गीत चतुर्वेदी : कॉलम 19 : लैला की उँगलियाँ




संस्कृत के महान कवि थे श्रीहर्ष। यह बाणभट्ट की हर्षचरितवाले राजा हर्षवर्धन नहीं थे, जो कि ख़ुद एक कवि थे और कई जगहों पर जिनके लिए श्रीहर्ष लिखा मिलता है। यह अलग श्रीहर्ष थे, जिन्होंने नैषिधीयचरितमजैसा अद्वितीय महाकाव्य और अद्वैत वेदांत पर खंडनखंडखाद्यजैसी अद्भुत कृति लिखी थी। उनके बारे में एक जनश्रुति सदियों से चली आ रही।

राजकवि ने उनके विद्वान पिता का बहुत मज़ाक़ उड़ाया, जिससे वह अवसादग्रस्त हो गए व उनकी मृत्यु हो गई। श्रीहर्ष ने क़सम खाई कि मैं पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लूँगा, उस राजकवि को अपने समक्ष झुकाऊँगा। उनसे शास्त्रार्थ की कोशिश की, लेकिन बुज़ुर्ग राजकवि उनसे डेढ़ था। दुखी होकर श्रीहर्ष अज्ञातवास में चले गए। कड़े स्वाध्याय व बरसों के अध्यवसाय से उन्होंने एक काव्य की रचना की और उसे लेकर राजदरबार गए। उनकी उम्मीद थी कि इस कृति से राज-दरबार उनकी प्रतिभा व विद्वत्ता का लोहा मान लेगा और यही उनका प्रतिशोध होगा। राज-दरबार ने उनकी कृति पढ़ी, लेकिन, भला-बुरा, कुछ भी कहने से इंकार कर दिया। श्रीहर्ष के बार-बार आग्रह पर राजा ने कहा, “यह बहुत कठिन काव्य है। हमारी सीमाओं से परे। हम या हमारा दरबार इस पर कोई निर्णय नहीं दे सकता। आप कश्मीर चले जाइए। वहाँ के राजा के मंदिर में साक्षात सरस्वती विराजती हैं। यदि इस कृति पर साक्षात सरस्वती ने मुहर लगा दी, तो हम आपको महाकवि मान लेंगे।

राजा ने उनके ख़र्चे की व्यवस्था की और श्रीहर्ष कश्मीर पहुँच गए। उन्होंने अनगिनत प्रयास किए कि किसी तरह वहाँ के राजा से भेंट कर लें, लेकिन उस राज्य की ब्यूरोक्रेसी इतनी भयंकर थी कि उन्हें राजमहल में प्रवेश ही नहीं मिलता था। उन्होंने पाया कि देश-भर से कई विद्वान साक्षात सरस्वती से मान्यता पाने के लिए वहाँ आए हैं, लेकिन कोई भी राजमहल में प्रवेश न पा सका। उनमें से कुछ वहीं मर गए। कई निराश होकर लौट गए। श्रीहर्ष जमे रहे। हर रोज़ प्रयास करते और हर रोज़ नाकाम होते। धीरे-धीरे उनके सारे पैसे ख़त्म हो गए। लौटने तक के पैसे नहीं बचे। उत्साह भी क्षीण हो गया। छोटी-मोटी पुरोहिताई करके गुज़र करने लगे।

एक रोज़ वह नदी किनारे अपने कपड़े धो रहे थे कि देखा, पानी भरने आई दो महिलाएँ आपस में बुरी तरह लड़ने लगीं। ज़बानी जंग कमोबेश कुश्ती में बदल गई और अंत में दोनों ने एक-दूसरे का सिर फोड़ दिया। कोतवाली हो गई। दोनों को सिपाही पकड़ ले गए; राजा के सामने प्रस्तुत किया गया। वहाँ दोनों फिर उसी तरह लड़ने लगीं। उनकी चाँव-चाँव से राजा को समझ ही न आया कि मामला क्या है। उसने दोनों को डाँटकर पूछा कि क्या वहाँ कोई प्रत्यक्षदर्शी मौजूद था? अगर हाँ, तो मैं उससे पूछ लेता हूँ कि मामला क्या है। दोनों ने बताया कि एक व्यक्ति वहाँ अपने कपड़े धो रहा था। उसे बुलाया गया। इस तरह राज-दरबार में श्रीहर्ष का प्रवेश हुआ। 

