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गीत चतुर्वेदी : कॉलम 4 : अधूरी चीज़ों का देवता



Pic : Anurag Vats 2017



एक मित्र ने पूछा, “इधर क्या-क्या पूरा कर दिया?”
आम तौर पर पूछा जाता है कि क्या कर रहे हो, लेकिन मित्र ने वह चीज़ जाननी चाही, जिसे मैंने पूरा कर दिया हो। मित्र क़रीबी थीं, तो उन्हें मेरे गुणों का अंदाज़ा रहा होगा, इसीलिए उन्होंने सिर्फ़ वह काम जानना चाहा, जिसे मैंने पूरा किया हो। वरना “क्या-क्या कर रहा” की सूचियाँ तो मैं हमेशा ही गिनाता रहता हूँ। 
मैंने बुझकर जवाब दिया, “मैं अधूरी चीज़ों का देवता हूँ।”
अगला ईमेल आने तक, ज़िंदगी के दस काम निपटाते हुए, मेरे ज़हन के बैकग्राउंड में यह अधूरापन तैरता रहा। लगातार यह चलता रहा कि अब तक जितने काम किए हैं, वे सब अधूरे किए हैं। कोई भी काम पूरा नहीं किया। कविताएँ लिखीं। कहानियाँ लिखीं। निबंध लिखे। इनके अलावा भी बहुत सारे काम किए। सब अधूरा किया। हर काम के दौरान मन में अंत की एक अवधारणा व कल्पना रही। मसलन- यह जो कविता मैं लिख रहा हूँ, अंत में यह उस-उस-उस बिंदु तक पहुँचेगी और मुझे इसमें वह-वह-वह बातें कहनी हैं। हक़ीक़त यह है कि मैं उस-उस-उस बिंदु तक कभी नहीं पहुँच पाया, वह-वह-वह बात मैं कभी नहीं कर पाया, क्योंकि मैंने उस कविता या कहानी को कभी पूरा ही नहीं किया। एक दिन लगा कि अब इससे आगे नहीं चला जा सकेगा, वहीं थककर बैठ गया, उसी कविता या कहानी को बाहर निकाल दिया, वह छप गई, उसे पूरी हो गई रचना की तरह पढ़ा गया। किसी भी कविता के साथ यह नहीं छपा कि- “गीत चतुर्वेदी की नई अधूरी कविता”। जबकि वैसा छपा होता, तो वह सच होता। जो चीज़ छपकर लोक को अर्पित हो गई, यदि उसके अधूरे होने का अलग से उल्लेख न किया जाए, उसे पूरा ही मान लिया जाता है।
अंग्रेज़ी की लेखिका ज़ेडी स्मिथ ने अपने एक निबंध में बहुत सुंदर तरह से कहा था, ठीक इन्हीं शब्दों में नहीं, पर इन्हीं आशयों में, हम जो लिखना चाहते हैं, वह कभी नहीं लिख पाते। उसके बदले क्या करते हैं? हमसे जो लिखाsss गया है, उसी को सामने रखकर हम दावा करते हैं कि हम ठीक यही तो लिखना चाहते थे।
यह अजब क़िस्म का खेल है। जो लिखा, वह अधूरा है, लेकिन पूरे की तरह प्रस्तुत कर दिया। मैं आपके सामने प्रस्तुत हूँ, अपने आप में अधूरा हूँ, लेकिन पूरे की तरह प्रस्तुत हूँ। ख़ुद के साथ यह खेल चलता ही रहता है। पूरा तो किसी स्थिति में नहीं होऊँगा, थककर एक दिन मैं ख़ुद या आप पूरा मानने लग जाएँगे। आईने के सामने खड़ा होता हूँ और जोश मलीहाबादी का एक शेर अपने आप ज़बान पर आ जाता है –
बिगाड़कर बनाये जा, उभारकर मिटाये जा
कि मैं तेरा चिराग़ हूँ, जलाये जा, बुझाये जा।
इस शेर में भी जो हालात बनते हैं, वे पूरे नहीं हैं। बिगाड़ दिया, तो भी अधूरा ही लगूँगा। पूरा करने के लिए बनाओगे। तो भी अधूरा ही लगूँगा। फिर बिगाड़ने लग जाओगे। बुझा हुआ रहूँगा, तो पूरा करने के लिए जलाओगे। जलता रहूँगा, तो फूँक मारकर बुझा दोगे। हर कोई अपना ख़ुद का चिराग़ है। ज़िंदगी में सबसे ज़्यादा खेल ख़ुद से खेले जाते हैं।
इसीलिए हम चीज़ों को पूरा मान लेते हैं। जीवन गणित की तरह है। मान लेना सबसे महत्वपूर्ण है। मान लिया, तो आगे के सारे समीकरण हल होते हैं। पूरा मान लिया, तो अगले काम की ओर बढ़ने में आसानी होती है। लोगों को अपना मान लेते हैं। पता नहीं, वे अपने हैं कि नहीं हैं, लेकिन अपना मानना होता है। न मानें, तो पचास झंझटों में पड़े रहेंगे। जो हमारे लिए हर रोज़ गड्‌ढे खोद रहा हो, उसे भी अपना मान लेते हैं। और अपना मान लिया, तो उसे बुरा मानना मुश्किल हो जाता है। पुराने ज़मानों के मशहूर नाटककार राधेश्याम कथावाचक की मशरिक़ी हूर का एक संवाद है- “जिन्हें अपना समझता हूँ, उन्हें अच्छा समझता हूँ।”
