Friday, September 22, 2017

पढ़ने के बारे में चार्ल्स सिमिक

 
 
हम क्या पढ़ते हैं, यह तो हम सब सोचते हैं, लेकिन हम कहां पढ़ते हैं, किन जगहों पर पढ़ते हैं, चार्ल्स सिमिक का यह संक्षिप्त निबंध इस बारे में है. सूक्ष्मता और संक्षेपण सिमिक के महत्वपूर्ण गुण रहे हैं. जैसे इसी निबंध का संक्षेप उदाहरण की तरह है. सिमिक ने इसमें जितना कम लिखा है, इसे पढ़ने के बाद हमारी चेतना उतना ही सक्रिय हो जाती है और हम उसके आगे की बातें सोचने लगते हैं. जगहों के साथ अपनी किताबों और पढ़ने की अपनी आदतों के बारे में सोचते हैं. सिमिक अमेरिकी अंग्रेज़ी कवि हैं. यह निबंध ‘कन्फेशन्स ऑफ अ पोएट लॉरिएट’ से लिया गया है.
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मुझे किनारों से मुड़ा अपना प्लेटो पसंद है
चार्ल्स सिमिक
किसी नियम की तरह मैं कविता पढ़ने और लिखने का काम बिस्तर में करता हूं. दर्शनशास्त्र और गंभीर निबंधों को अपनी मेज़ पर पढ़ता हूं. अख़बारों और पत्रिकाओं को नाश्ता या खाने के समय. सोफ़ा या दीवान पर लेटकर उपन्यास पढ़ता हूं. इतिहास पढ़ने के लिए कोई अच्छी-सी जगह खोजना सबसे मुश्किल काम है, क्योंकि इतिहास पढ़ना दरअसल अन्याय और अत्याचार की कहानियां पढ़ना है. उसे कहीं भी पढ़ा जाए, बग़ीचे में या गर्मी के किसी दिन या बस में यात्रा के दौरान, उसे पढ़ते समय, ख़ुद के ख़ुशक़िस्मत होने पर हमेशा एक लज्जा को अनुभव होता है. शहर में बने मुर्दाघर का प्रतीक्षालय ही शायद सबसे सही जगह है, जहां बैठकर स्टॉलिन या पोल पॉट के बारे में पढ़ा जा सके.
अजब है कि कॉमडी पढ़ने के साथ भी यही मसला है. ऐसी जगह और परिस्थतियां खोजना जहां आप खुलकर हंस सकें, कभी आसान नहीं होता. मुझे याद है, बरसों पहले जब मैं न्यूयॉर्क की एक ठुंसी हुई लोकल ट्रेन में बैठा था, जोसेफ हेलर का कैच-22 पढ़ रहा था, थोड़ी-थोड़ी देर बाद ठहाके के साथ हंसने लगता था. उस समय सारे लोगों का ध्यान मेरी तरफ़ हो जाता.  एक या दो सहयात्री मुझे देख मुस्करा उठते, जबकि बाक़ी ज़्यादातर लोग मेरे हंसने से विचलित हो रहे थे.  दूसरी तरफ़, अगर देहात के निर्जन में बने एक ख़ाली और वीरान मकान में बैठकर, आधी रात,  डब्ल्यू.सी. फील्ड्स की जीवनी पढ़ी जाए और ठहाके लगाए जाएं, तो इसे भी यार लोग अजीब व्यवहार का ही नाम देंगे.
मैं कहीं भी बैठकर पढ़ूं, कुछ भी पढ़ूं, मुझे एक पेंसिल की दरकार होती है, पेन की नहीं. ख़ासतौर पर वह पेंसिल, जो अंगूठे बराबर बची हो, ताकि मैं शब्दों के ज़्यादा क़रीब पहुंच सकूं और सुगठित वाक्यों, सुंदर या मूर्खता से भरे विचारों, दिलचस्प सूचनाओं और शब्दों को रेखांकित कर सकूं.  हाशिए पर छोटी या विस्तृत टिप्पणियां लिखना मुझे पसंद है, प्रश्नचिह्न बनाना, सही का निशान बनाना या अपनी पसंद के पैराग्राफ्स के पास बहुत निजी किस्म के चिह्न बनाना, जिन्हें सिर्फ़ मैं ही समझ सकता हूं, या कभी-कभी तो मैं ख़ुद नहीं समझ पाता. किसी सार्वजनिक पुस्तकालय में जाऊं और वहां इतिहास की किसी किताब पर रेखांकित की गई पंक्तियां या हाशिए पर लिखी गई टिप्पणियां देख लूं, तो मुझे बहुत अच्छा लगता है. वहां पुस्तकों पर ऐसे लिखना प्रतिबंधित होता है, लेकिन इससे यह पता चलता है कि उस पाठक को लेखक से कोई शिकायत थी और वह उसे ज़ाहिर करने से ख़ुद को रोक नहीं पाया. या पिछले हज़ार बरसों में सभ्यता जिन दिशाओं की ओर मुड़ गई है, उसके मुड़ जाने से उसे शिकायत है.
वितोल्द गोम्ब्रोविच ने कहीं अपनी डायरी में कहा है कि हम किसी महान उद्देश्य के लिए नहीं लिखते, बल्कि अपना होना जताने के लिए लिखते हैं. यह सिर्फ़ कवियों और उपन्यासकारों के लिए ही सच नहीं है, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए है जो किताब के पन्नों का मूल रूप बिगाड़ता है या उन पर कुछ लिख देता है. जब मेरे मन में यह बात आती है, तो मैं किंडल और उस जैसे अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के प्रति लोगों के आकर्षण को नहीं समझ पाता. (प्रिय पाठक, मैं उम्मीद करता हूं कि आपकी ईबुक मुड़ी-तुड़ी होगी, उसकी स्क्रीन पर पुराने धब्बे होंगे,  उस पर कहीं चीनी के दाने भी चिपके होंगे और अंगूठे के निशान बने होंगे.) मुझे तो अपनी प्लेटो की किताबें पसंद हैं जिनके पन्नों की कोर मैंने मोड़ रखी हैं, अपनी फिलिप रॉथ पसंद है जिस पर कॉफ़ी के गिरने के निशान हैं और मैं बिल्कुल इंतज़ार नहीं कर पा रहा कि मैं कब जाऊं और शैरन ओल्ड्स का नया कविता-संग्रह ख़रीद लाऊं जिसे मैंने कल रात किताब की एक दुकान की खिड़की से झांकते हुए देखा है.
 