श्रीहर्ष श्रुतधर थे। श्रुतधर यानी वह व्यक्ति, जो एक बार कोई बात सुन ले, तो उसे ताउम्र न भूले। श्रीहर्ष ने नदी किनारे घटी घटना की एक-एक बात बतानी शुरू कर दी- इस औरत ने ऐसा कहा, फिर उस औरत ने वैसा कहा, एक-एक संवाद हूबहू, जैसा उन औरतों ने कहा था। राजा ने मामले का निपटारा कर दिया, लेकिन श्रीहर्ष को वहीं रोक लिया। उसे समझ आ गया था कि यह कोई साधारण नागरिक नहीं, बल्कि कोई श्रुतधर है। श्रीहर्ष ने अपना पूरा परिचय व कश्मीर आने का प्रयोजन बताया। राजा ने उनकी कृति पढ़ी। अपने मंदिर की साक्षात सरस्वती तक उनकी रचना भिजवाई। सरस्वती ने उसे पढ़ा और अभिभूत होकर उसकी प्रशस्ति की। कश्मीर की सरस्वती ने श्रीहर्ष को मान्यता दे दी। वह कन्नौज लौटकर आए। अपनी पुस्तक पर लगी मुहर दिखा दी। पूरा राज-दरबार उनकी प्रशंसा करने लगा। बुज़ुर्ग राजकवि ने खड़े होकर उनका सम्मान किया, उन्हें अपनी कुर्सी पर बिठाकर ख़ुद संन्यास ले लिया। कहते हैं कि वह कृति कोई और नहीं, ‘नैषिधीयचरितमही थी। 

है यह जनश्रुति, लेकिन इसमें थीम के कितने विविध स्तर हैं। स्वदेश वाले मान्यता नहीं देते। कहते हैं, पहले विदेश में मान्यता लेकर आओ। विदेश वाले घुसने नहीं देते। स्वदेश की मान्यता होती तो शायद वहाँ घुसना आसान होता। राजनीतिक या साहित्यिक ब्यूरोक्रेसी के अपने झंझट हैं। ये सब दीगर बातें। लेकिन, जिस एक चीज़ ने श्रीहर्ष को बचा लिया, वह थी उनकी स्मृति। उनका श्रुतधर होना। 

यदि उनके पास अक्षुण्ण स्मृति न होती, तो संभव है कि हमारे पास नैषध जैसी अनुपम कृति भी न होती। कश्मीर के राज-महल में वह कभी न घुस पाते, ग़ुरबत में वहीं कहीं मर जाते और उनकी कृति विलुप्त हो जाती। 

निजी स्मृति के कारण श्रीहर्ष का लाभ हुआ, लेकिन निजी स्मृति के कारण हरिहर ने किसी निर्दोष का नुक़सान कर दिया था। यह कथा इस तरह है।

हरिहर को श्रीहर्ष का वंशज माना जाता है। वह तुनकमिज़ाज व खल-बुद्धि थे। वह एक बार गुजरात गए। वहाँ के राजा ने उनका ख़ूब स्वागत किया, लेकिन कुछ घटनाएँ ऐसी घटीं कि उनकी स्वागत-सभा में राजकवि सोमेश्वर उपस्थित न हो पाए। हरिहर को बुरा लगा। परंपरानुसार, कम उम्र होने के कारण ख़ुद हरिहर को सोमेश्वर से मिलने उनके निवास जाना चाहिए था, लेकिन हठ में वह प्रतीक्षा करते रहे कि जिस सराय में मैं ठहरा हूँ, बुज़ुर्ग सोमेश्वर वहाँ आकर मुझसे मिलेंगे और मेरा सत्कार करेंगे। कई दिन गुज़र गए। सोमेश्वर न आए। हरिहर को यह बात खटक गई। वह सोमेश्वर को अपमानित करने का मौक़ा खोजने लगे। 

