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Showing posts from October, 2017

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 3 : जाते हैं जिधर सब, मैं उधर क्यों नहीं जाता

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जो सभी लोग करते हैं, आप भी अगर वही करेंगे, तो आपको कभी विशेषण नहीं मिलेंगे। अधिकतर विशेषण हास्यबोध से निकलकर आते हैं। जिनका बहुत मज़ाक़ उड़ाया जाता है और जो बहुत महान होते हैं (और दोनों अमूमन एक ही होते हैं और यह भी एक कारण है कि महान शब्द अब मख़ौल के लिए ज़्यादा प्रयुक्त होता है), वे अपने अधिकांश काम उस तरह नहीं करते, जिस तरह बाक़ी दूसरे लोग करते हैं। किसी को पागल इसलिए भी कहा जाता है कि वह समाज के प्राकृतिक नियमों का पालन नहीं करता। समाज और प्रकृति के साथ उसका अलग और निजी रिश्ता होता है। यही रिश्ता एक ‘जगह’ की निर्मिति करता है। सिर्फ़ भौगोलिक जगह नहीं, सिर्फ़ मानसिक जगह नहीं, बल्कि दोनों क़िस्म की जगहों का एक अमूर्त-सा मिश्रण। एक ऐसा निजी मिश्रण, जो बहुत विशिष्ट होता है। कला का वास इसी अमूर्त-सी ‘जगह’ में होता है।
जैसे दिल्ली में लाखों शायर हुए होंगे, नामदार, गुमनाम और ज़्यादातर ने दिल्ली को अपनी शायरी में जगह दी, लेकिन जो ग़ालिब की दिल्ली है, वह किसी और की दिल्ली नहीं। जो मीर की है, वह भी किसी और की नहीं। एक ही दिल्ली दो लोगों के भीतर नहीं रह सकती। हम इन लोगों को पढ़ते हैं और इनकी दिल्…

इशिगुरो और नोबेल : कुछ फ़ौरी बातें - गीत चतुर्वेदी

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पिछले कुछ बरसों से अक्टूबर के महीने की शुरुआत के तीन रिचुअल्स रहे हैं- साहित्य के नोबेल पुरस्कार के पूर्वानुमानों में हारुकि मुराकामी को सबसे प्रबल दावेदार बताना, नोबेल समिति द्वारा अपने कॉन्फ्रेंस रूम का बड़ा-सा दरवाज़ा खोलकर माइक लिए खड़े पत्रकारों के सामने किसी एक नाम का उच्चारण करना और उसके बाद दुनिया के अधिकांश हिस्सों में हारुकि मुराकामी के प्रति एक शोकगीत का सामूहिक गायन शुरू हो जाना। मुराकामी के प्रशंसकों को यह समझ में ही नहीं आ रहा है कि आख़िर उनमें ऐसी कौन-सी कमी है, जिसके कारण नोबेल पुरस्कार उनसे छिटक जा रहा है। इस समय वह दुनिया के सर्वश्रेष्ठ लेखकों में से हैं। अपनी हर नई किताब से वह अपनी श्रेष्ठता को पुख़्ता कर देते हैं। पिछले दो दशकों में वह एकमात्र ऐसे लेखक हैं, जिन्हें इतने अधिक लोग चाहते हैं कि वह नोबेल पा लें। इतना प्रेम इस दौर में किसी साहित्यिक लेखक को नहीं मिला।

ऊपर के इस पैराग्राफ़ को अगर एक संकेत की तरह पढ़ा जाए, तो इसमें सिर्फ़ एक बदलाव करना होगा- मुराकामी की जगह आप अपने लेखक का नाम रख लीजिए. कोई चाहे, तो न्गुगी वा थियोंगो का नाम रख सकता है, तो कोई फिलिप रॉथ का। को…

महेश वर्मा: छह नई कविताएं

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शेर दागना
फिरोज़ अख़तर फिरोज़ या किसी गांव के तख़ल्लसु वाले शायर दोपहर जब आये तो खासे प्यासे थे लेकिन पानी का गिलास हाथ आते ही उन्होंने शेर दाग दिया जो मेरे कान को छूता गुज़रा और  मेरे पुराने घर  की दीवार की पलस्तर में जा धंसा जहां से थोड़ी रेत और सीमेंट भुरभुरा कर झर गई. दाद न मिलने पर और एक शेर सुनाया जो मेरी नासमझी की दीवार से टकराकर थोड़ा और पलस्तर गिरा गया. थोड़ी देर में तो कमरा चांदमारी का मैदान हो गया था और आने वाले लोग थे कि चारों ओर आदिवासियों की तरह मरे पड़े थे और शेर थे कि क्लाशनिकोव की मैगजीन हुए जा रहे थे. अंत में अपनी शेरवानी, टोपी और अपना दीवान समेटकर जब वो चौकी से  से उठे तो उन्होंने क्षेत्रीय बोली में तम्बाकू मांगा. ***
मछलियाँ
एक मछली से तुम सबकुछ (का चित्र) बना सकते हो... मज़ाकिये चित्रकार ने अत्याधुनिका से कहा यहां तक कि एक फीमेल न्यूड भी. वह जरा भी चौंकती तो देहाती करार दी जाती सो  उसने आगे का दांव खेला-तो क्या एक स्त्री गुप्तांग भी ? पुरूष अब गंभीर भयभीत और परास्त कायांतरण की ओर घूम चुका है। अगले दृश्य में वह त्रासदी का नायक है जो इस मछलीघर में किसी …