Friday, October 06, 2017

इशिगुरो और नोबेल : कुछ फ़ौरी बातें - गीत चतुर्वेदी



कज़ुओ इशिगुरो


पिछले कुछ बरसों से अक्टूबर के महीने की शुरुआत के तीन रिचुअल्स रहे हैं- साहित्य के नोबेल पुरस्कार के पूर्वानुमानों में हारुकि मुराकामी को सबसे प्रबल दावेदार बताना, नोबेल समिति द्वारा अपने कॉन्फ्रेंस रूम का बड़ा-सा दरवाज़ा खोलकर माइक लिए खड़े पत्रकारों के सामने किसी एक नाम का उच्चारण करना और उसके बाद दुनिया के अधिकांश हिस्सों  में हारुकि मुराकामी के प्रति एक शोकगीत का सामूहिक गायन शुरू हो जाना। मुराकामी के प्रशंसकों को यह समझ में ही नहीं आ रहा है कि आख़िर उनमें ऐसी कौन-सी कमी है, जिसके कारण नोबेल पुरस्कार उनसे छिटक जा रहा है। इस समय वह दुनिया के सर्वश्रेष्ठ लेखकों में से हैं। अपनी हर नई किताब से वह अपनी श्रेष्ठता को पुख़्ता कर देते हैं। पिछले दो दशकों में वह एकमात्र ऐसे लेखक हैं, जिन्हें इतने अधिक लोग चाहते हैं कि वह नोबेल पा लें। इतना प्रेम इस दौर में किसी साहित्यिक लेखक को नहीं मिला।

ऊपर के इस पैराग्राफ़ को अगर एक संकेत की तरह पढ़ा जाए, तो इसमें सिर्फ़ एक बदलाव करना होगा- मुराकामी की जगह आप अपने लेखक का नाम रख लीजिए. कोई चाहे, तो न्गुगी वा थियोंगो का नाम रख सकता है, तो कोई फिलिप रॉथ का। को उन, अदूनिस से लेकर आन्त्यूनेज़ तक का नाम रख सकते हैं, क्योंकि हर साल यह उम्मीद लगती है कि शायद इन्हें या इनमें से किसी एक का मिल जाएगा, पर मिलता वह किसी और को है।

खेल का आनंद, मात्र रहस्यों से बढ़ता है। इसे एक पटकथा की तरह देखा जाए-  किसी काम के लिए प्रेमिका अपने प्रेमी को बहुत आशा से देखती है,  प्रेमी टाल जाता है, प्रेमिका नाराज़ होकर सवाल पर सवाल करती है, प्रेमी किसी भी सवाल का जवाब नहीं देता और आंखों से ओझल हो जाता है। प्रेमिका ख़ूब रोती है। अकेली रह जाती है। वह अकेले में ख़ुद से वही सवाल पूछती है, जो उसने प्रेमी से पूछा था। अगले दिनों में उसे जो कोई मिलता है, उससे वह सवाल करती है। लोग अपनी तरह से जवाब दे देते हैं, लेकिन प्रेमी ने तो कोई जवाब ही नहीं दिया था। वह चुपचाप चला गया था। प्रेमिका उसे खोजने के लिए निकल पड़ती है। उसे खोजकर अपने सवालों के जवाब वह उससे मांगेगी। प्रेमी ग़ायब हो चुका है, लेकिन प्रेमिका के भीतर का प्रेम और जवाबों को पा लेने की आकांक्षा समाप्त नहीं हो रही। क्यों? क्योंकि सवाल अनसुलझे छूट गए। जिस प्रेम में भी प्रश्न, अनुत्तरित रह जाते हैं, वह प्रेम कभी समाप्त नहीं होता, ताउम्र ज़िंदा रहता है। प्रश्नों का रहस्य प्रेम को जिलाए रखता है।

नोबेल का खेल, प्रेम के इस खेल की तरह है। जिन सवालों को हम लोग बार-बार, हर साल उठाते हैं, उसी प्रेमी का भेस धरे हुए, नोबेल समिति उनमें से किसी सवाल का जवाब नहीं देती, और कुछ नए सवाल हमें पकड़ाकर चली जाती है। जो सवाल मुराकामी के संबंध में पूछा जा रहा है, वही सवाल बोर्हेस और नबोकफ़ के संबंध में भी पूछा जा सकता है। यह प्रक्रिया अनवरत चलती रहेगी। बीस साल बाद मुराकामी जैसे ही अवसर किसी और के होंगे और उसके बारे में भी यही सवाल पूछे जाते रहेंगे। जवाब कभी नहीं आने वाला।

हारुकि मुराकामी
मुराकामी साल-दर-साल नोबेल से जिस तरह दूर जा रहे हैं, उनका क़द उतना ही बढ़ता जा रहा है। उन्हें नोबेल न मिला, तो देखिएगा, आने वाले बरसों में वह अपने आप प्रूस्त, जॉयस, नबोकफ़ और बोर्हेस की पंगत में बैठे हुए मिलेंगे। महज़ इसलिए नहीं कि इन सबको ही यह पुरस्कार नहीं मिला, बल्कि इसलिए कि नकारी गई श्रेष्ठताओं की मान्यता ज़्यादा पुख़्ता होती है। मुराकामी ने अपने साहित्य में जो नई ज़मीनें तोड़ी हैं, उन्हीं को आधार बनाकर कुछ लोग नए उपन्यास लिखेंगे और नोबेल पा लेंगे। जैसे प्रूस्त, जॉयस और बोर्हेस की ज़मीनों पर लिखने वालों ने पाए हैं। जैसे प्रूस्त की ज़मीन पर लिखने वाले कज़ुओ इशिगुरो को मिला है, लेकिन यह पुरस्कार प्रूस्त से दूर ही रहा। परिहास में यह कहा जा सकता है कि विडंबना है, फूल हमेशा भँवरा ही खिलाएगा लेकिन उस फूल को कोई राजकुँवर ले जाएगा।

