Monday, August 27, 2018

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 20 : मैं कालिदास का मेघ हूँ



एक बार मैं अपने रास्ते जा रहा था कि मैंने देखा, रामगिरि पर एक पुरुष आकाश की ओर मुँह किये खड़ा था। एकबारगी तो मैंने ध्यान नहीं दिया, क्योंकि कई आकाशमुखी साधुओं को मैं इस तरह खड़ा देख चुका था। उस ज़माने में शैव संप्रदाय के साधुओं का एक समूह ख़ुद को ‘आकाशमुखी’ कहता था। वे आसमान की ओर मुँह उठाकर शिव का नाम लिया करते थे। इस उम्मीद में कि ख़ुद शिव उन्हें दर्शन देंगे। वे गरदन पीछे झुकाकर अपनी दृष्टि को आकाश में तब तक केंद्रित रखते थे, जब तक शिव दिख न जाएँ या उनकी माँसपेशियाँ सूख न जाएँ। मुझे नहीं पता, किसी को शिव दिखे या नहीं, लेकिन आसमान को घूरती अकड़ी हुई कई लाशों को मैंने देख रखा था। 

जब उस पुरुष ने आवाज़ देकर मुझे पुकारा, तब मुझे लगा कि यह आकाशमुखी नहीं, बल्कि कोई और है। और जैसे ही उसने मुझसे बातचीत शुरू की, मुझे समझ में आ गया कि यह कोई प्रेम-विदग्ध है। विरह का मारा है। अपनी प्रिया की याद में तड़प रहा है। मेरे पूछने पर पता चला कि यह कवि है, लोग उसे कालिदास नाम से जानते हैं। वह मुझे अपनी कविता का एक पात्र बनाना चाहता था। मैं हँस पड़ा। मुझ जैसे अज्ञात बादल को कोई हँसी का पात्र न बनाना चाहे, और यह मानुस मुझे कविता का पात्र बनाना चाहता है।

फिर मैंने उनकी कहानी सुनी। मुझे लगा, मैंने यह पहले भी सुन रखी है। 

ब्रह्मवैवर्त पुराण में वह कहानी है। अलकापुरी के राजा कुबेर अनन्य शिव-भक्त थे। उनका एक नौकर था हेममाली। उसकी पत्नी विशालाक्षी बहुत सुंदर थी। इतनी सुंदर कि हेममाली हमेशा उसी की धुन में रहता। उसके चक्कर में हर काम भूल जाता। एक बार कुबेर ने उसे एक काम सौंपा कि जाओ, मानसरोवर से मेरे लिए कमल के फूल ले आओ। हेममाली ने सोचा, मानसरोवर जाने से पहले घर हो आऊँ, पत्नी से मिल लूँ। पत्नी से मिलकर वह सबकुछ भूल गया। कुबेर अपने फूलों की प्रतीक्षा करते रह गए। शिव की पूजा नहीं कर पाए। कुबेर ने उसे खोजना शुरू किया, तो वह अपनी सुंदर पत्नी की बाँहों में सोया हुआ मिला। उसी क्षण कुबेर ने उसे शाप दे दिया कि तुझे कोढ़ हो जाए और तू अपनी पत्नी से अलग, दूर पर्वत पर अभिशप्त जीवन काटे।

कहानी यही थी। कालिदास ने इसमें परिवर्तन कर दिया था। कोढ़ वग़ैरह हटा दिया था, लेकिन विरह का प्रसंग वही था। वह मुझसे अनुरोध कर रहे थे कि मैं साधारण मेघ से मेघदूत की भूमिका में आ जाऊँ और विरह में डूबे यक्ष का संदेश दूर अलकापुरी ले जाऊँ। 

मुझे उसकी कहानी पर भी हँसी आई। जिस युग में लोग राजाओं की कहानी लिखते थे, यह कैसा कवि था, जो एक नौकर की प्रेमकथा लिख रहा था। वह भी इतनी सरस कि वह नौकर अपने राजा से भी अधिक सुंदर जान पड़ता था।

फिर मुझे लगा कि ख़ुद कालिदास ही तो वह यक्ष नहीं? क्या वह अपनी ही कहानी सुना रहे हैं? 

मेरा संदेह दूर करने के लिए कालिदास ने अपनी कहानी सुनाई। राजा विक्रमादित्य की बेटी विद्योत्तमा ने एक बार बुज़ुर्ग मंत्री वररुचि का बुरी तरह मज़ाक़ उड़ाया। विद्योत्तमा ख़ुद को महान विदुषी मानती थी। मंत्री ने क़सम खा ली कि इसकी शादी संसार के सबसे बड़े मूर्ख से कराऊँगा। मंत्री की भेंट कालिदास से हुई, जो जिस डाल पर बैठे थे, उसी को काट रहे थे। उन्हें यक़ीन हो गया कि यह व्यक्ति मूर्ख नहीं, मूर्खेंद्र है। उन्होंने ऐसा प्रपंच रचा कि विद्योत्तमा को लगा, कालिदास बेहद विद्वान हैं। उसने कालिदास से शादी कर ली, लेकिन सुहागरात को ही उसे अहसास हो गया कि यह तो वज्रमूर्ख है। उसने कालिदास को भगा दिया।

क्रोधित कालिदास राजा के महल में गए। वहाँ एक कमरे में देखा कि दीवार पर रानी का एक बड़ा चित्र टँगा हुआ है, जिसमें रानी की कमर के पास का हिस्सा दुपट्टे से ढँका हुआ है। कालिदास को जाने क्या सूझा कि वह आगे बढ़े और चित्र में रानी की जाँघ के पास एक तिल बना दिया। यह देखते ही राजा को बड़ा क्रोध आया। उसने सोचा, "सिर्फ़ मुझे पता है कि रानी के वहाँ तिल है, इस मूर्ख को कैसे पला चल गया? हो न हो, यह कालिदास, रानी का गुप्त प्रेमी है।" यह आशंका होते ही उसने, उसी क्षण कालिदास को देश-निकाला दे दिया।

पत्नी और ससुर, दोनों द्वारा मिले अपमान से कालिदास दुखी थे। उनकी पीड़ा देख, माँ काली ने उन्हें एक रात दर्शन दिए और महामूर्ख से महाविद्वान बना दिया। उनमें अद्वितीय काव्य-प्रतिभा आ गई। तब से वह छंद रचते हैं।

मुझे कालिदास की इन कहानियों पर भी भरोसा न हुआ, क्योंकि ये दोनों कहानियाँ मैंने पहले भी सुन रखी थीं, भले किन्हीं और चरित्रों के संदर्भ में। गुणाढ्य की ‘वृहत्कथा’ उस ज़माने में बहुत पढ़ी-सुनी जाती थी। मुझे याद आ गया, ये दोनों कहानियाँ उसमें थीं।

फिर भी मैंने कालिदास से कहा, “तुम यक्ष की नहीं, अपनी कहानी लिखना चाहते हो न?” 

