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गीत चतुर्वेदी : कॉलम 11 : कारवी के फूल



कवि कह गया है कि नरगिस के फूल इस बात पर दुखी होते हैं कि उनकी सुंदरता को देखनेवाला कोई नहीं। हज़ार साल में कोई एक ऐसा नज़रवान, दृष्टिसंपन्न रसिक आता है, जो उसके सौंदर्य को जी-भर निहारता है। ब्रह्मकमल साल में एक बार खिलता है। यह दुर्लभ फूल पहले हिमालय में रहता था, धीरे-धीरे मैदानों में भी आ गया है। आधी रात के बाद खिलता है। गाढ़ी नींद के मीठे सपने की तरह खिलता है। मान्यता है, इसको खिलता देख मन में की गई कामना पूरी हो जाती है। अशोक के पेड़ पर जब कोई सुंदरी पैरों से आघात करती है, तब उसमें फूल आते हैं। खिलने के लिए उसे निश्चित स्पर्श चाहिए।

मैं सोचता हूँ, कारवी कैसे खिलता है?

ये सभी फूल नामधनी हैं। बहुत भाग्यशाली हैं। इन्हें कवियों ने छू दिया। कवि जिसके प्रेम में पड़ जाते हैं, वह अमर हो जाता है। चाहे स्त्री हो, चाहे फूल। कवि सिर्फ़ एक-दूसरे के शब्दों का ही हरण नहीं करते, बल्कि उनकी नायिकाओं का भी कर लेते हैं। वासवदत्ता से पहला प्रेम किसने किया होगा? राजा उदयन या राजकुमार कन्दर्पकेतु ने? कवि भास या कवि सुबंधु ने? या इनसे भी पहले पैशाची भाषा के कवि गुणाढ्य ने? किसी को नहीं पता, लेकिन वासवदत्ता पर बहुतों ने लिखा। अलग-अलग तरह से लिखा। जिन-जिनने वासवदत्ता के अप्रतिम सौंदर्य का वर्णन किया, वे सब उसके प्रेम में पड़े होंगे। कवि के पास अमरफल होता है। वह भले ख़ुद उसे चख न सके, पर उस नायिका को ज़रूर चखाना चाहता है, जिसके प्रेम में पड़ जाए। वह अपनी नायिका को फूलों की उपमा देता है। इस नाते फूलों से भी नायिका जैसा ही प्रेम करने लगता है। उन्हें भी अमर बना देता है। जबकि फूल हमारे चारों तरफ़ होते हैं। हम उन्हें देखकर भी नहीं देखते।

फूलों के बारे में हम कितना कम जानते हैं। गिनती के फूलों को छोड़ दें, तो बाक़ी कई फूलों को हम उनके नाम से नहीं पहचान पाते। नाम सुन रखा हो, लेकिन सामने आ जाए, तो अजनबियों की तरह देखते हैं। कारवी का फूल ऐसा ही है। एक अकेले फूल को देख लें, तो पहली नज़र में वह इतना विलक्षण, इतना विशिष्ट नहीं लगता कि उसे स्मृति में जगह दी जा सके। इसीलिए, कारवी समूह का फूल है। यह फूलों से गाया गया कोरस है। महाराष्ट्र की सह्याद्रि पहाड़ियों पर कारवी सात साल में एक बार खिलता है और जब खिलता है, तो पूरी पर्वत-शृंखला को नीली चादर ओढ़ा देता है।

कारवी का जीवनचक्र संघर्ष की किसी कहानी जैसा है। इसके बीज पहली बरसात में अंकुरित हो जाते हैं। फिर साल-दर-साल इनका विकास होता है। सात साल में भी कुछ का आकार पौधों जितना ही होता है, कुछ दुर्बल नन्हें वृक्षों जितने हो जाते हैं। बहुत अधिक पत्तियाँ नहीं जुटा पाते। आठवें साल डोडे जैसी दिखने वाली कली खिलती है, जो जल्द ही नीले, जामुनी फूलों में बदल जाती है। भँवरों और मधुमक्खियों को ये बहुत प्रिय हैं। वे इनसे रस चूसते हैं और इनके पराग को दूर तक पहुँचाते हैं। फूल आने के कुछ ही समय बाद इसमें छोटा-सा फल लगता है, जो जल्द ही गिर जाता है। फिर ये फूल मुरझा जाते हैं। पूरा पौधा ही सूख जाता है। सात साल तक इंतज़ार करने के बाद इसके फूल महज़ सर्दियों के कुछ हफ़्तों तक बने रह पाते हैं। कारवी का एक पौधा जीवन में एक ही बार पुष्पित होता है। जब खिलते हैं, तो कई एकड़ तक सिर्फ़ नीला ही नीला दिखाई देता है। जब सूखते हैं, तो कई एकड़ तक वीरानगी नज़र आती है। इसके फल ज़मीन पर गिरे बिखरे रहते हैं। नमी और धूप के कारण एक दिन इन नन्हें फलों में विस्फोट होता है, जिससे इसके बीज दस-बारह फीट तक बिखर जाते हैं। फिर बारिश का इंतज़ार करते हैं। बूँदें पड़ने के साथ अंकुरित होते हैं और फिर वही सप्त-वर्षीय जीवनचक्र शुरू हो जाता है।

एक साथ कई बीज अंकुरित होते हैं, इसीलिए कारवी समूह में उगता है। न खिलेगा, तो सात साल तक नहीं खिलेगा। और खिल गया, तो मीलों दूर तक बस कारवी ही कारवी। शेष दूसरे पौधे तब जैसे लजाकर छुप जाते हैं। उनका रंग कारवी के नीले, जामुनी रंगों के नीचे दब जाता है। हरे के साथ जामुनी की मैचिंग करने में आधुनिक मनुष्य को भले संकोच हो, प्रकृति को कोई संकोच नहीं होता। रंगों के मेल का सौंदर्य हमने अभी भी प्रकृति से पूरी तरह नहीं सीखा है। कारवी जब हुलसकर कोरस में गाता है, तो उसे मराठी में मेल कहा जाता है। यानी मिलाप, एकत्र होना, मेला भर जाना।