इस निबंध की शुरुआत होनी चाहिए थी कज़ुओ इशिगुरो से, लेकिन हो गई मुराकामी से। ‘किसे नहीं मिला’ ने ‘किसे मिला’ को आच्छादित कर दिया। किंतु इसका अर्थ यह नहीं लेना चाहिए कि इस बार का नोबेल पुरस्कार किसी अयोग्य को मिल गया है। इशिगुरो दुनिया के श्रेष्ठतम लेखकों में से हैं और उन्हें नोबेल पुरस्कार मिलना एक योग्य और बड़े लेखक को मिला सम्मान ही है। सवाल बस इतना है कि यदि इशिगुरो को यह सम्मान मिल सकता है, तो मुराकामी को क्यों नहीं मिल सकता? क्या न अच्छा होता कि पहले मुराकामी को मिल जाता, बाद में इशिगुरो को मिल जाता? और इस इशिगुरो के साथ मुराकामी को न मिलने का ही सवाल क्यों उठाया जा रहा है, थियोंगो को न मिलने का सवाल क्यों नहीं उठाया जा रहा? जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, इन सारे सवालों का कोई जवाब नहीं हो सकता, और जो भी जवाब नोबेल समिति या किसी की ओर से आए, संभवत: उन जवाबों पर सहमत भी नहीं जा सकता। योरप में इशिगुरो को पर्याप्त मान्यता प्राप्त है और इस नाते उनको मिले पुरस्कार का स्वागत ही किया जाएगा, जिसमें कुछ भी ग़लत नहीं है, लेकिन इस बात से भी कम ही लोग इनकार कर पाएँगे कि यह पुरस्कार उन्हें उस समय दिया गया है, जब उनसे बेहतर कुछ लेखक प्रतीक्षालय में बैठे हुए थे।

इशिगुरो और मुराकामी में कुछ भिन्नताएं हैं और कुछ ख़ास अभिन्नताएं भी हैं। जैसे कि दोनों ही जापान से रिश्ता रखते हैं। मुराकामी पूरी तरह जापानी हैं।  वह उन अर्थों में जापानी हैं, जिन अर्थों में कुरोसावा जापानी थे। कुरोसावा ने अपनी थीम और शैली पश्चिम से प्राप्त की थी, उन्होंने पश्चिम के कला-जगत को कुछ नया नहीं सिखाया, बल्कि पश्चिम की शैलियों से सीख पाकर उसे अपनी कला में पिरोया। जापान की स्थानीय, अति-नाटकीय, भावुक, प्राचीन काबुकी नाट्यशैली को थोड़ा आधुनिक रूप देते हुए अपनी फिल्मों में शामिल किया। इस तरह उनकी फिल्मों में कला का एक मिश्रित संसार बना। उनके सिनेमा से स्थानीय जापानी भी प्रभावित हुए और पश्चिम में भी उन्हें तुरत लोकप्रियता मिली। कलाओं और शैलियों का ऐसा मिश्रण मुराकामी में भी दिखाई देता है। उनके नैरेशन का तरीक़ा और उत्तर-आधुनिक शैली पूरी तरह पश्चिमी है, लेकिन सोचने का तरीक़ा और परिवेश जापानी है। ‘नॉर्वेजियन वुड’, ‘वन क्यू एट फोर’ में चरित्रों का जो मूल्य-संकट है, वह न केवल जापानी बल्कि ठेठ एशियाई है, पूर्वी है। मुराकामी को भी स्थानीय और वैश्विक दोनों ही स्तरों पर लोकप्रियता मिली।

इशिगुरो सिर्फ़ नाम से जापानी हैं, बाक़ी पूरी तरह ब्रिटिश हैं। छह साल की उम्र में ही उनका परिवार इंग्लैंड आ गया था और तब से वह पूरी तरह ब्रिटिश हैं, लेकिन परिवार से उन्हें जापानी संस्कृति का एक ख़ास हिस्सा भी मिला है। उनका नैरेशन ज़ाहिर तौर पर पश्चिमी है, लेकिन सोचने का उनका तरीक़ा कहीं-कहीं जापानी संकेत दे देता है। उनके पास ठेठ ब्रिटिश या यूरोपीय तरीक़ा-मात्र नहीं है। उनके उपन्यासों का दार्शनिक स्वाद शायद उस जापानी स्पर्श के कारण आता है।

दोनों में कलात्मकता है, दोनों के पास लोकप्रियता है, और उनमें पहले भी कई बार तुलना होती रही है। ज़ाहिर है, दोनों एक-दूसरे के काम के प्रति सम्मान से भरे हुए रहते हैं। कुछ बरस पहले जब मुराकामी से पूछा गया कि वह अपनी पसंद के दो-तीन अंतर्राष्ट्रीय लेखकों के नाम बताएं, तो उन्होंने सबसे पहले इशिगुरो का ही नाम लिया था। उसके कई साल पहले ही इशिगुरो कह चुके थे कि मुराकामी, वर्तमान दुनिया के पांच श्रेष्ठतम लेखकों में से एक हैं।