 
 
 

Wednesday, September 13, 2017

गीत चतुर्वेदी : दिल के क़िस्से कहां नहीं होते

(अब से 'सबद' पर हर पंद्रह दिन में कवि-कथाकार गीत चतुर्वेदी का यह कॉलम प्रकाशित होगा.)



जब से मैंने लिखने की शुरुआत की है, अक्सर मैंने लोगों को यह कहते सुना है, 'गीत, तुममें लेखन की नैसर्गिक प्रतिभा है।' ज़ाहिर है, यह सुनकर मुझे ख़ुशी होती थी। मैं शुरू से ही काफ़ी पढ़ता था। बातचीत में पढ़ाई के ये संदर्भ अक्सर ही झलक जाते थे। मेरा आवागमन कई भाषाओं में रहा है। मैंने यह बहुत क़रीब से देखा है कि हमारे देश की कई भाषाओं में, उनके साहित्यिक माहौल में अधिक किताबें पढ़ने को अच्छा नहीं माना जाता। अतीत में, मुझसे कई अच्छे कवियों ने यह कहा है कि ज़्यादा पढ़ने से तुम अपनी मौलिकता खो दोगे, तुम दूसरे लेखकों से प्रभावित हो जाओगे। मैं उनकी बातों से न तब सहमत था, न अब। 


