गीत चतुर्वेदी : कॉलम 14 : प्रूस्त को कोई नहीं पढ़ता





हाल ही में दिल्ली में हुए रज़ा उत्सव में मुक्तिबोध पर एक वक्तव्य देते हुए विष्णु खरे ने कहा था, “मुक्तिबोध का लेखन क्लासिक्स में शुमार है। यह ऐसा समय है, जब मुक्तिबोध को पढ़े बिना भी उन पर बात की जा सकती है। उनकी ब्रांड-वैल्यू इतनी दमदार है कि उन पर बात करने के लिए उन्हें पढ़ना अनिवार्य नहीं रह गया।”

बात कई लोगों को नागवार गुज़री थी, लेकिन मुझे उनका यह निरीक्षण बहुत सही लगता है। जिन लेखकों का नाम सबसे ज़्यादा बार लिया जाता है, दरअसल, उन्हें बहुत कम पढ़ा जाता है। ऐसा नहीं है कि उन्हें हमेशा से ही कम पढ़ा गया हो। एक ज़माने में उन्हें बहुत पढ़ा जाता है, दो-तीन पीढ़ियाँ उन पर बहुत तल्लीन होकर बात करती हैं, उन पर चर्चा करना साहित्यिक समाज का एक नया चलन होता है, वे दो-तीन पीढ़ियाँ ही इतनी अधिक बातें कर लेती हैं कि आने वाली पीढ़ियाँ बस नाम से काम चला लेती हैं। उन पर हुई बातों को ही ध्यान से सुन लिया जाए, तो उन्हें पढ़े बिना उन पर चर्चा करने जितनी लियाक़त आ जाती है। कई सारी पंक्तियाँ इतनी बार दुहराई जा चुकी होती हैं कि वे याद हो जाती हैं। उन बातों को पार कर मूल लेखक तक पहुँच पाना बहुत श्रमसाध्य काम है। ज़्यादातर लोग अलसा जाते हैं।

और यह विडंबना है। किसी भी कृति की सूक्ष्मतम महत्वाकांक्षा क्लासिक में तब्दील हो जाने की होती है। क्लासिक बन जाने के बाद उसकी स्थिति घर के उस बुज़ुर्ग जैसी हो जाती है, जिसे आते-जाते सब प्रणाम कर लेते हैं, लेकिन जिसके जीवन के बारे में किसी को अधिक जानकारी नहीं होती। ग्रीक भाषा में लतीफ़ा चलता है। कोई आपसे इलियड के बारे में बात करने की कोशिश करे, तो उसे ख़ारिज करते हुए कह दो, हमें तो ओडीसी पसंद है। अगर वह ओडीसी के बारे में बात करने लगे, तो उसे ख़ारिज करते हुए कह दो, हम तो इलियड वाले हैं। अगर वह दोनों किताबों के बारे में बात करे, तो उससे होमर के अंधत्व और उसके कारण आई चुनौतियों पर बात करने लग जाओ। क्लासिक्स पर बात करने का यह वैश्विक व आमफ़हम तरीक़ा है। टॉलस्टॉय, दोस्तोएव्स्की, काफ़्का, नीत्शे, चेखॉव आदि के बारे में यह सिद्ध हो चुका है कि लोगों को इनके नाम व ग्लैमर से अधिक प्रेम है। पश्चिम में ऐसे कई सर्वे हो चुके हैं या होते रहे हैं, जिनसे पता चलता है कि इनकी या इन जैसे महान लेखकों की किताबें शेल्फ़ में लगाकर रखने वाले अधिकांश लोगों ने उन्हें नहीं पढ़ा है, पूरा नहीं पढ़ा है या उनकी मुख्य बातों-कृतियों को वे समझ नहीं पाते।

