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गीत चतुर्वेदी : कॉलम 12 : नेरूदा और स्त्रियाँ



पिछले सौ बरसों में जिस कवि पर सबसे ज़्यादा बात हुई है, वह हैं पाब्लो नेरूदा (1904-1973)। हो भी क्यों न, उन बरसों में प्रचलित काव्य-परंपराओं के साथ सबसे ज़्यादा छेड़छाड़ भी संभवत: उन्होंने ही की। उनकी सारी कविताओं को एक साथ रख दिया जाए, तो क़रीब चार हज़ार पन्नों की एक किताब बन जाएगी। अपने समय के कई आंदोलनों, विवादों, प्रेम-प्रसंगों व साहित्यिक विशेषाधिकारों से जुड़े रहने के कारण उन्होंने कविता से इतर एक ऐसा व्यक्तित्व भी पा लिया था, जो किसी कवि के प्रसार को व्यापक ही बनाता है। वह कम्युनिस्ट थे। देश और दुनिया की तत्कालीन परिस्थितियों से क्षुब्ध व विवश होकर, योजना बनाकर उन्होंने प्रतिरोध की महान कविताएँ लिखीं, लेकिन उन्हें आरंभिक प्रसिद्धि प्रेम कविताओं से ही मिली थी और आज भी उनकी प्रेम कविताओं को ही शिद्दत से याद किया जाता है।

नेरूदा एक रेल मज़दूर के बेटे थे। उनके पैदा होने के दो साल बाद ही उनकी माँ की मृत्यु हो गई। सौतेली माँ से भी नेरूदा को बहुत प्रेम मिला, लेकिन पिता से वह ख़ाइफ़ रहते थे। दस साल की उम्र से उन्होंने कविताएँ लिखना शुरू कर दिया था, लेकिन उनके पिता को उनका यह शौक़ पसंद नहीं आया। जब उन्होंने अपनी कविताएँ छपवाना शुरू कीं, तो उन्हें डर था कि असली नाम से छपवाएँगे, तो पिता को पता चल जाएगा। वह लड़कों के स्कूल में पढ़ते थे। उसी स्कूल का लड़कियों का सेक्शन दूसरी इमारत में था, जिसकी प्रिंसिपल थीं लूसीला गोदोई अलाकयागा, जिन्हें दुनिया गाब्रीयला मिस्त्राल के नाम से जानती थी। वह अपने समय की बहुत बड़ी कवि थीं और आगे चलकर, 1945 में उन्हें साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। हमारे महाकवि को शुरुआती मार्गदर्शन उन्हीं से मिला था। वह छद्म नाम से कविताएँ छपवाती थीं, इसी से नेरूदा को अपना नाम बदलने की युक्ति सूझी। किशोरावस्था से ही नेरूदा बहुत पढ़ते थे। चेक लेखक यान नेरूदा की कहानियाँ उन्होंने एक संकलन में पढ़ रखी थीं। उन्होंने अपने आसपास के स्पैनिश-भाषी समाज से नाम उठाया- ‘पाब्लो’, और उसमें चेक लेखक का नाम – ‘नेरूदा’ – जोड़ दिया। इस तरह बना- पाब्लो नेरूदा। यह नाम उनके साथ जीवन-भर के लिए जुड़ गया। उन्होंने राजनयिक के रूप में कई देशों में बड़े-बड़े पदों पर नौकरी की। इस दौरान उनका नाम होता- रिकार्दो नेफ्ताली रेएस बासोआल्तो, लेकिन अनजान लोगों के बीच इस नाम से काफ़ी भ्रम होता। चालीस की उम्र का होने के बाद नेरूदा ने क़ानूनी तौर पर अपना नाम पाब्लो नेरूदा ही करवा लिया। पुराना नाम सिर्फ़ एक स्मृति की तरह जुड़ा रहा, लेकिन अब तक याद किया जाता है।

दो नाम वाले लेखकों और कलाकारों को अक्सर कुछ व्यावहारिक समस्याएँ झेलनी होती हैं। रचनाएँ उपनाम से छपती हैं, और अगर उनके बदले पारिश्रमिक का चेक आ जाए, तो बैंक को समझाने की शुरुआती प्रक्रिया झेलनी पड़ती है। कुछ और भी समस्याएँ होती हैं। जैसे, एक असल क़िस्सा याद आ गया। किसी ज़माने में हिंदी की एक पत्रिका में छपा था। अज्ञेय का असली नाम था सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन। एक बार वह बिहार में किसी कार्यक्रम में गए थे। मंच पर उनके साथ एक और लेखक बैठे थे। आवाज़ की सुंदरता के कारण एक सज्जन को संचालन का काम तो मिल गया था, लेकिन उनका साहित्य-ज्ञान शून्य था। संचालक महोदय ने देखा कि मंच पर दो लेखक बैठे हैं, तो उन्होंने शुरुआत ही इस वाक्य से की, “साथियो, हमारे लिए बहुत ख़ुशी की बात है कि आज हमारे बीच सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन आए हैं और उससे भी ख़ुशी की बात यह है कि वह अपने साथ प्रसिद्ध साहित्यकार अज्ञेय जी को भी लेते आए हैं। दोनों मंच पर बैठे हैं। करतल ध्वनि से उनका स्वागत किया जाए।”

