गीत चतुर्वेदी : कॉलम 22 : टूटी हुई बोतल में चाँद का चेहरा

Anna Chan



एक बार चेखॉव ने अपने समकालीन गोर्की से कहा, “चाँद दिखाने के लिए पूरी रात, अमावस या पूर्णिमा का वर्णन करना ज़रूरी नहीं, बस इतना दिखा दिया जाए कि एक टूटी हुई बोतल में चाँद का प्रतिबिंब कैसा बन रहा है।”

अक्सर मुझे सड़क किनारे, पार्किंग लॉट या अन्य जगहों पर, टूटी हुई बोतलें दिख जाती हैं। उनमें न चाँद देखता हूँ, न सूरज, लेकिन चेखॉव की यह बात तुरंत याद आ जाती है— आख़िर चेखॉव ने टूटी हुई बोतल ही क्यों कहा? नदी, जलाशय या दर्पण क्यों न कहा?

हम जितना सोचते हैं, चेखॉव उससे कहीं आधुनिक थे। कृत्रिम में प्रकृति का प्रतिबिंब दिखाना अधिक चेखॉवियन है।

टूटी हुई बोतल में चाँद का चेहरा।

टूटन में बसे हुए सपने या सपनों के टूट जाने की कहानी।

निराशा के पात्र में आशा का आसव।

सोच को एकदम से पंख मिल जाते हैं। आनंद पाने वाला पाठक इसी एक पंक्ति पर देर तक सोचता रहे। इसी के ज़रिए पन्ने-भर जितना दर्शन पा ले। बाक़ी लोग तो पन्ने पर पन्ने रँगे ही जाएँगे और नज़र किसी एक शब्द पर ना टिकेगी। गोर्की मुझे हमेशा इस दूसरी श्रेणी वाले लेखक लगे।
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एक थे हेराक्लाइटस। यूनानी दार्शनिक। जिस समय वे अपना चिंतन कर रहे थे, उस समय यूरोप को दर्शन व चिंतन की ख़ास समझ नहीं थी। इसलिए उन पर कोई ध्यान भी न देता था। उनमें दुनिया की तमाम बातों के प्रति रोष था। किसी को क्रोध आता है, तब वह रोने लग जाता है। और कोई ऐसा कि हँसने लग जाए। दार्शनिक थे, सामान्य तो न ही रहे होंगे, हेराक्लाइटस क्रोधित व दुखी होकर रोते थे। इतना रोए कि उनका नाम ही “रोता हुआ दार्शनिक” पड़ गया। उनके कुछ समय बाद एक अन्य दार्शनिक हुए डेमॉक्रिटस। क्रोधित व दुखी होने पर वह हँसने लगते थे। उनका नाम पड़ गया “हँसता हुआ दार्शनिक”। बात उनके रोने-हँसने के इर्द-गिर्द ही घूमती रहती और लंबे समय तक उनके विचारों पर ध्यान ही नहीं दिया गया। प्लेटो तो डेमॉक्रिटस के नाम से ही चिढ़ता था और खुलेआम कहता था कि उसकी किताबें जला दो। शायद इसीलिए, उनकी किताबें नहीं बचीं, बस, कुछ पन्ने, कुछ टुकड़े ही बचे हैं और उन्हीं के आधार पर अब उन्हें महान माना जाता है।

हेराक्लाइटस का जीवनकाल वही था, जो उनसे मीलों दूर रह रहे गौतम बुद्ध का। और दोनों के विचारों में भी गहरी समानता दिखती है। बुद्ध ने कहा, संसार भंगुर है, अनित्य है, हर चीज़ जो जन्मी है, वह एक दिन ख़त्म हो जाएगी। हज़ारों मील दूर यूनान में बैठे हेराक्लाइटस ने अपनी भाषा में कहा, परिवर्तन संसार का नियम है।

यह अद्भुत समकालीनता है- शायद असली समकालीनता भी यही है। बिना एक-दूसरे को जाने, एक-दूसरे जैसा सोच लेना। विचारों की एक वंशावली होती है। उसका डीएनए बहुत पीछे तक ले जाता है। और समकालीनता, देशों, सरहदों, भाषाओं के पार भी होती है, सिर्फ़ अपनी भाषा व परिवेश तक सीमित नहीं रहती।

अगर ब्रह्मांड के किसी और ग्रह पर जीवन मिल जाए, वहाँ भी कला-साहित्य कारोबार होता हो, तो यक़ीनन, समकालीनता की हमारी सोच में कुछ नये आयाम ज़रूर जुड़ जाएँगे।
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दो मस्तिष्कों का एक जैसा सोचना एक आकर्षक घटना है, तो एक अविश्वसनीय बहाना भी। हाँ, कई लोग इसे एक बहाने की तरह भी प्रयोग करते हैं। महान जर्मन लेखक डब्ल्यू. जी. ज़ेबाल्ड ने एक इंटरव्यू में इस आशय की बात कही थी, आप एक डायरी लीजिए। उसमें दूसरों की लिखी पंक्तियाँ दर्ज कीजिए, लेकिन किसी का भी नाम मत लिखिए। फिर उसे आलमारी में रखकर भूल जाइए। साल-भर बाद जब आप उस डायरी को पढ़ना शुरू करेंगे, तो लगेगा, वे सारी पंक्तियाँ ख़ुद आपने ही लिखी हैं। आप उन्हें इस क़दर अपना मानने लगेंगे कि उन पंक्तियों के स्वामित्व के लिए किसी से भी लड़ लेंगे।