कुछ दिनों बाद राज-दरबार में एक विशेष काव्य-सभा हुई, जिसमें सोमेश्वर ने 18 श्लोकों वाली अपनी एक नई रचना पढ़कर सुनाई। सबने उनकी प्रशंसा की। जब सब बोल चुके, उसके बाद हरिहर खड़े हुए और कहा, “यहाँ आने से पहले मैं राजा भोज के राज्य में कुछ समय तक रुका था। वहाँ उनके राजमहल में एक खंभा है। राजकवि ने जो ये 18 श्लोक पढ़े हैं, ये सब के सब वहाँ उस खंभे पर बरसों से उत्कीर्ण हैं। राजकवि ने यह पूरी कविता वहाँ से चुराई है।यह सुनकर सभा में खलबली मच गई। हरिहर ने आगे कहा, “मैं उस खंभे के पास रोज़ जाता था। मैंने यह कविता वहाँ कई बार पढ़ी है। आप लोगों को यक़ीन न हो, तो लीजिए, मैं ये 18 श्लोक आपको फिर से सुनाता हूँ।और हरिहर ने दन्न-दन्न पूरी कविता सुना दी, इस तरह, जैसे उन्हें बरसों से याद हो।

सभी हैरान रह गए। राजकवि को चोर-कवि कहा जाने लगा। इस अपमान से सोमेश्वर रुआँसे हो गए। बुढ़ापे का समय था और बरसों की तपस्या मिट्टी में मिल गई। उधर, हरिहर विजेता भाव से भर उठे।

सोमेश्वर कुछ दिनों तक बेहद परेशान रहे। जब कुछ न सूझा, तो विवश होकर उस सराय में गए, जहाँ हरिहर ठहरे थे। उनसे पूछा, “आपने ऐसा क्यों किया?” 

हरिहर ने कहा, “पहले ही आ जाते, तो यह दिन न देखना पड़ता। जब मैं इस राज्य में आया, तब आपने मेरी उपेक्षा की थी। इसी कारण मैंने आपका अपमान किया।

सोमेश्वर ने उनकी स्वागत-सभा में न आ पाने के कुछ कारण बताए और कहा, “लेकिन मान्यवर, वह रचना तो मेरी अपनी है। मैंने किसी की नक़ल नहीं की। शब्दश: कहीं और कैसे हो सकती है?” 

हरिहर ने कहा, “जी हाँ, वह आपकी ही रचना है। शत-प्रतिशत आपकी। न तो राजा भोज के महल में ऐसा कोई खंभा है, न ही यह कविता वहाँ उत्कीर्ण है। चूँकि आपने मेरा अपमान किया था, मैंने उसे किसी और की साबित कर दी। मैं एक श्रुतधर हूँ- अक्षुण्ण स्मृति का स्वामी, सुने हुए को धारण करने वाला। किसी भी बात को सुनकर ताउम्र याद रख सकता हूँ। जब सभा में आपने अपनी कविता सुनाई, मैंने तुरंत उसे याद कर लिया। और एक काल्पनिक कथा बनाकर उसे सबको शब्दश: सुना दिया। चूंकि लोगों को पता नहीं कि किसी की स्मृति ऐसी भी हो सकती है, इसलिए सबने मान भी लिया कि आपने वह कविता चुराई है, क्योंकि वह मुझे पहले से कंठस्थ है।

इसके बाद हरिहर ने पूरे राज-दरबार के सामने इस बात का ख़ुलासा किया। खोई हुई प्रतिष्ठा सोमेश्वर को वापस मिली।