ख़ैर, बात नेरूदा की। किशोरावस्था में ही उनकी कुछ कविताएँ छप गईं और वह अपने आसपास के साहित्यिक समाज से जुड़ गए। ख़ासकर युवा क्रांतिकारी लेखकों के समूह ‘क्लारिदाद’ से। अठारह-उन्नीस की उम्र में (1923) उनकी पहली किताब इसी समूह ने छापी थी- ‘क्रेपुसकुलारियो’ यानी गोधूलि-वेला! बहुत साधारण-सी कविताएँ। तत्कालीन आधुनिकतावादी कविता का एक युवकोचित अनुकरण। इसके छपते ही नेरूदा में पराजय-बोध भर गया। वह उन कविताओं की कमज़ोरियाँ समझ रहे थे। और यह भी जान गए थे कि इस तरह की कविताएँ सिर्फ़ उनके ‘क्लारिदाद’ समूह में ही चल सकती हैं। कवि अक्सर समूह में काम करते हैं। अपने समूह से मिली तारीफ़ को ही वे सबकुछ मान लेते हैं। यही उनका कम्फर्ट ज़ोन बन जाता है। उस समूह से बाहर अपनी कविता को पहुँचाने और उसे स्वीकार करवाने की चिंता व साहस अधिकांश कवियों में नहीं होता। लेकिन नेरूदा बेहद महत्वाकांक्षी कवि थे। कवि की महत्वाकांक्षा उसकी कविताओं की बुनावट व संरचना में आने वाले परिवर्तनों से जानी जाती है, प्रसिद्ध हो जाने की उसकी काव्येतर कलाबाज़ियों से नहीं।

नेरूदा ने कुछ ही महीनों के श्रम से एक नई किताब बनाई- ‘बेइंते पोएमास दे आमोर ई ऊना कानसिओन देसेस्पेरादा’ (बीस प्रेम कविताएँ व निराशा का एक गीत, 1924)। असफल प्रेम की शिकायत करती कामुक, ऐंद्रिक कविताएँ। वह चाहते, तो उनके अपने समूह की पत्रिका व प्रकाशन गृह से ये कविताएँ आसानी से छप जातीं, लेकिन उन्हें एक व्यापक पाठक-समूह चाहिए था। इसकी आकांक्षा में उन्होंने देश की कुछ बड़ी पत्रिकाओं में ये कविताएँ भेजीं, ख़ारिज हो गईं। इस संग्रह की एक बेहद ऐंद्रिक कविता को उन्होंने एक पारिवारिक पत्रिका में भेज दिया था। उसने भी छापने से इंकार कर दिया। देश के सबसे बड़े प्रकाशन समूह नासीमेंतो ने भी उनकी पांडुलिपि को ख़ारिज कर दिया। नेरूदा ने अपने मित्रों से मदद माँगनी शुरू की। सांतिआगो के कई प्रसिद्ध कवि व समीक्षक नेरूदा को पसंद करते थे। ऐसे ही दो थे पेद्रो प्रादो और अलोन। नेरूदा के अनुरोध पर अलोन ने दबाव डालकर उस पारिवारिक पत्रिका में उनकी वह ऐंद्रिक कविता छपवा दी। फिर, नेरूदा ने प्रादो को ख़त लिखकर अपनी कविताएँ पढ़ाईं और उनसे अनुरोध किया कि वह नासीमेंतो पर दबाव डालें। प्रादो बहुत रसूख़दार थे। उनके कहने-भर से नासीमेंतो ने नेरूदा की वह पुस्तक छाप दी। पाँच सौ प्रतियों का एक संस्करण। किताब बाहर आते ही नेरूदा की आलोचना शुरू हो गई। साहित्यिक समीक्षकों ने उन कविताओं की बहुत धुलाई की। महज़ बीस साल की उम्र वाले एक कवि द्वारा ऐसी कामुक प्रेम कविताएँ लिखा जाना उस साहित्य-समाज को हज़म नहीं हो रहा था। दूसरे, उन कविताओं में स्पैनिश आधुनिकतावादी शैली को खुली चुनौती दी गई थी। कुछ कविताएँ प्राचीन-मध्य-युगीन अलेक्ज़ांद्रिया छंद में लिखी गई थीं, जो उस समय के ‘आधुनिक’ कवियों को लगभग नागवार गुज़रता था। पुराने छंद में नई कामुक अभिव्यक्तियाँ। 1924 के समाज के लिए वह भी एक ‘टैबू’ की तरह था। एक ही कविता में कुछ पंक्तियों में अनुभूतियाँ बेहद सांद्र, तो अगली ही पंक्तियों में बेहद ढीली। एक ही वाक्य का कई-कई बार दोहराव, जैसे बातचीत की शैली में होता है। शास्त्रीय आलोचना ने अख़बारों में लेखों के ज़रिए कवि की ‘भूरि-भूरि’ निंदा की। नेरूदा में पहले संग्रह वाला पराजय बोध समाप्त हो चुका था। अपनी इन कविताओं को लेकर वह बहुत आत्मविश्वास में थे। उन्हें अंदाज़ा था कि अपनी कम उम्र के कारण वे इन कविताओं को अकेले अपने दम पर बाहर नहीं ला पाएँगे। इसीलिए उन्होंने इन कविताओं के लिए सिफ़ारिशें लगवाई थीं। उन्होंने भी जवाबी लेख लिखे और अपनी कविताओं का बहुत आक्रामक बचाव किया। नेरूदा की स्पैनिश रचनावली ‘ओब्रास कोम्प्लीतास’ में उनमें से कुछ लेख पढ़े जा सकते हैं। संभवत: वे अंग्रेज़ी में उपलब्ध नहीं।

