Friday, October 06, 2017

इशिगुरो और नोबेल : कुछ फ़ौरी बातें - गीत चतुर्वेदी



कज़ुओ इशिगुरो


पिछले कुछ बरसों से अक्टूबर के महीने की शुरुआत के तीन रिचुअल्स रहे हैं- साहित्य के नोबेल पुरस्कार के पूर्वानुमानों में हारुकि मुराकामी को सबसे प्रबल दावेदार बताना, नोबेल समिति द्वारा अपने कॉन्फ्रेंस रूम का बड़ा-सा दरवाज़ा खोलकर माइक लिए खड़े पत्रकारों के सामने किसी एक नाम का उच्चारण करना और उसके बाद दुनिया के अधिकांश हिस्सों  में हारुकि मुराकामी के प्रति एक शोकगीत का सामूहिक गायन शुरू हो जाना। मुराकामी के प्रशंसकों को यह समझ में ही नहीं आ रहा है कि आख़िर उनमें ऐसी कौन-सी कमी है, जिसके कारण नोबेल पुरस्कार उनसे छिटक जा रहा है। इस समय वह दुनिया के सर्वश्रेष्ठ लेखकों में से हैं। अपनी हर नई किताब से वह अपनी श्रेष्ठता को पुख़्ता कर देते हैं। पिछले दो दशकों में वह एकमात्र ऐसे लेखक हैं, जिन्हें इतने अधिक लोग चाहते हैं कि वह नोबेल पा लें। इतना प्रेम इस दौर में किसी साहित्यिक लेखक को नहीं मिला।

ऊपर के इस पैराग्राफ़ को अगर एक संकेत की तरह पढ़ा जाए, तो इसमें सिर्फ़ एक बदलाव करना होगा- मुराकामी की जगह आप अपने लेखक का नाम रख लीजिए. कोई चाहे, तो न्गुगी वा थियोंगो का नाम रख सकता है, तो कोई फिलिप रॉथ का। को उन, अदूनिस से लेकर आन्त्यूनेज़ तक का नाम रख सकते हैं, क्योंकि हर साल यह उम्मीद लगती है कि शायद इन्हें या इनमें से किसी एक का मिल जाएगा, पर मिलता वह किसी और को है।

खेल का आनंद, मात्र रहस्यों से बढ़ता है। इसे एक पटकथा की तरह देखा जाए-  किसी काम के लिए प्रेमिका अपने प्रेमी को बहुत आशा से देखती है,  प्रेमी टाल जाता है, प्रेमिका नाराज़ होकर सवाल पर सवाल करती है, प्रेमी किसी भी सवाल का जवाब नहीं देता और आंखों से ओझल हो जाता है। प्रेमिका ख़ूब रोती है। अकेली रह जाती है। वह अकेले में ख़ुद से वही सवाल पूछती है, जो उसने प्रेमी से पूछा था। अगले दिनों में उसे जो कोई मिलता है, उससे वह सवाल करती है। लोग अपनी तरह से जवाब दे देते हैं, लेकिन प्रेमी ने तो कोई जवाब ही नहीं दिया था। वह चुपचाप चला गया था। प्रेमिका उसे खोजने के लिए निकल पड़ती है। उसे खोजकर अपने सवालों के जवाब वह उससे मांगेगी। प्रेमी ग़ायब हो चुका है, लेकिन प्रेमिका के भीतर का प्रेम और जवाबों को पा लेने की आकांक्षा समाप्त नहीं हो रही। क्यों? क्योंकि सवाल अनसुलझे छूट गए। जिस प्रेम में भी प्रश्न, अनुत्तरित रह जाते हैं, वह प्रेम कभी समाप्त नहीं होता, ताउम्र ज़िंदा रहता है। प्रश्नों का रहस्य प्रेम को जिलाए रखता है।

नोबेल का खेल, प्रेम के इस खेल की तरह है। जिन सवालों को हम लोग बार-बार, हर साल उठाते हैं, उसी प्रेमी का भेस धरे हुए, नोबेल समिति उनमें से किसी सवाल का जवाब नहीं देती, और कुछ नए सवाल हमें पकड़ाकर चली जाती है। जो सवाल मुराकामी के संबंध में पूछा जा रहा है, वही सवाल बोर्हेस और नबोकफ़ के संबंध में भी पूछा जा सकता है। यह प्रक्रिया अनवरत चलती रहेगी। बीस साल बाद मुराकामी जैसे ही अवसर किसी और के होंगे और उसके बारे में भी यही सवाल पूछे जाते रहेंगे। जवाब कभी नहीं आने वाला।