और यह कोई अपराध नहीं है। सबकुछ पढ़ लिया जाए, सबकुछ समझ लिया जाए, यह क़तई ज़रूरी नहीं। हम बिना पढ़े, बिना समझे भी कुछ लेखकों से प्रेम कर सकते हैं, क्योंकि यह प्रेम है। कोई ज़रूरी नहीं कि प्रेम, मूलतत्व के साथ किया जाए, छवि से भी किया जा सकता है। लेखक की इमेज इतनी विराट हो कि आप उस इमेज के प्रेम में पड़ सकते हैं और उसे लेखक के प्रति प्रेम मान सकते हैं। मेरे एक मित्र हैं। काफ़्का उनके सबसे पसंदीदा लेखक, लेकिन उन्होंने काफ़्का की एक भी किताब नहीं पढ़ी। उनकी आलमारी में काफ़्का का लिखा, काफ़्का पर लिखा अधिकांश मिल जाता है, लेकिन उन्होंने नहीं पढ़ा। उन्होंने काफ़्का के बारे में लोगों से सुना, उस आत्महंता छवि के रोमान में पड़े, काफ़्का के कुछ उद्धरण जाने, और दिल दे बैठे। काफ़्का ऐसा जादूगर है कि एक बार आपने दिल दे दिया, तो क्या मजाल कि दिल कभी वापस मिल जाए। बिना पढ़े भी दिल लूट ले जाएगा। मेरे वह मित्र काफ़्का टी-शर्ट, काफ़्का चॉकलेट, काफ़्का कॉफ़ी मग- यह सब खोजते-जमा करते रहते हैं। इस मामले में चे ग्वेरा कहीं बड़े उदाहरण हैं। क्रांति के विचारों ने उनकी बौद्धिक ब्रांड-वैल्यू में इतना इज़ाफ़ा न किया होगा, जितना टी-शर्ट व टोपियों ने कर दिया।

अधिकांश प्रेम छवियों से किया गया प्रेम होता है, क्योंकि मूल तत्व पतेदार होकर भी लापता बना रहता है। मीरा का प्रेम क्या है? वह कृष्ण की छवि से किया गया प्रेम है। कृष्ण थे या नहीं, किसी को नहीं पता, लेकिन हमारे सांस्कृतिक-धार्मिक विमर्श में कृष्ण हमेशा बने रहते हैं। जो कहीं नहीं है, वह सर्वत्र है—मीरा का प्रेम इस विचार से संचालित होता है, क्योंकि मूल तत्व पतेदार होकर भी लापता है और उसकी छवि सर्वत्र उपलब्ध है। हमारे मन में भी। मीरा को उस छवि से प्रेम हो जाता है और वह दीवानी हो जाती हैं। उस दीवानेपन में कृष्ण उन्हें दिखने लगते हैं। किसी और को नहीं दिखते, क्योंकि किसी और में वैसी दीवानगी नहीं। यानी दीवानगी भी एक अर्हता है। जिनमें नहीं है, वे हीन हैं, इसीलिए प्रेम से भी हीन हैं। मीरा सुपीरियर हैं, क्योंकि उनके पास एक छवि है, छवि से प्रेम है, प्रेम की दीवानगी है। दीवानगी अनिवार्य गुण है। वह भीतर हो, तो छवि भी प्राप्त हो जाएगी और उससे साक्षात्कार भी हो जाएगा। दीवानगी हो, तो पत्थर के अनाकार में भी देवाकार दिख जाता है। लेकिन मूल तत्व से प्रेम हो, तो दीवानगी की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। मूल तत्व को जान लेती, तो समझ जाती कि यदि कहीं नहीं होकर भी सर्वत्र हैं, तो इसका अर्थ यह है कि कृष्ण तो मेरे भीतर हैं, चौबीस घंटा मेरे साथ हैं। भले मैं राणा के साथ रहूँ या अकेली रहूँ, कृष्ण-नामी-मूल-तत्व हर घड़ी मेरे अंदर है, बिना दीवानी हुए, बिना जोगन बने भी कृष्ण से प्रेम कर सकती हूँ। कृष्ण को कोई एतराज़ भी नहीं कि राणा मेरे साथ रह रहा। एतराज़ राणा को है, और राणा के एतराज़ से मीरा को एतराज़ है। क्योंकि दोनों ही मूल-तत्व से अपरिचित हैं। मीरा का प्रेम, दरअसल, प्रेम की एक शैली है। वह प्यार की शैलीकार हैं। जोगन बनकर वह आत्मिक प्रेम का बहिर्मुखी उत्सव मनाती हैं।