इशिगुरो के उपन्यास विशालकाय हैं। आकार से ज़्यादा अपनी महत्वाकांक्षा में विशालकाय। मनुष्य के जीवन में दुख से पैदा होने वाली विसंगतियों और उसकी आध्यात्मिक विवशताओं को छूना अपने आप में एक विशालकाय महत्वाकांक्षा होती है। उपन्यास दरअसल एक जंक्शन होता है, जहाँ कई दिशाओं से ट्रेनें आकर रुकती हैं और आगे कई दिशाओं की ओर बढ़ जाती हैं। आत्म-संधान, दुख, हानिबोध और मृत्यु- उपन्यास नाम के इस जंक्शन के चार प्रमुख प्लेटफॉर्म हैं। और यही जीवन का चक्र भी है। इसका क्रम आगे-पीछे होता रहता है। पुरानी कहावत है कि हमारा जीवन, दरअसल जीवन नहीं है, यह हमें मिला हुआ एक मृत्युदंड है, एक क़ैद है। जिस क्षण कोई शिशु पैदा होता है, उसी क्षण उसे मृत्युदंड मिल जाता है। तुम पैदा क्यों हुए? पैदा होना एक अपराध है। तुमने यह अपराध कर दिया है। अब तुम्हें मरना ही होगा। लो, तुम्हें जीवन-रूपी मृत्युदंड दिया जाता है। सब अपनी-अपनी सज़ा भुगतते हैं। कोई बीस साल की उम्र तक भोगता है और मृत्यु के रूप में आख़िरी दंड पाता है, तो कोई सत्तर साल की उम्र तक भोगता है। सज़ा घोषित होने और सजा पूरी होने के दो बिंदुओं के बीच पूरी यात्रा चलती है। मनुष्य बार-बार यह पता करना चाहता है कि वह कौन है, इस क्रम में उसे जीवन में कई तरह की हानियों को झेलना पड़ता है और उसके पास दुख आता है। दुखों से अनुभूतियाँ बनती हैं, अनुभूतियाँ विचार में बदल जाती हैं और विचार के आने के साथ ही फिर से ख़ुद की तलाश शुरू हो जाती है। सारे विचार दरअसल, दुख के वंशज होते हैं। सारी कलाएँ अंतत: दुख की ही आराधना करती हैं। दर्शन के मूल में दुख है। जीवन में मृत्यु के कई व अद्वितीय तरीक़े होते हैं, लेकिन साहित्य उन तरीक़ों में से महज़ कुछ को ही अपनाता है, और कई बार मृत्यु के नए तरीक़ों की कल्पना करता है।

दुख और हानिबोध इशिगुरो के उपन्यासों का मूल स्वर है। ‘द रिमेन्स ऑफ द डे’ के लिए उन्हें बुकर पुरस्कार मिला था। नायक एक बड़े मालिक के घर में नौकर है। वहां एक महिला सहकर्मी के साथ उसकी निकटता है। दोनों में ख़ूब बातें होती हैं, वे प्रेम के क़रीब तो पहुंचते हैं, लेकिन उनमें से कोई भी हाथ बढ़ाकर प्रेम के कक्ष का द्वार नहीं खोल पाता। इस तरह हर बातचीत में वे प्रेम के क़रीब पहुंचकर भी छूछे हाथ लौट आते हैं। बरसों बाद नायक को उस सहकर्मी का ख़त मिलता है, जिसमें वह अपनी शादी का वर्णन करती है। नई नौकरी की तलाश, पुराने मालिक के प्रति वफ़ादारी के क़िस्सों को याद करते, नाज़ियों के साथ अपने संबंधों को बताकर भी छिपा ले जाते हुए नायक किन्हीं परिस्थितियों में उस सहकर्मी के जीवन में वापस पहुंचता है। महिला की शादी को बीस साल हो चुके हैं और जल्द ही उसे एक नाती होने वाला है। वे आधे से अधिक उपन्यास में अपने पुराने रिश्ते और दूसरे विश्व युद्ध के पहले के बरसों को याद करते हैं। महिला कहती है कि उसे लगता है, शादी करके उसने ग़लती की, और इसी के आसपास नायक को अपना हानिबोध समझ में आता है कि वह जिसे पा सकता था, उसे न पा सकना ही उसकी सबसे बड़ी हानि है। यह हानिबोध उसके अवचेतन में पहले से ही है, इसीलिए वह बहुत धीरे-धीरे अफ़सोस करता है कि उसने बरसों तक जिस मालिक की इतना सेवा की, वह कोई बहुत अच्छा आदमी, शायद, नहीं था। उसकी सेवा करने में उसने ख़ुद को इस तरह खपा दिया कि उसके पास अपने ख़ुद के जीवन व आध्यात्मिक विकास के लिए कोई समय ही न बच पाया। जिस औरत के प्रति वह आकर्षित था, वह उसे नहीं पा सकता, क्या वह अब भी उसके प्रति आकर्षित है या शायद नहीं है। अवचेतन का यह हानिबोध उसके व्यक्तित्व को बदलता है और उपन्यास के आधे होने तक एक नई आदत विकसित कर लेता है- वह सबसे हंसी-मज़ाक़ करना चाहता है। हानिबोध कई बार आपको विवश करता है कि आप हास्यबोध में शरण खोजें। हंसाने का हुनर उन्हीं के पास आता दिखता है, जिन्होंने जीवन में बहुत कुछ खोया हो।

ऊपरी तौर पर यह प्रेम के खो जाने की एक साधारण कहानी है, लेकिन साहित्यिक कहानियों का सौंदर्य उनके प्लॉट में नहीं, कथा कहने के तरीक़े में छिपा होता है। इशिगुरो ने यह कथा बहुत अच्छे से कही है। उनकी भाषा भव्य नहीं है, वह सपाट लेखक हैं। इस सपाटपन को सादगी मानने में हिचक हो सकती है, क्योंकि उनके चरित्रों का अंतर्द्वंद्व इस सादगी के विलोम में खड़ा होता है। सादगी जटिलताओं को जटिल रूप में चित्रित नहीं कर पाती, जबकि इशिगुरो में जटिलताएं पर्याप्त हैं, बस, वे अक्सर सपाट जटिलताएं होती हैं। यह सिर्फ़ मैं नहीं कह रहा, बल्कि दुनिया के कई आलोचक, बहुत पहले ही कह चुके हैं कि इशिगुरो, रूढ़ियों या क्लीशे का बेहद निडर और प्रचुर प्रयोग करते हैं। कला के भीतर यह कोई अच्छी आदत नहीं है, लेकिन जैसा कि आजकल क्रिकेट में कहा जाता है, रन आने ज़रूरी हैं, कहां से आएं, बैट के स्वीट स्पॉट पर लगकर आएँ या किनारा लगकर, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता- इसी बात के आधार पर यह सोचा जा सकता है कि कथा का अच्छा बन जाना ज़रूरी है, भले वह अच्छाई छप्पन तरह के क्लीशे का प्रयोग करके ही क्यों न आए।

