गीत चतुर्वेदी : कॉलम 17 : आईने ईश्वर द्वारा भेजे गए जासूस हैं




इस बार अपनी नोटबुक से चुने हुए कुछ वाक्य : 


बहुत थे लोग, मैंने उन्हें नहीं देखा
बहुत था दुख, दरिया में बहा न पाया 
बहुत था प्रेम, पूरा नहीं दे पाया
बहुत था जीवन, उसे एक ही क्यों माना?  

इतना पवित्र है तुम्हारा कंठ कि वहाँ प्रार्थनाओं को नहीं, प्रेम के गीतों को रहना चाहिए

प्रेमी से कुछ छिपा ले जाना राजनीति है 
प्रिय कवियों की सूची बनाना राजनीति है
जो प्रेम मैं तुमसे कर चुका हूं, उसे तुम भी अब छीन नहीं सकती 
इस पंक्ति का उच्चारण करना राजनीति है

गल्‍प शक्तिशाली लोगों की सेवा में लगा हुआ, फल-फूल रहा है। कविता सर्द रात में ठिठुर रहीइतनी भली है कि कंबलचोर को कोस भी नहीं पाती

तुमने पूछा- कविता कहाँ से आती है? / काले कोलतार से आती है / क़मीज़ के उस हिस्‍से से जो पतलून के भीतर है / एक पैर की चप्‍पल के अकेलेपन से आती है / लाइब्रेरी के भीतर किताबों के खर्राटों से / सिर की एक अजनबी नस में हुई पीड़ा से / तुम्‍हारे न पढ़ने से / कभी-कभी मेरी खाँसी से आती है /

मेरी हिचकी / एक अधूरी छूटी कविता द्वारा / लगाई गई पुकार है 
 


मैं तीन जगहों से चलता हूँ, अंत में एक ही जगह पहुँचता हूँ।
अद्वैत की प्रस्थानत्रयी को क्या मैं इस तरह देख सकता हूँ?
*  

भाषा सामूहिक है। भाषातीत निजी। अपने-अपने भाषातीत का आविष्कार हम ख़ुद करते हैं। हमारे भाव-जगत में, जो कुछ भी अनिवार्य है, सब भाषातीत है। अपनी अनिवार्यताओं के अन्वेषक हम ख़ुद हैं।

ख़ुद को कभी ऐसे संकट में मत डालना कि तुम्हें मूर्त व अमूर्त में से किसी एक का चुनाव करना पड़े। फिर भी, ऐसी कोई बाध्यता आ ही जाए, तो अमूर्त को चुनना। शिक्षक मूर्त है, उसके द्वारा दी गई शिक्षा अमूर्त। अक्षर, शब्द और वाक्य मूर्त हैं, उनसे उभरकर आया अर्थ अमूर्त। सिर्फ़ अमूर्त में ही वह क्षमता है, जो तुम्हें अदृश्य की गहराइयों तक ले जा सके।

एक घाव है, जो कभी नहीं भरता। उससे मुस्तक़िल ख़ून बहता रहता है। लेखन यही है। जिस दिन सारा ख़ून निकल जाता है, लिखना बंद हो जाता है। कवि, घाव की संतान है। उसका आधा श्रम उस घाव को नकारने में जाता है और बचा हुआ श्रम उस ख़ून को सहेजने में। मानो या न मानो, जब भी तुम कविता लिखते हो, अपना बहा हुआ ख़ून लिखते हो।

हर पल के भीतर एक अकुलाई अर्जेंसी है : “मुझे जी लो, वरना मैं ख़त्म हो जाऊँगा।”
हर पल के भीतर एक उदासीन उपेक्षा है : “छोड़ो भी, मुझे क्या जी रहे! अभी तो ख़त्म हो जाऊँगा।”

अति-प्राचीन समय में जब कोई बौद्ध-भिक्षु बोध प्राप्त कर लेता था, तब वह छुरा भोंककर अपनी जान ले लेता था। साधना कर-करके मुक्त हो गए, अब जीकर क्या करेंगे? यह आध्यात्मिक आत्महत्या थी और बौद्ध संघ को इससे कोई आपत्ति न थी। उसे सिर्फ़ यह चिंता थी कि हम कैसे मान लें कि आत्महत्या से पहले भिक्षु ने बोध प्राप्त कर ही लिया था? कौन-सी परीक्षा इस बात को तय करेगी? उचित ही था कि जल्द ही बुद्ध ने इस चलन पर रोक लगा दी।