हारुकि मुराकामी
मुराकामी साल-दर-साल नोबेल से जिस तरह दूर जा रहे हैं, उनका क़द उतना ही बढ़ता जा रहा है। उन्हें नोबेल न मिला, तो देखिएगा, आने वाले बरसों में वह अपने आप प्रूस्त, जॉयस, नबोकफ़ और बोर्हेस की पंगत में बैठे हुए मिलेंगे। महज़ इसलिए नहीं कि इन सबको ही यह पुरस्कार नहीं मिला, बल्कि इसलिए कि नकारी गई श्रेष्ठताओं की मान्यता ज़्यादा पुख़्ता होती है। मुराकामी ने अपने साहित्य में जो नई ज़मीनें तोड़ी हैं, उन्हीं को आधार बनाकर कुछ लोग नए उपन्यास लिखेंगे और नोबेल पा लेंगे। जैसे प्रूस्त, जॉयस और बोर्हेस की ज़मीनों पर लिखने वालों ने पाए हैं। जैसे प्रूस्त की ज़मीन पर लिखने वाले कज़ुओ इशिगुरो को मिला है, लेकिन यह पुरस्कार प्रूस्त से दूर ही रहा। परिहास में यह कहा जा सकता है कि विडंबना है, फूल हमेशा भँवरा ही खिलाएगा लेकिन उस फूल को कोई राजकुँवर ले जाएगा।

इस निबंध की शुरुआत होनी चाहिए थी कज़ुओ इशिगुरो से, लेकिन हो गई मुराकामी से। ‘किसे नहीं मिला’ ने ‘किसे मिला’ को आच्छादित कर दिया। किंतु इसका अर्थ यह नहीं लेना चाहिए कि इस बार का नोबेल पुरस्कार किसी अयोग्य को मिल गया है। इशिगुरो दुनिया के श्रेष्ठतम लेखकों में से हैं और उन्हें नोबेल पुरस्कार मिलना एक योग्य और बड़े लेखक को मिला सम्मान ही है। सवाल बस इतना है कि यदि इशिगुरो को यह सम्मान मिल सकता है, तो मुराकामी को क्यों नहीं मिल सकता? क्या न अच्छा होता कि पहले मुराकामी को मिल जाता, बाद में इशिगुरो को मिल जाता? और इस इशिगुरो के साथ मुराकामी को न मिलने का ही सवाल क्यों उठाया जा रहा है, थियोंगो को न मिलने का सवाल क्यों नहीं उठाया जा रहा? जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, इन सारे सवालों का कोई जवाब नहीं हो सकता, और जो भी जवाब नोबेल समिति या किसी की ओर से आए, संभवत: उन जवाबों पर सहमत भी नहीं जा सकता। योरप में इशिगुरो को पर्याप्त मान्यता प्राप्त है और इस नाते उनको मिले पुरस्कार का स्वागत ही किया जाएगा, जिसमें कुछ भी ग़लत नहीं है, लेकिन इस बात से भी कम ही लोग इनकार कर पाएँगे कि यह पुरस्कार उन्हें उस समय दिया गया है, जब उनसे बेहतर कुछ लेखक प्रतीक्षालय में बैठे हुए थे।

इशिगुरो और मुराकामी में कुछ भिन्नताएं हैं और कुछ ख़ास अभिन्नताएं भी हैं। जैसे कि दोनों ही जापान से रिश्ता रखते हैं। मुराकामी पूरी तरह जापानी हैं।  वह उन अर्थों में जापानी हैं, जिन अर्थों में कुरोसावा जापानी थे। कुरोसावा ने अपनी थीम और शैली पश्चिम से प्राप्त की थी, उन्होंने पश्चिम के कला-जगत को कुछ नया नहीं सिखाया, बल्कि पश्चिम की शैलियों से सीख पाकर उसे अपनी कला में पिरोया। जापान की स्थानीय, अति-नाटकीय, भावुक, प्राचीन काबुकी नाट्यशैली को थोड़ा आधुनिक रूप देते हुए अपनी फिल्मों में शामिल किया। इस तरह उनकी फिल्मों में कला का एक मिश्रित संसार बना। उनके सिनेमा से स्थानीय जापानी भी प्रभावित हुए और पश्चिम में भी उन्हें तुरत लोकप्रियता मिली। कलाओं और शैलियों का ऐसा मिश्रण मुराकामी में भी दिखाई देता है। उनके नैरेशन का तरीक़ा और उत्तर-आधुनिक शैली पूरी तरह पश्चिमी है, लेकिन सोचने का तरीक़ा और परिवेश जापानी है। ‘नॉर्वेजियन वुड’, ‘वन क्यू एट फोर’ में चरित्रों का जो मूल्य-संकट है, वह न केवल जापानी बल्कि ठेठ एशियाई है, पूर्वी है। मुराकामी को भी स्थानीय और वैश्विक दोनों ही स्तरों पर लोकप्रियता मिली।

इशिगुरो सिर्फ़ नाम से जापानी हैं, बाक़ी पूरी तरह ब्रिटिश हैं। छह साल की उम्र में ही उनका परिवार इंग्लैंड आ गया था और तब से वह पूरी तरह ब्रिटिश हैं, लेकिन परिवार से उन्हें जापानी संस्कृति का एक ख़ास हिस्सा भी मिला है। उनका नैरेशन ज़ाहिर तौर पर पश्चिमी है, लेकिन सोचने का उनका तरीक़ा कहीं-कहीं जापानी संकेत दे देता है। उनके पास ठेठ ब्रिटिश या यूरोपीय तरीक़ा-मात्र नहीं है। उनके उपन्यासों का दार्शनिक स्वाद शायद उस जापानी स्पर्श के कारण आता है।

