Sunday, September 30, 2018

अम्बर रंजना पांडेय की नई कविताएं






महानगर में दो नागरिकों के बीच बने पुल की कविताएं 



बृहद जनारण्य को पारकर चार चक्रयान बदलकर
दो नागरिक प्रतिदिन सायंकाल
भग्न मस्जिद को घेरे वन में मिलने आते है

कसे जूते उतार देता है एक नागरिक
दूसरा चमरस निहारता है थोड़ी देर

वह इतने महानगर हो चुके है
कि केवल बचे हुए है मिलने की टूटी पुलिया पर
जैसे चतुष्पंक्तिक विज्ञापन में
बचा रह जाए कोई पूर्णविराम
जिसकी चरितपंजी अब तक हवाईजहाज़ों से
गिरती राख से चिह्नांकित नहीं हुई

इसी पूर्णविराम को आड़ा कर
दो नागरिक प्रतिदिन सायंकाल
एक पुल बना लेते हैं।


वर्ष के अन्त तक, जब अँधेरा जल्दी हो जाता है
दूसरे नागरिक की प्रतीक्षा में पहला नागरिक
इस महानगर में नष्ट होकर यन्त्र हो चुके

एक नागरिक कवि की पुरानी
कविताओं की किताब नहीं पढ़ पाता
चित्रोपम कविताओं की भूमि पर

मोटरवाहनों का शोर, पखेरुओं की पाँत का
सायंकालीन कलरव और ढही हुई गुम्बद में
रहनेवाले नेवले की निशंक नीरवता भर
जाती है

थोड़े रुपयों में से प्रतिदिन यहाँ आने का भाड़ा
इतनी ही बचत है दोनों नागरिकों की
हारीबीमारी में काम आने को।


दूसरे नागरिक के देर से आने का कारण
उसके हाथ में साग का थैला
सम्भवत: यही कारण हो पहला नागरिक
सोचता है या अकारण ही दूसरा नागरिक
देर से आया
यह भेंट कोई शोधपत्र तो नहीं
कि अन्त में शुद्धाशुद्ध सूची जोड़नी पड़े

इस बीच अर्धपठित कविता के उत्तरभाग
दिमाग़ी बहीखाते, सतभैयों की पाँत की पाँत की
बीट, काँस के फूलों से भर जाता है पहले
नागरिक का शीश

“लौटते पुस्तकालय चलोगे क्या? चौदह दिन
ख़त्म मगर किताब आधी ही समाप्त हुई है
लौटाना है”
नागरिक नागरिक से पूछता है
“पूरी की पूरी तो है; किताब समाप्त कहाँ
हुई है!”
नागरिक नागरिक को मना कर देता है


चमगादड़ों से भरे हुए उस उद्यान में
उलूक का दिख जाना वार्तालाप का
विषय बन जाता है
चूहों का आखेट करता नीचे नीचे उड़ता
हिमश्वेत इंडियन बॉर्न उलूक

क्या दोनों नागरिक इतनी दूर से, थके-हारे
यहाँ उलूक की बात करने आते है
उलूक की बात में कितनी कविता है


महानगर में रहने के बाह्यचारों का वहन करते
मित्रता निबाहना, बासकसज्जा जैसी दीपावली
की संझाओं में, निर्जन उद्यान की बेंच पर बैठकर
दूसरे नागरिक का पथ देखना
या बत्ती जलने की प्रतीक्षा करना, इतना सब
सोचने का समय नहीं नागरिकों के पास
उनकी स्मृतियाँ केवल ऋतुओं में है
जैसे ऋतुभर ख़ूब वर्षा होने पर
जब मेघालियाँ छँटकर शुक्रतारे को उजागर
कर देती है

तब उसके नीचे रहनेवाले प्राणियों की क्या
दशा होती होगी? इतना तो दोनों नागरिक
नहीं जानते
हाँ, उन दिनों सिनेमाघर जाना चाहते है
टिकट लेने नहीं, सिनेमा देखकर अन्धेरे से
निकलती भीड़ को बिजली के लट्टुओं में
देखने बस


ऐसा कभी नहीं होगा नागरिक किसी सन्ध्या
एक दूसरे से मिलने न आए
नेत्रों में  जलती भुई बुझने से पूर्व
कवि छोड़ जाएगा कॉपी और क़लम

यह भेंट भी तो उतनी ही भौमिक है
जितने भौमिक भूमि पर चलनेवाले
नागरिकों के ये पाँव
माछी, मच्छर, खटमलों और कोलाहल से
भरे यातायात के साधन, नागरिकों का अपार्थिव
में विश्वास नहीं

माध्यंदिन से ही मिलने का मन उनके
मन को मींजता रहता है, इस मित्रता में कोई
व्याकुल भी नहीं है
बस वर्णसंकर जवा के झाड़ में वैज्ञानिक के
फूल खिलने की प्रतीक्षा जितनी मानुषिक
जिज्ञासा है

जब तक कविता रहेगी तब तक
असंख्य जनसंख्या लाँघकर ये दो नागरिक
कविता में मिलने आते रहेंगे ।
***

(अम्बर रंजना पांडेय की अन्य कविताएं सबद पर यहां पढ़े )

Thursday, September 27, 2018

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 21 : सिल्विया वाले गेरीन की नई फिल्म





मैं इस धरती पर रहने वाले उन चंद लोगों में से हूँ, जो ‘इन द सिटी ऑफ़ सिल्विया’ को सिनेमा-इतिहास की महानतम फिल्मों में से एक, और इसी कारण, इसके निर्देशक ख़ोसे लुईस गेरीन को बहुत ऊँचे पाये का कलाकार मानते हैं. जब भी मैं उनकी नई फिल्मों के बारे में सुनता हूँ, उत्साह व व्याकुलता से भर जाता हूँ, हालाँकि उन्हें हासिल करने में बहुत प्रयास, श्रम व समय लगते हैं.

1960 में जन्मे गेरीन स्पेन के फिल्मकार हैं.  वह आसान व पारंपरिक फिल्में नहीं बनाते. गल्पेतर औज़ारों से गल्प की रचना करते हैं. और इसे जितना आकर्षक माना जाए, होता यह उतना ही कठिन है. अधिकांश सिने-कथाएँ पोएटिक जस्टिस के आधार पर चलती हैं, उसे हटा दिया जाए, तो सिनेमा का ऐसा फिक्शन भहराकर गिर जाए, गेरीन सबसे कम चिंता इसी पोएटिक जस्टिस की करते हैं, बल्कि पोएटिक रहस्य को कहीं अधिक मान देते हैं. हर दृश्य में एक रहस्य है, जिसे कभी सुलझाया नहीं जा सकता, क्योंकि दृश्य अपने आप में एक परदा है. उनकी फिल्म ‘द अकैडमी ऑफ़ म्यूज़ेस’ उस परदे के पार झाँकने की कोशिश है. इसे देखे हुए मुझे साल से ऊपर हो रहा, लेकिन मैं अब भी उसे पूरी तरह सोख नहीं पाया हूँ.