बरसों बाद मेरी मुलाक़ात एक बौद्धिक युवती से हुई। उसने मेरा लिखा न के बराबर पढ़ा था, लेकिन वह मेरी प्रसिद्धि से परिचित थी और उसी नाते, हममें रोज़ बातें होने लगीं। हम लगभग रोज़ ही साथ लंच करते थे। कला, समाज और साहित्य पर तीखी बहसें करते थे। एक रोज़ उसने मुझसे कहा, 'तुम्हारी पूरी प्रतिभा, पूरा ज्ञान एक्वायर्ड है। तुम्हारा ज्ञान नैसर्गिक ज्ञान नहीं है।' उसके बाद कई दिनों तक हमारी बहसें इसी मुद्दे पर होती रहीं। बहसों का कोई हल नहीं होता। हममें इतना ईगो हमेशा होता है कि हम 'कन्विंस' होने की संभावनाओं को टाल जाएं।


लेकिन मुझे बुरा लगा था। एक्वायर्ड शब्द ही बुरा लगा था। इस शब्द के सारे संभावित अर्थों को जानने के लिए उस रोज़ घर लौटकर मैंने सारे शब्दकोश और थिसॉरस पलटे थे। मुझे एक भी नकारात्मक अर्थ नहीं मिला, लेकिन फिर भी मुझे बुरा लगा था। मुझे बुरा क्यों लगा था? इसका कारण समझने में मुझे कुछ बरस लग गए। जब मेरी प्रतिभा को नैसर्गिक कहा गया था, तो मुझे अच्छा लगा था। जब उसे एक्वायर्ड कहा गया, तो मुझे बुरा लगा। कारण हमारे सामूहिकसामाजिककलात्मक संस्कार थे। हमें बचपन से ही लगभग यह मनवा दिया जाता है कि श्रेष्ठताएं जन्मजात होती हैं। प्रतिभा जन्मजात होती है। बिरवा के पात चिकने हैं, यह बचपन में ही पता चल जाता है। हमें यही स्थिति सबसे अच्छी लगती है। श्रम से पाई गई, अर्जित की गई चीज़ों को, वह भी कला के संदर्भ में, अच्छा नहीं माना जाता। अभी पिछले हफ़्ते एक सज्जन कह रहे थे कि नेरूदा नैसर्गिक हैं, एक बार में कविता लिख देते थे, जबकि मीवोश को अपने क्राफ्ट पर बहुत काम करना पड़ता था, इसलिए वह कवि से ज़्यादा मिस्त्री हैं। 


प्रतिभाएं तो नैसर्गिक हो सकती हैं, पर क्या ज्ञान भी नैसर्गिक हो सकता है? चाहे बुद्ध हों या आइंस्टाइन, कोई भी जन्मजात ज्ञान लेकर नहीं आता। उसे ध्यान और अध्ययन दोनों की शरण में जाना होता है। दोनों में गहरा भाषाई रिश्ता है। निरंतर ध्यान ही अध्ययन बन जाता है। जो आप धारण करते हैं, उससे आपका ध्यान रचित होता है। इसी से बनती है मेधा। एक होती है प्रज्ञा। वह भी जन्मजात नहीं होती। आपकी मेधा से आपकी प्रज्ञा का विकास होता चलता है। प्रज्ञा, मेधा से चार क़दम आगे चलती है। मान लीजिए, आप किसी किताब के बीस पन्ने पढ़कर छोड़ देते हैं।  एक दिन आप पाते हैं कि आपके मन में वह पंक्ति या दृश्य गूंज रहा है, जो उस किताब के तीसवें पन्ने पर था, जिसे आपने पढ़ा ही नहीं था। यह प्रज्ञा का काम है। वह हमेशा उन भूखंडों में रहती है, जहां आपका अध्ययन व मेधा अभी तक नहीं पहुंचे हैं। इसीलिए योग में प्रज्ञा का विशेष महत्व है। मेधावी तो विद्यार्थी होते हैं, प्रज्ञा योगी के पास आती है। उसे भी प्राप्त करना होता है। एक्वायर्ड होती है।