मीरा की कहानी का अंत बहुत दिलचस्प है। जनश्रुति है कि मीरा एक रोज़ कृष्ण की मूर्ति में समा गई थीं। यानी कृष्ण ने उन्हें अपने भीतर शामिल कर लिया था। कहानी का यह अंत, दरअसल,  मीरा के ताउम्र चले प्रेम-प्रदर्शन का विसर्जन है। एक विराट प्रेम-प्रदर्शन, जिसमें मीरा सुध-बुध खो बैठी हैं, समाज-परिवार छोड़कर दीवानी हो गई हैं, उस छवि की तलाश में दर-दर भटक रही हैं, उस छवि का मूर्त रूप उन्हें हासिल नहीं होता, लेकिन मूर्ति उन्हें अपने भीतर शामिल कर लेती है। जैसे मैं तुम्हारे भीतर रहा, तुम मेरे भीतर आ जाओ। प्रेम में अशांत मीरा को कृष्ण शायद ऐसे ही शांत कर सकते थे। तर्कसंगत है कि मीरा का प्रेम, शुद्ध प्रेम नहीं, बल्कि उस पर भक्ति के गुण हावी हैं और भक्ति हमेशा अशांत करती है।

अधिकांश लोग ईश्वर से प्रेम करते हैं। वह कहीं है भी या नहीं- किसी को नहीं पता, लेकिन उसकी एक छवि उनके भीतर है। उस छवि से प्रेम हो जाता है।  ईश्वर से प्रेम करने के लिए ईश्वर को जानना ज़रूरी नहीं, तो लेखक से प्रेम करने के लिए लेखक को पढ़ना कहाँ से ज़रूरी हो गया? पढ़कर प्रेम कर लो, तो बोनस है। बिना पढ़े भी प्रेम कर लिया, तो क्या बुरा है! प्रेम तो आपके अंदर है। करने के लिए एक सुयोग्य, सुटेबल छवि की दरकार है। जैसे ही मिली, प्रेम हो गया।

एक लेखक महोदय चेखॉव की कहानियाँ पढ़ रहे थे। दूसरे आए और व्यंग्य से कहा, “अरे? अभी तक चेखॉव ही पढ़ रहे, हमने तो बीस साल पहले पढ़कर छोड़ दिया था।” पहले ने कहा, “छोड़ दिया? वह ऐसा लेखक नहीं, जिसे पढ़कर छोड़ दिया जाए। अगर कोई छोड़ सकता है, यानी उसने चेखॉव को पढ़ा ही नहीं।”

क्लासिक्स तो होते ही इसलिए हैं कि उन्हें बार-बार पढ़ा जाए, मरते दम तक पढ़ा जाए। जैसे ही आप उसके मूल-तत्व को पहचानेंगे, वह आपके भीतर रहने लगेगा। आप बार-बार उसके पास जाएँगे। एक बार पानी पी लेने से पूरे जीवन की प्यास नहीं मिट जाती। आप बार-बार पानी पीते हैं, अनिवार्यता के तहत पीते हैं, क्योंकि आपकी देह, पानी के मूल तत्व को पहचानती है। वह पानी की छवि से प्रेम नहीं करती, उसके मूल तत्व से करती है, इसीलिए उसे अपने लिए एक अनिवार्यता बना लेती है, क्योंकि वही मूल तत्व देह के भीतर भी है। जिन मूलभूत तत्वों से प्रकृति बनी है, उन्हीं से मनुष्य की देह भी बनी है। देह और प्रकृति के बीच एक अविश्वसनीय तालमेल होता है, क्योंकि दोनों एक-दूसरे के मूल तत्वों को पहचानते हैं।

किताबों, लेखकों, कलाकारों से भी हममें से कई इसी तरह प्रेम करते हैं। कुछ लोग छवि की तरह, कुछ लोग मूल तत्व की तरह। किसी कृति का क्लासिक होना दीवानगी या अनिवार्यता के उस राडार में प्रविष्ट होना है। क्लासिक्स को पढ़ना आसान नहीं होता। पहले तो वे आपके युग की नहीं होतीं, इसलिए उनके युग में जाकर उन घटनाओं व मानसिकता से तालमेल बिठाने में समय लग जाता है। नई पीढ़ी ऐसी किताबों को पढ़ना शुरू करती है, तो कई बार भयंकर उबाहट में चली जाती है। अपनी भाषा और संरचना में वे इतनी पुरानी पड़ चुकी कृतियाँ होती हैं कि उनके साथ सामंजस्य बना पाना, उस भाषिक आनंद को संपूर्णता में प्राप्त कर पाना बेहद मुश्किल होता है। तब बहुत सब्र की ज़रूरत पड़ती है। भाषा, शैली, संरचना, कथ्य जैसी चीज़ों से ऊपर उठकर धैर्य के साथ उस कृति में प्रवेश करना होता है। टॉल्स्टॉय की ‘वार एंड पीस’ एक उदाहरण है। उसका शुरुआती हिस्सा फ्रेंच में लिखा हुआ है। टॉलस्टॉय जिस कुलीन समाज का चित्रण कर रहे, तत्कालीन रूस में भी वह शान के लिए फ्रेंच का प्रयोग करता था। अगर आपको फ्रेंच नहीं आती, या आपके पास जो संस्करण है, उसमें अनुवादक ने फ्रेंच वाले हिस्सों का अनुवाद न किया हो, तो आपका उस किताब में प्रवेश कष्टकारी होगा। एक पत्रिका ने इस तरह की क्लासिक किताबों की सूची बनाई थी, जिसमें टॉल्स्टॉय की यह किताब सबसे ऊपर थी-  जिसके बारे में सब बात करते हैं, लेकिन जिसे हक़ीक़तन पढ़ते कम ही लोग हैं।