प्रेम के इतिहास में ऐसी घटनाएँ नहीं दिखतीं। कोई यह नहीं कहता कि इस एक क्षण में मैंने संपूर्ण प्रेम पा लिया, अब इसके बाद जीना व्यर्थ है, और फिर ख़ुद को मार डाले। जैसे ही प्रेम की अनुभूतियाँ सांद्र होती हैं, जीवन जीने की इच्छा बढ़ जाती है। प्रेम पाकर जीने का ख़्याल आता है, मरने का नहीं, क्योंकि प्रेम अपने आप में एक मृत्यु है- एक संक्षिप्त मृत्यु!

एक नौजवान जीवन से निराश था। जंगल में एक पेड़ के नीचे बैठा रोता रहता था। एक दिन मृत्यु की देवी वहाँ से गुज़री और उससे पूछा, “तुम इतना दुखी क्यों हो?” उसने कहा, “क्योंकि मैं बेहद असफल हूँ।”

मृत्यु की देवी ने उसे वरदान दिया कि तुम बेहद सफल वैद्य बनोगे, लेकिन सबका इलाज मत करना। मरीज़ के पास जाकर आँख बंद कर लेना। तुम्हें अगर मैं मरीज़ के पैर की तरफ़ खड़ी दिखूँ, तो समझ जाना कि यह ठीक हो जाएगा। अगर मैं उसके सिर की ओर दिखूँ, तो जान लेना कि कुछ ही दिनों में मैं उसे अपने साथ ले जाऊँगी। ऐसे मरीज़ का इलाज करने से मना कर देना।

नौजवान ने ऐसा ही करना शुरू किया और दूर-दूर तक एक सफल वैद्य के रूप में उसकी कीर्ति फैल गई, कि वह जिस मरीज़ को हाथ लगाता है, वह ठीक हो जाता है। वह बहुत सफल व धनवान हो गया।

एक रोज़ उस देश की राजकुमारी बीमार पड़ गई। राजा ने घोषणा करवाई कि जो इसका इलाज कर देगा, मैं इसकी शादी उसी से कराऊँगा। जगह-जगह से वैद्य आए, लेकिन सबने हाथ खड़े कर दिए। नौजवान वहाँ पहुँचा। उसे पहली ही नज़र में राजकुमारी से प्रेम हो गया, लेकिन उसने देखा कि मृत्यु की देवी उसके सिर की ओर खड़ी है।

वह कुछ देर सोचता रहा। वह किसी भी क़ीमत पर राजकुमारी को खोना नहीं चाहता था। उसने चार नौकर बुलाए और बिजली की तेज़ी से पलंग की दिशा बदल दी। अब मृत्यु की देवी राजकुमारी के पैरों की ओर खड़ी थी। नौजवान वैद्य की इस चतुराई से वह बहुत क्रोधित हुई और पैर पटकते हुए वहाँ से चली गई। राजकुमारी ठीक हो गई।

लेकिन उसी रात से नौजवान को सपने आने लगे कि मृत्यु की देवी उसके सिरहाने खड़ी है। वह पूरी रात सिरहाने को पैताना और पैताने को सिरहाना करता रहता, लेकिन देवी हर बार उसके सिर की ओर ही रहती। इससे वह इतना आतंकित रहने लगा कि कुछ ही रातों बाद उसने अपना मानसिक संतुलन खो दिया।

उसके बाद, हर रोज़ वह आत्महत्या की कोशिशें करता और हर बार बच जाता। कहते हैं कि वह अमर है। अब भी उसी जंगल में भटकता है, ख़ुद को मारने की नई-नई तरकीबें ईजाद करता हुआ, पर हर बार ज़िंदा बच जाता हुआ।

जब मृत्यु नाराज़ होती है, जीवन का शाप देती है।

पानी सूख जाता है, लेकिन फ़र्श पर शीतलता बनी रहती है। सूरज डूब जाता है, लेकिन अंधेरी हवा में तपिश बनी रहती है। तुम चली जाती हो, मेरे भीतर तुमसे संवाद बना रहता है।

जो बना रहता है, बचा रहता है, वह क्या होता है? शोक या उत्सव? फ़र्श पर बची शीतलता पानी का शोक है या उत्सव?