यह दो मस्तिष्कों के एक जैसा सोचने की समकालीनता के बहानों पर क़रारा व्यंग्य है। शायद ज़ेबाल्ड पर यह बीती हो। इसमें कोई संदेह नहीं कि दो मस्तिष्क, एक साथ, एक जैसा सोच सकते हैं, लेकिन दीग़र संदेहास्पद मामलों पर ज़ेबाल्ड ने जिस तरह चुटकी ली है, वह मनोरंजक है।
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समकालीनता का एक अर्थ एक-दूसरे के साथ परोक्ष संवाद भी करना है। ज़ाहिर है, अपनी रचनाओं के माध्यम से। टॉल्स्टॉय और दोस्तोएव्स्की का उदाहरण जगत-प्रसिद्ध है। एक ही देश में रहने, एक ही भाषा में लिखने के बावजूद, दोनों में मुलाक़ात न थी। चिट्‌ठी-पत्री तक न हुई। लेकिन उनके उपन्यास एक-दूसरे की विचारशैली को प्रश्नांकित ज़रूर करते हैं। हर अच्छी किताब भीतर ही भीतर किन्हीं दूसरी अच्छी किताबों के साथ संवादरत होती है। निश्चित है कि दोनों एक-दूसरे का लिखा पढ़ते थे और उस पर एक धारणा भी क़ायम करते थे। इसीलिए तो, दोस्तोएव्स्की के निधन के बाद टॉल्स्टॉय ने कहा था, “मैं दोस्तोएव्स्की से कभी नहीं मिला, न ही उससे मेरा कोई संवाद रहा. लेकिन उसकी मौत की ख़बर सुनने के बाद मुझे महसूस हो रहा है कि एक वही था, जो मेरे लिए सबसे प्यारा और सबसे आवश्यक था।” ऐसी दुर्लभ व ईमानदार उक्तियाँ बहुत कुछ कह देती हैं— ठीक चेखॉव की सलाह की तरह— टॉल्स्टॉय ने इन तीन पंक्तियों में पूर्णिमा का दृश्य नहीं खींचा, टूटी हुई किसी बोतल में बस उसका प्रतिबिंब दिखा दिया है।
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फ़लीस्तीनी कवि महमूद दरवेश अपनी डायरी में लिखते हैं, “अच्छे लेखक की एक प्रमुख निशानी यह है कि वह बहुत जल्द दूसरे लेखकों की अच्छाइयों से प्रभावित हो जाता है और उन्हें अपने भीतर उतार लेना चाहता है। अगर कोई यह कहे कि वह किसी से प्रभावित नहीं, तो मैं उसे कुछ और भले मान लूँगा, अच्छा लेखक तो क़तई नहीं मानूँगा।”
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दो लेखकों को पढ़कर महसूस हो जाता है कि वे समकालीन हैं। वे न सिर्फ़ एक-सी भाषा, बल्कि एक-से प्रश्नों से भी टकराते हैं। आंद्रे जीद और प्रूस्त को पढ़कर भी यह महसूस होता है। प्रूस्त अपने महत्वाकांक्षी उपन्यास का पहला खंड लिखकर आंद्रे जीद के पास ले गए, जिनने उसे पढ़कर बुरी तरह निरस्त कर दिया। फ्रेंच भाषा के सारे बड़े प्रकाशकों ने उसे ख़ारिज कर दिया, जबकि प्रूस्त ने उन्हीं सवालों के आसपास वह किताब बुनी थी, जिसे आंद्रे जीद बरसों से उठाते या छूते आ रहे थे। प्रूस्त का वह उपन्यास मनुष्य-सभ्यता की महानतम कलाकृतियों में से है। उन्हें होमर व शेक्सपीयर के समकक्ष माना जाता है। लेकिन उनकी श्रेष्ठता पकड़ पाने में आंद्रे जीद जैसा जीनियस विफल कैसे हो गया? ऐसा क्यों होता है कि समकालीन या हमउम्र कलाकार अक्सर एक-दूसरे की प्रतिभा को कम आँकते हैं, उपेक्षित करते हैं या नष्ट कर देना चाहते हैं?