तुनकमिज़ाजी व अवैध, अकारण प्रतिशोध का यह अनुपम उदाहरण है। पूरा खेल स्मृति का है। एक व्यक्ति जिसे सब कुछ याद रहता है, वह अपनी स्मृति को हथियार बनाकर इस तरह खेलता है कि सोमेश्वर जैसा निर्दोष पानी भी न माँग पाए। इतिहास में असली-नक़ली स्मृतियों के ऐसे तमाम खेल भरे पड़े हैं।

स्मृति रचनाकारों का प्रिय आश्रय है और मनुष्य के जीवन की अबूझ पहेलियों में से एक। बोर्हेस की एक प्रसिद्ध कहानी है- ‘फ्यूनेस द मेमोरियस’। इरेनियो फ्यूनेस नामनौजवान घोड़े से गिर जाता है, उसके सिर में चोट लगती है और उसके बाद उसके मस्तिष्क में जाने कैसा परिवर्तन होता है कि अपने जीवन में घटे हर पल को वह याद रखने लगता है। उसका शरीर पंगु हो चुका है, वह सारा समय अपने मरे में रहता है, हाँ से बाहर का दृश्य देखता है। उसे यह भी याद रहता है कि छ दिन पहले किसी क्षण-विशेष में बादलों काकाकैसा था, किस क्षण उसके शरीर ने कैसा महसूस किया था। उसके पास एक-क्षण की हूबहू, स्मृति है। समय काटने के लिए वह अपने बीते दिन को याद रता है, इसमें उसका पूरा दिन चला जाता है। ज़ाहिर है, बीते के हर क्षण को याद रने के लिए आज का हर क्षण निवेश रना पड़ेगा। वह गणित के हर अंक कोविशेष नाम देना चाहता है। वह नाम भी खोजने लगता है। उसकी दुनिया में साधारणीरण नहीं है, अमूर्तन नहीं है, ल्कि हर क्षण उसके सामने मूर्त है। वह पिछले महीने के सोमवार को, महज़ एबीता हुआ सोमवार नहीं मान पाता, ल्कि उसके पास तो उस सोमवार के हर क्षण की स्मृति है, जिसे वह सुना भी सता है। हर क्षण की स्मृति महत्वपूर्ण नहीं होती, लेकिन उसके पास है। उसकी स्मृति में मामूली व विलक्षण दोनों ही प्रकाके क्षण हैं। नतीजा यह होता है कि वह सो नहीं पाता। उसका चेहरा इजिप्त से भी पुराना लगने लगता है, पिरामिडों से भी प्राचीन।बाद में फेफड़ों की बीमारी से वह मर जाता है।
फ्यूनेस कोई चरित्र नहीं, बल्कि एक अवधारणा है। श्रुतधर से भी आगे की अवधारणा। जैसे फ्यूनेस की इंद्रियों में सीसीटीवी कैमरा लगा है। जो देखेगा-सुनेगा, सब रिकॉर्ड कर लेगा। सीसीटीवी फुटेज देखना बेहद उबाऊ काम है। मान लो, तुमने चालीस साल का जीवन जिया है। चालीस साल की रियल-टाइम सीसीटीवी रिकॉर्डिंग देखने के लिए पूरे चालीस साल लगेंगे। एक-एक पल, एक-एक आवाज़। सब रिप्ले के लिए उतना ही समय लेंगे, जितना असल में लिया था। जबकि उसमें कितने क्षण थे, जिन्हें तुम सच में याद रखना चाहते थे? 

