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महेश वर्मा की लम्बी कविता : रक़ीब


                                                                                                            तस्वीर: अनुराग वत्स 


रक़ीब


रक़ीब माशूका के ख़ाब में बुदबुदाता है 
और उस दोपहर मेरी नींद पर 
बर्फ़ जमी होती है 

मैं बर्फ़ के नीचे से अपना ख़ून आलूदा हाथ निकालकर 
किसी को बुलाना चाहता हूँ 
माशूका अपनी प्यारी चील को किशमिश खिला रही होती है

मुझे दो घड़ी की नींद चाहिये 
नींद के गैरहाज़िर ख़ुदा!
मुझे नींद चाहिये कि अपने ख़ाब का कोई दरवाज़ा खोलकर 
माशूका की नींद में सरक जाऊँ दबे पाँव

मुझे रक़ीब के हौसले और और अपने ख़ंजर की प्यास 
दोनों की फ़ितरत मालूम है 

***

हर बार की तरह उस एक बार भी 
मेरी पुकार और माशूका की तवज्जो में 
वही पुरानी निस्बत रहनी थी 
वो अपनी अंगड़ाई के ख़त्म पर 
काग़ज़ पर मेरा नाम लिखेगी या हथेली पर 
और मेरी पुकार के जवाब में बोलेगी : हाँ यहीं हैं 
फिर अपना ख़ाब बताएगी के रक़ीब के फ़रेब 
और एक क़ातिल हवा मेरे खून को गर्म कर देगी 

मुझे तेईस मुल्क के कारतूसों और 
तेरह मुल्कों की तलवारों और 
सत्रह मुल्कों के ज़हरों का अफ़साना मत सुनाओ 

अगर हो सके तो दुआ करो कि मुझे नींद जाए 
***

मैं एक वादे 
और टेलीफोन की घंटी के बीच 
बज रहा वक़्त हूँ मेरी जान  
जितनी बार तुम्हारी धड़कन से 
तुम्हारे सीने का सबसे ख़ूबसूरत तिल धड़कता है 
मैं उतनी ही बार मरने को तैयार फ़र्द हूँ चाँद !
मुझे अपने पास रक्खा करो 
***


रक़ीब के पास दिलफ़रेब अफ़साने हैं 
और मेरी नज़्मों की क़िताब के लफ़्ज 
बार-बार आंसुओं से धुल जाते हैं 

नज़्मों के दिन लौटेंगे बरखुरदार : बोलता बोलता बूढ़ा नजूमी 
मेरे आख़िरी सिक्के भी ठग लेगा
और फ़कीर दुआओं से ख़ाली अपना कासा 
मुझ पर उलीच देगा : सिक्के नहीं 
                : तो दुआ भी नहीं 

क्या यही तुम्हारे पुराने नगर का दस्तूर है 
ये पूछने से पहले 
मुझे तुम्हारे नयनों की याद बींध देगी 
और मैं अपने सवाल भूल जाऊंगा 

सबसे आसन लफ़्जों को भूलने की मौत 
और मुश्किल लफ़्जों से परहेज के इल्म के बीच 
मुझे रक़ीब के क़दमों की आहट सुनाई देगी 
और मैं इन्साफ़ के मौजूदा तरीके को मानने से इनकार कर दूंगा 

मुझे क़िताबों और पुराने चलनों के रियाज़ से बाहर की 
कोई बात बताओ अगर आये हो मेरे दोस्त !
मुझे नसीहत से अधिक नींद 
और सच से अधिक झूठ का जाम लाकर दो 
***


अगर तुम ये कहती हो कि सच का वक़्त ख़त्म हो चुका 
तो मुझे एक झूठ रचने का हुनर तुम्हें ही सिखा देना चाहिये था 

रक़ीब तुम्हारे तस्वीरख़ाने में रखी तस्वीरों के पीछे मुस्काता है 
और तुम बहाने से अपनी अल्बम बंद करने के सारे हुनर जानती हो 

मुझे एक बंद क़िताब की चुप्पी और 
कलम से बह रहे ख़ून में से कुछ चुनना नहीं था : तुम्हें मालूम है 
मुझे रकीब के सीने से बह रहे ख़ून की महक ही चुप करा सकती है 
                                       : ये भी तुम्हें मालूम है 
और तुम तो इतनी संगदिल हो मेरी जान 
कि मेरे ख़ाब में तुम्हारे तुम्हारे क़दमों की आवाज़ तक नहीं 
मुझे अपने ख़ाब में जगह दो मत दो 
मेरे ख़ाबों की पुकार पे ज़रा कान तो दो 
***

रक़ीब मेरी नींद की चादर चुराकर 
उसे धूप के खेतों में जला देता है 
मैं बेनींद की आँखों
धूप की चमकदार सफ़ेदी और धुएँ के बीच 
चीज़ों की जगह भूलता जाता हूँ 

यहाँ रखी थी माचिस 
यहाँ था नमक का मर्तबान 
यहाँ समेटकर रखे गए थे पुराने दुःख 
यहाँ रखे गये थे पागल अलफ़ाज़ 

लेकिन कोई चीज़ अपनी जगह पर क्यूं नहीं मिलती 

मेरे बिस्तर की जगह पर ताबूत रखी है 
मेरे इबादतख़ाने में कुफ़्र रखे हैं 
और तेज़ाब भरा है सुरमेदानी में 
***

ये सारी पहेलियाँ मैं पहली सुबह हल कर लूँगा 
और चीज़ें अपने मायनों में लौट जाएंगी 

मैं नींद की गोलियों की शीशी 
बस की खिड़की से बाहर फेंकने के सपने से बाहर 
फेंक दिया गया मुसाफ़िर नहीं हूँ नसीब 

ये बात बिलकुल साफ़ है कि क़त्ल रक़ीब ही का होना है
ख़ून मेरी ही आस्तीन के कफ़ पर लगना है
मुकाबला कभी कोई था ही नहीं 
चाँद को मेरे ही जाम में उतरना है 

फिर भी कोई शै है के मुझे उदास किये जाती है 
और उस शै का पता सिर्फ़ तुम्हें मालूम है.
***


                                                                                   सबद पर महेश की अन्य कविताएँ : यहाँ )

Comments

imupasana said…
बेहद सुंदर कविताएँ! दूसरी और तीसरी तो बेहतरीन
neera said…
बहुत सुन्दर!
Gaurav Sharma said…
बहुत दिलकश
Amar Singh said…
बेहद अच्छी कविता।
kuch tareefain.....shabdon ki mohtaaj ho jati hein
Munna Kumar said…
माशूका की नींद में सरक जाऊँ दबे पाऊँ .
भाई ऐसी नींद मुझे भी चाहिए ।
उफ्फ ..कमाल है।
कौन सी बात छोड़ दें, कौन सी रखी जाए.. हर बात पे आह उठती है।
😊रक़ीब की भी किस्मत कि उसे इतनी शिद्दत से कोई महसूस करता है।
लाजवाब👌
Gaurav Sharma said…
तुम्हारी तर्ज़ो-रविश जानते हैं हम क्या है
रक़ीब पर है अगर लुत्फ़ तो सितम क्या है
- मिर्ज़ा ग़ालिब

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