पुरानी अंग्रेज़ी का एक मुहावरा है, जिसे हेमिंग्वे अपने शब्दों में ढालकर बारबार दुहराते थेप्रतिभा, दस फ़ीसदी जन्मजात गुण है और नब्बे फ़ीसदी कठोर श्रम। यह वाक्य नैसर्गिक व एक्वायर्ड, दोनों के एक आनुपातिक मिश्रण की ओर संकेत करता है। अगर वह नब्बे फ़ीसदी श्रम न हो, तो उस दस फ़ीसदी का कोई मोल न होगा। एक शेर याद आता है, जिसके शायर का नाम याद नहीं— 


दिल के क़िस्से कहां नहीं होते
मगर वे सबसे बयां नहीं होते।


पर इस मामले में मेरी मदद हेमिंग्वे से ज़्यादा अभिनवगुप्त ने की। आठनौ साल पहले मैंने उन्हें गंभीरता से पढ़ना शुरू किया था। ध्वन्यालोक के उस हिस्से में जहां वह सारस्वत तत्व की विवेचना करते हैं, सहृदय का निरूपण करते हैं, वहां वह प्रख्या और उपाख्या दो प्रविधियोंउपांगों का भी उल्लेख करते हैं। प्राचीन व अर्वाचीन विद्वानों ने इन दोनों शब्दों की भांतिभांति से व्याख्या की है, लेकिन मैंने इन्हें अपने तरीक़े से समझा है।


प्रख्या कवि की नैसर्गिक प्रतिभा है, उपाख्या उसका अर्जित ज्ञान है। प्रख्या दर्शन है। उपाख्या अभ्यास है। यहां अभ्यास का अर्थ सीधेसीधे प्रैक्टिस न समझ लें। अभ्यास यानी उस दर्शन को दृष्टि के व्यवहार में रखना। कवि में एक ऋषितत्व का होना अनिवार्य है। ऋषि शब्द को भी समझकर सुना जाए। यह इसलिए कह रहा कि याद आया, आठ-दस साल पहले जब कुंवर नारायण को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था, तो सबद पर एक टिप्पणी में मैंने लिखा था कि उनमें ऋषितत्व है। कुछ समय बाद हिंदी के एक कवि ने इस शब्द के प्रयोग के आधार पर मुझे दक्षिणपंथी और संघी आदि क़रार दिया और कहा कि ऋषि जैसा शब्द प्रयोग कर मैं कुंवर नारायण को आध्यात्मिक रंग दे रहा हूं। उस हिंदी कवि को ऋषि शब्द का अर्थ नहीं पता है, इसीलिए वह ऐसा लिख गया। कुंवर नारायण को पता है। इसलिए उन्हें पसंद आया था। पुरानी, वैदिक संस्कृत में ऋषि के दोतीन अर्थ होते हैं, लेकिन मूल अर्थ हैवह व्यक्ति जिसे बहुत दूर तक दिखाई देता हो। इसीलिए जब वेदों का उल्लेख होता है, तो ज्ञानी लोग 'मंत्रों के रचयिता' नहीं, 'मंत्रद्रष्टा' शब्द का प्रयोग करते हैं। कविता रची नहीं जाती, वह पहले से होती है, आप बस उसे देख लेते हैं, उसे उजागर कर देते हैं। उजागर करने की प्रक्रिया में बहुत श्रम लगता है। जैसे पत्थर के भीतर शिल्प होता है, अच्छा शिल्पकार उसे देख लेता है और पत्थर के अनावश्यक हिस्सों को हटाकर शिल्प को उजागर कर देता है। दृश्य हर जगह उपस्थि​त होता है, अच्छा फिल्मकार उसे देख लेता है, उसके आवश्यक हिस्से को परदे पर उतार देता है। बात वही हैदिल के क़िस्से कहां नहीं होते...। 