इसे खिलता देखने के लिए मुंबई से ज़्यादा दूर जाने की ज़रूरत नहीं, लेकिन मुंबईवालों को ख़बर नहीं होती कि उनके पास ही कारवी उगता है। जैसे मुंबईवालों को यह ख़बर नहीं होती कि उनके शहर के बिल्कुल पास जव्हार है, मोखाड़ा है, तलासरी है, वाड़ा है। ये सब मुंबई से लगे आदिवासी इलाक़े हैं। मुंबई का भूगोल अजब कल्पनाशील है कि वह लंदन व न्यूयॉर्क को अपना पड़ोसी मान लेता है, लेकिन इन इलाक़ों को नहीं मान पाता। वारली चित्रकला के नाम से इन जगहों की कला पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है, लेकिन ये जगहें कमनाम हैं। हर बड़े शहर के हैंडलूम स्टोर्स में वारली शैली के चित्रांकन वाला एक कपड़ा तो ज़रूर मिल जाएगा।

सह्याद्रि पर्वत-शृंखला, गुजरात और महाराष्ट्र को जोड़नेवाले बिंदु से शुरू होकर केरल, तमिलनाडु तक जाती है। इसे पश्चिम घाट नाम से भी जाना जाता है। इसका शुमार प्राकृतिक संपदाओं से समृद्ध दुनिया की दस सबसे चर्चित जगहों में होता है। जो वनस्पतियाँ विश्व की दूसरी जगहों पर लुप्तप्राय हैं, यहाँ मिल जाती हैं। उत्तर में जो महत्व विंध्य को मिला था, दक्षिण में वही सह्याद्रि को है। उत्तर के कवियों ने दुर्गा को विंध्यवासिनी कहा है, दक्षिण के कवि उन्हें सह्यवासिनी कहते हैं। उत्तर व दक्षिण में कितना अंतर है। उत्तर, दक्षिण को कितना कम जानता है। शूद्रक के जगत्प्रसिद्ध नाटक मृच्छकटिकममें चारुदत्त का सिर बलिवेदी पर है, प्रहार से पहले ही चाण्डाल का खड्ग हाथ से गिर जाता है, राम-राम की तर्ज पर उसके मुँह से निकलता है, “भगवति सह्यवासिनि! प्रसीद प्रसीद!” भवभूति की मालती-माधवमें दुर्गा सह्यवासिनि के रूप में आती हैं। दक्षिण से आए इन सारे कवियों का सह्याद्रि से गहरा नाता रहा है। मैं सोचता हूँ, क्या इनके युगों में कारवी नहीं खिला होगा? इनके साहित्य में कारवी क्यों नहीं मिलता? या मिलता है, तो उन नामों से, जिन्हें अब हम सामूहिक रूप से भूल चुके हैं? आख़िर कितने सारे नाम तो बदल गए हैं। फूल भी बदल गए हैं। अशोक के फूलों पर कालिदास ने कितने सुंदर छंद बनाए। युवतियाँ उससे केशसज्जा करती थीं। वसंत में यह फूल लोगों के कामभाव को उद्दीप्त कर देता था। मकरंद से भरे हुए, भँवरों के अतिप्रिय, ऐसे गहरे लाल फूल, जिनके आगे लालमणि भी फीकी लगे। इसीलिए महाकवि इसे रक्ताशोक कहते थे। वह अशोक अब कितना कम दिखता है। हमारे शहरों के बग़ीचों में, सड़क किनारे जो लंबे-छरहरे, नोकदार पत्तियों वाले पेड़ अशोक के नाम से पहचाने जाते हैं, वे अशोक नहीं हैं जिनके फूलों के बारे में हम पढ़ते आए हैं। यह उस अशोक वाटिका का वृक्ष नहीं, जिसमें सीता रही थीं और हनुमान उनसे मिलने गए थे। यह प्रेम के मनोभावों का प्रतीक अशोक नहीं, जहाँ यक्ष रहा करते थे। यह वह अशोक नहीं, जिसके तने में छिपकर कामदेव रहा करते थे। यह वह अशोक नहीं, जिसे किसी ठंडे प्रदेश से कभी गंधर्व लाए होंगे। यह नया अशोक है। इसमें फूल नहीं दिखते। कभी आ गए, तो वे लाल नहीं होते। जबकि अशोक के फूल लाल का पर्याय थे।

जैसे लवली की सूखी पत्तियाँ, पीले रंग की पर्याय थीं। लवली संस्कृत का शब्द है। हम इस शब्द को नहीं जानते, लेकिन इसी वर्तनी व उच्चारण वाले अंग्रेज़ी शब्द को जानते हैं। विक्रमोर्वशीयमके पाँचवें अंक में कालिदास कहते हैं, “लवलीदलपाण्डुराननच्छायम!” यानी पुरुरवा को उर्वशी का चेहरा लवली की पत्तियों जैसा पीला दिखाई देने लगा था। कितना मुश्किल है इस लवली वृक्ष (या लता) को खोजना! हमारी भाषाओं के इतिहास में यह नाम कितना विस्मृत हो चुका है, लेकिन शुक्र है कि वृक्ष विस्मृत नहीं है। लवली एक क़िस्म का आँवला है, जिसे काट आँवला कहते हैं। अलग क्षेत्रों में इसके अलग नाम हैं, जैसे हरफारेवड़ी, किरनेली या हरफारी। आयुर्वेद में कुछ जगहों पर इसे कोमल-अम्लिका नाम से संबोधित किया गया है।

