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मोनिका कुमार की पाँच नई कविताएँ





(मोनिका के ही एक शब्द के सहारे कहा जाए, तो वह अपनी कविता में 'विनम्रा' हैं। (निज) संसार देखने की उनकी विनम्र-दृष्टि में ऐसी कई बातों की समाई सम्भव हुई है, जो अन्यथा बहुत मुखर, नाराज़ और अनिवार्यतः आक्रामक स्त्री-कवि-दृष्टि में अँट नहीं पातीं। मोनिका की कविताएँ पिछले पाँचेक बरस में हिंदी के भूगोल में रहने-फैलने के अलावा 'माडर्न पोयट्री इन ट्रैन्स्लेशन' जैसी प्रमुख अंतरराष्ट्रीय पत्रिका तक गई हैं। आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर पेश हैं उनकी पाँच नई कविताएँ)


आग पानी

विनम्र स्त्री है वह
परिचित और अजनबी
सभी के प्रति विनम्र
आवाज़ धीमी थी
विनम्रता ने उसकी आवाज़ को धीमा कर दिया था
दुपट्टा ओढ़ना भले भूल जाए
विनम्रता के आँचल से ढकी रहती है


अखंड विनम्रा है वह
विनम्रता ने सभी को उसके निकट कर दिया
विनम्रता से ही उसकी सभी से अनिवार्य दूरी भी बन गई 
दुनिया आश्वस्त हो गई थी
आग पानी से दूर
हानियों से परे
विनम्रता के वायुमंडल में
बस गई है वह 
उसे भी लगने लगा
दुनिया टिक गई है

कोलाहल थम गया है
उसे पता होता विनम्रता ऐसा दिलकश कवच है
वह बहुत सी परेशानियों से पहले ही बच जाती
पर कैसे पता चलता पहले
जब तक उसने विनम्रता की वटी नहीं बनाई थी
अपनी आग में वह जले जा रही थी
अपने पानी में डूब जा रही थी


विनम्रता के आवरण को जो तोड़ सके
वटी के असर को जो बेअसर कर दे
विनम्र साँसों की आग में जो जल सके
उजले पानी में जो डूब सके
विनम्र जीवन के हर क्षण
वह ऐसे प्रेमी की प्रतीक्षा करती है
*


सदमे से उबरने का पहला दिन

काम पर लौटने का निर्णय करके
साहस जुटा कर घर से निकलती हूँ
चौक पर पहुँच कर याद नहीं आता
किस तरफ मुड़ना है
सड़क का जाना पहचाना शोर
याददाश्त से कोई याद नहीं टटोलता
सदमे से उभरा वैराग्य
छोटी दुश्मनियों और नफ़रतों से आज़ाद कर देता है
यह वैराग्य ऐसे विषाद से परिचय कराता है
जो अपने नएपन की वजह से इतना अजनबी होता है
कि भरे हुए पेट में ख़ालीपन भर देता है
और मुंह से स्वाद छीन लेता है
ऐसे पहले दिन में
मुझे अपनी पहचान के पुराने दुःखों की याद आती है
दुश्मनियों और नफ़रतों की याद आती है
जो इस तरह रच बस गई थी जीवन में
दुःख की अनिवार्यता का धर्म भी निभ रहा था
और दिन फिर भी अच्छा गुज़र रहा था
बनस्बित इस दिन के
जो अपने नवजात अजनबीपन के कारण
मेरी रोज़ की सड़कों से मुझे बेगाना कर रहा है
*

गपोड़ी रिश्तेदार की मृत्यु

दूर के रिश्तेदार की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई
यह ख़बर सुनकर हमारे परिवार में आतंक फैल गया
इस तरह सड़क दुघटना में अचानक मर जाने की
हमारे परिवार में यह पहली घटना थी
धीरे धीरे पता चला कि घटना स्थल पर ही उस युवक रिश्तेदार ने दम तोड़ दिया था
ख़ून का क़तरा नहीं बहा
अंदरूनी चोट बहुत गहरी रही होगी
यह बात सुनकर हम सभी का ख़ून सूख गया था

ख़बर की इस अगली खेप ने हमारे परिवार को और आक्रांत कर दिया
कुछ दिनों तक वे बेआवाज़ सांस लेकर जीवित रहे
शोकाकुल और भयभीत
वे मृत्यु की कटु नज़र से बचना चाहते थे
मृत्यु जो किसी भी बात का बुरा मानकर उसे मार सकती है
हमारे स्कूल की वार्षिक परीक्षा ने माँ को
और स्कूल की फीस ने डैडी को इस भय से उबार लिया था


बिना कतरा ख़ून बहे गहरी चोट से मर जाने के कारण
रिश्तेदार का वजूद जीवन की क्षणभंगुरता और मृत्यु की निर्ममता का उदाहरण बन गया
उदाहरण ही नहीं
वह बच्चों को रोज़ दी जाने वाली चेतावनी बन गया
कि सड़क पर सावधानी और बहुत सावधानी से उतरना चाहिए
हालाँकि उदाहरण और चेतावनी बनने से पहला उसका जीवन था गौण जीवन
जब उसका रुतबा परिवार का सिरमौर गपोड़ी होने का था
जिसकी दिलचस्प गप्पें सुनकर परिवार के लोगों का पाव भर ख़ून बढ़ जाता था
*