समीक्षक चिल्लाते रह गए, लेकिन पाठकों को कुछ और ही मंज़ूर था। उस समय की युवा पीढ़ी ने इस किताब को हाथोंहाथ लिया। जल्द ही गलियों में नौजवान गिटार पर उन कविताओं को गाने लगे। जिस ‘नयेपन’ को साहित्य-समाज का एक हिस्सा नहीं समझ पा रहा था, उस ‘नयेपन’ को साधारण पाठकों ने समझ लिया। और वह सच में नयापन ही था। कुछ ही समय में चीले के अधिकांश कवि नेरूदा की कविताओं की नक़ल करने लगे या उन कविताओं के रिस्पॉन्स में लिखने लगे। नेरूदा अचानक एक बहुत बड़ी साहित्यिक हस्ती बन गए। नासीमेंतो ने प्रादो के दबाव में उनकी किताब छापी थी, अनमने ढंग से। अब वह धड़ाधड़ उसके नये संस्करण निकालने लगा। आत्मविश्वास को कवियों का अवगुण माना जाता है, लेकिन नेरूदा ने यहाँ भी प्रचलित मान्यता को ध्वस्त कर दिया। इस उदाहरण से यह न समझा जाए कि नेरूदा हमेशा ही आत्मविश्वास से भरे रहते थे। उनके संशय का क़िस्सा अगली पंक्तियों में आएगा। दरअसल, काव्य-विवेक बहुत बुनियादी गुण है। किस समय कवि को संशय में होना है और किस समय आत्मविश्वास से भरा हुआ- एक विकसित काव्य-विवेक ही इसकी पहचान कर सकता है। जीवन और किताबों की पढ़ाई बहुत ज़रूरी उपक्रम हैं और इसका आधे से अधिक हिस्सा काव्य-विवेक के विकास के लिए ज़रूरी श्रम में ही ख़र्च होता है।

जैसे ही उनकी ये कविताएँ प्रसिद्ध हुईं, शुरू हो गया क़यासों का सिलसिला, कि आख़िर किस लड़की के लिए नेरूदा ने इतनी ऐंद्रिक व मार्मिक कविताएँ लिखी हैं, जिसे उनका देश, बाद में स्पैनिश भाषा से बना एक पूरा महाद्वीप, और उसके भी बाद पूरी दुनिया ने इतने चाव से पढ़ा। नेरूदा की मृत्यु तक इस रहस्य पर से पर्दा न उठ सका। जब तक जिये, नेरूदा के अनगिनत प्रेम संबंध रहे। जहाँ गए, वहाँ नये-नये प्रेम किए। ‘बीस प्रेम कविताओं’ की वह लड़की कौन थी, नेरूदा ने ख़ुद इसका उत्तर कभी नहीं दिया। जब बहुत चर्चा मची, तब किताब छपने के तीस साल बाद एक भाषण में उन्होंने एक इशारा दिया : “एक लड़की मेरे क़स्बे तेमूको की है, और दूसरी मेरे शहर सांतिआगो की।” यह इशारा काफ़ी नहीं था। इस रहस्य ने उनकी कविताओं को और प्रसारित किया। यह जिज्ञासु समीक्षकों का शग़ल था, क्योंकि पाठकों को उन कविताओं में नेरूदा की नहीं, अपनी प्रेमिका दिखती थी। जब नेरूदा साठ के हुए, तो उन्होंने अपने संस्मरणों में इस पर थोड़ी और रोशनी डाली। उन्होंने लिखा- “उस किताब में दो लड़कियाँ हैं। एक क़स्बाई यानी तेमुको की है, उसे मैं ‘मारीसोल’ कह सकता हूँ और दूसरी शहराती यानी सांतिआगो की, उसे ‘मारीसोम्ब्रा’ कह सकता हूँ।" दोनों साधारण स्पैनिश शब्द नहीं हैं, बल्कि गढ़े हुए हैं। ‘मारीसोल’ का अर्थ है समंदर व धूप। ‘मारीसोम्ब्रा’ का अर्थ है समंदर व छाँव। नेरूदा की मौत के बाद जिज्ञासु पत्रकारों ने दोनों लड़कियों को खोज निकाला। मारीसोल, तेमुको की रहने वाली तेरेसा वास्केस लियोन थी। मारीसोल नाम के अनुरूप ही वह चंचल, उल्लसित, ज़िंदादिल लड़की थी, अपने क़स्बे में उसने ब्यूटी क्वीन का ख़िताब जीता था। सांतिआगो आने के ठीक पहले नेरूदा उसके प्रेम में थे। पढ़ाई के लिए शहर आने के बाद वह मारीसोम्ब्रा के प्रेम में पड़ गए- यानी अलबेर्तीना रोसा। वह कॉलेज में उनकी सहपाठी थी, कम्युनिस्ट थी और हर जुलूस में दोनों साथ-साथ नारे लगाते थे। मारीसोम्ब्रा नाम के अनुसार ही वह सुंदर, लेकिन बेहद संजीदा, लगभग उदास-सी रहने वाली युवती थी। उस किताब की कविताओं में दोनों छिपे हुए, लेकिन ऐसे गड्‌डमड्ड तरीक़े से आती हैं कि साधारण युवतियाँ होने की जगह कविता की प्रेरक-देवियाँ बन जाती हैं। दोनों के पास नेरूदा के पुराने ख़त पाए गए, जिनसे पुष्टि हुई। कुछ अध्यवसायी लोगों के जिज्ञासु स्वभाव व खोजी प्रयासों से ये सब तथ्य बाहर आए, लेकिन अगर न भी आते, तो नेरूदा के काव्य के सौंदर्य पर कोई असर न पड़ता। अलबत्ता इन तथ्यों के आलोक में यह भी देखा जा सकता है कि नेरूदा की वे इक्कीस कविताएँ किस क़दर उस रहस्य से भरी हुई हैं, जिसे हम जीवन नाम से जानते हैं। हाँ, उन कविताओं का सौंदर्य इस रहस्य में भी है कि कैसे एक ही कविता जीवन की उदासियों से भरी रहती है और कुछ ही पंक्तियों बाद उसमें जीवन का अदम्य उल्लास खिलखिला उठता है। मारीसोल व मारीसोम्ब्रा का कैसा अद्भुत व रहस्यमयी मिश्रण है नेरूदा के यहाँ। 