पिछले साल इशिगुरो की सबसे चर्चित किताब आई – ‘द बेरीड जाएंट’। दुनिया-भर में इस किताब का जमकर प्रचार हुआ था और इसकी बहुत प्रतीक्षा भी की गई थी। इशिगुरो को नोबेल पुरस्कार मिलने में संभवत: इसी किताब की महत्वपूर्ण भूमिका है। यह उपन्यास ऐतिहासिक विस्मृति को केंद्र में रखता है। छठी या सातवीं सदी का इंग्लैंड है, जो अब से बहुत अलग है। एक ऐसा नैरेटर है, जो संभवत: दोनों कालखंडों में एक साथ विचरण करता है और शुरुआत में दोनों के बीच के अंतर को बताता है और फिर जैसे ग़ायब ही हो जाता है। किंतु वह कई इशारे दे जाता है, जो आगे चलकर खुलते हैं। उस ज़माने में सैक्सन और ब्रिटिश लोगों में संघर्ष होता रहता था। एक भयानक महायुद्ध के बाद कहानी का असली प्लॉट सामने आता है। दोनों समुदाय आराम से रह रहे हैं, और तभी उनका ध्यान जाता है कि वे सभी एक विस्मृति का शिकार हो रहे हैं। पुरानी बातें तो उन्हें याद ही नहीं आतीं, और एक-डेढ़ महीने जितनी नई बातें भी लोग धीरे-धीरे भूलने लगते हैं। एक अधेड़ दंपति, एक्सल और बिआट्रिस पाते हैं कि वे भी सबकुछ भूल रहे हैं। उनका एक बेटा था और अब वह उन्हें मिल नहीं रहा। वे उसे भूलने लगते हैं। इस भूलने के बाद भी उन्हें उसकी याद है और वे उसे खोजने निकल पड़ते हैं, यह विचित्र है। वे लोग इस विस्मृति के लिए एक नया शब्द गढ़ते हैं- मिस्ट, धुंध या कोहरा। यानी एक कोहरे के कारण स्मृति और विस्मृति में दो फाँक बन गई है। बेटे को खोजने के दौरान उनकी मुलाक़ात कई लोगों से होती है, कहानी में ड्रैगन्स, राक्षस, अजीब मिथकीय जानवर भी आते हैं, जादुई यथार्थवाद की तरह नहीं, बल्कि सीधे तिलिस्मी शैली में। एक्सल और बिआट्रिस को पता चलता है कि विस्मृति की यह धुंध कुछ और नहीं है, बल्कि एक मादा ड्रैगन द्वारा छोड़ी गई साँस है। वह जितनी बार साँस छोड़ती है, वहाँ के मनुष्यों की स्मृति का उतना लोप होता है, विस्मृति उतनी बढ़ती जाती है। स्मृति चाहिए, तो उस मादा ड्रैगन को मारना होगा। और किसी न किसी तरह वे उसे मारने में सफल हो जाते हैं। स्मृति लौट आती है। प्यार की भी स्मृति लौट आती है, तो आपसी नफ़रत की भी। ब्रिटिश और सैक्सन, जो विस्मृति में शांति से रह रहे थे, स्मृति लौट आने से एक दूसरे के प्रति अपनी शत्रुता को फिर से जान लेते हैं और लड़ पड़ते हैं। इस तरह स्मृति का आना भयावह ही साबित होता है। जो जाएंट यानी दानव, बेरीड यानी दफ़न था, वह फिर उभरकर आ गया है।

जीवन का सुख अतीत को भूलने से भी पाया जा सकता है। अतीत को याद करने से दुख ही दुख है। यह इस उपन्यास का कथा-सार है। इसमें हॉबिट है, हैरी पॉटर है, प्रूस्त हैं, चेखव हैं, बोर्हेस हैं, दोस्तोएव्स्की हैं, और जाने क्या-क्या है, इशिगुरो ने कई जगहों से चीज़ें प्राप्त की हैं और इस उपन्यास में निवेश किया है। लेकिन मेरी नज़र में, यह निवेश बहुत ज़्यादा डिविडेंड नहीं देता, क्योंकि ऐसी थीम पर बोर्हेस, कम पन्नों में कहीं बड़ा काम करके जा चुके हैं, प्रूस्त ने मनोविज्ञान की एक पूरी शाखा बना दी है। चेखव की एक कहानी में मुख्य पात्र अपने मरे हुए बेटे को इसी तरह भूल जाता है। ड्रैगन्स का मायाजाल, जीवन की विस्मृतियों के साथ जुड़े जीवन-दर्शन को हम हॉबिट और हैरी पॉटर में देख-पढ़ चुके हैं। फिर इशिगुरो इस उपन्यास में हमारे लिए नया क्या देते हैं? कुल मिलाकर वह एक प्रतीक-कथा की प्रस्तावना करते जान पड़ते हैं कि स्मृति के विशाल दानव को ज़मीन के नीचे अच्छी तरह दफ़न कर दो, तो जीवन शांतिपूर्वक व्यतीत हो सकता है। इक्कीसवीं सदी के एक पाठक के तौर पर मेरी दिलचस्पी प्रतीक-कथा पढ़ने में नहीं रहती। मैं उसके लिए मिथॉलजी पढ़ लिया करता हूं, क्योंकि उसे पढ़ते समय मेरा मन मुझे बार-बार बताता है कि यह भले मैं इक्कीसवीं सदी में पढ़ रहा, यह तीन हज़ार साल पहले की कल्पनाएं हैं। किसी भी सुंदर कहानी को प्रतीक-कथा में तब्दील करके ख़त्म किया जा सकता है। जैसे ही लेखक अपनी ओर से प्रतीकों का निवेश करता है, वह पाठक की कल्पनाशक्ति को कुंद करता है, उससे कहता है कि दूसरी दिशाओं में जाकर मत सोचो, उतना ही सोचो, जितना मैं तुम्हें बताना चाहता हूं। और यह श्रेष्ठ कला का गुण क़तई नहीं हो सकता। इसीलिए, पिछले साल इस उपन्यास को पढ़ने के बाद मैंने इसे उनकी एक विराटकाय असफलता माना था, और आज जब उन्हें नोबेल पुरस्कार की घोषणा हुई, तो मुझे थोड़ा आश्चर्य भी हुआ। यह भी सही है कि दुनिया के कई आलोचक इस उपन्यास को एक सफलता भी मानते हैं। साहित्य हमेशा से आस्वाद का विषय रहेगा।