एक पाठक, जो लेखक भी है, की नज़र से ऐसे क्लासिक्स को पढ़ने के बाद एक चीज़ बेहद बारीकी से समझ में आती है कि भाषा, शैली, वस्तु, संरचना, कथ्य- ये सब गौण चीज़ें हैं, अस्थायी हैं, समय के साथ परिवर्तित हो जाती हैं। ये सब समकालीन होती हैं, अपने आप में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन महज़ अपनी समकालीन तरुणाई में। जैसे ही समय का एक बड़ा खंड बीतता है, इनकी वृद्धता, वैभवहीनता और निरर्थकता खुलकर सामने आ जाती हैं। ये सब महज़ सिंगार हैं, असल नहीं हैं। इन सबके सहारे कोई रचना कभी क्लासिक नहीं बन पाई। कैसा उलट-चक्र है कि किसी समकालीन कृति पर बात करते समय लोग इन्हीं मुद्दों को आधार बनाकर अपना कहा आगे बढ़ाते हैं, लेकिन जैसे ही वह कृति क्लासिक की श्रेणी में गई, इन मुद्दों पर बातों का सिलसिला कम से कम होता जाता है।

फिर वह क्या है, जिससे कोई कृति क्लासिक बन जाती है? यह एक रहस्य है। इसका कोई एकल जवाब नहीं, जिस पर लोग एकमत हो जाएँ। और यह भी क्लासिक होने की निशानी है।

हमारे यहाँ सबसे बड़ी किताब है- महाभारत। इस देश-भूमि पर जितनी कृतियाँ रची गईं, उनमें संभवत: सबसे सुंदर, सबसे जटिल, सबसे विस्तृत, सबसे सूक्ष्म कृति। मोटा-मोटी उसकी कहानी सब लोग जानते हैं। टीवी सीरियल बनने के बाद उसकी कहानी के बारे में लोगों की जानकारियाँ और बढ़ीं। महाभारत पर हर कोई अपनी-अपनी सीमा के तहत कुछ न कुछ बात कर सकता है, लेकिन उस किताब को कितनों ने पढ़ा है? सिर्फ़ आज की बात नहीं कर रहा, बरसों, शायद सदियों, से ऐसा है कि उस किताब के बारे में सबसे ज़्यादा बात की जाती है, लेकिन उसे उतना ही कम पढ़ा जाता है। उत्तर भारत में तो परंपरा के तहत उसे न पढ़ने, घर में न रखने की सलाह दी जाती है, क्योंकि ऐसा माना जाता है, महाभारत पढ़ने, उसे घर में रखने से कलह बढ़ता है। क्लासिक का एक गुण होता है कि बिना पढ़े भी लोग उसके बारे में बात कर सकते हैं। और यह गुण महाभारत में दिखता है।

