Friday, February 03, 2017

सपने में पिया पानी: कुछ कविताएं


(हिन्दी के प्रमुख युवा कवियों में से एक समर्थ वाशिष्ठ का पहला हिन्दी कविता संग्रह "सपने में पिया पानी" नाम से दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में राजकमल प्रकाशन से छप कर आया। आगे संग्रह से कुछ चुनी हुई कविताएं और संग्रह पर कवि-वक्तव्य दिया जा रहा है।)


अपनी पहली कविता-पुस्तक के बारे में...

मेरी कविता हिन्दी में शुरू नहीं हुई थी। बाईस साल की उम्र तक मैं लगभग पूरी तरह भारतीय अंग्रेज़ी में लिखता रहा। छपा भी, संग्रह भी आए। फिर महसूस हुआ कि कविता भाषा की प्रयोगशाला तभी बन सकती है जब उस भाषा में लिखा जाये जिसे गढ़ने की पूरी आज़ादी हो। हिन्दी की तरफ रुझान होने का कारण एक और भी रहा। कविता को मैंने हमेशा अपने जीवन में ईमानदारी से एक बेहद ज़रूरी जगह दी, बिना किसी अपेक्षा। यही ईमानदारी थी कि ग्यारह साल पहले जब मैंने अंग्रेज़ी में एक ख़ास तरह के तकनीकी लेखन को अपना पेशा बनाया, तो दोबारा अंग्रेज़ी में मुझसे कविता न हुई। मेरी कविता ने फिर हिन्दी में ही विस्तार पाया।

पिछले पंद्रह बरस के दौरान लिखी गईं कविताओं से बना यह संग्रह अब आपके सामने है। 

                                                                                    © अनुराग वत्स, 2017 


कुछ कविताएं

जीना


वैसे नहीं
मेरे बच्चे
जैसे काठ की कोठरी में
क़ैद रहती है अखरोट की गिरी
तोड़े जाने का करती इंतज़ार

वैसे नहीं जैसे बढ़ती जाती हैं कुछ मूर्ख नौकाएँ
रेडियो पर गूँज रहीं
तूफ़ान की चेतावनियों के बावजूद

रहना तरल
पेड़ की पत्तियों के बीच
टपकती बूंद के मानिंद
मिले जब किसी सीप की ओट
धड़कती, जीवित
कर लेना अपना एक घर सुदृढ़

लड़ना
कि सबको नहीं मिलता
यहाँ एक घर

अपनी धुन की सुनना

सूरज रखेगा तुम्हारे सर पर हाथ
***

दो साल की तुम


मुमकिन नहीं अब
कि तुम्हें निकाल ले आऊँ
दुनिया के सारे खतरों से
ऐन बचाकर
बिना किसी खरोंच
मुनासिब भी नहीं शायद

कि रंग भर रही हो तुम
इस दुनिया में बेधड़क
नीले हैं पेड़ और गुलाबी गायें
और काली तुम्हारी विस्मय से भरी आँखें
उस सूरज को डूबते देख
जो करोड़ों बरसों से डूब रहा है यूँ ही
लाल और नारंगी के बीच
किसी अनाम रंग में चमक खोता

जबकि किसी दुकान में जगमगाती
ज़मीन से दो फुट ऊपर रंगीन
बत्तियों को छूने से महसूस हुई तपिश
ही सिखाती है तुम्हें
ऊष्मा और प्रकाश का पुरातन संबंध

ढूंढ़ लिए हैं तुमने
घर में छिपे कई कोने
जहाँ इकट्ठा करती जा रही हो तुम
नापसंद खिलौने
खाना जो मजबूरी है तुम्हारी
माँ को दिखाने के लिए
अनामंत्रित उन कोनों में ताँक-झाँक
अच्छी नहीं लगती तुम्हें