पहले म्यूज़ शब्द के बारे में कुछ बातें कह दूँ, जो कि इस फिल्म के शीर्षक में है. म्यूज़ यानी कविता रचने की प्रेरक-शक्तियाँ. यूरोपीय काव्य-परंपरा मानती है कि हम अपने आप कविताएँ नहीं लिखते, बल्कि अदृश्य म्यूज़ेस हैं, जो हमसे कविता लिखवाती हैं. होमर की ‘ओडिसी’ की शुरुआत ही इस मंगलाचार से होती है कि हे म्यूज़, मुझे उस महानायक के बारे में बताओ, आदि आदि. उनकी परंपरा ऐसी नौ प्रेरक-शक्तियाँ मानती है. एक कवि के ऊपर सारी प्रेरक-शक्तियाँ या म्यूज़ेस मेहरबान नहीं होतीं. किसी पर प्रेम की म्यूज़ मेहरबान है, तो किसी पर युद्धाख्यानों की. वे लोग महाकवि बन जाते हैं, जिन पर एक से अधिक म्यूज़ की कृपा होती है. होमर पर सबसे कृपालु म्यूज़ कलायोपी थी, उन्होंने युद्ध व तलाश से भरा महाख्यान लिखा. सैफ़ो ने प्रेम व कामुकता पर लिखा, उनकी म्यूज़ एरातो थी. इस तरह, हर प्राचीन कवि को किसी न किसी म्यूज़ के साथ जुड़ा हुआ माना जाता है. आधुनिक कविता में म्यूज़ के प्रति यह मान्यता कमज़ोर हुई है, लेकिन साहित्य के मुहावरों में यह अब भी बेहद लोकप्रिय है. मेरी पढ़त में चेस्वाव मीवोश आख़िरी यूरोपीय महाकवि हैं, जो यह कहने में क़तई लाज या झिझक महसूस नहीं करते थे कि वह ख़ुद कविता नहीं लिखते, बल्कि कोई म्यूज़ उनसे लिखवाती है. 

परंपरा में म्यूज़ सिर्फ़ स्त्रियाँ हैं. इसीलिए, कवि की प्रेरणा या प्रेमिका बनी स्त्री को भी म्यूज़ कहा जाने लगा. इस फिल्म में स्पेन की एक यूनिवर्सिटी में साहित्य का एक अधेड़ प्रोफ़ेसर लड़कियों से भरी एक कक्षा को म्यूज़ेस के बारे में पढ़ाता है. इस बहाने वह उनके साथ प्रेम व सेक्स भी कर लेता है. (यह एंगल देखते ही मुझे फिलिप रॉथ का नॉवल ‘द डाइंग एनिमल’ याद आता है, जिस पर एक अन्य स्पैनी फिल्मकार इज़ाबेल कूशेत ने हॉलीवुड के लिए ‘एलीजी’ बनाई थी और जिसमें पेनेलोपे क्रूस ने साधारण लेकिन बेन किंग्सले ने सुंदर अभिनय किया था.) क्लासिक इतालवी व अन्य यूरोपीय कविता को आधार बना वह प्रोफ़ेसर एक ऐसा स्कूल बनाना चाहता है, जो पूरी तरह इन म्यूज़ को समर्पित हो, जो कविता के प्रति प्रतिबद्ध लोगों की एक नई दुनिया ही बना दे. छात्राओं के साथ प्रेम को वह अपनी इसी योजना के लिए आवश्यक रिसर्च का एक हिस्सा-भर मानता है. उसकी पत्नी को उस पर संदेह होने लगता है. तब शब्द, कविता, प्रेम व कामनाओं पर एक गहरी बहस शुरू होती है. पूरी फिल्म यही विमर्श है. कहानी इससे अधिक नहीं. लेकिन कहानी ढूँढ़ने के लिए कौन गेरीन की फिल्म देखना चाहेगा? सिर्फ़ वही, जो गेरीन से नावाक़िफ़ हो.  और सच कहें, तो इतनी-सी कहानी भी कितनी अधिक है! रोबेर्तो बोलान्यो या सेसार आइरा इतने पर ही पूरा उपन्यास खींच सकते हैं. 


‘सिल्विया’ में जितनी ख़ामोशी है, ‘म्यूज़ेस’ में उतने ही संवाद हैं. शब्द, प्रेम व कामना के पहलुओं को जाँचते-प्रश्नांकित करते इन संवादों में भी, ज़ाहिर है कि, दर्शन व कविता ही हैं. जैसे एक जगह प्रोफ़ेसर की पत्नी रोसा कहती है, ‘कविता ने जो सबसे बुरा व सबसे ख़तरनाक काम किया है, वह है प्रेम की खोज.’ जो लोग प्रेम को कविता से बड़ा मानते हैं, वे इससे सहमत नहीं होंगे, लेकिन अपने आप में यह वाक्य एक गहरी दार्शनिक अनुगूँज लिए चलता है और यह बताता है कि निर्देशक, प्रेम व कविता को कितनी ऊँचाई पर खड़े होकर देख रहा है. यहाँ मुझे याद आता है कि ऋग्वेद में सृष्टि को कविता व अथर्ववेद में कवि को ईश्वर का पर्यायवाची शब्द माना गया है. इन मिथकीय आधारों पर सोचें, तो एक तर्क आसानी से बन सकता है कि मनुष्य व उसकी अनुभूतियों की रचना से पहले ही काव्य-रचना हो चुकी थी व अनुभूतियों की खोज का श्रेय व दोष कविता को है.  

फिक्शन ने हमारी कलात्मक अभिरुचियों पर ख़ास क़िस्म के दुष्प्रभाव भी डाले हैं. आज से नहीं, बहुत प्राचीन काल से ही. अलग-अलग युग की कविताओं को अगर ध्यान से पढ़ा जाए, तो एक बुनियादी बात यह समझ में आती है कि बिना कथा के कोई कविता संभव ही नहीं होती. चाहे महाकाव्य हो या कुछ और, कविता को कथा कहने के एक माध्यम की तरह उपयोग में लाया जाता रहा है. अगर वह कथा हटा दी जाए, तो कविता संकट में आने लगती है. जो कविताएँ, कथा नहीं कहतीं, उनमें भी हम तार्किकता व कथात्मकता की कल्पना करने लगते हैं. हमारी बुनियादी कोशिश यह नहीं होती कि हम कविता को समझ लें, बल्कि हमारा सारा प्रयास उसमें छुपी कथा को समझने में लगता है. वह कथा समझ में आ गई, तो हमें लगता है, हमने कविता समझ ली. स्कूलों में कविता की पढ़ाई भी इसी तरह करवाई जाती है. सिनेमा भी मुख्यत: कथा-प्रधान गतिविधि है. मान लीजिए, हमने एक तस्वीर देखी, जिसमें सूर्योदय है. वह कई प्रतीकों व चिह्नों से बनी होगी. हर प्रतीक व चिह्न की अपनी कथा होती है. सूर्य, नारंगी रंग, समुद्र, नदी, परछाईं, हमारे दिमाग़ में इनके अर्थ व कथाएँ हैं. सारी कथाओं को जोड़कर हम अपनी एक कथा बना लेते हैं. इस तरह जीवन व कला की हमारी समझ पर कथा-युक्तियों का वर्चस्व है. व्यापक अर्थों के संधान के लिए हमें कथा की इस बाधा को पार करना होगा. दृश्य को समझने के लिए दृश्य के पार देखना होगा. 