यह ऋषितत्व, देख लेने का यह गुण, प्रख्या है। उजागर करने की प्रक्रिया में लगने वाला श्रम उपाख्या है। रससिद्धांत की अच्छी समीक्षा करने वाले लोग भी इस भ्रम में पड़े रहते हैं कि सबसे बड़ा कलाकार वही होता है, जिसके भीतर जन्मजात गुण हो। बचपन से हमारे संस्कार ऐसे होते हैं कि हम जन्म से मिलने वाली श्रेष्ठताओं को ही वरीयता देते हैं। इसीलिए एक्वायर्ड शब्द या अर्जित श्रेष्ठताओं का महत्व हम नहीं समझ पाते। इसीलिए हम साधना के अध्यवसाय को नजरअंदाज़ कर चमत्कारों में यक़ीन करने लग जाते हैं। मेरे उस प्राचीन दुख का कारण यहीं कहीं रहा होगा। किसी एक को महत्वपूर्ण मान लेना, दूसरे को कम महत्व का मानना एक संस्कारी भूल है। श्रम की महत्ता को कम करने आंकने जैसा है। 


कवि की देह प्रतीकात्मक रूप से अर्धनरनारीश्वर की देह होती है। वह यौगिक है। दो तत्वों के योग से बनी हुई देह। अनुभूति व अभिव्यक्ति का योग। कथ्य व शिल्प का योग। अंतर व बाह्य का योग। प्रख्या व उपाख्या का योग। दाना व नादान का योग। जब कृति सामने आती है, तब यह पता नहीं लगाया जा सकता कि ये दोनों तत्व अलगअलग थे भी क्या। जैसे पानी पीते हुए हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का स्वाद आप अलगअलग नहीं जान सकते। हां, उसकी शीतलता और प्यास बुझाने के उसके गुण को जान सकते हैं। दोनों बहुत महत्वपूर्ण हैं। दोनों का संयोग महत्वपूर्ण है। इसीलए अभिनवगुप्त ने इस संबंध में कहा था-  सरस्वती के दो स्तनों का नाम है प्रख्या व उपाख्या। कलाकार यदि सरस्वती की संतान है, तो वह अपनी मां के दोनों स्तनों से दुग्धपान करता है।


क्या कोई यह बता सकता है कि कालिदास, ग़ालिब और नेरूदा में कितनी प्रख्या थी, कितनी उपाख्या थी? उनका नैसर्गिक ज्ञान कितना था व अर्जित ज्ञान कितना? हो सकता है, किसी रचनाकार के जिस ज्ञान को आप उसका नैसर्गिक ज्ञान मान रहे हों, वह उसने बरसों के अभ्यास से अर्जित किया हो? और जिसे आप उसका अर्जित ज्ञान मान रहे हों, वह उसकी स्वाभाविक प्रज्ञा से आया हो, उन भूखंडों से, जहां तक वह कभी गया ही न हो? रचनात्मकता का यह रहस्य कभी भेदा नहीं जा सकता। 


यहां ​अभिनवगुप्त का पानक याद आता है। यह पुराने ज़माने का कोई शर्बत है, जिसमें गुड़ भी होता है और मिर्च भी होती है। गुड़ और मिर्च, दोनों को अलगअलग चखा जाए, तो अलगअलग स्वाद मिलते हैं। लेकिन जब ईख से बने उस शरबत में इनका प्रयोग किया जाता है, तो एक अलग स्वाद मिलता है। वह तीसरा ही कोई स्वाद होता है। इसलिए कृति का स्वाद या रस, उसके इनग्रेडिएंट्स या उपांगों को देखकर नहीं जाना जाता, बल्कि कृति के संपूर्ण प्रभाव को देखने पर ज़ोर दिया जाता है। क्योंकि आपके पास वही आता है। हम तक नेरूदा और मीवोश के प्रभाव आते हैं, उनका होमवर्क नहीं आ सकता। 