दोनों में कलात्मकता है, दोनों के पास लोकप्रियता है, और उनमें पहले भी कई बार तुलना होती रही है। ज़ाहिर है, दोनों एक-दूसरे के काम के प्रति सम्मान से भरे हुए रहते हैं। कुछ बरस पहले जब मुराकामी से पूछा गया कि वह अपनी पसंद के दो-तीन अंतर्राष्ट्रीय लेखकों के नाम बताएं, तो उन्होंने सबसे पहले इशिगुरो का ही नाम लिया था। उसके कई साल पहले ही इशिगुरो कह चुके थे कि मुराकामी, वर्तमान दुनिया के पांच श्रेष्ठतम लेखकों में से एक हैं।

इशिगुरो के उपन्यास विशालकाय हैं। आकार से ज़्यादा अपनी महत्वाकांक्षा में विशालकाय। मनुष्य के जीवन में दुख से पैदा होने वाली विसंगतियों और उसकी आध्यात्मिक विवशताओं को छूना अपने आप में एक विशालकाय महत्वाकांक्षा होती है। उपन्यास दरअसल एक जंक्शन होता है, जहाँ कई दिशाओं से ट्रेनें आकर रुकती हैं और आगे कई दिशाओं की ओर बढ़ जाती हैं। आत्म-संधान, दुख, हानिबोध और मृत्यु- उपन्यास नाम के इस जंक्शन के चार प्रमुख प्लेटफॉर्म हैं। और यही जीवन का चक्र भी है। इसका क्रम आगे-पीछे होता रहता है। पुरानी कहावत है कि हमारा जीवन, दरअसल जीवन नहीं है, यह हमें मिला हुआ एक मृत्युदंड है, एक क़ैद है। जिस क्षण कोई शिशु पैदा होता है, उसी क्षण उसे मृत्युदंड मिल जाता है। तुम पैदा क्यों हुए? पैदा होना एक अपराध है। तुमने यह अपराध कर दिया है। अब तुम्हें मरना ही होगा। लो, तुम्हें जीवन-रूपी मृत्युदंड दिया जाता है। सब अपनी-अपनी सज़ा भुगतते हैं। कोई बीस साल की उम्र तक भोगता है और मृत्यु के रूप में आख़िरी दंड पाता है, तो कोई सत्तर साल की उम्र तक भोगता है। सज़ा घोषित होने और सजा पूरी होने के दो बिंदुओं के बीच पूरी यात्रा चलती है। मनुष्य बार-बार यह पता करना चाहता है कि वह कौन है, इस क्रम में उसे जीवन में कई तरह की हानियों को झेलना पड़ता है और उसके पास दुख आता है। दुखों से अनुभूतियाँ बनती हैं, अनुभूतियाँ विचार में बदल जाती हैं और विचार के आने के साथ ही फिर से ख़ुद की तलाश शुरू हो जाती है। सारे विचार दरअसल, दुख के वंशज होते हैं। सारी कलाएँ अंतत: दुख की ही आराधना करती हैं। दर्शन के मूल में दुख है। जीवन में मृत्यु के कई व अद्वितीय तरीक़े होते हैं, लेकिन साहित्य उन तरीक़ों में से महज़ कुछ को ही अपनाता है, और कई बार मृत्यु के नए तरीक़ों की कल्पना करता है।

दुख और हानिबोध इशिगुरो के उपन्यासों का मूल स्वर है। ‘द रिमेन्स ऑफ द डे’ के लिए उन्हें बुकर पुरस्कार मिला था। नायक एक बड़े मालिक के घर में नौकर है। वहां एक महिला सहकर्मी के साथ उसकी निकटता है। दोनों में ख़ूब बातें होती हैं, वे प्रेम के क़रीब तो पहुंचते हैं, लेकिन उनमें से कोई भी हाथ बढ़ाकर प्रेम के कक्ष का द्वार नहीं खोल पाता। इस तरह हर बातचीत में वे प्रेम के क़रीब पहुंचकर भी छूछे हाथ लौट आते हैं। बरसों बाद नायक को उस सहकर्मी का ख़त मिलता है, जिसमें वह अपनी शादी का वर्णन करती है। नई नौकरी की तलाश, पुराने मालिक के प्रति वफ़ादारी के क़िस्सों को याद करते, नाज़ियों के साथ अपने संबंधों को बताकर भी छिपा ले जाते हुए नायक किन्हीं परिस्थितियों में उस सहकर्मी के जीवन में वापस पहुंचता है। महिला की शादी को बीस साल हो चुके हैं और जल्द ही उसे एक नाती होने वाला है। वे आधे से अधिक उपन्यास में अपने पुराने रिश्ते और दूसरे विश्व युद्ध के पहले के बरसों को याद करते हैं। महिला कहती है कि उसे लगता है, शादी करके उसने ग़लती की, और इसी के आसपास नायक को अपना हानिबोध समझ में आता है कि वह जिसे पा सकता था, उसे न पा सकना ही उसकी सबसे बड़ी हानि है। यह हानिबोध उसके अवचेतन में पहले से ही है, इसीलिए वह बहुत धीरे-धीरे अफ़सोस करता है कि उसने बरसों तक जिस मालिक की इतना सेवा की, वह कोई बहुत अच्छा आदमी, शायद, नहीं था। उसकी सेवा करने में उसने ख़ुद को इस तरह खपा दिया कि उसके पास अपने ख़ुद के जीवन व आध्यात्मिक विकास के लिए कोई समय ही न बच पाया। जिस औरत के प्रति वह आकर्षित था, वह उसे नहीं पा सकता, क्या वह अब भी उसके प्रति आकर्षित है या शायद नहीं है। अवचेतन का यह हानिबोध उसके व्यक्तित्व को बदलता है और उपन्यास के आधे होने तक एक नई आदत विकसित कर लेता है- वह सबसे हंसी-मज़ाक़ करना चाहता है। हानिबोध कई बार आपको विवश करता है कि आप हास्यबोध में शरण खोजें। हंसाने का हुनर उन्हीं के पास आता दिखता है, जिन्होंने जीवन में बहुत कुछ खोया हो।