तुम एस्त्री से छह माह प्रेम रते हो, लेकिन याद रखने लायछह क्षण जुटा सते हो? वे छह क्षण, जो बीस साल बाद तुम्हारी स्मृति को आंदोलित र दें?। जब तुम्हारी सारी स्मृति जा चुकी हो, तुम उन छह में से किसी एक्षण के लिए तड़प सते हो? उम्बेर्तो को के उपन्यास 'द मिस्टीरियस फ्लेम ऑफ क्वीन लोआनामें याम्बो अपनी सारी स्मृति खो चुका है। तमाम कोशिशों के बाद भी उसे स्मृति वापस नहीं मिलती। अंत में, उसमें सिर्फ़इच्छा बची है- वह उस लडक़ी का चेहरा एबार याद कर लेना चाहता है, जिससे वह स्कूली दिनों से प्रेम रता था। वह स्मृति की शरण में है, लेकिन उसे कुछ याद नहीं आता। वह ऐसे ही मर जाता है।

फ्यूनेस के पास हर क्षण है। याम्बो के पास एक क्षण तक नहीं। फ्यूनेस की त्रासदी है सब कुछ याद रखना। याम्बो की त्रासदी है सब कुछ भूल जाना।

नीत्शे कहता था- “अगर तुम्हारे पास विस्मृति नहीं होगी, तो तुम्हारे पास कोई ख़ुशी न होगी। आनंद, उम्मीद व गौरव नहीं होगा। यहाँ तक कि वर्तमान भी नहीं होगा। जो भूल नहीं पाता, उसकी हालत क़ब्ज़ के मरीज़ जैसी होती है।”

बुद्ध ने सम्यक स्मृति कहा था। वह संपूर्ण स्मृति पर नहीं, सम्यक स्मृति पर ज़ोर देते थे। यह एक तरह की चयनित स्मृति है- विवेकपूर्ण सतर्क स्मृति। बुद्ध हमेशा चयनप्रिय रहे। उन्होंने मार्गों का चयन किया, स्थितियों का चयन किया, वृक्ष का चयन किया, जन्म लेने के लिए माँ की कोख का चयन किया, पिता का चयन किया, कुल-वंश-तिथि का चयन किया, जब संबोधि मिली, तो प्रथम उपदेश के लिए श्रोताओं का भी चयन किया। दिशाओं का चयन किया। दूरियों का चयन किया। यहां तक कि प्रश्नों का भी चयन किया। सभी का नहीं, चयनित प्रश्नों का ही मात्र उत्तर दिया। उन्होंने प्राप्त में से चयन किया। अ-प्राप्त में से चयन किया। बुद्ध के जीवन में चयन के महत्व को अक्सर उपेक्षित किया जाता है। व्याख्याकार कहते हैं, ‘वह भिक्षु ही क्या, जो चयन करे। भिक्षु तो वह है, जो प्राप्त को  संपूर्ण रूप से स्वीकार करे, उसमें से चयन न करे।किंतु बुद्ध ऐसे नहीं हैं। उन्होंने संघ में सबको लिया, किंतु विशिष्ट शिष्यों का चयन किया। उनकी विशिष्टता को  जानने के लिए बार-बार उनका परीक्षण किया। एक बार उन्होंने एक सभा में कहा था, यहां उपस्थित भिक्षुओं में से तीन सौ ऐसे हैं, जिन्हें अर्हता प्राप्त करने के लिए पूर्वनिवासानुस्मृति यानी पूर्व-जन्मों की स्मृति की आवश्यकता ही नहीं है। यह भी एक प्रकार का चयन था। इसी तरह उन्होंने अपनी समस्त उपलब्ध स्मृतियों का आवाह्न नहीं किया, बल्कि चयनित स्मृतियों का किया।

बाक़ी सब को भूल गए। भूल जाने को कहा। जीवन में हर कोई इनका प्रयोग अलग-अलग तरह से करता है। मैं जीवन से निकली कहानियों को आधार बनाकर इन सबको देख रहा हूँ। अपनी कमज़ोर स्मृति की आँखों से। इसीलिए ऊपर सिर्फ़ कहानियाँ ही सुना रहा। किसी गहरी व्याख्या में जाना या कोई एक निष्कर्ष पा लेना अभीष्ट नहीं।

मनुष्य कई चीज़ें भूल नहीं पाता। इसलिए, उसकी ख़ुशी बनी रहती है। इसीलिए, उसका दुख भी बना रहता है। इससे जुड़ी एक कहानी मुझे बहुत पसंद है। चलते-चलते वह भी सुना दूँ। जुडाइज़्म की धार्मिक किताब कब्बाला में यह कहानी है। 

