। यह कला का एक सिद्धांत या प्रविधि है, जिसे पुराने ज़माने के रूसी लेखकों ने और बीसवीं सदी की शुरुआत के अमेरिकी लेखकों ने ख़ासा इस्तेमाल किया था। इसमें नैरेटर किसी जानी-पहचानी साधारण-सी चीज़ को इस क़दर नाटकीय और हल्लेदार बनाकर प्रस्तुत करता था कि देखने वाले को यह अहसास हो जाए कि दरअसल वह पहली बार ही उस चीज़ को देख रहा है। इस चौंक के कलात्मक लाभ और छौंकदार हासिल को वह फिक्शन मान लेता था। हिंदी कहानी से ज़्यादा उसका परिदृश्य इस समय उसी पोएटिक्स को एन्ज्वॉय करता जान पड़ता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;इसके &lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;पीछे बहुधा मुझे हिंदी कहानी के विकास की सरणियों के पेचो-ख़म दिखाई देते हैं। हिंदी कथा साहित्य का विकास और हिंदी सिनेमा का विकास कुछ बरसों के आगे-पीछे में ही होता है। दोनों स्टोरी-टेलिंग की दो विधाएं हैं, लेकिन इस विकास में मुझे हिंदी सिनेमा की लोकप्रिय कथ्य-धारा अत्यधिक हावी होती दिखाई देती है। सिनेमा ने साहित्य को समृद्धि ही दी है, ऐसा हम दुनिया के कई बड़े लेखकों का आत्मकथ्य पढ़कर जान पाते हैं, लेकिन हिंदी में सिनेमा के लोकप्रिय कथानक-कथात्मक दबाव ने, कुछ ख़ास अर्थों में भारतीय-हिंदी समाज की संरचना ने भी, हिंदी कथा-साहित्य को चीज़ों को ब्लैक एंड व्हाइट में देखने का जो अत्यंत सरल, सुपाच्य कि़स्म का फॉर्मूला दिया है कि वह आज भी हमारे कथाकारों, किंचित पाठकों और अधिकतर आलोचकों से छुड़ाए नहीं छूट रहा। हमने नैरेशन की चेखोवियन शैली को तो अपना लिया, लेकिन अंतर्वस्तु की चेखोवियन जटिलताओं को ख़ुद से दूर ही रखा। आज भी हम तथाकथित पोस्ट-मॉडर्न नैरेटिव से उसी कि़स्म के सरलीकृत, लेकिन हाहाकारजनित नतीजे ही निकाल रहे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;क्या&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; इसके पीछे कहीं ये कारण तो नहीं कि हम शुरू से ही, हिंदी कथा के परिक्षेत्र में, डेमी-गॉड्स और लेसर-गॉड्स को पूजते आ रहे हैं? क्या हिंदी कहानी लगातार रॉन्ग्ड पैट्रन्स के हाथों में रही है? क्यों ऐसा होता है कि मुझे हिंदी कहानी के शिखर पुरुष हिंदी से बाहर कहीं दिखाई ही नहीं देते? और दुनिया के आला दरजे के फिक्शन का एक हिस्सा पढ़ लेने के बाद अपने इन लेसर-गॉड्स की कहानियों में मेरी कोई दिलचस्पी रह ही नहीं पाती? हां, उनकी कथेतर साहित्यिक-सामाजिक तिकड़में, शरारतें, बदमाशियां मुझे उनकी कहानी से ज़्यादा आकर्षित करती हैं। फिक्शन का अगर कोई मानचित्र हो, तो उसमें हमारी पोजीशनिंग कहां है? यक़ीनन, कहीं नहीं। हम साहित्य में रणजी ट्रॉफ़ी मुक़ाबलों से ही अंतरराष्ट्रीय विजय-प्राप्ति का आनंद भोग ले रहे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;नहीं,&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; यह न सोचा जाए कि इसके पीछे कोई पश्चिमपरस्त मानसिकता है, अपने जातीय-भाषाई स्‍वभावगत विशेष सरलीकृत तुरत-फुरत आरोप-निष्पादन की फेहरिस्त में इज़ाफ़ा करते हुए यह न कह दिया जाए कि कुछ लोगों को विदेशी चीज़ों में ही आनंद आता है, बल्कि यह एक कड़वी सचाई है, जिसे कम से कम ब्लैक एंड व्हाइट में न देखा जाए। तो वह चमत्कार जो उस कहानी में पैरासेल्‍सस कर रहा है और हमारे परिदृश्य में हिंदी कहानी कर रही है, उसे जांच लिया जाए। स्ट्रैटजिक टाइमिंग्स के सहारे नहीं, बल्कि साहित्य की गुणवत्ता को मानदंड बनाकर। हम डीफैमिलियराइज्ड की आत्मरति से बाज़ आएं, लेसर-गॉड्स के होलसेल प्रोडक्‍शन से भी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;मैं&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; यहां किसी कि़स्म के सामाजिक यथार्थ, वर्तमान की चुनौतियां, समकालीन हिंदी कहानी का संकट, यथार्थ और विभ्रम, 90 के पहले और बाद का यथार्थ, दशा और दिशा जैसे सेमिनारी क्लीशे में नहीं जाना चाहता, क्योंकि एक ख़ास, सीमित दबाव डालने के अलावा इन सारी बातों का आर्ट ऑफ द फि़क्शन से कोई लेना-देना भी नहीं होता, लेकिन फिर भी मैं यहां पहले पैराग्राफ़ की बात को दोहराते हुए महज़ इतना कहना चाहूंगा कि हम इतिहास के साथ-साथ अपनी पूरी कथा-परंपरा को भी संशयग्रस्त होकर देखें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;(30 अक्‍टूबर 2009 को रामगढ़, नैनीताल में हिंदी कहानी पर आयोजित सेमिनार में कुछ ज़बानी जोड़ के साथ पढ़ा गया आलेख.)&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;****&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7056011166391074188-4520960371599108177?l=vatsanurag.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vatsanurag.blogspot.com/2009/11/blog-post.html</link><author>anuragji.kaisehain@gmail.com (anurag vats)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/Su6gBk3Ph8I/AAAAAAAAAoQ/ZZJd1a5gZLQ/s72-c/light+bulb.JPG' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>9</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-7056011166391074188.post-8013518404736650231</guid><pubDate>Fri, 23 Oct 2009 17:01:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-11-30T19:34:56.966+05:30</atom:updated><title>ज़बां उर्दू : ६ : अहमद फ़राज़</title><description>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SuKaiRSIzwI/AAAAAAAAAoI/T8k7S0dKlsY/s1600-h/It.JPG"&gt;&lt;img alt="" border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5396045217088982786" src="http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SuKaiRSIzwI/AAAAAAAAAoI/T8k7S0dKlsY/s320/It.JPG" style="cursor: hand; display: block; height: 240px; margin: 0px auto 10px; text-align: center; width: 320px;" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="background-color: #9fc5e8; color: black;"&gt;( अहमद फ़राज़ की यह ग़ज़ल जितनी मकबूल हुई शायर के शब्दों में उतनी ही उसके बदनामी का सबब भी बनी। लेकिन फ़राज़ की मकबूलियत के सामने बदनामी जाती रही और पीढियों को इसका लुत्फ़ मिलता रहा। ज़बां उर्दू में इस दफा अहमद फ़राज़। हालाँकि &lt;/span&gt;&lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/2008/08/blog-post_27.html"&gt;&lt;span style="background-color: #9fc5e8; color: black;"&gt;इससे पहले भी &lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="background-color: #9fc5e8; color: black;"&gt;उनकी एक ग़ज़ल की आमद सबद पर हुई थी, जब पिछले बरस वो इंतकाल फरमा गए थे। बहरहाल। यह ग़ज़ल। तस्वीर मधुमिता दस के कैमरे से।) &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: #006600;"&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;सुना है&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt; ...&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;सुना है लोग उसे आँख भरके देखते हैं&lt;br /&gt;सो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना है रब्त है उसको ख़राब हालों से&lt;br /&gt;सो अपने आपको बर्बाद करके देखते हैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना है दर्द की गाहक है चशमे नाज़ उसकी&lt;br /&gt;सो हम भी उसकी गली से गुज़र के देखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना है उसको भी है शेर-व-शायरी से शगफ़&lt;br /&gt;सो हम भी मोजज़े अपने हुनर के देखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं&lt;br /&gt;यह बात है तो चलो बात करके देखते हैं&lt;br /&gt;सितारे बामे फ़लक से उतरकर देखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना है दिन में उसे तितलियाँ सताती हैं&lt;br /&gt;सुना है रात में जुगनू ठहर के देखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना है हश्न है उसकी गिज़ाल सी आँखें&lt;br /&gt;सुना है उसको हिरण दश्त भरके देखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना है रात से बढ़कर हैं काकुलें उसकी&lt;br /&gt;सुना है शाम को साये गुज़र के देखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना है उसकी सियाह चस्मगी क़यामत है&lt;br /&gt;सो उसका सुरमा फ़रोश आह भरके देखते हैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना है उसके लबों से गुलाब जलते हैं&lt;br /&gt;सो हम बहार पे इल्ज़ाम धरके देखते हैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना है आईना तिमसाल है ज़बीं उसकी&lt;br /&gt;जो सादा दिल है उसे बन संवर के देखते हैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना है जब से हमाईल है उसकी गर्दन में&lt;br /&gt;सुना है चश्मे तसव्वुर से दश्ते इमकां में&lt;br /&gt;पलंग ज़ाविये उसकी कमर के देखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना है उसके बदनकी तराश ऐसी है&lt;br /&gt;वह सर-व-कद है मगर बे गुले मुराद नहीं&lt;br /&gt;कि इसे शहर पे शगूफ़े समर के देखते हैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का&lt;br /&gt;सो रहवाने तमन्ना भी डर के देखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना है उसके शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त&lt;br /&gt;मकीं उधर के भी जलवे इधर के देखते हैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रुकें तो गर्दिशें उसका तवाफ़ करती हैं&lt;br /&gt;चले तो ज़माने उसे ठहर के देखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसे नसीब कि बै पैरहन उसे देखे&lt;br /&gt;कभी कभी दर-व-दीवार घर के देखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहानियां ही सही सब मुबालगे ही सही&lt;br /&gt;अगर वह ख्वाब है ताबीर करके देखते हैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब उसके शहर में ठहरें की कूच कर जाएं&lt;br /&gt;फ़राज़ आओ सितारे सफ़र करके देखते हैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं&lt;br /&gt;फ़राज़ अब लहजा बदल के देखते हैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जुदाइयां तो मुक़द्दर हैं फिर भी जाने सफ़र&lt;br /&gt;कुछ और दूर ज़रा साथ चलके देखते हैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रहे वफ़ा में हरीफ़े खुराम कोई तो हो&lt;br /&gt;सो अपने आप से आगे निकाल के देखते हैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तू सामने है तो फिर क्यों यकीं नहीं आता&lt;br /&gt;यह बार बार जो आँखों को मल के देखते हैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये कौन लोग हैं मौजूद तेरी महफिल में&lt;br /&gt;जो लालचों से तुझे, मुझे जलके देखते हैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कुर्ब क्या है कि यकजाँ हुए न दूर रहे&lt;br /&gt;हज़ार इक ही कालिब में ढल के देखते हैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न तुझको मात हुई न मुझको मात हुई&lt;br /&gt;सो अबके दोनों ही चालें बदल के देखते हैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कौन है सरे साहिल कि डूबने वाले&lt;br /&gt;समन्दरों की तहों से उछल के देखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी तक तो न कुंदन हुए न राख हुए&lt;br /&gt;हम अपनी आग में हर रोज़ जल के देखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत दिनों से नहीं है कुछ उसकी ख़ैर ख़बर&lt;br /&gt;चलो फ़राज़ को ए यार चलके देखते हैं &lt;br /&gt;****&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7056011166391074188-8013518404736650231?l=vatsanurag.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vatsanurag.blogspot.com/2009/10/blog-post_23.html</link><author>anuragji.kaisehain@gmail.com (anurag vats)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SuKaiRSIzwI/AAAAAAAAAoI/T8k7S0dKlsY/s72-c/It.JPG' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>9</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-7056011166391074188.post-5904869027071621735</guid><pubDate>Mon, 12 Oct 2009 15:48:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-10-13T17:45:44.662+05:30</atom:updated><title>आखिरी वाक्य</title><description>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/StNsG6UfpeI/AAAAAAAAAoA/gtBjAZ4J9io/s1600-h/melancholy.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 150px; FLOAT: left; HEIGHT: 200px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5391772044882847202" border="0" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/StNsG6UfpeI/AAAAAAAAAoA/gtBjAZ4J9io/s200/melancholy.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;वह&lt;/strong&gt; बस में है। दफ्तर के शुरूआती दिनों से ही उसने इसे रीडिंग रूम बना लिया है। उसे जगह मिल जाए, वह भी खिड़कीवाली, इसके लिए वह दो स्टाप पीछे चढ़ता है। हालाँकि एक यही वजह नहीं थी पीछे चढ़ने की।...जाम हर रोज़ लगता है और वक्त उससे काटे नहीं कटता। उसके हाथ में कामू के नोटबुक्स हैं। थैले में थोड़ा कोएटजी और क्लीमा। ...बस अभी गर्ल्स हॉस्टल के स्टाप पर रुकी है। यहाँ वह बस नहीं, ऑटो लेने आती थी। वह लड़के की तरह कभी बस में नहीं चली। लड़का ख़ुद भी जब उसके साथ उन दिनों जाता था, तो ऑटो लेता था...अब ऑटो पर चढ़ने के पहले वह कई दफा सोचता है।... बस में भीड़ और शोर बढ़ रहा है। आश्रम से एक चूरन बेचनेवाला चढ़ा है और अपनी बेलौस आवाज़ में चूरन बेच रहा है। उसका यह कार्यक्रम कोई दस मिनट चलेगा।...उसके लिए ध्यान लगाना दूभर हो रहा है। उसने टिकट को बुक-मार्क बना कर किताब बंद कर दी है। उसके मन में कामू की कुछ पंक्तियाँ वन-लाइनर की तरह आज फ़िर खुब गई हैं, जिसे वह ज़ज्ब करने की कोशिश कर रहा है : &lt;em&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;THERE IS ALWAYS A PART OF MAN THAT REFUSES LOVE. IT IS THE PART THAT WANTS TO DIE. IT IS THE PART THAT NEEDS TO BE FORGIVEN...&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;सबसे&lt;/span&gt; पहले उसने ये पंक्तियाँ अपने प्रिय लेखक की किताब में समर्पण पंक्तियों की जगह पढ़ी थी। तब वह बहुत छोटा था, और सिवाय इसके की उसे ये भा गई थीं, और कुछ समझ में नहीं आया था। वर्षों बाद हॉस्टल वाली लड़की की 'ढुलमुल-सी हाँ-ना' के बाद वह इन पक्तियों के बीच अपने लिए एक अर्थ पा सका था। एक सांत्वना। हल्की राहत। ...उसने इन पंक्तियों में से आखिरी को बिना लिखे उसे मैसेज किया था। थोड़ी ही देर बाद उधर से एक स्माइली के साथ जवाबी मैसेज आया ...&lt;em&gt;वेरी ट्रू जुल्फी, आई स्वे़र... &lt;/em&gt;ये उसके आखिरी शब्द थे। अबोले दिन बीतते रहे। लड़के ने उन्हीं दिनों अपने तईं अबोलेपन की लिपि और भाषा ईजाद की।... उसे इस बात का कभी-कभी अफ़सोस होता है कि मैसेज में उसने आखिरी वाक्य भी क्यों नहीं लिख भेजा! शायद वह सच को तब महज हैरत भरी खुशी से देखने की बजाय किसी और निगाह से भी देखती...शायद?...लड़के को झपकी आ रही है...&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;em&gt;( ऊपर एरलेंड म्‍योर्क की पेंटिंग : मेलंकली )&lt;/em&gt; &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7056011166391074188-5904869027071621735?l=vatsanurag.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vatsanurag.blogspot.com/2009/10/blog-post_12.html</link><author>anuragji.kaisehain@gmail.com (anurag vats)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/StNsG6UfpeI/AAAAAAAAAoA/gtBjAZ4J9io/s72-c/melancholy.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>24</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-7056011166391074188.post-7515482326185801135</guid><pubDate>Sat, 10 Oct 2009 07:02:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-10-10T23:06:44.040+05:30</atom:updated><title>विष्णु खरे का लेख</title><description>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/StBK8woMgjI/AAAAAAAAAnw/4xolhdFWfTg/s1600-h/200px-Goethe_(Stieler_1828).jpg" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; height: 244px; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em; width: 206px;"&gt;&lt;span style="background-color: #f1c232;"&gt;&lt;img alt="" border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5390891161668583986" src="http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/StBK8woMgjI/AAAAAAAAAnw/4xolhdFWfTg/s320/200px-Goethe_%2528Stieler_1828%2529.jpg" style="float: right; height: 244px; margin: 0px 0px 10px 10px; width: 200px;" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="background-color: #f1c232;"&gt; &lt;em&gt;( महान जर्मन कवि-लेखक &lt;strong&gt;&lt;span style="color: #663300;"&gt;गोएठे &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;के सुप्रसिद्ध काव्य-नाटक &lt;span style="color: #cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;'फाउस्ट'&lt;/strong&gt; &lt;/span&gt;का &lt;strong&gt;&lt;span style="color: #006600;"&gt;&lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/search?updated-max=2009-09-17T18%3A43%3A00%2B05%3A30&amp;amp;max-results=1"&gt;विष्णु खरे&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; कृत अनुवाद हाल ही में प्रवीण प्रकाशन, दिल्ली से छप कर आया है. यहाँ दिया जा रहा लेख अनूदित पुस्तक की भूमिका है, जिसके स्वतंत्र-पाठ का भी अपना मह्त्व है. इसे&amp;nbsp;छापने की स्वीकृति देने के लिए हम लेखक के आभारी हैं. )&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: #000099;"&gt;हम फाउस्ट क्यों पढ़ें ?&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;strong&gt;नाटक&lt;/strong&gt;, टेलिविज़न, फ़िल्म तथा गल्प-साहित्य तक के क्षेत्रों में आजकल कथानकों का पेशेवर एक-पंक्तीय सार-संक्षेप ( वन लाइनर ) मांगने या देने का नियम-सरीखा है। 'फाउस्ट' का ऐसा खुलासा कुछ इस प्रकार होगा : ''मानवता के शत्रु के प्रलोभनों में फंसकर एक संशयग्रस्त बुद्धिजीवी किस तरह अपनी आत्मा तथा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी निरीह प्रेमिका को घनघोर नैतिक और भौतिक संकट में दल देता है।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;'शैतान'&lt;/strong&gt; और 'शैतानी' शब्द दक्षिण एशिया में इस्लामी सभ्यता की उपस्थिति के कारण ही प्रचलित हुए क्योंकि शैतान की अवधारणा सामी ( सेमिटिक - यहूदी, ईसाई, इस्लामी ) आस्थात्रयी की आदिमिथकों से उपजती है। 'याहवेह', 'येहोवा', 'गॉड' या 'अल्लाह' सृष्टि के आरम्भ में फरिश्तों को अस्तित्व में लाता है जिसमें सेटन, शैतान या इब्लीस और एडम या आदम भी है। ये सारे फ़रिश्ते अजर-अमर थे। सामी ईश्वर ने आदम (मानव) को अपनी ही छवि में सिरजा है। सारे फरिश्तों में उसे सर्वश्रेष्ठ का दर्ज़ा देकर ईश्वर चाहता है कि बाकी सारे फ़रिश्ते आदम के सामने झुकें। बाकी सब झुकते भी हैं, सिर्फ़ शैतान गहरी ईर्ष्या और घृणा के कारण आदम का सिजदा करने से इनकार कर देता है। बाद में शैतान ही आदम की संगिनी 'हव्वा' को प्रलोभन देता है जिसके फलस्वरूप आदम और हव्वा को मर्त्य बनाकर उन्हें हमेशा के लिए जन्नत यानी स्वर्ग से निकल दिया जाता है। धरती पर आकार आदम और हव्वा सहित उनकी सारी संतान, यानी समूची मानवीयता, मरने के लिए अभिशप्त हो जाती है। शैतान किंतु अन्य फरिश्तों के साथ अमर है और मानव का सबसे बड़ा शत्रु है। &lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;विधान&lt;/strong&gt; ऐसा है कि सामी ईश्वर, यानी याहवेह, गॉड या अल्लाह, चाहकर भी शैतान का विनाश नहीं कर सकता। शैतान कभी सोता भी नहीं है, एक शाश्वत जागृति में वह सिर्फ़ मानव के भौतिक तथा आध्यात्मिक विनाश की षड्यंत्री योजनाओं को अंजाम देने में जुटा रहता है। सामी ईश्वर कभी मानव को बचाता है, कभी नहीं बचा पता लेकिन शैतान को नष्ट करना तो दूर, वह उसे निष्क्रिय भी नहीं कर पाता या नहीं करना चाहता। ऐसा लगता है जैसे शैतान की एक समांतर सत्ता हो। भारतीय मूल की बौद्ध तथा जैन जैसी नास्तिक आस्थाओं में भी 'मार' सरीखी शैतान से मिलती-जुलती अवधारणा भले ही हो, वह कोई शाश्वत सक्रिय उपस्थिति नहीं है, 'अशुभ' अथवा 'पाप' जैसे प्रत्यय और उनके प्रतीक भले ही हों। असस्थाओं के उस परेशान कर देने वाले महामेले में, जिसे 'हिन्दू धर्म' जैसे नितांत अपर्याप्त नाम से पुकारा जाता है, 'ईश्वर' तो कोई हैं लेकिन उन्हें चुनौती देने वाला कोई मृत्युंजय, लगभग सर्वशक्तिमान, शैतान-जैसा देवता, देवदूत, पात्र अथवा चरित्र नहीं है। दक्षिण एशियाई मूल के धर्मों के लिए यह कल्पनातीत है कि ईश्वर का कोई स्थाई, पापिष्ट, सशक्त प्रतिद्वंद्वी भी हो। &lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;कभी&lt;/strong&gt;-कभी लगता है कि सामी शैतान, जिसका यूनानी नाम मेफिस्टोफेलीस है, सामी ईश्वर के किसी संभावित नकारात्मक आयाम का अवतार ही है। यदि निर्गुण निराकार ब्रह्म को छोड़ दें तो शेष सभी ईश्वरों में क्रोध, ईर्ष्या, प्रतिकार आदि की 'मानवीय' भावनाएं प्रचुर मात्रा में देखि जा सकती हैं। शैतान को इतना अधिकार ईश्वर के संज्ञान के बिना कैसे मिल सकता है कि वह मानव को पतन की ओर ले जा सके - ईश्वर स्वयं मानव को अमानवीय भावनाओं से मुक्त क्यों नहीं रखता? वह सीधे-सीधे या शैतान के मध्यम से मानव को संकट में क्यों डालता है? मानव को यदि श्रेष्ठ सिद्ध करना ही है तो उसे अग्नि-परीक्षाओं से ही क्यों गुजरना पड़े?