उन्होंने कोई जवाब न दिया। 

मैंने कहा, “यदि तुम चाहो, तो मैं यक्ष के बजाय तुम्हारी प्रिया तक तुम्हारा संदेसा पहुँचा देता हूँ। तुम उसके विरह में पागल हो रहे हो।”

उन्होंने कहा, “कितनी सुंदर बात है कि तुम्हें मेरे भाव समझ में आ रहे। काश, तुम्हारा नाम विद्योत्तमा होता।”

लेकिन वह यक्ष की कहानी बुनने में लगे रहे। उनका हर छंद मुझ पर एक आश्चर्य की तरह उतरा। कविता आधी होने तक मैंने मान लिया कि मैं इतना ख़ुशक़िस्मत हूँ कि संसार के सबसे बड़े कवि ने मुझे अपनी कविता का पात्र बनाया है। कालिदास की कथा और यक्ष की कथा दोनों कितनी अलग-अलग हैं। फिर भी कितनी सफ़ाई से इन्होंने दोनों को मिश्रित कर दिया।

उन्होंने कहा, “मेरी कविता में यक्ष का कोई नाम नहीं है। यक्ष तो कोई भी हो सकता है, पर मेघ तो तुम्हीं हो। मेरे मेघदूत। मेरी कविता तुम्हारे कंधों पर यात्रा करेगी। एक बादल की पीठ पर बैठ उड़ती रहेगी।” 

पर सचाई यह है कि मैं उनकी कविता की पीठ पर बैठ उड़ता हूँ। 

*

मैं कालिदास का मेघ हूँ। उनकी कविता का नायक। मैं अज्ञातकुलशील नहीं हूँ। आपको याद होगा, महाकवि ने कहा था कि मैं पुष्करावर्तक वंश का हूँ। उनकी कविता में प्रविष्ट होने से पहले भी मेरे पास एक जीवन था। उनकी कविता की समाप्ति के बाद भी मेरे पास एक जीवन है। लेकिन भूमिका मेरी उतनी ही रही, जितनी कालिदास ने मुझे दी थी। आप मेरे बारे में सिर्फ़ उतना जानते हैं, जितना महाकवि ने बताना चाहा था।

कुछ चीज़ें मैं ख़ुद बताऊँगा।

पुष्कारावर्तक वंश बड़ा अजीब है। ग़ौर से देखें, तो पता चलेगा कि यह कोई वंश ही नहीं था। शुद्ध काव्य की रचना करने वाले कालिदास किसी तरह की शुद्धि में विश्वास नहीं करते थे। वह दरअसल, अशुद्धियों की आराधना करते थे। दो अजनबी और दूरस्थ दिखने वाली वस्तुओं को वह मिश्रित कर देते थे। जैसे अपने काव्य में उन्होंने संस्कृत और प्राकृत को मिश्रित कर दिया था। आपको याद होगा, और न भी याद हो तो मैं याद दिला दूँ, कि कुमारसंभव में पार्वती से विवाह के बाद शिव के समक्ष ख़ुद माँ सरस्वती प्रकट हुईं। उन्होंने शिव से शुद्ध संस्कृत में, लेकिन पार्वती से शुद्ध प्राकृत में संवाद किया। शिव और पार्वती दूरस्थ थे। कालिदास को उनका मेल कराना था। संस्कृत व प्राकृत दूरस्थ थीं। कालिदास को इनका भी मेल कराना था। उन्होंने करा दिया। असर देखिए कि बाद की सारी शताब्दियों में संस्कृत काव्य ने दोनों भाषाओं के मेल से ही अपना वैभव पाया। यह कालिदास की महिमा थी कि वह दो मौलिकताओं के मिश्रण से एक तीसरी मौलिकता का निर्माण करते थे। 

मैं उसी का एक प्रमाण हूँ। आपको यह बात समझ में आ सके, इसके लिए मुझे अपने विराट कुनबे का पूरा वर्णन करना होगा।

हम मेघों के चार वंश हैं। आवर्त, संवर्त, पुष्कर और द्रोण।

आवर्त यानी बिना पानी वाला बेहद चंचल बादल। रुई के फाहे जैसा। ज़रा-सी हवा चली कि यहाँ से वहाँ से हो गया। इसके भीतर कोई सार तो होता नहीं, इसलिए कहीं ठहरता नहीं। सारा समय बस आवारगी करता रहता है। कहीं किसी पहाड़-पेड़ से मुहब्बत हो गई, तो कुछ देर वहाँ रुकेगा, फिर आगे बढ़ जाएगा।

संवर्त यानी पर्याप्त पानी वाला बादल। यह यात्री नहीं होता, थोड़ा आलसी होता है। समुद्र के ऊपर बनता है और वहीं-कहीं सोया रहता है। ज़ोर की हवा चले, तो वहीं पानी के ऊपर ही अपना सारा रस गिरा देता है। ज़मीन की तरफ़ आने के लिए इसे अपना आलस तोड़ना होगा, लेकिन यह मुश्किल है। हमारे ख़ानदान में कहावत है कि शिव का धनुष टूट सकता है, संवर्त मेघ का आलस नहीं।

पुष्कर सबसे दुष्कर होता है। इसमें बेतहाशा पानी भरा होता है। ऐसा समझो कि प्रेम में चोट खाए किसी व्यक्ति की आँख जैसा। ज़रा-सा किसी ने छेड़ा कि टप-टप आँसू गिराना शुरू। रोके न रुकेगा। इतने भावुक तो इंसान भी नहीं होते, जितना पुष्कर बादल।