गेरीन ने इस फिल्म में इसका बारीक संकेत दिया है. और यह अपने आप में बेहद सुखद, आश्चर्यकारी व दिलचस्प है कि कविता के अंतर्लोक पर सिनेमा बनाते हुए वह इस तरह का प्रयोग करते हैं. पहली बात तो यह कि उन्होंने सोनी के बेहद साधारण हैंडीकैम से यह फिल्म शूट की है, क्योंकि उनके पास पैसे ही नहीं हैं. उसमें कुछ दृश्य तो अद्भुत व यादगार बने हैं, जैसे चमकते सूरज तले नदी के बीच आधी डूबी खड़ी लड़की. लेकिन यह कोई ख़ास बात नहीं, क्योंकि ज़्यादा अच्छे कैमरों से ऐसे दृश्य और भी सुंदर तरहों से फिल्माए जाते रहे हैं. दृश्यों की भव्यता व सौंदर्य, अब कलात्मक कम, व्यावसायिक पक्ष अधिक बन गया है. इसलिए, बदलते हुए वक़्त में सुंदर व आकर्षक दृश्यों को मैं श्रेष्ठ कला के रूप में नहीं देख पाता. मेरा उनसे कोई विरोध नहीं, मुझे वे पसंद भी हैं, जैसे आंग ली, स्पीलबर्ग, वोंग कार-वाई, त्रान आन्ह हुंग या झांग यिमू के चमकदार दृश्य. यिमू तो इस मामले में अद्वितीय हैं. वह रंगों व दृश्यों का सम्मोहक मायाजाल बुन देते हैं. ‘द कर्स ऑफ़ गोल्डन फ्लॉवर’ की सुनहरी भव्यता, ‘रेज़ द रेड लैंटर्न’ की छल-भरी लालिमा या ‘द हाउस ऑफ़ फ्लाइंग डैगर्स’ का रंग-वैविध्य, जहाँ अवसाद का रंग नीला नहीं, हरा है, जहाँ क्रूरता लाल से नहीं, सफ़ेद से दिखती है. ये सभी कलात्मक दृश्य व यथार्थ की कलात्मक व्याख्याएँ हैं, लेकिन उसके बावजूद, मुझे ऐसा लगता है कि, इनके सौंदर्य की रचना में कला से अधिक, व्यावसायिक दबावों का योगदान है. व्यावसायिकता, सिनेमा पर पड़ने वाला अनिवार्य दबाव है, और उसे उपेक्षित नहीं किया जा सकता, क्योंकि सिनेमा बनाने में बहुत पैसे लगते हैं और टिकट-खिड़की से उस पैसे को वापस पा लेने की इच्छा की अवमानना नहीं करनी चाहिए, लेकिन तब उसे उच्चतम स्तर की कला कहने का दावा भी नहीं करना चाहिए. जो कला आपको जीवन की अनजान गहराइयों तक ले जाए, वही उच्चतम स्तर की हो सकती है. जिस कला पर व्यावसायिकता का अनिवार्य दबाव हो, वह आपको अनजान गहराइयों तक नहीं, बल्कि महज़ जानी-पहचानी गहराइयों तक ही ले जाती है. इसी दबाव के कारण वह अनजान तक जाने का जोखिम नहीं उठा पाती.  एक उदाहरण देता हूँ- भव्य दृश्य देखकर हमारे मुँह से तुरंत एक ‘वाह’ या ‘वॉव’ निकलता है, हमारी आँखें चौंधिया जाती हैं. ‘वाह’ जितनी जल्दी निकलेगी, इसका अर्थ है कि कला अधिक गहराई तक नहीं पहुँच पाई. वह एक ऐसी जानी-पहचानी गहराई तक पहुँची है, जहाँ पहले से आपकी एक ‘वाह’ रहती है. उस जानी-पहचानी गहराई तक पहुँचकर उसने आपकी उस निश्चित ‘वाह’ को जगा दिया. सवाल यही बनता है कि क्या वह उस अनजान गहराई तक पहुँच पाई है, जहाँ पर रहने वाली ‘वाह’ को अभी आप ख़ुद ही पहचान न पाए हों? 

चाहे आंग ली हों या झांग यिमू, इनके दृश्यों का वाचाल सौंदर्य, धरातल का सौंदर्य-मात्र है, गहराई का नहीं, क्योंकि उस सौंदर्य की सराहना, हम बिना अपनी बुद्धि लगाए आँख के एक अभ्यस्त प्रयोग-मात्र से ही कर सकते हैं. वह महज़ ऐंद्रिक है, महज़ चाक्षुष है, महज़ सेंसुअस है. यह दृश्य को दृश्य की तरह महसूस करना मात्र है. उसकी सराहना करने से बहुसंख्यक लोगों की कला की भूख मिट जाती है. लेकिन गेरीन जैसे फिल्मकार अर्थ व सौंदर्य के धरातल पर नहीं बैठते. 

इसे इस तरह भी कह सकता हूँ कि अधिकतर शायरों की ग़ज़ल का एक साधारण शेर तुरंत ‘वाह’ निकालता है, लेकिन ग़ालिब का एक शेर, अच्छे-से समझने में बरसों लग जाते हैं, क्योंकि ग़ालिब आपको अनजान गहराइयों तक ले जाते हैं. कोई कह सकता है कि हम ग़ालिब के भी कई शेरों पर तुरंत ‘वाह’ करते हैं, लेकिन उस समय यह नहीं भूलना चाहिए कि इन डेढ़ सौ बरसों में परंपरा ने कई सारे तरीक़ों से उन शेरों की अनजान गहराई हमें इस तरह समझा दी है कि अब हमारे लिए वह एक अभ्यस्त गहराई बन चुकी है.


कहने का अर्थ यह है कि गेरीन का सौंदर्य दृश्य में नहीं, दृश्य के पार देखने में निहित है. जब आप अदृश्य को देखना चाहते हैं, तब दृश्य एक पारदर्शी परदे की तरह उपस्थित हो जाता है. इसीलिए, ‘द अकैडमी ऑफ़ म्यूज़ेस’ के अधिकांश दृश्यों को फिल्माते समय गेरीन ने कैमरे के आगे एक काँच रख दिया है. जिन दृश्यों में कविता पर बहस हो रही है, उन दृश्यों को हम सीधे नहीं, बल्कि पारदर्शी काँच के पार से देखते हैं. दुनिया के बौद्धिक-जगत में इस फिल्म पर अधिक बात नहीं हो रही. और जो अमेरिकी इस पर बात कर भी रहे हैं, उनमें से अधिकांश इस पर नाराज़ हैं कि गेरीन ने अपने कई दृश्यों में काँच का यह पारदर्शी परदा क्यों लगा दिया है? जैस हम पूरी फिल्म खिड़की के पार से देख रहे हों? ज़ाहिर है, उन्होंने ‘सिल्विया’ देख रखी है, जिसके दृश्य बेहद सुंदर, सुस्पष्ट व धुले-पुँछे हैं. उन्होंने नई फिल्म में भी गेरीन से वही उम्मीद की होगी, और स्पष्ट है कि, निराश हुए हैं. 