&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;ये&lt;/strong&gt; वे प्रश्न हैं जिन पर आस्तिकों और नास्तिकों के बीच ही नहीं, आस्तिकों और आस्तिकों के बीच भी बहस होती आई है और तब तक चलती रहेगी जब तक ईश्वर के अस्तित्व या अनस्तित्व से मानव का प्रत्यक्ष साक्षात्कार न हो ले। शैतान के दुस्साहस की सीमा तो उस प्रकरण में देखी जा सकती है जब वह स्वयं ईश्वरपुत्र ईसा को आकाश में ले जाकर कहता है कि यदि तू अपने पिता में आस्था को तज दे तो मैं तुझे इस सारी सृष्टि का स्वामी बना दूँगा। ईसा ने तब वह अमर वाक्य कहा था : तू मेरे ( सामने से हटकर ) पीछे चला जा, शैतान! कुछ ऐसी ही कोशिश शैतान ने मुहम्मद के साथ की थी जब उसने धोखा देकर कुछ मूर्तिपूजन-समर्थक आयतें उतार दी थीं किंतु मुहम्मद शैतान की साजिश को समझ गए और उन्होंने उन आयतों को रद्द कर दिया। यही प्रकरण सलमान रुश्दी के विवादग्रस्त तथा प्रतिबंधित उपन्यास 'द सैटनिक वेर्सेज' ( शैतानी आयतें) के केन्द्र में है जिस पर अभी तक ईरान का जानलेवा फतवा लागू है। &lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;ज़ाहिर&lt;/strong&gt; है कि ईसा मसीह और हज़रात की तुलना में गोएठे के काव्य-नाटक का नायक फाउस्ट एक बहुत कमतर इंसान है। वह एक ईसाई बुद्धिजीवी है जो यूरोपीय 'रेनासां' (पुनर्जागरण) तथा 'रेफर्मेशन' ( संशोधन) का उत्पाद है किंतु ब्रह्माण्ड, अस्तित्व, ईश्वर, सत्-असत् तथा स्वयं अपने भौतिक प्रलोभनों की समस्याओं से ग्रस्त है। स्वर्ग में बैठा हुआ इश्वर उसे अपना भक्त मानता है और शैतान इश्वर से बाज़ी लगता &lt;span class=""&gt;है कि &lt;/span&gt;वह फाउस्ट को उसके विवेक और नैतिकता के मार्ग से गिरा देगा। धरती पर पहुँच कर मेफिस्टोफेलीस अपने भयावह और घिनौने षड़यंत्र में लग जाता है और जान &lt;span class=""&gt;लेता &lt;/span&gt;है कि फाउस्ट एक किशोरी को बहुत चाहता है और उसका प्रेम पाने के लिए कुछ भी -शैतान का साथ और शिष्यत्व - स्वीकार करने को भी तैयार है। किन्तु फाउस्ट की किशोर प्रेमिका &lt;span class=""&gt;मार्गरेट या ग्रेट्षेन ईश्वर में सम्पूर्ण आस्था रखने वाली एक धर्मभीरु प्राणी भी है। वह अपने प्रेमी फाउस्ट के अशुभ मित्र मेफिस्टो की वास्तविकता जानती तो नहीं है किन्तु यह अहसास उसे है कि वह कोई पापात्मा है। मेफिस्टो की योजना अब मार्गरेट को नैतिक और भौतिक रूप से नष्ट कर देने की है ताकि परिणामस्वरूप फाउस्ट भी पराजित हो जाये और स्वयं मेफिस्टो इस तरह ईश्वर को निचा दिखा सके। किन्तु स्वर्ग में बैठा हुआ ईश्वर इस सब पर अपनी दिव्यदृष्टि रखे हुए है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;गोएठे &lt;/strong&gt;की इस कालजयी कृति के विषय शाश्वत हैं - सत् और असत्, पाप और &lt;span class=""&gt;पुण्य, &lt;/span&gt;अपराध और दंड, प्रलोभन और संयम, प्रेम और वासना, बंधन और मुक्ति, व्यक्ति और समाज, स्वर्ग और नरक, नर और नारी, संशय और विवेक, प्रकाश और अंधकार। शैतान तमस और प्रलोभन का प्रतिनिधि है, फाउस्ट संदेह और लालसा का, जबकि मार्गरेट निर्दोषिता, पावनता और ईश्वरभीरुता का प्रतीक है। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि 'फाउस्ट' एक उबाऊ, उपदेशों से सराबोर 'मोरैलिटी प्ले' है ( नैतिकतावादी नाटक) है। बेशक उसकी गहरी व्याख्या की कभी उपेक्षा नहीं की जा सकती किन्तु एक नाटक के तौर पर वह अत्यंत पठनीय, दिलचस्प और मार्मिक कृति है जो मूलतः मानवीय है। इसमें 'महाभारत', यूनानी तथा शेक्सपियरीय कथानकों का तनाव, औत्सुक्य, नाटकीयता, हर्ष और विषाद के सारे&amp;nbsp;लक्षण मौजूद हैं। &lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;फाउस्ट&lt;/strong&gt; जैसी हर महान कृति चूँकि प्रतिबद्ध विवेकशील विश्वबोध का प्रतिफलन होती है इसलिए वह हर युग में किसी न किसी तरह प्रासंगिक होती रहती है क्योंकि अंततः उसके केंद्र में म्सानव-जीवन, उसकी विदाम्ब्नाएं और समस्यां, उसके हर्ष-विषाद, जय-पराजय, उत्थान-पतन और कामदी एवं त्रासदी होते हैं। गोएथे को शायद इसका अनुमान तक न रहा होगा कि २१ वीं सदी तक आते-आते विश्व केवल यूरोप तक सीमित नहीं रहेगा, शैतान के कितने अवतार हो चके होंगे और फाउस्ट तथा ग्रेट्षेन के सामने कैसे प्रलोभन उपस्थित हो जायेंगे। गोएथे विश्व-साहित्य ( वेल्ट लिटेराटूअर) की अवधारणा का जनक था किन्तु विश्व-बाज़ार, विश्व-पूंजीवाद, वैश्विक ( नव) साम्राज्यवाद, वैश्विक-आतंकवाद आदि की कल्पना भला उसे कैसे हो सकती थी और अब तो विश्व इतनी तेजी से बदल रहा है कि हम अगले वर्ष की कल्पना भी नहीं कर सकते, अगली शताब्दियों की तो बात ही बहुत दूर है। आज मेफिस्टो राष्ट्रों, राजनीतियों, राजनेताओं, धर्म के भ्रष्ट और मानवद्रोही संस्करणों, पूंजीवाद, बाजारवाद, माल-संस्कृति, (अ) नैतिक स्वच्छन्दतावाद, संचार-माध्यमों, 'लाइफ स्टाइल', 'पेज थ्री', माफिआओं, विज्ञापनों, 'हिअर-एंड-नाउ', 'कार्पेडिएम' आदि के माध्यम से करोडों प्रौढ़ और युवा फाउस्‍टों और ग्रेट्षेनों को प्रलोभन और विनाश के वापसीविहीन मार्ग पर ले जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सारा&lt;/strong&gt; संसार धनकुबेरों और मार्की द साद की विश्वव्यापी वाल्पुर्गिसरात्रि में बदल गया है। बल्कि कभी-कभी लगता है कि प्रलुब्ध होने के लिए आज के हम फाउस्‍टों और ग्रेट्षेनों को मेफिस्टो की ज़रूरत रही ही नहीं, ठीक उसी तरह जैसे ड्रैकुला को सिर्फ एक बार अपने शिकार की गर्दन का खून पीने की ज़रूरत होती है जिसके बाद शिकार खुद एक नए शिकारी ड्रैकुला में बदल जाता है और इस तरह यह संक्रामक सिलसिला अनंत होता चला जाता है। आज मानवता ही और अधिक मेफिस्टो, फाउस्ट&lt;span class=""&gt; और ग्रेट्षेन &lt;/span&gt;बनती जा रही है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;किन्तु&lt;/strong&gt; चूँकि इसका अहसास हमें है, ठीक इसीलिए हममें अपनी सभ्यता के मेफिस्‍टोवाद का सामना करने का संकल्प और माद्दा भी बचा हुआ है। केवल इश्वर की इच्छा और कृपा पर निष्क्रियता से निर्भर रहते हुए हम अपने बीच मौजूद मेफिस्टो से बच नहीं सकते। क्या कभी-कभी ऐसा नहीं लगता कि वह सर्वशक्तिमान स्वयं मेफिस्टो के कई अवतारों में हमारी परीक्षा ले रहा है? यदि उसने हमें मेफिस्टो दिया है तो उसी ने हमें सनातन और समसामयिक शैतानों पर विजय प्राप्त करने वाला विवेक, विचारधारा, भविष्य-स्वप्न और नैतिक संकल्प भी दिए होंगे। ईश्वर की अनुकम्पा से ही अब हमें ईश्वर की ज़रूरत नहीं रही, जैसे धर्मों के सरे योगदान के बाद अब हमें धर्मों की ज़रूरत नहीं रही। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आज&lt;/strong&gt; हमारे पास गोएठे जैसे दृष्टा और 'फाउस्ट' -जैसी कालजयी नैतिक कृतियाँ हैं। मानवतावादी, समतावादी, प्रगतिकामी आस्थाएँ और विचारधाराएँ हमारे साथ हैं। 'फाउस्ट' कोई एकमात्र कृति नहीं जो हमें संघर्ष के लिए प्रेरित करेगी या चेतावनी देगी, जिस तरह कोई एक ईश्वर, कोई एक धर्म, कोई एक धर्मग्रन्थ या कोई एक मसीहा नहीं जो हमें बचायेगा, किन्तु इन सबका प्रगतिधार्मा सार ही हमें अपना उद्धार करने में सहायता देगा। तब वह शाश्वत सवेरा होगा जिसके उजाले में मेफिस्टो की सारी शक्तियां चली जाती हैं। &lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;****&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7056011166391074188-7515482326185801135?l=vatsanurag.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vatsanurag.blogspot.com/2009/10/blog-post_10.html</link><author>anuragji.kaisehain@gmail.com (anurag vats)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/StBK8woMgjI/AAAAAAAAAnw/4xolhdFWfTg/s72-c/200px-Goethe_%2528Stieler_1828%2529.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>6</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-7056011166391074188.post-4275037938362714280</guid><pubDate>Wed, 07 Oct 2009 18:08:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-10-08T09:40:10.224+05:30</atom:updated><title>पहली कहानी : नीरज पाण्डेय</title><description>&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&amp;nbsp;&lt;em&gt;&lt;span style="color: #b6d7a8;"&gt;&lt;span style="background-color: #b6d7a8;"&gt;&lt;span style="color: black;"&gt;( नीरज पाण्डेय की ख्याति वेंसडे फिल्म से है. वे अपनी फिल्मों के लिए खुद लिखते हैं. यह फिल्म से बहार उनकी पहली कहानी है. इसे नीरज और उनके मित्र प्रभात रंजन ने मिलकर अनूदित किया है. हम दोनों के आभारी हैं.)&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #f1c232; color: black;"&gt;प्यार के संबंध में एक छोटी सी बात&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने तीसरी घंटी पर दरवाजा खोला। &lt;br /&gt;&lt;em&gt;मैं बाथरुम में थी!&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;और तुम वहां क्या कर रही थी?&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुरुष&amp;nbsp;ने मुस्कुराकर उसे चूम लिया। वह&amp;nbsp;शरमा गई। उसने उसके नितंबों को दबाया। स्त्री ने उसके सीने को थपथपाया। पुरुष&amp;nbsp;ने अपना बैग नीचे रखा और मेल देखने लगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह रसोई में गई और चाय बनाने लगी।&lt;br /&gt;पुरुष&amp;nbsp;हाॅल में बैठा क्रेडिट कार्ड का स्टेटमेंट देखने मशरूफ है। &lt;br /&gt;कुछ बर्तन खड़खड़ाए और...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: red;"&gt;पुरुष&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पता नहीं साली बिना आवाज किए चाय बनाना कब सीखेगी? मेरा मतलब है, आप ही बताइए, चाय बनाने में तो कोई आवाज नहीं होनी चाहिए, लेकिन ऐसी कुतिया है कि पूछिए नहीं... ये कभी नहीं सीखने वाली है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब आएगी मर्तबान की आवाज, अब कैबिनेट खोलने की - अब बंद करने की आवाज और गुनगुनाने की आवाज कहां गई? हां... वह रही!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सात साल... चुतियापे से भरे सात साल हो गए लेकिन उसमें रत्ती&amp;nbsp;भर बदलाव नहीं आया। हमेशा&amp;nbsp; बाथरुम में घुसी रहती है। अभी भी इंतजार करती है कि दरवाजे पर पहुंचते ही उसे दबाऊँ! और उसकी बेवकूफी भरी मुस्कुराहट! पहले कभी दिलचस्प हुआ करती थी उसकी यह बेवकूफी भरी मुस्कुराहट भी। पर वह समय काफी पहले बीत चुका है। अब वह मुस्कुराहट उसके चेहरे पर मेरे दर्द का बयान है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी-कभी मैं सोचता हूं कि आखिर साली किस चीज की बनी है। मेरा मतलब है सारा दिन बस खाना और सोना और वही आवाज वाली चाय बनाना। और टीवी देखना। धार्मिक चैनल; आस्था, संस्कार, प्रेरणा, मिरैकल, वगैरह, वगैरह। कोई चूतिया बाबा बताता रहता है कि जीवन क्या है? ख़ुशी&amp;nbsp; क्या है? कर्म क्या है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अच्छा भाइयो, जीवन पाखाना है। ख़ुशी&amp;nbsp;इसमें है कि अच्छी तरह से पाखाना हो जाए। और कर्म है अपने पाखाने को साफ करना। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी मानिए। उन बाबाओं को कुछ भी मालूम नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अरेंज मैरेज! बस बताने के लिए कि कहीं आप कुछ और न सोच बैठें। मेरे माता-पिता मेरे लिए एक गाय चाहते थे। सो वे मेरे लिए ले आए। बस, यह गाय बोलने लगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस गाय की और मेरी एक वारिस है। उसकी आंखें अपनी मां की तरह नहीं हैं। थोड़ी सी उलाहना भरी। वह मुझे &lt;em&gt;पा &lt;/em&gt;बुलाती है। मेरे खयाल से इस कारण क्योंकि वह जानती है कि वह हमारी अधूरी इच्छा का परिणाम थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवन ने मुझे टीना के रूप में सांत्वना पुरस्कार दिया है। मेरी निजी सहायिका। मेरी अपनी, अंतरंग, मेरे लिए सब कुछ करने वाली। उसकी भी शादी&amp;nbsp;हो चुकी है और एक बच्चा भी है। &lt;br /&gt;टीना ये भी है वो भी है और बहुत कुछ और भी है। &lt;br /&gt;समझौतों की इस बावली दुनिया के लिए हम बिल्कुल माकूल ठहरते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #cc0000; color: black;"&gt;औरत&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे मुझे नहीं चाहते, मैं जानती हूं। वे मुझे क्यों नहीं चाहते, मैं यह भी जानती हूं। उनमें मुझे बताने की मर्दानगी क्यों नहीं है, मैं ये नहीं जानती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे उनसे बातें करना अच्छा लगता है... चाहती हूं कि उनको भी अच्छी लगूं, लेकिन तमाम कोशिशों&amp;nbsp;के बावजूद वे मुझे एप्रीसिएट नहीं करते। उन्होंने ही मुझे यह शब्द&amp;nbsp;सिखाया था- एप्रीसिएट करना!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं तो उनको हमेशा&amp;nbsp;एप्रीसिएट करती हूं लेकिन वे मुझे कभी नहीं करते। मैं बहुत कोशिश&amp;nbsp;करती हूं लेकिन वे कभी एप्रीसिएट नहीं करते। मैं पढ़ी-लिखी, समझदार दिखने की भी भरसक कोशिश&amp;nbsp;करती हूं लेकिन वे कभी एप्रीसिएट नहीं करते। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने तो नौ महीनों तक उनका बच्चा अपनी कोख में पाला लेकिन उन्होंने इसको भी एप्रीसिएट नहीं किया। पहले मुझे यह डर था कि वे मुझे बच्चा गिरवा लेने के लिए कहेंगे। इसलिए यह बात मैंने उनको तीसरे महीने बताई। इस तरह माया पैदा हुई। उन्होंने एप्रीसिएट नहीं किया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनको मेरा संभोग करते समय आवाजें निकालना भी पसंद नहीं। इसीलिए मैं अब हर कहीं आवाजें करती रहती हूं। अगर उनको लगता है कि दरवाजे के पास मुझे उस तरह से दबाना काफी है तो उनको और अच्छी तरह से करना चाहिए। उनको तो लगता है मीठे बोल ही काफी होते हैं। वे मुझे लेकर कहीं भी नहीं जाते क्योंकि उनको&amp;nbsp;शर्म आती है। वे माया से भी बात नहीं करते। शायद&amp;nbsp;उनको लगता है मैं कोई गाय हूं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं एप्रीसिएट नहीं करती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनका चक्कर चल रहा है। मैं जानती हूं। औरतें हमेशा&amp;nbsp;समझ जाती हैं। हमेशा। वे औरतें जिनके साथ धोखा हुआ हो? मेरे खयाल से वे धोखा खाना चाहती भी हैं। मैंने उसकी आवाज सुनी है। मैंने उनके ऑफिस&amp;nbsp;में फोन किया था और उसी औरत ने फोन उठाया था। उसने कहा था कि मैं होल्ड करुं तब तक वह ट्रांसफर कर रही है। उसकी कांपती आवाज। बातें करते-करते बीच में रुक जाना। मैं तुरंत समझ गई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन मैं इसे एप्रीसिएट नहीं करती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाद में मेरे दिमाग में बुरे-बुरे खयाल आने लगे। बुरे ख्वाब। बुरी बातें। मैं उनकी मौत के बारे में सपने देखने लगी। या मैं उनको सचमुच मरा हुआ देखना चाहती थी? बहरहाल, असल बात यह है कि तब मुझे उदासी नहीं होती थी। मुझे कुछ भी महसूस नहीं हुआ। नहीं। मैं झूठ बोल रही हूं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असल में मैं इन सबको एप्रीसिएट करने लगी हूं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए मैंने घर-घर की कहानी देखना छोड़ दिया और धार्मिक चैनल देखने लगी। बाबा लोग बकबक करते रहते हैं और मुझे नींद आ जाती है। उसी नींद में मुझे यह सपना आया। हां। वह सपना जिससे सब कुछ ठीक हो सकता था। जिससे सब कुछ बेहतर और सामान्य हो सकता था। मुझे और माया को ख़ुशी&amp;nbsp;मिल सकती थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे बस टीना के पति के बारे में पता करना था। वह कहां काम करता है?&lt;br /&gt;मैंने उसे फोन करके बता दिया कि उसकी पत्नी क्या गुल खिला रही है? उसने मुझसे पूछा मैं कौन हूं? मैंने फिल्मी स्टाइल में जवाब दिया- &lt;em&gt;इससे कुछ फर्क पड़ता है क्या?&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज की शाम&amp;nbsp;सब कुछ का फैसला हो जाएगा। &lt;br /&gt;मुझे यह पसंद आया। जो होने वाला है उसे आप लोग भी एप्रीसिएट करेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #cc0000;"&gt;प्यार के संबंध में एक छोटी सी बात&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरवाजे की घंटी बजी। अजय ने नजरें उठाई। &lt;br /&gt;&lt;em&gt;मैं उठ रहा हूं।&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;प्लीज।&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;काजल ने रसोई में टंगी घड़ी की ओर देखा। वह सात बजा रही थी। अजय ने दरवाजा खोला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो आदमी खड़े थे। एक लंबा, एक ठिगना। ठिगने ने हाथ में राॅड पकड़ रखा था। वे दस मिनट अजय के जीवन के सबसे लंबे, दर्द भरे लम्हे थे। टीना के पति और उसके साथ आए आदमी ने वे हड्डियां तोड़ डालीं जिनके बारे में अजय को पता भी नहीं था कि वे थीं भी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने केवल उसकी पिटाई ही नहीं की, एक तरह से उसको निचोड़ डाला। फिर उस ठिगने ने उसके मुंह पर पैर रखकर कहा- टीना से दूर रहना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काजल ने रसोई में गर्म चाय का एक घूंट लिया और मुस्कुराने लगी। प्यार के संबंध में वह छोटी सी बात यह है कि वह एक ही समय में रिसता भी रहता है और भरता भी जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #cc0000;"&gt;चार महीने बाद&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सब खुश&amp;nbsp;हैं। &lt;br /&gt;****&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7056011166391074188-4275037938362714280?l=vatsanurag.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vatsanurag.blogspot.com/2009/10/blog-post_07.html</link><author>anuragji.kaisehain@gmail.com (anurag vats)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>9</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-7056011166391074188.post-6091014605942170187</guid><pubDate>Sat, 03 Oct 2009 15:31:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-10-05T23:27:42.052+05:30</atom:updated><title>विष्णु खरे के लेख पर एक बढ़त : रविभूषण</title><description>&lt;em&gt;( हमने कुछ हफ्ते पहले &lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/search?updated-max=2009-09-17T18%3A43%3A00%2B05%3A30&amp;amp;max-results=1"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: #cc0000;"&gt;विष्णु खरे&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; का भारत भूषण पुरस्कार के तीस वर्षों की अवधि पर लिखा एक लेख छापा था. तब से विभिन्न हलकों में वह लेख विवाद और चर्चा के केंद्र में रहा और अब भी है. दिलचस्प यह है कि उस लेख का जिन लोगों ने विरोध किया है, उसका आधार लेख के भीतर की स्थापनाएं नहीं हैं. उससे उलझने की ईमानदार कोशिश नहीं दिखी है, जो एक तरह से चिंता का विषय है. यह इस बात का सूचक है कि हमारे बीच असहमत होने के लिए जो ज़रूरी अध्यवसाय लोगों को करना चाहिए, उसके बिना बात बनाने का चलन बढ़ रहा है. अपवादस्वरूप प्रभात खबर दैनिक में दिल्ली से दूर बैठे वरिष्ठ लेखक &lt;span style="color: #006600;"&gt;&lt;strong&gt;रविभूषण&lt;/strong&gt; &lt;/span&gt;ने पुस्तक ''उर्वर प्रदेश'' की नोटिस लेने के साथ-साथ विष्णुजी के लेख का अपने ढंग से पाठ भी किया है. हम इसे साभार यहाँ दे रहे हैं. इस बीच दो पुष्ट-अपुष्ट बातें भी सामने आई हैं. पुष्ट यह कि विष्णु खरे ने तीस वर्षों तक भारतभूषण स्मृति पुरस्कार समिति में रहने के बाद उससे इस्तीफा दे दिया है और अपुष्ट किन्तु अपने आप में अत्यंत अलोकतांत्रिक और दुखद यह कि उर्वर प्रदेश का वह संस्करण जिसमें विष्णु खरे का विवादस्पद लेख छापा गया है, प्रकाशक उसे कुछ स्वनामधन्य लेखकों के दबाव में हटाकर छापने वाले हैं. अगर यह बात सच साबित होती है, तो हिंदी में वैचारिक असहिष्णुता की एक नई मिसाल ही कायम होगी ! ...)&lt;/em&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SsdmQ7f8u7I/AAAAAAAAAnQ/5pDW0tLX9oQ/s1600-h/Raviji10001.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" r="true" src="http://1.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SsdmQ7f8u7I/AAAAAAAAAnQ/5pDW0tLX9oQ/s320/Raviji10001.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SsdmxlZgjTI/AAAAAAAAAnY/hW1F57hiBoI/s1600-h/Raviji20001.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" r="true" src="http://4.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SsdmxlZgjTI/AAAAAAAAAnY/hW1F57hiBoI/s320/Raviji20001.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SsdnYxcdLcI/AAAAAAAAAng/2mznRQmYdaI/s1600-h/Raviji30001.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" r="true" src="http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SsdnYxcdLcI/AAAAAAAAAng/2mznRQmYdaI/s320/Raviji30001.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/Ssdn3Nzx9eI/AAAAAAAAAno/k5NIsL5a7bE/s1600-h/Raviji40001.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" r="true" src="http://3.