चौथा है द्रोण मेघ। ये बेहद शरीफ़ और श्रमजीवी बादल हैं। धरती का सौभाग्य इन्हीं से बरसता है। दिल के बहुत साफ़ होते हैं। लंबी दूर तक जाने के सपने देखते हैं, लेकिन जैसे ही अपनी यात्रा शुरू करते हैं, धरती इन्हें पुकारने लगती है। चाहकर भी यह उस पुकार को अनसुना नहीं कर पाते और बरस पड़ते हैं। धन-धान्य बरसाकर अगली राह पकड़ते हैं, लेकिन वहाँ भी सूखी धरती को देख अपनी यात्रा स्थगित कर देते हैं। बरसने लग जाते हैं। मंज़िल तक पहुँचने से पहले ही ये अपना सारा पानी धरती को सौंप ख़ाली हो जाते हैं।

मेरे वंश का नाम पुष्करावर्तक है। ऊपर के इन चारों वंशों से अलग। सच कहूँ, अपनी कविता के लिए कालिदास ने  ख़ासतौर पर मेरे वंश की उत्पत्ति की, जो बाद में मान्य हो गया। उन्होंने पुष्कर और आवर्त दोनों वंशों का संयोग कर दिया। उन्होंने संवर्त को नहीं चुना, क्योंकि मेघों का वह वंश लंबी यात्रा के अनुकूल न था। उन्होंने द्रोण को भी नहीं चुना, क्योंकि वह इतना शरीफ़ था कि हर कहीं बरस जाता और कभी अलकापुरी तक न पहुंच पाता। उन्होंने अकेले पुष्कर को भी नहीं चुना, क्योंकि वह सारे रास्ते बरसता रहता। बरस-बरसकर सबको वह संदेश सुना देता, जोकि यक्ष ने यक्षप्रिया के लिए भेजा था। इस तरह वह सारी निजता ही भंग कर देता। उन्होंने अकेले आवर्त को भी नहीं चुना, क्योंकि वह तो अंदर से ख़ाली होता है, स्वभाव से ही हल्का है। दूत-कर्म कोई आसान ज़िम्मेदारी थोड़े है। हल्के लोगों से वह नहीं निभने वाला।

कालिदास ने पुष्कर और आवर्त, दोनों वंशों का संयोग कर एक नया वंश बना दिया- पुष्करावर्तक। और फिर उसे एक महान वंश भी बता दिया। जब उनकी यह चतुराई मेरी समझ में आई, तब मैं ज़ोर-ज़ोर से हँसा। 

मैंने उनसे कहा, “कालिदास, तुम बहुत चतुर हो।”

तिरछी मुस्कान बिखेरते हुए कवि-कुल-गुरु ने कहा, “कहाँ चतुर हूँ, मेघ? मेरी सबसे क़रीबी विद्योत्तमा तो मुझे महामूर्ख मानती है।”

कालिदास की कविता में प्रविष्ट होने से पहले मैं आवर्त था। हल्का-फुल्का, अल्हड़, अपनी आवारगी में  तिरता हुआ। छोटे-छोटे टुकड़ों में बँटा हुआ। कभी-कभार तेज़ी से बहता, लेकिन ज़्यादातर समय मस्ताता हुआ तफ़रीह करता। चलते-चलते एक दिन मैं पुष्कर वंश के मेघों से मिल गया। वे पानी से भरे हुए थे। मैंने उनसे पानी उधार ले लिया। उनमें जाकर समाहित हो गया। मैं रुई के उड़ते हुए फाहों जैसा था। पुष्कर से मिलने के बाद मैं पानी में भीगी हुई रज़ाई जैसा हो गया। 

इसे किसी लड़की के जीवन की तरह भी समझ सकते हैं। वह किसी और कुल में पैदा होती है, लेकिन एक समय के बाद किसी और कुल में समाहित हो जाती है। वह अपना पिछला खो नहीं पाती, और बावजूद, उसे नये को स्वीकार करना पड़ता है। उसमें पिछले कुल के गुण तो रहते ही हैं, नये कुल के गुणों को भी वह धारण कर लेती है। 

आवर्त और लड़कियाँ एक जैसी होती होंगी। कुल बदलने से पहले तक, उनमें इतनी चंचलता होती है कि जल के अभाव का कोई दुख तक उन्हें नहीं होता।

कुल बदल लेने के बाद, उनके भीतर इतना जल जमा हो जाता है कि उन्हें याद ही नहीं पड़ता, किसी ज़माने में उनके पास एक निर्जल चंचलता भी थी।

इस तरह कालिदास ने मेरे वंश की उत्पत्ति की, और उसका नामकरण किया- पुष्करावर्तक। यानी पुष्कर और आवर्त दोनों के गुणों से शोभित। दूत-कर्म के लिए इससे सुंदर संयोग, और क्या हो सकता था! 

ऐसा बादल, जिसमें पुष्कर की तरह बहुत सारा पानी हो, जो बेहद भावुक हो, जो यक्ष की विरह-वेदना को समझ सके, जो उसके प्रेम के गीलेपन को जान सके, जिसमें अनुभूतियों से जुड़े रहने लायक़ राग हो। उसके साथ आवर्त जैसा बादल हो, जो आवारा हो, व्यावहारिक हो, जिसमें तात्कालिक राग हो, एक लंबा विराग हो, जो आगे बढ़ते रहने को ही अपना ध्येय माने, जो पुष्कर की भावुकता को नियंत्रित कर सके और अलकापुरी तक पहुँचा सके। 