एक बहुत पुराना क़िस्सा याद आ रहा है। किशोरावस्था के दिनों में इस पर ख़ूब हँसते थे।
एक राजा था। बेटे से परेशान रहता था कि यह ऐसा बैरागी क्यों है, संन्यासी जैसा क्यों है? उसके आसपास लड़कियों की फ़ौज खड़ी कर दी कि किसी से तो प्रेम कर ले, शादी कर ले, ताकि मेरा वंश चले, पर राजकुमार तो बस अपनी ध्यान-साधना में लगा रहता। किसी की ओर झाँककर भी न देखता। राजा ने बहुत कोशिश की, पर हमेशा नाकाम ही रहा। एक दिन राजकुमार को प्रेम हो गया, पर उन लड़कियों से नहीं, जो बाप ने उपलब्ध कराई थीं। प्रेम हुआ, तो पड़ोसी देश की राजकुमारी से। आकर सबको बता दिया। रानी माँ बहुत ख़ुश हुईं। शादी की तैयारियाँ करने लगीं, पर राजा को यह प्रेम बिल्कुल पसंद न आया। अब वह अड़ गया कि बेटा, किसी और से कर ले, उससे तो शादी न होने दूँगा। कई दिनों तक ज़िद की तलवारें खिंची रहीं। बेटे के बार-बार पूछने पर राजा ने बताया, “बरसों पहले पड़ोस की रानी के साथ मेरा गुप्त प्रेम-संबंध था। सिर्फ़ मैं और वह रानी जानते हैं कि वह राजकुमारी उसी प्रेम का फल है। सो बेटा, वह तेरी बहन हुई। उससे शादी का सपना छोड़ दे। मुझसे सहन न होगा।” सुनकर राजकुमार रोने-धोने लगा। जीवन में बमुश्किल एक लड़की से प्रेम हुआ और वह भी बहन निकली। सांत्वना पाने के लिए माँ की गोद में सिर रखकर रोने लगा। माँ ने कहा, “बेटा, बरसों पहले मेरा भी एक गुप्त प्रेम-संबंध था। तू उसी प्रेम का फल है। जा, बिंदास उसी से शादी कर। कोई बहन ना लगे है तेरी।”
लतीफ़ा है। लतीफ़े कई बार फ़लसफ़ों पर भारी पड़ते हैं। मोटी किताबें जो बात नहीं समझा पातीं, छोटा-सा एक लतीफ़ा वह बात समझा जाता है। असल क्या है, किसी को नहीं पता। या जिस एक को पता था, वह हमारी कहानी से निकलकर दूर जा चुका है, तब तो और न पता चलेगा कि असल क्या था। तो ऐसे में, बस मान लेना ही एक उपाय बचता है। उसी तरह, पूरा या पूर्ण क्या है, किसी को नहीं पता, बस मान लेना होता है कि अब यह पूरा है। कोई भी कहानी जहाँ ख़त्म होती है, उसके आगे से एक नई कहानी कहना शुरू किया जा सकता है। जैसे ही यह होगा, पिछली कहानी अपने आप अधूरी साबित हो जाएगी।
सारा खेल इस ‘अ’ में है। अ से अधूरा। अ से अपूर्ण। हमारी वर्णमाला का पहला वर्ण। दुनिया की कई भाषाओं में पहला वर्ण अ या इसी से मिलती-जुलती ध्वनि से निकला है। फिर एक कहानी याद आती है। बहुत पहले, जाने कितना पहले, जब भाषा नहीं थी, लोगों के सामने सबकुछ स्पष्ट था। जवाब हर किसी के पास थे, सवाल किसी के पास नहीं था। सौंदर्य चारों ओर था, लेकिन कोई रहस्य नहीं था। रहस्य न हो, तो सौंदर्य का अचार भी नहीं डाला जा सकता। इतना सबकुछ जाना हुआ था कि लोग ऊबने लगे। तब भाषा की रचना हुई। जाने कौन जादूगर था वह, जिसने दुनिया के सारे जवाबों को इकट्‌ठा किया और भाषा के भीतर छिपा दिया। लोगों को जीने में मज़ा आने लगा। वह भाषा के पास जाते, वह उन्हें नया सवाल देती। लोग जवाब तलाशने लगते। जो भी जवाब मिलता, वह दरअसल एक नये सवाल की ओर इशारा होता। जादूगर ने कहा, भाषा के भीतर ही असली जवाब है, किसी एक वर्ण में छिपा हुआ है। लोग सारे वर्णों को खंगालने लगे, जबकि जादूगर ने पहले ही वर्ण में जवाब छिपा दिया था। और वह था अ। उसने किसी को नहीं बताया कि दुनिया के हर रहस्य की कुंजी अ के पास है। उसे समझो। अ से अनार, अ से अमरूद की पढ़ाई तो होने लगी, लेकिन अ को चाभी की तरह इस्तेमाल करने का हुनर बहुत कम लोगों को आया।