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/Ssdn3Nzx9eI/AAAAAAAAAno/k5NIsL5a7bE/s320/Raviji40001.jpg" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7056011166391074188-6091014605942170187?l=vatsanurag.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vatsanurag.blogspot.com/2009/10/blog-post.html</link><author>anuragji.kaisehain@gmail.com (anurag vats)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SsdmQ7f8u7I/AAAAAAAAAnQ/5pDW0tLX9oQ/s72-c/Raviji10001.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>3</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-7056011166391074188.post-7159423734366007023</guid><pubDate>Mon, 28 Sep 2009 05:32:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-09-28T18:06:19.955+05:30</atom:updated><title>ज़बां उर्दू : ५ : इस्मत चुगताई</title><description>&lt;div align="left"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="CLEAR: both; TEXT-ALIGN: left"&gt;&lt;a style="CLEAR: left; FLOAT: left; MARGIN-BOTTOM: 1em; MARGIN-RIGHT: 1em; cssfloat: left" href="http://3.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SsA0T-9RNOI/AAAAAAAAAnI/wEsWAWscDdg/s1600-h/poet-ismat-chughtai2.jpg" imageanchor="1"&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;&lt;img src="http://3.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SsA0T-9RNOI/AAAAAAAAAnI/wEsWAWscDdg/s200/poet-ismat-chughtai2.jpg" border="0" iq="true" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt; &lt;strong&gt;&lt;span style="color:blue;"&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;मैं...एक बच्चे को प्यार कर रही थी&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;वालिद&lt;/strong&gt; काफ़ी&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;रौशन&lt;span class=""&gt;ख़याल &lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;थे.&lt;/span&gt; बहुत-से हिंदू खानदानों से मेलजोल &lt;span class=""&gt;था, &lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;यानी &lt;/span&gt;एक ख़ास तबके &lt;span class=""&gt;के &lt;/span&gt;हिंदू-&lt;span class=""&gt;मुसलमान &lt;/span&gt;निहायत &lt;span class=""&gt;सलीके &lt;/span&gt;से घुले-मिले रहते &lt;span class=""&gt;थे.&lt;/span&gt; एक-दूसरे &lt;span class=""&gt;के &lt;/span&gt;जज़्बात का ख़याल &lt;span class=""&gt;रखते.&lt;/span&gt; हम काफ़ी छोटे थे जब ही एहसास होने लगा था &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;हिंदू-मुसलमान एक दूसरे से कुछ न कुछ &lt;span class=""&gt;मुख्तलिफ़ &lt;/span&gt;ज़रूर &lt;span class=""&gt;हैं.&lt;/span&gt; ज़बानी भाईचारे के प्रचार के साथ-साथ एक तरह &lt;span class=""&gt;की &lt;/span&gt;एहतियात का एहसास होता &lt;span class=""&gt;था.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अगर&lt;/strong&gt; कोई हिंदू आए तो गोश्त-&lt;span class=""&gt;वोश्त &lt;/span&gt;का नाम न लिया &lt;span class=""&gt;जाए, &lt;/span&gt;साथ बैठकर मेज़ पर खाते वक्त भी ख्याल रखा जाए &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;उनकी कोई चीज़ न &lt;span class=""&gt;छू &lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;जाए.&lt;/span&gt; सारा खाना दूसरे नौकर लगायें, उनका खाना पड़ोस का महाराज &lt;span class=""&gt;लगाये. &lt;/span&gt;बर्तन भी वहीं से माँगा दिए &lt;span class=""&gt;जायें. &lt;/span&gt;अजब घुटन सी तारी हो जाती &lt;span class=""&gt;थी.&lt;/span&gt; बेहद ऊंची-ऊंची रौशन&lt;span class=""&gt;ख़याली &lt;/span&gt;की बातें हो रही हैं. एक दूसरे की मुहब्बत और जाँ&lt;span class=""&gt;निसारी &lt;/span&gt;के &lt;span class=""&gt;किस्से &lt;/span&gt;दुहराए जा रहे &lt;span class=""&gt;हैं. &lt;/span&gt;अंग्रेजों को मुजरिम ठहराया जा रहा &lt;span class=""&gt;है.&lt;/span&gt; साथ-साथ सब बुजुर्ग लरज़ रहे &lt;span class=""&gt;हैं &lt;/span&gt;कि कहीं बच्चे छूटे बैल हैं, कोई ऐसी हरकत न कर बैठें कि &lt;span class=""&gt;धरम &lt;/span&gt;भ्रष्ट हो &lt;span class=""&gt;जाए.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'' क्या हिंदू आ रहे हैं ?'' पाबंदियां लगते देखकर हमलोग &lt;span class=""&gt;बोर &lt;/span&gt;होकर &lt;span class=""&gt;पूछते.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="BORDER-RIGHT: medium none; BORDER-TOP: medium none; BORDER-LEFT: medium none; BORDER-BOTTOM: medium none" align="left"&gt;&lt;span class=""&gt;''ख़बरदार!&lt;/span&gt; चाचाजी और चाचीजी आ रहे &lt;span class=""&gt;हैं. &lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;बद्तमीज़ी &lt;/span&gt;की तो खाल खींचकर भूसा भर दिया &lt;span class=""&gt;जाएगा.&lt;/span&gt;''&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="BORDER-RIGHT: medium none; BORDER-TOP: medium none; BORDER-LEFT: medium none; BORDER-BOTTOM: medium none" align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="BORDER-RIGHT: medium none; BORDER-TOP: medium none; BORDER-LEFT: medium none; BORDER-BOTTOM: medium none" align="left"&gt;&lt;strong&gt;और&lt;/strong&gt; हम फ़ौरन समझ जाते कि चचाजान और &lt;span class=""&gt;चचिजान &lt;/span&gt;नहीं आ रहे &lt;span class=""&gt;हैं.&lt;/span&gt; जब वो आते हैं तो सीख़कबाब &lt;span class=""&gt;और मुर्ग़-मुसल्लम पकता है, लौकी का रायता और दही-बड़े नहीं बनते.ये पकने और बनने का फर्क भी बड़ा दिलचस्प है. &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हमारे&lt;/strong&gt; पड़ोस में एक लालाजी रहते थे. उनकी बेटी से मेरी दांत-काटी रोटी थी. एक उम्र तक बच्चों पर छूत की पाबंदी लाज़मी नहीं समझी जाती. सूशी हमारे यहाँ खाना भी खा लेती थी. फल, दालमोट, बिस्कुट में इतनी छूत नहीं होती, लेकिन चूँकि हमें मालूम था कि सूशी गोश्त नहीं खाती, इसलिए उसे धोखे से किसी तरह गोश्त खिलाके बड़ा इत्मीनान होता था. हालाँकि उसे पता नहीं चलता था, मगर हमारा न जाने कौन सा जज़्बा तसल्ली पा जाता था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;वैसे &lt;/strong&gt;दिन भर एक दूसरे के घर में घुसे रहते थे मगर बकरीद के दिन सूशी ताले में बंद कर दी जाती थी. बकरे अहाते के पीछे टट्टी खड़ी करके काटे जाते. कई दिन तक गोश्त बंटता रहता. उन दिनों हमारे घर से लालाजी से नाता टूट जाता. उनके यहाँ भी जब कोई त्योहार होता तो हम पर पहरा बिठा दिया जाता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लालाजी&lt;/strong&gt; के यहाँ बड़ी धूमधाम से जश्न मनाया जा रहा था. जन्माष्टमी थी. एक तरफ़ कड़ाह चढ़ रहे थे और धड़ाधड़ पकवान तले जा रहे थे. बहार हम फ़कीरों की तरह खड़े हसरत से तक रहे थे. मिठाइयों की होशरुबा खुशबू अपनी तरफ खीच रही थी. सूशी ऐसे मौकों पर बड़ी मज़हबी बन जाया करती थी. वैसे तो हम दोनों बारहा एक ही अमरूद बारी-बारी दांत से काटकर खा चुके थे, मगर सबसे छुपकर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''भागो यहाँ से,'' आते-जाते लोग हमें दुत्कार जाते. हम फिर खिसक आते. फूले पेट की पूरियां तलते देखने का किस बच्चे को शौक़ नहीं होता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;''अदंर&lt;/strong&gt; क्या है?'' मैंने शोखी से पूछा. सामने का कमरा फूल-पत्तों से दुल्हन की तरह सजा हुआ था. अदंर से घंटियाँ बजने की आवाजें आ रही थीं. जी में खुदबुद हो &lt;span class=""&gt;रही थी &lt;/span&gt;-हाय अल्ला, अदंर कौन है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''वहां भगवान बिराजे हैं.'' सूशी ने गुरूर से गर्दन अकडाई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;''भगवान &lt;/strong&gt;!'' मुझे बेइंतिहा एहसासे-कमतरी सताने लगा. उनके भगवान क्या मज़े से आते हैं. एक हमारे अल्ला मियां हैं, न जाने कौन सी रग फडकी की फ़कीरों की सफ़ से खिसक के मैं बरामदे में पहुँच गई. घर के किसी फर्द की नज़र न पड़ी. मेरे मुंह पर मेरा मज़हब तो लिखा नहीं था. उधर से एक देवीजी आरती की थाली लिए सबके माथे पर चंदन-चावल चिपकाती आईं. मेरे माथे पर भी लगाती गुज़र गईं. मैंने फ़ौरन हथेली से टीका छुटाना चाहा, फिर मेरी बद्जाती आडे आ गई. सुनते थे, जहाँ टीका लगे उतना गोश्त जहन्नुम में जाता है. खैर मेरे पास गोश्त की फरावानी थी, इतना सा गोश्त चला गया जहन्नुम में तो कौन टोटा आ जायेगा. नौकरों की सोहबत में बड़ी होशियारियों आ जाती हैं. माथे पर सर्टिफिकेट लिए , मैं मज़े से उस कमरे में घुस गई जहाँ भगवान बिराज रहे थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बचपन&lt;/strong&gt; की आँखें कैसे सुहाने ख्वाबों का जाल बुन लेती हैं. घी और लोबान की खुशबू से कमरा महक रहा था. बीच कमरे में एक चाँदी का पलना लटक रहा था. रेशम और गोटे के तकियों और गद्दों पर एक रुपहली बच्चा लेटा झूल रहा था. क्या नफीस और बारीक काम था. बाल-बाल खूबसूरती से तराशा गया था. गले में माला, सर पर मोरपंखी मुकुट.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;और&lt;/strong&gt; सूरत इस गज़ब की भोली! आँखें जैसे लहकते हुए दिए! जिद कर रहा है, मुझे गोदी में ले लो. हौले से मैंने बच्चे का नरम-नरम गाल छुआ. मेरा रोआं-रोआं मुस्करा दिया. मैंने बे-इख्तियार उसे उठा कर सीने से लगा लिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;एकदम &lt;/strong&gt;जैसे तूफ़ान फट पड़ा और बच्चा चीख मारकर मेरी गोद से उछलकर गिर पड़ा. सूशी की नानी का मुंह फटा हुआ था. हाजियानी कैफियत तारी थी जैसे मैंने रुपहले बच्चे को चूमकर उसके हलक में तीर पैवस्त कर दिया हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;चाचीजी&lt;/strong&gt; ने झपटकर मेरा हाथ पकडा, भागती हुई लाईं और दरवाज़े से बाहर मुझे मरी हुई छिपकली की तरह फेंक दिया. फ़ौरन मेरे घर शिकायत पहुंची कि मैं चाँदी के भगवान की मूर्ति चुरा रही थी. अम्मा ने सर पीट लिया और फिर मुझे भी पीटा. वह तो कहो, अपने लालाजी से ऐसे भाईचारेवाले मरासिम थे: इससे भी मामूली हादिसों पर आजकल आये दिन खूनखराबे होते रहते हैं. मुझे समझाया गया कि बुतपरस्ती गुनाह है. महमूद गज़नवी बुतशिकन था. मेरी ख़ाक समझ में न आया. मेरे दिल में उस वक़्त परस्तिश का अहसास भी पैदा न हुआ था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मैं &lt;/strong&gt;पूजा नहीं कर रही थी, एक बच्चे को प्यार कर रही थी.&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(&lt;/em&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Ismat_Chughtai"&gt;&lt;em&gt; &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;इस्मत चुगताई&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;/a&gt;&lt;em&gt; : उर्दू अदब में बड़ा नाम. कथाकार. आधुनिक उर्दू कथा को आकार देने में अहम रोल. यह अंश उनकी आत्मकथा &lt;span style="color:#666600;"&gt;&lt;strong&gt;''कागज़ी है पैरहन''&lt;/strong&gt; &lt;/span&gt;से. इससे पहले इस स्तंभ में &lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/2009/08/blog-post_25.html"&gt;मिर्ज़ा हादी 'रूस्वा'&lt;/a&gt;&lt;/em&gt;&lt;em&gt;&lt;/em&gt;&lt;em&gt;, &lt;/em&gt;&lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/2009/02/blog-post_17.html"&gt;&lt;em&gt;ग़ालिब&lt;/em&gt;&lt;/a&gt;&lt;em&gt;, &lt;/em&gt;&lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/2008/08/blog-post_28.html"&gt;&lt;em&gt;फ़िराक़ &lt;/em&gt;&lt;/a&gt;&lt;em&gt;और &lt;/em&gt;&lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/2008/11/blog-post.html"&gt;&lt;em&gt;सफ़िया अख्तर&lt;/em&gt;&lt;/a&gt;&lt;em&gt; की रचनाएं आप पढ़ चुके हैं. )&lt;/em&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7056011166391074188-7159423734366007023?l=vatsanurag.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vatsanurag.blogspot.com/2009/09/blog-post_28.html</link><author>anuragji.kaisehain@gmail.com (anurag vats)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SsA0T-9RNOI/AAAAAAAAAnI/wEsWAWscDdg/s72-c/poet-ismat-chughtai2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>8</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-7056011166391074188.post-1200719225007543948</guid><pubDate>Sun, 20 Sep 2009 15:57:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-09-20T23:19:02.620+05:30</atom:updated><title>विपिन कुमार शर्मा की चार कवितायें</title><description>&lt;em&gt;{ कविता मेरे लिए न शौक की चीज़ है, न सामर्थ्य की, यह मेरे अन्दर छुपे एक क्षुब्ध व्यक्ति का प्र&lt;/em&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SrZRJ2t3hPI/AAAAAAAAAm4/q0-TiqywmJM/s1600-h/portrait_of_a_poet.jpg"&gt;&lt;em&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5383579634316575986" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 237px; CURSOR: hand; HEIGHT: 400px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SrZRJ2t3hPI/AAAAAAAAAm4/q0-TiqywmJM/s400/portrait_of_a_poet.jpg" border="0" /&gt;&lt;/em&gt;&lt;/a&gt;&lt;em&gt;तिरोध है. मैं प्रायः तभी लिखता हूँ जब देश या समाज के समानांतर मेरे मस्तिष्क में बन रही स्थितियां बर्दाश्त के बहार हो जाती हैं. मैं महज अपनी मुक्ति के लिए नहीं लिखता, जो लोग मेरे सोच के दायरे में हैं, उन सबकी मुक्ति-आकांक्षा को अपनी मुक्ति से जोड़कर लिखता हूँ. यही वजह है की लिखने के बाद भी मेरे अन्दर की छटपटाहट कभी समाप्त नही होती. कविता मेरे लिए वाग्जाल नहीं, बल्कि हर तरह के जाल को काटनेवाला खंजर है. अपनी कविता में मैं बातों को उलझाना नहीं, बल्कि सुलझाना चाहता हूँ. इसीलिए सहजता को चुनौती की तरह लेता हूँ- &lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/2008/12/blog-post_06.html"&gt;&lt;strong&gt;कवि. &lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;}&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;कवि&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;श्लथ क़दमों से&lt;br /&gt;लौटता है घर&lt;br /&gt;कवि&lt;br /&gt;धीरे-धीरे&lt;br /&gt;भरके निकला था सुबह&lt;br /&gt;कविताओं की टोकरी&lt;br /&gt;बिकीं एक भी नहीं&lt;br /&gt;वापिस लौटा है&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;लेकर,&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;भूख-प्यास&lt;br /&gt;कुंठा-त्रास&lt;br /&gt;और वही रोज़ की चिख-&lt;span class=""&gt;चिख&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;नंगे-अधनंगे बच्चे&lt;br /&gt;हर सम्भव जगह&lt;br /&gt;पिता पर झूल जाते हैं&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;span class=""&gt;उन्हें कुछ भी नहीं चाहिए&lt;br /&gt;परम संतोषी हैं&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;span class=""&gt;लेकिन कवि कुछ चाहता है&lt;br /&gt;अपने बच्चों से&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;उन्हीं की भांति उमगती -विहंसती कवितायें&lt;br /&gt;और गदबदे भी&lt;br /&gt;( उनकी तरह कुपोषित नहीं)&lt;br /&gt;पर बच्चों के पास कवितायें कहाँ !&lt;br /&gt;न ही मालूम है किकैसे बनती हैं कवितायें&lt;br /&gt;फटे बिवाइयों वाले&lt;br /&gt;निरीह से पाँव&lt;br /&gt;जाने कब से चुभ रहे हैं&lt;br /&gt;कवि की आंखों में&lt;br /&gt;दबे कन्धों और झुकी आंखों से&lt;br /&gt;देख रहा है पत्नी की रोनी सूरत&lt;br /&gt;आजिज़ होकर उठता है&lt;br /&gt;बच्चों को धूल-गर्द की भांति&lt;br /&gt;बदन से झाड़ते हुए&lt;br /&gt;और पत्नी के होठों को&lt;br /&gt;दोनों हाथों की उँगलियों से&lt;br /&gt;निर्ममतापूर्वक खींचकर&lt;br /&gt;कहता है -&lt;br /&gt;'' हंसती रहो भाग्यवान !&lt;br /&gt;संपादकों को&lt;br /&gt;अब हास्य कवितायें चाहिए।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;हे मेरी तुम&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अनेक दुखों के भार से&lt;br /&gt;बेजार हुई जा रही, इन दिनों&lt;br /&gt;'' हे मेरी तुम !''&lt;br /&gt;मैं जानना चाहता हूँ&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;की &lt;/span&gt;हज़ार मुश्किलों के बीच&lt;br /&gt;एकदम से मुस्करा पड़ने की&lt;br /&gt;मजबूरी क्या है ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने तुमसे, तुम्हारी&lt;br /&gt;हँसी तो नहीं मांगी थी&lt;br /&gt;यह और बात, &lt;span class=""&gt;कि&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;लाचारी भी नहीं मांगी थी&lt;br /&gt;ऐसा नहीं कि तुमसे सुख न चाहा&lt;br /&gt;शायद ! ऐसा भी नहीं&lt;br /&gt;कि तुमने मेरे सुख को समझा ही नहीं !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ख़ुद को टुकड़ा-टुकड़ा करके&lt;br /&gt;बारी-बारी देती गईं तुम&lt;br /&gt;और मैं संकोचवश यह न कह &lt;span class=""&gt;सका&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;कि मैं तुम्हारा पूरा चाहता हूँ&lt;br /&gt;न ही यह, कि मैं&lt;br /&gt;तुम्हें टुकड़ा होते नहीं देख सकता।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;गाँधी के देश में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;हमारे गाल पर&lt;br /&gt;नहीं मारता अब तमाचा कोई&lt;br /&gt;कि हम&lt;br /&gt;तपाक से दूसरा गाल बढ़ा दें&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;अब तो चुभते हैं&lt;br /&gt;उनके पीने दांत&lt;br /&gt;खच्च से हमारी गर्दन पर&lt;br /&gt;और उनकी सहस्त्र जिह्वाएँ&lt;br /&gt;लपलपा उठते हैं&lt;br /&gt;फ़व्वारे की तरह चीत्कार करते खून पर &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;गाँधी के इस देश में&lt;br /&gt;हमें&lt;br /&gt;ज़्यादा से ज़्यादा स्वस्थ होना होगा&lt;br /&gt;ताकि हम उनकी खून की हवस बुझा सकें&lt;br /&gt;या यह भी&lt;br /&gt;कि उनकी यह आदत ही छुड़ा सकें &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;आदत&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;कभी भट्ठी में पिघलता लोहा भी&lt;br /&gt;मनमानी पर उतर आता है&lt;br /&gt;बन्दूक के बदले&lt;br /&gt;हँसिया में ढल जाता है&lt;br /&gt;मगर&lt;br /&gt;खून पीने की आदत&lt;br /&gt;बदल नहीं पाता है &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;( ऊपर दी गई पेंटिंग ''पोट्रेट ऑफ़ अ पोएट'' &lt;strong&gt;&lt;em&gt;वेन कोस्तुरानोव&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; की है।)&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7056011166391074188-1200719225007543948?l=vatsanurag.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vatsanurag.blogspot.com/2009/09/blog-post_20.html</link><author>anuragji.kaisehain@gmail.com (anurag vats)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SrZRJ2t3hPI/AAAAAAAAAm4/q0-TiqywmJM/s72-c/portrait_of_a_poet.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>5</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-7056011166391074188.post-4317033347272258323</guid><pubDate>Thu, 17 Sep 2009 13:13:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-09-18T18:29:47.789+05:30</atom:updated><title>गिरिराज किराड़ू की सात कवितायें</title><description>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SrIubsu1AsI/AAAAAAAAAmw/okqNsX1EwpM/s1600-h/woman-with-scenario.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" mq="true" src="http://4.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SrIubsu1AsI/AAAAAAAAAmw/okqNsX1EwpM/s400/woman-with-scenario.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="font-size: 85%;"&gt;( शिव कुमार गाँधी की चित्र-कृति A Woman with a Scenario . प्रतिलिपि से साभार )&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;em&gt;{ हमेशा से तो नहीं पर पिछले कुछ समय से मेरी कविताओं में कई दूसरे लेखक, कलाकार (ज्यादातर लेखक ही) और उनका काम मौजूद रहने लगा है. लेकिन ये सात कवितायेँ तो दूसरो के काम के बिना संभव ही नहीं थीं - 'डॉन किख़ोते का रचयिता, पियरे मेनार्ड' बोर्खेज़ की इसी शीर्षक वाली एक कहानी से निकलती है. 'संगतराश' के. आसिफ/अमान/कमाल अमरोही की मुगल-ए-आज़म से और 'बादशाह मैकबेथ' ज़ाहिर ही शेक्सपीयर के मैकबैथ से. उसी तरह दो अन्य फ्लाबेयर और रेणु के प्रसिद्ध फिक्शन से. 'दो अर्थ का भय' लिखते हुए रघुवीर सहाय की इसी शीर्षक से लिखी कविता दिमाग में थी. 