प्रेम नेरूदा की कविताओं का खाद्य है। वह प्रेम को खाते हैं, तभी कविताएँ लिखते हैं। यह पंक्ति हर कवि के लिए कही जा सकती है, लेकिन प्रेम का वैसा वैभव हर कवि के यहाँ नहीं मिल पाता। प्रेम सफ़ेद पंखों वाला एक बूढ़ा बाज़ है, जो झपट्‌टा मारकर दिलों की नौजवानी को पंजों में जकड़ लेता है और नोंच-नोंचकर उसका माँस खाता है। प्रेम कवि को खाता है और कवि प्रेम को। यह परस्पर भक्षण है। नेरूदा इस खाद्य की तलाश में असंभव सीमाओं तक जाते हैं। वह तलाश यक़ीनन उनकी कविताओं में भी दिखती है।

यह प्रेम दैहिक लालसाओं से भी संचालित होता है। स्त्रियों के प्रति नेरूदा की लालसा लगभग अनियंत्रित थी। इस लालसा के कई पहलुओं पर ठीक से प्रकाश नहीं पड़ा है, क्योंकि वह उनके बेहद निजी दायरे में घटित होती थीं और तमाम लाइमलाइट के बावजूद नेरूदा रहस्यमय जीवन जीने में सफल थे। लेकिन समय के साथ कई बातें बाहर आई हैं। उन बातों व घटनाओं को अगर ग़ौर से पढ़ा-जाना जाए, तो कई लोगों की नज़र में नेरूदा की विशाल प्रतिमा भरभराकर गिर सकती है। जैसे एक बात का ख़ुलासा तो ख़ुद नेरूदा ने अपनी किताब ‘मेमॉयर्स’ में किया है – जब वह श्रीलंका में राजनयिक नौकरी पर थे, तब उन्होंने एक तमिल नौकरानी के साथ बलात्कार किया था।

प्रेम में वफ़ा और बेवफ़ाई की नेरूदा की परिभाषाएँ अपनी निजी थीं। मुझे ऐसा लगता है, उनकी इस सोच के पीछे उनके आरंभिक दिनों के ‘क्लारिदाद’ समूह का संग-साथ भी एक बड़ा कारण रहा होगा। वह समूह युवा क्रांतिकारियों का था, जो न सिर्फ़ क्रांति के स्वप्न देखता था, बल्कि नैतिकताओं की नई परिभाषाएँ गढ़ने की भी बहसें करता था। उस समूह और उस समय के अधिकांश क्रांतिकारी समूहों की मान्यता थी कि नैतिकता महज़ एक सामंती मूल्य है और नये समाज में ऐसे सारे मूल्यों को तोड़ देना चाहिए। ज़ाहिर है, नैतिकता ऐसा विषय है, जिसका सबसे ज़्यादा जुड़ाव सेक्स के साथ माना जाता है। वह समूह अति-स्वच्छंद सेक्स-आदतों का हिमायती था। उस दौर में नेरूदा बीस प्रेम कविताएँ जैसी किताब लिख पाए, तो उसके पीछे इस समूह की बहसों का भी योगदान था। वह किताब लिखकर नेरूदा ने अपने समय के टैबू को एक तरह से तोड़ा ही। निजी जीवन में भी शायद उन बहसों ने असर दिखाया था। तभी तो गाब्रीयल गार्सीया मारकेस, जिन्होंने नेरूदा को ‘दुनिया की किसी भी भाषा में बीसवीं सदी का महानतम कवि’ कहा था, ने उनके प्रेम-जीवन के बारे में दिलचस्प टिप्पणी की थी— “फेथफुलनेस और लॉयल्टी के बीच कन्फ्यूज़ नहीं होना चाहिए। नेरूदा, मातील्दा के प्रति हमेशा लॉयल रहे, लेकिन हमेशा फेथफुल नहीं रहे।” यहाँ जानबूझकर अंग्रेज़ी शब्दों को वैसा ही रहने दिया है, क्योंकि फेथफुल और लॉयल का फ़र्क़ अंग्रेज़ी (या स्पैनिश) में बेहतर समझा जा सकता है। हल्की-सी कोशिश यह कि -  किसी के प्रति निष्ठावान होकर भी पूरी तरह ईमानदार न होना।