अशोक का नाम वही रहा, लेकिन इतने बरसों में पेड़ बदल गया। लवली का पेड़ वही रहा, लेकिन इतने बरसों में नाम बदल गया। जीवन के बारे में हमारा ज्ञान भाषाओं पर आधारित होता है। वे लगातार बदलती रहती हैं। उन बदलावों को दर्ज करना हम भूल जाएँ, तो हमारा ज्ञान नकारात्मक आशयों में प्रभावित होता है। इतिहास की कई बातें अब हमारे लिए गुत्थियाँ हैं, तो उनके पीछे एक कारण यह भी है कि हमने अपनी प्राचीन भाषाओं के शब्दों को या तो खो दिया है या आज के युग में उनके अर्थों को बदल दिया है।

मैं सोचता हूँ, क्या कारवी का नाम भी बदल गया होगा? संस्कृत साहित्य में वर्णित अनगिनत फूलों में से कोई एक फूल, कारवी का रहा होगा, लेकिन इस नाम से नहीं, किसी और नाम से? या फिर उस युग में इसे नीलकुरुंजी या वनलता की ही कोई उपजाति माना जाता होगा? कारवी मराठी का शब्द है। मध्यप्रदेश के कुछ हिस्सों में इसे मरुआदोना कहते हैं। ज़ाहिर है, मरुआदोना भी आंचलिक शब्द है। ठेठ संस्कृत या हिंदी में इसका क्या नाम है? कुछ है भी या नहीं, ख़बर नहीं। फूल आंचलिक है, तो नाम भी आंचलिक है। इसकी कहानी बस इतनी है, जितनी ऊपर बताई। और ख़ास बात सिर्फ़ इतनी है कि सात साल में एक बार खिलता है, लेकिन जब खिलता है, तो पूरे पहाड़ को नीलगिरि बना देता है। कारवी तो इतना अभागा है कि पूरे पहाड़ को नीला कर देने के बाद भी इसे पहाड़ के नामकरण का श्रेय नहीं मिल पाता। क़ायदे से, जहाँ उगता है, उस पहाड़ को नीलगिरि नाम देना चाहिए, लेकिन नीलगिरि नामक पहाड़ तो सह्याद्रि के और दक्षिण में जाने पर मिलता है। कारवी जैसा ही एक फूल वहाँ खिलता है, जिसका नाम है नीलकुरुंजी। यह बारह साल में एक बार खिलता है। जिन पहाड़ों पर खिलता है, वे नीलगिरि कहलाते हैं। हमारे इतिहास में कई नीलगिरि हैं। कामरूप में देवी कामाख्या जिन पहाड़ों पर बसती हैं, उन्हें भी नीले फूलों के कारण नीलगिरि कहा जाता था। लेकिन कारवी के निवासस्थान को यह नाम न मिल पाया।


संस्कृत के कवियों ने जितना फूलों के बारे में लिखा है, शायद ही दुनिया की किसी भाषा के कवियों ने लिखा हो, लेकिन कवियों ने सिर्फ़ उन्हीं फूलों को चुना, जिनके साथ सौंदर्य के बिंब व कथाएँ जुड़ी थीं। कवि का स्वभाव भँवरे जैसा ही होता है। सिर्फ़ उन्हीं फूलों पर बैठता है, जहाँ से काम लायक़ रस मिल सके।

कुंद सरस्वती का फूल है। या कुंदेंदुतुषारहारधवला... कुंद की माला सरस्वती को बड़ी प्रिय है, क्योंकि उसकी सफ़ेदी अद्वितीय है। माधवी, सुगंधित, मधु-गुणों से भरा लता-पुष्प है। दोनों चमेली की उपजातियाँ हैं। पहले कुंद खिलता है, उसके कुछ समय बाद माधवी खिलती है। माधवी खिलना शुरू होती है, कुंद कुम्हलाना शुरू हो जाता है। माधवी पूरी तरह खिल जाती है, कुंद पूरी तरह मुरझा जाता है। विक्रमोर्वशीयममें कालिदास ने पुरुरवा की पत्नी को कुंद कहा है और उसकी प्रेमिका यानी उर्वशी को माधवी। विवाहेतर प्रेम-संबंध जब पूरी तरह खिलने लगता है, विवाहिता स्त्री मुरझा जाती है।

सहकार आम का पेड़ है। वह अपनी जगह खड़ा, लहराता रहता है। कहीं से मल्लिका लता आती है और सहकार से लिपट जाती है। सहकार प्रेम में उपस्थिति की तरह है। वह हमेशा स्थिर रहेगा। मल्लिका प्रेम में अनुभूति की तरह है। वह हमेशा बदलती रहेगी। प्रेम को पाने के लिए सहकार अपनी जगह से नहीं हिलेगा, हर बार मल्लिका को ही उसके पास आकर लिपटना होगा।

भास और कालिदास के यहाँ फूल ही फूल हैं। भास के यहाँ हरे रंग का कमल है, कालिदास के यहाँ हरा कमल नहीं है। भास के यहाँ काले फूल भी हैं। रणक्षेत्र में रथ की ध्वजा को काले फूलों से सजाया जाता था, जो टूटकर गिरने के बाद रणभूमि की शोभा बढ़ाते थे। कालिदास के पास फूल, रण-पुष्पों की तरह नहीं। लेकिन फूलों के प्रति कालिदास का अनुराग भास से कहीं ज़्यादा है। रघुवंश में एक जगह कहा है कि राजा को जितनी चिंता प्रजा की करनी चाहिए, उतनी ही चिंता फूलों की भी करनी चाहिए। फूलों का वर्णन करने के लिए कालिदास सुदूर वक्षु देश (आज का आमू दरिया) तक चले जाते हैं। केसर पुष्पों का बखान करते हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि कालिदास के वर्णन के बाद वे पुष्प नीचे कश्मीर तक आए। महाकवि तो यह संकेत तक करते हैं कि जिन पेड़ों को फूल नहीं आया, उनका बसंत से संयोग ही न हुआ।