'अभिव्यक्त' शायद विनोद कुमार शुक्ल की कई कविताओं में से या उनकी सब कविता की किसी अनुपस्थिति में से – &lt;strong&gt;&lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/2009/04/blog-post_25.html"&gt;कवि&lt;/a&gt;. &lt;/strong&gt;}&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: #009900;"&gt;&lt;strong&gt;संगतराश&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;शायद एक वही सब कुछ पहले से जानता था सब कुछ पहले से तराश रखा था उसने&lt;br /&gt;वह हमेशा वीराने में रहता था और एक दिन अचानक उसके वीराने में जो बहार चली आयेगी&lt;br /&gt;उसकी आँखें ग़ज़ब की होंगी जब दूसरे ख्वाब देख रहे होंगे वह बस अपनी आँखें देखेगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो हकीकत ही क्या जिसे मुजुस्तमा न बनाया जा सके वह बहार से कहेगा और बेतहाशा हंसने लगेगा&lt;br /&gt;&lt;span style="color: #93c47d;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: #009900;"&gt;अभिव्यक्त&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नीम का अर्थ पीपल था पीपल का बरगद बरगद का तुलसी इसी तरह कमल का गुलाब गुलाब का बेला बेला का बोगेनवीलिया पर शुक्र है पेड़ का अर्थ कोई पेड़ फूल का कोई फूल ही था इतना रहता था मैं मनुष्यों के बीच फिर भी कबीर का अर्थ घनानंद मीरां का अर्थ महादेवी नहीं था मेरी सारी गफ़लत उन के बारे में थी जो मनुष्य नहीं थे मैं उन दिनों की बात कर रहा हूँ जब मेरा अर्थ तुम हो जातीं अगर मैं अपना अर्थ रह गया होता मैं उन दिनों की बात कर रहा हूँ जब पेड़ों से झूल रही थीं लाशें हर तरफ और कई दिनों से विनोद कुमार शुक्ल की कोई कविता नहीं थी जीवन में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: #009900;"&gt;बादशाह मैकबैथ&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size: 78%;"&gt;(कवि अरूण कमल के लिये)&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;क्या हुआ बैंको के बेटे का शेक्सपीयर हमें नहीं बताता – कुछ समझे &lt;span class=""&gt;बादशाह?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;उसकी कोई दिलचस्पी नहीं चुड़ैलों के बताये भविष्य में,&lt;br /&gt;तुम्हें कुछ ख़बर भी है कौन बनेगा बादशाह तुम्हारे बाद?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस खंज़र ने डरा दिया था तुम्हें उसकी मूठ बर्नम की लकड़ी से तो नहीं बनी थी?&lt;br /&gt;गौर से देखा था तुमने जब हवा में लहरा रहा था वह?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देखो, बादशाह देखो, तुम्हारी त्रासदी मृतक लिख रहे हैं&lt;br /&gt;हिरण चुराने वाला शेक्सपीयर तो उनका लिपिक भर है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: #009900;"&gt;डॉन किख़ोते का रचयिता, पियरे मेनार्ड&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;br /&gt;पियरे&lt;/span&gt; मेनार्ड एक किताब लिखना चाहता है पर पहली मुश्किल तो यही कि वो खुद कोई नहीं उसकी जीवनी तो शायद है कोई जीवन नहीं दूसरी यह कि वह एक लिखी हुई किताब को किसी नये तरीके से नहीं लिखना चाहता ऐसा तो सभी लेखक करते ही हैं वह शताब्दियों में हजारों लाखों के पढ़ी हुई किताब को शब्द दर शब्द वैसे ही लिखना चाहता है और बेचारा पियरे उसकी तीसरी मुश्किल यह कि वो सोचता है शताब्दियों में हजारों लाखों के पढ़ी हुई किताब को शब्द दर शब्द लिख कर ही वो मौलिक लेखक हो पायेगा कि इसी तरह जैसा सभी लेखक नहीं करते वैसा करके ही वह एक लेखक हो पायेगा&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;br /&gt;कितना&lt;/span&gt; खुशनसीब है पियरे मेनार्ड बस यही तीन मुश्किलें हैं उसकी जान को&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;br /&gt;पर&lt;/span&gt; इतनी आसान किताब भी जिसमें उसे शताब्दियों में हजारों लाखों के पढ़ी हुई किताब को शब्द दर शब्द फिर से लिखना भर है वह कभी पूरी नहीं लिख पायेगा किताबों की भूलभूलैया में घूमते हुए वह शताब्दियों में हजारों लाखों के पढ़ी हुई किताब के लेखक से टकरा जायेगा और कहेगा मेरी किताब को मुझसे पहले लिखकर आप मैं हो गये आपकी किताब को लिखते लिखते मैं आप हो गया हूँ क्या मिला आपको यह करके मैं कितना मजें में था बिना जीवन के अब चैन पड़ गया आपकी आत्मा को जी में आता है आपको दरिया में डुबा दूँ और किनारे बैठकर मुजरा करूँ आपके डूब मरने का इधर आप डूब मरते रहें उधर मैं खूब सारी बीयर पीता रहूँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: #009900;"&gt;दो अर्थ का भय&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;अपमान बेहद था होने का रक्त के दरिया में दौड़ते घुड़सवार थे किसी और से नहीं&lt;br /&gt;अपने आप से थी शर्मिंदगी हर साँस में हर शब्द का एक अर्थ दुख दूसरा मज़ाक था – जीवन में&lt;br /&gt;कल्पना में पर नहीं था इनमें से कुछ भी&lt;br /&gt;यही मेरा गुनाह कल्पना में सुखी था मैं&lt;br /&gt;&lt;span style="color: #93c47d;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color: black;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: #009900;"&gt;मादाम&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: #33cc00;"&gt;&lt;span style="color: #009900;"&gt; बोवारी से क्षमा&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह मादाम बोवारी का अभिनय कर रही है&lt;br /&gt;बिल्कुल अंतिम दृश्य है विष उसके शरीर में फैल रहा है वह क्षमा माँगती है&lt;br /&gt;यह देखते हुए मैं उसके पति की भूमिका में हूँ&lt;br /&gt;मैं भी उससे क्षमा माँगता हूँ –&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्षमा करो प्रिये, मैं इस कथा से अभी विदा नहीं ले सकता&lt;br /&gt;तुम्हारा अंतिम संस्कार मेरा अंतिम संस्कार नहीं है&lt;br /&gt;मैं तुम्हारा समाधिलेख नहीं हूँ&lt;br /&gt;मैं जीवन का आज्ञाकारी पालतू हूँ&lt;br /&gt;मुझे तुम्हारी याद की ही नहीं कब्र की भी देखभाल करनी है&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;br /&gt;क्षमा&lt;/span&gt; करो, प्रिये, क्षमा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: #93c47d;"&gt;&lt;span style="color: #009900;"&gt;कहानी के फेर में&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;br /&gt;हिरामन&lt;/span&gt; तीन कसमें खाता है&lt;br /&gt;फिर किसी कहानी का सुपात्र नहीं बनूंगा&lt;br /&gt;फिर किसी कहानीकार को अपने बारे में नहीं लिखने दूंगा&lt;br /&gt;फिर किसी कहानी में अपना ही पार्ट नहीं करुंगा –&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रेणु थोड़ा उदास हो कर उसे देखते हैं फिर तनिक हंसकर कहते हैं&lt;br /&gt;जा रे जमाना, तू भी आ गया मेरी कहानी के फेर में!&lt;br /&gt;****&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7056011166391074188-4317033347272258323?l=vatsanurag.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vatsanurag.blogspot.com/2009/09/blog-post_17.html</link><author>anuragji.kaisehain@gmail.com (anurag vats)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SrIubsu1AsI/AAAAAAAAAmw/okqNsX1EwpM/s72-c/woman-with-scenario.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>5</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-7056011166391074188.post-7989490858687300609</guid><pubDate>Thu, 10 Sep 2009 12:19:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-09-11T16:22:54.468+05:30</atom:updated><title>सबद पुस्तिका : १ : विष्णु खरे</title><description>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/Sqjl7BffB9I/AAAAAAAAAmo/q29tdqO9pyA/s1600-h/vishnu-khare-2c.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" mq="true" src="http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/Sqjl7BffB9I/AAAAAAAAAmo/q29tdqO9pyA/s320/vishnu-khare-2c.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="background-color: #fce5cd; color: black;"&gt;(आगे दिए जा रहे लेख को विष्णुजी ने हमारे आग्रह पर यहाँ पुस्तिका स्वरुप छापने की अनुमति दी है. हम उनके आभारी हैं. यह लेख यों भूमिकास्वरुप कुछ संशोधनों के साथ राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित भारत भूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार पर केंद्रित पुस्‍तक ‘उर्वर प्रदेश’ में छपा है. इसके अविकल छापने का आग्रह ज़ाहिर है दुतरफा रहा है. याद नहीं आता, क्योंकि कम पढ़ा है, कि हिंदी में किसी प्रतिष्ठित पुरस्कार के निर्णायक मंडल में रहते हुए उसके औचित्य, चयन-प्रक्रिया, निर्णायक और प्राप्तकर्ता के बारे में इससे पहले किसी ने इतना निर्भीक, तार्किक और ज़रूरी मूल्यांकन का यत्न किया है. इसमें दूसरों पर लिखते हुए खुद के निर्णयों को बख्शने की सलाहियत नहीं है और न ही यह हमारी एक लोकप्रिय विवाद को जन्म देकर उसमें केन्द्रीयता हासिल कर लेने की अपरिपक्व सोच की ही उपज है. सत्तर पार विष्णु सौभाग्यवश उस बूढ़ बचपना में बूड़ नहीं गए हैं, जिसमें बूड़कर उनके समकालीन और कुछ बुजुर्गवार धौलधप्पा खेल हमें इंगेज रखने की लज्जाजनक कोशिशें कर&amp;nbsp;रहे हैं. )&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;span style="color: #ffe599;"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: white; font-size: x-small;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;span style="color: white;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: #ffe599;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #e69138; color: black;"&gt;एक पुरस्‍कार के तीन दशक :&lt;/span&gt;&lt;span style="color: orange;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="background-color: #cc0000; color: black;"&gt;एक अंशत: विवादास्‍पद जायज़ा&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="background-color: #b6d7a8; color: black;"&gt;विष्‍णु खरे&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कोई&lt;/strong&gt; ऐसा वार्षिक पुरस्‍कार, जिसे सरकारें या साहित्यिक-ग़ैर-साहित्यिक संस्‍थान प्रयोजित न कर रहे हों बल्कि एक कवि की स्‍मृति में उसके परिजनों ने स्‍थापित किया हो, जिसकी राशि लुभाने वाली न हो, जो 'पिछले वर्ष' प्रकाशित 35 साल की आयु से कम के किसी कवि की सिर्फ़ एक कविता पर दिया जाता हो, जिसका निर्णय पांच लेखक प्रति वर्ष बारी-बारी से स्‍वतंत्र रूप से करते हों, जो 1980 से लगातार दिया जा रहा हो और इस तरह 2009 में अपने तीस वर्ष पूरे कर चुका हो, आश्‍चर्य, हर्ष और अभिनंदन की भावनाएं जगाता है. इसमें संदेह नहीं कि &lt;span style="background-color: #76a5af; color: black;"&gt;भारतभूषण अग्रवाल स्‍मृति कविता पुरस्‍कार&lt;/span&gt; 'तार सप्‍तक' के यशस्‍वी कवि दिवंगत भारत जी की स्‍मृति को बनाए रखने के अपने मौलिक उद्देश्‍य में सफल रहा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लेकिन&lt;/strong&gt; किसी भी पुरस्‍कार को मात्र उसके प्राथ‍मिक लक्ष्‍य की कामयाबी या असफलता पर नहीं आंका जाता. वह उसकी प्रतिज्ञाओं, उसके निर्वाह और उससे उत्‍पन्‍न परिणामों और प्रतिघातों पर परखा जाएगा. कुछ बहसें तो ऐसी होंगी, जिनका कोई हल होगा ही नहीं – मसलन क्‍या चर्चाधीन पुरस्‍कार के सारे निर्णायक इस योग्‍य और पूर्वग्रहमुक्‍त हैं कि वे पात्र कवि की 'पिछले वर्ष' की 'श्रेष्‍ठ' कविता जान और चुन सकें, क्‍या वे वाक़ई सारी वांछनीय कविताएं पढ़ चुके होते हैं, क्‍या सारे निर्णायक और हिंदी कविता के सभी कि़स्‍म के पाठक सचमुच सहमत हो पाते हैं कि पुरस्‍कृत कविता विचाराधीन वर्ष की श्रेष्‍ठ कविता है? प्रारंभिक भलाई यही मानकर चलने में है कि संसार का कोई भी पुरस्‍कार मतभेद और विवाद से परे हो नहीं सकता- यदि उसमें दिलचस्‍पी रखने वालों का जैसा-तैसा प्रबुद्ध बहुमत उसके पक्ष्‍ा में प्रतीत हो तो उसे वैध मानना होगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;यदि&lt;/strong&gt; समसामयिक हिंदी कविता में आपकी दिलचस्‍पी सामान्‍य से अधिक है या उसमें आपकी किसी भी कि़स्‍म की सक्रिय भागीदारी है तो पुरस्‍कार पर निर्णय देने के आपके मापदंड और जटिल होते जाएंगे. पहला सवाल यही किया जा सकता है कि क्‍या भारतजी इतने महत्‍वपूर्ण कवि और लेखक थे कि उनकी स्‍मृति को बनाए रखने के लिए कोई पुरस्‍कार स्‍थापित किया जाता? यह इसलिए कि जब हम आज के 'निजी' या 'पारिवारिक' पुरस्‍कारों पर नज़र डालते हैं तो दुर्भाग्‍यवश यह पाते हैं कि उनमें से कई ऐसे अज्ञातकुलशील दिवंगतों के नाम पर हैं जो नितांत साहित्‍यसंगीतकलाहीन थे - यद्यपि वैसा होना कोई अपराध नहीं – और उनके समर्थ वंशजों, शुभचिंतकों या मातहतों ने परस्‍पर अमरत्‍व तथा निजी प्रभाव-क्षेत्र और साख प्राप्‍त करने के लिए स्‍मृति पुरस्‍कार स्‍थापित कर डाले. भारतजी 'तार सप्‍तक' और उसके पहले और बाद की अपनी कविताओं के कारण ही नहीं, हिंदी उपन्‍यास पर अपने मौलिक शोध और साहित्‍य अकादेमी में भारतीय साहित्‍यों और हिंदी के लिए किए गए ठोस काम, अपने कुछ अप्रतिम अनुवादों और वाक़ई युवा प्रतिभाओं को सक्रिय प्रोत्‍साहन देने के लिए साहित्‍य में चिरस्‍थायी स्‍थान बना चुके हैं. उनके परिवार को न तो उनके लिए और न अपने लिए हिंदी या किसी भी अन्‍य क्षेत्र में किसी स्‍वार्थ-सिद्धि के लिए इस पुरस्‍कार का इस्‍तेमाल करना है. हिंदी में इतने असंदिग्‍ध औचित्‍य वाले पुरस्‍कार बहुत कम हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;strong&gt;समस्‍या&lt;/strong&gt; निर्णायकों को लेकर हो सकती है. तीस वर्षों में निर्णायकों में से एक ही नाम बदला है- &lt;span style="background-color: #d5a6bd; color: black;"&gt;नेमिचंद्र जैन&lt;/span&gt; के देहावसान के बाद उनके स्‍थान पर इसी पुरस्‍कार के पहले विजेता और अब सुपरिचित प्रौढ़ कवि &lt;span style="background-color: #e69138; color: black;"&gt;अरुण कमल&lt;/span&gt; को निर्णायक बनाया गया है वर्ना &lt;span style="color: cyan;"&gt;&lt;span style="background-color: #93c47d; color: black;"&gt;नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, विष्‍णु खरे &lt;/span&gt;&lt;span style="color: black;"&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span style="background-color: #93c47d; color: black;"&gt;अशोक वाजपेयी&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: black;"&gt;1980 से निर्णायक हैं&lt;/span&gt;. यह भी एक अच्‍छा संयोग है कि तीसवें पुरस्‍कार के निर्णायक अरुण कमल हैं, जो उनका प्रवेश-निर्णय है. जिस वर्ष (1979) में निर्णायक-मंडल तय हुआ है तब उसके युवतम सदस्‍य विष्‍णु खरे (39 वर्ष) और अशोक वाजपेयी (38 वर्ष) थे और उन्‍हें युवा ही कहा जाएगा. अशोक वाजपेयी अपने लेखन और सांस्‍कृतिक गतिविधियों से तभी पर्याप्‍त ख्‍याति अर्जित कर चुके थे यद्यपि विष्‍णु खरे का उस समय से लेकर अब तक साहित्‍य में तो क्‍या, कहीं भी क्‍या स्‍थान है यह कहना कठिन है. 'तार सप्‍तक' योजना के जन्‍मदाता और उसकी पांडुलिपि के मूल संयोजक-संपादक नेमिचंद्र जैन, जो स्‍वयं उसमें कवि के रूप में उपस्थि‍त हैं और भारतभूषण अग्रवाल के आजीवन मित्र और विवाह के बाद हमज़ुल्‍फ़ रहे, निर्णायक मंडल के वरिष्‍ठतम सदस्‍य थे. हिंदी के अनेक लेखकों की अनेक असहमतियां नेमिजी से हो सकती थीं किंतु उन जैसा कठोर साहित्यिक और व्‍यक्तिगत नैतिकता वाला, अपने विचारों, अवधारणाओं, मूल्‍यांकनों-निर्णयों पर अटल कवि-आलोचक-अनुवादक-सम्‍पादक, 'नो नॉन्‍सैंस' स्‍पष्‍टवादी बुद्धिजीवी हिंदी में शायद ही कोई दूसरा हो. उन्‍होंने हिंदी की सतत् पतनशील दुनिया में कभी इतना लोकप्रिय नहीं होना चा‍हा कि कोई पुरस्‍कारप्रार्थी उनके नज़दीक भी फटक सके. उनकी साहित्यिक पसंद-नापसंद से असहमत होना हमेशा संभव था, उनकी नीयत और ईमानदारी पर लेशमात्र भी संदेह करना कुफ़्र ही समझा जाएगा. उनके कुछ अभिमतों को आप दुर्भाग्‍यपूर्ण कह सकते थे, दुरभिसंधि-प्रेरित नहीं.&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;br /&gt;यहां&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह और अशोक वाजपेयी की आलोचनात्‍मक साहित्यिक जीवनियों ('‍क्रिटिकल लिटरेरी बाइऑग्राफ़ी') के खुलासों में जाने का न अवकाश है और न औचित्‍य, किंतु यह सच है कि हिंदी की अकादमिक दुनिया में कुछ अर्से तक सत्‍त-सम्‍पन्‍न रहने के बावजूद केदारनाथ सिंह हिंदी प्रतिष्‍ठान के संदिग्‍ध व्‍यक्तित्‍व कभी नहीं बन पाए. निस्‍संदेह हिंदी साहित्‍य में उनकी छवि एक अजातशत्रु भले व्‍यक्ति की है और एक कवि के रूप में अकादमिक-ग़ैर-अकादमिक तथा साहित्यिक-ग़ैर-साहित्यिक हलक़ों में उन्‍हें असाधारण प्रतिष्‍ठा और लोकप्रियता हासिल है. वे मिलनसार, सामाजिक तथा अपने मित्रों और प्रशंसकों के हितैषी और प्रोत्‍साहक रहे हैं. उन्‍हें 'मृदूनि कुसुमादपि' माना जाता है. आलोचक के रूप में नामवर सिंह और अशोक वाजपेयी की, और कवि के रूप में मात्र अशोक वाजपेयी की, आज जो भी प्रतिष्‍ठा बच रही हो, हिंदी साहित्‍य जगत में दोनों के विराट, प्रतियोगी प्रभाव-मंडल और 'क्‍लाउट' हैं. दोनों की विचारधाराएं, यदि उन्‍हें यह नाम दिया जा सकता हो तो, प्रतिद्वंद्वी हैं और दोनों के भक्‍त, अनुयायी और कृपापात्र 'ए गर्ल इन एवरी पोर्ट' की तरह हर क़स्‍बे, शहर, महानगर में बिछे पड़े हैं. यदि नामवर सिंह का असर हिंदी की विस्‍तीर्ण पतनोन्‍मुख दुनिया, एक दयनीय लेखक संघ और हाशिए की राजनीतिक राजनीति पर है तो अशोक वाजपेयी की प्रति‍क्रियावादी विचारधारा एक ओर तो हिंदी साहित्‍य की एक बावली और साकि़त मग़ज़ी (लूनटिक एंड डिकेडेंट फ्रिंज) को साथ लिए और पोषित किए हुए चलती है और दूसरी ओर देश के प्रशासकीय और राजनीतिक गलियारों और चित्रकला की अरबों रुपयों की 'एलीटिस्‍ट' दुनिया से ताक़त हासिल करती है और उन्‍हें ताक़त देती है. अशोक के पास हमेशा सत्‍ता रही है और उन्होंने उसका मिला-जुला इस्‍तेमाल किया है लेकिन इस समय वे हिंदी में अपने चरम पर हैं.&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;br /&gt;इस&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; तूमार का लुब्‍बेलुबाब यह है कि जब ऐसे सत्‍ताधारियों के अनुगामियों, मातहतों, मुरीदों और प्रशंसकों की संख्‍या बढ़ती जाती है तो जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे वे अपने भक्‍तों की उम्‍मीदों और मांगों के शिकार या क़ैदी भी होने लगते हैं. जो आराध्‍य अपने पूजकों को वरदान नहीं देता, उसकी मूर्ति शीघ्र ही उपेक्षित हो जाती है. औलिया और मुतवल्‍ली एक-दूसरे से ताक़त हासिल करते हैं. फिर हिंदी में व्‍यामोह ('पैरेनोइआ') और षड्यंत्र-सिद्धांत ('कॉन्स्पिरेसी थियरी') लगभग स्‍थायी-भाव हैं सो अलग. इसलिए अन्‍य पुरस्‍कारों सहित भारतभूषण अग्रवाल स्‍मृति कविता-पुरस्‍कार पर भी हर वर्ष जाति, प्रदेश, क्षेत्र, बोली, आस्‍था, विभिन्‍न कि़स्‍मों के अंतंरंग सम्‍बंध, रसूख़, विनिमय आदि के सच्‍चे-झूठे संदेह किए ही जाते रहे हैं.&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;br /&gt;समस्&lt;/span&gt;‍या&lt;/strong&gt; यह है कि जब तक कोई निर्णायक ही अपने कमज़ोर लमहों में क़ुबूल न कर ले - एक अन्‍य पुरस्‍कार की निर्णायक-मंडल बैठक में ऐसा हो चुका है - कि उसने किसी दबाव में पुरस्‍कार दिया है, या कोई और ठोस, क़ानूनी-सरीखा प्रमाण न हो, तब तक सिर्फ़ पुरस्‍कृत कृति की गुणवत्‍ता पर बहस की जा सकती है और उसी के आधार पर कहा जा सकता है कि निर्णायक की श्रेष्‍ठ कविता की समझ स्‍थायी रूप से या 'इस बार' चली गई है, या कोई असवाधानी या लापरवाही हुई है या, जो कि सबसे भयावह होगा, पुरस्‍कार के साथ कोई अनैतिक समझौता किया गया है. लेकिन कोई कविता पिछले वर्ष की श्रेष्‍ठ कविता थी या नहीं, इसका फ़ैसला कोई दूसरा एक व्‍यक्ति नहीं, हिंदी साहिय जगत में, वह जैसा भी है, उसे लेकर बना बहुमत ही कर पाएगा. वैसे अपनी निजी राय रखने का मौलिक जनतांत्रिक अधिकार प्रत्‍येक व्‍यक्ति के पास सुरक्षित रहता ही है.&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;br /&gt;कथित&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; हिंदी साहित्‍य में आपकी अपनी 'जगह' और 'शोहरत' क्‍या है इसका निर्णय दूसरों और काल पर छोड़ देना ही बेहतर है- यही कहा जा सकता है कि पिछले त्रेपन वर्षों से 'सक्रिय' रहने के कारण आपकी अच्‍छी-ख़राब कोई तस्‍वीर तो बनी होगी. आप यह दावा कर सकते हैं कि आपने साहित्‍य सहित शेष सारे जीवन-क्षेत्रों में न्‍यूनतम बेईमानी करने की कोशिश की है लेकिन उसका फ़ैसला भी दूसरे ही करेंगे. इसलिए बेहतर यही है कि मैं अपने द्वारा निर्णीत पुरस्‍कारों का ही यथासंभव बचाव करूं और उसके बाद दूसरे निर्णायकों के फ़ैसलों पर कोई टिप्‍पणी करूं. मैंने अब तक &lt;span style="background-color: #b4a7d6; color: black;"&gt;विनोद भारद्वाज&lt;/span&gt; की कविता 'हवा' (पुरस्‍कार-वर्ष 1982) से शुरू कर&lt;span style="color: #d5a6bd;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="background-color: #b4a7d6; color: black;"&gt;विमल कुमार&lt;/span&gt; की 'सपने में एक औरत से बातचीत', &lt;span style="background-color: #b4a7d6; color: black;"&gt;संजय चतुर्वेदी&lt;/span&gt; की 'पतंग', &lt;span style="background-color: #b4a7d6; color: black;"&gt;नीलेश रघुवंशी&lt;/span&gt; की 'हंडा', &lt;span style="background-color: #b4a7d6; color: black;"&gt;आर. चेतनक्रांति&lt;/span&gt; की 'सीलमपुर की लड़कियां' और &lt;span style="background-color: #b4a7d6; color: black;"&gt;गीत चतुर्वेदी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: black;"&gt; &lt;/span&gt;की 'मदर इंडिया' कविताओं को चुना है.