ऊपरी तौर पर यह प्रेम के खो जाने की एक साधारण कहानी है, लेकिन साहित्यिक कहानियों का सौंदर्य उनके प्लॉट में नहीं, कथा कहने के तरीक़े में छिपा होता है। इशिगुरो ने यह कथा बहुत अच्छे से कही है। उनकी भाषा भव्य नहीं है, वह सपाट लेखक हैं। इस सपाटपन को सादगी मानने में हिचक हो सकती है, क्योंकि उनके चरित्रों का अंतर्द्वंद्व इस सादगी के विलोम में खड़ा होता है। सादगी जटिलताओं को जटिल रूप में चित्रित नहीं कर पाती, जबकि इशिगुरो में जटिलताएं पर्याप्त हैं, बस, वे अक्सर सपाट जटिलताएं होती हैं। यह सिर्फ़ मैं नहीं कह रहा, बल्कि दुनिया के कई आलोचक, बहुत पहले ही कह चुके हैं कि इशिगुरो, रूढ़ियों या क्लीशे का बेहद निडर और प्रचुर प्रयोग करते हैं। कला के भीतर यह कोई अच्छी आदत नहीं है, लेकिन जैसा कि आजकल क्रिकेट में कहा जाता है, रन आने ज़रूरी हैं, कहां से आएं, बैट के स्वीट स्पॉट पर लगकर आएँ या किनारा लगकर, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता- इसी बात के आधार पर यह सोचा जा सकता है कि कथा का अच्छा बन जाना ज़रूरी है, भले वह अच्छाई छप्पन तरह के क्लीशे का प्रयोग करके ही क्यों न आए।

पिछले साल इशिगुरो की सबसे चर्चित किताब आई – ‘द बेरीड जाएंट’। दुनिया-भर में इस किताब का जमकर प्रचार हुआ था और इसकी बहुत प्रतीक्षा भी की गई थी। इशिगुरो को नोबेल पुरस्कार मिलने में संभवत: इसी किताब की महत्वपूर्ण भूमिका है। यह उपन्यास ऐतिहासिक विस्मृति को केंद्र में रखता है। छठी या सातवीं सदी का इंग्लैंड है, जो अब से बहुत अलग है। एक ऐसा नैरेटर है, जो संभवत: दोनों कालखंडों में एक साथ विचरण करता है और शुरुआत में दोनों के बीच के अंतर को बताता है और फिर जैसे ग़ायब ही हो जाता है। किंतु वह कई इशारे दे जाता है, जो आगे चलकर खुलते हैं। उस ज़माने में सैक्सन और ब्रिटिश लोगों में संघर्ष होता रहता था। एक भयानक महायुद्ध के बाद कहानी का असली प्लॉट सामने आता है। दोनों समुदाय आराम से रह रहे हैं, और तभी उनका ध्यान जाता है कि वे सभी एक विस्मृति का शिकार हो रहे हैं। पुरानी बातें तो उन्हें याद ही नहीं आतीं, और एक-डेढ़ महीने जितनी नई बातें भी लोग धीरे-धीरे भूलने लगते हैं। एक अधेड़ दंपति, एक्सल और बिआट्रिस पाते हैं कि वे भी सबकुछ भूल रहे हैं। उनका एक बेटा था और अब वह उन्हें मिल नहीं रहा। वे उसे भूलने लगते हैं। इस भूलने के बाद भी उन्हें उसकी याद है और वे उसे खोजने निकल पड़ते हैं, यह विचित्र है। वे लोग इस विस्मृति के लिए एक नया शब्द गढ़ते हैं- मिस्ट, धुंध या कोहरा। यानी एक कोहरे के कारण स्मृति और विस्मृति में दो फाँक बन गई है। बेटे को खोजने के दौरान उनकी मुलाक़ात कई लोगों से होती है, कहानी में ड्रैगन्स, राक्षस, अजीब मिथकीय जानवर भी आते हैं, जादुई यथार्थवाद की तरह नहीं, बल्कि सीधे तिलिस्मी शैली में। एक्सल और बिआट्रिस को पता चलता है कि विस्मृति की यह धुंध कुछ और नहीं है, बल्कि एक मादा ड्रैगन द्वारा छोड़ी गई साँस है। वह जितनी बार साँस छोड़ती है, वहाँ के मनुष्यों की स्मृति का उतना लोप होता है, विस्मृति उतनी बढ़ती जाती है। स्मृति चाहिए, तो उस मादा ड्रैगन को मारना होगा। और किसी न किसी तरह वे उसे मारने में सफल हो जाते हैं। स्मृति लौट आती है। प्यार की भी स्मृति लौट आती है, तो आपसी नफ़रत की भी। ब्रिटिश और सैक्सन, जो विस्मृति में शांति से रह रहे थे, स्मृति लौट आने से एक दूसरे के प्रति अपनी शत्रुता को फिर से जान लेते हैं और लड़ पड़ते हैं। इस तरह स्मृति का आना भयावह ही साबित होता है। जो जाएंट यानी दानव, बेरीड यानी दफ़न था, वह फिर उभरकर आ गया है।