मुझे इससे कोई नाराज़गी नहीं, बल्कि मैं तो इस पर ताली बजाना चाहता हूँ. मेरे दृष्टिकोण में यह गेरीन के भीतर का कवि है, जो उपेक्षित धुँधलेपन को व्याकरण की तरह प्रयोग करना चाहता है. गेरीन संभवत: यह बताना चाहते हैं कि दृष्टि व दृश्य के बीच, यथार्थ व हमारे बीच, कविता व हमारे बीच, भाषा व हमारे बीच, शब्द व अर्थ के बीच एक अपरिभाषित पारदर्शी परदा लगा हुआ है. हम उसके पार के दृश्य को देख रहे हैं, लेकिन साथ ही साथ उस काँच पर पड़ने वाली अन्य परछाइयों व प्रतिबिंबों को भी देख रहे हैं. यानी हम पूरी कोशिश के बाद भी एक शुद्ध दृश्य नहीं देख पा रहे. यह अपने आप में कितनी बड़ी व सुंदर कथा-युक्ति है. हम दृश्य का अर्थ समझ लेने के लिए व्याकुल हैं, लेकिन गेरीन बताते हैं कि तुम्हारी बुद्धि व समझ तो कथा-युक्तियों के परदे को हटा ही नहीं सकती, तुम असली अर्थ क्या समझोगे?

कथा-युक्तियों से संचालित होने वाली हमारी कलात्मक समझ, अंतत: कथा-युक्ति को ही पार करने में नाकाम रहती है.

एक अच्छा कलाकार, सौंदर्य की परिभाषाओं को बहुत सूक्ष्म स्तर पर बदलता चलता है. पाँच सौ साल पहले सुंदरता की जो परिभाषा थी, उसमें काफ़ी बदलाव आ गया है, तो इसका श्रेय उन विलक्षण कलाकारों को है, जिनकी अंतर्दृष्टियों ने हमें एक नई दृष्टि दी है. गेरीन का काँच सौंदर्य की चाक्षुष नहीं, बौद्धिक परिभाषा पर ज़ोर दे रहा है. जिसे असुंदर माना जाए, उसमें सौंदर्य का तत्व खोजने से आपको तुरंत स्वीकृति नहीं मिलने वाली. संभव है कि फ़ौरी तौर पर आपकी आलोचना ही की जाए. यहाँ मुझे अप्रतिम मेक्सिकन फिल्मकार कार्लोस रेगादास की फिल्में याद आ रही हैं. सिनेमा, चाहे वह जैसा भी हो, सुंदर चेहरे वाले अभिनेताओं को प्राथमिकता देता रहा है. अभिनय आए या न आए, चेहरा सुंदर हो, तो मामला बन जाता है. रेगादास की फिल्में जैसे ‘बैटल इन हैवन’, ‘जापान’, ‘साइलेंट नाइट’ सौंदर्य की इसी मान्य अवधारणा को ध्वस्त करती हैं. उनके अभिनेताओं को स्पष्ट तौर पर कुरूप कहा जा सकता है. उनकी फिल्मों में यौन-दृश्य भी पर्याप्त होते हैं. आमतौर पर यौन-दृश्यों में स्त्री व पुरुष देहों की सुंदरता, गठीलापन, कटा-छँटा-चर्बीरहित-निखरा हुआ शरीर ही दिखाया जाता है. फिगर व बॉडी-शेप के प्रति आग्रह इसी व्यवसाय की उपज हैं. रेगादास की फिल्में इस अवधारणा या रुझान को अपने तरीक़े से प्रश्नांकित करती हैं. दो ऐसे शरीर, जो मान्य परिभाषाओं पर कहीं से सुंदर नहीं माने जा सकते, उनके बीच अभिसार के दृश्य, उनकी निपट निर्वस्त्र देहें— दृश्य व अदृश्य, मान्य व अमान्य के बीच अर्थ के नए वितान रचती हैं. 

‘म्यूज़ेस’ में गेरीन इन्हीं मान्य परिभाषाओं के साथ एक जिज्ञासु छेड़छाड़ कर रहे हैं. दो महान फिल्मकारों रोबेर ब्रेसाँ और यासुजिरो ओज़ू की तरह अपने इस काम में वह नॉन-एक्टर्स का प्रयोग करते हैं. जब कोई फिल्मकार ऐसा करता है, तब वह अभिनय की मान्य व सांस्थानिक परिभाषा के साथ भी छेड़छाड़ करता है. गेरीन जैसा अल्प-भाषी, अल्प-यशी जीनियस जब अपने समय के कलात्मक परिदृश्य में ऐसा हस्तक्षेप करे, तो मेरी नज़र में, उस पर बहुत ध्यान से सोचना चाहिए. उनकी यह फिल्म आसानी से उपलब्ध नहीं है. दो साल पहले विशाल स्पेन में यह सिर्फ़ छह सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी. अमेरिका में भी लगभग इसी पैमाने पर. हाँ, कुछ फिल्मोत्सवों का हिस्सा ज़रूर बनी. और जहाँ-जहाँ पहुँची है, वहाँ-वहाँ इसने उत्सुकता जगाई है. मुझे लगता है कि ‘सिल्विया’ की तरह यह भी धीरे-धीरे फैलेगी, क्योंकि एक त्वरित वाह, एक त्वरित स्वीकृति, एक त्वरित प्रसार गेरीन जैसे कलाकारों के लिए न तो अभीष्ट है, न ही नियति.


Saturday, September 22, 2018

स्मरण : विष्णु खरे





जीनियस कवि का प्रस्‍थान
(वे शेष विश्‍व के लिए भारतीय कविता की तरफ से सबसे प्रभावशाली प्रविष्टि थे)
कुमार अम्‍बुज

कवि विष्‍णु खरे से मेरी शुरुआती 'पहचान, 'पहचान' सीरीज में प्रकाशित पुस्तिका से हुई लेकिन गहन परिचय उनके संग्रह 'सबकी आवाज के पर्दे में' से हुआ। तब इंदौर में चंद्रकांत देवताले जी के भाई के फ्लैट में किराये से रहता था और 1994 की सर्दियों में अपार्टमेंट की छत पर उस संग्रह को धारोष्‍ण सुबह से लेकर धूप ढलने तक पढ़ता रहा। तब तक उनकी वह प्रसिद्धि भी आ ही चुकी थी जिसकी वजह से कोई भी युवतर कवि उनसे मुलाकात करना प्राय: स्‍थगित कर देता था। यह जानते हुए भी कि वे बीच-बीच में देवताले जी के पास अकसर इंदौर आते रहते थे, मैंने मुलाकात के एवज में उन्‍हें पत्र लिखना पसंद किया। दरअसल, उस संग्रह की तमाम कविताओं के अलावा 'दृष्टिफेन' शीर्षक कविता का मैं मुरीद हो गया था। जिस पर एक लंबी टिप्‍पणी भी करीब 12 बरस बाद लिखी गई। बहरहाल, उनका जवाब आया और फिर देवताले जी के घर से ही लंबी, अविस्‍मरणीय और संपन्न करनेवाली मुलाकातों का सिलसिला शुरु हुआ। तब मैंने आविष्‍कार किया कि उनके स्‍वभाव के बारे में प्रचलित लगभग सारी बातें अतिरंजित हैं। सच्चाई यह थी कि उन्‍हें कुछ भी औसत दर्जे का अथवा दोयम बर्दाश्‍त नहीं होता था इ‍सलिए उनकी छबि उग्रगुस्‍सैलअहंकारी की तरह प्रचारित हुई लेकिन उनका सामीप्‍य हासिल करनेवाले जानते हैं कि वे बेहद संवेदनशील,आत्‍मीय और मित्रता से संचरित थे।