&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;br /&gt;हिंदी&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; कविता, जिससे हमारा अर्थ 'निराला' द्वारा स्‍थापित 'मुक्‍त-छंद' 'अतुकांत' 'आधुनिक' कविता है, शेष हिंदी कविता नहीं, के पाठक और ज्ञाता यह जानते ही हैं कि समसामयिक कवियों की सूची में विनोद भारद्वाज का नाम अनायास नहीं आ जाता - उसे स्‍मरण करना पड़ता है. उन्‍होंने कविताएं कम लिखी हैं और उनके संग्रह भी चर्चित नहीं हो पाए हैं जिसका एक कारण तो यह है कि वह कवियों की क़तार में धक्‍का-मुक्‍की करते नहीं पाए जाते. लेकिन जि़दंगी को देखने की उनकी निगाह अधिकांश हिंदी कवियों से अलग है और उसका प्रसार भी व्‍यापक और दूरगामी है. उनकी कविता 'हवा', जो हिंदी में अनायास पर्यावरण-प्रदूषण पर लिखी गई बहुत कम कविताओं में विशिष्‍ट स्‍थान रखती है, कथ्‍य और शिल्‍प में बेजोड़ है. पर्यावरण और पत्रकारिता से आगे जाकर वह एक गांव के हालिया अवर-इतिहास से होते हुए देश की वृहत्‍तर पूंजीवाद-राजनीति दुरभिसंधि तक पहुंचते हैं. हिंदी कवियों में 1982 में यह चेतना कम थी. आज देश और विश्‍व जिस (पर्यावरण) विनाश के क़गार पर खड़े हैं, उसे इस कविता ने बहुत पहले देख लिया था. विनोद भारद्वाज की अब तक की अधिकांश कविताओं ने मुझे निराश नहीं किया है, बल्कि कुछ ने चौंकाया है.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;br /&gt;मैं&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; इस या दूसरे पुरस्‍कारों के निर्णायकों के बारे में कुछ नहीं कह सकता, किंतु यदि कोई पुरस्‍कार के लिए सिर्फ़ मैं उत्‍तरदायी हूं तो मैं सोचता हूं कि मेरी जवाबदेही सिर्फ़ मेरे निर्णय का औचित्‍य बतलाने तक ही सीमित नहीं रह जाती. यह सही है कि कोई भी पुरस्‍कार इसकी कोई गारंटी नहीं दे सकता कि उसका प्राप्‍तकर्ता यदि गुणवत्‍ता में उस कृति से आगे नहीं जाएगा, तो कम-से-कम वह स्‍तर तो क़ायम रखेगा : कोई भी निर्णायक आजीवन इसके लिए जि़म्‍मेदार नहीं ठहराया जा सकता कि उसके फ़ैसले ने जो उम्‍मीद जगाई थी, उसे इनामयाफ़्ता निभा या आगे ले जा न सका. फिर भी निर्णायक एक नैतिक उत्‍तरदायित्‍व के बोझ से मुक्‍त नहीं हो सकता. यह कोई संरक्षक-अभिभावक ग्रंथि नहीं, बल्कि साहित्‍य की अपनी समझ, वस्‍तुपरकता और अख़्लाक़ की चिंता है. इसलिए हिंदी का सब-कुछ पढ़ने-जानने की कोशिश के साथ मैं अपने द्वारा चुने गए कवियों की रचनाएं, संग्रह और उनका अन्‍य लेखन भी लगातार खोजकर पढ़ता रहता हूं ताकि आश्‍वस्‍त हो सकूं कि वे मुझे या स्‍वयं को शर्मिंदा तो नहीं कर रहे. तमाम परस्‍पर जि़म्‍मेदारियों के साथ ये आपके साहित्यिक परिवार के निकट सदस्‍य हो जाते हैं, उन पुरस्‍कारों के स्‍थापक-नियामक तथा अन्‍य निर्णायकों के साथ, भले ही वे चाहें या न चाहें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;इसीलिए&lt;/strong&gt; मुझे अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि विमल कुमार ने जो उम्‍मीदें 'सपने में एक औरत से बातचीत' से जगाई थीं, वे उन्‍हें, मेरे विचार से, अपनी बाद की अधिकांश कविताओं में निभा नहीं पा रहे हैं. बेशक, दस वर्ष पहले, जब भारतभूषण अग्रवाल स्‍मृति पुरस्‍कार का पहला मुकम्मिल संकलन 'उर्वर प्रदेश' शीर्षक से प्रकाशित हुआ था, तब उसमें उनकी तत्‍कालीन ताज़ा रचना 'उस सौंदर्य को देखना दर्पण के लिए एक नया अनुभव था', जो अपनी गुणवत्‍ता में 'सपने में...'से कमतर न थी,भी दी गई थी. यहां किसी कवि की विस्‍तृत समीक्षा संभव नहीं है और न ही अभीष्‍ट, इसलिए झाड़ूबुहारी और फ़तवेबाज़ी के आरोपों का जोखिम उठाते हुए भी यही कहना होगा कि विमल कुमार अभी-भी कभी-कभी स्‍तरीय कविता लिख डालते हैं, लेकिन कुल मिलाकर आपको जब आज के महत्‍वपूर्ण कवियों के नाम याद आते हैं तो स्‍वत:स्‍फूर्त ढंग से विमल कुमार उनमें नहीं होते. उनकी कविता में उच्‍चावचन और झोल औसत से ज़्यादा हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;1992&lt;/strong&gt; के बाद भी संजय चतुर्वेदी की ‘पतंग’ मैं कई बार पढ़ चुका हूं और उसमें अब भी इतना आकर्षण है कि भविष्‍य में भी पढ़ता रहूंगा. कथ्‍य, भाषा, शिल्‍प, लय और संगीत में उसे मैं हिंदी की उत्‍कृष्‍ट कविताओं में शुमार करता हूं- प्रतिबद्ध विवेकशील विश्‍वचेतना का यह विरला उदाहरण है. सात वर्ष बाद 'उर्वर प्रदेश' में सहप्रकाशित उनकी कविता 'संकेत' भी 'पतंग' की परंपरा में ही रखी जाएगी. संजय चतुर्वेदी ने इन वर्षों में पर्याप्‍त लिखा है, लेकिन वे एक अमर्ष, एक '‍हुब्रिस' में अपना काव्‍य-संग्रह प्रकाशित करने से इन्‍कार कर रहे हैं. दरअसल वे हिंदी की साहित्‍य-संस्‍कृति के पतन और मार्क्‍सवादी-रूपवादी खेमों के नैतिक ह्रास से असामान्‍य रूप से क्रुद्ध हैं - जिसके लिए उन्‍हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता - और अपनी भयावह हास्‍य-व्‍यंग्‍य भरी कविताओं में दोनों पर अपनी लानत भेजते रहे हैं - उससे भी एतराज़ नहीं हो सकता - लेकिन दुर्भाग्‍यवश ऐसा प्रतीत होने लगा है कि वे अपने क्रोध और घृणा को ही एक स्‍थायी या दीर्घावधि काव्‍य-प्रेरणा बना बैठे हैं और इस तरह अपनी असंदिग्‍ध काव्‍य-प्रतिभा को अब अकारण नकारात्‍मक ढंग से सीमित कर रहे हैं. उनसे कोई यह नहीं कह रहा है कि वे अपना क्रोध भूल जाएं लेकिन 'पतंग', 'संकेत' और इस तरह की अन्‍य कविताओं के सार्थकतर संसार में अवश्‍य लौटें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नीलेश &lt;/strong&gt;रघुवंशी की ही कविता 'संतान सातें' को यदि मैं 1997 के पुरस्‍कार के लिए चुन पाता तो मुझे और ख़ुशी होती क्‍योंकि संजय चतुर्वेदी की 'पतंग' की तरह जब भी मैं उसे पढ़ता हूं तो विचलित हुए बिना नहीं रहता. लेकिन 'संतान सातें' 1995 में प्रकाशित हुई थी और मैं 1996 में निर्णायक नहीं था. फिर भी 1996 में प्रकाशित अन्‍य पात्र कवियों की रचनाओं के साथ नीलेश रघुवंशी की कविता 'हंडा' को पढ़कर मुझे कोई संदेह न रहा कि इस युवा प्रतिभावान कवयित्री की वह रचना वर्ष की श्रेष्‍ठ कविता थी. उसकी मार्मिक सादगी प्राण है. नीलेश रघुवंशी भारतभूषण अग्रवाल पुरस्‍कार के कुछ पहले ही अपनी पहचान बना चुकी थीं और अगर मैं ग़लत नहीं हूं, तो उनकी पहली पांडुलिपि पुरस्‍कार से पहले ही स्‍वीकृत हो चुकी थी. बहरहाल, अब उन्‍होंने मात्र कवयित्रियों के बीच नहीं, समसामयिक हिंदी कविता में अपनी जगह हासिल कर ली है. उनका विकास देखकर आश्‍वस्ति और ख़ुशी होती है और उसमें कोई अवरोध भी नज़र नहीं आ रहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;युवा&lt;/strong&gt; प्रतिभाओं को दिए जाने वाले पुरस्‍कारों से वे साहित्‍य में स्‍थापित होती हैं या नहीं- यानी क्‍या ऐसे पुरस्‍कार ही उनके कैरियर में एक प्रारंभिक केंद्रीय भूमिका निभाते हैं - इस पर बहस हो सकती है. यदि पुरस्‍कार ही लेखकों को बनाते-मिटाते तो फिर ऐसा क्‍यों होता कि जिन श्रेष्‍ठ रचनाकारों को ऐसे कोई भी पुरस्‍कार नहीं मिले, या एकाध ही मिला, उनकी संख्‍या पुरस्‍कृत रचनाकारों से हमेशा ज़्यादा रही? कई कवि तो भारतभूषण पुरस्‍कार की स्‍थापना से पहले ही स्‍थापित हो चुके थे. आलोकधन्‍वा, असद ज़ैदी, मंगलेश डबराल, गिरधर राठी, राजेश जोशी, वीरेन डंगवाल, अजीत चौधरी, सत्‍यपाल सहगल, नरेंद्र जैन, कात्‍यायनी, अनिता वर्मा, सविता सिंह आदि अनेक कवि-क‍वयित्रियों को अनेक कारणों से यह पुरस्‍कार नहीं मिला. 'निराला' को उनके जीवन-काल में और मुक्तिबोध को मरणोपरांत साहित्‍य अकादेमी पुरस्‍कार नहीं दिया गया, तो क्‍या वे उसके मोहताज हैं? दरअसल पुरस्‍कार तभी प्रतिष्‍ठा पाते हैं जब वे सुपात्रों को दिए जाते हैं और तभी वे उस प्रकाश को अगले पुरस्‍कृत व्‍यक्तियों पर परावर्तित करते हैं. पुरस्‍कारदाताओं को अपने महत्‍व के बारे में अत्‍यधिक भ्रम नहीं पालने चाहिए. यदि निर्णायक निर्लज्‍ज नहीं हुए हैं और उन्‍हें अपनी इज़्ज़त, यदि वह है तो, का ज़रा भी ख़याल है, तो अच्‍छा पुरस्‍कार देकर स्‍वयं उन्‍हें प्रतिष्‍ठा-सुख और गर्व होता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जहां &lt;/strong&gt;तक मेरी जानकारी है, आर. चेतनक्रांति ने 2002 के पुरस्‍कार के बहुत पहले कविताएं लिखना शुरू नहीं किया था लेकिन जो भी उनकी रचनाएं पत्रिकाओं में प्रकाश्ति हुई थी, उन्‍होंने मुझ-सरीखे पाठकों का ध्‍यान आकर्षित किया था. चेतनक्रांति की सिर्फ़ 'सीलमपुर की लड़कियां' पुरस्‍कार-योग्‍य नहीं थी - उनकी कुछ दूसरी कविताएं भी उसकी पात्र हो सकती थीं लेकिन यह कविता हिंदी में दिल्‍ली की ऐसी भौगोलिकी और संस्‍कृति लेकर आई, और कवि की अपनी भाषा और शिल्‍प, कि उसे ही श्रेष्‍ठ मानना पड़ा. उसके बाद भी मैं चेतनक्रांति के कृतित्व और विकास से आ‍कर्षित होता रहा हूं और मुझे उन्‍होंने किसी आशंका या पछतावे में नहीं डाला है, बल्कि मैं यह भी कहना चाहूंगा कि उनकी कविताओं की एक निजी पहचान बन चुकी है. वे एक ठेठ भाषा-शैली की ठोस, निर्भीक रचनाएं हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;गीत&lt;/strong&gt; चतुर्वेदी भी उन युवा कवियों में हैं जिनकी रचनाएं मुझ सरीखे निर्णायक के सामने चुनाव का संकट खड़ा करती हैं. उन्‍होंने जबसे प्रकाशित होना शुरू किया है, तब से अपने स्‍तर को शर्मिंदा करने वाली बहुत कम कविताएं लिखी होंगी. उनकी पुरस्‍कृत रचना 'मदर इंडिया' (प्र.व. 2006) का शीर्षक पाठक को एक शोर-शराबे और राजनीतिक व्‍यंग्‍य आदि से लबरेज़ कविता की आशंका से भर देता है लेकिन वह एक अलग मार्मिकता और नश्‍तर को लेकर आती है. आज का युवा कवि दीन-दुनिया के एक या कुछ ही पक्षों को नहीं देख रहा, बल्कि मानव-अस्तित्‍व और अस्तित्‍व-मात्र के लगभग सभी पहलुओं को छूने की कोशिश कर रहा है और इस वजह से उसकी प्रतिबद्धता व्‍यापकतर, जटिलतर होती जाती है. गीत जैसे कवियों को कीलित करना कठिन है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;निर्णायकों &lt;/strong&gt;को अपने चुनाव पर टिप्‍पणी देनी होती है और विनोद भारद्वाज की कविता को मैंने ''गहरी सामाजिक टिप्‍पणी, असंदिग्‍ध प्रतिबद्धता, बहुआयामी दृष्टि तथा भाषा एवं शिल्‍प पर विलक्षण नियंत्रण'' के लिए श्रेष्‍ठ माना था. उसके बाद मेरी प्रशस्तियां कुछ और सविस्‍तार होती गईं और सभी अपने अविकल रूप में पाठकों के लिए उपलब्‍ध हैं. इनमें निर्णायक की संस्‍तुति और तर्क तथा कैफि़यत शामिल हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;किसी&lt;/strong&gt; पुरस्‍कार का निर्णायक-मंडल यदि सामूहिक फ़ैसला नहीं देता और उसका प्रत्‍येक सदस्‍य स्‍वायत्‍त होता है तो एक अघोषित, अलिखित शिष्‍टाचार यह रहता है कि वह दूसरों के फ़ैसलों पर कोई ज़ाहिरा प्रतिकूल टिप्‍पणी न करे. वैसा मैंने अब तक नहीं किया है. लेकिन एक कवि, समीक्षक और पाठक के नाते, जैसा भी मैं होने के लिए अभिशप्‍त हूं, यह मेरा अधिकार है कि दूसरे निर्णायकों के चुनाव पर अपनी राय रखूं. यदि मैं उसे स्‍याह-सुफ़ैद में दर्ज करने जा रहा हूं तो शायद इसे विश्‍वासघात, अमानत में ख़यानत, 'वनअपमैनशिप', अतिरिक्‍त होशियारी और चतुराई, शेष निर्णायकों की अवमानना आदि कहकर उसकी सही या ग़लत भर्त्‍सना की जा सकती है. निर्णायक-मंडल के शेष सदस्‍य और पुरस्‍कार के नियामक कोई सख़्त कार्रवाई भी कर सकते हैं. लेकिन जिस पुरस्‍कार को चलते हुए तीस वर्ष हो चुके, जो हिंदी में प्रतिष्ठित हो चुका, उसके बारे में एक निर्णायक की निजी राय आखि़र उसे कितनी क्षति पहुंचा सकती है? आशंका तो अधिक यही है कि उस निर्णायक की कुख्‍याति में ही कुछ इज़ाफ़ा हो जाए. यदि शेष निर्णायक में से कोई भी एक 'अभद्र', 'गरिमाहीन' बहस में न पड़ना चाहे तो अलग बात है वर्ना तीस वर्ष एक मुक्‍त चर्चा के लिए पर्याप्‍त माने जाने चाहिए- मुझसे असहमत होने का अधिकार उनसे कौन छीन सकता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बहरहाल,&lt;/strong&gt; मैं पहले (अशोक वाजपेयी/&lt;span style="background-color: #e69138; color: black;"&gt;अरुण कमल&lt;/span&gt;/1980) पुरस्‍कार से ही असहमत था. आज 1979 में प्रकाशित 35 वर्ष से कम आयु के कवियों की रचनाओं को याद कर पाना असंभव-सा है लेकिन 'उर्वर प्रदेश' उस वर्ष की सामान्‍य अच्‍छी कविता ही लगी थी, विशिष्‍ट नहीं. आज भी वह शायद इस पुरस्‍कार के कारण ही उल्‍लेख्‍य है. उनके संग्रह 'नए इलाक़े में' की कविताओं में मुझे एक मार्मिक, नए अरुण कमल दिखाई दिए थे लेकिन उसके पहले और बाद के संग्रहों में उनकी कविताएं 'उर्वर प्रदेश' की सामान्‍य अच्‍छी ज़मीन की ही लगती हैं. यह मालूम करना मुश्किल है कि आज कवि के रूप में उनकी वास्‍तविक प्रतिष्‍ठा क्‍या है. अशोक वाजपेयी ने अगले चार पुरस्‍कार &lt;span style="background-color: orange; color: black;"&gt;गगन गिल, तेजी ग्रोवर, शिरीष ढोबले और गिरिराज किराडू&lt;/span&gt; की कविताओं को दिए. गगन गिल की पुरस्‍कृत कविता 'एक दिन लौटेगी लड़की' निस्‍संदेह तब तक महिला कवियों में एक नया निर्मम तेवर, अमर्ष, विद्रोह और बेबाकी लेकर आई थी. यह कहे जाने पर कि महादेवी के बाद ऐसी अलग, सशक्‍त अभिव्‍यक्ति पहली बार देखी गई, बहुत शोर भी मचा था. लेकिन उसके बाद शायद 'आधुनिकता', 'आंतरिकता', बौद्ध और सूफ़ी प्रभावों के कारण उनकी कविता बदल गई और अब वह इतनी निजी, अंतर्मुख और 'मिस्टिक' हो चुकी है कि कविता से वृहत्‍तर उम्‍मीद रखने वाले मुझ जैसे पाठकों के लिए वह एक ऐसी पहेली बन गई है जिसे हल करने की लालसा ही नहीं होती. तेजी ग्रोवर और गिरिराज किराडू की पुरस्‍कृत कविताओं में गगन गिल की प्रवृत्तियों की ही आधुनिकतर प्रयोगधर्मिता है और गहन शब्‍दों, बिंबों, शैलीगत नवाचारों से काव्‍यरव पैदा करने की दुहरावग्रस्‍त कोशिश है किंतु अंतत: वे कविताएं न कुछ कह पाती हैं और न कोई प्रभाव छोड़ती हैं, यद्यपि दोनों ने इनसे अलग, और मुझे लगता है कि बेहतर, कविताएं भी लिखी हैं. यह समझ में नहीं आता कि जिस तरह की अर्थहीन कविताएं अब यूरोप, और विशेषत: फ्रांस, तक में भी नहीं लिखी जा रही हैं उनमें हमारे ऐसे कवि अपनी प्रतिभा क्‍यों नष्‍ट कर रहे हैं. शिरीष ढोबले की कविता 'प्रदक्षिणा है यह' अपने भक्तिवाद-रहस्‍यवाद से स्‍वयं ही रोमांचित है और आत्‍माभिनंदन कर रही है तो पाठक भी उन्‍हें उनके स्‍तोत्रों की प्रयोजनहीनता पर छोड़ रहा है. अशोक वाजपेयी की ऐसी कविताओं की प्रशस्तियां इन्‍हीं का एक हास्‍यास्‍पद उपोत्‍पाद लगती हैं और अपने निरर्थक वाग्‍जाल में उस असंभव ऑक्‍टोपस की तरह हैं जिसने स्‍वयं किसी तरह अपनी भुजाओं में गांठ बांध लेने में सफलता प्राप्‍त कर ली है. यतीन्‍द्र मिश्र की 'बारामासा' 2004 की श्रेष्‍ठ कविता थी या नहीं इस पर मतभेद की गुंजाइश है फिर भी वह इतनी सार्थक तो है कि अपने निर्णायक का उद्धार कर सकी. दरअसल यतीन्‍द्र मिश्र पहले साधारण कवि ही थे लेकिन समय रहते संभल गए और अब उनमें हिंदी कविता की सकारात्‍मक मुख्‍यधारा में शामिल होने के कुछ लक्षण दिखाई दे रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;यतीन्‍द्र&lt;/strong&gt; मिश्र सरीखा आत्‍मोद्धार &lt;span style="background-color: #cfe2f3; color: black;"&gt;उदय प्रकाश&lt;/span&gt; (केदारनाथ सिंह/1981) ने अपने संग्रह 'रात में हारमोनियम' की कविताओं में और उसके बाद करने की कोशिश की लेकिन तब तक इतनी देर हो चुकी थी कि वे रघुवीर सहाय, उनकी समवर्ती तथा परवर्ती पीढि़यों की मुख्‍यधारा कविता का अनुकरण करके ही कवि होने का कुछ आभास दे पा रहे हैं वर्ना उनकी 'तिब्‍बत' को श्रेष्‍ठ तो क्‍या, कविता भी मान पाना कठिन है. यही हाल उनकी 'सुनो कारीगर' और 'अबूतर कबूतर' की कथित कविताओं का है. कहानी-लेखन में असाधारण ख्‍याति और सफलता कमाने के बावजूद कवि के रूप में भी स्‍वीकृत होने की उनकी त्रासद महत्‍वाकांक्षा उनसे कविता में अतिलेखन करवा रही है. &lt;span style="background-color: #cfe2f3; color: black;"&gt;स्‍वप्निल श्रीवास्‍तव&lt;/span&gt; की 'ईश्‍वर बाबू' (1986) किसी भी तरह से 'रामदास' से आगे नहीं जाती और उनकी बाद की कविताएं भी उन्‍हें प्रमुख कवि माने जाने के विपक्ष में खड़ी दिखाई देती हैं. &lt;span style="background-color: #cfe2f3; color: black;"&gt;बद्री नारायण&lt;/span&gt; की कविता 'प्रेमपत्र' (1991) में केवल एक पंक्ति 'बंदिशें प्रेमपत्र पर ही लगाई जाएंगी' को छोड़कर कुछ भी तार्किक नहीं है और वह एक कृत्रिम काव्‍यात्‍मकता रचने की कोशिश ही रह जाती है. यह समस्‍या उनकी बाद की कविताओं में भी मौजूद है - कभी वे भाषा, कभी कथ्‍य और कभी शिल्‍प को पूर्णरूपेण निबाह नहीं पाते और कभी भवानीप्रसाद मिश्र-केदारनाथ सिंह की पाठक को शामिल-संबोधित करने वाली 'पेटेंट' शैली में बचकाना हो जाते हैं. भाषा की कुछ भूलें भी उनसे होती हैं लेकिन यह मर्ज़ इधर के हुड़ुकलुल्‍लू-मार्का युवा लेखन में वबा का दर्जा हासिल कर चुका है. आप किसी भी प्रदेश, क्षेत्र या बोली से आते हों, यदि हिंदी में लिखने की महत्‍वाकांक्षा है तो पहले सही ज़ुबान आनी चाहिए. हिंदी में आंचलिक बोलियों और उनके व्‍याकरणों का अनावश्‍यक, दिग्‍भ्रमित, छौंक-बघार भी भर्त्‍सना और विरोध का विषय है. &lt;span style="background-color: #cfe2f3; color: black;"&gt;अनामिका&lt;/span&gt; की कविता 'अनुवाद' एक युक्ति ('डिवाइस') या 'कंसीट' से प्रेरित है - लोगों के बीच की दूरी उन्‍हें अंग्रेज़ी शब्‍द 'स्‍पेस' का स्‍मरण दिलाती है (‍‍'डिस्‍टैंस' का नहीं, जबकि 'स्‍पेस' चाहना पाश्‍चात्‍य जगत में एक सकारात्‍मक मांग है) और उसका हिंदी अनुवाद वे 'विस्‍तार' के बजाय 'अंतरिक्ष' करना चाहती हैं. विडंबना यह है कि 'स्‍पेस' का अर्थ 'विस्‍त’र' होता ही नहीं. अब 'अंतरिक्ष' शब्‍द कविता में एक ऐसी उड़नतश्‍तरी ले आता है जो फिर उसमें नहीं लौटती - क‍वयित्री को याद नहीं आता कि वह 'फ़्लाइंग सॉसर' का अनुवाद है. तीसरा चरण कविता की 'थीम' से नितांत असंबद्ध है, उसे वहां होना ही नहीं चाहिए था. अब चूं‍कि कवयित्री को गिरस्‍ती की चीज़ों का 'अनुवाद' करना है, तो बिना किन्‍हीं तार्किक सोपानों के कविता 'ख़ाली घर' में प्रवेश करती है, हालांकि 'स्‍पेस' का एक अनुवाद 'ख़ला' भी हो सकता है यह कवयित्री को नहीं सूझा. फिर वह 'उतरनों' का अनुवाद जल की भाषा में, प्‍लेटों का पंखुडि़यों में, सिंक का राग में, घर का किसी और भाषा में, शाम का पर्दे खोलने में और 'स्‍पेस' का 'विस्‍तार' में करना चाहती हैं. अनामिका जिसे 'अनुवाद' कहती हैं, वह दरअसल 'रूपांतरण' ('ट्रांस्‍फॉर्मेशन'), 'पुनर्सृजन' ('ट्रांस्क्रिएशन') या 'कायांतरण' ('मेटामॉर्फा़सिस') है, 'तर्जुमा' ('ट्रांस्‍लेशन') नहीं. उनकी अधिकांश कविताओं में समस्‍या यह है कि उनकी काव्‍य-अवधारणा एक रूमानी किशोरसुलभ नाज़-ओ-अंदाज़ से आगे नहीं जा सकी है और उनकी भाषा और शैली को वात्‍सल्‍य-कामना में क़ैद किए हुए है जिसमें वयस्‍कता का चेतन-अवचेतन नकार है.&lt;span style="color: #93c47d;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="background-color: #cfe2f3; color: black;"&gt;हेमंत कुकरेती&lt;/span&gt; की 'सिलबट्टा' (2001) अपने विषय की तरह ही ग़ैर-रूमानी, मूर्त और ठोस है. उसकी कई पीढि़यां, परंपराएं, कहानियां और संस्‍करण हैं, उसका एक अंश हमारे शरीर के रक्‍त-लवण में बहता है. हेमंत कुकरेती ने लगातार अच्‍छी कविताएं ही लिखी हैं और यदि वे अपने से कुछ वरिष्‍ठ या अपने समवयस्‍कों से बेहतर नहीं तो निस्‍संदेह उनके समकक्ष हैं, लेकिन हिंदी में उन्‍हें वह तवज्‍जो और स्‍वीकृति नहीं दी जा रही है जिसके वे पात्र हैं. केदारनाथ सिंह द्वारा उन्‍हें पुरस्‍कृत किया जाना न केवल उचित था, बल्कि आवश्‍यक भी था और समयोचित. दुर्भाग्‍यवश,&lt;span style="color: #93c47d;"&gt; &lt;span style="background-color: #cfe2f3; color: black;"&gt;जितेंद्र श्रीवास्‍तव&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;की कविता 'ज़रूर जाऊंगा कलकत्‍ता' (2006) और उनके कवि को लेकर ऐसा कह पाना मेरे लिए संभव नहीं है. कलकत्‍ते की गाड़ी में बैठे हुए कवि का यह संकल्‍प ही पुनरुक्तिदोषग्रस्‍त है, जब तक कि विदाउट टिकट होने के कारण कोई टीटी उन्‍हें उतारने की धमकी न दे रहा हो. बहरहाल, हिंदी के 'अदना-सा कवि' को 'अपने मिर्जा़ ग़ालिब' की कलकत्‍ता-यात्रा याद आती है जिससे वे 'ज़ेहन में आधुनिकता लेकर' लौटे थे. यहीं से कवि का ग़ालिब, उनकी दिल्‍ली और तत्‍कालीन कलकत्‍ता का अज्ञान उरियां होने लगता है. ग़ालिब को कलकत्‍ता गए अभी दो सौ वर्ष भी नहीं हुए हैं - 'सैकड़ों साल' का प्रश्‍न ही नहीं उठता. 