कालिदास वक्षु देश तक चले जाते हैं, हिमालय के अंदरूनी हिस्सों के फूलों के बारे में बता देते हैं, विंध्य प्रदेश की पुष्पराशि को चित्रित कर देते हैं, दक्षिण में पहुँच जाते हैं, देश के कई हिस्सों पर उनकी नज़र है। कथाओं को मानें, तो मृत्यु का वरण करने के लिए वह श्रीलंका तक चले गए, लेकिन सह्याद्रि के कारवी पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। किसी ने आकर उन्हें यह न बताया कि एक बार दक्षिण में उन जगहों की यात्रा कर आओ, जहाँ पहाड़ियाँ, कभी-कभी समंदर होने का भ्रम देती हैं। नीले कारवी को कालिदास ने शायद न देखा होगा। देखा होता, तो उस नीलालोक प्रसार पर उनके यहाँ एक छंद ज़रूर होता। कालिदास कभी पुष्पद्रोही नहीं हो सकते, जो फूल को देखकर भी अनदेखा कर दें। सौंदर्य का पुजारी, सौंदर्य का घाती नहीं हो सकता, सौंदर्य की बलि भले हो जाए। भास तो ठेठ दक्षिण के थे। जिन बरसों में सह्याद्रि पर नीला कारवी फूलता था, क्या उन बरसों में वह कभी उस राह न गुज़रे होंगे? नीले फूल तो भास को विशेष रूप से पंसद जान पड़ते हैं।

कारवी के साथ तो कोई कथा भी नहीं जुड़ी। कैसा अभाग है कि इतना सुंदर फूल कथाविहीन है। मनुष्य की सभ्यता में प्रेम के गल्प की रचना फूलों ने ही की है। पर देखो, गल्पकार के पास अपने ही जीवन का कोई गल्प नहीं। इतिहास हो या वर्तमान, मुख्य धारा का दबाव हमेशा बना रहता है। कारवी मुख्य धारा का फूल भी नहीं। किनारे सह्याद्रि में पाया जाता है। वह जनजातियों का क्षेत्र है। कारवी के उन्नत वृक्षों के तनों या टहनियों का प्रयोग वे कच्चे मकान बनाने में करते हैं। उनका सांस्कृतिक गल्प अभी तक मुख्य धारा में पूरी तरह शामिल नहीं हो पाया है। जिसके साथ कोई कहानी न जुड़ी हो, उसे भला इतिहास क्यों याद रखेगा? और कवि तो इतिहासकारों से ज़्यादा चूज़ी होते हैं। वे भला ऐसे फूल को महत्व क्यों देने लगे, जिससे प्रेम के बिंब न बनते हों? जिन्हें नवयौवनाओं ने अपने केशों में न सजाया हो? जिनकी कलियों को कान में बालियों की तरह न धारा हो?

फूलों के देवता का पक्षपात तो सर्वविदित है। कामदेव फूलों के भी देव हैं। बसंत उनका सहयोगी है। उनके पाँच बाण थे, पाँच फूलों से बने हुए। पहला श्वेत कमल, जो उन्माद का बाण है। दूसरा, अशोक, जो तापन का बाण है। तीसरा आम के फूलों से बना, जो शोषण का बाण है। चौथा नवमल्लिका, जो स्तंभन का बाण है। पाँचवाँ नीलकमल, जो सम्मोहन का बाण है। कहते हैं, कामदेव अपना हमला इन्हीं पाँच चरणों में करते हैं। उन्होंने अपने बाणों के लिए फूलों का चयन किस आधार पर किया था, यह कोई कैसे जान सकता है। कामदेव, श्वेत कमल को उन्माद उपजाने के लिए प्रयुक्त करते हैं, जबकि संस्कृत काव्य में कई जगह वर्णन है कि कोई मनोरोग या उन्माद से पीड़ित हो, तो उसके माथे पर श्वेत कमल व उसका डंठल बाँधना चाहिए, मानसिक शांति मिलेगी। प्रेम का देवता ऐसा चतुर है कि जिस फूल को दूसरों ने दवा का दर्जा दिया, उसी को रोग की तरह  अपने शिकार पर छोड़ दिया.

और भी तो फूल हो सकते थे। फूलों के देव को फूलों की क्या कमी? लेकिन किसी के चयन पर सवाल कैसे किया जा सकता है? कितना निरर्थक है यह! देव का धनुष है, देव की मर्ज़ी, चाहे जिस फूल को चुन ले। फिर भी, मन में तो सवाल उठता ही है! ख़ासकर तब, जब बीसवीं-इक्कीसवीं सदी में हम देखते हैं कि प्रेम का सारा क्रियाकलाप गुलाब के इर्द-गिर्द होता है। क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि कोई सरे राह, एक घुटना टेक, आम की मंजरियाँ बढ़ाकर प्रेमिका से प्रणय-निवेदन कर रहा हो? कमल का फूल देकर कितने लोगों ने प्रपोज़ किया होगा? चाहे, तो कोई कोशिश कर सकता है। प्रेम के प्रतीक अक्सर समकालीन कला व उसके अभिजात बाज़ार द्वारा गढ़े जाते हैं। जब बाज़ार इस रूप में नहीं था, तब भी अभिजात अपने प्रबल रूप में उपस्थित था।

