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Showing posts from June, 2017

महेश वर्मा की लम्बी कविता : रक़ीब

रक़ीब

रक़ीबमाशूकाकेख़ाबमेंबुदबुदाताहै औरउसदोपहरमेरीनींदपर बर्फ़जमीहोतीहै
मैंबर्फ़केनीचेसेअपनाख़ूनआलूदाहाथनिकालकर किसीकोबुलानाचाहताहूँ माशूकाअपनीप्यारीचीलकोकिशमिशखिलारहीहोतीहै
मुझेदोघड़ीकीनींदचाहिये नींदकेगैरहाज़िरख़ुदा! मुझेनींदचाहियेकिअपनेख़ाबकाकोईदरवाज़ाखोलकर माशूकाकीनींदमेंसरकजाऊँदबेपाँव
मुझेरक़ीबकेहौसलेऔरऔरअपनेख़ंजरकीप्यास दोनोंकीफ़ितरतमालूमहै