'आधुनिकता' के लिए ग़ालिब कलकत्‍ता के मुहताज न थे, 'नयी रोशनी' उनमें पहले ही बहुत थी. यदि कलकत्‍ता उस वक़्त महानगर था तो दिल्‍ली भी मुग़लिया दारुलसल्‍तनत थी. जितेंद्र श्रीवास्‍तव उस ज़माने के कलकत्‍ता के अख़बारों को देखें जिनमें 'जादुई विज्ञापन' छपने लगे थे. उन्‍हें यह भी मालूम नहीं है कि उनके मिर्जा़ ग़ालिब कलकत्‍ते को दिल दे बैठे थे - कलकत्‍ते का जि़क्र ही उनके सीने पर एक तीर-सा मार देता था और वे हाय-हाय कर उठते थे. इस तरह की कोई भी कविता काव्‍य-नायक की जीवनी पढ़े बग़ैर लिखी ही नहीं जानी चाहिए. यह कल्‍पना करना कठिन है (या शायद नहीं भी है) कि केदारनाथ सिंह ने, जो हिंदी में ग़ालिब के सबसे आधिकारिक मुरीद हैं, क्‍योंकर इस बोगस रूमानियत से भरी कविता को पुरस्‍कृत किया. जितेंद्र श्रीवास्‍तव के नये संग्रह में भी बमुश्किलतमाम दो छोटी कविताएं &lt;span style="color: white;"&gt;कुछ&lt;/span&gt; सलीक़े की हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नामवर&lt;/strong&gt; सिंह द्वारा अपने पहले पुरस्‍कार को दिवंगत &lt;span style="background-color: #b4a7d6; color: black;"&gt;शरद बिल्‍लौरे&lt;/span&gt; की कविता 'तय तो यही हुआ था' (1983) को दिया जाना एक तरह की अपराध-बोध-जन्‍य क्षतिपूर्ति थी लेकिन राजा शिबि की पुराकथा से प्रेरित यह छोटी कविता वाक़ई मिथक के बेहतरीन इस्‍तेमाल, उसे समसामयिकता देने की सिफ़अत, त्रासद मर्मांतक नैतिकता तथा मितकथन का एक सबक़ है. उसकी प्रासंगिकता, जो अब तक बनी हुई है और बनी रहेगी, इसमें भी है कि आज के युवा कवियों में से बहुत कम अपने या विश्‍व के अन्‍य मिथकों को जानते हैं जो किसी भी कविता का एक महत्‍वपूर्ण पोषक तत्‍व है. पश्‍चदृष्टि से इस संयोग पर सुखद आश्‍चर्य होता है कि नामवर सिंह का दूसरा निर्णय भी एक मिथक-प्रेरित कविता, &lt;span style="background-color: #b4a7d6; color: black;"&gt;देवीप्रसाद मिश्र&lt;/span&gt; (1988) की 'प्रार्थना के शिल्‍प में नहीं', के पक्ष में गया था जो मिथक की पुष्टि या अनुमोदन नहीं करती बल्कि अपने निहितार्थ में मात्र वैदिक देवमाला को ही नहीं, बल्कि सारी सत्‍ताओं पर आरूढ़ समस्‍त आराध्‍यों, देवदूतों, पैग़म्‍बरों, धर्माधिकारियों, महंतों और मठाचार्यों को हट जाने की चुनौती देती है. हिंदी में शायद अपनी तरह की यह पहली कविता थी, यद्यपि उसके पहले भी देवीप्रसाद मिश्र विलक्षण कविताएं लिख चुके थे और अब तक कुछ सार्थक और जटिल प्रयोग कर रहे हैं‍ जिन्‍हें सराहने और विश्‍लेषित करने की क़ूवत अधिकांश हिंदी काव्‍यालोचन में नहीं है. इन दो अनिंद्य निर्णयों के बाद नामवर सिंह ने जिन चार कवियों : &lt;span style="background-color: #b4a7d6; color: black;"&gt;अनिल कुमार सिंह&lt;/span&gt; /'अयोध्‍या 1991'/ 1993, &lt;span style="background-color: #b4a7d6; color: black;"&gt;संजय कुंदन&lt;/span&gt;/'अजनबी शहर में'/1998, &lt;span style="background-color: #b4a7d6; color: black;"&gt;सुंदरचंद ठाकुर&lt;/span&gt;/'कविता के मुक्तिबोधों का समय नहीं यह'/2003 तथा &lt;span style="background-color: #b4a7d6; color: black;"&gt;निशांत&lt;/span&gt;/'अट्ठाइस साल की उम्र में'/2008 : को सम्‍मानित किया उनमें अनिल कुमार सिंह और निशांत की कविताएं निराश ही करती हैं. अयोध्‍या की 'मानवता' की थीम बुरी न थी, लेकिन वहां जो 1992 में होने दिया गया, उसकी भयावहता को वह न तो कम कर पाई है और न समझा सकी है. राक्षसों और नरभक्षियों के हवाले अयोध्‍या हुई कैसे? एक भोली भावुकता के पीछे राजनीतिक जागरूकता के अभाव को छिपाया नहीं जा सकता. अपनी बाद की कविताओं में भी अनिल कुमार सिंह अपनी कोई पहचान नहीं बना पाए हैं. उधर निशांत का आत्‍ममुग्‍ध कवि अट्ठाइस साल की उम्र के कवि को 'लड़का' कह रहा है जिसके सपने में एक पवित्र सुर्ख़ लाल गुलाब लहलहा रहा है, इस बहुत ही महत्‍वपूर्ण उम्र में उसके दिल से सच्‍ची प्रार्थना निकल रही है, उसका मन हल्‍का पारदर्शी और पवित्र है, लेकिन वह धूमिल, धर्मवीर भारती और अकविता के बीच दिग्‍भ्रमित हो रहा है. उनकी दूसरी कविताएं भी अपनी अतिसामान्‍यता के कारण ही उल्‍लेखनीय हैं. संजय कुंदन की समस्‍या यह है कि वह अच्‍छी या बेहतर कविताएं लिखने में सक्षम हैं लेकिन अक्‍सर शिल्‍प को लेकर सावधानी बरतने में कोताही कर जाते हैं. सिरहाने एक लोटा जल पड़ा कैसे रहता है? यह जल, नदी का सपना तथा स्‍मृति का सोता न तो कविता में अर्थ पाते हैं और न लौटते हैं तथा बाज़ार में बौने होते रुपये से उनका न तो कोई सामंजस्‍य है और न तनाव. पहली चार पंक्तियां शेष कविता से नितांत असंबद्ध हैं और उन्‍हें हटाकर पढि़ए, तो कविता कुछ निखर भी आती है. सुंदरचंद ठाकुर की कविता अभिव्‍यक्ति के ख़तरों की ही नहीं, अभिव्‍यक्तिमात्र की समस्‍याओं को अभिव्‍यक्ति देती है. एक ओर कवि का समष्टिबोध है, दूसरी ओर उसकी निजी जि़दंगी और भाषा हैं, अभिव्‍यक्ति का संकट, उसकी चुनौतियां जटिलतर होते जाते हैं लेकिन न्‍यस्‍त स्‍वार्थों वाले आलोचक कहते हैं यह मुक्तिबोधों का समय नहीं, मुक्तिबोध अब संभव नहीं, सरल कविता लाओ, जटिल को निष्‍कासित करो. आश्‍चर्य यही है कि स्‍वयं ऐसे आलोचक ने इस कविता को श्रेष्‍ठ कैसे माना? जो हो, सुंदरचंद ठाकुर ने अब तक अपने पाठकों की उम्‍मीद की हिफ़ाज़त की है और अपने व्‍यक्तित्‍व को अपने कवित्‍व में विकसित किया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;दिवंगत&lt;/strong&gt; नेमिजी ने अपना पहला निर्णय &lt;span style="background-color: #ea9999; color: black;"&gt;राजेंद्र धोड़पकर&lt;/span&gt; की कविता 'अंतिम आदमी' (1984) के पक्ष में दिया था. हाशिये पर धकेल दिए गए एकाकी आदमी पर यह पहली कविता नहीं थी और न अंतिम. आखि़री पंक्ति का नैराश्‍यपूर्ण अंत कुछ आकस्मिक लगता है जिसका औचित्‍य पूर्वगामी पंक्तियों में दिखाई नहीं देता. राजेंद्र धोड़पकर ने कविताएं लिखना बंद क्‍यों कर दिया यह एक रहस्‍य है, लेकिन वह एक आदर-भाव जगाता है. हिंदी में बीसियों ऐसे कवि हैं जिन्‍हें कविता लिखने से पहले ही लिखना बंद कर देना चाहिए था. नेमिजी का &lt;span style="background-color: #ea9999; color: black;"&gt;कुमार अंबुज&lt;/span&gt; की कविता 'किवाड़' (1989) को पुरस्‍कृत करने का भारतभूषण अग्रवाल पुरस्‍कार के इतिहास में वही स्‍थान है जो उससे एक वर्ष पहले नामवर सिंह द्वारा देवीप्रसाद मिश्र की कविता को चुने जाने का है. अपनी धोखादेह सादगी, मितभाषिता, वसाहीनता और अर्थबाहुल्‍य में वह बेजोड़ है. पिछले बीस वर्षों में कुमार अंबुज ने हिंदी कविता में अपना स्‍थान अर्जित कर लिया है और उनका कवि होना विवादातीत है. जब 1994 में &lt;span style="background-color: #ea9999; color: black;"&gt;पंकज चतुर्वेदी&lt;/span&gt; की कविता 'एक संपूर्णता के लिए' पुरस्‍कृत हुई, तब से अब तक शायद वे ऐसे सबसे कमउम्र सम्‍मानित कवि का कीर्तिमान धारण किए हुए हैं. 1999 के 'उर्वर प्रदेश' में प्रकाशित यह और दूसरी कविता 'उसने कहा था' कवि-कर्म की त्रासदी और जोखिमों के बारे में है. पुरस्‍कृत कविता के पहले तीन चरणों में पर्याप्‍त काव्‍योचित परोक्षता है लेकिन अंतिम चरण उसे अचानक सामान्‍य बना देता है क्‍योंकि उसमें एक विचित्र दैन्‍य और पलायन है. अपने कवि होने का अहसास बार-बार पंकज चतुर्वेदी की कविताओं में आता है और शायद वही कवि के रूप में उनके तत्‍काल पहचाने जाने के मार्ग में एक बाधा है. &lt;span style="background-color: #ea9999; color: black;"&gt;बोधिसत्‍व &lt;/span&gt;की कविता 'पागलदास' (1999) एक सहज प्रश्‍न के उत्‍तर की तलाश में एक आरोपित उत्‍कंठा तथा असमंजस की जासूसी कहानी बन जाती है जिसमें आधी पंक्तियां सिर्फ़ एक तूमार बांधने के लिए हैं. पागलदास की मृत्‍यु/हत्‍या का आख्‍यान निस्‍संदेह भयावह और मार्मिक हो सकता था लेकिन दो पागलदासों का निर्माण कर और यह दो-टूक न बताकर कि कौन-से अन्‍याय और असत्‍य के विरुद्ध वे सक्रिय थे और उनके हत्‍यारे कौन थे - पागलदास 'रामदास' या 'ईश्‍वर बाबू' की तरह एक प्रतीक-पात्र न थे - बोधिसत्‍व अपनी कविता को कुंद और भावनिक ('सेन्टिमेंटल') बनाते हैं. यह भावविह्वलता उनकी अन्‍य कविताओं में भी देखी जा सकती है और 'स्‍त्री को देखना' कविता की पंक्तियां ''उसको चिता में जलाकर देखो/ दिखेगी तब भी नहीं'' अपनी विकृति ('मॉर्बिडिटी') में भयावह है. &lt;span style="background-color: #ea9999; color: black;"&gt;प्रेमरंजन अनिमेष&lt;/span&gt; की पुरस्‍कृत कविता 'इक्‍कीसवीं सदी की सुबह झाड़ू देती एक स्‍त्री' के शीर्षक में एक मार्मिक व्‍यंग्‍य है. अंग्रेज़ी में बुहारने की क्रिया से 'स्‍वीपिंग' और 'स्‍वीप' संज्ञाएं बनती हैं और अनिमेष की कविता में 'स्‍वीप' तो अच्‍छा है, यदि वह कम 'स्‍वीपिंग' होती तो बेहतर होती. उनकी 'पचीस साल के नौजवान का बयान' कविता को निशांत की कविता 'अट्ठाइस साल की उम्र में' के बरक्‍स रखिए - यह जानने में देर न लगेगी कि अनिमेष की कविता सार्थकतर क्‍यों है. लेकिन यदि वे 'पायदान पर बचपन' सरीखी बेहतरीन कविता और अधिक लिखें तो स्‍वयं उनके और हिंदी के लिए बहुत श्रेयस्‍कर होगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;भारतभूषण&lt;/strong&gt; अग्रवाल स्‍मृति कविता पुरस्‍कार के प्रथम आदाता और पिछले तीस वर्षों में ख्‍यातिलब्‍ध कवि तथा अब निर्णायक-मंडल के नये सदस्‍य अरुण कमल के पहले निर्णय को लेकर हिंदी में एक आशंकापूर्ण औत्‍सुक्‍य था क्‍योंकि कविता पर जैसा लेखन उन्‍होंने अधिकांशत: किया है और जिस दुर्भाग्‍यपूर्ण ढंग से वे त्रैमासिक 'आलोचना' का संपादन और सामग्री-चयन कर रहे हैं, उससे बहुत आश्‍वस्ति नहीं होती है. लेकिन &lt;span style="background-color: #a2c4c9; color: black;"&gt;मनोज कुमार झा&lt;/span&gt; की रचना 'स्‍थगन' (2009) का चयन कर उन्‍होंने मुझ-जैसे शंकालुओं को सुखदता से ग़लत सिद्ध किया है. 'स्‍थगन' पहली बार मां बनने जा रही एक ग्रामीण युवती के बारे में है जो अपने घर-आंगन, क्षेत्र, ऋतु, प्रकृति और वृहत्‍तर संसार से घिरी हुई है, वायुयान की घरघराहट उसके ऊपर है, उसके गर्भ में एक शिशु विकस रहा है और इन सबकी उपस्थिति के बीच कामना, जीवन और आशा में स्‍थगित वह कच्‍चा आम खा रही है. मनोज कुमार झा की कविताओं के बारे में अरुण कमल ने सही लिखा है कि उनकी सामग्री प्राय: गांवों के जीवन से आती है लेकिन अपनी अंतिम निर्मिति में वह विचारप्रवण तथा वैश्विक होती है. इसी क्षमता को मैं प्रतिबद्ध विवेकशील विश्‍वचेतना कहना चाहता हूं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;strong&gt;सही&lt;/strong&gt; निर्णय हुए हों या ग़लत, सायास हुए हों या अनायास, यह साफ़ है कि भारतभूषण अग्रवाल स्‍मृति पुरस्‍कार प्राप्‍त अधिकांश कवि समसामयिक हिंदी कविता पर किसी भी गंभीर बहस में उल्लिखित होंगे, भले इनमें से कुछ ने ही साहित्‍य में असंदिग्‍ध स्‍थान बनाया हो, कुछ में अब भी विकास की न्‍यूनाधिक संभावनाएं हों और कुछ से, दुर्भाग्‍यवश, उम्‍मीद बहुत कम रह गई हो, हालांकि सृजन-शक्ति कभी भी कोई चमत्‍कार दिखा सकती है. हम चाहें तो कह सकते हैं कि इनमें से कुछ को इस पुरस्‍कार ने अपने कवि-अध्‍यवसाय में ठोस मदद दी होगी और कुछ के लिए यह खद्योत-सम साबित हुआ होगा. दृष्‍टव्‍य यह है कि अपने वक्‍तव्‍यों में लगभग प्रत्‍येक कवि ने पुरस्‍कार का ऋण स्‍वीकार किया है, भले ही वह औपचारिक भलमनसाहत में ही क्‍यों न हो. एक अच्‍छा कवि अपने विरोधाभासों और विडंबनाओं के बावजूद एक नैतिक इंसान होना और दिखना चाहता है. एक सार्थक पुरस्‍कार तीन कोटियों के व्‍यक्तियों पर एक नैतिक उत्‍तरदायित्‍व और बोझ बनता है - उसके नियामकों पर, निर्णायकों पर और प्राप्‍तकर्ताओं पर. भारत में आज लाखों और हज़ारों रुपये के सरकारी-ग़ैरसरकारी साहित्यिक पुरस्‍कारों की संख्‍या सौ से ऊपर होगी, लेकिन उन्‍हें देनेवालों, तय करनेवालों और लेनेवालों में से अधिकांश की ईमानदारी और पात्रता में गहरा संदेह है, इसलिए कौन-सा लेखक इनामों से लखपति हो चुका है इसके अलावा चर्चा का कोई मसला ही नहीं है. मुझे लगता है कि भारतभूषण अग्रवाल कविता पुरस्‍कार का प्राप्‍तकर्ता प्रत्‍येक कवि-कवयित्री उसे एक नैतिक-सर्जनात्‍मक उत्‍तरदायित्‍व की तरह लेता है - पहले तो वह चाहता है कि वह उसे मात्र गुणवत्‍ता के आधार पर निष्‍पक्ष निर्वैयक्तिकता से मिले, फिर यह कि यदि वह गुणवत्‍ता असली है तो वह अपने आगामी कृतित्‍व और शायद अपने व्‍यक्तित्‍व में भी उसी गुणवत्‍ता को यदि विकसित न कर पाए तो भी उस स्‍तर पर बनाए रखे. साहित्यिक बिरादरी भी हर ऐसे पुरस्‍कार पर नज़र रखती है - उसे रखनी चाहिए. मुझे लगता है कि अपने तीस वर्षों के अस्तित्‍व में भारतभूषण अग्रवाल स्‍मृति कविता पुरस्‍कार और उसके प्राप्‍तकर्ता इन कठिन शर्तों को अधिकांशत: निभा पाए हैं. इसके अलावा किसी पुरस्‍कार की सार्थकता व महत्‍ता और क्‍या हो सकती है? &lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;****&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7056011166391074188-7989490858687300609?l=vatsanurag.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vatsanurag.blogspot.com/2009/09/blog-post_10.html</link><author>anuragji.kaisehain@gmail.com (anurag vats)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/Sqjl7BffB9I/AAAAAAAAAmo/q29tdqO9pyA/s72-c/vishnu-khare-2c.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>23</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-7056011166391074188.post-7481252561507056146</guid><pubDate>Sun, 06 Sep 2009 09:42:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-09-06T23:30:46.491+05:30</atom:updated><title>शहरनामा : १ : लखनऊ</title><description>( बहुत तकलीफ के साथ आलोकधन्वा ने अपनी कविता &lt;strong&gt;सफ़ेद रात&lt;/strong&gt; में यह दर्ज किया था : &lt;em&gt;लखनऊ में बहुत कम बच रहा है लखनऊ/इलाहाबाद में बहुत कम इलाहाबाद/ कानपुर और बनारस और पटना और अलीगढ़/अब इन्हीं शहरों में/कई तरह की हिंसा कई तरह के बाज़ार/कई तरह के सौदाई/इनके भीतर इनके आसपास/इनसे बहुत दूर बम्बई हैदराबाद अमृतसर/और श्रीनगर तक/हिंसा/और हिंसा की तैयारी&lt;/em&gt;...यह हानि-बोध हमारे शहरी जीवन के अनुभव के अत्यन्त निकट है। कुछ ठहरकर सोचने पर लगता है कि इन तमाम शहरों का अपना अतीत और वैभव उनसे छूट रहा है। यह आदमी की तरफ से शहर के ख़िलाफ़ की गई सबसे क्रूरतम कार्रवाई की वजह से हुआ है। इसलिए कुंवर नारायण जब यह कहते हैं कि अब आदमी ही नहीं शहर की तरफ से भी सोचना होगा, तो वह शहर को उसकी गरिमा और वैभव सौंपने जैसी बात लगती है। शहर को यह गरिमा कवि-लेखक ही सौंप सकते हैं। सबद पर शहरनामा नामक इस स्तम्भ को शुरू करने के पीछे की मंशा यही है। हम शहरों को उनके अतीत और आज में याद और ज़ज्ब करके उनके प्रति कुछ हद तक सहिष्णु बन सके, तो हमारे आदमीनामे में भी इससे कुछ गरिमा ज़रूर लौट आएगी। शहरनामा की पहली पेशकश में हम &lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/2009/04/blog-post_22.html"&gt;कुंवरजी&lt;/a&gt; की ही उनके अपने शहर लखनऊ पर लिखी कविता दे रहे हैं। लखनऊ को नवाबी शानो-शौकत का बखान करती इतिहास की पोथियों से कहीं ज़्यादा संजीदगी से सरशार और शरर, मजाज़ और &lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/2009/08/blog-post_25.html"&gt;मिर्ज़ा रुस्वा&lt;/a&gt;, सरदार जाफ़री, कुंवर नारायण और मनोहरश्याम जोशी के ज़रिये जाना जा सकता है। हम हर बार किसी एक कवि-लेखक का शहर विशेष के बारे में गद्य-पद्य देंगे। कुंवरजी ने नेह के नाते इस कविता का इस्तेमाल करने की हमें अनुमति दी, हम इसके लिए उनके आभारी हैं। शहर केंद्रित एक अन्य आयोजन भी इससे पूर्व &lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/2008/07/blog-post_25.html"&gt;सबद पर &lt;/a&gt;संभव हुआ है। पर विधिवत शुरुआत इसे ही माना जाए। नीचे लखनऊ का एक विहंगम दृश्य और इसी शीर्षक से कुंवर नारायण की कविता। )&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5378287587985171570" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 264px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SqOEEN2_pHI/AAAAAAAAAmY/kHXQlPokRc4/s400/lucknow-thumb-500x330.jpg" border="0" /&gt;&lt;br /&gt;लखनऊ&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;किसी नौजवान के जवान तरीकों पर त्योरियां &lt;span class=""&gt;चढ़ाये&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;एक टूटी आरामकुर्सी पर&lt;br /&gt;अधलेटे&lt;br /&gt;अधमरे बूढे-सा खांसता हुआ लखनऊ।&lt;br /&gt;काफ़ी-हाउस, हज़रतगंज, अमीनाबाद और चौक तक&lt;br /&gt;चार तहजीबों में बँटा हुआ लखनऊ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिना बात बात-बात पर बहस करते हुए-&lt;br /&gt;एक-दूसरे से ऊबे हुए मगर एक-दूसरे को सहते हुए-&lt;br /&gt;एक-दूसरे से बचते हुए मगर एक-दूसरे से टकराते &lt;span class=""&gt;हुए-&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;ग़म पीते हुए और ग़म खाते &lt;span class=""&gt;हुए-&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;ज़िन्दगी के लिए तरसते कुछ मरे हुए नौजवानोंवाला लखनऊ। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;br /&gt;नई&lt;/span&gt; शामे-&lt;span class=""&gt;अवध--&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;दस सेकंड में समझाने-समझनेवाली किसी बात को&lt;br /&gt;करीब दो घंटे की बहस के बाद समझा-समझाया,&lt;br /&gt;अपनी सरपट दौड़ती अक्ल को&lt;br /&gt;किसी बे-अक्ल की समझ के छकड़े में जोतकर&lt;br /&gt;हज़रतगंज की सड़क पर दौड़ा-दौड़ाकर थकाया,&lt;br /&gt;ख्वाहिशों की जगह बहसों से काम चलाया,&lt;br /&gt;और शामे-अवध को शामते-अवध की तरह बिताया। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;br /&gt;बाज़ार&lt;/span&gt;-&lt;br /&gt;जहाँ ज़रूरतों का दम घुटता &lt;span class=""&gt;है,&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;बाज़ार-&lt;br /&gt;जहाँ भीड़ का एक युग चलता &lt;span class=""&gt;है,&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;सड़कें-&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;जिन पर जगह &lt;span class=""&gt;नहीं,&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;भागाभाग-&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;जिसकी वजह नहीं,&lt;br /&gt;महज एक बे-रौनक आना-जाना,&lt;br /&gt;यह है- शहर का बिसातखाना। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;br /&gt;किसी&lt;/span&gt; मुर्दा शानोशौकत की कब्र-सा,&lt;br /&gt;किसी बेवा के सब्र-सा,&lt;br /&gt;जर्जर गुम्बदों के ऊपर&lt;br /&gt;अवध की उदास शामों का शामियाना थामे,&lt;br /&gt;किसी तवाइफ की ग़ज़ल-सा&lt;br /&gt;हर आनेवाला दिन किसी बीते हुए कल-&lt;span class=""&gt;सा,&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;कमान-कमर नवाब के झुके &lt;span class=""&gt;हुए&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;शरीफ़ आदाब-सा लखनऊ,&lt;br /&gt;खण्डहरों में सिसकते किसी बेगम के शबाब-सा लखनऊ,&lt;br /&gt;बारीक़ मलमल पर कढ़ी हुई बारीकियों की तरह&lt;br /&gt;इस शहर की कमज़ोर नफासत,&lt;br /&gt;नवाबी ज़माने की ज़नानी अदाओं में&lt;br /&gt;किसी मनचले को रिझाने के लिए&lt;br /&gt;कव्वालियाँ गाती हुई &lt;span class=""&gt;नज़ाकत :&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;किसी मरीज़ की तरह नई ज़िन्दगी के लिए &lt;span class=""&gt;तरसता,&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;सरशार और मजाज़ का लखनऊ,&lt;br /&gt;किसी शौकीन और हाय किसी बेनियाज़ का लखनऊ :&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;br /&gt;यही&lt;/span&gt; है &lt;span class=""&gt;किब्ला&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;हमारा और आपका लखनऊ। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;****&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7056011166391074188-7481252561507056146?l=vatsanurag.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vatsanurag.blogspot.com/2009/09/blog-post.html</link><author>anuragji.kaisehain@gmail.com (anurag vats)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SqOEEN2_pHI/AAAAAAAAAmY/kHXQlPokRc4/s72-c/lucknow-thumb-500x330.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>5</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-7056011166391074188.post-7254393949108762804</guid><pubDate>Mon, 31 Aug 2009 16:48:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-09-02T08:05:38.595+05:30</atom:updated><title>अनकहा कुछ : ४ : गाब्रीएल गार्सीया मारकेज़</title><description>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SpwN8bwGsoI/AAAAAAAAAmI/A2addDmsrbI/s1600-h/marquez.png"&gt;&lt;em&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5376187387066364546" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 211px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SpwN8bwGsoI/AAAAAAAAAmI/A2addDmsrbI/s320/marquez.png" border="0" /&gt;&lt;/em&gt;&lt;/a&gt;&lt;em&gt;( &lt;/em&gt;&lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/2009/06/blog-post.html"&gt;&lt;em&gt;प्रभात रंजन &lt;/em&gt;&lt;/a&gt;&lt;em&gt;अपने स्तम्भ ''अनकहा &lt;span class=""&gt;कुछ'' &lt;/span&gt;में इस दफा मशहूर लैटिन अमेरिकी &lt;span class=""&gt;लेखक &lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/2008/07/blog-post_23.html"&gt;गाब्रीएल गार्सीया मारकेज़&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/2008/07/blog-post_23.html"&gt; &lt;/a&gt;के बारे में लिख रहे हैं। आधार मारकेज़ की उस हालिया लिखी जीवनी को बनाया है जिसकी बड़ी चर्चा हो रही है। )&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;मिथक &lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;मारकेज़ के चारों ओर &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;&lt;br /&gt;प्रभात रंजन&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जीवन&lt;/strong&gt; वह नहीं होता जो कोई जीता &lt;span class=""&gt;है,&lt;/span&gt; बल्कि वह होता है जिसे कोई याद रखता है और दोबारा याद करते हुए जिस क्रम से उसे वह याद करता है -ये पंक्तियां बेहद लोकप्रिय और चर्चित लेखक &lt;span class=""&gt;गाब्रीएल गार्सीया मारकेज़&lt;/span&gt; ने अपनी आत्मकथा &lt;em&gt;&lt;span style="color:black;"&gt;लिविंग टु टेल द टेल&lt;/span&gt;&lt;/em&gt; के आरंभ में लिखी हैं। शायद एक जीवनीकार यही काम करता है। जिसका जीवन उसके जिम्मे होता &lt;span class=""&gt;है, &lt;/span&gt;वह उसे शब्दों से इस तरह गढ़ता है कि वह यादगार बन जाए। &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;गेराल्ड मार्टिन&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; द्वारा लिखित मारकेज़ की आधिकारिक बताई जा रही जीवनी &lt;span style="color:#003300;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;गाब्रीएल गार्सीया मारकेज़ : &lt;/span&gt;ए लाईफ&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; को पढ़ते हुए भी यह बात कही जा सकती है। 