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गीत चतुर्वेदी : कॉलम 4 : अधूरी चीज़ों का देवता

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एक मित्र ने पूछा, “इधर क्या-क्या पूरा कर दिया?” आम तौर पर पूछा जाता है कि क्या कर रहे हो, लेकिन मित्र ने वह चीज़ जाननी चाही, जिसे मैंने पूरा कर दिया हो। मित्र क़रीबी थीं, तो उन्हें मेरे गुणों का अंदाज़ा रहा होगा, इसीलिए उन्होंने सिर्फ़ वह काम जानना चाहा, जिसे मैंने पूरा किया हो। वरना “क्या-क्या कर रहा” की सूचियाँ तो मैं हमेशा ही गिनाता रहता हूँ। मैंने बुझकर जवाब दिया, “मैं अधूरी चीज़ों का देवता हूँ।” अगला ईमेल आने तक, ज़िंदगी के दस काम निपटाते हुए, मेरे ज़हन के बैकग्राउंड में यह अधूरापन तैरता रहा। लगातार यह चलता रहा कि अब तक जितने काम किए हैं, वे सब अधूरे किए हैं। कोई भी काम पूरा नहीं किया। कविताएँ लिखीं। कहानियाँ लिखीं। निबंध लिखे। इनके अलावा भी बहुत सारे काम किए। सब अधूरा किया। हर काम के दौरान मन में अंत की एक अवधारणा व कल्पना रही। मसलन- यह जो कविता मैं लिख रहा हूँ, अंत में यह उस-उस-उस बिंदु तक पहुँचेगी और मुझे इसमें वह-वह-वह बातें कहनी हैं। हक़ीक़त यह है कि मैं उस-उस-उस बिंदु तक कभी नहीं पहुँच पाया, वह-वह-वह बात मैं कभी नहीं कर पाया, क्योंकि मैंने उस कविता या कहानी को कभी पूरा ही नहीं किया। …