बोर्हेस नए लेखकों को सलाह देते थे, ‘जमकर क्लासिक्स पढ़ो, लेकिन अपनी नहीं, दूसरी भाषाओं के क्लासिक्स, क्योंकि अपनी भाषा के क्लासिक्स को आप अमूमन बिना पढ़े ही जान लेते हैं।’ जब दूसरी भाषाओं के क्लासिक्स को ग़ौर से पढ़ते हैं, तब ख़्याल आता है कि अरे, क्लासिक्स में मनुष्य की स्थितियों का ऐसा सूक्ष्म वर्णन होता है। जो मोटा-मोटी कहानियाँ हम अपने क्लासिक्स के बारे में जानते हैं, क्या उनमें भी ऐसी सूक्ष्मताएँ हैं? यह प्रश्न हमें जिज्ञासु बनाता है और हम अपनी भाषा व संस्कृति के क्लासिक्स की ओर जाते हैं। हिंदी व भारतीय भाषाओं के कई लेखकों के आत्मकथ्य, आत्मकथाएँ या वैसा लेखन पढ़ने के बाद एक बात पर ध्यान जाएगा- कई लेखक अपनी तरुणाई में ऐसे प्राचीन या क्लासिक साहित्य का गंभीर अध्ययन नहीं करते, लेकिन अधेड़ या वृद्ध होने के बाद उस दिशा में ज़रूर बढ़ते हैं। वे कितना गहरे गए, यह उनकी जिज्ञासा और ज़रूरत पर निर्भर करता है, लेकिन अक्सर वे दूसरी भाषा-संस्कृति के क्लासिक्स के अध्ययन के बाद अपनी संस्कृति व इतिहास की उन किताबों की ओर लौटते हैं, जिनका कथा-सार उन्हें पहले से पता होता है किंतु जिन्हें विस्तार से पढ़ने की जहमत उन्होंने अब तक न उठाई थी।

एक आम मान्यता है कि महाभारत, धर्म की किताब है। अधर्म पर धर्म की विजय की कथा है। इसीलिए कृष्ण द्वैपायन ने उसका आरंभिक नाम ‘जय’ रखा था, जो बाद में महाभारत हो गया। भगवद्गीता वाले हिस्से इतने अधिक चर्चित व उद्धृत हैं कि उन्होंने महाभारत को लगभग ढाँप रखा है। धर्म और अधर्म का जो संग्राम गीता में है, उसने एक आम धारणा बना ली कि पूरे महाभारत में यही होगा। धर्म और अधर्म को पूरी सचाई के साथ विश्लेषित करने में मनुष्य हमेशा से असफल रहा है। जिस किताब को धर्म-विजय की सबसे बड़ी किताब माना जाता है, वह भी धर्म की एक सच्ची व सर्वमान्य परिभाषा दे पाने में नाकाम रहती है। यहाँ धर्म का अर्थ सत्य से लिया जाए। सत्य परिभाषा से बाहर होता है, लेकिन उसके बावजूद यह किताब सत्य को परिभाषित करने का एक बेहद ईमानदार प्रयास करती है। शांति-पर्व में यह कोशिश बहुत गहरे तक जाती है। दरअसल, शांति-पर्व न होता, तो महाभारत कभी इतनी बड़ी किताब न बन पाती। वह युद्ध की पृष्ठभूमि व उसके वर्णन की किताब-भर होती। जैसे होमर की ईलियड है। शांति-पर्व एक निर्णायक बढ़त है, जिसे वेद व्यास की महान प्रतिभा प्राप्त करती है और पूरी मानव-सभ्यता को भेंट करती है। वेद व्यास, युधिष्ठिर से कहते हैं- आओ, मैं तुम्हें सबसे बड़ा रहस्य बताता हूँ जो कि ब्रह्म-रहस्य है। युधिष्ठिर चौकस होकर सुनने लगते हैं। व्यास कहते हैं- मनुष्य से श्रेष्ठ इस सृष्टि में कुछ भी नहीं है, यही ब्रह्म-रहस्य है।

और यही इस किताब का सार है। वेद व्यास और श्रीकृष्ण लाख कोशिश कर लें, धर्म की अचूक परिभाषा नहीं दे सकते। हर परिभाषा में दुर्योधन का धर्म अलग होगा और युधिष्ठिर का अलग, और दोनों एक-दूसरे के धर्म को अधर्म कहते रहेंगे। एक-दूसरे का सत्य, उन्हें असत्य लगता रहेगा। अपना छल, युक्ति लगेगी। दूसरे की युक्ति, छल लगेगी। यह झुटपुटा हमेशा बना रहेगा। दुनिया का सबसे बड़े कवि वेद व्यास, सबसे बड़े कलाकार श्रीकृष्ण हमेशा असमर्थ रहेंगे, क्योंकि इनकी परिभाषा संभव ही नहीं। बिना पक्ष लिये इन बिंदुओं का सटीक निर्धारण नहीं हो सकता और जैसे ही आपने पक्ष लिया, ये बिंदु ही समाप्त हो जाते हैं। पक्ष लेते ही सत्य का सवाल गौण हो जाता है। लेकिन ख़ुद व्यास कह देते हैं कि मेरी किताब का रहस्य धर्म व अधर्म के युद्ध से अधिक मनुष्यता के महास्वप्न में है।