हमारे यहाँ हर विस्तार का सार प्रस्तुत करने की परंपरा है। हम विस्तार की भी आराधना करते हैं और सार की भी। तभी सात सौ श्लोकों वाली गीता का सार सात श्लोकों में प्रस्तुत कर देते हैं। वाल्मीकि की रामायण में क़रीब चौबीस हज़ार श्लोक हैं, लेकिन एकश्लोकी रामायण में उसका सार दे दिया गया है। यह पूर्णता की नहीं, अपूर्णता की स्थापना है। कोई चीज़ अगर चौबीस हज़ार श्लोक में भी पूर्ण है और एक श्लोक में भी पूर्ण है, तो वह असल में अपूर्ण है। उसे आप कितना भी बड़ा कर सकते हैं, कितना भी छोटा कर सकते हैं।
अपूर्णता के इस विचार को अ की महिमा के बिना नहीं जाना जा सकता। इसी अ में बोध है। जो अबोध है, बोध उसी को चाहिए होता है। बिना अ लगे बोध की कोई आकांक्षा भी नहीं होती। इसीलिए बुद्ध ने अ को बहुत महत्वपूर्ण माना था।
बौद्ध धर्म की महायान शाखा का बेहद प्रसिद्ध सूत्र है- प्रज्ञापारमिता। यह उनके सबसे बड़े सूत्रों में से है। एक नेपाली मान्यता है कि प्राचीनतम समय में यह सूत्र सवा लाख श्लोकों से बना था। बाद में उसे घटाकर एक लाख श्लोकों का किया गया। इसका घटाना चलता रहा, बाद में पचीस हज़ार, दस हज़ार, आठ हज़ार श्लोकों तक इसे घटाया गया। और संक्षेप करने पर यह ढाई हज़ार, फिर सात सौ, फिर तीन सौ श्लोकों तक आया।  अंत में यह एक शब्द तक सीमित हो गया। बुद्ध ने कहा, अगर तुम सवा लाख श्लोक नहीं समझ सकते, उससे कम भी नहीं समझ सकते, तो लो, मैं एक शब्द में उस पूरे ज्ञान को कहता हूं। वह वर्ण है- अ!
अब इस अ को बूझना, सवा लाख श्लोकों को बूझ लेने के बराबर ही हुआ। है न!
यह अ नकार का है। नकार में न होता है, लेकिन हर वर्ण में अ होता है। न का अ देखना ही उसे समझना है। बुद्ध ने अ को महत्व दिया, क्योंकि वह नकारात्मक हैं। बौद्ध धर्म कोई सकारात्मक दर्शन नहीं है, वह बेहद नकारात्मक है। हर चीज़ के लिए ना कह देता है। बुद्ध ने अपने से पहले की ज्ञान-परंपरा को ना कहा। उन्होंने वेदों को ना कह दिया। उन्होंने ईश्वर को ना कह दिया। तपस्या की जो सारी प्रणालियाँ उस समय मान्य थीं, उन सबको एक-एक बार छुआ और उन्हें अपर्याप्त बताते हुए ना कह दिया। उनके पिता ने उन्हें ऐश्वर्य दिया। उसे भी उन्होंने ना कह दिया। साथियों ने ज्ञान देना चाहा। उसे भी ना कह दिया। यह ना उन्होंने अ की मदद से किया।
अपने से पहले के ज्ञान के आगे अ उपसर्ग लगा दिया और उसे अज्ञान बना दिया। वैदिक नित्य के आगे अ लगा दिया और अनित्य बना दिया। लोग द्वय में फँसे हुए थे। उन्होंने आकर अ लगा दिया। अद्वय बना दिया।  एक साधारण अ, उपसर्ग की तरह लग जाए, तो बना-बनाया अर्थ उलट जाता है। बाग़ी क्या करता है? यही करता है। समाज जिसे न्याय कहता है, बाग़ी आता है और बताता है कि नहीं, यह न्याय नहीं, अन्याय है। और बग़ावत कर देता है। इसीलिए बुद्ध बाग़ी थे। विद्रोही थे। जो पूर्ण है, जिसे सब लोग पूर्ण मानते थे, बुद्ध ने उसके आगे अ लगा दिया और उसे अपूर्ण घोषित कर दिया। एक नया रास्ता दिखा दिया, जो कि एक नया अपूर्ण होगा।
रागी और बाग़ी, दोनों ही अ से शुरू करते हैं। रागी आलाप लेता है, अ की ध्वनि के साथ शुरू करता है। बाग़ी एक स्टैंड लेता है और एक बने-बनाए सत्य के आगे अ उपसर्ग लगाकर लेता है। रागी और बाग़ी, दोनों ही अपने-अपने समय की कलात्मक कृतियाँ होते हैं। कलाएँ पूर्णता का आवाह्न नहीं करतीं, अपूर्णता की प्राण-प्रतिष्ठा करती हैं। कोई भी ईश्वर हो, वह एक कलाकृति ही है। देवता भी कलाकृति हैं। इनकी रचना मनुष्य करता है। अपने काल-समय के अनुसार अपने ईश्वर, अपने देवताओं की रचना करता है। इसलिए ये सब भी अधूरे होते हैं। इनमें लगातार विस्तार होता रहता है। एक उपनिषद का शांति-पाठ कहता है कि पूर्ण में से पूर्ण को घटा दो, तो भी पूर्ण बचेगा। पूर्ण में पूर्ण जोड़ दो, तो भी पूर्ण मिलेगा। किसी भी वस्तु में, विचार में, अगर कुछ जोड़ा या घटाया जा सके, तो इससे उसकी अपूर्णता साबित होती है, पूर्णता कैसे साबित हो सकती है?
