Wednesday, February 07, 2018

देवताओं के क़िस्से ख़त्म हो चुके





मनोज कुमार झा की पाँच नई कविताएँ


टूटे पत्थरों से पहाड़ बनाने हैं

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देवताओं के क़िस्से ख़त्म हो चुके हैं
अब वहां हांफता पूर्णविराम है
और थकाने वाली उदासी

मनुष्यों के किस्सों का तो आरम्भ है
आओ सँपेरों, चरवाहों, मछुआरों
पहाड़ तोड़ने वालों
अब तुम्हें टूटे पत्थरों से पहाड़ बनाने हैं।
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दुःख
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मैं दुःख कहता था
तो मां जली हुई रोटी समझती थी
मैं बार बार दुःख कहता था
दुःख का अनुवाद बार बार अधूरा रह जाता था

एक बार एक चुप्पा चरवाहे ने कहा
जिसे कुछ लोग पागल भी कहते हैं
कि चिड़ियों का दुःख पंख है
जिसके कारण पृथ्वी उन्हें आसमान में धकेल देती है
मुझे आश्चर्य हुआ
कि क्या मेरा दुःख मन है
जिस कारण राजा का चेहरा गिद्ध के चेहरे की तरह दिखता है।
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सारा जीवन
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बारिश होती थी तो कागज की नाव बनाता था
नाव थोड़ी दूर चलती और गल जाती थी
गलना तब सहज क्रिया थी
दूसरी नाव बनाने की पूर्व-कथा।

तब पता नहीं था कि बाद में
नदियों को पार करने का समय आएगा तो भी
कागज की नाव ही मिलेगी
एक नष्ट हो रहे जीवन की उत्तर-कथा।
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ट्रोलिंग
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गालियां यहां सही होने का फल है
उन गालियों को भूल जाओ
जो स्कूल में तुम्हारे दोस्त या दुश्मन देते थे

यह कई चक्कर काट कर आई गालियां हैं
जिसे घृणा के सबसे नापाक कीमिया से बनाया गया है।
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दूसरे का
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तुम कहते हो तुम्हारी देह अपनी है
मेरा तो  अंगूठा भी अपना नहीं

जब अंगूठे का निशान लगाता हूं
तो धूलकण दौड़े आते हैं
अंगूठे से चिपकने

और कई लोग आ जाते हैं
अंगूठे का निशान मांगने। 
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___________________________________ सबद पर मनोज की अन्य कविताएँ यहाँ

12 comments:

सुशील सुमन said...

बेहतरीन कविताएँ,हमेशा की तरह।
बेहद गहन संवेदना,अपार करुणा और सधी संरचना में रची-पगी।

Amarnath Jha said...

बहुत मार्मिक कवितायें

Vinod Vithall said...

वाह !

Sharda Jha said...

वाह! बार बार पढ़कर उसमें डूबता है मन और उस दुःख को जीता भी है शायद। हार्दिक आभार शेयर करने के लिए।

Akhileshwar Pandey said...

मनोज जी को पढ़ना कितना सुखद होता है।

मा धु री said...

Bahut sundar

Shipra Kiran said...

वाह। बहुत अच्छी कविताएँ।

Navin Kumar said...

दर्शन की बुनियाद पर खड़ा सच्चा कवि !

Shalinee Shrivastava Sharma said...

कम शब्द वज़न ज़्यादा...

Rajesh Kumar Mishra said...

सम्वेदनाओं से पूरित कविताएँ पढ़कर अच्छा लगा। दुःख का मतलब जली रोटी में उभरता बिम्ब पूरी सभ्यता का मर्म कह जाता है।

Anupama Tiwari said...

छोटी -छोटी बहुत गहरी कविताएँ। हार्दिक शुभकामनाएं।

Bhupinder Preet said...

Beautiful poems