संस्कृत साहित्य में गुलाब को वह महत्व प्राप्त नहीं है, जो आज है। गुलाब की अलग-अलग क़िस्में थीं और अधिकांश के नाम अलग थे। कहीं उसे शतपुष्पि कहा गया, तो कहीं वृत्तपुष्प। आज की संस्कृत में गुलाब के लिए सर्वाधिक प्रचलित शब्द है स्थलपद्मम यानी ज़मीन पर उगने वाला कमल। लेकिन इनमें से किसी भी नाम को छू लें, संस्कृत काव्य में वह प्रेम के मुख्य प्रतीक के रूप में नहीं मिल पाता। जबकि इस भूमि पर गुलाब बहुतायत में पाया जाता था। चरक और सुश्रुत ने बाक़ायदा इन फूलों (शतपत्री, गंधाद्य, सुशीत, सुमन, सुवृत्त) का उल्लेख किया है, लेकिन बुख़ार उतारने के लिए, प्यार का बुख़ार चढ़ाने के लिए नहीं। बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन गुलाबजल बनाने की विधि जानते थे। वात्स्यायन, कामसूत्र में गुलाब की क़िस्मों का उल्लेख करते हैं, लेकिन शयनकक्ष सजाने के लिए कई अन्य फूलों के सहयोगी के रूप में, लगभग गौण उल्लेख। कालिदास व सौंदर्य के अन्य कवियों के पास गुलाब का वैभव नहीं। उनके ज़माने में जिन फूलों में प्रेम-प्रतीकों का वास था, उनकी जगह आज छिन चुकी है। आज प्रेम का अधिकांश ऐश्वर्य गुलाब के पास है। गुलाब का यह सत्कार यूरोप और मध्य-पूर्व ने किया। कहते हैं, सिकंदर जब भारत आया, तो जिन चीज़ों को देख वह हैरान हुआ था, उनमें गुलाब भी था। उसी ने इसके पौधे यूरोप में अरस्तू के पास भिजवाए।

जब गुलाब जैसे दबंग फूल की यह हालत थी, तो बेचारे कारवी के बारे में कवियों से क्या सवाल पूछा जाए? कैसे पूछा जाए कामदेव से कि तुम्हारे बाणों में गुलाब क्यों नहीं था? कारवी भी क्यों नहीं था? मैं तो कारवी का पक्ष लेने पर तुला हुआ हूँ। कामदेव ने पक्षपात किया था, तो भला मैं क्यों न इसका सुख लूँ? वामन पुराण कहता है कि जब शिव ने उन्हें भस्म किया, तो उनका धनुष ज़मीन पर गिरकर टूट गया और पाँच भागों में बँट गया। धनुष की मूठ जहाँ गिरी, वहाँ से चम्पा का फूल उगा। उसके दोनों मोड़ जहाँ गिरे, एक से केसर के फूल उग आए, दूसरे से पाटल के फूल। (यह पाटल गुलाब नहीं है। उत्तर भारत की बोलियों में इस फूल को अब अधकपारी या पाचल कहा जाने लगा है।)  धनुष का मध्य भाग जहाँ गिरा, वहाँ पाँच पंखुड़ियों वाली चमेली उग आई। और धनुष की कटि जहाँ गिरी थी, वहाँ से मल्लिका या बेला के फूल उगे।

ये भी बेहद चुने हुए फूल हैं। ऐसे फूल, जो प्राचीन साहित्य में बार-बार दिखाई देते हैं। यक़ीनन, उस समय प्राकृतिक नेमतें आज से कहीं ज़्यादा रही होंगी, विभिन्न क़िस्म के फूलों के साथ मनुष्य का संबंध भी आज के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा रहा होगा, फिर भी अधिकांश कवियों के पास एक ही जैसे फूलों का उल्लेख है। एक कवि ने जिस फूल की तारीफ़ कर दी, परवर्ती कवियों ने भी उस फूल को सराहा। ऐसे में मुझे लगता है कि अगर किसी एक कवि ने कारवी के फूल को विरहिणी की प्रतीक्षा के पूरे होने के प्रतीक की तरह चित्रित किया होता, तो शायद कारवी का फूल भी नामधनी हो जाता।

कामदेव के धनुष-विखंडन पर कुछ विद्वान कहते हैं, जहाँ वासना का नाश होता है, वहाँ फूल खिलते हैं। लेकिन कामदेव को महज़ वासना का देव नहीं माना जा सकता, वह जीवमात्र की एक बुनियादी अनुभूति का अधिष्ठाता है। आम मान्यता है कि शिव ने कामदेव को हरा दिया, पर ग़ौर से देखें, तो शिव भी हारे हुए लगते हैं। क्रोधाग्नि की वह घटना दोनों पक्षों की जय या पराजय, दोनों रूपों में देखी जा सकती है। अनंग होने के बाद भी कामदेव का नाश न हुआ। विदेह होकर भी उसने शिव पर वैसा ही प्रभाव डाला। आख़िर कुछ समय बाद वह पार्वती की ओर आकर्षित तो हुए ही। कामदेव की सत्ता अडिग रही। हालाँकि उन्होंने शिव से बदला लिया था, जब अगले जन्म में वह श्रीकृष्ण के पुत्र बने। रुक्मिणी की कोख से प्रद्युम्न बनकर उनका जन्म हुआ। विष्णु व भागवत पुराणों में इसकी अलग-अलग कथाएँ हैं। अनिरुद्ध व उषा के विवाह के अवसर पर देवों व असुरों में संग्राम हो गया। संयोगवश, शिव की सेना असुरों के साथ थी, कार्तिकेय उसके सेनापति। इधर, देवसेना के सेनापति कामदेव यानी प्रद्युम्न थे। यह एकमात्र ऐसी लड़ाई है, जिसमें शिव पराजित हुए थे, क्योंकि प्रद्युम्न ने कार्तिकेय को हरा दिया था। लेकिन बदले की इस तथाकथित लड़ाई को जाने व माने बिना भी यह महसूस किया जा सकता है कि अनंग रूप में भी कामदेव ने शिव को प्रेम करने पर विवश कर दिया था। बाद में भले पार्वती के आग्रह पर कामदेव को उनका रूप लौटा दिया और वह मस्त होकर पूरी सृष्टि पर फूल से निशाना साधते रहे।