नेरूदा और मातील्दा की प्रेमकथा किसी परिकथा जैसी है। एक बार नेरूदा बहुत बीमार हो गए। उनके देश चीले में उनकी जान को ख़तरा था। इसलिए उनके मित्रों ने उन्हें मेक्सिको में छिपाकर रखा। उनकी तीमारदारी के लिए एक विश्वस्त नर्स चाहिए थी, तो उनके मित्रों ने मातील्दे उर्रूतीया नामक एक युवती को मेक्सिको भेजा, जो उनकी कविताएँ गिटार पर गाया करती थी। दोनों में प्रेम हो गया। कुछ समय बाद नेरूदा योरप चले गए। फिर तमाम सरकारी दंद-फंद करके उन्होंने मातील्दा को भी वहीं बुला लिया।  दोनों योरप में कई जगह रहे, कभी खुलकर, कभी छिपकर। कुछ बरस बाद उन्होंने अपनी पहली पत्नी को छोड़कर मातील्दा से शादी कर ली। शादी से पहले के उन बरसों में जब वे साथ-साथ रहते थे, तब नेरूदा, लगभग हर सुबह मातील्दा के लिए एक कविता लिखते थे। उनमें से अधिकांश कविताएँ नेरूदा के संग्रह ‘लोस वेरसोस देल कापितान’ यानी ‘कप्तान रचित कविताएँ’ (1952, अंग्रेज़ी में ‘द कैप्टन्स वर्सेस’ 1972) में शामिल हैं। जब यह पहली बार छपी थी, तो किताब में कवि के तौर पर किसी का नाम नहीं था। यह एक अनाम कवि की कविताओं के रूप में छपी थी। इसे छपवाने के प्रति नेरूदा संशय में थे। यह कई स्तरों पर उभरा संशय था। वे कविताएँ उन्हें बहुत प्रिय थीं, बेहद निजी भी थीं, लेकिन उनकी गुणवत्ता के प्रति वह बेहद आश्वस्त नहीं थे। दूसरी बात, तब तक वह अपनी पहली पत्नी से अलग नहीं हुए थे और अगर अपने नाम से छपवाते, तो हंगामा मच जाता कि फिर से इतनी ऐंद्रिक प्रेम कविताएँ? इस बार ये किसके लिए हैं? तीसरा संशय और बड़ा था- क्या 1950 के दशक में, जब ‘कान्तो जनरल’ की कविताओं ने नेरूदा को प्रतिरोध के कवि के रूप में पूरी दुनिया में स्थापित कर दिया है, तब उन्हें अपनी ऐंद्रिक प्रेम-कविताओं का संग्रह लाना चाहिए? लेकिन वह मातील्दा से वादा कर चुके थे कि तुम्हारे लिए कविताओं की किताब लिखूँगा। ‘द कैप्टन्स वर्सेस’ पहली कड़ी थी। ‘सिएन सोनेतोस दे आमोर’ (प्यार के सौ सॉनेट, 1959) उसकी दूसरी कड़ी।

तीसरा संशय संभवत: सबसे बड़ा था और नेरूदा उसके बारे में न के बराबर बात करते हैं। नेरूदा को प्रसिद्धि प्रेम कविताओं से मिली थी, लेकिन जल्द ही वह अपने देश-काल की राजनीतिक-सामाजिक स्थितियों के प्रवक्ता बन गए। अपनी संस्कृति, सभ्यता, राजनीतिक दृष्टिकोण व प्रतिरोध का प्रवक्ता बनना किसी भी लेखक के लिए सबसे जोखिम-भरी स्थिति होती है। वह उसे कई क़िस्म के अदृश्य बंधनों में बाँध देती है। ‘बीस प्रेम कविताओं’ के बाद नेरूदा अपने देश की राजनीति में सक्रिय हुए और कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे। 1934 में वह सरकारी ज़िम्मेदारी पर स्पेन आ गए। गाब्रीयला मिस्त्राल की जगह उन्हें वहाँ चीले का कॉन्सुल बनाया गया। वहीं स्पैनिश कवि फेदेरीको गार्सीया लोर्का के साथ उनकी क़रीबी दोस्ती हुई। एक-दूसरे के प्रति उनमें कितना प्रेम था, इस बात से समझा जा सकता है कि जब नेरूदा माद्रिद पहुँचे, तो रेलवे स्टेशन पर उनकी अगुआनी करने लोर्का आये थे। दोनों मार्क्सवादी विचारधारा के थे और जनांदोलनों के प्रति बहुत समर्पित व उत्साहित रहते थे।

1936 में स्पेन में फासिस्ट जनरल फ्रैंको ने तख़्तापलट कर दिया। इससे वहाँ गृहयुद्ध छिड़ गया। हिटलर और मुसोलिनी, फ्रैंको को हथियारों की मदद कर रहे थे। वामपंथी नेताओं व कवियों को इस फासीवादी उभार की आशंका पहले से थी। उन्होंने माद्रिद में एक फासीवाद-विरोधी मोर्चा बनाया। लोर्का उसके मुख्य स्तंभ थे। उन्होंने फासीवादी विरोधी भाषण दिए, कविताएँ लिखीं, नाटक किए, पत्रिका निकाली। उसमें उस समय के सभी बड़े स्पैनिश कवि छपे। नेरूदा से लेकर अंतोनियो मचादो व राफ़ाएल अलबेर्ती तक। स्पेन के अंदरूनी इलाक़ों में रिपब्लिकन सैनिकों का संहार करती हुई फ्रैंको की फासिस्ट सेना माद्रिद तक पहुँच गई और उसने लोर्का को गिरफ़्तार कर लिया। जब उनका दोष पूछा गया, तो एक अफ़सर ने कहा, “दूसरों ने हमें जितना नुक़सान पिस्तौल से नहीं पहुँचाया है, उससे कहीं ज़्यादा नुक़सान लोर्का ने अपनी क़लम से पहुँचाया है।” और उसके दो दिन बाद लोर्का की हत्या कर दी गई। आज तक लोर्का की लाश का भी पता न चला।