चूंकि इशिगुरो के पास सुलझा हुआ क्राफ्ट है, कहानी कह जाने की कला है, वह इस किताब को हमारे भीतर  से गुज़ार देते हैं। पर गुज़रकर वह ऐसी जगह पहुंचती है, जो हमारे लिए नई नहीं होती। कहीं न पहुंच पाने का भाव श्रम का व्यय है।

उनकी सबसे अच्छी किताब ‘नेवर लेट मी गो’ है। ‘द बेरीड जाएंट’ के प्रकाशन के पूर्व जो उत्सुकता व्याप्त थी, उसका प्रमुख कारण ‘नेवर लेट मी गो’ की विचारगत सुंदरता ही थी। इसकी कहानी ऐसे है- सरकार क्लोनिंग के ज़रिए कुछ बच्चों का ‘उत्पादन’ करती है। उन्हें एक हॉस्टल में रखा जाता है। बाक़ायदा स्कूल भी भेजा जाता है। वे बड़े भी होते रहते हैं। साधारण क्रिया-कलापों में लगे हुए हैं। पढ़ रहे हैं। प्रेम कर रहे हैं। जीवन के सौंदर्य को अनुभूत कर रहे हैं। और बड़े सपने भी देख रहे हैं। लेकिन उनका ‘उत्पादन’ एक ख़ास उद्देश्य के लिए किया गया है। उनके शरीर के सारे अंग स्वस्थ हैं। जब साधारण ब्रिटिश नागरिकों को अंगों की ज़रूरत होती है, इन बच्चों के अंग निकालकर उनमें प्रत्यारोपित कर दिए जाते हैं। ज़ाहिर है, अंग निकल जाने के बाद उस बच्चे की या तो जान चली जाएगी या वह अनुपयोगी हो जाएगा और सरकार उसे ढोने के बजाय मार डालेगी। यह प्लॉट ही अपने आप में भयावह मानवीय स्थितियों की ओर ले जाता है। फ़सल की तरह मनुष्य का उत्पादन। जैसे आप मुर्ग़ियाँ व अन्य जानवर पालते हैं, ताकि इंसान उसे व उसके अंडों को खाने के लिए उपयोग करे। विशिष्ट तकनीक के प्रयोग से मनुष्य का जानवर की तरह प्रयोग करना, हमारे भीतर के पशु का फोटो खींचकर दिखा देने जैसा है। बच्चों को पता है कि वे मारे जाएंगे, लेकिन वे कोई विरोध नहीं करते। वे लगातार अपनी नियति के आगे समर्पण करते हैं। यह इतना ताक़तवर प्लॉट है कि इशिगुरो की मुरझाई हुई, बेचमक, सपाट अंग्रेज़ी के बाद भी हम पूरी किताब पढ़ डालते हैं और अंत में लेखक की प्रशंसा ही करते हैं, मानवता के विशाल महास्वप्न में उसकी आस्था के कारण। एक बार एक पत्रिका ने सूची बनाई थी और पाठकों से आमंत्रित किया था कि वे अपने पढ़े उपन्यासों के दस सबसे उबाऊ दृश्यों को नामांकित कर उसके पास भेजें। ‘नेवर लेट मी गो’ के कुछ हिस्से उबाऊपन की उस प्रतिस्पर्धा में शामिल किए गए थे। इतने दिलचस्प प्लॉट के बाद भी इशिगुरो इस उपन्यास में अपने पाठक को झिलवा देते हैं, तो अपनी भाषाई मंथरता के ही कारण।

एक पाठक के तौर पर इशिगुरो के उपन्यासों के मुक़ाबले मैं कहानियों की उनकी किताब ‘नॉक्टर्न्स’ से अधिक मुतास्सिर हुआ था, जहां उनकी कल्पनाशीलता अनर्गल ‘वाइल्ड’ नहीं होती, उसमें वह जापानी कला-पद्धति वाबी-साबी के नज़दीक जाते हैं। आपस में जुड़ी हुई वे पांच कहानियां अलग तरह का इशिगुरो है। मनुष्य की बुनियादी अनुभूतियों के अधिक निकट खड़ा लेखक। मुझे लगता है, और ज़ाहिर है कि यह मेरी निजी सोच है, कि साहित्यिक लेखकों को भरसक मनुष्य के आसपास ही रहना चाहिए। उसे उन दुर्लभ कलाकारों में शामिल होना चाहिए जो मानते हों कि अब भी, भूख पूरी न होने पर मृत्यु हो सकती है, प्यास के बेहद हो जाने पर भी, और कोई प्रेम में डूबकर भी आत्महत्या कर सकता है, एक बम फटने,  ट्रेन के पलट जाने या ग़लत दवा की चार बूंदें पी लेने से भी हज़ारों लोग मारे जा सकते हैं। ज़रूरी नहीं कि इक्कीसवीं सदी की कला के भीतर सारी मौतें बाहर से आई उड़नतश्तरियों, दूसरे ग्रहों के अजीब सैनिकों, प्राचीन युग से इस युग में आ गए किसी डायनासॉर या गॉडज़िला या अनाकोंडा से ही हों। नए-नए व अविश्वसनीय तरीक़ों से होने वाली मृत्यु की कल्पनाओं के बजाय, मृत्यु के एग्जिस्टंग रूपों पर फिर से सोचा जाए। यह हमारी अनुभूतियों के ज़्यादा क़रीब होगा। और दूसरी बात-  व्यावसायिक कलाएँ तो उस रास्ते पर ‘ऑलरेडी’ चल ही रही हैं, साहित्यिक व गंभीर कलाओं को तो कम से कम मनुष्यता की असली उंगलियों को पकड़े रखना चाहिए।