खरगोश के उछलने-कूदने से
मिलने लगते हैं जब तुम्हारे पैरों के निशान
बौने पड़ जाते हैं मेरे उपाय
समझाने के सारे प्रयास
डाँट भी डपट भी
ग्लानि है मुझे उन क्षणों तक की
जब तुमसे सख़्ती करने का
मन में आया सिर्फ़ ख़्याल

तीस सालों के अंतराल से
देखता हूँ तुम्हें
मन में मुस्कराता
कि ऐसा ही रहा हूँगा मैं भी
जो इतने पत्थरों से ठोकर खाई
कहीं भी न पहुंचते हुए
***

पराजय


मैं तुम्हें हारना सिखाऊंगा
जैसे मैं तुम्हें सिखाना चाहता हूँ
जीतना

जीतो तुम शायद सिर्फ़ एक बार
हारोगी सौ बार
खेदपत्र, निपट अकेली चुप्पियाँ
साथ चलेंगी तुम्हारे भी
कुछ भी बड़ा करने के प्रयास में

तुम सीखोगी कि गरिमा है एक विशेष
सर झुकाए मैदान से बाहर निकलने में
यह जानने में कि बेहतर था तुम्हारा प्रतिद्वंदी आज
पर ज़रूरी नहीं कि ऐसा हो
कल भी

मैं सिखाना चाहता हूँ तुम्हें
कि चुननी पड़ती है कई बार हार
ताकि बड़ी हो तुम्हारी जीत एक दिन
ये भी कि निरंतर जीतने की होड़ के
अंत में मिलती है सिर्फ़ हार

एक दु:स्वप्न
जिसमें बचे रहते हैं सिर्फ़ तीन मिनट
और पूरा का पूरा प्रश्नपत्र

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प्रवास में याद


1

मैंने जाना नहीं तुम्हें
जब थीं सोलह की
और ढूढ़ता रहा बरसों
तुम्हारे चेहरे पर उस उम्र का तेज।

तुमने खोदा मुझे बचपन से अचानक
और सींचा, ढाला, बनाया
अपने लिए
चुपचाप।

2

तुम कभी नहीं जान पाओ शायद
मैं कैसे जिया तुम्हारे बगैर

इकलौती आरामकुर्सी रही खाती हिचकोले
रोशनदान को तरसते कमरे के बीचोंबीच

जैसे मां ढके रही मेरे जुर्म-दोष बरसों-बरस
जूठे बर्तनों पर औंधी पड़ी रही तश्तरियां

बहुत कुछ ज़ाया गया शहर की नालियों में
जो लगना था कभी मेरे अंग

बहुत कुछ ख़ाक़ गया पकते वक़्त
जो कल्पना में रहा सुगंधों से भरपूर

सुबहों में सीढ़ियां बस उतरी हीं उतरी हीं
बिखरी रही मैली कमीज़ें हर ओर

खाली राशन डिब्बों से परेशान कमरा मेरा
सहेजे रहा मेरे दुर्गुणों को हर छोर

कि तुम आओ और चिल्ला सको बेधड़क
कि क्या मचा रक्खा है ये सब?

3

कितने भय थे मेरे भीतर
जो कहे नहीं कभी

अपनापे की चंद रातों में
तुम ढूंढ़ती रही मेरी आंखों में जो कुछ
एक सर्द कमरे की
दीवारों पर चिपका आया था मैं

लैपटॉप की सजीली कुंजियों पर
टूटती रही मेरी वर्तनी
आवाज़ की घबराई भर्राहट
छिटक फेंकी संचार तरंगों ने दूर

सुबह की कच्ची नींदों में
एक मैले तकिए को भींचे पास
मैं देखता रहा
उगते सूर्य के दु:स्वप्न

बहुत नहीं चाहा था मैंने कभी
फिर भी बहुत मिला
और मैं चाहने लगा और भी ज़ियादा।

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समर्थ वाशिष्ठ की कविताएं वक़्त वक़्त पर सबद की शोभा बढ़ाती रहीं है। इन कविताओं को यहां: 1, 2, 3, 4 पढ़ा जा सकता है।