और देखिए न, यह संयोग कितना प्रभावकारी रहा कि मैं, दिए गए दायित्व को, कितनी स्निग्धता से निभा ले गया। मैं आसमान में बहता गया, लेकिन कहीं भी इतना विगलित न हुआ कि अपने भीतर के जल को कहीं भी बरसा देता। मैं दिग्नाग सरीखे विकराल पहाड़ों के मुक्कों से बचा रहा। अलकापुरी के रास्ते में मेरा प्रेम उज्जैन नामक नगरी से हो गया, लेकिन मैंने अपने प्रेम का प्रदर्शन नहीं किया। मात्र प्रेक्षकों की तरह उज्जैन की सुंदरता को निहारता रहा। शोहदों की तरह उस नगरी के चारों ओर चक्कर काटता रहा, लेकिन फिर आगे बढ़ गया। मैं सिर्फ़ पुष्कर नहीं था कि अपना पूरा प्रेम उज्जयिनी पर बरसा देता। मैं सिर्फ़ आवर्त नहीं था कि वहाँ खड़े-खड़े नयनमटक्का करता और अपनी मंज़िल को भूल जाता। मैं दोनों वंशों के संयोग से बना एक नया मेघवंश हूँ। एक अद्वितीय मौलिकता। राग और विराग का अद्भुत काव्यात्मक संगम। मैं कालिदास के मानस में बहता हुआ अद्वैत हूँ। 

मैं साधारण बादल नहीं। मैं कामरूप हूँ। अपनी इच्छा से आकार ग्रहण करने वाला। कामरूप कौन होता है? यक़ीनन, प्रेम होता है। मैं कालिदास की कविता का प्रेम हूँ। मैं समस्त संसार में व्याप्त प्रेम हूँ। ज़रूरत पड़ने पर वज़नदार, ज़रूरत पड़ने पर सबसे हल्का। गरज पड़ूँ, तो सृष्टि काँप उठे। बरस पड़ूँ, तो क्या पत्थर क्या रेत, सबको गीला कर दूँ।

मैं साधारण बादलों की तरह आवारा नहीं था। महाकवि ने कहा है कि मैं ब्रह्मचारी था। तो आप ही बताइए, मैं भला ब्रह्म-व्रत से कैसे टलता?

कई लोगों को अचरज होता है कि बादल कैसे ब्रह्मचारी हो सकता है? बादल का मन तो जहाँ-तहाँ अटकता है, फिर कैसे हुआ वह ब्रह्मचारी?

याद रखना, मुझे ब्रह्मचारी की उपाधि स्वयं महाकवि ने दी है। और महाकवि किसी को इतना बड़ा मान ऐसे ही नहीं दे देते! 

ऋग्वेद में पुष्कर का अर्थ है नीलकमल। लेकिन संस्कृत में एक ही शब्द के कई अर्थ होते हैं। पुष्कर का एक अर्थ है ब्रह्म। एक अर्थ है जल। ब्रह्म के लिए एक शब्द है उदक। उदक का अर्थ होता है जल। 

ऋग्वेद कहता है, सृष्टि की उत्पत्ति ब्रह्म से हुई। वही ऋग्वेद कहता है, सृष्टि की उत्पत्ति जल से हुई।

सो, ब्रह्म और जल, पर्यायवाची हो गए। 

मेघ, जल के साथ विचरण करता है। इस तरह मेघ, ब्रह्म के साथ विचरण करता है। जिसके साथ विचरण करें, आप उसके चारी होते हैं। इस तरह मेघ, ब्रह्मचारी है। 

मेघ: कस्मात मेहतीति। मैं जल का मेहन करता हूँ, इसीलिए मेघ हूँ। मेहन करना यानी भीतर संचित द्रव को निकालकर बाहर बरसा देना।

ब्रह्मचारी भी अपने भीतर संचित ब्रह्म को बाहर निकालकर प्रसारित कर देता है।

मेरा ब्रह्मचर्य मुझे कालिदास ने समझाया। 

मैं ही इंद्र हूँ। मैं ही ऐरावत हूँ।

जल को कहते हैं वृषा। वृषा का एक अर्थ है तेज। कालिदास ने इंद्र को वृषा कहा है। निरुक्त में मेघ के लिए वृषंधि शब्द का प्रयोग है। वृषा से ही वर्षा हुई।

इरा का अर्थ है पानी। जहाँ बहुत सारा पानी हो, उसमें से किसी का जन्म हो, तो वह कहलाएगा ऐरावत। समुद्र के भीतर से ऐरावत का जन्म हुआ। समुद्र के भीतर से ही मेघ का भी जन्म होता है और मेघ को हाथी या गज भी कहा जाता है। अमरकोश में कहा गया है- ऐरावतो अभ्रमातंग:। अभ्र का अर्थ है बादल। मातंग का अर्थ है हाथी।

अभ्र इसलिए कहते हैं कि इसमें पानी का भस्म यानी धुआँ उड़ता रहता है। सूरज पूरब में उगता है। इसलिए अधिकतर बादलों की रचना पूरब से होती है। पूरब को कहते हैं इंद्र। उसी से बना ऐंद्र। जो कुछ भी पूर्व में हो चुका हो, उसे ऐंद्र कह सकते हैं। जैसे पाणिनी से पूर्व जो व्याकरण सबसे अधिक प्राचीन व मान्य था, उसे ऐंद्र व्याकरण कहते हैं। यानी इंद्र द्वारा बनाया गया अथवा पूर्व में प्रचलित व्याकरण। 

इस तरह मेघ भी ऐंद्र हैं। इंद्र की दिशा से आने वाला विद्युतपति।

कहते हैं, दुनिया शिव व शक्ति के सुयोग से चलती है। बारिश भी मेघ व विद्युत के सुयोग से होती है। जिस मेघ के पास विद्युत न हो, वह बारिश नहीं करा सकता। ऐरावत की पत्नी का नाम है अभ्रमु। अभ्रमु का अर्थ है विद्युत और विद्युत, मेघ की पत्नी का नाम है। हर वंश के मेघ की पत्नी का नाम।

महाकवि ने यूँ ही मेरे दो वंशों को सुयोग कर मेरे नये वंश की स्थापना नहीं की थी। उन्हें सब पता था। इतिहास, पुराण, अतीत, वर्तमान, लोक, वेद! उन्हें हर चीज़ का ज्ञान था। 