जीवन का सुख अतीत को भूलने से भी पाया जा सकता है। अतीत को याद करने से दुख ही दुख है। यह इस उपन्यास का कथा-सार है। इसमें हॉबिट है, हैरी पॉटर है, प्रूस्त हैं, चेखव हैं, बोर्हेस हैं, दोस्तोएव्स्की हैं, और जाने क्या-क्या है, इशिगुरो ने कई जगहों से चीज़ें प्राप्त की हैं और इस उपन्यास में निवेश किया है। लेकिन मेरी नज़र में, यह निवेश बहुत ज़्यादा डिविडेंड नहीं देता, क्योंकि ऐसी थीम पर बोर्हेस, कम पन्नों में कहीं बड़ा काम करके जा चुके हैं, प्रूस्त ने मनोविज्ञान की एक पूरी शाखा बना दी है। चेखव की एक कहानी में मुख्य पात्र अपने मरे हुए बेटे को इसी तरह भूल जाता है। ड्रैगन्स का मायाजाल, जीवन की विस्मृतियों के साथ जुड़े जीवन-दर्शन को हम हॉबिट और हैरी पॉटर में देख-पढ़ चुके हैं। फिर इशिगुरो इस उपन्यास में हमारे लिए नया क्या देते हैं? कुल मिलाकर वह एक प्रतीक-कथा की प्रस्तावना करते जान पड़ते हैं कि स्मृति के विशाल दानव को ज़मीन के नीचे अच्छी तरह दफ़न कर दो, तो जीवन शांतिपूर्वक व्यतीत हो सकता है। इक्कीसवीं सदी के एक पाठक के तौर पर मेरी दिलचस्पी प्रतीक-कथा पढ़ने में नहीं रहती। मैं उसके लिए मिथॉलजी पढ़ लिया करता हूं, क्योंकि उसे पढ़ते समय मेरा मन मुझे बार-बार बताता है कि यह भले मैं इक्कीसवीं सदी में पढ़ रहा, यह तीन हज़ार साल पहले की कल्पनाएं हैं। किसी भी सुंदर कहानी को प्रतीक-कथा में तब्दील करके ख़त्म किया जा सकता है। जैसे ही लेखक अपनी ओर से प्रतीकों का निवेश करता है, वह पाठक की कल्पनाशक्ति को कुंद करता है, उससे कहता है कि दूसरी दिशाओं में जाकर मत सोचो, उतना ही सोचो, जितना मैं तुम्हें बताना चाहता हूं। और यह श्रेष्ठ कला का गुण क़तई नहीं हो सकता। इसीलिए, पिछले साल इस उपन्यास को पढ़ने के बाद मैंने इसे उनकी एक विराटकाय असफलता माना था, और आज जब उन्हें नोबेल पुरस्कार की घोषणा हुई, तो मुझे थोड़ा आश्चर्य भी हुआ। यह भी सही है कि दुनिया के कई आलोचक इस उपन्यास को एक सफलता भी मानते हैं। साहित्य हमेशा से आस्वाद का विषय रहेगा।

चूंकि इशिगुरो के पास सुलझा हुआ क्राफ्ट है, कहानी कह जाने की कला है, वह इस किताब को हमारे भीतर  से गुज़ार देते हैं। पर गुज़रकर वह ऐसी जगह पहुंचती है, जो हमारे लिए नई नहीं होती। कहीं न पहुंच पाने का भाव श्रम का व्यय है।

