अम्बर रंजना पांडेय की नई कविताएं






महानगर में दो नागरिकों के बीच बने पुल की कविताएं 



बृहद जनारण्य को पारकर चार चक्रयान बदलकर
दो नागरिक प्रतिदिन सायंकाल
भग्न मस्जिद को घेरे वन में मिलने आते है

कसे जूते उतार देता है एक नागरिक
दूसरा चमरस निहारता है थोड़ी देर

वह इतने महानगर हो चुके है
कि केवल बचे हुए है मिलने की टूटी पुलिया पर
जैसे चतुष्पंक्तिक विज्ञापन में
बचा रह जाए कोई पूर्णविराम
जिसकी चरितपंजी अब तक हवाईजहाज़ों से
गिरती राख से चिह्नांकित नहीं हुई

इसी पूर्णविराम को आड़ा कर
दो नागरिक प्रतिदिन सायंकाल
एक पुल बना लेते हैं।


वर्ष के अन्त तक, जब अँधेरा जल्दी हो जाता है
दूसरे नागरिक की प्रतीक्षा में पहला नागरिक
इस महानगर में नष्ट होकर यन्त्र हो चुके

एक नागरिक कवि की पुरानी
कविताओं की किताब नहीं पढ़ पाता
चित्रोपम कविताओं की भूमि पर

मोटरवाहनों का शोर, पखेरुओं की पाँत का
सायंकालीन कलरव और ढही हुई गुम्बद में
रहनेवाले नेवले की निशंक नीरवता भर
जाती है

थोड़े रुपयों में से प्रतिदिन यहाँ आने का भाड़ा
इतनी ही बचत है दोनों नागरिकों की
हारीबीमारी में काम आने को।


दूसरे नागरिक के देर से आने का कारण
उसके हाथ में साग का थैला
सम्भवत: यही कारण हो पहला नागरिक
सोचता है या अकारण ही दूसरा नागरिक
देर से आया
यह भेंट कोई शोधपत्र तो नहीं
कि अन्त में शुद्धाशुद्ध सूची जोड़नी पड़े

इस बीच अर्धपठित कविता के उत्तरभाग
दिमाग़ी बहीखाते, सतभैयों की पाँत की पाँत की
बीट, काँस के फूलों से भर जाता है पहले
नागरिक का शीश

“लौटते पुस्तकालय चलोगे क्या? चौदह दिन
ख़त्म मगर किताब आधी ही समाप्त हुई है
लौटाना है”
नागरिक नागरिक से पूछता है
“पूरी की पूरी तो है; किताब समाप्त कहाँ
हुई है!”
नागरिक नागरिक को मना कर देता है


चमगादड़ों से भरे हुए उस उद्यान में
उलूक का दिख जाना वार्तालाप का
विषय बन जाता है
चूहों का आखेट करता नीचे नीचे उड़ता
हिमश्वेत इंडियन बॉर्न उलूक

क्या दोनों नागरिक इतनी दूर से, थके-हारे
यहाँ उलूक की बात करने आते है
उलूक की बात में कितनी कविता है


महानगर में रहने के बाह्यचारों का वहन करते
मित्रता निबाहना, बासकसज्जा जैसी दीपावली
की संझाओं में, निर्जन उद्यान की बेंच पर बैठकर
दूसरे नागरिक का पथ देखना
या बत्ती जलने की प्रतीक्षा करना, इतना सब
सोचने का समय नहीं नागरिकों के पास
उनकी स्मृतियाँ केवल ऋतुओं में है
जैसे ऋतुभर ख़ूब वर्षा होने पर
जब मेघालियाँ छँटकर शुक्रतारे को उजागर
कर देती है

तब उसके नीचे रहनेवाले प्राणियों की क्या
दशा होती होगी? इतना तो दोनों नागरिक
नहीं जानते
हाँ, उन दिनों सिनेमाघर जाना चाहते है
टिकट लेने नहीं, सिनेमा देखकर अन्धेरे से
निकलती भीड़ को बिजली के लट्टुओं में
देखने बस


ऐसा कभी नहीं होगा नागरिक किसी सन्ध्या
एक दूसरे से मिलने न आए
नेत्रों में  जलती भुई बुझने से पूर्व
कवि छोड़ जाएगा कॉपी और क़लम

यह भेंट भी तो उतनी ही भौमिक है
जितने भौमिक भूमि पर चलनेवाले
नागरिकों के ये पाँव
माछी, मच्छर, खटमलों और कोलाहल से
भरे यातायात के साधन, नागरिकों का अपार्थिव
में विश्वास नहीं

माध्यंदिन से ही मिलने का मन उनके
मन को मींजता रहता है, इस मित्रता में कोई
व्याकुल भी नहीं है
बस वर्णसंकर जवा के झाड़ में वैज्ञानिक के
फूल खिलने की प्रतीक्षा जितनी मानुषिक
जिज्ञासा है

जब तक कविता रहेगी तब तक
असंख्य जनसंख्या लाँघकर ये दो नागरिक
कविता में मिलने आते रहेंगे ।
***

(अम्बर रंजना पांडेय की अन्य कविताएं सबद पर यहां पढ़े )

Comments

Sandip Naik said…
कविता अच्छी है

भाई महेश वर्मा और डॉ आशुतोष दुबे को लेकर लिखी अदभुत है यह कविता
Ajanta Deo said…
पूर्णविराम को आड़ा कर लेने की युक्ति केवल कवियों के पास है,और इस युक्ति को बाँटना सम्भव नहीं। कवि की जय हो
Rahul Tomar said…
बहुत सुन्दर
पढ़ आई हूँ अभी..बहुत खूब हैं...
Priya Jeet said…
आभार शेयर करने के लिए
कविताओं की ये शृंखला एक लम्बा गतिमान दृश्य बाँधती है, सीन दर सीन।केवल दो पात्रों की उपस्थिति दिखती है, और फिर अंत होते-होते अचानक तीसरा पात्र- दर्शक/कवि फ़्रेम में आ जाता है...
अर्थपूर्ण

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