शरद पूर्णिमा

क्लांत जबकि सभी जगहें होने लगी हैं
तुम्हारी कला का मेरे चंद्रमा अंत नहीं
मैं लौटी हूँ एकांत में
यानी  कि ऐसी रात में
चाँदनी जो बरस जाए
तो फूलों की तरह चुन सकती हूँ

वंचना होगी इस रात से पूर्व और रातोत्तर भी होंगी
प्रचुर रात में केवल प्रचुरताएँ सहज हैं
चाँदी के गहनों की मुझ शौक़ीन को क्या वंचना
शरद के चाँद की संगति में बालों की डोरी भी चाँदी की
चंद्रबाला का धैर्य चाँदी का
चंद्रकांता का साहस चाँदी का

चंद्रबिंदु है शरद पूर्णिमा का चाँद
पूर्णिमाओं की वर्णमाला में
आधे ‘न’ की खिड़की से देखो
इस पार गर्मियों के लंबे दिन
उस पार सर्दियों की लंबी रातें हैं
आदि कवि जन्म रहा शरद की पूर्णिमा में
चंद्रमोहन की प्रतीक्षा चाँदी की
चंद्रबलि की आकुलता चाँदी की

एकांत का वर पाया चंद्रमा से
घटना बढ़ना और खिलना
खिलना बढ़ना और घट जाना
लौटना फिर फिर अकुंठ
शरद की पूर्णिमा में
एकांत को पवित्र करना
पारिजात की सुगंधि से
*


नकोदर-होशियारपुर अप डाऊन


रोज़ एक ही सड़क और लगभग एक ही बस में चार वर्षों तक दो घंटे सुबह और दो घंटे शाम को बैठने से धैर्य बढ़ता है। रोज़ जाने अनजाने चेहरे पढ़ने से आपके भीतर ऐसी प्रज्ञा जन्म ले सकती है जैसे आप इस दुनिया के सारे चेहरे पढ़ चुके हैं। पचपन लोगों के साथ अकेले सफर करने के बाद आप पांच सौ पांच हज़ार और पांच लाख तक की संख्या तक के सहयात्रियों के साथ अकेले लेकिन निर्भय सफर कर सकते हैं। फिर यह संख्या और उसका छोटा या बड़ा होने का एहसास ख़तम हो जाएगा, आप निर्भय है - इस सजगता का आवरण भी स्वत गिर जाएगा। यह रोज़ाना सफर हर दुःख को एक स्थिति में बदल देगा, एक स्थिति जिसकी नियति एक दिन सुख में बदल जाना है। अत्याधिक आबादी वाले देश में सार्वजनिक स्थानों को रोने जैसे बेहद निजी कामों के लिए इस्तेमाल करने की प्रतिभा अर्जित करना अब कोई दूर की बात नहीं।  वर्जित जो भी अधीर के लिए वर्जित है।  संसार को रोज़ चलती बस के बाहर के पेड़ों की तरह आगे पीछे छोड़ने से यह एक दिन स्थिर हो जाएगा। आप संसार से दुःख पाना बंद कर देंगे। जबकि संसार में अब अधिक नहीं बचा देखने के लिए लेकिन सौभाग्यवश संसार की इच्छा का अंत जीवन के संघर्ष और सुख का अंत नहीं है। 
***

(सबद पर मोनिका की अन्य कविताएँ यहाँ)

Comments

Rahul Tomar said…
पाँचों कविताएं बहुत अच्छी हैं
मुझे "आग पानी" और "शरद पूर्णिमा"
विशेष रूप से बहुत पसंद
आयीं। 💐💐💐💐
Sharda Jha said…
मोनिका कुमार को पढ़ने की सलाह दो दिन पहले ही एक मित्र ने दी थी, और आज सहज रूप से जब उनकी कविताएं पढ़ी , तो समझ आया उन्होंने क्यूँ कहा था इन्हें पढ़ने को। इनकी कविताएं एक गूँज की तरह हैं, जो पढ़ने के बाद भी चलती रहती हैं अंतर्मन में। धन्यवाद अनुराग! 'शरद पूर्णिमा' ख़ासकर ज्यादा अच्छी लगी।
Baabusha Kohli said…
मोनिका वह कवि है जिसकी कविताओं का मैं ख़ूब इंतज़ार करती हूँ और दिनों-दिन तक पढ़ती हूँ.
Mamta Singh said…
शरद पूनों के चांद पर इतनी मधुरतम कविता नहीं पढ़ा था मैंने
मोनिका जी और आपको सादर आभार
preeti said…
बहुत अच्छी कविताएं हैं
Pankaj Bose said…
सभी कविताएँ एक से बढ़कर एक हैं। मुझे 'नकोदर-होशियारपुर अप डाऊन' बहुत पसंद आई। मोनिका कुमार की कविताएँ लगातार प्रकाशित होनी चाहिए।
Anonymous said…
शुक्रिया अनुराग, शुक्रिया पाठक मित्रो.

मोनिका कुमार
Monika's poetry has the flavour and fatigue of everyday life, refreshing, mesmerising
बहुत अच्छी कविताएं।सचमुच।लंबे समय तक जा सकने व आज की हिंदी कविता में जगह पाने वाली हैं ये कविताएं।

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