यहॉं, उन मुलाकातों को घटनाओं के विवरण में नहीं बदलूँगा लेकिन उनसे हासिल कुछ बातों को याद करना चाहता हूँ। जैसे, यह एक मजेदार बात थी कि यदि वे किसी से नाराज हों तो उसके क्षमा माँगने भर से उसे माफ नहीं करते थे लेकिन उसके अच्‍छे रचनाकर्म के सामने आते ही न केवल उसे माफ कर देते थे बल्कि उसकी प्रशंसा दुनिया भर में करने की कोशिश करते थे। वे दूसरे लेखकों को हमेशा उनके रचनाशीलता के स्‍तर से मूल्‍यांकित करते थे, लेखक के स्‍वभाव या सतही चीजों से नहीं। विडंबना यह रही कि हिंदी का शेष साहित्‍य समाज उनकी रचनाशीलता पर बात करते हुए उनके स्‍वभाव को आगे रखता रहा।

उनके श्रम, अध्‍यवसाय, ज्ञान, साहित्‍य-विवेक, जटिल और कठिन के प्रति जिज्ञासा, अनंत और अज्ञात में भी प्रवेश करने की उत्‍कट इच्‍छा से आप प्रेरित हो सकते थे लेकिन उन जैसा होना, उनका अनुकरण करना नामुमकिन था। क्‍योंकि वे महज नै‍सर्गिक अर्थ में जीनियस नहीं थे। उनमें प्रतिभा, महत्‍वाकांक्षा और पसीने का अद्भुत मिश्रण था। उन्‍होंने 'जीनियस' होने को रोजमर्रा के जीवन से गुजरते हुए, लोहा लेते हुए, असमाप्‍त जिद और श्रेष्‍ठता की चाह से अर्जित किया था। इसलिए वे गुणात्‍मक रूप से ही नहीं, मात्रात्‍मक रूप से भी विपुल और वैविध्‍य भरा काम कर सके। वे किसी विषय में जिज्ञासु की तरह प्रवेश करते थे लेकिन विशेषज्ञ की तरह बाहर आते थे। शायद वे ऐसे अभिमन्‍यु थे जो चक्रव्‍यूह से विजयी होकर निकलना भी जानते थे और उन्‍होंने यह महज गर्भ में रहकर नहीं जाना था बल्कि जीवन जीते हुए सीखा। न तो वे पूरी नींद सोए और न ही किसी को सोने दिया। यह जगराता जितनी उनकी उपलब्धि है, उससे कहीं ज्‍यादा हिंदी कविता की।

वे 'चौबीस गुणा सात' के लेखक थे। यदि कवि होना हमारे समाज का समालोचक होना है तो वे हमारे समय के सबसे बड़े और महान कवि थे। उनके पास एक सच्‍चे कवि की स्‍कैनर दृष्टि थी। इसलिए उनका डायग्‍नोसिस हमेशा ही अचूक रहा। इस मायने में वे रेडियोलॉजिस्‍ट ही नहीं, मॉस्‍टर ऑव मे‍डिसिन और मॉस्‍टर आवॅ सर्जरी भी थे। डीएम और एमसीएच भी। उनकी जीवन-दृष्टि में संसार भर के अंतिम आदमी के लिए तकलीफ, उसकी बेहतरी की फिक्र, सामाजिक समानता और समाजवादी लोकतंत्र की आकांक्षा हमेशा बनी रही। उन पर बात करते हुए कभी इस पक्ष को अ‍लक्षित या गौण नहीं किया जाना चाहिए कि वे वामपंथी और मार्क्‍सवादी लेखक थे। व्‍यक्ति के तौर पर भी। इस पक्ष की उपेक्षा करते हुए विष्‍णु जी पर लिखना एक अपराध की तरह या चालाकी की तरह देखा जाना चाहिए। उन्‍होंने हमेशा सर्वसत्‍तावाद से ग्रसित संस्‍थानों, व्‍यक्तियों और संगठनों का सक्रिय विरोध किया, बहिष्‍कार किया। वे अभिधा, लक्षणा और व्‍यंजना- तीनों अर्थों में राजनीतिक कवि थे। भारत देश की मुश्किलों को और जातिगत समस्‍याओं, खासकर दलितों की स्थितियों को ध्‍्यान में रखते हुए वे आम्बेडकर से प्रभावित हुए और अपने को मार्क्‍स-आम्‍बेडकरवादी कहना पसंद किया। एक देसज किस्‍म का वामपंथ उनके स्‍वप्‍न का हिस्‍सा सदैव बना रहा। जाहिर है कि फासिज्म, सांप्रदायिकता, किसी भी तरह का दक्षिणपंथ और जातिभेद उनके निशाने पर होने ही थे। जो लोग अपने घरों में काम करनेवालों के लिए चाय के कप या बर्तन अलग रखते थे उसे वे बहुत आपत्ति के साथ देखते थे और इस पक्ष से उनके आडंबर और पिछड़ेपन को, सामंतवाद और मनुष्‍यविरोध को पकड़ते थे। वे चापलूसी और प्रेम का फर्क एकदम पहचान लेते थे और इससे उनको लोगों ने बहुत मुश्किलें पेश कीं।

इन सब चीजों से उनके कवि का निर्माण होता था।

रिल्‍के की कविता 'फॉर द सेक ऑव ए सिंगल पोएम' में वर्णित अपेक्षा और अर्हता को जैसे वे अपनी हर कविता में प्राप्‍त करते रहे। यही वजह है कि सिर पर मैला ढोने की अमानवीय प्रथा, जिनकी कोई दूकान नहीं होती है, जो टेम्‍पो में घर बदलते हैं, बँगले, जिल्‍लत, बेटी, गुंग महल, वृंदावन की विधवाऍं, शिविर में शिशु, लड़कियों के बाप, घर, आलैन जैसी कविताऍं लिखते रहे। यहॉं उनकी राजनीतिक, घर-गृहस्‍थी, विज्ञान और मिथक संबंधी कविताओं की सूची भी बनाई जाए तो शताधिक कविताऍं मिलेंगी जिन्‍हें हम आज हिंदी की धरोहर और मूल्‍यवान कविताओं की तरह छाती से लगाकर, कुछ गर्व के साथ आगे बढ़ सकते हैं। भाषा की तीनों शक्तियों में उन्‍होंने कविता संभव की और लय, तुक, आंतरिक लय आदि की रूमानियत से हिंदी कविता को हमेशा के लिए मुक्‍त कर दिया। वे तारों, ग्रहों, आकाशगंगाओं और पारलौकिकता को कविता में लिखते हुए उसे पार्थिवता और लौकिकता में लाकर ही मोक्ष प्रदान करते थे।