तो क्या वह शांति-पाठ ग़लत है? नहीं, न तो गणित के स्तर पर ग़लत है न ही दर्शन के स्तर पर ग़लत है। क्योंकि वहाँ अपूर्ण को पूर्ण मान लिया जाता है। गणित के हर अंक को पूर्ण मान लिया जाता है, जैसे उसके आगे कुछ नहीं होगा। पर हर अंक के आगे कोई दूसरा अंक है। इस तरह हर अंक को पूर्ण मानने वाला गणित अंतत: कहाँ पहुँचता है? कहीं नहीं पहुँचता, अंत में हाथ खड़े कर लेता है और कहता है- इनफिनिटी है भाई, इनफिनिटी। यह क्या है? इनफिनिटी भी तो अपूर्णता ही है। जो अनंत है, वह यक़ीनन अपूर्ण है। हर अंक को पूर्ण मानकर भी तुम अपूर्णता की ओर ही बढ़ रहे हो। कहा जाता है कि यह ब्रह्मांड पूर्ण है, पर क्या सच में? यह सृष्टि अपने आप में एक अपूर्णता है। यदि पूर्ण है, तो उसका एक आरंभ होगा, एक अंत होगा। इस सृष्टि का न तो आरंभ पता है, न ही अंत पता है। क्या पता है? महज़ बीच का हिस्सा पता है। बीच के जिस हिस्से में हम हैं, उसका एक अंश पता है। तो पूरा कहाँ पता है? महज़ अधूरा पता है। यह हमारा हुनर है कि अधूरे पते पर भी चिटिठयाँ पहुँच जाती हैं।
और यही कला है। हमारी हर कलाकृति एक अधूरा पता है, लेकिन फिर भी वह किसी जगह पहुँच जाती है, इसी में कला है। मान लीजिए, मैंने एक कविता लिखी। पढ़ने वाले को लगता है कि इसकी शुरुआत पहली पंक्ति से हो रही है। पर सच में वैसा नहीं है। उस पहली पंक्ति को मैंने सबसे बाद में लिखा था। वह तो हक़ीक़त में अंत की पंक्ति थी, जो मैंने सबसे पहली पंक्ति के रूप में लिख दी। तो शुरुआत का बिंदु क्या है? अंत का बिंदु क्या है? कुछ नहीं है। किसी भी कलाकृति का, किसी भी विचार का आदि और अंत पता करना असंभव है। हम महज़ अपनी बुद्धि की सुविधा के लिए आदि और अंत को मान लिया करते हैं। चाहे जीवन हो या कला, वह बीच में मौजूद है। एक विशाल मध्य-भाग है। कला वहीं रहती है। विचार वहीं पर रहते हैं। कौन कहाँ से आया, रहस्य है। कौन कहाँ को जाएगा, रहस्य है। जितनी देर साथ है, सामने है, उतनी देर तक वह है और, यक़ीनन है।
उत्तर-आधुनिक फ्रेंच विद्वानों दिल्यूज़ और गुआत्तरी के राइज़ोम को याद करना चाहूँगा। राइज़ोम एक पौधा होता है, जिसमें कोई तना नहीं होता, बस जड़ ही जड़ होती है। एक जड़ से दूसरी जड़ उत्पन्न हो जाती है। एक तरह का कंद होता है। वनस्पति-शास्त्र में देखा जाए, तो राइज़ोम परिवार में बहुत सारे दूसरे पौधे भी आते हैं। जैसे हल्दी, अदरक, कंद ये सब अलग-अलग तरह के राइज़ोम हैं। दिल्यूज़ और गुआत्तरी अपने राइज़ोम को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं- इस जड़ की कोई शुरुआत नहीं है, इस जड़ का कोई अंत नहीं है। हमारे सामने बस मध्य-भाग होता है।
हम जिस जगह को छुएँगे, वह एक नया मध्य-भाग होगा। हमने उसे काट लिया, काट के मेज़ पर रख दिया, तो हमें उसके दो सिरे दिख जाएँगे और हम मान लेंगे कि यह उसके शुरू और अंत के बिंदु हैं, पर वैसा सिर्फ़ मानेंगे, वह हक़ीक़त नहीं होगी। बस, ख़ुद के साथ किया गया हमारा एक नया खेल होगा।
