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Showing posts from April, 2018

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 14 : प्रूस्त को कोई नहीं पढ़ता

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गीत चतुर्वेदी : कॉलम 13 : चोरी की स्मृतियाँ

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मैं एक चोर हुआ करता था। न मैंने सोना चुराया, न चाँदी। नक़दी और हीरे-जवाहरात भी नहीं। कपड़े-लत्ते, टीवी-रेडियो और बर्तन भी मैंने कभी नहीं चुराये। कुछ लड़कियाँ कहती थीं कि मैंने उनके दिल चुराये हैं, लेकिन मैं इसकी पुष्टि नहीं करूँगा, ये सब बातें वे ही जानें। लेकिन सच है कि मैं एक चोर हुआ करता था, भले अधिक समय के लिए नहीं। मैं किताबें चुराया करता था। किसी शातिर हुनरमंद की तरह। मुझे किताबें पढ़ने का शौक़ था, लेकिन आप जानते ही हैं, यह एक महँगा शौक़ है, क्योंकि किताबें किसी युग में सस्ती नहीं रहीं। मेरी जेब में पैसे हमेशा कम रहते। उस मजबूरी के कारण मैंने पहली बार किताबों की चोरी की। और उस पहली बार में मुझे इतना आनंद आया कि मैंने बार-बार चोरी की। चोरी और चुंबन एक जैसे होते हैं। एक बार चूमने के बाद, आपके भीतर, बार-बार चूमने की इच्छा जागती है। एक बार चोरी करने के बाद, इच्छाओं का भूत बोतल से बाहर निकल आता है। जब हवस आती है, सबसे पहले आप हवास खोते हैं। किताबें भी एक हवस होती हैं। दीग़र है कि एक अच्छी हवस।
जैसे लकड़ी का कीड़ा बिना कोई भेदभाव किए सबकुछ चट कर जाता है,  मैं पढ़ने की हर चीज़ चट कर जाता था। बिना …

मरियम उस्मानी की डायरी

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।। कितनी छोटी हैं मेरी बाहें, संसार का एक हिस्सा समेटती हूँ, तो दूसरा छूट जाता है ।।

(ज़िंदगी और अनुभव में धीरे-धीरे बड़ी हो रही मरियम का गद्य कविता जैसी सुंदरता से सम्पन्न है।उसमें एक सर्जनात्मक असावधानी है, जो दरअसल कवियों के लिए अनिवार्य है। यह देखना दिलचस्प होगा कि बमुश्किल बीस पार मरियम जब कभी कविता लिखेगी, तो उसका रूपाकार कैसा होगा। फ़िलहाल मरियम की डायरी के टुकड़े पढ़िए। यह कहीं भी प्रकाशित होने का मरियम के लिए पहला अवसर है।)  _________________________________________________


आवाज़
जब तक यह पता हो कि आवाज़ किस दिशा से आ रही है, उससे छूटा जा सकता है। लेकिन जब वह इस तरह आए कि उसकी दिशा बताना कठिन हो, तो सब दिशाएँ उससे लिपट कानों से टकराने लगती हैं...फिर वह आवाज़ घेर लेती है !
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नृत्य
नृत्य में मन की उमंग, उत्साह और उदासी को देह में उतर कर अभिव्यक्त होना था। लेकिन वे देह से ऐसे भाव उपजाना चाहते थे जिसके अंकुर भीतर की ओर फूटें।
यह अलग नृत्य था, अंगों की थिरकन से होता हुआ मन की सतह पर लहराने को अकुलाता !
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एक अबोध क्रूरता

किसी आँख से गिर कर बच जाने के बाद अपनी दृष्टि से उतरना होगा। …