अंग्रेज़ी में इसे गेस्टॉल्ट इफेक्ट कहते हैं। गेस्टॉल्ट जर्मन का शब्द है, जिसका अर्थ होता है संपूर्ण। आधुनिक दर्शन व मनोविज्ञान की एक पूरी शाखा गेस्टॉल्ट पद्धति पर आधारित है। यह पद्धति कहती है कि चीज़ों को उनके टुकड़ों में न देखा जाए, बल्कि उसे एक में देखा जाए। बहुलता को आधार अवश्य बनाया जाए, लेकिन बहुल के समेकित प्रभाव को जाना जाए। दाल को हल्दी, नमक, मिर्च, तड़का के अलगअलग उपांगों में बांटकर नहीं चखना चाहिए, उसके समेकित प्रभाव को जानना चाहिए। अंत में आपको 'एक' तक पहुंचना ही होगा। यही 'एक' है, जिसकी ओर शंकर ले जाना चाहते हैं, अभिनवगुप्त ले जाना चाहते हैं, और इसी 'एक' तक बुद्ध भी ले जाना चाहते हैं। बुद्ध में अद्वैत है। भरपूर है। इसका एक प्रमाण यह भी कि बुद्ध का एक नाम 'अद्वयवादी' भी है और यह नाम बुद्ध के जीतेजी प्रचलित हो चुका था। और इसी का उल्टा रास्ता पकड़कर चलें, तो देरिदा और बॉद्रिला के विखंडनवाद और संरचनावाद को समझ सकते हैं। प्राचीन भारतीय दर्शन 'बहुत से एक' की ओर ले जाता है, तो आधुनिक यूरोपीय दर्शन 'एक से बहुत' की ओर। 


तो जब कोई यह कहता है कि नेरूदा नैसर्गिक थे, क्योंकि वह एक बार में लिख देते थे और मीवोश को अपने क्राफ्ट पर मेहनत करनी होती थी, तो हंसी आ जाती है। क्योंकि तब यह पता चल जाता है कि कहने वाला 'बाल' है, वह अभी अपने 'बालपने' से नहीं निकल पाया है, भले सत्तर का हो गया हो। यह कैसे पता चलेगा कि किसी ने एक रचना एक ही बार में लिख दी या दस दिन की मेहनत से? और यह पता करने की ज़रूरत भी क्या है? रचना कैसी है, यह क्यों नहीं देखते? एक बार में लिख देने से भी श्रेष्ठ है तो भी अच्छी बात। चार बार लिखने के बाद भी श्रेष्ठ है, तो भी अच्छी बात। तथाकथित नैसर्गिक प्रतिभा से आई हो या तथाकथित एक्वायर्ड प्रतिभा से, रचना की श्रेष्ठता ही उसका गेस्टॉल्ट है। 


मध्ययुग के एक इतालवी कवि का किस्सा याद आता है : उसका समाज मानता था कि यदि कोई रचना एक ही बार में लिख दी गई हो, तो वह ईश्वरप्रदत्त है। यानी उस रचना की श्रेष्ठता निर्विवाद है। कलाकार हमेशा एक निर्विवाद श्रेष्ठता को पाना चाहता है। तो उस इतालवी कवि ने एक दिन घोषणा की कि मैंने यह लंबी कविता कल रात जंगल में प्राप्त की है, एक प्रकाशपुंज दिखा, और उससे यह कविता मुझ पर नाज़िल हुई। उसके समाज ने उस कविता को महान मान लिया। वह थी भी श्रेष्ठ कविता। कुछ समय बाद वह कवि मरा, तो एक स्मारक बनाने के लिए उसके सामान की तलाशी ली गई। वहां उसकी दराज़ों में उसी कविता के बारह या अठारह अलगअलग ड्राफ्ट मिले। वह उसे छह साल से लिखने की कोशिश कर रहा था। चूंकि उसका समाज वैसा था, एक निर्विवाद श्रेष्ठता पाने के लिए उसे दैवीय चमत्कार की कल्पना का सहारा लेना पड़ा। 
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