642 पृष्ठों की इस किताब में मार्टिन ने लगभग मिथक में बदल चुके लेखक &lt;span class=""&gt;मारकेज़ &lt;/span&gt;की जीवन-कथा उन्हीं सूत्रों के सहारे गढ़ने की कोशिश की है जिसके संकेत मारकेज़ के साहित्य, भेंटवार्ताओं इत्यादि मिलते रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;मारकेज़&lt;/strong&gt; &lt;/span&gt;न केवल ऊँचे दर्जे के लेखक हैं बल्कि उनकी शख्सियत भी बहुत बड़ी है। ऐसे व्यक्तित्व की जीवनी लिखना चुनौतीपूर्ण होता है। मारकेज़ ने स्वयं अपने बारे में लिखा है कि मेरा शुरुआती जीवन कठिन लेकिन जादुई था और बाद का जीवन सार्वजनिक और रहस्यमयी। वास्तव में, मारकेज़ का जीवन बहुआयामी रहा है - न केवल लेखक के रूप में बल्कि एक सार्वजनिक व्यक्तित्व और पत्रकार के रूप में भी। वे एक ऐसे लोकप्रिय लेखक हैं जिन्हें पाठकों का अपार प्यार मिला तो विवादों से भी नाता बना रहा। मारकेज़ को पहला ग्लोबल लेखक मानने वाले गेराल्ड मार्टिन ने न केवल इस लिविंग लीजेंड की जीवनी लिखने की चुनौती को स्वीकार की है, वरन् पर्याप्त मेहनत से, अनेक स्त्रोतों के आधार पर उसे पन्नों पर उतारा भी है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;br /&gt;जादुई&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; यथार्थवाद की शैली को लोकप्रिय बनाने वाले इस लेखक की जीवनी को लिखने के दौरान मार्टिन ने करीब सत्रह सालों तक मार्केस के जीवन और साहित्य को लेकर शोध किया। प्रश्न उठता है कि जब मारकेज़ ने कुछ ही समय पहले अपनी आत्मकथा लिखी है तो फिर आखिर उनकी यह जीवनी क्यों? वह भी उनके जीते जी? इसका एक संतोषजनक जवाब यह हो सकता है कि मारकेज़ ने अपनी आत्मकथा &lt;em&gt;लिविंग टु टेल द टेल&lt;/em&gt; में अपने जीवन के आरंभिक वर्षों के बारे में लिखा है। उन के वर्षों बारे में जब उनके अनेक सपनों में एक सपना लेखक बनने का भी था। जब मारकेज़ लेखक बनने का निश्चय करते हैं तब आत्मकथा समाप्त हो जाती है। आत्मकथा में मारकेज़ ने लेखक बनने के सपने और अपने आरंभिक &lt;span class=""&gt;संघर्षों &lt;/span&gt;के बारे में विस्तार से लिखा है। जीवनी में गेराल्ड मार्टिन ने नोबेल पुरस्कार विजेता इस लेखक के लेखकीय जीवन को फोकस में रखा है। इसमें एक साधारण व्यक्ति के असाधारण लेखक बनने की कहानी है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;1927 &lt;/strong&gt;में कोलंबिया के एक छोटे से कस्बे अराकाटक में जन्मे इस विश्वप्रसिद्ध लेखक का सबसे बड़ा लेखकीय &lt;span class=""&gt;ऑब्‍सेशन&lt;/span&gt; नाना के घर में बिताए गए बचपन के वर्ष रहे हैं जिनके बारे में पहले भी काफी कुछ लिखा जा चुका है और जिसे &lt;em&gt;वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सॉलिट्यूड&lt;/em&gt; में मकोन्दो कस्बे के रूप में उन्होंने अमर बना दिया। नाना की विशाल हवेली से लेखक का ऐसा लगाव था कि अपनी आत्मकथा का आरंभ उन्होंने उस घटना से किया है जब उनकी माँ उन्हें बताती हैं कि नाना की उस हवेली को बेचना है और इसके लिए मारकेज़ बरसों बाद नाना के उस घर को दोबारा देखने जाते हैं जिससे उनके बचपन की यादें बावस्ता थीं। जीवनीकार के अनुसार वास्तव में उसी यात्रा के दौरान उस घर को देखते हुए उनके मन में कुछ बहुत बड़ा लिखने का विचार आया, जो बहुत बाद में &lt;em&gt;वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सॉलिट्यूड&lt;/em&gt; नामक उपन्यास की शक्ल में ढला।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;br /&gt;जीवनी&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; में मार्टिन ने लेखन के आरंभिक वर्षों में &lt;span class=""&gt;मारकेज़ &lt;/span&gt;के पेरिस में बेरोजगारी और भयानक गरीबी में बिताए गए दिनों की कथा भी कही है। एक स्थान पर मार्टिन ने लिखा है कि एक बार पेरिस में कई दिनों की भूख से हारकर उन्होंने अपने एक दोस्त की कचरापेटी से कचरा निकाला और उसमें जो कुछ भी खाने लायक बचा था उसे उसी समय और वहीं खा लिया। उन दिनों का एक प्रसंग यह है कि गरीबी के कारण वे करीब एक साल तक एक वेश्यालय की बरसाती में कम किराए पर रहे। प्रसंगवश, वेश्याओं का जीवन भी मारकेज़ के लेखन का एक बहुत बड़ा &lt;span class=""&gt;ऑब्‍सेशन&lt;/span&gt; रहा है। अपनी आत्मकथा में भी उन्होंने वेश्याओं के बारे में लिखा है। बाद में उन्होंने उनके जीवन को आधार बनाकर संपूर्ण उपन्यास ही लिखा - &lt;em&gt;मेमोरीज ऑफ़ माई मेलांकली होर्स&lt;/em&gt;। इसी तरह, पेरिस के दिनों की उनकी प्रेमिका के बारे में भी जीवनीकार ने लिखा है और आजीविका के लिए उनके द्वारा किए गए अनेक कामों के बारे में भी।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;1958&lt;/strong&gt; में &lt;span class=""&gt;मारकेज़ &lt;/span&gt;की शादी मर्सिडीज नामक उसी युवती से हुई जिससे उनको जब प्यार हुआ तो उसकी उम्र महज 9 साल थी। प्रसंगवश, जीवनी लिखने के दौरान मार्टिन ने मारकेज़ की पत्नी से भी बातचीत की है और उनके दो बेटों से भी, जिनमें से एक रोड्रिगो गार्सिया भी हैं जो हॉलिवुड में फिल्मों का लेखन और निर्देशन करते हैं। कुल मिलाकर, पुस्तक में मारकेज़ के जीवन के निजी प्रसंग तो हैं लेकिन उनको लेखक ने उसी सीमा तक स्थान दिया है जहां तक उनके ऊपर निजता में हस्तक्षेप का आरोप नहीं लगे। मारकेज़ के रहस्यमयी जीवन के बारे में पुस्तक में संकेत भर है। वास्तव में, पुस्तक का उद्देश्य मेकिंग ऑफ़ मारकेज़ के रहस्यों का अनावरण अधिक है इसलिए निजी प्रसंगों का वर्णन करते हुए जीवनीकार की दृष्टि लेखक के प्रति अधिक सहानुभूतिपूर्ण है।&lt;/div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;मार्टिन&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; ने अपनी पुस्तक में यह दिखाया है कि असल में मारकेज़ ने अपने लंबे जीवनकाल में एक तरह से दो जीवन जिए &lt;span class=""&gt;हैं &lt;/span&gt;- एक जीवन &lt;em&gt;वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सॉलिट्यूड&lt;/em&gt; के प्रकाशन से पहले का है और दूसरा उस उपन्यास के प्रकाशन के बाद का।1967 में प्रकाशित इस उपन्यास ने उस को बनाया जिसे आज दुनिया भर के पाठक जादुई यथार्थवाद के जादुई चितेरे के रूप में जानते हैं। इस उपन्यास के प्रकाशन के समय उनकी उम्र 40 साल थी। जीवनीकार ने इसका दिलचस्प बयान अपनी पुस्तक में किया है कि किस तरह इस युगांतकारी समझे गए उपन्यास का आइडिया उनके दिमाग में कौंधा। 1965 में एक दिन वे गाड़ी से मेक्सिको सिटी से कहीं और जा रहे थे। अचानक उनके दिमाग में कुछ कौंधा, गाड़ी मोड़कर वे वापस घर आए और 18 महीने तक खुद को कमरे में बंद कर लिया। 18 महीने के बाद जब वे बाहर आए तो उनके हाथ में उस उपन्यास की पांडुलिपि थी जिसने उनको 1982 में नोबेल पुरस्कार दिलवाया और उनकी पत्नी के हाथों में 18 महीने के भुगतान न किए गए तरह-तरह के बिल।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;br /&gt;जिस&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; तरह के अविश्वसनीय यथार्थ के किस्से मारकेज़ ने लिखे हैं उसी तरह के अनेक किस्से उनको लेकर भी प्रचलित हैं, जिनमें से कुछ का जीवनीकार ने विश्लेषण भी किया है। बहरहाल, अपनी प्रसिद्धि को लेकर मारकेज़ अक्सर मजाक करते रहते हैं। उन्होंने कई बार मजाक में कहा है कि वे इस बात से वाकिफ थे कि उनको प्रसिद्ध होना है। कहते हैं कि अपनी पत्नी को उन्होंने शादी के समय ही बता दिया था कि जब उनकी उम्र चालीस साल की होगी तब वे एक मास्टरपीस लिखेंगे। एक बार अपनी एक बातचीत में उन्होंने कहा था कि जब वे पैदा हुए उस समय भी प्रसिद्ध थे, यह अलग बात है कि उस समय इस बात को केवल वे ही जानते थे। हालांकि &lt;span class=""&gt;मारकेज़ &lt;/span&gt;ऐसे लेखक नहीं हैं जिनके लेखन का मात्र इस एक उपन्यास के आधार पर आकलन किया जाए। आलोचकों ने उनके अन्य उपन्यासों &lt;em&gt;लव इन द टाईम ऑफ़ कॉलरा, &lt;span class=""&gt;ऑटम &lt;/span&gt;ऑफ़ द पैट्रिआर्क&lt;/em&gt; को भी विश्वस्तरीय माना है।&lt;br /&gt;****&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7056011166391074188-7254393949108762804?l=vatsanurag.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vatsanurag.blogspot.com/2009/08/blog-post_7180.html</link><author>anuragji.kaisehain@gmail.com (anurag vats)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SpwN8bwGsoI/AAAAAAAAAmI/A2addDmsrbI/s72-c/marquez.png' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>6</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-7056011166391074188.post-6586753006214314620</guid><pubDate>Mon, 31 Aug 2009 01:01:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-08-31T19:42:25.459+05:30</atom:updated><title>यह जो हरा है</title><description>&lt;div class="separator" style="CLEAR: both; TEXT-ALIGN: center"&gt;&lt;a style="MARGIN-LEFT: 1em; MARGIN-RIGHT: 1em" href="http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SpvYvZlDBhI/AAAAAAAAAl4/Mb_BbBy4K9w/s1600-h/mysticquest_edit.jpg" imageanchor="1"&gt;&lt;img src="http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SpvYvZlDBhI/AAAAAAAAAl4/Mb_BbBy4K9w/s400/mysticquest_edit.jpg" border="0" lk="true" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/2009/08/blog-post_3995.html"&gt;&lt;strong&gt;तुषार धवल&lt;/strong&gt; &lt;/a&gt;की कविता कई मायनों में ''शद्ध कविता'' है। इन कविताओं में कवि की अन्तः प्रेरणा दूषित प्रभावों की तुलना में प्रबलतर हैं, जो इसे ''कनट्राइव्ड पोएट्री'' होने से बचाती हैं। इसका सामना जिन अधिकतर कविताओं से है उसमें कवि का श्रम और युक्ति दिखती है। इसलिए तुषार को पढ़ते हुए कई दफा यह भ्रम होता है कि उनके यहाँ चीजें कच्ची तो नहीं रह गईं। पर एकाधिक जगहों को छोड़ कर आपको उसका कच्चा या हरा होना ही मोहता है। एक नए कवि में अक्सर 'यह जो हरा है', उसका न होना सबसे ज़्यादा खटकता है। और अगर कवि-कर्म आपने महज सायानी जमात में हिस्सेदारी की गरज से इस हरे से शुरू न करके ठूंठ से शुरू की होती है तो वृक्ष की संभावनाएं भी आप ख़ुद ही निःशेष करते जाते हैं। अनेक नए कवि इसी तरह काल-कलवित हो गए और हो रहे हैं। तुषार के यहाँ यह हरा एक वृक्ष का आश्वाशन है। अस्तु। तुषार ने ( प्रभात रंजन ने ठीक मार्क किया है ) ऐसी कवितायें लिखी हैं जिनमें अवचेतन का अविरल प्रवाह आद्योपांत कायम रहता है। हालाँकि तुषार सिर्फ़ इसी से कविता नहीं संभव कर &lt;span class=""&gt;लेते। विमल &lt;/span&gt;मन जब वह कहते हैं कि ''जितना भी, जैसा भी पर शब्दों का एक संसार उग रहा है। अपने को उसी में धर रहा हूँ। शब्द आते हैं। मैं कहीं नहीं हूँ'' तो उसका यह आशय कतई नहीं है कि अवचेतन को वे अपने हिसाब से गढ़ते या पुनर्सृजित नहीं करते। दरअसल, इसी पुनर्सृजन में उनकी वैचारिकी और आध्यात्मिक प्रेक्षाएं भी जगह पाती हैं। तुषार की कविताओं के लिए इसीलिए 'प्रेक्षा' शब्द का इस्तेमाल करना मुझे उपयुक्त जान पड़ता है। प्रेक्षा का अर्थ है देखना। पर उनकी प्रेक्षाएं भी कुछ फर्क हैं। मसलन वे दृश्य-पाठ तक अपने को सीमित नहीं रखतीं। वे अपने लिए एक ज़्यादा बड़ा संदर्भ ढूँढने-पाने की चेष्टाएँ हैं। अनायास ही तुषार की कविता में नैतिक-आध्यात्मिक आयाम नहीं जुड़ जाते। ज़ाहिर है वे इन्हें प्रार्थना के शिल्प में स्वायत्त नहीं करते, बल्कि अपने तीखे यथार्थ-बोध से समंजस करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;****&lt;br /&gt;(&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;''पहर यह बेपहर का''&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; नाम से प्रकाशित कवि के प्रथम संग्रह को पढने की एक कोशिश। ऊपर पुस्तक का आवरण चित्र , जो कवि की तुलिका से ही निकली है। नाम 'मिस्टिक क्वेस्ट'। ) &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7056011166391074188-6586753006214314620?l=vatsanurag.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vatsanurag.blogspot.com/2009/08/blog-post_31.html</link><author>anuragji.kaisehain@gmail.com (anurag vats)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SpvYvZlDBhI/AAAAAAAAAl4/Mb_BbBy4K9w/s72-c/mysticquest_edit.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>4</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-7056011166391074188.post-4199129193015963775</guid><pubDate>Sat, 29 Aug 2009 14:05:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-08-30T01:09:46.620+05:30</atom:updated><title>कवि कह गया है : ५ : तुषार धवल</title><description>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/Splju2KzOBI/AAAAAAAAAlw/tR5eShktYy8/s1600-h/Shesh1.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5375437286709344274" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 305px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/Splju2KzOBI/AAAAAAAAAlw/tR5eShktYy8/s400/Shesh1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SplERXnDtbI/AAAAAAAAAlo/_tlvhyiJtnw/s1600-h/Shesh.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;एक तत्त्व है कविता&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;&lt;span class=""&gt;तुषार&lt;/span&gt; धवल&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मन&lt;/strong&gt; ... मन के पार एक कोमल अँधेरा पसरा रहता है। नहीं, अँधेरा भी नहीं, इसे एक कोमल उजास कहना चाहिए। या उजास भी &lt;span class=""&gt;नहीं, &lt;/span&gt;यह एक शून्य है। ....शून्य है ? नहीं वह भी नहीं। तो फिर क्या है ? पता नहीं, लेकिन कुछ तो है। कोई तो एक ज़मीन है। अवकाश या न जाने क्या है, जहाँ मन में उठती लहर मुझे धकेल रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;यह&lt;/strong&gt; रास का काल है। &lt;span class=""&gt;लय, &lt;/span&gt;गति और बारीक हरकतों का मिला जुला संयोजन! कविता वह नहीं जिसे हम जानते हैं। अनुभूति वह नहीं, जिसे हम व्यक्त करते हैं। यह कुछ शब्दातीत-सा होता है। सृष्टि ने अपनी रचना का सूत्र अपने भीतर छुपा रखा है। खजाने की कोई गुमशुदा चाबी गहरे अतल में किसी सूक्ष्म भाव में 'एनक्रिप्ट' करके रख दी है। उसे 'डी-कोड' करना मुझे नहीं आता। लेकिन एक संकेत कहीं भीतर से उठता है। कौन ? कहाँ ? लुका-छिपी का खेल चलता है ! मन को सतर्क करता हूँ। मुझे मालूम &lt;span class=""&gt;है, &lt;/span&gt;कहीं से कोई 'धप्पा' दे देगा और फिर से खेल अपनी शुरुआत पर लौट जायेगा। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;एक&lt;/strong&gt; 'सिम्फनी' है शब्दों की। 'रिद्मिक'। लय जो मुझे चारों तरफ से घेर रही है। कुनमुन कुनमुन कुछ कुनमुनाता है मेरे भीतर। टन्न से एक घंटी बजती है। स्वरों का जमघट एक 'रिदम' में फैलने लगता है। भाव उसी 'रिदम' पर चल रहे हैं। पड़ोस में कोई ड्रिल मशीन तीखी घिर्र-घिर्र करती दीवार में उतरती जा रही है। एक चील हवा में चकल्लस करती हुई गोता लगा रही है। फेरीवाला पुकार लगाता है। यहीं ट्रैफिक भी है। बीवी, ऑफिस, बॉस भी। ये सब &lt;span class=""&gt;हैं,&lt;/span&gt; लेकिन इन क्षणों में ठीक वैसे नहीं, जैसा हम उन्हें &lt;span class=""&gt;चीन्हते-&lt;/span&gt;जानते आए हैं। जानना भी कभी-कभी कितना अनजान होना है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सृष्टि&lt;/strong&gt; सेवित ( सृष्ट ) हर चीज़ की जो यह लय है, क्या हम इस लय को जान समझ पाते हैं ? इस नैसर्गिक लय का असर बहुत सीधा होता है। बहुत पक्का। भीतर जो उमड़ता-घुमड़ता &lt;span class=""&gt;है, &lt;/span&gt;वह इसी लय से तारतम्य बिठा कर इसमें विलय का आकांक्षी होता &lt;span class=""&gt;है। &lt;/span&gt;रचना वहीँ से उगती है। और यह लय सहजता की होती है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;इस&lt;/strong&gt; 'सिम्फनी' में मैं भी डूब-उतरा रहा हूँ। आदिम संस्कार हैं, अहम् है, जो काठ के किवाड़-सा आड़े आ जाता है। जितना भी, जैसा भी पर शब्दों का एक संसार उग रहा है। अपने को उसी में धर रहा हूँ। शब्द आते हैं। मैं कहीं नहीं हूँ। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कभी&lt;/strong&gt; कोई लय गीत के ताल पर उठती है तो कभी गद्य के ताल पर। उसका कोई फार्मूला नहीं है। कभी कभी तो बिलकुल निर्जन सपाट-सी भी लय होती है किसी भाव-चेतना की। बस उसके सहज में सहज हो जाने में सब कुछ बसा होता है। काठ के किवाड़ में दरार है जिसके पीछे से ढिबरी ढिमक ढिमक कुछ कह रही है। देखो उसकी लौ का 'रिदम'। यह संसार का 'रिदम' है। जो कुछ भी सहज-सृष्ट है उसमें 'रिदम' है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कविता&lt;/strong&gt; शब्दों में नहीं होती। शब्दों से बनती भी नहीं। एक तत्त्व है कविता।&lt;br /&gt;कविता सिर्फ वहां संभव 'होती' है, जहाँ शब्दों के वाहन हमें ले जा कर छोड़ देते हैं ! &lt;/p&gt;&lt;p&gt;****&lt;br /&gt;&lt;em&gt;( &lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/2008/10/blog-post_07.html"&gt;तुषार धवल &lt;/a&gt;हिन्दी के नए कवियों में अपने रचना-स्वभाव की वजह से अलग से पहचाने जाते हैं। उनकी कविता में समकालीन यथार्थ के साथ-साथ एक आध्यात्मिक प्रेक्षा भी जुड़ी है। बहुधा ऐसी प्रेक्षाओं को ग़लत पढ़ लिया जाता है। इसलिए ज़रूरी है कि हम उस कोहेतूर की भी सैर कर आयें जहाँ कविता में इन प्रेक्षाओं का नियोजन होता है। तुषार ने हमारे आग्रह पर यह तलघर खोला है। उनके शब्दों के आलोक में हम यहाँ विचर सकते हैं। &lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/2009/04/blog-post_25.html"&gt;'कवि कह गया है' &lt;/a&gt;स्तम्भ में इस बार तुषार की अन्तः-क्रिया। हाल ही में कवि का पहला कविता-&lt;span class=""&gt;संग्रह, &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;'&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;पहर यह बेपहर का'&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; नाम से छपकर आया है। सबद कवि को उनके पहले संग्रह और भविष्य की शुभकामनायें देता है। तुषार कविता करने के साथ-साथ बहुत उम्दा चित्र भी बनाते हैं। ऊपर उन्हीं की चित्र-कृति ,''शेष '' दी गई है। )&lt;/em&gt;&lt;em&gt; &lt;/em&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7056011166391074188-4199129193015963775?l=vatsanurag.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vatsanurag.blogspot.com/2009/08/blog-post_3995.html</link><author>anuragji.kaisehain@gmail.com (anurag vats)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/Splju2KzOBI/AAAAAAAAAlw/tR5eShktYy8/s72-c/Shesh1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>5</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-7056011166391074188.post-8101615419719659677</guid><pubDate>Fri, 28 Aug 2009 23:15:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-12-03T10:20:30.846+05:30</atom:updated><title>बही - खाता : ८ : पॉल ऑस्टर</title><description>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/Sph4M-GhC4I/AAAAAAAAAlg/NvA273T2BWU/s1600-h/paul_auster_2031.gif"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5375178319490780034" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 124px; CURSOR: hand; HEIGHT: 191px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/Sph4M-GhC4I/AAAAAAAAAlg/NvA273T2BWU/s200/paul_auster_2031.gif" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;किताब पाठक लिखता है&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मेरी&lt;/strong&gt; यह कोशिश रहती है &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;अपने गद्य में इतनी जगहें छोड़ता चलूँ जिसमें पाठक का वास हो। क्योंकि मेरी &lt;span class=""&gt;यह &lt;/span&gt;दृढ मान्यता है कि यह पाठक &lt;span class=""&gt;है &lt;/span&gt;जिसने किताब लिखी होती है, लेखक ने नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जब&lt;/strong&gt; मैं लिखता हूँ, मेरे दिमाग में कहानी सर्वोपरि रहती &lt;span class=""&gt;है, &lt;/span&gt;और मुझे लगता &lt;span class=""&gt;है &lt;/span&gt;इस पर किसी और को वरीयता नहीं दी जानी चाहिए। इसके लिए सबकुछ तज देना चाहिए : अत्यन्त मनोरम और उत्सुकता से भर देनेवाले उन तमाम हिस्सों को भी, अगर &lt;span class=""&gt;वे,&lt;/span&gt; जो मैं कहना चाहता हूँ उसके साथ एक प्रासंगिक &lt;span class=""&gt;जुड़ाव &lt;/span&gt;नहीं रखते।