मरण कहे बिना स्मरण का उच्चारण पूरा नहीं होता। हम सिर्फ़ उन्हीं पलों को याद कर सकते हैं, जो मर चुके हैं।

माँ के निधन पर शोक करते रोलाँ बार्थ ने लिखा था, “मैं तुम्हारे जैसा नहीं था, क्योंकि मैं तुम्हारे साथ नहीं मरा।”

सिकंदर ने पश्चिमी भारत में भरपूर तबाही मचाई थी। वह सबकुछ ऐतिहासिक है। सेनाएँ स्वभावत: क्रूर होती हैं और उस ज़माने में लूटपाट की विशेष महत्ता थी।

उसके भारत हमले के सौ साल बाद मकदूनिया और यूनान में भयानक प्राकृतिक आपदाएँ आईं। लोग मर रहे थे। शासन असहाय था। इतने संसाधन भी नहीं थे कि जनता की मदद की जा सके।

उन दिनों भारत में अशोक का शासन था। वह तब तक इंसान बन चुका था। उसके बौद्ध प्रचारक यूनान जाते रहते थे। कहा जाता है कि उसने विशेष आदेश दिए। बहुत बड़ी राहत-सामग्री यूनान भिजवाई गई। वह आधुनिक काल नहीं था, फिर भी सरहदों के पार, दुश्मनियों के माहौल में, इंसानी मदद की वह पहल कितनी सुंदर थी।

विद्वान कहते हैं कि यह सिर्फ़ धर्म-प्रचार या राजनयिक निर्णय नहीं था, यह सिकंदर के उत्पातों के प्रति अशोक का बदला था। महान सभ्यताएँ अपना बदला ऐसे ही चुकाती हैं।

इतिहास में हम नायक भले तलाश लें, प्रति-नायक, खलनायक नहीं तलाशने चाहिए, क्योंकि ये दोनों भूमिकाएँ हर किरदार अदा करता है। हर नायक किसी न किसी मोड़ पर खलनायक होता है।

संगीत को यदि पूरी तरह शब्दों में ढाल दिया जाए, तो क्या वह कविता बन जाएगा? कविता के भीतर जो नि:शब्द संगीत होता है, ऐसे में वह कहाँ जाएगा? वह तो शब्दों में आने से मना कर देगा। अगर वह शब्दों में आ गया, तो कविता नष्ट हो जाएगी। तब वह संगीत क्या बनेगा? शायद वह दर्शन बन जाएगा। दर्शन, संसार का चित्र नहीं, बल्कि संसार की व्याख्या के चित्र की योजना है। संगीत भी यही है।

पर सोचने वाली बात यह है कि क्या वह चित्र कभी पूरा भी होता है?  

जिसकी अनुपस्थिति में भी तुम जिससे मानसिक संवाद करते हो, उसके साथ तुम्हारा प्रेम होना तय है। भले वह सौ साल पहले ही क्यों न मर चुका हो। यह तुम्हारे हृदय की नहीं, संसार की बनावट की सीमा है कि तुम उससे कभी मिल न पाओ।

प्रेम अलग शै है, प्रेम की अभिव्यक्तियाँ निहायत अलग।
क़तई ज़रूरी नहीं कि तुम्हारे हिस्से दोनों आएँ।

मंथरता। मेरी मंथरता।

हवाई जहाज़ में बैठती है और बहुत दूर पहुँच जाती है। ट्रेन में बैठती है और बहुत तेज़ी से गुज़रती है। मैं सड़क पर दौड़ता हूँ, तब वह मेरे कंधों पर बैठी रहती है।

गति मेरे लिए क्या करती है? बस, मेरी मंथरता को एक से दूसरी जगह पहुँचा देती है।

जो हर बात पर लड़ते हैं, भूल जाते हैं कि एक दिन वे भी मर जाएँगे।

एक व्यक्ति ने लिखा : पीड़ा। दूसरे ने पढ़ा : सौंदर्यशास्त्र।
एक ही शब्द का उच्चारण, दो लोगों के लिए कितना अलग-अलग होता है।

मेरा मन था कि लौटते समय ट्राम पकड़ूँ, लेकिन मेरे शहर में ट्राम नहीं चलती। ज़ोरों की बारिश हुई, पर सिवाय मेरे पतले होंठों के, कुछ गीला न हुआ।