उन्हें मेरी पत्नी का भी ज्ञान था, इसीलिए अपना संदेश पूरा सुनाने के बाद जब उन्होंने मुझे अलकापुरी रवाना होने का संकेत दिया, तो उससे ठीक पहले यह भी कहा, “मेघ, जिसे तुम अपनी गोद में धारण किए रहते हो, उस विद्युत को कभी ख़ुद से अलग मत करना। वह तुम्हारी प्रेयसी है। उससे अलग हो जाओगे, तो तुम्हारी स्थिति मेरे जैसी हो जाएगी। तुम किसी काम लायक़ न रहोगे।”

मैंने यक्ष को कभी नहीं देखा था, पर मैंने कालिदास को देखा था। इसलिए मैं कह सकता हूँ कि वह प्रेम के सबसे बड़े गायक थे। उन्हें पता था कि संस्कृत में दो शब्द हैं - पत्नीतीर्थ व तीर्थप्रिया। यानी संसार के सारे तीर्थ तुम्हारी पत्नी या प्रिया के भीतर ही हैं। विद्या की तरह उसे अंक में लेकर देखो। विद्युत की तरह उसे अँकवारी भरकर तो देखो।

कालिदास ने कहा, “ओह मेघ! कितनी सुंदर बात है कि तुम्हें यह भाव समझ में आ रहा। काश, तुम्हारा नाम विद्योत्तमा होता!”
(अगली क़िश्त में जारी)


 

Monday, August 13, 2018

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 19 : लैला की उँगलियाँ




संस्कृत के महान कवि थे श्रीहर्ष। यह बाणभट्ट की हर्षचरितवाले राजा हर्षवर्धन नहीं थे, जो कि ख़ुद एक कवि थे और कई जगहों पर जिनके लिए श्रीहर्ष लिखा मिलता है। यह अलग श्रीहर्ष थे, जिन्होंने नैषिधीयचरितमजैसा अद्वितीय महाकाव्य और अद्वैत वेदांत पर खंडनखंडखाद्यजैसी अद्भुत कृति लिखी थी। उनके बारे में एक जनश्रुति सदियों से चली आ रही।

राजकवि ने उनके विद्वान पिता का बहुत मज़ाक़ उड़ाया, जिससे वह अवसादग्रस्त हो गए व उनकी मृत्यु हो गई। श्रीहर्ष ने क़सम खाई कि मैं पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लूँगा, उस राजकवि को अपने समक्ष झुकाऊँगा। उनसे शास्त्रार्थ की कोशिश की, लेकिन बुज़ुर्ग राजकवि उनसे डेढ़ था। दुखी होकर श्रीहर्ष अज्ञातवास में चले गए। कड़े स्वाध्याय व बरसों के अध्यवसाय से उन्होंने एक काव्य की रचना की और उसे लेकर राजदरबार गए। उनकी उम्मीद थी कि इस कृति से राज-दरबार उनकी प्रतिभा व विद्वत्ता का लोहा मान लेगा और यही उनका प्रतिशोध होगा। राज-दरबार ने उनकी कृति पढ़ी, लेकिन, भला-बुरा, कुछ भी कहने से इंकार कर दिया। श्रीहर्ष के बार-बार आग्रह पर राजा ने कहा, “यह बहुत कठिन काव्य है। हमारी सीमाओं से परे। हम या हमारा दरबार इस पर कोई निर्णय नहीं दे सकता। आप कश्मीर चले जाइए। वहाँ के राजा के मंदिर में साक्षात सरस्वती विराजती हैं। यदि इस कृति पर साक्षात सरस्वती ने मुहर लगा दी, तो हम आपको महाकवि मान लेंगे।

राजा ने उनके ख़र्चे की व्यवस्था की और श्रीहर्ष कश्मीर पहुँच गए। उन्होंने अनगिनत प्रयास किए कि किसी तरह वहाँ के राजा से भेंट कर लें, लेकिन उस राज्य की ब्यूरोक्रेसी इतनी भयंकर थी कि उन्हें राजमहल में प्रवेश ही नहीं मिलता था। उन्होंने पाया कि देश-भर से कई विद्वान साक्षात सरस्वती से मान्यता पाने के लिए वहाँ आए हैं, लेकिन कोई भी राजमहल में प्रवेश न पा सका। उनमें से कुछ वहीं मर गए। कई निराश होकर लौट गए। श्रीहर्ष जमे रहे। हर रोज़ प्रयास करते और हर रोज़ नाकाम होते। धीरे-धीरे उनके सारे पैसे ख़त्म हो गए। लौटने तक के पैसे नहीं बचे। उत्साह भी क्षीण हो गया। छोटी-मोटी पुरोहिताई करके गुज़र करने लगे।

एक रोज़ वह नदी किनारे अपने कपड़े धो रहे थे कि देखा, पानी भरने आई दो महिलाएँ आपस में बुरी तरह लड़ने लगीं। ज़बानी जंग कमोबेश कुश्ती में बदल गई और अंत में दोनों ने एक-दूसरे का सिर फोड़ दिया। कोतवाली हो गई। दोनों को सिपाही पकड़ ले गए; राजा के सामने प्रस्तुत किया गया। वहाँ दोनों फिर उसी तरह लड़ने लगीं। उनकी चाँव-चाँव से राजा को समझ ही न आया कि मामला क्या है। उसने दोनों को डाँटकर पूछा कि क्या वहाँ कोई प्रत्यक्षदर्शी मौजूद था? अगर हाँ, तो मैं उससे पूछ लेता हूँ कि मामला क्या है। दोनों ने बताया कि एक व्यक्ति वहाँ अपने कपड़े धो रहा था। उसे बुलाया गया। इस तरह राज-दरबार में श्रीहर्ष का प्रवेश हुआ। 