प्रेम के सारे निशाने फूलों से ही सधते हैं, क्या फ़र्क़ पड़ता है कि वह साधारण-सा फूल हो या कोई महानसेलेब्रिटीफूल? कारवी को क्या फ़र्क़ पड़ता है कि कोई उस पर कविता लिखे या न लिखे? वह ख़ुद पहाड़ी की विस्तृत छाती पर, पेट के बल लेटकर, उल्लास की नीली कविता लिखता है। जैसे हेनरी मातीस अपने कैनवास पर नीले का एक स्ट्रोक मारता है। कारवी प्रतीक्षा का नीला छंद है। छंद का अर्थ आवरण है। कारवी तो अपना संघर्ष करता है, सात साल तक कोशिश करता है, आठवें साल फूल उगा देता है। हार नहीं मानता। जैसे नीलकुरुंजी बारह साल तक हार नहीं मानती। समझ लीजिए, नरगिस 999 साल तक प्रतीक्षा करने के बाद एक दिन निराश हो जाए, तो हज़ारवें साल में आने वाले दीदावर का स्वागत कैसे कर पाएगी? फूल चाहे कोई भी हो, कारवी, गुलाब, चम्पा या अशोक, मनुष्य की जिजीविषा के प्रामाणिक रूप हैं- कुछ भी हो जाए, वे अपना खिलना नहीं रोकते। कैसा भी परिवेश हो, अपना स्वभाव नहीं बदलते। असंभव रेगिस्तानों में उगनेवाली नागफनी भी अंतत: अपना फूल खिला ही देती है।

फूलों को बहुत नाज़ुक माना जाता है। उनसे भी नाज़ुक कोई है? हाँ, गद हैं। गद श्रीकृष्ण के छोटे भाई थे, जिन्हें फूलों से भी नाज़ुक माना जाता था। श्रम का कोई भी काम उनसे कह दिया जाए, गद महाशय वहाँ से खिसक लेते थे। लेकिन इसमें नज़ाकत कम, आलस्य अधिक दिखता है। फूलों की नज़ाकत में आलस्य नहीं है, ताज़गी है। चीज़ों को ज़रा-सा उलटकर देखा जाए, तो फूलों से मज़बूत कुछ न मिलेगा। रौंदे जाने के तमाम इतिहास के बाद भी सिर उठाकर खड़ा एक फूल ताक़त की प्रेरणा है। मनुष्य भी सदियों से दमन झेलता आया है, फिर भी सिर उठाकर खड़ा है। देवता की आराधना करें या न करें, लेकिन उसके चरणों में पड़े फूल की आराधना ज़रूर करनी चाहिए। चाहे सुख हो या दुख, वे मनुष्य की यात्रा के सबसे प्रेरक व रंगदार साथी रहे हैं।



Comments

Harsha Verma said…
"फूल चाहे कोई भी हो, कारवी, गुलाब, चम्पा या अशोक, मनुष्य की जिजीविषा के प्रामाणिक रूप हैं- कुछ भी हो जाए, वे अपना खिलना नहीं रोकते। कैसा भी परिवेश हो, अपना स्वभाव नहीं बदलते। असंभव रेगिस्तानों में उगनेवाली नागफनी भी अंतत: अपना फूल खिला ही देती है।"

बेहतरीन ढंग से गुंथा हुआ बेहद सुंदर लेखन.
जैसे लंबे वक्त से 'उपस्थित होने के बावजूद अनुपस्थित-से होने' वाले कारवी के फूल कवि का ध्यान पाकर पुनः जीवित हो उठे हों और उसके बाद प्रेम, सौंदर्य, प्रतीक्षा के प्रतीक बन गए हों, ऐसा लग रहा है.
शेष, कारवी के फूलों की तस्वीर की अनुपस्थिति खल रही है सम्पादक महोदय :)
जिस विषय को छूते हो सोना बना देते हो गीत जी,,, कारवी के फूल,,,,, बहुत सुन्दर
आप के कालम पढ के लगता है किसी उड़नखटोले में बैठे कई सदियो व कई जगहो की सैर कर रहे हो ।
शब्द सारथी हो।
Brajesh MP said…
सर आपके लेख समय काल से परे ले जाते हैं.. संस्कृत की इतनी जानकारी मुझे कम ही पढ़ने को मिली कहीं.. आप बहुत मेहनत से लिखते हैं... 💙💙
Anita Manda said…
'फिर छिड़ी रात बात फूलों की।'
फूलों की तरह ही खूबसूरत फूलों की बात है, और फिर साहित्य का सन्दर्भ तो सोने पर सुहागा।
बहुत समृद्ध आलेख। वाह!!

# कवि जिसके प्रेम में पड़ जाते हैं, वह अमर हो जाता है। चाहे स्त्री हो, चाहे फूल।

# ब्रह्मकमल साल में एक बार खिलता है। यह दुर्लभ फूल पहले हिमालय में रहता था, धीरे-धीरे मैदानों में भी आ गया है। आधी रात के बाद खिलता है। गाढ़ी नींद के मीठे सपने की तरह खिलता है।

# एक अकेले फूल को देख लें, तो पहली नज़र में वह इतना विलक्षण, इतना विशिष्ट नहीं लगता कि उसे स्मृति में जगह दी जा सके। इसीलिए, कारवी समूह का फूल है। यह फूलों से गाया गया कोरस है।

# मुंबई का भूगोल अजब कल्पनाशील है कि वह लंदन व न्यूयॉर्क को अपना पड़ोसी मान लेता है, लेकिन इन इलाक़ों को नहीं मान पाता।

# लवली संस्कृत का शब्द है। हम इस शब्द को नहीं जानते, लेकिन इसी वर्तनी व उच्चारण वाले अंग्रेज़ी शब्द को जानते हैं। ‘विक्रमोर्वशीयम’ के पाँचवें अंक में कालिदास कहते हैं, “लवलीदलपाण्डुराननच्छायम!” यानी पुरुरवा को उर्वशी का चेहरा लवली की पत्तियों जैसा पीला दिखाई देने लगा था।