‘नॉक्टर्न्स’ में वह जिस तरह वाबी-साबी को छूते हैं, उसी तरह अपने उपन्यासों में मूजो का स्पर्श करते हैं। दोनों ही जापानी कला-पद्धतियां हैं। दोनों का रिश्ता प्राचीन बौद्ध धर्म से है। बौद्ध भिक्षुओं के पास कला के कम ही औज़ार होते थे, इसलिए वे कम से कम चीज़ों के प्रयोग के साथ यथार्थ को हल्का-सा विरूपित, लगभग आदिम रूप में, अशुद्ध-सा दिखा देते थे। जैसे- एक गिलास। जब उसे कोई व्यावसायिक कंपनी बनाएगी, तो उसका आकार बहुत शुद्ध होगा, उसमें कोई दोष नहीं होगा, बेहद नपा-तुला, उसके किनारे तीखे होंगे, और उसकी रेखाएं एकदम सीधी होंगी। लेकिन जब एक कलाकार हाथ से गिलास को बनाएगा, तो उसकी रेखाओं को टेढ़ा-मेढ़ा कर देगा, उसके रूप को अशुद्ध कर देगा, क्योंकि रूप की अशुद्धि कला को सुंदर बनाती है। शुद्धतम रूप में व्यावसायिक मूल्य हो सकते हैं, कलात्मक मूल्य कम होंगे। ‘नॉक्टर्न्स’ में इशिगुरो इसी कला-रूप के पास जाते हैं। उस किताब में अनुभूतियां और चरित्र अशुद्ध हैं। प्रेम ठीक प्रेम जैसा नहीं है, और संगीत तो कभी संगीत जैसा होता ही नहीं। संगीत तो हमेशा एक कल्पना की तरह हमारे मन में बजता है, बाहर तो केवल ध्वनियाँ तैरती हैं।

उनके उपन्यासों में भी उनके चरित्र, नैरेशन के दौरान अपनी कमज़ोरियों और अक्षमताओं को उजागर करते चलते हैं। यह भी एक तरह का वाबी-साबी है। दूसरी चीज़ है मूजो। बौद्ध धर्म में जिसे ‘अनित्य’ कहा जाता है, उसी को जापानी में मूजो कहा जाता है। यानी हर चीज़ एक दिन नष्ट हो जाएगी, तुम भी और मैं भी, तो आख़िर संघर्ष कैसा? चीज़ों को उनके हाल पर छोड़ देने, उन्हें स्वीकार कर लेने, नियति के आगे चुप हो जाने की स्थिति का नाम भी मूजो है। इशिगुरो के उपन्यास एक ऐसी जगह जाकर ख़त्म होते हैं, जहां चरित्र अपने अतीत व वर्तमान के साथ एक ख़ास क़िस्म का सामंजस्य बना लेता है, अपने परिवेश में घुल-मिल जाता है, दुखों को उपेक्षित करके आगे बढ़ जाता है। यह कोई नकारात्मक भाव नहीं है, बल्कि जीवन में आगे बढ़ते रहने के भाव का सम्मान ही है। अधिक दुखद स्थिति का मूजो, भले हमारे ऊपर क्षणिक तौर से नकारात्मक प्रभाव छोड़े। दुख की अवस्था में दुख पर बात न करना, एक किस्म का मूजो है। यह कुरोसावा के जापानी सिनेमा में कम दिखाई देता है, लेकिन यासुजिरो ओज़ू की फिल्मों में ऐसे प्रयोग बहुत हैं, जब, अभी-अभी एक गहरे दुख से निकला व्यक्ति, दूसरे से कहता है, “कितनी अच्छी हवा चल रही है!”

इशिगुरो के उपन्यासों में बीच-बीच में ऐसे कितने ही मूजो प्रसंग आते हैं। ‘द बेरीड जाएंट’ में दोन किहोते या डॉन क्विग्जोट जैसा एक किरदार है, सर गैविन, उसकी उपस्थिति एक किस्म का मूजो है। वहीं ‘द रिमेन्स ऑफ द डे’ में नायक द्वारा बीच-बीच में किया जाने वाला परिहास भी मूजो है। इस तरह के मूजो-प्रसंग इशिगुरो को एक दार्शनिक स्पर्श भी दे देते हैं।
* * *

(गीत चतुर्वेदी के अन्य लेख यहां पढ़े जा सकते हैं।)

Monday, October 02, 2017

महेश वर्मा: छह नई कविताएं

                                                                                                                                       कवि की चित्रकृति


शेर दागना

फिरोज़ अख़तर फिरोज़ या किसी गांव के तख़ल्लसु वाले शायर दोपहर जब आये तो खासे प्यासे थे लेकिन पानी का गिलास हाथ आते ही उन्होंने शेर दाग दिया जो मेरे कान को छूता गुज़रा और  मेरे पुराने घर  की दीवार की पलस्तर में जा धंसा जहां से थोड़ी रेत और सीमेंट भुरभुरा कर झर गई. दाद न मिलने पर और एक शेर सुनाया जो मेरी नासमझी की दीवार से टकराकर थोड़ा और पलस्तर गिरा गया. थोड़ी देर में तो कमरा चांदमारी का मैदान हो गया था और आने वाले लोग थे कि चारों ओर आदिवासियों की तरह मरे पड़े थे और शेर थे कि क्लाशनिकोव की मैगजीन हुए जा रहे थे. अंत में अपनी शेरवानी, टोपी और अपना दीवान समेटकर जब वो चौकी से  से उठे तो उन्होंने क्षेत्रीय बोली में तम्बाकू मांगा.
***