श्रीहर्ष श्रुतधर थे। श्रुतधर यानी वह व्यक्ति, जो एक बार कोई बात सुन ले, तो उसे ताउम्र न भूले। श्रीहर्ष ने नदी किनारे घटी घटना की एक-एक बात बतानी शुरू कर दी- इस औरत ने ऐसा कहा, फिर उस औरत ने वैसा कहा, एक-एक संवाद हूबहू, जैसा उन औरतों ने कहा था। राजा ने मामले का निपटारा कर दिया, लेकिन श्रीहर्ष को वहीं रोक लिया। उसे समझ आ गया था कि यह कोई साधारण नागरिक नहीं, बल्कि कोई श्रुतधर है। श्रीहर्ष ने अपना पूरा परिचय व कश्मीर आने का प्रयोजन बताया। राजा ने उनकी कृति पढ़ी। अपने मंदिर की साक्षात सरस्वती तक उनकी रचना भिजवाई। सरस्वती ने उसे पढ़ा और अभिभूत होकर उसकी प्रशस्ति की। कश्मीर की सरस्वती ने श्रीहर्ष को मान्यता दे दी। वह कन्नौज लौटकर आए। अपनी पुस्तक पर लगी मुहर दिखा दी। पूरा राज-दरबार उनकी प्रशंसा करने लगा। बुज़ुर्ग राजकवि ने खड़े होकर उनका सम्मान किया, उन्हें अपनी कुर्सी पर बिठाकर ख़ुद संन्यास ले लिया। कहते हैं कि वह कृति कोई और नहीं, ‘नैषिधीयचरितमही थी। 

है यह जनश्रुति, लेकिन इसमें थीम के कितने विविध स्तर हैं। स्वदेश वाले मान्यता नहीं देते। कहते हैं, पहले विदेश में मान्यता लेकर आओ। विदेश वाले घुसने नहीं देते। स्वदेश की मान्यता होती तो शायद वहाँ घुसना आसान होता। राजनीतिक या साहित्यिक ब्यूरोक्रेसी के अपने झंझट हैं। ये सब दीगर बातें। लेकिन, जिस एक चीज़ ने श्रीहर्ष को बचा लिया, वह थी उनकी स्मृति। उनका श्रुतधर होना। 

यदि उनके पास अक्षुण्ण स्मृति न होती, तो संभव है कि हमारे पास नैषध जैसी अनुपम कृति भी न होती। कश्मीर के राज-महल में वह कभी न घुस पाते, ग़ुरबत में वहीं कहीं मर जाते और उनकी कृति विलुप्त हो जाती। 

निजी स्मृति के कारण श्रीहर्ष का लाभ हुआ, लेकिन निजी स्मृति के कारण हरिहर ने किसी निर्दोष का नुक़सान कर दिया था। यह कथा इस तरह है।

हरिहर को श्रीहर्ष का वंशज माना जाता है। वह तुनकमिज़ाज व खल-बुद्धि थे। वह एक बार गुजरात गए। वहाँ के राजा ने उनका ख़ूब स्वागत किया, लेकिन कुछ घटनाएँ ऐसी घटीं कि उनकी स्वागत-सभा में राजकवि सोमेश्वर उपस्थित न हो पाए। हरिहर को बुरा लगा। परंपरानुसार, कम उम्र होने के कारण ख़ुद हरिहर को सोमेश्वर से मिलने उनके निवास जाना चाहिए था, लेकिन हठ में वह प्रतीक्षा करते रहे कि जिस सराय में मैं ठहरा हूँ, बुज़ुर्ग सोमेश्वर वहाँ आकर मुझसे मिलेंगे और मेरा सत्कार करेंगे। कई दिन गुज़र गए। सोमेश्वर न आए। हरिहर को यह बात खटक गई। वह सोमेश्वर को अपमानित करने का मौक़ा खोजने लगे। 

कुछ दिनों बाद राज-दरबार में एक विशेष काव्य-सभा हुई, जिसमें सोमेश्वर ने 18 श्लोकों वाली अपनी एक नई रचना पढ़कर सुनाई। सबने उनकी प्रशंसा की। जब सब बोल चुके, उसके बाद हरिहर खड़े हुए और कहा, “यहाँ आने से पहले मैं राजा भोज के राज्य में कुछ समय तक रुका था। वहाँ उनके राजमहल में एक खंभा है। राजकवि ने जो ये 18 श्लोक पढ़े हैं, ये सब के सब वहाँ उस खंभे पर बरसों से उत्कीर्ण हैं। राजकवि ने यह पूरी कविता वहाँ से चुराई है।यह सुनकर सभा में खलबली मच गई। हरिहर ने आगे कहा, “मैं उस खंभे के पास रोज़ जाता था। मैंने यह कविता वहाँ कई बार पढ़ी है। आप लोगों को यक़ीन न हो, तो लीजिए, मैं ये 18 श्लोक आपको फिर से सुनाता हूँ।और हरिहर ने दन्न-दन्न पूरी कविता सुना दी, इस तरह, जैसे उन्हें बरसों से याद हो।

सभी हैरान रह गए। राजकवि को चोर-कवि कहा जाने लगा। इस अपमान से सोमेश्वर रुआँसे हो गए। बुढ़ापे का समय था और बरसों की तपस्या मिट्टी में मिल गई। उधर, हरिहर विजेता भाव से भर उठे।

सोमेश्वर कुछ दिनों तक बेहद परेशान रहे। जब कुछ न सूझा, तो विवश होकर उस सराय में गए, जहाँ हरिहर ठहरे थे। उनसे पूछा, “आपने ऐसा क्यों किया?” 

हरिहर ने कहा, “पहले ही आ जाते, तो यह दिन न देखना पड़ता। जब मैं इस राज्य में आया, तब आपने मेरी उपेक्षा की थी। इसी कारण मैंने आपका अपमान किया।

सोमेश्वर ने उनकी स्वागत-सभा में न आ पाने के कुछ कारण बताए और कहा, “लेकिन मान्यवर, वह रचना तो मेरी अपनी है। मैंने किसी की नक़ल नहीं की। शब्दश: कहीं और कैसे हो सकती है?” 