तोमास त्रांसत्रोमर की एक कविता याद आती है :

दो सत्य एक-दूसरे की तरफ़ बढ़ रहे हैं
एक भीतर की तरफ़ से आ रहा है, दूसरा बाहर की तरफ़ से।
जिस बिंदु पर दोनों का संगम होगा,
ठीक वहीं पर हमारे पास एक अवसर होगा
कि हम अपने आत्म की एक झलक पा सकें।

यह जो संगम का बिंदु है, जो संधि-स्थल है जिसे संध्या कहते हैं, जहाँ दो चीज़ें जुड़ती हैं, कला के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है। जहाँ अवधारणाएँ सबसे क़रीब होती हैं, आपस में मिलती हैं, वही बिंदु। धर्म व अधर्म को मिला देने वाला बिंदु। ईश्वर व शैतान को जोड़ने वाला बिंदु। सत्य व असत्य के संगम का बिंदु। यही वह जगह होती है, जहाँ मनुष्यता की सबसे सच्ची झलक पाने का एक अवसर होता है। क्लासिक, इसलिए क्लासिक होते हैं कि वे हमेशा इस बिंदु को तलाश कर रहे होते हैं, इसी को पाने की कोशिश करते हैं। वेद व्यास का बताया हुआ ब्रह्म-रहस्य कि “मनुष्य से श्रेष्ठ इस सृष्टि में कुछ नहीं” में व्याप्त मनुष्यता का स्वप्न, मनुष्य के जीवन की स्थितियों के चित्रण से पाया जाता है।

और यह कितनी साधारण-सी बात है! जो ब्रह्म-रहस्य वेद व्यास ने बताया, वह महाभारत पढ़े बिना भी हमें पता है। मनुष्यता को बचाए रखना है, मनुष्यता ही सर्वश्रेष्ठ गुण है- यह कितनी क्लीशे, कितनी मामूली क़िस्म की बात लगती है। इसे जानने के लिए किसी मोटी-सी किताब को पढ़ने की ज़रूरत नहीं। क्लासिक का यह एक महत्वपूर्ण गुण है कि वह आपको वह चीज़ बताता है जिसे आप साधारणतया पहले से जानते हैं, लेकिन क्लासिक की शक्ति इसमें है कि उसे पढ़ने के बाद आप जानी हुई उस बात में भरोसा करने लगते हैं।

जानी हुई हर बात में हम कहाँ भरोसा कर पाते हैं? यह भरोसा पाने के लिए हमें एक बाहरी मदद की ज़रूरत होती है। जैसे हम क्लासिक के बारे में बात करते हैं, लेकिन उसे पढ़ते नहीं। उसी तरह, ब्रह्म-रहस्य को हम जानते हैं, लेकिन उसमें भरोसा नहीं करते। जानी हुई बात के बावजूद क्लासिक को हम पढ़ेंगे, बार-बार पढ़ेंगे तो उस बात में हमारा भरोसा गहरा होता जाएगा। जैसे मनुष्यता की श्रेष्ठता के विचार का हम अभ्यास करेंगे, बार-बार करेंगे, तो इस विचार में हमारा भरोसा गहरा होता जाएगा।

लेकिन यह आसान नहीं है। ब्रह्म-रहस्य पता होने के बाद भी दुनिया का सबसे बड़ा युद्ध हुआ, होता रहा है। क्योंकि ब्रह्म-रहस्य एक बेहद मामूली रहस्य है। ब्रह्म-रहस्य की छवि इतनी विराट है, उसकी ब्रांड-वैल्यू इतनी बड़ी है कि हमें कोफ़्त होती है कि इसके भीतर इतनी मामूली बात छिपी हुई है? खोदा पहाड़, निकली चुहिया? इस मामूलियत को पड़ा रहने दो, हम विराट ब्रांड-वैल्यू ही थामे रहेंगे!