और प्रेम में हम ऐसे बहुत सारे खेल करते हैं। आपके जीवन में एक प्रेमी आया। आप यह भूल जाते हैं कि उसके पास एक पूर्व-जीवन भी रहा होगा। कल को वह आपके जीवन से निकल जाएगा। आप इस कल्पना से भी भयभीत होते हैं कि उसके बाद एक पश्चात-जीवन भी बचेगा। आपके लिए उसका जीवन महज़ उतना होता है, जितने में आप उसके साथ हैं। उसे आप पूरा मान लेते हैं। इसीलिए प्रेमी क़िस्म के लोग ऐसे भावुक उद्गार सबसे ज़्यादा प्रकट करते हैं कि – मैं अधूरा था, तुम भी अधूरी थी। हम दोनों मिलकर पूरे हो गए। दो महीने बाद प्रेमी का चक्कर कहीं और चल जाता है, प्रेमिका किसी और के साथ व्यस्त हो जाती है। तब वह पूरापन कहाँ चला जाता है? बस यह कि उतनी देर के लिए उन्होंने मान लिया था कि वे पूरे हो गए हैं। एक दिन नए सिरे से उनमें अधूरापन आ जाता है और वे नए साथी को तलाशने लग जाते हैं, पूरा हो जाने के लिए। इंसान जो नहीं होता है, वह हो जाना चाहता है। वह पूरा नहीं होता, इसीलिए पूरे हो जाने की तलाश करता रहता है। जबकि होता वह अधूरा है, लेकिन अधूरा होने की तलाश नहीं करता।  हर आदमी आत्म की खोज में लगता है, स्व को पा लेना चाहता है, अध्यात्म की तमाम किताबें पढ़ता है, दाढ़ी वाले बाबाओं की शरण में जाता है। यह भी नहीं सोचता कि बाबाओं में दाढ़ी का फैशन इतना कॉमन क्यों है? इतनी-सी बात नहीं सोचता, लेकिन सोच के सबसे ऊँचे धरातल पर पहुँच जाना चाहता है- ख़ुद को पा लेना चाहता है। बताइए, ग़लत पते पर सही चिट्‌ठी कैसे पहुँच सकती है? वह ख़ुद को पाना चाहता है, ख़ुद अधूरा है, यानी क़ायदे से उसे अपने अधूरेपन को पाने की यात्रा करनी चाहिए थी, लेकिन दौड़ रहा है वह पूरेपन की तरफ़? जो कि वह है नहीं। अगर वह पूरा होता, तो पूरेपन की तलाश को आत्म की खोज कह सकते थे, लेकिन है वह अधूरा, तो पूरेपन की तलाश को आत्म की खोज कैसे कह सकते हैं?
ठीक यह बिंदु है, जहाँ प्रेमीगण एक अद्भुत कलाकृति में तब्दील होने से वंचित रह जाते हैं। एक श्रेष्ठ कलाकृति बन सकने की सारी सामग्री होने के बाद भी वे श्रेष्ठ कलाकृति नहीं बन पाते, क्योंकि वे ग़लत पते की ओर चलने लगते हैं। जाना दिल्ली है, बैठ गए मुंबई की ट्रेन में। जाओ, अब इंडिया गेट की जगह गेटवे ऑफ इंडिया देखकर कन्फ़्यूज़न का आनंद पाओ। यात्रा का आनंद तो ख़ूब आएगा, लेकिन अंत में पाएँगे कि कहीं नहीं पहुँच पाए।
ठीक यही बिंदु है, जहाँ पर कोई कविता, उपन्यास या कोई भी कलाकृति श्रेष्ठ होने से वंचित हो जाती है, क्योंकि वह ग़लत पते पर ख़ुद को खोजने लगती है। कलाकृतियों को अपूर्णता की आराधना करनी चाहिए, करने लगती हैं वे पूर्णता की आराधना। जब आराध्य ही ग़लत चुनोगे, तो वरदान कैसे सही मिल जाएगा?
श्रेष्ठ प्रेमकथाओं में अपूर्णता का तत्व बहुत बारीकी से मिलता है। सारी प्रेमकथाओं का ज़िक्र नहीं कर सकते, एक प्रेमकथा मुझे अक्सर याद आती है, शायद अपनी सिंधी पृष्ठभूमि के कारण, जो कि आंशिक तौर पर मेरी भी पृष्ठभूमि है। यह सस्सी-पुन्नू की प्रेमकथा है। पुन्नू एक राजकुमार था। सस्सी एक धोबी की बेटी। किसी तरह दोनों में प्रेम हो गया। राजकुमार का परिवार इस विजातीय प्रेम-संबंध के ख़िलाफ़ था। फिर भी दोनों ने शादी कर ली। राजपरिवार ने क्रोध में आकर षडयंत्र किया और शादी की रात पुन्नू को बहुत शराब पिलाई। फिर उसे किडनैप कर अपने साथ ले गए। यहाँ सस्सी नींद में भी पुन्नू की प्रतीक्षा करती रही। सुबह उठी, तो पाया कि पुन्नू सुहागरात को भी कमरे में ना आया था। अब वह ग़ायब हो गया है। उसे लगा, पुन्नू बेवफ़ा निकला। वह उसकी तलाश में दौड़ पड़ी। कच्छ का रेगिस्तान पार करना बहुत मुश्किल था। भूख-प्यास से बदहाल हो गई। तभी रास्ते में दो ऊँटसवार मिले। उस रूपसी को देख उसका फ़ायदा उठाने की कोशिश करने लगे। सस्सी ने धरती से पुकार की। धरती फट गई। सस्सी उसमें समा गई। उसका दुपट्‌टा आधा ही दफ़न हुआ। आधा ज़मीन के ऊपर लहराता रहा। जब पुन्नू को होश आया, वह उल्टे पैर उसी राह दौड़ा आया और रास्ते में उसे वह दुपट्‌टा दिखा। उसके होश उड़ गए। शायद वह भी वहीं मर गया।