रास्ते में एक खेत पड़ा। मैंने वहाँ उस पेड़ के बीज बिखेर दिए, जिसे बोते सभी हैं, पर उगता हुआ आज तक कोई ना देख पाया।  

कुएँ के पास एक दरवेश कौओं को पुकार रहा था। हर कौए को पता था कि कौन-सा ‘आओ’ उसके लिए उच्चारा गया है। मेरे गाल कभी नहीं जान पाते कि कौन-सा आँसू किस दुख के लिए निकला था, कौन-सा थप्पड़ किस अपराध के लिए।

दक्षिण की ओर एक जंगल था, जहाँ पेड़ों पर पत्तों की जगह आईने उगे थे। पीले पड़कर गिर गए आईनों को लोग उठा ले जाते और रूप निहारते। मुझे किसी में अपना प्रतिबिंब दिखाई न पड़ा। आईने ईश्वर द्वारा भेजे गए जासूस हैं।

मैं लौट आया। चाहता था कि लौटकर अपने घर पहुँचूँ, पर मेरे शहर में अब मेरा घर नहीं रहता।
कुछ लोगों के हाथ में मेरी तस्वीर थी। मुझे दिखाकर वे बोले, “तुमने इसे कहीं देखा है? हम इसे कब से खोज रहे।”

क्या बताता मैं उन्हें?
कि बहुत दूर, मैं तुम्हारे द्वार पर दस्तक की तरह छूट आया।
* * *


Comments

Sapna jain said…
गहरे और सारभूत तथ्य!बड़ा खजाना है आपके पिटारे में ।
बधाई!!
जिसकी अनुपस्थिति में भी तुम जिससे मानसिक संवाद करते हो, उसके साथ तुम्हारा प्रेम होना तय है।..बेहद खूबसूरत.. रूह को स्पर्श करने वाले वाक्य.. लेखक को शुभकामनायें

इतना गहरा...
मन पढ़ते हैं
बार बार पढ़ना होगा
Harsha Verma said…
इन बेहद सुन्दर पंक्तियों की प्रशंसा में अब कुछ भी कहना मेरे बूते से बाहर की बात है. 🙏
गंभीर भी। सहज भी।
बिलकुल डूब सा गया हूँ पढ़ के | इतनी गहराई कि क्या कहा जाए| अभी भी वहीँ हूँ | बिलकुल शांत पड़ा हुआ | हलकी सी भी आवाज़ गूंजने लगती |
गीत आप हमेशा की तरह मौन कर देते हैं हमें |
Rahul Tomar said…
बहुत बहुत सुंदर सर 💐💐
आशा करता हूँ अगली टेबल लैम्प जल्द ही आए।
Sujata Shunyo said…
बेहतरीन जी ....प्रेम के ऊपर कहा गया , और मेरे द्वारा पढ़ा गया अब तक का सबसे मौलिक लेख
Shandar jindabaad jabarjast
Kapil Bhardwaj said…
लाजवाब ।
Manoj Malik said…
इतनी शब्दों में ताक़त कैसे ले आते हो 😍😍
Janhavi Sant said…
अतिसुंदर ...!
Deepti Singh said…
ये बहुत शानदार है सर बहुत बहुत कमाल
Narendra Tiwari said…
गीत सर
हर बार की तरह इस बार भी आपका लिखा जादू है बस चुम्मा के बाद डायरेक्ट साष्टांग होने की मुद्रा समझें।
😍😘
🙏🙏🙏
Wowww...tremendous explanation of love. 👏👏👏👏👌👌👌👌
Anil Tiwari said…
संसार में जितने प्रेम के प्रतीक स्मारक हैं, वो उन व्यक्तियों ने बनाये हैं जिनका रोम रोम पीड़ा और विरह से भरा था। इनमें मुझे तो कहीं प्रेम नहीं दिखाई देता चाहे ताज़महल हो या बोल्ट कैसल न्यूयॉर्क या फिर स्वीट हार्ट ऐबी स्कॉटलैंड।
सटीक है👍
Lipsa Patel said…
राजनीति ही सही पर कुछ शब्द सुनने को बेक़रार रहता है दिल
Shukriya share karne ke liye..boht kamm hote hain jinko pardne ke baad aap sochte ho. Mere pasandeeda writer.
जिसकी अनुपस्थिति में भी तुम जिससे मानसिक संवाद करते हो, उसके साथ तुम्हारा प्रेम होना तय है। भले वह सौ साल पहले ही क्यों न मर चुका हो। यह तुम्हारे हृदय की नहीं, संसार की बनावट की सीमा है कि तुम उससे कभी मिल न पाओ।
Neelima Pandey said…
शानदार!
बेहद खूबसूरत
Rahul Tomar said…
"जब मृत्यु नाराज़ होती है, जीवन का शाप देती है।"