# अशोक का नाम वही रहा, लेकिन इतने बरसों में पेड़ बदल गया। लवली का पेड़ वही रहा, लेकिन इतने बरसों में नाम बदल गया।

# कवि का स्वभाव भँवरे जैसा ही होता है। सिर्फ़ उन्हीं फूलों पर बैठता है, जहाँ से काम लायक़ रस मिल सके।

# माधवी पूरी तरह खिल जाती है, कुंद पूरी तरह मुरझा जाता है। ‘विक्रमोर्वशीयम’ में कालिदास ने पुरुरवा की पत्नी को कुंद कहा है और उसकी प्रेमिका यानी उर्वशी को माधवी। विवाहेतर प्रेम-संबंध जब पूरी तरह खिलने लगता है, विवाहिता स्त्री मुरझा जाती है।

# नीले कारवी को कालिदास ने शायद न देखा होगा। देखा होता, तो उस नीलालोक प्रसार पर उनके यहाँ एक छंद ज़रूर होता। कालिदास कभी पुष्पद्रोही नहीं हो सकते, जो फूल को देखकर भी अनदेखा कर दें।

# प्रेम के प्रतीक अक्सर समकालीन कला व उसके अभिजात बाज़ार द्वारा गढ़े जाते हैं। जब बाज़ार इस रूप में नहीं था, तब भी अभिजात अपने प्रबल रूप में उपस्थित था।

#किसी एक कवि ने कारवी के फूल को विरहिणी की प्रतीक्षा के पूरे होने के प्रतीक की तरह चित्रित किया होता, तो शायद कारवी का फूल भी नामधनी हो जाता।

# देवता की आराधना करें या न करें, लेकिन उसके चरणों में पड़े फूल की आराधना ज़रूर करनी चाहिए।
कभी कभी किसी को अपने इस तरह होने का क्रेडिट नही मिलता, बहुत फूल खिलेते हैं पर हर फूल कवि की नजर नही चढ़ते, इन्तजार के फल मीठे होते हैं, आज कारवी पर एक कवि की नजर पड़ ही गई और लो वो मशहूर हो गया ।
खिलना तो अनिवार्य है, कब कहाँ कैसे वो भी निश्चित है, इन्तजार है तो बस किसी साक्षी का जिसने जंगल मे पेड़ का गिरना भर देखा।
कुछ होने के लिए किसी दूसरे का होना जरूरी है।
Sudhanshu Gupt said…
बहुत बढ़िया गीत भाई!
Shipra Kiran said…
"फूल चाहे कोई भी हो, कारवी, गुलाब, चम्पा या अशोक, मनुष्य की जिजीविषा के प्रामाणिक रूप हैं- कुछ भी हो जाए, वे अपना खिलना नहीं रोकते। कैसा भी परिवेश हो, अपना स्वभाव नहीं बदलते। असंभव रेगिस्तानों में उगनेवाली नागफनी भी अंतत: अपना फूल खिला ही देती है।"💐💐
बेहतरीन। लेखक और सबद को बधाई ही बधाई। सबद के प्रति अनुराग
मुझे नहीं मालूम नीला गुलमोहर होता है या नहीं..या मैंने अपने कॉलेज में स्थित उस पेड़ को गुलमोहर मान लिया जिस पर नीले नीले फूल खिलते थे..जो मेरी हँसी को कपड़े पर लगने वाली टिनोपाल नील की तरह उजला कर देते थे..मगर मुझे मालूम है कि वो कारवी नहीं था.

क्या ख़ूब लिखा है प्रिय कवि Geet Chaturvedi ने..!!

(अब मैं हर नीले फूल में कारवी खोजूँगी.)
Venus Singh said…
आपको पढ़ना भी,,,, फूलों जैसी ताजगी दे जाता है
गीत सर को पढ़ना हमेशा समृद्ध करता है। भाषा ही नहीं, कविता, जीवन, प्रकृति सब आपके यहाँ आकर और सौम्य और उर्वर और सुंदर हो उठती है।

पुरुरवा-पुरुरवा की पत्नी और उर्वशी का कैसा मार्मिक रूपक दिया कुंद और माधवी के पुष्पों के जरिए

और यह

सहकार आम का पेड़ है। वह अपनी जगह खड़ा, लहराता रहता है। कहीं से मल्लिका लता आती है और सहकार से लिपट जाती है। सहकार प्रेम में उपस्थिति की तरह है। वह हमेशा स्थिर रहेगा। मल्लिका प्रेम में अनुभूति की तरह है। वह हमेशा बदलती रहेगी। प्रेम को पाने के लिए सहकार अपनी जगह से नहीं हिलेगा, हर बार मल्लिका को ही उसके पास आकर लिपटना होगा।

जीवन इसलिए सुंदर है कि आपका लिखा हुआ पढ़ सकते हैं।
vikas vashisth said…
अगर ये किसी किताब का हिस्सा होता तो सोचना पड़ता कि किस लाइन को अंडरलाइन न करूंं। किसी अखबार में होता तो न जाने कितनी कटिंग्स में सहेजा जाता। ये वेब स्पेस में है। फूल की तरह खड़ा रहेगा, मज़बूती से। मज़ा गया गीत सर।
Seema Gupta said…
कारवी...... नाम भी पहले नहीं सुना था लेकिन अब लग रहा है कि चिरपरिचित है...... कवि जिसके प्रेम में पड़ जाए वह अमर हो जाती है कितना खूबसूरत सच कहा आपने...... कालिदास ने कारवी के बारे में नहीं लिखा क्यों नहीं लिखा शायद इसलिए कि आपने जो अमर करना है कारवी को......गुलाब के कितने नामों से परिचित थी मैं.... नहीं जानती थी इतने प्यारे नाम..... शतपुष्पी.... स्थलपद्यम........ प्यार का बुखार उतारने चढ़ाने के लिए नहीं 😊...... सहकार प्रेम में उपस्थिति की तरह है स्थिर है...... लता को ही पास आना होता है...... पुरुरवा की पत्नी को कुंद, उर्वशी को माधवी आहहहहहह....... कितना गहरा गए हैं आप कारवी को हम सबसे मिलवाने के लिए......... आप इसमें बहुत सफल हुए हैं....... कितने लोगों को छुआ होगा कारवी ने......
गाढ़ी नींद के सपने की तरह खिलता है कारवी......
अद्भुत अद्भुत गीत...... बहुत खूबसूरत.......

