प्रभात की ६ नई कविताएं




जीवन के दिन 

हम तो देखते ही हैं अपने दिन 
जीवन भी हमें अपने दिन दिखाता है 
***

ईंधन 

बोझे से दबे दबे चलते हुए 
वे आँधियों से जूझती हैं
जैसे पेड़ जूझते हैं निरा अकेले 
***

आतप में पेड़ 

साधारण पेड़ हैं ये 
सूखते हुए जीते हुए 

मेरे इलाके के गरीब हैं ये
जीवन के प्रेम पड़े हुए 
***

पीली लूगड़ी 

बाल्टी में कपड़े रखकर नहाने आयी जो घाट पर 
कपड़ों के नीचे छिपाकर लायी तुम थोड़ा अनाज 
रास्ते में छप्पर की दूकान से लिया साबुन 
जिससे धो रही हो लूगड़ी 
जिसमें भरी है खेतों की खक 
और एक छुअन की धक-धक 

गाँव की लड़कियों का एक गोल 
गया है गाते हुए तुम्हारे समीप से 
पीड़ी लूगड़ी को कलर उड़ै बंधा का पाणी सूँ
घासों, पेड़ों और पक्षियों के लिए ही नहीं है सृष्टि में यह दृष्य-
तुम्हारी आँखों में छल-छल आँसू 
***

अनोखा दुख

तब हम साथ रोये थे 
एक दूसरे के लिए रो रहे थे 
जाना भी था, जल्दी भी थी 
जल्दी-जल्दी में जितना रो सकते थे 
उतना रोये थे 
वह दुख था 

आह! वह अनोखा दुख 
संसार के सारे सुख फीके जिसके आगे 
फिर मिला जीवन में 
फिर नहीं मिले हम जीवन में 

कौन जानता है अब हम 
एक दूसरे की मृत्यु के बारे में भी जानेंगे या नहीं 
***

तुम्हारा हिस्सा

तुम्हारे हिस्से के मेरे पाँव 
कोई दूरी तय नहीं करते 
तुम्हारे हिस्से के मेरे हाथ 
पड़े रहते हैं निकम्मे 

तुम्हारे हिस्से के मेरे होंठ
ढँक गए है दिनों की धूल से
तुम्हारे हिस्से की मेरी आँखों में 
फैला पड़ा है सपनों का असबाब 
***

_______________________ सबद पर प्रभात की अन्य कविताएँ यहाँ.

Comments

हृषीकेश सुलभ said…
प्रभात की बच्चों के लिए लिखी कुछ कविताएँ पढ़ने को मिली थीं। फिर उनका संकलन अरुण कमल से लेकर पढ़ा। प्रभात इस दौर के मत्त्वपूर्ण कवि हैं। भीड़ से अलग।
Pallav said…
आह! वह अनोखा दुख
संसार के सारे सुख फीके जिसके आगे
फिर न मिला जीवन में
फिर नहीं मिले हम जीवन में
कविता का नया आस्वाद ... आभार सबद
Mahesh Soni said…
कविता का आस्वादन मन को रुचिकर लगा धन्यवाद
Rahul Tomar said…
"तुम्हारा हिस्सा" बहुत अच्छी लगी।
Mukesh A Korba said…
सफ्फाक सुंदर, सब की सब।
Amar Singh Amar said…
प्रभात सर, मेरे गाँव के पास के है। कविताओं को गाते भी बहुत बढ़िया है।
Shubhra Singh said…
जाने की जल्दी में भी,जल्दी जल्दी रो सकना उसके साथ,जिसके साथ हम रो सकते हैं अपनी सब पीड़ा,सब दुख........वाकई एक सरस्,सुखद अनुभूति है।
बड़ा अच्छा लिखा है आपने।
तुम्हारे हिस्से के होठों पर दिनों की धूल,और आँखों मे सपनो के असबाब.....पर यही शायद जिंदगी का हासिल है।
प्रेम,वेदना,लाचारी और आस से लबरेज सुंदर कविताएं। बधाई!!!
kuldip kaur said…


Kuldip Kaur ‘पीड़ी लूगड़ी को कलर उड़ै बंधा का पाणी सूँ’

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Prabhat Prabhat पीड़ी लूगडी को कलर उड़े बंदा का पाणी सूं. कविता में शामिल यह एक लोकगीत की पंक्ति है. लूगडी ओढनी को कहते हैं. प्रेम में पड़ी युवती को बाँध पर ओढनी धोते देख गाँव की दूसरी लडकियां व्यग्य में उससे सीधे कुछ भी न कहते हुए यह गीत गा रही हैं. धुलने से जैसे ओढनी का रंग उड़ रहा है प्रेम में पड़ने से उसके जीवन का रंग उड़ रहा है क्योंकि बदनामी फ़ैल रही है. बहरहाल कविता की व्याख्या में नहीं पड़ना चाहिए.

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