मछलियाँ

एक मछली से तुम सबकुछ (का चित्र) बना सकते हो... मज़ाकिये चित्रकार ने अत्याधुनिका से कहा यहां तक कि एक फीमेल न्यूड भी. वह जरा भी चौंकती तो देहाती करार दी जाती सो  उसने आगे का दांव खेला-तो क्या एक स्त्री गुप्तांग भी ? पुरूष अब गंभीर भयभीत और परास्त कायांतरण की ओर घूम चुका है। अगले दृश्य में वह त्रासदी का नायक है जो इस मछलीघर में किसी विशाल मछली के पेट से निकला है. अत्याधुनिका के लिप्सटिक ठीक करने के दृश्य के बाद कैमेरा सीधे सार्वजनिक मूत्रालयों के रेखांकनों पर रोककर हम कास्ट/क्रेडिट्स दिखाना शुरू कर सकते हैं। फिल्म का नाम मछलियाँ.
***


मलेरिया

उस समय का किस्सा है जब इतना विकास हो गया था कि दो साल तक मालूम ही नहीं कर पाये कि मलेरिया था. खून जांच कराते कराते वह सुनहरा हो गया और उसकी भूख और उसका हास्यबोध जागृत हो गया. खाना अलबत्ता पच नहीं पाता था उसे और उसके लगातार मज़ाक डाक्टर,  नर्स और  मित्रों को. एक और दोस्त का किस्सा याद आया जिसका फिसड्डीपन सेरेब्रल मलेरिया से ऐसा दूर हुआ कि पुराने दोस्त उससे आंख नहीं मिला पाते थे  लेकिन बीच में थोड़ा हिंसक किस्म से सरक गया था. 
मलेरिया मिलते ही हास्पिटल में जश्न का सा माहौल हो गया डाक्टर्स एक दूसरे से गले मिलकर बधाईयाँ दे रहे थे, मिठाई मंगाने का प्रस्ताव किसी सीनीयर ने खारिज कर दिया वरना इस मरीज के मुंह में डाक्टर हलदकर जरूर लड्डू ठूंस देते जिसे मलेरिया मिला था इससे उसके प्रेक्टिकल जोक्स भी मरने तक रूक जाते. 
खुशी के बीच ऐसे भी वह मरा तो किसी का ध्यान नहीं गया.
***

कल्पनाहीनता 

मेरे पक्षी उड़ते तो कभी छत से कभी पंखे से टकराकर छितरा जाते इस तरह कि जमीन उनके टुकडा टुकड़ा शवों से नहीं चिन्दी चिन्दी काग़ज़ों से भर जाता. एक बार तो हद हो गई जब मैं आकाश की बात करते हुए उड़ने वाली मछलियों की बात तक नहीं लिख पाया जबकी यह उस समय की सभी बालपत्रिकाओं में बहुतायत से छपने वाली थीम थी. अक्सर मेरे कन्धे पर पंखे से भी नीचा उड़ने वाला उल्लू बैठा रहता और मिचमिचाती आंखों से दिन की धूप को देखता रहता. यद्यपि मैं खूब उँची छतों वाले कमरों में पला बढ़ा था और मैंने बचपन में उड़ते पक्षी को मार गिराने के शिकारी संस्मरण अपने दादाजी से खूब सुने थे.
***

पानी

कीचड़ बारिश थकान की अनगिनत रातों और खून के बीच हम एक दूसरे को एक रात देना चाहते थे. इससे पहले कि कोई उब हमें मार डाले या एक विचारहीन गोली हमारी खोपड़ी को छेदती निकल जाये. कीचड़ हमें चबा रहा था और बीच बीच में छोड़ देता तब अंधेरा हमें भूनने लगता. वह भूल जाता तो बारिश हमारी नग्नता पर छडि़याँ फटकारने लगती. थकन तो थी हीः वह जैसे सांस थी,सांस में घरघराहट की आवाज़.
लो यह मेरी देह कहता हुआ पुरूष कहने लगता और लो अंधकार, 
   और रूदन, 
   असामर्थ्य लोः उसका अर्ध्य लो, 
   लो पूर्वजों का अहंकार.
स्त्री देना चाहती थी अपने दुःख, अपनी देह, अपने अंधकार. चुप रहती. वह आशा के शब्द 
मांगती मांग लेती चोट. धरती बने रहने से उबी हुई वह सूर्योदय  होने पर किधर भी जा 
सकती थी निर्भय.
निर्धन दोनों हम लोग इतने कि पूछने भर पानी भी नहीं आसपास कि पूछें -पानी पियोगी ?
  पियोगे पानी ?
***

विवाह

उस समय जबकी कोहबर के वृक्ष और पक्षी भी सो गये थे, सप्तपदी के उनींदे समय को पुरोहित की कड़कदार आवाज़ ही तोड़ सकती थी. वह अब भी हर विवाह पर वही मज़ाक करके लोगों को जगा देने वाला मसीहा था.
रात ख़त्म होने को है, भाषा और उल्लास पहले ही ख़त्म हो चुके इसी समय मैं  वर-वधू- स्त्री-पुरूष के बीच एक बड़े से लाल फल को पकता देख पाया. वह निश्चय ही वासना का लाल फल था जो समूचे वायुमंडल की सांस तंग कर सकता था किसी क्षण.
आग जलाने का यत्न करते पुरोहित को भी जैसे अचानक इसका भान हुआ और उसके पलट कर देखते वर-वधू खड़े हो गये जबकी यह थोड़ी देर में उनसे कहा जाना था, नाई को पुरूष की कलगी और सखी को स्त्री की सलवटें ठीक करनी थीं.
कोई चीज़ इस बीच वहाँ आ गई थी अनुष्ठान मंडप से मंत्रों का वर्चस्व कम करती. वह शायद तीव्र कामना से मिलती जुलती किसी चीज़ का उत्ताप था जिसने दोनों देहों को तान दिया था अद्वितीय अंगड़ाईयों में एकसाथ एक ही जैसी गीली और लसलसी मुस्कान दोनों केमुख पर आई फिर छुपा ली गई.
उनींदे लोगों ने इसे स्वप्न की तरह देखा और पवित्र अग्नि ने इसको देखा हास से,
परिक्रमा इसके बाद संपन्न हुई।
***