देवताओं की आराधना करें न करें, लेकिन उनके चरणों में पड़े फूल की आराधना जरूर करनी चाहिए........

आपने अमर कर दिया कारवी 🌹🌹🌹🌹🌹🌹
Babban Singh said…
हजारी प्रसाद द्विवेदी (कदाचित कुछ विद्या निवास मिश्र व कुबेर राय को भी शामिल करें ) के बाद हिंदी में इतिहास, पुराण, संस्कृत साहित्य व लोक के सहारे ललित निबंध लिखने वाले विरले ही लक्षित होते हैं. वैसे इसे पढ़ते हुए कई बार जॉन डिडियन की याद भी आती रही. वैसे इस तरह के लेखन में जिस अनुशासन व शोध की जरूरत होती है उसके लिए आपका नमन, गीत जी!
Usha Bhatia said…
Wah anokha lekh... ..pathak phoolon ki mehak...aur phool pathak ki dharkan mahsoos Kar sakte hai🍒
"हज़ारों साल नरग़िस अपनी बेनूरी पे रोती है
तब कहीं जाके होता है चमन में दीदा-वर पैदा ।"
नरग़िस और कारवी जैसे सभी फूलों को आप -सा दीदा-वर ही चाहिए और मिला भी और हम जैसे सौंदर्य के अल्पबोधियों को आप की पारखी नज़र के सहारे से इतनी खूबसूरती महसूसने को मिली ।
शुक्रिया, शुक्रिया, शुक्रिया
Rahul Tomar said…
कितना सुंदर लेख है सर।

‘विक्रमोर्वशीयम’ में कालिदास ने पुरुरवा की पत्नी को कुंद कहा है और उसकी प्रेमिका यानी उर्वशी को माधवी। विवाहेतर प्रेम-संबंध जब पूरी तरह खिलने लगता है, विवाहिता स्त्री मुरझा जाती है।"

"फूल चाहे कोई भी हो, कारवी, गुलाब, चम्पा या अशोक, मनुष्य की जिजीविषा के प्रामाणिक रूप हैं- कुछ भी हो जाए, वे अपना खिलना नहीं रोकते। कैसा भी परिवेश हो, अपना स्वभाव नहीं बदलते। असंभव रेगिस्तानों में उगनेवाली नागफनी भी अंतत: अपना फूल खिला ही देती है।"

कारवी के बारे में मुझे नहीं पता था, पता तो लवली के बारे में भी नहीं था।
फूल,कला, साहित्य,आध्यात्म, संस्कृति इतिहास सबकुछ है इस आलेख में
और इनके साथ-साथ सरस्वती नदी तो है ही, जो हमेशा की तरह कल-कल करके बह ही रही है।
🙏🙏🙏💐💐💐💐
Kavita Malaiya said…
गीत,कितना सुंदर लिझते हैं आप ...जानकारी को भी कविता बना देते हैं,सुख मिलता है ऐसा पढ़कर।
Rachana Dubey said…
शायद कारवी क़े फ़ूलों को आपके सबद का गीत बनना पसन्द था । वो किसी और फूल क़े साथ तुलांत्मक तरीके से रखे जाये ये वो नही चाहते होंगे। और इसलिये जब कालिदास वहा गए तो वो खिले नही ।
उन फूलो को सिर्फ़ आपने ने नही चुना बल्कि उन फूलो ने भी आपकी लिखनी को चुना वो आपके शब्दो का प्यार पाकर अमर हो गए ।
आपने हमेंशा क़े लिये कारवी क़े फूलों की खूबसूरती औऱ ताक़त का बखान कर उसे अमर बना दिया ।
सचमुच अदभुत लिखा आपने।
Amar Singh said…
बहुत सुंदर।
आजकल लालित्यपूर्ण रचना कम पढ़ने मिलती है। कारवी से अपरिचित था। जिस तरह कुटज से था। सही कहा कवि जिससे प्रेम करता है वहीँ अमर ही जाता है।
कारवी.....अमर हो गया।

शुक्रिया सर
Gaurav Adeeb said…
Do baar padh liya ... Ye sangrahneey hain saare ...
Usha Bhatia said…
Phir se padrna para...pathak ek nai chetna se sarabor ho.. jata hai...is prakar ki rachna pahr kar ..samuchi srishti ke saath gehra sunder anubhav hota hai..ek pyara sa khayal aata hai ...kya lekhak is prakar ki kalakriti ki rachna karne ke baad pehle jaisa manav rehta hai ...ya ki uska puran vajud kisi sunder Davik shakti se ot_ prot ho jata hai..🍒
Pooja Bhatia said…
💙💙karvi ke liye jiski anupam sundarta ko odh kr dhani dharti gahri aasmani ho jati hae .
aapke liye shukriya
Shruti Agrawal said…
मुझे बस कारवी के फूल देखने हैं। पेट के बल लेटे उल्लास फैलाते। सात साल सात जन्मों से कम हैं। कितनी सूंदर छटा होगी ना।
As a student of Kannada literature and teacher of English literature I never read this type of write up on flowers.... Geet is voracious reader as well as the master of words.....
Sona Lee Singh said…
फूलों के देवता, आपने अद्वितीय लिखा है

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