क्योंकि हम छवि से प्रेम करते हैं, मूल तत्व से नहीं। उसे जानते तक नहीं है। हम क्लासिक या विराट या बड़े होने की छवि-मात्र से प्रेम करते हैं, उसे पढ़ते नहीं। लेकिन मोटा-मोटी जानते हैं। जैसे प्रूस्त को जानते हैं।  अमेरिकी साहित्य-समाज में एक लतीफ़ा चलता है-  “प्रूस्त को वह दूसरी बार पढ़ रहा है क्योंकि बरसों पहले उसने पहली बार पढ़ रखा है। तुमने ज़िक्र किया, तो उसने दूसरी बार पढ़ना शुरू कर दिया।” जबकि सचाई यह है कि प्रूस्त को कोई नहीं पढ़ता, सिर्फ़ उसका नाम लेता है। जैसे मनुष्यता का सिर्फ़ नाम लिया जाता है।


Comments

what makes a classic what it is is indeed an intriguing inquiry but more importantly I believe because human dilemmas are a constant and hence books that we find connect with across cultures or as we popularly call universal are in fact those that deal with these intensely personal human conflicts that are timeless
Harsha Verma said…
यह लेख कुछ बरसों से मन में चल रहे मूलतत्व और छवि से प्रेम(यदि इसे dilemma कह सकें, नहीं तो प्रश्न कहना भी शायद गलत न हो)को फिर से जैसे समक्ष रख रहा है, लेकिन एक बड़े ही बेहतर और साफ लहज़े में, जिसे बार-बार पढ़ने और समझने की ज़रूरत है. इसके लिए आपका आभार :)

"दो सत्य एक-दूसरे की तरफ़ बढ़ रहे हैं
एक भीतर की तरफ़ से आ रहा है, दूसरा बाहर की तरफ़ से।
जिस बिंदु पर दोनों का संगम होगा,
ठीक वहीं पर हमारे पास एक अवसर होगा
कि हम अपने आत्म की एक झलक पा सकें।"
तोमास की यह कविता भी बेहद सुन्दर लगी,इसकी गहराई को महसूस करते हुए उस संगम पर टिक पाने के लिए भी कितनी ईमानदारी और साहस चाहिए..
pankaj pandey said…
उम्दा लेख।कितनी अच्छी बात।गीत अपने आयामों से हैरान करते हैं।इस कडी में ये लेख बेहतर है।
Govind Gautam said…
मैं इस लेख को साझा करने के लिये Anurag भाईसाहब को,
और लिखने के लिये Geet भाईसाहब को बहुत सारी मुहब्बत भिजवा रहा हूँ ।
बहुत ही शानदार लेख है । इस लेख को पढ़ते ही सुबह बहुत ख़ूबसूरत हो गई है ।
Anita Manda said…
अद्भुत !
Kavita Malaiya said…
मुझे तो लगता है,पढ़ना , सिर्फ पढ़ना नही, उसके साथ एक प्राण हो जाना है, पढ़ने का सुख तो उसी से मिलता है, हाँ, जैसे कोर्स की पढ़ाई कुंजी से की जाती है, उस तरह से पढ़ना हो तो फिर तो वो तो सचमुच जानकारी के लिए है, सुख के लिए नही।लेकिन जिन्हें अपने ज्ञान का नाम कमाना हो उनके लिए तो जानकारी भी सुख का निमत्त हुई..तो ठीक ही है।
Sudhanshu Gupt said…
क्या बात है यही आज के दौर का सच है, हम बिना पढ़े और बिना समझ ही किसी से प्रेम या नफ़रत कर सकते हैं कर रहे हैं!
Rachna Bhola Yamini said…
💟
Rahul Tomar said…
"एक बार पानी पी लेने से पूरे जीवन की प्यास नहीं मिट जाती। आप बार-बार पानी पीते हैं, अनिवार्यता के तहत पीते हैं, क्योंकि आपकी देह, पानी के मूल तत्व को पहचानती है। वह पानी की छवि से प्रेम नहीं करती, उसके मूल तत्व से करती है"