हम चीज़ों को जिस तरह पूरा मानते हैं, उस तरह यह कहानी भी पूरी है, पर क्या सच में यह पूरी है? सूफ़ी सिंधी कवि शाह अब्दुल लतीफ़ की किताब में यह कहानी विस्तार से है। आप इंटरनेट पर भी अंग्रेज़ी में खोजकर पढ़ सकते हैं। शुरू से ही यह कहानी एक अधूरेपन की ओर बढ़ती दिखाई देती है- एक ऐसा अधूरापन, जिसे हम स्वीकार नहीं कर पाते। उनका प्रेम अधूरा है। उनका मिलना अधूरा है। उनका बिछड़ना भी अधूरा है। राजपरिवार का षडयंत्र अधूरा है। ऊँटसवारों की कुत्सा अधूरी है। सस्सी का मरना अधूरा है। पुन्नू का बिलखना अधूरा है। और यह अधूरापन घटनाओं के स्तर पर नहीं, अनुभूतियों के स्तर पर है।  इस अधूरेपन को आप भाषा के भीतर विश्लेषित नहीं कर सकते, सिर्फ़ अनुभूत कर सकते हैं। ज़मीन में आधा दफ़न, लहराता हुआ दुपट्‌टा इस अधूरेपन का पर्याप्त इशारा दे देता है।
प्रेम क्या होता है? ज़मीन में आधा दफ़न, लहराता हुआ दुपट्‌टा ही तो होता है। उसे पूरा मान लो या अधूरा मान लो। जो भी मान लो, आधा दुपट्‌टा नज़र से ओझल ही रहेगा। आधा दिखते को पूरा मान लेना होगा। दुनिया की सारी कहानियाँ अधूरी होती हैं। कविताएँ अधूरी होती हैं। प्रेम भी अधूरा होता है। प्राचीन साहित्य का इतिहास देख लिया जाए, कितनी सारी अधूरी रचनाएँ दिखती हैं। बाण की कादंबरी अधूरी रह गई। कहानी को आगे बढ़ाने का काम उनके बेटे भूषण ने किया। कालिदास की कुमार सम्भव को अधूरा ही माना जाता है, जाने किसने उसे पूरा किया। रघुवंश अपूर्ण है, यह मानने वाले भी कम नहीं। मेरी प्रिय पुस्तकों में से एक श्रीहर्ष की नैषध के बारे में भी विद्वान अपूर्णता के उदाहरण खोज लाते हैं। वेद व्यास ने महाभारत का नाम जय रखा था और उसकी शुरुआत में ही कह दिया है कि इस ग्रंथ में मैंने चौबीस हज़ार श्लोक ही लिखे हैं, लेकिन अब किताब में एक लाख श्लोक मिलते हैं। वेद व्यास को लगा था कि उन्होंने कहानी पूरी कर दी है, जाने कौन बीच में आ गया, जो उसने बाक़ी पौने लाख श्लोक उसमें जोड़ दिए? व्यास के पूर्ण काम को अपूर्ण साबित कर दिया? उसी में हरिवंश पुराण जुड़ गया। उसी में गीता जुड़ गई। जुड़ता ही गया। जिसमें कुछ भी नया जुड़ता जाए, वह हमेशा अपूर्ण रहता है। पुणे के भंडारकर इंस्टीट्यूट में बरसों रिसर्च चलती रही कि महाभारत के कौन-से हिस्से भाषा और शैली के हिसाब से अलग हैं और बाद में जोड़े गए हैं, उन्हे निकालकर एक अलग पाठ बनाया जाए। जाने कौन लोग होंगे, जो उस पाठ से संतुष्ट हो जाएँगे। यह भी जीवन की एक विडंबना ही है। आपको लगता है कि आप पूरे हैं, आपका काम पूरा हो गया, लेकिन समाज और दुनिया बता देती है कि आप अभी भी पूरे नहीं हैं। वेद व्यास को लगा था कि वह पूरे हैं, उनके बाद के लेखकों ने बता दिया कि नहीं, अधूरे हो। बुद्ध और गांधी को लगा कि वे पूरे हैं, काम पूरा कर दिया, पर दुनिया ने बता दिया कि ना, पूरे नहीं हो सकते। हम नई-नई विधियों से हिंसा करेंगे, नए-नए छल करेंगे, करुणा को भी एक बम की तरह फोड़कर लोगों की जान ले लेंगे और ऐसा कर-करके, ओ बुद्ध-ओ गांधी, हम बता देंगे कि तुम भी अधूरे ही रहे। जो पूरे होते, तो हम लोग तुम्हारे सपनों जैसा समाज बना ही देते। हम न बनाएँगे। हम तुम्हें पूरा ही नहीं होने देंगे।    