उनकी सबसे अच्छी किताब ‘नेवर लेट मी गो’ है। ‘द बेरीड जाएंट’ के प्रकाशन के पूर्व जो उत्सुकता व्याप्त थी, उसका प्रमुख कारण ‘नेवर लेट मी गो’ की विचारगत सुंदरता ही थी। इसकी कहानी ऐसे है- सरकार क्लोनिंग के ज़रिए कुछ बच्चों का ‘उत्पादन’ करती है। उन्हें एक हॉस्टल में रखा जाता है। बाक़ायदा स्कूल भी भेजा जाता है। वे बड़े भी होते रहते हैं। साधारण क्रिया-कलापों में लगे हुए हैं। पढ़ रहे हैं। प्रेम कर रहे हैं। जीवन के सौंदर्य को अनुभूत कर रहे हैं। और बड़े सपने भी देख रहे हैं। लेकिन उनका ‘उत्पादन’ एक ख़ास उद्देश्य के लिए किया गया है। उनके शरीर के सारे अंग स्वस्थ हैं। जब साधारण ब्रिटिश नागरिकों को अंगों की ज़रूरत होती है, इन बच्चों के अंग निकालकर उनमें प्रत्यारोपित कर दिए जाते हैं। ज़ाहिर है, अंग निकल जाने के बाद उस बच्चे की या तो जान चली जाएगी या वह अनुपयोगी हो जाएगा और सरकार उसे ढोने के बजाय मार डालेगी। यह प्लॉट ही अपने आप में भयावह मानवीय स्थितियों की ओर ले जाता है। फ़सल की तरह मनुष्य का उत्पादन। जैसे आप मुर्ग़ियाँ व अन्य जानवर पालते हैं, ताकि इंसान उसे व उसके अंडों को खाने के लिए उपयोग करे। विशिष्ट तकनीक के प्रयोग से मनुष्य का जानवर की तरह प्रयोग करना, हमारे भीतर के पशु का फोटो खींचकर दिखा देने जैसा है। बच्चों को पता है कि वे मारे जाएंगे, लेकिन वे कोई विरोध नहीं करते। वे लगातार अपनी नियति के आगे समर्पण करते हैं। यह इतना ताक़तवर प्लॉट है कि इशिगुरो की मुरझाई हुई, बेचमक, सपाट अंग्रेज़ी के बाद भी हम पूरी किताब पढ़ डालते हैं और अंत में लेखक की प्रशंसा ही करते हैं, मानवता के विशाल महास्वप्न में उसकी आस्था के कारण। एक बार एक पत्रिका ने सूची बनाई थी और पाठकों से आमंत्रित किया था कि वे अपने पढ़े उपन्यासों के दस सबसे उबाऊ दृश्यों को नामांकित कर उसके पास भेजें। ‘नेवर लेट मी गो’ के कुछ हिस्से उबाऊपन की उस प्रतिस्पर्धा में शामिल किए गए थे। इतने दिलचस्प प्लॉट के बाद भी इशिगुरो इस उपन्यास में अपने पाठक को झिलवा देते हैं, तो अपनी भाषाई मंथरता के ही कारण।

एक पाठक के तौर पर इशिगुरो के उपन्यासों के मुक़ाबले मैं कहानियों की उनकी किताब ‘नॉक्टर्न्स’ से अधिक मुतास्सिर हुआ था, जहां उनकी कल्पनाशीलता अनर्गल ‘वाइल्ड’ नहीं होती, उसमें वह जापानी कला-पद्धति वाबी-साबी के नज़दीक जाते हैं। आपस में जुड़ी हुई वे पांच कहानियां अलग तरह का इशिगुरो है। मनुष्य की बुनियादी अनुभूतियों के अधिक निकट खड़ा लेखक। मुझे लगता है, और ज़ाहिर है कि यह मेरी निजी सोच है, कि साहित्यिक लेखकों को भरसक मनुष्य के आसपास ही रहना चाहिए। उसे उन दुर्लभ कलाकारों में शामिल होना चाहिए जो मानते हों कि अब भी, भूख पूरी न होने पर मृत्यु हो सकती है, प्यास के बेहद हो जाने पर भी, और कोई प्रेम में डूबकर भी आत्महत्या कर सकता है, एक बम फटने,  ट्रेन के पलट जाने या ग़लत दवा की चार बूंदें पी लेने से भी हज़ारों लोग मारे जा सकते हैं। ज़रूरी नहीं कि इक्कीसवीं सदी की कला के भीतर सारी मौतें बाहर से आई उड़नतश्तरियों, दूसरे ग्रहों के अजीब सैनिकों, प्राचीन युग से इस युग में आ गए किसी डायनासॉर या गॉडज़िला या अनाकोंडा से ही हों। नए-नए व अविश्वसनीय तरीक़ों से होने वाली मृत्यु की कल्पनाओं के बजाय, मृत्यु के एग्जिस्टंग रूपों पर फिर से सोचा जाए। यह हमारी अनुभूतियों के ज़्यादा क़रीब होगा। और दूसरी बात-  व्यावसायिक कलाएँ तो उस रास्ते पर ‘ऑलरेडी’ चल ही रही हैं, साहित्यिक व गंभीर कलाओं को तो कम से कम मनुष्यता की असली उंगलियों को पकड़े रखना चाहिए।