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;इतनी&lt;/strong&gt; निर्ममता ज़रूरी &lt;span class=""&gt;है। &lt;/span&gt;तब जब आप एक कहानी कह रहे हों और उम्मीद करते हों कि लोग आपको सुनें। इसमें छटांक भर विचलन भी लोगों के मन में भारी बोरियत पैदा कर सकता है। अंततः आप वही किताब नहीं लिखते जिसे लिखने &lt;span class=""&gt;की &lt;/span&gt;ज़रूरत आपने महसूस की थी, आप वह किताब भी लिखना चाहेंगे जिसे आप ख़ुद पढ़ना पसंद करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मैं&lt;/strong&gt; जब यह सोचता हूँ कि मैं क्यों लिखता हूँ, तो मुझे अचरज होता है। लिखते हुए न तो मैं कोई सुंदर वस्तु बना रहा होता हूँ और न मनोरंजक कहानियाँ गढ़ने की ही मेरी मंशा होती है। फिर ? मुझे दरअसल यह शिद्दत से महसूस होता है कि लेखन जीवित रहने के लिए किया जानेवाला एक ज़रूरी कर्म है। एक ऐसा काम जिसे न करूँ तो मुझे अपना अस्ति-बोध भयावह लगने लगता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मेरे&lt;/strong&gt; लिए लिखना हमेशा सुखकर नहीं रहा है। पर यह न लिख पाने की पीड़ा से हमेशा बेहतर रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जिन&lt;/strong&gt; जीवनानुभवों से गुजरा हूँ उन्हें दर्ज कर मैं उनके प्रति एक नैतिक आभार प्रकट करता हूँ। मैं अपनी जी हुई दुनिया पर ज़्यादा यकीन करता हूँ, बनिस्बत मुझे बताई गई दुनिया के।...इस तरह हर लेखक अपने लेखन में अपने जीवनानुभवों को कमोबेश शामिल करता है और हर उपन्यास आत्मकथात्मक जान पड़ता है। पर इसमें लुत्फ़ कल्पना द्वारा यथार्थ में सुराख करने से पैदा होता है, यथार्थ को ज्यों का त्यों परस देने से नहीं।&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;span style="font-size:78%;"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;em&gt;अनुवाद : अनुराग वत्स&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;****&lt;br /&gt;&lt;em&gt;( अमेरिकी कथाकार और कवि &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Paul_Auster"&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;&lt;strong&gt;पॉल ऑस्टर&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;/a&gt;के ये विचार-बिन्दु उनके गद्य संकलन द रेड नोटबुक से लिए गए हैं। ऑस्टर की ख्याति क्राइम-फिक्शन के लिए है। साथ ही वे अपने अनुवाद और कथेतर गद्य के लिए भी जाने जाते हैं। &lt;/em&gt;&lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/2009/04/blog-post_22.html"&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;बही-खाता&lt;/strong&gt; &lt;/em&gt;&lt;/a&gt;&lt;em&gt;में इस दफा ऑस्टर ही। )&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7056011166391074188-8101615419719659677?l=vatsanurag.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vatsanurag.blogspot.com/2009/08/blog-post_29.html</link><author>anuragji.kaisehain@gmail.com (anurag vats)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/Sph4M-GhC4I/AAAAAAAAAlg/NvA273T2BWU/s72-c/paul_auster_2031.gif' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>5</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-7056011166391074188.post-6507709000122746670</guid><pubDate>Wed, 26 Aug 2009 00:54:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-09-06T14:53:14.049+05:30</atom:updated><title>पोथी पढ़ि पढ़ि : ३ : इतलो कल्विनो</title><description>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SpSH_wpE9KI/AAAAAAAAAlI/Fdw6VZtQLj4/s1600-h/calvino.jpg"&gt;&lt;img alt="" border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5374069784818545826" src="http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SpSH_wpE9KI/AAAAAAAAAlI/Fdw6VZtQLj4/s320/calvino.jpg" style="cursor: hand; float: left; height: 320px; margin: 0px 10px 10px 0px; width: 220px;" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color: #003333;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: #cc0000;"&gt;क्लैसिक्स के बारे में&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;१.&lt;/span&gt; क्लैसिक&lt;/span&gt; किताबों के बारे में लोग अक्सर यह कहते पाए जाते हैं कि वे इन्हें 'फिर से पढ़ रहे हैं'। वे यह कभी नहीं कहते कि इन्हें ( दरअसल पहली दफा ही) 'पढ़ रहे हैं'! ऐसा उनके मुंह से तो और सुनने को मिलता है जो अपने आप को खासा पढ़ाकू मानते-समझते हैं।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;२.&lt;/span&gt; 'क्लैसिक्स' शब्द का इस्तेमाल हम उन किताबों के लिए करते हैं जिन्हें उनके पढ़ने और प्यार करनेवालों ने अमूल्य निधि की भांति सहेजा होता है। पर ये किताबें उन लोगों द्वारा भी कम सहेजी हुई नहीं मानी जाती जिन्हें यह सौभाग्य मिला कि वे ऐसी किताबों को तब पढ़ सके जब स्थितियां उसे पढ़े-गुनने के लिए सर्वाधिक अनुकूल रहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;३.&lt;/span&gt; क्लैसिक वे किताबें हैं जो आपके मनोजगत पर गहरा असर छोड़ती हैं। खासकर तब जब वे आपके दिलोदिमाग से जाने से मना करती हैं और तब भी जब खुद को स्मृति में नियोजित करती हुई वे आपके सामूहिक या व्यक्तिगत अवचेतन में छुप बैठती हैं।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;४.&lt;/span&gt; क्लैसिक का पुनर्पाठ भी उसके पहले पठन की तरह ही एक खोजी यात्रा सरीखा रोमांच से आपको भर देता हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;५ + ६.&lt;/span&gt; क्लैसिक का हर पठन असल में पुनर्पाठ ही है। मायने ये कि एक क्लैसिक किताब कभी चुप नहीं बैठती। हर पाठ में वह आपको कुछ न कुछ अलग सौंपती जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;७.&lt;/span&gt; क्लैसिक्स हमारे पूर्व पठन को अपने भीतर ज़ज्ब सांस्कृतिक अनुभवों से आलोकित करती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;८.&lt;/span&gt; एक क्लैसिक किताब ज़रूरी नहीं कि हमें वह बताये जो हम पहले नहीं जानते थे। बहुधा तो यह होता है कि ऐसी किताबों में हम उन्हीं चीजों को पाते हैं, जिनसे हमारा पूर्व परिचय रहता है। महत्वपूर्ण इस जाने हुए को एक खास ढंग से, अक्षरयोजित, जानना होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;९.&lt;/span&gt; क्लैसिक्स के बारे में हमने जितना सुना होता है, पढ़ते हुए वे हमें उससे कहीं ज़्यादा ताज़ा, अनपेक्षित और अद्भुत जान पड़ती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;१०.&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;एक क्लैसिक किताब को उसकी संरचना में ब्रह्माण्ड के बराबर रख कर देखा जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 130%;"&gt;११.&lt;/span&gt; आपके क्लैसिक लेखक वे हैं जिनसे आप हमेशा अपने को नाभिनालबद्ध पाते हैं। इस अभिन्नता में न सिर्फ़ वह अपने सम्बन्ध में आपको अपनी परिभाषा गढ़ने में मदद करते हैं, बल्कि उनसे जिरह करते हुए भी आप ऐसा करने की सहूलियत पाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;१२.&lt;/strong&gt; एक क्लैसिक किताब आपके हाथ दूसरी के पहले आती है। पर जिस किसी ने भी दूसरी पहले पढ़ी हुई होती है, वह अपने तईं पहली को पढ़ कर उसकी जगह आप ही तय कर देता है।&lt;br /&gt;&lt;span style="color: #000066; font-size: 78%;"&gt;&lt;em&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: #000066; font-size: 78%;"&gt;&lt;em&gt;अनुवाद : अनुराग वत्स&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;em&gt;( इतालवी भाषा के अनुपम कथाकार &lt;strong&gt;&lt;span style="color: #006600;"&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Italo_Calvino"&gt;इतलो कल्विनो&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; की ये पंक्तियाँ उनके कथेतर गद्य-संकलन 'लिटरेचर मशीन' से&amp;nbsp;ली गई हैं। जिस लेख से इन्हें अलगाया गया है, उसका नाम है, व्हाई रीड क्लैसिक्स ? लेख में क्लैसिक की अवधारणा, निर्मिति और इस शब्द के मिथकीय होते जाने के बारे में विस्तार से लिखा गया है। यहाँ लेखक की स्थापनाओं के दर्जन भर सूत्र वाक्यों को ही अनूदित कर दिया गया है। इससे पहले आप इस स्तम्भ में &lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/2009/04/blog-post_24.html"&gt;मारीना त्स्वेतायेवा &lt;/a&gt;और &lt;/em&gt;&lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/2009/02/blog-post_07.html"&gt;&lt;em&gt;फरनांदो पैसोआ &lt;/em&gt;&lt;/a&gt;&lt;em&gt;का गद्य भी पढ़ चुके हैं। )&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7056011166391074188-6507709000122746670?l=vatsanurag.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vatsanurag.blogspot.com/2009/08/blog-post_26.html</link><author>anuragji.kaisehain@gmail.com (anurag vats)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SpSH_wpE9KI/AAAAAAAAAlI/Fdw6VZtQLj4/s72-c/calvino.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>4</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-7056011166391074188.post-7438078755359371805</guid><pubDate>Mon, 24 Aug 2009 18:47:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-09-02T16:25:01.592+05:30</atom:updated><title>ज़बां उर्दू : ४ : मिर्ज़ा हादी 'रूस्वा'</title><description>&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:medium;"&gt;&lt;span style="color:#38761d;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SpLCXFhAPKI/AAAAAAAAAk4/fg5q4GStwJI/s1600-h/umrao.bmp"&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5373571007279807650" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 190px; CURSOR: hand; HEIGHT: 281px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SpLCXFhAPKI/AAAAAAAAAk4/fg5q4GStwJI/s320/umrao.bmp" border="0" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#006600;"&gt;आखिरी सफे...&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मिर्ज़ा&lt;/strong&gt; &lt;span class=""&gt;रुस्वा &lt;/span&gt;साहब, जब आपने मेरी ज़िन्दगी के हालात लिखके मसविदा मुझे &lt;span class=""&gt;पढ़ने &lt;/span&gt;के लिए &lt;span class=""&gt;दिया, &lt;/span&gt;तो मुझे ऐसा गुस्सा आया &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;जी चाहता था &lt;span class=""&gt;टुकड़े-&lt;/span&gt;टुकड़े करके फेंक दूँ। बार-बार ख़याल आया कि ज़िन्दगी में क्या कम काला मुंह हुआ था, जो उसकी कहानी मरने के बाद भी &lt;span class=""&gt;बाकी &lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;रहे &lt;/span&gt;और लोग पढ़ें और मेरी लानत-मलामत &lt;span class=""&gt;करें ? &lt;/span&gt;मगर कुछ आपका लिहाज़ करके हाथ रुक गया।&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मुझे&lt;/strong&gt; नेक औरतों का खयाल आता है। उन्हें अपने ऊपर जितना &lt;span class=""&gt;घमंड &lt;/span&gt;न हो, थोड़ा है। &lt;span class=""&gt;हम-&lt;/span&gt;जैसी बज़ारियों का उनसे क्या &lt;span class=""&gt;मुकाबला! &lt;/span&gt;मगर मैंने सोचा कि इसमें वक्त ही का हाथ है, जो मैं बाज़ार में आई और अपनी किस्मत का लिखा पूरा किया। वक्त न &lt;span class=""&gt;होता, &lt;/span&gt;तो क्या दिलावर &lt;span class=""&gt;खां &lt;/span&gt;मुझे उठाके लाता और लाके &lt;span class=""&gt;खानम &lt;/span&gt;के हाथ बेचता और मैं वह बुरे &lt;span class=""&gt;काम &lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;करती, &lt;/span&gt;जिनको अब मैं बुरा समझती हूँ ? उस ज़माने में मैं उन &lt;span class=""&gt;चीज़ों &lt;/span&gt;को नहीं समझती थी और न मुझे बताया गया था कि मैं उन कामों से बचूं।&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जवान &lt;/strong&gt;होने के बाद ऐशो-आराम में पड़ &lt;span class=""&gt;गई। &lt;/span&gt;उस ज़माने में गा-&lt;span class=""&gt;बजाके &lt;/span&gt;मर्दों को रिझाना मेरा पेशा था। इसमें औरों के मुकाबले मुझे जितनी कामयाबी मिलती &lt;span class=""&gt;थी, &lt;/span&gt;उतनी ही मैं खुश होती थी। जहाँ कामयाबी नहीं होती थी, रंज होता था। मेरी सूरत दूसरों की बनिस्बत कुछ अच्छी न थी, मगर गाने और शेरो-शायरी के शौक &lt;span class=""&gt;की &lt;/span&gt;वजह से मैं सबसे बढ़ी-चढ़ी रही। अपनी उम्रवालों में मुझे ज़्यादा बड़ा दर्जा मिला हुआ था। इसका नतीजा यह हुआ &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;जितनी मेरी इज्ज़त &lt;span class=""&gt;बढ़ती, &lt;/span&gt;मैं अपनी निगाहों में ख़ुद को इज्ज़तदार समझने लगी। इससे नुकसान यह हुआ कि मैं तो अपने काम में मुंह देखती रह जाती और दूसरी रंडियां अपना मतलब निकाल लेतीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;फ़िर&lt;/strong&gt; वह ज़माना आया कि मैं रंडी के ज़लील पेशे को ऐब समझने लगी और उससे हाथ खींच लिया। हर ऐरे-गैरे से मिलना छोड़ दिया और &lt;span class=""&gt;सिर्फ़ &lt;/span&gt;नाच-मुजरे पर गुज़र करने लगी।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;br /&gt;जब&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; मैंने उन कामों को &lt;span class=""&gt;छोड़ा, &lt;/span&gt;जिन्हें मैं बुरा समझती थी, तो कई बार मेरे जी में आया कि किसी के घर बैठ जाऊँ। फिर सोचा लोग कहेंगे कि आख़िर रंडी थी &lt;span class=""&gt;न, &lt;/span&gt;कफ़न का चोगा किया। जब कोई रंडी उम्र से उतर जाने के बाद किसी के घर बैठती है तो तजुर्बेकार तमाशबीन कहते हैं कि मरते-मरते कफ़न ले &lt;span class=""&gt;मरी...&lt;/span&gt;बात सच &lt;span class=""&gt;है, &lt;/span&gt;हमलोग ऐसी ही होती हैं, खुदगर्ज़, लालची, फरेबी।&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;एक&lt;/strong&gt; बड़ी बी कभी-कभी मेरे मकान पर आया करती हैं। किसी ज़माने में बड़ी मशहूर रंडियों में थीं। जवानी में हजारों रुपये कमाए। जब सिन से उतरी, तो वही कमाई यारों को खिलाना शुरू कर दी। बुढ़ापे में एक नौजवान के घर जा बैठी। वह खूबसूरत था, कमसिन था, इन पर क्यों रीझता ? मगर यह न समझीं। पहले तो साहबजादे की बीवी इनको देखकर ज़रा बिगड़ीं, मगर जब मियां ने असल मतलब समझा दिया, तो खामोश हो रहीं और उनकी खूब खातिर-मदारत करने लगीं। जब तक माल रहा, मियां-बीवी ने खूब फुसलाकर खाया और जब खुख हो गईं, तो घर से निकाल दिया। अब गलियों की ठोकरें खाती फिरती हैं।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;br /&gt;लखनऊ&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; के गली-कूचों में जो बूढी-फ़कीरनियाँ पड़ी रहती हैं, उनमें ज्यादातर रंडियां हैं और वे रंडियां, जो कभी ज़मीन पर पैर न रखती थीं, जिन्होंने क़यामत बरपाकर रखी थी...जहाँ जाती थीं, लोग आँखें बिछाते थे, जहाँ बैठ जाती थीं, लोग बाग़-बाग़ हो जाते थे; आज उनकी तरफ कोई आँख उठाके नहीं देखता...&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मैं&lt;/strong&gt; बहुत दिन तकदीर और तदबीर के मसले में फंसी रही। मगर अपने हालत को क्योंकर भूल सकती हूँ! मेरी ज़िन्दगी में काम वही दो हरूफ आए, जो मौलवी साहब ने पढ़ा दिए थे...उस ज़माने में जब मैं नाच-मुजरा करती थी, तो मौलवी साहब से हासिल किये हुए इल्म की वजह से मेरी शोहरत हुई। उस वक्त तो मैं बराबर तारीफ करनेवालों से घिरी रहती थी। पढ़ने-लिखने के लिए ज्यादा फुरसत नहीं मिलती थी। लेकिन अब मैं अकेली हूँ, तो मौलवी साहब की दी हुई किताबें पढ़ने के शौक की वजह से ही ज़िन्दा हूँ। अगर यह शौक न होता तो जवानी के मातम, पुरानी दिनों के ग़म और मर्दों की बेवफाई का रोना रोते हुए ज़िन्दगी खत्म हो जाती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रहती&lt;/strong&gt; रंडी की तरह हूँ, ख़ुदा चाहे मारे, चाहे जिलाए, मुझसे पर्दे में घुटकर तो न बैठा जायेगा। मगर मैं पर्देवालियों के लिए दिल से दुआ मांगती हूँ, ख़ुदा उनका राज-सुहाग कायम रखे और रहती दुनिया तक उनका पर्दा रहे। जहाँ तक मेरी बात है, अपने हाल तो यह हैं कि :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#20124d;"&gt;मरने के दिन करीब हैं शायद कि ऐ हयात &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#20124d;"&gt;तुझसे तबीयत अपनी बहुत सीर हो गई &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:black;"&gt;****&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;( यह गद्य &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Mirza_Hadi_Ruswa"&gt;&lt;span style="color:purple;"&gt;मिर्ज़ा हादी 'रुस्वा'&lt;/span&gt; &lt;/a&gt;का है। रुस्वा उर्दू के आरंभिक गद्यकारों में अग्रगण्य हैं। यहाँ दिए गए अंश उनके अत्यंत प्रसिद्द उपन्यास &lt;strong&gt;&lt;span style="color:red;"&gt;उमराव जान 'अदा'&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; से चयनित हैं। रुस्वा का यह उपन्यास उन्नीसवीं सदी के अवध ( लखनऊ) का आईना है। हालाँकि इसमें एक वेश्या अपने जीवन का अक्स देखती है, लेकिन बजरिये उसके पूरे युग का चरित और त्रासद विडम्बनाएं उजागर होती जाती हैं। इन मायनों में इसकी अमरता इतिहास पुस्तकों से कुछ ज्यादा है। साथ-साथ यह उपन्यास तत्कालीन गद्य मात्र में हिंदी के बरक्स उर्दू की बढ़त का सूचक भी है। &lt;a href="http://vatsanurag.blogspot.com/2009/02/blog-post_17.html"&gt;ज़बां उर्दू&lt;/a&gt; में इस दफा यही। जोड़ना ज़रूरी है कि प्रस्तुत अंश गिरीश माथुर द्वारा उपन्यास के पुस्तकाकार अनुवाद से हैं। ) &lt;/em&gt;&lt;br /&gt;####&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7056011166391074188-7438078755359371805?l=vatsanurag.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vatsanurag.blogspot.com/2009/08/blog-post_25.html</link><author>anuragji.kaisehain@gmail.com (anurag vats)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SpLCXFhAPKI/AAAAAAAAAk4/fg5q4GStwJI/s72-c/umrao.bmp' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>6</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-7056011166391074188.post-8609184456400736636</guid><pubDate>Sat, 22 Aug 2009 12:50:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-08-29T10:43:11.365+05:30</atom:updated><title>लव इन द टाइम ऑफ़ स्‍वाइन फ्लू...</title><description>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SpAGKIPG_vI/AAAAAAAAAkw/7dkTNx3TgJ4/s1600-h/love.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5372801126532316914" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 145px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SpAGKIPG_vI/AAAAAAAAAkw/7dkTNx3TgJ4/s400/love.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;क्या&lt;/strong&gt; यह ज़रूरी है ?... नहीं। ...फिर ? तुमने बात क्यों बंद की ? ...सोच रहा था, देखें, बगैर बात किए लोग कैसे रहते हैं। ...अच्छा !, बकवास। तुमने खामख्वाह परेशान किया मुझे। ऐसा क्यों करते हो ? &lt;span style="font-size:78%;"&gt;XXX&lt;/span&gt; खैर, अभी कहाँ हो, ऑनलाइन नही दिखते। ...बस में हूँ। ...जगह मिली ? ...हाँ,निजामुद्दीन आते-आते। ...तुम ?...मैं घर पर हूँ। बात बंद कर दी थी तुमने इसलिए बिना मिले चली आई। ...ओह! &lt;span style="font-size:78%;"&gt;XXX &lt;/span&gt;बाहर बारिश गिर रही है। जाम लगा है और अदंर लोग नकाबपोश हैं ? ...क्यों ? ...तुम अख़बार नहीं पढ़ती क्या ? स्वाइन फ्लू। ...तुम मेरे मन का अख़बार ही नहीं बनाते, क्या पढूं! ...तुम भी! ...अच्छा तुमने मास्क पहन रखी है ?...नहीं। ...क्यों तुम्हारे लिए फ्लू नहीं है ?...है, पर मैं उससे बड़ी फ्लू की चपेट में हूँ। ...बनो मत। कम से कम रुमाल ही बाँध लेते।...तुम जानती हो न...हाँ-हाँ कि आप रुमाल भूल जाते हैं। पर ऐन नाक पर बंधी रहेगी तब भी भूलोगे ?...नहीं। ...ऐसा करो रुमाल बांधनेवाली बीवी घर ले आओ। ...वह गले में पट्टा बाँध देगी!...हाहाहा ...हमं, सच कह रहा हूँ। ...क्या करते रहे इन चार गुमसुम दिनों में। अभी जैसे ऊँगली पटपट चल रही है, चार दिन में तुमसे चार अक्षर नहीं लिखे गए!...&lt;span style="font-size:78%;"&gt;XXX&lt;/span&gt; सॉरी...शट अप! मेरा मतलब है क्यों ? क्यों करते हो ऐसा ? बताओ अपने लिए तकलीफ सिरजते हो, जबकि जितना साथ लिखा है, उतनी दूर तक तो मैं हूँ न।... &lt;span style="font-size:78%;"&gt;XXX&lt;/span&gt;...मेरा स्टाप आ गया। ...कमीने!...किसके, विशाल के ? ...नहीं, मेरे। मेरे अपने।....&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;**** &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7056011166391074188-8609184456400736636?l=vatsanurag.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vatsanurag.blogspot.com/2009/08/blog-post_22.html</link><author>anuragji.kaisehain@gmail.com (anurag vats)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_Iosr5cTHRWY/SpAGKIPG_vI/AAAAAAAAAkw/7dkTNx3TgJ4/s72-c/love.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>28</thr:total></item></channel></rss>