हरिहर ने कहा, “जी हाँ, वह आपकी ही रचना है। शत-प्रतिशत आपकी। न तो राजा भोज के महल में ऐसा कोई खंभा है, न ही यह कविता वहाँ उत्कीर्ण है। चूँकि आपने मेरा अपमान किया था, मैंने उसे किसी और की साबित कर दी। मैं एक श्रुतधर हूँ- अक्षुण्ण स्मृति का स्वामी, सुने हुए को धारण करने वाला। किसी भी बात को सुनकर ताउम्र याद रख सकता हूँ। जब सभा में आपने अपनी कविता सुनाई, मैंने तुरंत उसे याद कर लिया। और एक काल्पनिक कथा बनाकर उसे सबको शब्दश: सुना दिया। चूंकि लोगों को पता नहीं कि किसी की स्मृति ऐसी भी हो सकती है, इसलिए सबने मान भी लिया कि आपने वह कविता चुराई है, क्योंकि वह मुझे पहले से कंठस्थ है।

इसके बाद हरिहर ने पूरे राज-दरबार के सामने इस बात का ख़ुलासा किया। खोई हुई प्रतिष्ठा सोमेश्वर को वापस मिली।

तुनकमिज़ाजी व अवैध, अकारण प्रतिशोध का यह अनुपम उदाहरण है। पूरा खेल स्मृति का है। एक व्यक्ति जिसे सब कुछ याद रहता है, वह अपनी स्मृति को हथियार बनाकर इस तरह खेलता है कि सोमेश्वर जैसा निर्दोष पानी भी न माँग पाए। इतिहास में असली-नक़ली स्मृतियों के ऐसे तमाम खेल भरे पड़े हैं।

स्मृति रचनाकारों का प्रिय आश्रय है और मनुष्य के जीवन की अबूझ पहेलियों में से एक। बोर्हेस की एक प्रसिद्ध कहानी है- ‘फ्यूनेस द मेमोरियस’। इरेनियो फ्यूनेस नामनौजवान घोड़े से गिर जाता है, उसके सिर में चोट लगती है और उसके बाद उसके मस्तिष्क में जाने कैसा परिवर्तन होता है कि अपने जीवन में घटे हर पल को वह याद रखने लगता है। उसका शरीर पंगु हो चुका है, वह सारा समय अपने मरे में रहता है, हाँ से बाहर का दृश्य देखता है। उसे यह भी याद रहता है कि छ दिन पहले किसी क्षण-विशेष में बादलों काकाकैसा था, किस क्षण उसके शरीर ने कैसा महसूस किया था। उसके पास एक-क्षण की हूबहू, स्मृति है। समय काटने के लिए वह अपने बीते दिन को याद रता है, इसमें उसका पूरा दिन चला जाता है। ज़ाहिर है, बीते के हर क्षण को याद रने के लिए आज का हर क्षण निवेश रना पड़ेगा। वह गणित के हर अंक कोविशेष नाम देना चाहता है। वह नाम भी खोजने लगता है। उसकी दुनिया में साधारणीरण नहीं है, अमूर्तन नहीं है, ल्कि हर क्षण उसके सामने मूर्त है। वह पिछले महीने के सोमवार को, महज़ एबीता हुआ सोमवार नहीं मान पाता, ल्कि उसके पास तो उस सोमवार के हर क्षण की स्मृति है, जिसे वह सुना भी सता है। हर क्षण की स्मृति महत्वपूर्ण नहीं होती, लेकिन उसके पास है। उसकी स्मृति में मामूली व विलक्षण दोनों ही प्रकाके क्षण हैं। नतीजा यह होता है कि वह सो नहीं पाता। उसका चेहरा इजिप्त से भी पुराना लगने लगता है, पिरामिडों से भी प्राचीन।बाद में फेफड़ों की बीमारी से वह मर जाता है।
फ्यूनेस कोई चरित्र नहीं, बल्कि एक अवधारणा है। श्रुतधर से भी आगे की अवधारणा। जैसे फ्यूनेस की इंद्रियों में सीसीटीवी कैमरा लगा है। जो देखेगा-सुनेगा, सब रिकॉर्ड कर लेगा। सीसीटीवी फुटेज देखना बेहद उबाऊ काम है। मान लो, तुमने चालीस साल का जीवन जिया है। चालीस साल की रियल-टाइम सीसीटीवी रिकॉर्डिंग देखने के लिए पूरे चालीस साल लगेंगे। एक-एक पल, एक-एक आवाज़। सब रिप्ले के लिए उतना ही समय लेंगे, जितना असल में लिया था। जबकि उसमें कितने क्षण थे, जिन्हें तुम सच में याद रखना चाहते थे? 

तुम एस्त्री से छह माह प्रेम रते हो, लेकिन याद रखने लायछह क्षण जुटा सते हो? वे छह क्षण, जो बीस साल बाद तुम्हारी स्मृति को आंदोलित र दें?। जब तुम्हारी सारी स्मृति जा चुकी हो, तुम उन छह में से किसी एक्षण के लिए तड़प सते हो? उम्बेर्तो को के उपन्यास 'द मिस्टीरियस फ्लेम ऑफ क्वीन लोआनामें याम्बो अपनी सारी स्मृति खो चुका है। तमाम कोशिशों के बाद भी उसे स्मृति वापस नहीं मिलती। अंत में, उसमें सिर्फ़इच्छा बची है- वह उस लडक़ी का चेहरा एबार याद कर लेना चाहता है, जिससे वह स्कूली दिनों से प्रेम रता था। वह स्मृति की शरण में है, लेकिन उसे कुछ याद नहीं आता। वह ऐसे ही मर जाता है।

फ्यूनेस के पास हर क्षण है। याम्बो के पास एक क्षण तक नहीं। फ्यूनेस की त्रासदी है सब कुछ याद रखना। याम्बो की त्रासदी है सब कुछ भूल जाना।

नीत्शे कहता था- “अगर तुम्हारे पास विस्मृति नहीं होगी, तो तुम्हारे पास कोई ख़ुशी न होगी। आनंद, उम्मीद व गौरव नहीं होगा। यहाँ तक कि वर्तमान भी नहीं होगा। जो भूल नहीं पाता, उसकी हालत क़ब्ज़ के मरीज़ जैसी होती है।”