वे मुझे कितना स्‍नेह करते थे, मेरी योग्‍यता से अधिक मान देते थे, हमारे समय के नवीनतम लेखन पर कितने उत्‍साह, लगाव और चिंता से बात करते थे, मेरे लिए कितने अधिक पारिवारिक थे, उनसे हास-परिहास और कुश्‍ती के तो कितने अविस्‍मरणीय क्षण दर्ज हैं, यह सब लिखना अभी वांछित नहीं। (केवल एक तात्‍कालिक प्रसंग से एक निजी अफसोस यह है कि 'प्रतिनिधि कविताओं' की भूमिका लिखने के बाद उन्‍होंने मुझसे कहा था कि जब दूसरा संस्‍करण आएगा तो इसमें कुछ और शब्‍द जोड़ना चाहूँगा क्‍योंकि मैं उसमें 'अतिक्रमण' और 'अमीरी रेखा' की कविताओं के बारे में कुछ अधूरा ही लिख सका था। अभी अगस्‍त में इसका दूसरा संस्‍करण आया लेकिन जब प्रकाशक की तरफ से मुझे ही सूचना नहीं मिली तो मैं भला उनको क्‍या बता सकता था। उनकी विनम्रता, बड़प्‍पन और निराभिमानी होने का इससे बड़ा उदाहरण क्‍या हो सकता है कि उन्‍होंने इस 'चयन और भूमिका' का प्रसन्‍नतापूर्वक, आग्रही होकर कार्यभार तब हाथ में लिया जब उन सरीखे कवि की उपेक्षा करते हुए, उनसे कनिष्‍ठ और कम महत्‍वपूर्ण कवियों के 'प्रतिनिधि कविताऍं' के संकलन प्रकाशित किए जा रहे थे। यहॉं यह बताना उचित है कि इस बारे में मैंने अपना प्रतिवाद निजी तौर पर दर्ज कराया था कि उनका प्रतिनिधि संग्रह पहले आना चाहिए। लेकिन वह बाद में आया। वह कथा फिर कभी। क्‍योंकि विष्‍णु जी को किसी बात के लिए राजी करना भी एक बड़ा काम था। बहरहाल।)

उन्‍होंने अपने हर रूप में मनुष्‍य की पीड़ा, उसकी सामूहिकता की मुश्किलों, जरूरतों और चुनौतियों पर अपनी प्रखर टीपें दर्ज कीं। मॉं-बहन की गालियॉं भी उनकी कविता में समाज में व्‍याप्‍त और होमो सेपियन की क्रूरता को ही रेखांकित करती रहीं, भाषा में अनिवार्य विशेषण और क्रोध के वाहन की तरह। करुणा उनकी कविता में प्रच्‍छन्‍न रही। और कई कविताओं में प्रधान तत्‍व के रूप में। सबसे महत्‍वपूर्ण पक्ष तो दरअसल यह है कि किसी के लिए भी उनकी बहुआयामिता, विविधता और सर्जनात्‍मकता से भरा अराजक व्‍यक्तित्‍व एक विशाल चुनौती पेश करता है कि आखिर उनका मूल्‍यांकन समग्रता में किस तरह किया जाए। वे एक विराट उपस्थिति थे। कविता में वे अनवरत अन्‍वेषी और वैज्ञानिक की तरह पेश आते थे। सिनेमा, संगीत, पत्रकारिता, व्‍याख्‍यानकर्ता, संपादक, अनुवादक आदि भूमिकाओं के बारे में लिखना तो सैंकड़ों पृष्‍ठों की मॉंग करेगा। प्रस्‍तुत समकालीन राजनीतिसत्‍ताविमर्श और फासिज्‍म के खतरों को लेकर वे हमेशा चिंतित थे। विश्‍लेषण से भरे हुए और प्रतिकार के लिए उद्यत। उनके अवसान से हिंदी साहित्‍य और चिंतन में प्रतिवाद का, प्रतिरोध कासकर्मक आशा और कलागत अभिनव श्रेष्‍ठता का सबसे प्रभावी स्‍वर क्षीण हो गया है। ध्‍यान से विचार करें कि संसार के समकालीन सर्वोत्‍त्‍ाम कवियों में से एक कवि हिंदी के पास था, जो अब नहीं है। वे शेष विश्‍व के लिए हिंदी की तरफ से, भारतीय कविता की तरफ से सबसे प्रभावशाली प्रविष्टि थे।

हिंदी में वे मुक्तिबोध के सच्‍चे और इकलौते उत्‍तराधिकारी हैं। जिन्‍होंने अपने उत्‍तराधिकार की संपत्ति में कुछ इजाफा किया है। वे एक ऐसे कवि थे जिन्होंने अपने समय के सबसे नए कवि से भी चुनौती ग्रहण करना पसंद किया। हमने युवा रचनाशीलता का एक बड़ा हितैषी खो दिया है। दरअसल, वे अपने सामने पेश हर श्रेष्‍ठता के प्रशसंक थे और अपने लिए भी उसे एक मानक बनाकर उसके पार जाना चाहते थे। वे अपनी छलॉंग के लिए रोज की अपनी 'बार' को कुछ इंच ऊँचा कर लेते थे। आखिर में जितनी ऊँचाई पर वे अपनी यह 'बार' छोड़कर गए हैं उसे एक अभिमानी रिकॉर्ड की तरह देखा जा सकता है।

अन्‍य के लिए उनके 'एरीना' में प्रवेश भी मुश्किल है।

* * *


लालटेन बुझ गई है
नीलेश रघुवंशी

तो, क्या अब विष्णु खरे तारा बन गए हैं। अंधेरे में चमकते आधे चाँद को देख मैंने उससे कहा, ‘‘अब तुम ठीक से सब जगह उजियारा करना। अच्छे से चमकना और जब ज़रूरत हो, तब पूरी तरह चमकना। संसार के किसी भी कोने को न छोड़ना।’’ नहीं तो विष्णुजी तुम्हें बहुत फटकार लगाएंगे। चाँद के बगल का तारा इतराने लगा कि कोई तो है जो चाँद की भी खबर ले सकेगा ।

सोचा नहीं था कि विष्णुजी इतनी जल्दी चले जाएंगे । ऐसे समय में जब उन जैसे निर्भीक और मानवीय संवेदनाओं से भरे मनुष्य की भारतीय समाज को जरूरत थी । वे समूचे प्राणी जगत के प्रति जिम्मेदारी के भाव से भरे कवि-लेखक थे। 

क्या वो समय से डर गए थे या समय उनसे डर रहा था? काल के किस क्षण में यह व्यूह रचा गया होगा कि उन्होंने प्राण त्याग दिए।  

वे निर्भीक योद्वा थे, अप्रतिम कवि थे, पत्रकर और अनुवादक थे । विश्वबोध से भरे लेखक मनुष्य थे । वे हमारे समय के जीनियस थे। लोकतंत्र और भारतीय समाज को सच्चे अर्थों में जानने-समझने वाले विलक्षण लेखक और सामान्य नागरिक दोनों एक साथ थे।