‘नॉक्टर्न्स’ में वह जिस तरह वाबी-साबी को छूते हैं, उसी तरह अपने उपन्यासों में मूजो का स्पर्श करते हैं। दोनों ही जापानी कला-पद्धतियां हैं। दोनों का रिश्ता प्राचीन बौद्ध धर्म से है। बौद्ध भिक्षुओं के पास कला के कम ही औज़ार होते थे, इसलिए वे कम से कम चीज़ों के प्रयोग के साथ यथार्थ को हल्का-सा विरूपित, लगभग आदिम रूप में, अशुद्ध-सा दिखा देते थे। जैसे- एक गिलास। जब उसे कोई व्यावसायिक कंपनी बनाएगी, तो उसका आकार बहुत शुद्ध होगा, उसमें कोई दोष नहीं होगा, बेहद नपा-तुला, उसके किनारे तीखे होंगे, और उसकी रेखाएं एकदम सीधी होंगी। लेकिन जब एक कलाकार हाथ से गिलास को बनाएगा, तो उसकी रेखाओं को टेढ़ा-मेढ़ा कर देगा, उसके रूप को अशुद्ध कर देगा, क्योंकि रूप की अशुद्धि कला को सुंदर बनाती है। शुद्धतम रूप में व्यावसायिक मूल्य हो सकते हैं, कलात्मक मूल्य कम होंगे। ‘नॉक्टर्न्स’ में इशिगुरो इसी कला-रूप के पास जाते हैं। उस किताब में अनुभूतियां और चरित्र अशुद्ध हैं। प्रेम ठीक प्रेम जैसा नहीं है, और संगीत तो कभी संगीत जैसा होता ही नहीं। संगीत तो हमेशा एक कल्पना की तरह हमारे मन में बजता है, बाहर तो केवल ध्वनियाँ तैरती हैं।

उनके उपन्यासों में भी उनके चरित्र, नैरेशन के दौरान अपनी कमज़ोरियों और अक्षमताओं को उजागर करते चलते हैं। यह भी एक तरह का वाबी-साबी है। दूसरी चीज़ है मूजो। बौद्ध धर्म में जिसे ‘अनित्य’ कहा जाता है, उसी को जापानी में मूजो कहा जाता है। यानी हर चीज़ एक दिन नष्ट हो जाएगी, तुम भी और मैं भी, तो आख़िर संघर्ष कैसा? चीज़ों को उनके हाल पर छोड़ देने, उन्हें स्वीकार कर लेने, नियति के आगे चुप हो जाने की स्थिति का नाम भी मूजो है। इशिगुरो के उपन्यास एक ऐसी जगह जाकर ख़त्म होते हैं, जहां चरित्र अपने अतीत व वर्तमान के साथ एक ख़ास क़िस्म का सामंजस्य बना लेता है, अपने परिवेश में घुल-मिल जाता है, दुखों को उपेक्षित करके आगे बढ़ जाता है। यह कोई नकारात्मक भाव नहीं है, बल्कि जीवन में आगे बढ़ते रहने के भाव का सम्मान ही है। अधिक दुखद स्थिति का मूजो, भले हमारे ऊपर क्षणिक तौर से नकारात्मक प्रभाव छोड़े। दुख की अवस्था में दुख पर बात न करना, एक किस्म का मूजो है। यह कुरोसावा के जापानी सिनेमा में कम दिखाई देता है, लेकिन यासुजिरो ओज़ू की फिल्मों में ऐसे प्रयोग बहुत हैं, जब, अभी-अभी एक गहरे दुख से निकला व्यक्ति, दूसरे से कहता है, “कितनी अच्छी हवा चल रही है!”

इशिगुरो के उपन्यासों में बीच-बीच में ऐसे कितने ही मूजो प्रसंग आते हैं। ‘द बेरीड जाएंट’ में दोन किहोते या डॉन क्विग्जोट जैसा एक किरदार है, सर गैविन, उसकी उपस्थिति एक किस्म का मूजो है। वहीं ‘द रिमेन्स ऑफ द डे’ में नायक द्वारा बीच-बीच में किया जाने वाला परिहास भी मूजो है। इस तरह के मूजो-प्रसंग इशिगुरो को एक दार्शनिक स्पर्श भी दे देते हैं।
* * *

(गीत चतुर्वेदी के अन्य लेख यहां पढ़े जा सकते हैं।)

34 comments:

Manoj said...

Bahut sundar aalekh jise geet hi likh sakte the. Ham jaise logon k liye geet vah khidki hain jinke madhyam se ham duniya bhar k sahity ko dekh pate hain. Bahut bahut shukriya.

Pooja Priyamvada said...

Geet I have only read NEVER LET ME GO and have heard a lot about remains of the day and Nocturnes. Your write up touches almost all the aspects of Ishuguro's craft as a modern storyteller, and I am one of the few who like both him and Murakami equally.
Looking forward to next article from you !

surender kumar said...

बेहतरीन आपका लिखा एक साँस में पढ जाता हूँ..शुक्रिया आपका|

Unknown said...

Spellbound
इसके आगे मेरी औकात ही नहीं

Aparna Krishnamurtthi said...

Spellbound

आशीष पाठक said...

नकारी गई श्रेठताओं की मान्यता ज़्यादा पुख़्ता होती है।
-------/----- गीत चतुर्वेदी.

Rahul Shabd said...

मैंने मुराकामी की जगह कोई और नाम लिखा है।
देखते हैं उन्हें कब तक मिलता है, मिलता भी है या नहीं। :)
:)

Manish Kumar Joshi said...