बुद्ध ने सम्यक स्मृति कहा था। वह संपूर्ण स्मृति पर नहीं, सम्यक स्मृति पर ज़ोर देते थे। यह एक तरह की चयनित स्मृति है- विवेकपूर्ण सतर्क स्मृति। बुद्ध हमेशा चयनप्रिय रहे। उन्होंने मार्गों का चयन किया, स्थितियों का चयन किया, वृक्ष का चयन किया, जन्म लेने के लिए माँ की कोख का चयन किया, पिता का चयन किया, कुल-वंश-तिथि का चयन किया, जब संबोधि मिली, तो प्रथम उपदेश के लिए श्रोताओं का भी चयन किया। दिशाओं का चयन किया। दूरियों का चयन किया। यहां तक कि प्रश्नों का भी चयन किया। सभी का नहीं, चयनित प्रश्नों का ही मात्र उत्तर दिया। उन्होंने प्राप्त में से चयन किया। अ-प्राप्त में से चयन किया। बुद्ध के जीवन में चयन के महत्व को अक्सर उपेक्षित किया जाता है। व्याख्याकार कहते हैं, ‘वह भिक्षु ही क्या, जो चयन करे। भिक्षु तो वह है, जो प्राप्त को  संपूर्ण रूप से स्वीकार करे, उसमें से चयन न करे।किंतु बुद्ध ऐसे नहीं हैं। उन्होंने संघ में सबको लिया, किंतु विशिष्ट शिष्यों का चयन किया। उनकी विशिष्टता को  जानने के लिए बार-बार उनका परीक्षण किया। एक बार उन्होंने एक सभा में कहा था, यहां उपस्थित भिक्षुओं में से तीन सौ ऐसे हैं, जिन्हें अर्हता प्राप्त करने के लिए पूर्वनिवासानुस्मृति यानी पूर्व-जन्मों की स्मृति की आवश्यकता ही नहीं है। यह भी एक प्रकार का चयन था। इसी तरह उन्होंने अपनी समस्त उपलब्ध स्मृतियों का आवाह्न नहीं किया, बल्कि चयनित स्मृतियों का किया।

बाक़ी सब को भूल गए। भूल जाने को कहा। जीवन में हर कोई इनका प्रयोग अलग-अलग तरह से करता है। मैं जीवन से निकली कहानियों को आधार बनाकर इन सबको देख रहा हूँ। अपनी कमज़ोर स्मृति की आँखों से। इसीलिए ऊपर सिर्फ़ कहानियाँ ही सुना रहा। किसी गहरी व्याख्या में जाना या कोई एक निष्कर्ष पा लेना अभीष्ट नहीं।

मनुष्य कई चीज़ें भूल नहीं पाता। इसलिए, उसकी ख़ुशी बनी रहती है। इसीलिए, उसका दुख भी बना रहता है। इससे जुड़ी एक कहानी मुझे बहुत पसंद है। चलते-चलते वह भी सुना दूँ। जुडाइज़्म की धार्मिक किताब कब्बाला में यह कहानी है। 

रात की देवी है- लैला। लैला का अर्थ है- श्यामा। रात अँधेरी होती है। इसीलिए देवी का नाम लैला पड़ा होगा। मृत्यु के बाद मनुष्य की आत्मा को लैला अपने पास बुलाती है। वह देखती है कि इसके मन में इतना सब कुछ भरा हुआ है। सारी स्मृतियाँ लेकर अगले जन्म में गया, तो इसका जीना मुश्किल हो जाएगा। वह अपनी तर्जनी से मनुष्य की आत्मा के ऊपरी होंठ को दबाती है और उसकी स्मृति निकाल लेती है। नाक और होंठ के बीच वह छोटी-सी जगह, दबी हुई। छूकर देखो, उस पर तुम्हारी तर्जनी एकदम फिट हो जाएगी। इसीलिए मनुष्यों का ऊपरी होंठ बीच से दबा होता है। इस कहानी के हिसाब से, ऐसा मान सकते हो कि, नाक और होंठ के बीच की इस जगह में तुम्हारे पूर्व-जन्मों की स्मृतियाँ रहती थीं। तुम्हारे होंठ के ठीक ऊपर, लैला की उँगली का निशान है। लैला की छुअन के बिना तुम्हें अगला जन्म नहीं मिलेगा।



Sunday, August 05, 2018

प्रभात की ६ नई कविताएं




जीवन के दिन 

हम तो देखते ही हैं अपने दिन 
जीवन भी हमें अपने दिन दिखाता है 
***

ईंधन 

बोझे से दबे दबे चलते हुए 
वे आँधियों से जूझती हैं
जैसे पेड़ जूझते हैं निरा अकेले 
***

आतप में पेड़ 

साधारण पेड़ हैं ये 
सूखते हुए जीते हुए 

मेरे इलाके के गरीब हैं ये
जीवन के प्रेम पड़े हुए 
***

पीली लूगड़ी 

बाल्टी में कपड़े रखकर नहाने आयी जो घाट पर 
कपड़ों के नीचे छिपाकर लायी तुम थोड़ा अनाज 
रास्ते में छप्पर की दूकान से लिया साबुन 
जिससे धो रही हो लूगड़ी 
जिसमें भरी है खेतों की खक 
और एक छुअन की धक-धक 

गाँव की लड़कियों का एक गोल 
गया है गाते हुए तुम्हारे समीप से 
पीड़ी लूगड़ी को कलर उड़ै बंधा का पाणी सूँ
घासों, पेड़ों और पक्षियों के लिए ही नहीं है सृष्टि में यह दृष्य-
तुम्हारी आँखों में छल-छल आँसू 
***

अनोखा दुख

तब हम साथ रोये थे 
एक दूसरे के लिए रो रहे थे 
जाना भी था, जल्दी भी थी 
जल्दी-जल्दी में जितना रो सकते थे 
उतना रोये थे 
वह दुख था 

आह! वह अनोखा दुख 
संसार के सारे सुख फीके जिसके आगे 
फिर मिला जीवन में 
फिर नहीं मिले हम जीवन में 

कौन जानता है अब हम 
एक दूसरे की मृत्यु के बारे में भी जानेंगे या नहीं 
***

तुम्हारा हिस्सा

तुम्हारे हिस्से के मेरे पाँव 
कोई दूरी तय नहीं करते 
तुम्हारे हिस्से के मेरे हाथ 
पड़े रहते हैं निकम्मे 

तुम्हारे हिस्से के मेरे होंठ
ढँक गए है दिनों की धूल से
तुम्हारे हिस्से की मेरी आँखों में 
फैला पड़ा है सपनों का असबाब 
***

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