वे सबको डराते थे, लेकिन भारतीय जन की दुर्दशा को देख खुद बहुत डरते थे। विचलित होते थे। इसी भारतीय जन के सुख-चैन और उज्ज्वल भविष्य के लिए वे बार-बार लालटेन जलाते थे । वामपंथ में उनका अकूत विश्वास था। वे यह मानते थे कि मनुष्य की मुक्ति के लिए यही एकमात्र विचारधारा है, जो इस धरती को जीने के लायक बनाएगी । 
वे हज़ारों-हज़ार बेटियों को काम पर जाते देखना चाहते थे। वे ऐसी हुंकार भरना चाहते थे कि प्रतिक्रियावादी ताकतें धूल के गुबार की तरह मिट जाएँ, तहस-नहस हो जाएं। वे सर्वहारा को सिर्फ लेखन में ही नहीं, बल्कि अपने जीवन में भी जगह देते थे । उसी की खुशी से किलकते थे और उसी के दुख से व्यथित होते थे । काल ने उन्हें हमसे ऐसे समय छीन लिया, जब हमें उनकी सबसे ज्यादा जरूरत थी। वे लालटेन जलाते थे और सब उसे बड़ी आस से जलते देखते थे। 

क्या लालटेन अब बुझ गई है ? या फिर वो सबकी आवाज़ के परदे में टिमटिमाती रहेगी  लालटेन जलाने का जो हुनर उनके पास था, वो क्योंकर किसी और के पास होगा? वे हमें एक कोरे कागज में बदलकर चले गए, जिस पर अब एक नई इबारत लिखनी होगी। एक कवि के होने और न होने के बारे में।

एक जीनियस कवि के प्रस्थान पर आज वृंदावन की विधवाएं विलाप कर रही होंगी और वे जो टेम्पो में अपना घर बदलते हैं, वे भी सहसा रुक गए होंगे। अपने कवि को विदा करते हुए । उनकी कविता में रचित जन-जीवन जब कभी अपना फ्लैट बनाएगा, तो सोचेगा कि विष्णु खरे होते तो कहाँ किस जगह बैठकर अपनी लालटेन जलाते । अब जब वो चले गए हैं तो काश हम में यह साहस आए कि हम कह सकें कि-‘‘राजा तो नंगा है ।’’

क्या वे ‘‘और अन्य कविताएँ ’’ के आलैन बन गए । समुद्र किनारे औंधे पड़े मृत बालक आलैन ने उन्हें भीतर तक हिला दिया । विचलित कर दिया कि ये दुनिया जीने लायक नहीं बची । इस क्रूर अहसास ने उनके दिमाग की नसों को तहस-नहस कर दिया ।

क्या वो बारह सितम्बर की रात को नींद में चले गए ? वो अपनी ही कविता को चरितार्थ कर गए । 

नींद में’ (पाठांतर - 2008 )

कैसे मालूम कि जो नहीं रहा

उसकी मौत नींद में हुई ?
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लिहाजा मैं सुझाव देना चाहता हूँ

कि अगली बार अगर ऐसा कुछ हो

कि कहना पड़े कोई सोते सोते नहीं रहा

तो यह कहा जाए

पता नहीं चला वह कैसे गुजरा

जब वह नहीं रहा होगा

तब हम सब नींद में थे ।

क्या वे कबीर थे, जो अभी भी जागकर इस संसार को देख रहे होंगे? उनका सारा जीवन सोए हुए को  जगाने में चला गया। कविता में भी और कविता से इतर भी। एक ऐसा कवि-लेखक जो हज़ार हाई-वे पर चलकर भी गलियों को नहीं भूला। कहना चाहिए कि वे गलियों और हाई-वे दोनों पर एक साथ चल रहे थे । वे अपने ही देश के मानचित्र पर अपने ही देश को खोज रहे थे । वे लगातार लोकतंत्र और संविधान को बचाने की कोशिश में जी जान से लड़ रहे थे । वे लेखक-एक्टिविस्ट थे और भलिभांति जानते थे कि लेखक की क्या भूमिका होनी चाहिए। वे एक लेखक की आवाज थे। ये लेखक की आवाज बची रहे, यह साहस बचा रहे कि (‘‘बढ़ती ऊँचाई’’उनकी कविता को याद करते हुए ) रावण की बढ़ती ऊँचाई को देख हम भयभीत न हों कि अगले बरस रावण और ऊँचा हो जाएगा ।

वे अदभुत खेलप्रेमी थे और खेल के भीतर के खेलों को बड़ी दबंगई से उजागर करते थे ।

‘‘तुम हो क्या ? हम हैं क्या ? हमारी औकात क्या है ? किस मुगालते में जी रह हो ? वे आ रहे हैं, वे आ गए हैं, समूचे जगत को नष्ट कर देंगे- मैं कहता हूँ उठ खड़े हो।’’ 

वे भारत के विशालतर जन-समाज की मुक्ति चाहते थे । वे चमगादड़ और चिड़िया दोनों से डूबकर प्यार करते थे। सबकी सलामती चाहते थे । इस बात की फिक्र नहीं करते थे कि किसी की सलामती में उनकी जान चली गई तो ?
अपने समूचे लेखन में वे एक विस्मयबोधक चिन्ह थे, जो प्रश्नवाचक और पूर्णविराम को अपने में समेटे हुए नकारात्मक चिन्ह को भी जगह देते थे । क्योंकि

लालटेन जलाना उतना आसान बिल्कुल नहीं है

जितना कि उसे समझ लिया गया है ।

लालटेन जलाने की प्रक्रिया में लालटेन बुझाना और कम करना भी शामिल है।

उन्नीस सितम्बर 2018 गुजर गया और चाँद खिड़की के पल्ले से झाँकता दिखाई दे रहा है । क्या वो वे हैं? नहीं , बिल्कुल नहीं ! इतनी आसानी से इतनी जल्दी वे किसी की जगह को हड़पेंगे नहीं । वे तो सारा जीवन इसी हड़पने के विरुद्ध लड़ते रहे।
काश, वे न जाते।

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विष्णु खरे : मेरे टीचर, मेरे रोल मॉडल
गीत चतुर्वेदी


किशोरावस्था के दिन थे. तब हम मुंबई रहते थे. दोस्तों का एक बड़ा दल था. हम एक से दूसरी जगह यात्रा करते हुए नुक्कड़ नाटक किया करते थे. यात्रा के दौरान रेलवे स्टेशनों पर बैठकर, लोकल ट्रेनों में अँड़सकर, चौथी सीट के लिए चिक-चिक करते हुए, सामने बैठी किसी सुंदर लड़की को निहारते हुए, रोज़मर्रा जैसे दिखने वाले तमाम कामों के बीच हममें से ज़्यादातर लोग मन लगाकर एक ही विषय पर बात करते थे, और वह विषय होता विष्णु खरे की कविताएँ. हमारे बीच प्रतिस्पर्धा चलती थी कि विष्णु खरे की नई प्रकाशित कविता किसने सबसे पहले पढ़ी. जिसने बाज़ी मारी होती, उसे यह अधिकार मिल जाता था कि वह विष्णु जी की नई कविता हम सबके बीच, बाक़ायदा केंद्र में खड़े होकर, सस्वर पाठ करे. उनकी कितनी ही ऐसी कविताएँ थीं, जिन्हें हमने बारी-बारी पढ़ा और हर बार उतनी ही तल्लीनता से सुना. ऐसे मौक़ों पर, कभी-कभार, हमारे बीच मराठी का अद्वितीय कवि भुजंग मेश्राम भी हुआ करता था. जब विष्णु खरे की बात छिड़ती, तो वह ख़ुद सेलेब्रेटेड कवि होना छोड़ सबसे बड़ा फैनबॉयबन जाता था. तब गालियाँ बकते उद्दंड भुजंग मेश्राम की देह में प्रचंड विष्णु खरे की आत्मा आ जाती थी. फिर बनता था डेडली कॉम्बिनेशन. हम उसे बमुश्किल क़ाबू कर पाते. हम न सिर्फ़ विष्णु जी की कविताओं को पढ़ने के हक़ के लिए लड़ते थे, बल्कि अपने बीच उनकी काल्पनिक उपस्थिति तक को सेलेब्रेट करते थे. हमारे लिए विष्णु खरे से बड़ा कोई दूसरा कवि न था और हममें से कोई ख़ुद को विष्णु खरे से छोटा मानने को भी तैयार न होता. हम सभी विष्णु खरे थे