रात की देवी है- लैला। लैला का अर्थ है- श्यामा। रात अँधेरी होती है। इसीलिए देवी का नाम लैला पड़ा होगा। मृत्यु के बाद मनुष्य की आत्मा को लैला अपने पास बुलाती है। वह देखती है कि इसके मन में इतना सब कुछ भरा हुआ है। सारी स्मृतियाँ लेकर अगले जन्म में गया, तो इसका जीना मुश्किल हो जाएगा। वह अपनी तर्जनी से मनुष्य की आत्मा के ऊपरी होंठ को दबाती है और उसकी स्मृति निकाल लेती है। नाक और होंठ के बीच वह छोटी-सी जगह, दबी हुई। छूकर देखो, उस पर तुम्हारी तर्जनी एकदम फिट हो जाएगी। इसीलिए मनुष्यों का ऊपरी होंठ बीच से दबा होता है। इस कहानी के हिसाब से, ऐसा मान सकते हो कि, नाक और होंठ के बीच की इस जगह में तुम्हारे पूर्व-जन्मों की स्मृतियाँ रहती थीं। तुम्हारे होंठ के ठीक ऊपर, लैला की उँगली का निशान है। लैला की छुअन के बिना तुम्हें अगला जन्म नहीं मिलेगा।



Comments

Ajanta Deo said…
इस पढ़े की स्मृति बनी रहेगी । बेहतरीन।
Kuldip Kaur said…
Should be preserved and shared... A thoughtful and insightful piece
Rahul Tomar said…
बहुत सुन्दर सर। Geet Chaturvedi 💐💐🙏🙏

"मनुष्य कई चीज़ें भूल नहीं पाता। इसलिए, उसकी ख़ुशी बनी रहती है। इसीलिए, उसका दुख भी बना रहता है।"
Preeti LS Mann said…
बहुत उम्दा 👏
Usha Verma said…
There are memories n there are memories <3
Anil Tiwari said…
मनुष्य में अहंकार की जड़ ये स्मृति ही तो है जितना अहंकारी व्यक्ति होगा उसकी स्मृति उतनी ही तेज होगी।
आलेख अच्छा है पर श्रीहर्ष के पिता के प्रतिद्वंद्वी के विषय में कुछ नहीं बताया गया है। उनके पिता को उनके प्रतिद्वंद्वी ने अपमानित नहीं किया था ,वे शास्त्रार्थ में हारे थे , और हराने वाले कोई राजकवि नहीं नव्यन्याय के पुरोधा उदयनाचार्य थे ।श्रीहर्ष ने सुकाव्य के द्वारा उदयनदर्शन को खंडित करने का प्रयास किया है , पर वे असफल रहे।न्यायकुसुमांजलि ,किरणावली और आत्मतत्वविवेक जैसे ग्रंथ अभी भी अपने विषय के सर्वोत्तम ग्रंथ हैं।
Mohan Verma said…
गज़ब गीत जी, हर बार कुछ नया और नायाब ।।
Ramkumar Tiwari said…
एक नयी बात...!लैला के स्पर्श को सभी अनुभव करें, वे भी जिन्हें इसी जन्म में अमर होना है।
Rahul Boyal said…
कमाल का लेख.
आपसे मिलकर इतना आनन्द आया कि वहाँ से लौटना कठिन हो गया।
Shikha Singh said…
कम्माल।
Anil Tiwari said…
शानदार लेख
Anita Manda said…
श्रुतधर के क़िस्से कमाल।
अति सुंदर आंकलन
सुंदर!

शुक्रिया!
बेहद सुंदर 💐💐
Nikhil Patil said…
ख़ूब सुंदर।

आभार🌿
Sudeep Shukla said…
विदिशा कब होकर चले गए आप?
Mohammad Sami said…
बेहद ख़ूबसूरत

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