इस दुनियावी पूरेपन से पश्चिम के लोग ज़रा सावधान रहे। भले होमर की ईलियड और ओडिसी के भी अधूरे होने की चर्चा सुनाई देती हो, वे लोग अपनी किताबों के पाठ को लेकर शुरू से ही सतर्क रहे, इसलिए शायद उनमें नई कथाएँ नहीं जुड़ पाईं। 18 लाख शब्दों वाली महाभारत, होमर की किताबों से दस गुना बड़ी है। जो आकार में जितना बड़ा होता है, उसकी अपूर्णता भी उतनी ही बड़ी होती है। जिसके पास ज़्यादा ज्ञान होता है, उसी के पास ज़्यादा अज्ञान भी होता है।
ज्ञान और अज्ञान के संबंध को एक वृत्त की तरह समझा जा सकता है। ज्ञान, रोशनी का एक वृत्त है। उसके अंदर सब रोशन है। वृत्त के बाहर जो कुछ है, वह अज्ञान है। अज्ञान उस वृत्त की परिधि पर बैठा हुआ अंधेरा है। ज्ञान के वृत्त का आकार बढ़ाते जाइए, उसकी परिधि बढ़ती जाएगी और परिधि पर अज्ञान बैठा है, यानी अज्ञान का आकार बढ़ता जाएगा। जिन लोगों को लगता है कि बहुत पढ़-लिखकर, ध्यान-साधना कर वे अपना ज्ञान बढ़ा रहे हैं, दरअसल, वे अपना अज्ञान बढ़ा रहे हैं। महज़ इसी उदाहरण से यह समझा जा सकता है कि ज्ञान और अज्ञान के बीच किस तरह निरंतर बदलते रहने वाला एक अपूर्ण क़िस्म का संबंध है। इसी तरह का संबंध जीवन और कला के अन्य क्षेत्रों में भी खोजा जा सकता है।
श्रेष्ठ कलाएँ कभी पूर्णता की दौड़ नहीं दौड़तीं। अगर उन्हें कुछ अभीष्ट होता है, तो वह उस दुनियावी पूर्णता से अलग कोई चीज़ होती है। वे लगातार एक अपूर्णता की तरफ़ बढ़ रही होती हैं। दुनिया उसे पूर्ण की तरह देखने लगती है। यहीं पर दोनों के बीच द्वंद्व होता है। एक-दूसरे को ग़लत समझ लेने की दारुणता पैदा होती है। दुनिया की रफ़्तार बहुत तेज़ है। उसे कहीं नहीं जाना, इसलिए वह बहुत तेज़ दौड़ती है, दौड़ते-दौड़ते बहुत आगे निकल जाती है। कविता शनि ग्रह की तरह है, स्वभावत: धीरे चलेगी, ठहरकर देखेगी। दोनों का साथ चलना मुश्किल है। दुनिया आगे चली जाया करेगी, कविता पीछे से आवाज़ देती रहेगी कि ओ दुनिया, तुम ग़लत जा रही हो, सुनो, थोड़ा यू-टर्न लो, इस तरफ़ जाना है। कुछ लोग पूछते हैं कि जैसे पुराने समयों में कविता समाज का नेतृत्व करती थी, अब क्यों नहीं करती? उन्हें इस दृश्य से जवाब मिल जाना चाहिए—कविता अब भी नेतृत्व कर रही है, लेकिन आगे से नहीं, पीछे से। एक नेता आगे चलता है, हज़रत मूसा की तरह, सबसे आगे चलता हुआ सबको कहीं ले जाता है। दूसरा नेता जीसस जैसा होता है, जो सबसे पीछे खड़ा होता है और वहाँ से पुकारता है कि लौट आओ, ग़लत राह चले गए। कविता इस दूसरे नेता की तरह होती है। वह करुण स्वर में पुकारती है, लौट आने और राह बदलने की आर्त पुकार। कि आओ, हम दोनों एक साथ अधूरे बन जाएँ। देखो, तुम भी पूरे हो, मैं भी पूरी हूं, आ जाओ, जुड़कर हम एक नया अधूरापन गढ़ेंगे।
मैं क्या, किसी भी कवि या लेखक का डीएनए जाँचा जाएगा, तो वह अधूरी चीज़ों का देवता ही निकलेगा। जैसा साहिर कह गए थे- वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमक़िन, उसे एक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा। हम सब अपने जीवन में इसी ख़ूबसूरत मोड़ को तलाशते हैं।
सोचिए, हम साथ-साथ चल रहे हैं। हमें पता है कि हम कभी पूरे नहीं हो सकते, लेकिन किसी एक मोड़ पर मुड़ ज़रूर जाएँगे। हम एक गली के पास से गुज़रेंगे। मैं बिना बताए उस गली में मुड़ जाऊँगा। फिर कभी दिखाई नहीं दूँगा। मेरा कोई निशान नहीं बचेगा। मैं अपने अधूरेपन में खो जाऊँगा। क्या तुम दो पल को मुझे महसूस करोगे? गली जो आगे मुड़ती है, उसके मुहाने पर खड़े होकर इंतज़ार करोगे या आगे बढ़ जाओगे? मुझे याद कर-करके मेरे अधूरेपन में नए क़िस्से जोड़ोगे या मुझे भूलकर मेरे अधूरेपन की समिधा चढ़ा दोगे? इतना ही साथ था। साथ आधा छोड़कर चला जाऊँगा। उसे पूरा कह पाओगे? तब महसूस करोगे, जीवन की गली कभी पूरी नहीं होती, बस, आगे जाकर मुड़ जाती है।