सबकी आवाज़ के पर्दे मेंकी प्रतियाँ छीना-झपटी में जर्जर हो चुकी थीं. ‘आलोचना की पहली किताबउन दिनों अप्राप्य थी. एक दिन हमारा दोस्त संजय भिसे, मराठी के ख़ूबसूरत कवि सतीश काळसेकर से मिला, जो कि विष्णु जी के क़रीबी दोस्तों में से एक थे. संजय भिसे की बातों में खरे के प्रति इतना प्रेम व सम्मान देखकर काळसेकर ऐसे प्रभावित हुए कि कुछ ही दिनों बाद उन्होंने आलोचना की पहली किताबकी अपनी प्रति उसे भेंट कर दी. अहा! उस किताब को हासिल करने के बाद संजय भिसे कितना गौरवान्वित हुआ था, जैसे उसने क़िला फ़तह कर लिया हो. सच में, कर भी लिया था. दुर्लभ किताबें मेरे पास होती थीं, बाज़ी उसने मार ली थी. तो, तात्कालिक ईर्ष्या से भरे उसके इस नालायक़ दोस्त ने उससे वह किताब छीन ली और आज तक अपने ताबे में रखी है. हिंदी कविता की ऐतिहासिक बारीकियों को समझने के लिए बीसियों बार पढ़कर जर्जर कर दी गई वह किताब आज भी मेरी बुकशेल्फ़ की सबसे क़ीमती किताबों में से एक है. बरसों बाद, अलग-अलग मौक़ों पर, जब हम सामने बैठे विष्णु खरे को ये सारी बातें बता रहे थे, तो वह अपने प्रिय मिथकीय चरित्र वासुदेव कृष्ण की तरह नटखट अंदाज़ में, मंद-मंद, मुस्करा रहे थे

विष्णु खरे अदम्य, दुर्गम प्रतिभा थे. वह हमारी भाषा के जीनियस थे. हमारे महान कवियों में से एक. हिंदी कविता के सबसे मुश्किल, लेकिन सबसे आकर्षक अध्याय. दुनिया की कविता में ऐसे दो ही उदाहरण मुझे मिल पाए. एक पोलिश भाषा के कवि चेस्वाव मीवोश. दूसरे हिंदी के कवि विष्णु खरे. दोनों ही समकक्ष थे, दोनों ही अपनी कविताओं की संरचना में काव्य-आस्वादन की पूरी परंपरा को चुनौती देते हुए, जिन जगहों पर कविता के होने की सबसे कम उम्मीद की जाती हो, ठीक वहीं पर कविता के महीन रेशे कातते हुए, अनुभूतियों के सामान्यीकरण को कविता का बुनियादी गुण मानने के दौर में विशिष्ट औपन्यासिक डीटेलिंग के साथ कविता की झीनी चदरिया बुनने वाले, व्यास-होमर जैसी नैतिकता और कबीर-नीत्शे जैसे औघड़पन को एक साथ साधते हुए. क्या अचरज कि दोनों ही अगिया बेताल थे. दोनों ही क्रोध के दुर्वासा. दोनों लड़ाके. दोनों में अजेय परिहास-बोध. और दोनों ही युवतर पीढ़ियों को काँच की तरह हाथ में लेकर चलने वाले दूरद्रष्टा. जिस तरह यूरोपीय कविता-परंपरा लंबे समय तक चेस्वाव मीवोश की ऋणी रहेगी, उसी तरह हिंदी व मराठी की कविता-परंपरा लंबे समय तक विष्णु खरे की ऋणी. फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि खरे को वह मान्यता-मूल्यांकन कभी नसीब न हुए, जो यूरोप में रहने के कारण मीवोश को हुए. भौगोलिकताओं के साथ कविता का एक बेहद सूक्ष्म, लगभग अव्याख्येय, रिश्ता भी होता है, जिससे अक्सर कवि की व्याप्ति प्रभावित होती है

विष्णु खरे का इस दुनिया में न रहना न सिर्फ़ हिंदी कविता की, बल्कि हम जैसे कई लोगों के लिए एक निजी क्षति है, जो ज़रा-सी दुविधा होने पर उन्हें फ़ोन लगा देते थे. जब मैंने प्रूस्त को पहली बार पढ़ा था, तब उसे  प्राउस्त कहा था, जिसे सुनकर वह बहुत हँसे थे, और जब प्रूस्त का कुछ भी मेरे पल्ले न पड़ा, तब दो घंटे उनसे फोन पर बात की थी और उतनी देर में उन्होंने पूरा प्रूस्त खोलकर रख दिया था, कम से कम इतना कि सात खंडों की उसकी किताब मैं सब्र के साथ पढ़ सकूँ. नीत्शे, होल्डरिलन, रिल्के, काफ़्का, जेम्स जॉयस, होमर, वर्जिल... मुझे यूरोप ने जहाँ-जहाँ परेशान किया, मेरे पास विष्णु खरे थे. जब भी हमारी मुलाक़ात हुई, हिंदी कविता की वर्तमान राजनीतियों व उठापटकों पर हमारी ज़रा-सी भी बातचीत न हुई. मेरे पास दुनिया-भर के साहित्य व दर्शन के सवाल होते थे, और विष्णु खरे, मेरे टीचर, मेरे रोल मॉडल, उनके पास जवाब होते थे. वह कितने सब्र, कितनी प्रखरता के साथ उन बौद्धिक जालों को साफ़ करते रहे

देह भीतर ही भीतर मृत्यु से मिलन की तैयारी करती रहती है. दिल व आत्मा को देह की इस साज़िश का पता तक नहीं चलता.

उनके जाने से जो ख़ालीपन आया है, वह कभी नहीं भरा जा सकेगा. ईमान से कहूँ, इतनी देर तक तो मैंने कोशिश कर ली कि बिना भावुक हुए, बिना रोए, एक लेखक की तरह निरपेक्ष होकर उनके बारे में लिखूँ, उस तरह उन्हें याद करूँ, जैसा कि उन्होंने सिखाया था और ऐसे शोक-भरे अवसरों पर वह ख़ुद भी जैसे किया करते थे, पर क़सम से, अब नहीं लिखा जा रहा. विष्णु खरे पर लिखना मेरे लिए दुनिया का सबसे मुश्किल काम है और भावुक होकर लिखने से मुझे सख़्त नफ़रत है

(विष्णु खरे की तीनों तस्वीरें : © Anurag Vats, 2018)