नेरूदा इससे बहुत दुखी हुए। इस घटना ने उनके जीवन व कविताओं पर बड़ा असर डाला। उन्होंने कहा – “यह लोर्का की नहीं, कविता की हत्या है।” उन्होंने राष्ट्रवादी-फासीवादी ताक़तों के विरोध में सीधी और तीखी कविताएँ लिखनी शुरू कीं। उन कविताओं में उन्होंने साफ़ लिखा कि अब मैं कैसे फूलों व सुगंधों की बात करूँ, जब मैं देख रहा हूँ कि स्पेन की गलियों में मासूम बच्चों का रक्त बह रहा है। रिपब्लकिन सैनिकों ने इन कविताओं से नई ताक़त पाई। गृहयुद्ध के मोर्चे पर एक तरफ़ गोलियाँ चल रही हैं, दूसरी तरफ़ रिपब्लिकन सैनिकों की नई टुकड़ी जोश भरने के लिए नेरूदा की कविताएँ गा रही है। उन सैनिकों ने फासिस्ट झंडों पर क़ब्ज़ा किया, उन्हें गलाकर उनसे लुगदी बनाई और उससे बने काग़ज़ पर नेरूदा की कविताएँ छापकर अपने साथियों में बँटवाईं। कविता प्रतिरोध का महत्वपूर्ण औज़ार होती है- यह बात सिर्फ़ कही जाती थी। स्पैनिश गृहयुद्ध में नेरूदा, उनके साथी कवियों और फासीवाद से लड़ रहे सैनिकों ने इस बात को साबित कर दिया कि ये कविताएँ ही दरअसल प्रतिरोध का असली ईंधन हैं। नेरूदा, मचादो, अलबेर्ती आदि कवियों ने जो चाबुक कविताएँ लिखीं और जनता को एकजुट करने में अपनी जो जबरी भूमिका निभाई कि स्पैनिश इतिहास में उस गृहयुद्ध को ‘कवियों द्वारा लड़ा गया युद्ध’ भी कहा जाता है। अगर समय के बड़े फलक पर देखा जाए, तो फासिस्ट नहीं, अंतत: प्रतिरोध की यही कविताएँ जीतीं।

‘एस्पान्या एन एल कोराज़ोन’ (स्पेन मेरे दिल में, 1936) और ‘कान्तो खेनेराल' (कान्तो जनरल, 1950) में नेरूदा की ऐसी कविताएँ संकलित हैं। इन दोनों के बीच तीन और संग्रह आए थे। उनमें भी प्रतिरोध का स्वर ही मुखर था। इस पृष्ठभूमि में 1952 में ‘द कैप्टन्स वर्सेस’ की प्रेम-कविताओं को अपने नाम से छपवाने में अगर उन्हें संकोच हो रहा था, तो ग़ैर-वाजिब नहीं है। प्रतिरोध के उस दौर में भी नेरूदा प्यार तो कर ही रहे थे- अपने जीवन का सबसे बड़ा प्रेम, छिप-छिपाकर। और उस प्रेम से जीवद्रव्य लेकर ऐंद्रिक प्रेम की कविताएँ भी लिख रहे थे। उन कविताओं के प्रति उनमें जो संशय था, वह भी उनके विकसित काव्य-विवेक का ही परिचायक था।

हालाँकि, इस बार भी प्रेम-कविताएँ लिखते समय नेरूदा के सामने वही पुराना संकट था कि प्रेम पर लिखते समय सेक्सिस्ट होने से कैसे बचा जाए। नेरूदा की कविताओं में दैहिक प्रेम की अद्भुत छटाएँ हैं। चाहे सदियों पुराने संस्कृत काव्य में प्रेम को देखा जाए या बीसवीं सदी में नेरूदा और उनके समानधर्मा कवियों की ऐंद्रिक कविताओं को, पुरुषों द्वारा लिखी गई इस कविता के अधिकांश हिस्से में स्त्री की देह को एक वस्तु की तरह प्रस्तुत किया जाता है। प्रेम और देह का यह रिश्ता बड़ा विरोधाभासी है। दैहिक प्रेम को संबोधित दुनिया की अधिकांश कविताएँ पुरुषों ने लिखी हैं। स्त्री के नितंबों को पहाड़, जंघाओं को पेड़ का तना, स्तनों को फल और योनि को पुष्प कहने की एक भरी-पूरी परंपरा है। हमारे यहाँ संस्कृत में नायिका-भेद और मध्ययुग का रीतिकाल तो इसका चरम रहा है। किसी कवि ने लिखा- “तुम्हारे दो स्तनों के बीच मैं इस तरह बैठता हूँ, जैसे दो पहाड़ों के बीच, उनकी छाँव में छंद लिखता हूँ।” कभी-कभी सोचता हूँ कि महिलाओं ने प्रेम, दैहिक प्रेम, पर लिखते हुए ऐसा अतिवादी-सेक्सिस्ट रवैया क्यों नहीं अपनाया? उन्होंने पुरुष अंगों का कम ही वर्णन किया, जहाँ किया, तो अधिकतर मद्धम अंदाज़ में। पुरुषों ने योनि को पुष्प की तरह देखा, तो स्त्रियों ने लिंग को क़लम की तरह क्यों नहीं देखा--- “मैं तुम्हारे लिंग को क़लम की तरह थामकर लिखती हूँ अपनी कविताएँ”। क़तई ज़रूरी नहीं कि स्त्री की लिखी कविता में ऐसी पंक्तियाँ हों, कि वह भी पुरुषों की तरह अतिवादी-सेक्सिस्ट हो जाए, लेकिन मान लीजिए, अगर ऐसी पंक्तियाँ हों, तो? जिस तरह पुरुष, स्त्री के अंगों को वस्तु मानकर लिखते हैं, वैसा ही स्त्रियाँ भी करें, तो? यक़ीनन वे हास्यास्पद बन जाएँगी। ऐसी पंक्तियों का ख़ूब मज़ाक़ बनाया जाएगा, महिला कवि पर हज़ार छींटे उड़ाए जाएँगे, शायद कोई धार्मिक-सामाजिक समूह उनका बलात्कार करने की धमकी दे दे या उनका गला रेतकर लाने वालों को लाखों का इनाम देने की घोषणा कर दे। प्रेम और सेक्स को लेकर दोनों की अभिव्यक्तियाँ अलग होती हैं, यह कोई नई बात नहीं। जेंडर के कोण से सोचा जाए, तो दुनिया की कविता के इतिहास में भयंकर असंतुलन है, प्रेम कविताओं के इतिहास में तो और भी ज़्यादा। लेकिन, जेंडर का यह असंतुलन तो हर क़िस्म के इतिहास में है।