Comments

निःशब्द हूँ। शुक्रिया सबद इतने उम्दा लेख के लिए।
Sughosh Mishra said…
"प्रेम क्या होता है? ज़मीन में आधा दफ़न, लहराता हुआ दुपट्‌टा ही तो होता है।" "हमारी हर कलाकृति एक अधूरा पता है, लेकिन फिर भी वह किसी जगह पहुँच जाती है, इसी में कला है।" ऐसी कितनी ही मोती-सी पंक्तियाँ हैं इस पूरे धागे में गुंथी हुई। बेहद शुक्रिया गीत जी का यह लेख 'अधूरी चीज़ों का देवता' सबद पर साझा करने के लिए।
Narendra Tiwari said…
गीत भाई अद्भुत हैं
कोई अधूरा पूरा होकर...विनोद जी की कविता भी ऐसी ही है

अपने निबंध गद्य के विकास में रामस्वरूप चतुर्वेदी जी ने भी सोचने और लिखने की प्रक्रिया पर विस्तार से लिखा है।

बुद्ध के मौन सा गद्य है गीत जी लेखन में ❤
Rachna Bhola said…


शुक्रिया सबद...निःशब्द हूँ.
Vishesh said…
गीत सर
इतना अद्भुत कि पढ़ने के बाद सचमुच यह कॉलम अधूरा लग रहा है। गुलज़ार के चाँद की तरह।
Kuldip Kaur said…
One of the best by you... Thanks for writing this
Anita Manda said…
लाजवाब
बढ़िया वाकई
Akash Deep said…
कितने दिन से Refresh कर कर के देख रहा था ~

शुक्रिया ❤
Rahul Shabd said…
🙏🙏🙏🙏🙏
लेख अद्भूत है सर।
सुन्दरता अधूरेपन मे होती है, अधूरेपन की अधूरी प्रस्तुति बेहद सुन्दर ,
उपन्यास कब तक आयेगा सर
अदभुत लेखन
very amazing expression sir
Adhuri cheezon Ka Devta!
Sundar 😀
Gaurav Adeeb said…
Subah phli class lene se phle hi nazar padi .... 30 minute late ho gaya main.... Lekh poora padha ... Class adhuri reh gayi.... Gajab falsafa ..bade se canvas par behta jharna ... Aah
Seema Gupta said…
अधूरेपन की अपनी एक अलग ही दुनिया और सुंदरता होती है.... किसी प्रेम कथा के अधूरेपन की सुंदरता.... जीवन की हर बात हर चीज़ के अधूरेपन की पूर्णता या पूर्णता का अधूरापन.... हर पूरी की गई बात में अधूरापन.....
अद्भुत अधूरेपन का पूर्ण एहसास और सौंदर्य लिए लेख.... हर पहले लिखे लेख को अधूरा महसूस करवाता आपका हर नया लेख..... यही अद्भुत एहसास
Rajesh Saxena said…
अधूरापन
------------

अधूरापन रखता है
हमेशा दूसरों के लिये
कुछ करने योग्य
अधूरे प्रेम में ही रची गई
दुनिया की सबसे
सुंदर प्रेम कथाएँ

अधूरे चन्द्रमा की कलाएँ
पूरणमासी से होती
ज़्यादा धारदार और कलात्मक

दरअसल पूर्णता कुछ नहीं
कहीं भी नहीं होती
बचा ही रहता है सदा
हर जगह हर कहीं
कुछ ना कुछ शेष

अधूरी कविताओं में
ढूँढ़ोगे तुम गुम शब्दों
की शेष आवृतियाँ
अधूरेपन में छुपा है
दुनिया का सबसे कलात्मक सर्जन ।

*राजेश सक्सेना*
गीत भाई आपने मेरी यह के कविता भास्कर रस रंग में प्रकाशित की थी सम्भवतः 2008 या 09 में
Mahesh Mishra said…
बढ़िया है।
Veebha Parmar said…
अधूरेपन का देवता
#गीत सर you rock <3 <3
Amar Singh said…
पूरा कॉलम में बहुत सुंदर तरीके व्याख्या।
गज़ब, इन फलसफों में बहुत कुछ छिपा है।
अधूरी चीज़ों का देवता, इसे पढ़कर सचमुच एक खुशनुमा स्तब्धता छा गई मन पर । अक्सर हमारा जेहन पूर्णता की तलाश में ग़ुम रहता है लेकिन प्राप्त सिर्फ अपूर्णता ही होती है । अद्भुत लेखन गीत जी । सचमुच अद्भुत ����
pankaj agrawal said…
अधूरा. पर सुन्दर आलेख
Jasmine Mehta said…
एक नई दृष्टि प्रदान करता हुआ लेख ....
पढ़कर नज़र ऊपर की तो एकबारगी वही अपना, जाना-पहचाना माहौल 'अ'लग लगा, 'अ'धूरा लगा | अपना अधूरापन इसके सामने गौण लगा |

सलाम है आपको | आपको पढ़ना हमेशा एक कुछ नया दिखाता-सिखाता है | प्रशंसा करने में'अ'योग्य हूँ सो 'अ'लिखित को समझने का प्रयास कीजिएगा
Long back I had written somewhere on my blog I am the goddess of incomplete things, of broken things, this is one is so "me" as it talks about all the things that we hold on to so dearly and then eventually let go, rather accept in their incompleteness, I even have a doctrate thesis to testify that :) cheers Geet for writing this !
बहुत ही शानदार । नतमस्तक हूँ।

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