Tuesday, March 06, 2018

संगीता गुन्देचा की 'जी' कविताएँ





(हिंदी जिन अनेक बोलियों से पुसती चली आ रही है, उसकी एक रंगत मालवी भी है। संगीता गुन्देचा की इन कविताओं में मालवी कंठ एक अलग सौंदर्य पैदा करता है। इसे कुछ हद तक कविता के अकथ अनुभव-स्रोत के अक्षत आविर्भाव की तरह भी पढ़ा जा सकता है। )


'जी' कविताएँ

1
बस एक बुखार की देर और है
जी कहती है
वह आँखें मटकाती एक हाथ से
दूसरे को मलती हुई आकाश की ओर देखती है:
बस एक बुखार को बदन और बच्यो!
 
2
वह बीमार हुई और शहर के
डाॅक्टर के पास जाने से मना कर दिया:
ऐ पूनमचन्द थारो जरा भी माजनो व्हे
तो म्हारे यांसे कंइ लइजावा मत दीजे
म्हारे तो यांज शान्तिनाथ को सायरो है।

3
जी के घर शान्तिनाथ हैं
वह रोज़ सुबह नहा कर उनकी पूजा करती है
केसर, चन्दन और गुलाब से
अपने पेड़ को फूलों से लदा देख
वह ताली बजाते हुए कहती है:
ये फूल कभी कम नहीं हो सकते
इ फूल कदी कम नी व्हइ सके
शान्तिनाथ के या सोरभ घणी हउ लगे!

4
गाँव में लोगों को पता चल गया है
परकोटे की राजपूत स्त्रियाँ
रंग-बिरंगी साड़ियों में
घूँघट लेकर जी से मिलने आ रही हैं
अपने बच्चे को लेकर
पड़ोसी कुम्हार और उसकी पत्नी आये हैं
उनके मटकों पर चित्रकारी कैसी हो
यह वे जी से पूछते आये हैं।

5
गली में रंभाती गायें
जी को पुकार रही हैं
उन्हें रोटी और उनके ग्वालों को
गाली देने वाली जी को उनके खुरों की आवाज़
पहले ही आ चुकी है
उसकी आँखों के कोर पर आ-आकर
आँसू आ लगे हैं।

6
जी अपने घाघरे, लुगड़े और काँचली में
यहाँ से वहाँ फिसलती रहती
गिलहरी की तरह।
             
7
अपने दोनों पैर गँवा चुके
जी के दोस्त अपने  बेटे के कन्धों पर चल कर
उसे गुजराती-मन्त्र सुनाने आये हैं
एक सत्संगी औरत अभी-अभी
उसे भजन सुना कर गयी है
आसपास बैठे लोगों के घेरे ने
उसे ज़ोर से दोहराया:

माला री थारे जपनो कठिन है
सुमिरन रे थारे करनो कठिन है।

8
कराहती हुई जी के सिरहाने
मालिन सुर्ख़ गुलाब रख गयी है
माँ उसके कानों पर अपने ओंठ ले जा कर पूछती है:
जी थारे कंइ वेदना है बता तो सइ ?
जी अपने पोपले मुँह से
बड़ी मुश्किल से फुसफुसाती है:
कंइ कोनि !
जब उससे उसकी अन्तिम इच्छा पूछी जाती है
वह अपने पोपले मुँह से
बड़ी मुश्किल से फुसफुसाती है:
कंइ कोनि !

9
जी के कमरे के बिल्कुल पास बने मन्दिर में
आज सुबह जब शान्तिनाथ की आरती गायी गयी
बेहोशी की देहरी पर खड़ी
वह उसे दोहराने लगी;
विश्वसेन अचलाजी के नन्दा
शान्तिनाथ मुख पूनमचन् .....

10
आणन्द देइ सा कह कर
सीढ़ियों पर प्रतीक्षा कर रहे
गाँव के ब्राह्मण की ओर
सुबह-सुबह अँजुरि भर जुवार ले जी
दौड़ते हुए आँगन पार करती है
भोजन से पहले
गाय और कुत्ते को रोटी देने
वह गली तक जाती है
अपने भोजन से एक कवा बचा कर
उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँट कर
वह चींटियों के बिल पर रख आती है
पक्षियों को चावल डालने
दोपहर में मुँडेर तक जाती है
संजा-समय घर लौट रही अपनी प्रिय गायों को
वह रोटियाँ खिलाती है
दिन भर में जी की ये पाँच बलियाँ थीं
कम से कम तेरह दिन तक इन्हें
कोई और देता रहेगा।

11
दूर तक फैला शाम का उजास
सीमान्त पर अकेले खड़े जवा कुसुम पर मँडराती
भँवरों की टोली
कीचड़ भरी डगर से लौटता
पीठ पर भुट्टे लादे प्रसन्नमुख किसान

हर शाम लगभग वैसे ही बीतती है
तुम्हारे बीत जाने के बाद भी ‘जी !‘

लेकिन तुम्हारे गुलाब पर
अब फूल आने
अचानक कम क्यूँ हो गये !
***

(सबद पर संगीता का इससे पहले प्रकाशन यहां)

14 comments:

Vishakha Rajurkar Raj said...

"कंइ कोनि" ही शायद 'जी' और उसकी बोली के स्वभाव की विशिष्टता है। सरलता, सहजता, सादापन लेकिन सुंदरता लिये। लोक की और बोलियों की यही खासियत उनकी ओर आकर्षित करती है। 'जी' की यात्रा सुंदर लगी। कविताओं पर क्या ही कह सकूँगी... संगीता जी! कविताएँ हम तक पहुंचाने के लिए शुक्रिया अनुराग जी, और बधाई भी, विशेष रूप से प्रस्तावना के लिए!!

Rey Naren said...

माला री थारे जपनो कठिन है
सुमिरन रे थारे करनो कठिन है
Too good 🙂

Pratap said...

बहुत सुंदर कविता है मैम ।।

roshni vyam said...

वाह ...दिल को छू जाने वाली कविताएं। आपके लिए अपनी बनाई हुइ एक पेंटिंग का चित्र पोस्ट किया है आपके फेसबुक वाल पर, देखियेगा।

Mukesh Sharma said...

संवेदना, सरोकार और जीवन के अनुभव की कविताएं!!!

उपासना झा said...

मालवा की मिठास पगी कविताएँ! बहुत पसन्द आईं संगीता जी

Pankhuri Sinha said...

Behad khoobsoorat kavitayein

Anonymous said...

Very nice Sangeeta ji!

Bharti Dixit said...

बहुत ही सुंदर कविताएँ, अद्भुत।
बहुत बहुत बधाई।

Rama Sharma said...

मर्मस्पर्शी

safoo khan said...

Ek atyant anokhi aur dil ko choo Jane vale shabdo ko ek Mala me piro diya..bhut khoob

Aparna Dubey said...

Marvelous

Poonam Arora said...

जी सीरीज की कविताएं बहुत ही प्यारी हैं. बहुत अपनी सी और दिल को छूती हुई. मैंने तो आपको सुना भी है और आप किस तरह डूबी थी 'जी' में यह देखा भी है.

Anonymous said...

"एक हाथ से
दूसरे को मलती हुई आकाश की ओर देखती है:
बस एक बुखार को बदन और बच्यो!"

वाह! यही बोलियों की शक्ति है| और आपने जिस प्रकार इसे प्रस्तुत किया वह अद्भुत है|
गुणिजन सभा के वे क्षण मैं भूल नहीं पाता|

नितिन वैद्य