नेरूदा ने संभवत: इसके बारे में सोचा था, लेकिन सेक्सिस्ट होने के ऐसे आरोपों को कोई मूल्य नहीं दिया। उन्होंने बेधड़क स्त्री-अंगों पर पुरुषवादी दृष्टिकोण से लिखा। उनकी काव्य-मेधा इतनी तीक्ष्ण थी कि धक गया। आज के समय नेरूदा जाने कौन-सा औज़ार अपनाते, जाने क्या युक्ति लगाते, क्योंकि आज वैसी कविताएँ नहीं धकने वालीं। हालाँकि अब भी, सेंसुअल या ऐंद्रिक लिखते समय तमाम कवियों पर सेक्सिस्ट होने का ख़तरा मँडराता ही रहता है। फेमिनिस्ट आलोचक नेरूदा की कविताओं के इस सेक्सिज़्म पर हमेशा तीखी टिप्पणी करते हैं, तो कई आलोचक नेरूदा की कविताओं में अर्थों की कई परतों का हवाला देते हुए उनका बचाव भी करते हैं।

नेरूदा की प्रेम-कविताओं में यह निडर ऐंद्रिकता अंत तक दिखाई देती है। आख़िर, अंत तक उन्होंने नये-नये प्रेम करना बंद भी तो नहीं किया था। मातील्दा के साथ हुआ उनका प्रेम सबसे चर्चित था, लेकिन जैसा कि मारकेस के कथन से भी स्पष्ट है, वह उनका आख़िरी प्रेम नहीं था।

‘ला एस्पादा एनसेन्दीदा’ (जलती हुई तलवार, 1970) नेरूदा के जीवन की सबसे ऐंद्रिक किताबों में से एक है। पूरी किताब एक लंबी कविता है।  इसमें फिर से सृष्टि के विनाश की कल्‍पना है। उसके बाद भी एक स्‍त्री और एक पुरुष बचे रह जाते हैं। यह नये आदम और ईव हैं। इसमें आदम तो ख़ुद नेरूदा ही हैं, लेकिन ईव, मातील्‍दा नहीं हैं।

यह नेरूदा के जीवन का आखि़री प्रेम था।

एक साल पहले : मातील्‍दा ने अपनी भतीजी अलीसिया उर्रूतिया को अपने घर रहने बुलाया था। क़रीब तीस वर्षीय अलीसिया किसी पारिवारिक समस्‍या में थीं और अपनी बेटी के साथ वहाँ रहने चली आईं। 65 की उम्र के नेरूदा को अलीसिया से प्रेम हो गया। और जैसा कि, महाकवि जुनूनी थे, यह प्रेम भी उनके तमाम प्रेमों की तरह जुनून से भरा रहा।

जब मातील्‍दा को उनके इस प्रेम के बारे में पता चला, तो वह बहुत क्रोधित हुईं। उन्‍होंने अलीसिया का सारा सामान बाहर सड़क पर फेंक दिया। हिंसक झड़प के बाद अलीसिया को भी घर से निकाल दिया। लेकिन ख़तों के ज़रिए नेरूदा, अलीसिया से जुड़े रहे। उन्‍होंने उसे 'रोसारिया' नाम दिया था। ‘जलती हुई तलवार’ की ईव का नाम भी रोसारिया ही है।

मातील्‍दा की नाराज़गी बढ़ती जा रही थी। नेरूदा ख़ुद को रोक नहीं पा रहे थे। जब उन्‍हें अपनी शादी संकटग्रस्‍त लगने लगी, तो उसे बचाने के लिए उन्‍होंने राष्‍ट्रपति अयेंदे से बात की और गुज़ारिश की कि उन्‍हें चीले के राजदूत के तौर पर पेरिस में नियुक्‍त कर दिया जाए, वरना यह प्रेम-संबंध एक बड़ा स्‍कैंडल बन जाएगा। अयेंदे, नेरूदा के निजी दोस्‍तों में से थे। उनका आग्रह तुरंत माना गया। नेरूदा ने पेरिस इसलिए भी चुना था कि वहाँ किडनी से संबंधित उनके रोग का इलाज भी आसान था।

पेरिस पहुँचने के बाद भी ख़तो-किताबत बंद न हो सकी। उन्‍होंने अपने मातहत के पते पर अलीसिया से ख़त मंगाने शुरू किए। जिस समय वह योजना बना रहे थे कि वह अपनी नई प्रेमिका को भी पेरिस बुला लें, उनका स्‍वास्‍थ्‍य बिगड़ने लगा। उन्हें स्वदेश लौटना पड़ा। मातील्‍दा ने उनके ख़राब स्‍वास्‍थ्‍य को देखते हुए तय किया कि वह उनके नए प्रेम पर कोई आपत्ति नहीं लेंगी। उन्‍हें यह भान हो गया था कि यह नेरूदा का अंत समय है। कुछ ही समय बाद महाकवि की मृत्‍यु हो गई।

उनके मरने के काफ़ी बरसों बाद अलीसिया ने अपनी तरफ़ से यह स्‍वीकार किया कि वह नेरूदा की आखि़री स्‍त्री थीं। उसके पास से नेरूदा की कई अप्रकाशित कविताएं भी मिलीं। जैसा कि नेरूदा का शौक़ था, वह अपनी कविताओं की हस्‍तलिखित प्रतियाँ उसे भेंट कर देते थे, जिसके लिए वे लिखी गई होतीं