आंद्रे जीद— भयंकर, खुर्राट, जघन्य पढ़ाकू, निर्मम लिक्खाड़, युवा प्रतिभाओं की पूरी एक नर्सरी तैयार करने वाला मेहनतकश माली, 1947 का नोबेल विजेता— क्या सच में वह प्रूस्त का ताप सहन नहीं कर पाए थे? अपने आख़िरी बरसों में आंद्रे जीद ने कहा था— “मेरे जीवन का सबसे बड़ा अफ़सोस है कि मैं प्रूस्त को सही समय पर समझ नहीं पाया।”  
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हिंदी में कृष्ण बलदेव वैद को पढ़ते हुए पता चलता है कि वह सैम्युअल बेकेट के समकालीन हैं। सिर्फ़ अनुयायी या प्रभावित नहीं, बल्कि बाक़ायदा बेकेट के समकालीन। नियति व अस्तित्व के पश्चिमी प्रश्नों का परिशोधित पूरबी उत्तर। वहीं, निर्मल वर्मा को पढ़कर यह अंदाज़ा लगा पाना बेहद मुश्किल है कि वह बेकेट या मारकेस या कुंडेरा या अमोस ओज़ के समकालीन हैं। काश, ‘अंतिम अरण्य’ निर्मल वर्मा का पहला उपन्यास होता। तब उनके वितान का फूल शायद और खिलता। एक वैश्विक समकालीनता-बोध में रच-बस पाना कितना मुश्किल है और हम चिंतन के भाषाई फ़ैशन व उसके दायरे को कतरने में किस क़दर अलसाए रहते हैं। हमें जो चीज़ें तोड़ देनी चाहिए, हम उन्हीं के मोह में रहते हैं।
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लेखक के जीवन में मोह से बड़ी बाधा कुछ नहीं। उजागर हो जाने का मोह। छिपे रहने का मोह। हाल के बरसों में उभरे अद्भुत लेखक कार्ल ऊवे केनॉसगोर्द एक जगह कहते हैं, “जिन पंक्तियों को लिखकर मुझे शर्मिंदगी महसूस होती है, मैं उन्हें कभी नहीं मिटाता, क्योंकि उस समय मुझे पता चल जाता है कि मैं सच लिख रहा हूँ और अब मुझे रुकना नहीं चाहिए।”

पुरानी कहावत है कि सच्चा होना और अच्छा होना, दोनों एक साथ होना, बहुत मुश्किल है।
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इंसान का दिल इसका उदाहरण है। दिल हमारे जीवन, कला, प्रेम व अभिव्यक्तियों के केंद्र में है। “तुम्हें देखकर दिल थोड़ा ज़ोर से धड़कता है” इस पंक्ति में एक अमूर्त क़िस्म का झूठ है, जो सुंदर है और जो प्रेम की भावनाओं को बढ़ा देता है। फ़र्ज़ कीजिए, इंसान को सुविधा होती कि वह इस पंक्ति को कहते समय छाती में हाथ डालता, ख़ून से लिथड़ा हुआ दिल बाहर निकालता और ज़ोर देकर कहता, नहीं, मैं झूठ नहीं बोल रहा, ये देखो मेरा असल दिल, कैसे ज़ोर से धड़क रहा, धक-धक, धक-धक...., तब? ख़ून में लिथड़ा हुआ, धड़कता हुआ इंसानी दिल देखकर उबकाई आती, किसी को तो चक्कर भी आ जाता, प्यार की सारी अनुभूति फ़ना हो जाती।

सच्चा होना, यथार्थवादी होना, असलियत दिखा देना भी कई बार समस्यापूर्ण होता है।

शायद इसीलिए कामू कहते थे--- “गल्प वह झूठ है, जो हमें सच के बारे में बताता है।”

हम झूठ की समकालीनता रचते हैं, ताकि एक सार्वकालिक सच की झलक पा सकें।

Comments

Anita Manda said…
"निराशा के पात्र में आशा का आसव।" लाजवाब है।
Ran Baxy said…
बेहद उम्दा लिखा गीत सर।
प्राउस्ट या प्रूस्त, सेबल्ड या जेबाल्ड? सही उच्चारण कैसे पता करते हैं गीत सर?
Harshita Pratap Singh said…
👌👌
Chandra said…
Suuuuuuuunder
Manjusha Singh said…
बहुत ही उम्दा 👏👏
टूटी हुई बोतल में चाँद का चेहरा।👌👌
समकालीनता का एक अर्थ एक-दूसरे के साथ परोक्ष संवाद भी करना है। 👌👌
Pankaj Agrawal said…
शानदार
Ashish Kumar said…
मुरीद हूं मै इन दोनों लेखकों का ।गीत जी ।
Gaurow Gupta said…


❤❤
Yog Maya Singh said…
Bahut hi sundar likha hua. Kudos to you Anurag for holding space for such beautiful pieces of writing.
Amar Singh Amar said…
♥️💯❤️
vijaymaudgill said…
हर अच्छी किताब भीतर ही भीतर किन्हीं दूसरी अच्छी किताबों के साथ संवादरत होती है... स्वाद आ गया गीत जी
reena said…
विचारों की वंशावली होती है,
वाह कितना अनोखा वर्णन

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