पढने लायक

Arun Inder Vyas said...

नोबेल माना कि बहुत बडा है ,
किन्तु लेखक की कल्पना से बडा नहीं।पंक्तियाँ चाहे गीत की हो या कहानी की दिल में असर कर जाए तो वो नोबेल से कम नहीं।

Joshnaa Banerjee Adwanii said...

So v well crafted
Hats off

Piyush Kunwar Kaushik said...

अभी बस थोड़ी देर पहले ही "सबद" पर पढ़ा।आपको पढ़ना एक उपलब्धि है।

Brajesh MP said...

शुक्रिया! आपका ये लेख बिना नजर हटाये पढ़ा। बहुत अच्छा लिखा है। मुझे लगता है हिंदी में इस तरह के वैश्विक विषय पर आप ही लिखते हैं।

DrVikram Choudhary said...

Shaandar...

Mukesh Mishra said...

'... लेकिन साहित्यिक कहानियों का सौंदर्य उनके प्लॉट में नहीं, कथा कहने के तरीक़े में छिपा होता है ।' ✔️

Dhananjay Singh said...

अपर्णा जी ! इशिगुरो पर यह महत्त्वपूर्ण विश्लेषणात्मक आलेख साझा करने के लिए आपके एवं गीत जी के प्रति आभार।

Roshan Sharma said...

शुक्रिया।

Praveen K said...

मैं हर बार ओडोनिस के बारे में सोचता हूं लेकिन न मिलने की निराशा के बाद उनकी कविताओं से प्रेम थोड़ा और गहरा हो जाता है |

उपासना झा said...

आपको पढ़ना कितना कुछ नया जानना है, आप बहुत प्रेरित करते हैं।

Kavita Malaiya said...

गीत, एक बड़े लेखक से जिस तरह के लेख, विवरण और विश्लेषण की अपेक्षा कोई रखता होगा,ये लेख वैसा ही है।सोलह कलाओं से पूर्ण।

Pushpendra Dwivedi said...

बहुत बढ़िया जानकारी पूर्ण लेख

dinesh chandra joshi said...

Nice article,takes us deep into the world of characters of ishiguro.

mahesh mishra said...

बहुत सारगर्भित, सधा हुआ आलेख। आपको न पढ़ना शुध्द नुकसान है।

allahabadi andaaz said...

Behtreen!

Deependra Baghel said...

सुंदर निबंध है। सचमुच , उपन्यास विधा में मुराकामी ने अनेक प्रयोग किये है और उसे अप्रत्याशित उचाई पर पहुचाया है। मनुष्य के नितांत अकेलेपन के जिस चरम पर मुराकामी पहुचे है, बिरले ही लेखक वहां पहुच सकते है।बिल्लियों और कुत्तों को वो जिस करुणा से देखते है, वह दुर्लभ है। उनके यहां उपरी ढंग से जासूसी उपन्यास का ढांचा दिख सकता है पर वो बेहद ऊपर की सतह का ढांचा है और वो तो साभ्यतिक प्रश्नों और मनुष्य मात्र की नियति और उसके निपट अकेलेपन पर उपन्यासिक ध्यान लगाते है।

Gauri Ks said...

क्या सही कहा। पुरस्कारोंसें उनके पाठकोको कोई फर्क नही पडेगा। हां, उससे एक तसल्ली हो जायेगी, की पुरस्कार अभिभी सुयोग्य व्यक्ती को सही समयपर मिल सकते है। बस और कुछ नही।

Utpal Banerjee said...

गीत, तुमने कमाल का लिखा है. मैंने कल पढ़ लिया था.

p said...

सारगर्भित लेख। आभार।

अनुपमा पाठक said...

Brilliant article!
लेखक एवं सबद का शुक्रिया!

Poonam Arora said...

फिलोसॉफिकल वे में लिखा गया ये निबंध आपके विचारों की उच्चता भी दिखा रहा है.

सुपर्ब राइट अप मास्टर !!

शा लि नी said...

अब तो मराकोमी को पढने से खुद को रोक नही पा रही

नवभारत मे पढा आपका लेख । गजब का है

Manisha Sri said...

इश्क़ सवाल बहुत करता है, मुझे इश्क़ से बस यही एक शिक़ायत है।
सुनो, बिन सवाल जो जी लो तो इश्क़ मत करना...क्योंकि इश्क़ बिना सवाल के जीने तो देगा मगर मरने नही और जो इश्क़ में जिये ऐसे आशिक़ का क्या इश्क़ ।

गीत...बहुत शुक्रिया, इतना प्यारा लेख देने के लिए।

Sunita Zade said...

शुक्रीया गीत...

Anurag Tiwari said...

Geet जी ❤️💐. बहुत ही सधा हुआ और रोचक लेख. आपका लिखा हुआ पढ़ना हर बार कुछ अलग दे जाता है, हर बार आप कुछ नया कर देते हैं । love you for this.

Kaushal Lal said...

सारगर्भित आलेख जिस सूक्ष्मता के साथ सभी उपन्यासों के मूल भाव को पिरोकर लेखक की जानकारी उभरा है । प्रसंसनीय