नेरूदा महाकवि थे। सदी के सर्वश्रेष्ठ कवि। वह ‘दिलफेंक दास हृदय कुमार प्रेमोपाध्याय’ भी थे। लाखों की भीड़ के सामने कविता पढ़ने वाले विरले कवि। दमितों और शोषितों के लिए लड़ने वाले ज़मीन से जुड़े कार्यकर्ता। दीवाना बना देने वाली शख़्सियत थे, तो प्रतिरोध की बुलंद आवाज़ भी। उनकी कविताओं में अद्भुत बिंब थे, तो सेक्सिज़्म की सीधी छाप भी। यारों के यार थे, तो ‘बलात्कारी’ भी थे। वह प्रेम के महान गायक थे, तो विश्वासघात की मिसाल भी थे। एक नेरूदा थे। उनके कई-कई रूप थे। अपने-अपने अनुसार उन्हें सही-ग़लत मानने की छूट हो सकती है, लेकिन यह ज़रूर है कि वह खुली किताब के भेस में एक रहस्य थे।


Comments

Rishi Shastri said…
अद्भुत.
गिरीश शास्त्री said…
नेरूदा के संबंध में एक सार्थक व प्रभावी लेख |
Gautam Yogendra said…
"कवि अक्सर समूह में काम करते हैं। अपने समूह से मिली तारीफ़ को ही वे सबकुछ मान लेते हैं। यही उनका कम्फर्ट ज़ोन बन जाता है। उस समूह से बाहर अपनी कविता को पहुँचाने और उसे स्वीकार करवाने की चिंता व साहस अधिकांश कवियों में नहीं होता।"

कब से चाहता था, आपसे नेरूदा पर पढ़ना.. धन्यवाद बहुत.. :)🙏💐
Rahul Tomar said…
" वह प्रेम के महान गायक थे, तो विश्वासघात की मिसाल भी थे। एक नेरूदा थे। उनके कई-कई रूप थे। अपने-अपने अनुसार उन्हें सही-ग़लत मानने की छूट हो सकती है, लेकिन यह ज़रूर है कि वह खुली किताब के भेस में एक रहस्य थे।"

इस कॉलम के लिए विशेष रूप धन्यवाद सर🙏🙏
💗💗💐💐
Anita Manda said…
एक कवि के कई-कई रूप।
Jitendra Jeetu said…
बहुत खूब। भुजंग पर लेख भी पढ़ डाला। शुभकामनाएं।
Savi Arora said…
गीत सर बहुत बढ़िया लिखा आपनेे ..
हमें सदी के श्रेष्ठ प्रेम कवि के व्यक्तिगत जीवन से रूबरू कराने के लिए बेहद शुक्रिया :) ....
नेरूदा को जीवन में कई बार प्रेम हुआ और हर बार उन्होंने अपने नये हुए प्रेम पर कविताएं लिखी ,अपनी प्रेमिकाओं को अपनी लिखी कविताओं से नवाज़ा,, निश्चित रूप से सब प्रेमिकाएँ किस्मत वाली रही होंगी.. सच में नेरूदा निष्ठावान थे ..

देखा जाए तो हम सब भी अपने जीवन में पांच सात दफा अलग अलग प्रेमियों प्रेमिकाओं के प्रेम में ज़रूर पड़ते हैं ..पर कोई इस बात को मानने को कभी तैयार नहीं होता..
और ये संभव भी कैसे हो सकता है कि पूरा जीवन हमें एक ही इंसान अच्छा लगता रहे... जीवन के अलग अलग पड़ावों पर अलग अलग इसानों से प्रेम हो जाना कहां गलत ..?
हां जरूरी ये है कि जिस समय जिसके प्रेम में हम हों ,उसके प्रति पूर्ण निष्ठावान रहें..
फिर से शुक्रिया गीत सर..अनुराग वत्स बेहद शुक्रिया :)
गीत भाई नेरुदा पर एक प्रामाणिक टिप्पणी है आपका लेख।
Madhav Rathore said…
तसल्ली से पढ़ा ...चीज़ों को इस तरह देखना ताजगी से भर देता है।
नेरुदा के बारे में कविता से इतर पहली बार इतना डिटेल से पढ़ने को मिला
और वो भी अपने प्रिय कवि की कलम से निकला
Vijay Sharma said…
बहुत खूब। बधाई Geet Chaturvedi !
Rohit Patidar said…
धकाना/धकना का इस्तेमाल हिंदी में पहली बार देख रहा हूँ। मालवी में इसका इस्तेमाल बहुत देखा है। क्या यह हिंदी का ही शब्द है या आपने मालवी से उधार लिया है?

कई बार स्थानीय शब्द इतनी खूबसूरती से पंक्ति को परिपूर्ण कर देतें है। अगर आपने वैकल्पिक शब्द 'चलता' लगाया होता तो उतना साफ़ भाव नहीं आता जो धकने में आया है।
Anuradha Singh said…
हमेशा की तरह बहुत उम्दा। "कवि की महत्वाकांक्षा उसकी कविताओं की बुनावट व संरचना में आने वाले परिवर्तनों से जानी जाती है, प्रसिद्ध हो जाने की उसकी काव्येतर कलाबाज़ियों से नहीं।" बहुत सटीक।
Jui Kulkarni said…
ये बढिया चल रहा है। नेरूदा पर आपका लिखना
Kapil Bhardwaj said…
लाजवाब लिखते हो सर !!!
आयुष सोनू said…
वाह आदरणीय.........नेरूदा के बहाने गजब ढ़ा गये

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