सर बहुत शानदार लिखा है !! 🙏🙏
बहुत सुन्दर,,,, पूरा पढा,,,, क्लासिक की तरह ही,,,, उपर से ही निकल गया,,,, कृष्ण, मीरा, महाभारत, सभी,,,,, वाह गीत जी,,,, बहुत सुन्दर
प्रतिक्रिया और इससे परे हर बार आपको सिर्फ़ शुभकामना देना ही मुझे सबसे सही लगता है. क्लासिक की तरह आपको भी पढ़ के भरोसा अपना विस्तार पाता है. कॉलम दस में भुजंग मेश्राम का वाकया... ऐसा लग रहा है कि भुजंग ने मुझे फोन किया था !!!!
Vinod Purohit said…
अद्भुत
Arun Sheetansh said…
शानदार है भाई
हम सत्य के करीब आने से या पा लेने से डरते हैं, उसे जाने अनजाने टालते रहते हैं, क्योंकि उस को पाते ही झूठ के आवरण गिर जाते हैं, वैसे ही एक चर्चित क्लासिक को पढ़ने में बहुधा एक डर समाहित है, उस पे चर्चा करेंगे मोटा मोटी समझ लेंगे पर पढेंगे नही, डरते है कि कही नींद मे खलल न पड़ जाये। अध्यात्म की बाते करना गुरू से प्रेम करना ये सब मूल तत्व को टालने के बहाने है।
बहुत स्पष्ट व सटीक कहा है आपने!
ऐसा भी होता होगा कि जिन्हे सत्य के साक्षात्कार हु हैं, उनका पढना लिखना ओम मे सिमटकर रह गया हो ?
Sanjay Jaiswal said…
हमारे पास एक अवसर होगा
गीत जी लोग बाहरी आवरण को लेकर इतने संजीदां है की आत्म बौद्ध की कल्पना भी उनसे बहुत परे है. ये कार्य तो आप जैसे बिरले ही कर सकते है
Anonymous said…
बेहतरीन, बेहतरीन, बेहतरीन। मनुष्यता, क्लासिक्स, और प्रेम सब पर एक संतुलित दृष्टि और काव्यात्मक गद्य! आप ऐसे ही ख़ूब लिखते रहें।
Gautam Yogendra said…
एक बार पढ़ लेने से पूरे जीवन का पढ़ना नहीं हो जाता। आप बार बार पढ़ते हैं, क्योंकि आपके भीतर जो प्यास है वो मूल तत्व पहचानती है। बारम्बार पठनीय!
Poonam Arora said…
GC 🙏

बहुत सुंदर लिखा है आपने और पढ़ने के बाद एक असहनीय मुग्धता दिमाग को घेर रही है. 🙂
Mahesh Mishra said…
आपने बहुत अच्छे से लिखा है। classics क्या हैं, प्रेम क्या है और यह सब बताते हुए इतनी स्वस्थ दृष्टि। प्रूस्त के बारे में भी थोड़ा जोड़ते तो अच्छा रहता।
Sushila Puri said…
बड़ी बात
बेहतरीन लिखा है।
विष्णु खरे की बात से प्रारम्भ होकर यह चिंतन क्लासिक्स तक विस्तार पाता है लेकिन यह महाभारत में उलझकर रह जाता है । आवश्यक नही कि किसी निष्कर्ष बिंदु तक पहुँचे , आयाम तो अनेक हैं ।
सृष्टि said…
सच है। हम कभी-कभी सरल चीज़ों में भी जटिलता ढूँढने लगते हैं।
GGShaikh said…
पढ़ रहे हैं गीत जी टेबल लैम्प...पर रफ्ता-रफ्ता...
कहीं मन खूब रम जाता है, कहीं कम या कहीं मिला जुला।

इतना कहूं कि आपके लेखन में एक डायरेक्शन है, एक दिशा है...
एक बेसिक-सा एलिमेंट है जो मिथ्या बिखराव के पक्ष में क़तई
नहीं। आपकी लेखन शैली भी सहजीकृत है, बिना थकाने वाली...

क्लासिक साहित्य पर आपका विमर्श अदभुत और बिलकुल नया-
नया-सा है, नए आयाम देता। अभूतपूर्व !

सरसरी तौर पर कुछ कहूं तो :
क्लासिक साहित्य हमारी सौंदर्य संबंधी अभिरुचि को परिमार्जित
करते हुए हमारी मनुष्यता, ईमानदारी और हमारी भीतरी संरचना,
प्राकृतिक, सामाजिक,वैश्विक, को अभूतपूर्व ढंग से सुदृढ़ करता है।
हमारे होने को हमारे जीने के विश्वासों को बल भी देता है...सोच और
लेखन के नए-नए फॉर्म प्रस्तुत करता है साथ ही अपने समय काल
और स्थानीय स्थल काल से हमें परिचित कराता है। हमारी
कूपमंडूकता और आभासी गर्वोक्ति को निरस्त करता। क्लासिक
साहित्य हमारी पृथ्वी के जीवन को संकुल सुंदरता भी प्रदान करता है।
हमें उल्लास और आत्मविश्वास से हमें भर देता है।

Jyotsna Kumari said…

क्योंकि हम छवि से प्रेम करते हैं, मूल तत्व से नहीं।
बेहतरीन...
आयुष सोनू said…
💗💗

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