कितना खूबसूरत लिखा है💐💐💗💗
Anita Manda said…
'मेरे गाल कभी नहीं जान पाते कि कौन-सा आँसू किस दुख के लिए निकला था'
भाषा सामूहिक है, भाषातीत निजी ।

फिर भी कभी चुनना पड़े तो अमूर्त को चुनना ।

सुखद अनुभव है पढ़ना, लेखक को साधुवाद
Kiran Yadav said…
Kitna khoobsurat likha h
Neelam A Kumar said…
अनमोल है ऐसा अनुराग।
"प्रेम एक संक्षिप्त मृत्यु"...❤️❤️❤️
Sapna Jain said…
क्या उध्दृत करूं.. क्या छोड़ दूं।मानो हर सवाल का कोई जबाब हो आपकी नोटबुक में।जितनी बार पढ़ो, कुछ नये मायने मिल जाते हैं।बहुत शुक्रिया हम सबसे शेयर करने के लिए👍
Kuldip Kaur said…
Geet Chaturvedi ji har vaar literature ke baare main Naye nukte dete hai Sochne ke liye.

More than just dry philosophical questions.
Jitesh Singh said…
मेरी हिचकी एक अधूरी छूटी कविता द्वारा लगाई गई पुकार है

bahut achha likhe hain pura padha mai
Hema Awasthi said…
कवि घाव की संतान है ...
आह से उपजा होगा गान ♥
Rupendra Pratap said…
AP likhte rahiye hum padhte rahenge..
Pankaj Sharma said…
Sir...कम्माल का लिखा है सर आपने।
एक अलग तरह का आनन्द मिलता है पढ़ के आपको,सच कहूं तो काफी चीजे समझ मे नही आती हैं,but समझने का प्रयास करता हूँ,फिर भी मजा आता है पढने में।
मुझे आपकी नोटबुक चाहिए ,अगर प्रिंट में हो तो।
Maya Kaul said…
कितनी सुंदर कितनी सच्ची और कितने संगीतमय कॉलम हैं उसके,,,ऐसा लगता है तुम लिखते नही सुनाते हो वो भी नही जीते हो,,,क्या कहूं बहुत सुंदर,,,तृप्त कर दिया बुद्धि को भी हृदय को भी ,,,,,मुझे पूरी पढ़ना है अमेजन पर मिल जाएगी क्या???
Kalpana Pandey said…
Ahaaa आप कितना शानदार लिखते हो
हमेशा की तरह अद्भुत ... हर पंक्ति दर्शन है, हर पंक्ति जीवन
Pravin C Roy said…
हमेशा आपको पढ़कर स्वयं अपने में झांकता हूं। शुक्रिया कवि।
क्या ग़जब बात कहे आप👌
Purnima vats said…
आपके लिखे में जीवन का मौन झाँकता है और उस मौन के भीतर एक संपूर्ण जीवन |
मन शांत हो गया पढ़कर। सादर ।
Anupma Singh said…
वाह! बहुत बढिया

Shruti Gautam said…
कहते है कि कहानी तो हमेशा वही रहती है बस कहने का तरीका बदल जाता है। गीत जी की कहन जितनी सहज है उतनी ही गम्भीर भी। कुछ पंक्तियों ने बहुत परेशान किया है ज़ेहन को। कुछ मुस्कुराहट ले आई। नोटबुक के शेष अंशो की प्रतीक्षा रहेगी।

हर पल के भीतर एक अकुलाई अर्जेंसी है : “मुझे जी लो, वरना मैं ख़त्म हो जाऊँगा।”
हर पल के भीतर एक उदासीन उपेक्षा है : “छोड़ो भी, मुझे क्या जी रहे! अभी तो ख़त्म हो जाऊँगा।”

अकुलाहट और उदासीनता के बीच फंसी हुई ज़िन्दगी को कोई सुकून है तो वह कुछ अर्थवान पठन है।

धन्यवाद एवं शुभकामनाये।

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