_____________________________________________ महेश वर्मा की सबद पर अन्य कविताएं यहां




Wednesday, September 27, 2017

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 2 : नींद, मृत्यु का दैनिक अभ्यास है





जब मृत्यु से मेरा पहला परिचय हुआ, मेरी उम्र सवा चौदह साल थी. एक दशक लंबी बीमारी के बाद मेरी बड़ी बहन का निधन हो गया था. अपने परिवार में सबसे ज़्यादा जुड़ाव मैं उन्हीं से महसूस करता था. उन्होंने मुझे बहुत सारी किताबें पढ़ाई थीं. जीवन, संगीत और बिल्लियों के बारे में बहुत सारी बातें बताई थीं. मेरी हैंडराइटिंग उनकी हैंडराइटिंग से बहुत मिलतीजुलती है, क्योंकि बरसों, उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर मुझसे लिखवाया था. जब मैं लिखना सीख गया था, उसके बाद भी. यह उनके लिए खेल की तरह था. जब वह मरीं, मैं बहुत रोया. रोतेरोते सो गया. उठने के बाद फिर रोने लगा. अपने घर से श्मशान तक मैं रोतेरोते गया. जब उनकी देह को आग दी गई, मैं और ज़ोर से रोया. तब तक यह उम्मीद थी कि वह लौट आएंगी. आग देने के बाद वह उम्मीद भी चली गई.

लौट आने की उम्मीद स्वर्ण की तरह होती है. सबसे क़ीमती, लेकिन सबसे नाज़ुक. कहते हैं, सोना सबसे नहीं संभलता, अचानक गुम हो जाता है. अभी आंख के सामने था, अभी ग़ायब हो गया. लौट आने की इसी उम्मीद में पुराने ज़माने में कुछ लोग लाशों को बचाकर रखते थे. देह बची रहेगी, तो एक दिन प्राण लौटकर आएगा. जो राजा थे, समर्थ थे, धनवान थे, उनकी लाशें बची रह जाती थीं. जो समर्थ नहीं थे, देहों को बचाकर नहीं रख सकते थे, उन्होंने कला की रचना की. साहित्य रचा. दर्शन रचा. कविताओं और गीतों की रचना की. ऐसा करके वे मरे हुए लोगों को याद करते थे.


हम जब तक किसी को याद करते रहते हैं, तब तक उसकी मृत्यु नहीं होती. यही सोचकर मैं अपनी दीदी को याद करता रहा. उसके बाद मैं किसी को दीदी नहीं बोल पाया. उसके बाद मैं उतना कभी नहीं रो पाया.

हम जितनी चीज़ों को जानते हैं, उनमें सबसे बलवान मृत्यु को माना गया है. कहावत कहती है कि समय बड़ा बलवान, लेकिन समय से अधिक क्षणभंगुर कुछ नहीं होता. समय और कुछ नहीं है, बस मृत्यु का वाहन है. हर पल, हर चीज़ को उसकी मृत्यु की ओर ले जाता हुआ. हम हमेशा मृत्यु से लड़ते हैं. यह आमनेसामने की लड़ाई नहीं होती, कोई गुरिल्लायुद्ध जैसा होता है. मृत्यु ब्रह्मा की मंझली बेटी है. देवताओं को भी उससे डर लगता था. बारबार उसके आगे हाथ जोड़ना पड़ता था. एक दिन अमृत मिल गया. देवताओं को लगा कि उन्होंने मृत्यु पर विजय प्राप्त कर ली है. किंतु यह भी एक भ्रम निकला. अमृत से अमर नहीं हो सकते, चिरंजीव हो सकते हैं. हर देवता की मृत्यु निश्चित है. जिनजिन ने अमृत पिया है, उन सबको भी एक दिन मरना होता है. बस, उन्हें कुछ अतिरिक्त सुविधाएं मिल जाती हैं. उनका पुनर्जन्म होता है, जिस आयु और अवस्था में उनका निधन हुआ था, उसी आयु और अवस्था में उनका पुनर्जन्म होता है. एक और सुविधा मिलती है, उन्हें अपने पूर्वजन्म की स्मृतियां भी ठीक उसी तरह वापस मिल जाती हैं. वे सबकुछ पहले जैसे ही याद कर सकते हैं. इस तरह मृत्यु एक क्षणिक ब्रेक की तरह आती है और चली जाती है. किंतु आती ज़रूर है. मृत्युंजय महादेव भी मृत्यु के इस ब्रेक से एकबारगी दचका ज़रूर खाते हैं.

ये हिंदू मिथॉलजी की वे बातें हैं, जिन्हें बहुत कम लोग जानते हैं. मिथकों को लोहिया ने 'मनुष्य की कलात्मक कल्पनाएं' कहा है. ग़ौर किया जाए, तो इस कहानी में सबसे अनिवार्य तत्व अक्षुण्ण स्मृति है. मान लीजिए कि पुनर्जन्म के बाद देवताओं को अपनी देह और अवस्था तो वापस मिल गई, लेकिन यह स्मृति वापस न मिले, तब? तब उनके लिए देह और अवस्था का कोई अर्थ न रह जाएगा. कल्पना कीजिए, मृत्यु के क्षणिक ब्रेक के बाद महाशिव का पुनर्जन्म हुआ है. उन्होंने जिस पाणिनि को अष्टाध्यायी का वरदान दिया था, वही पाणिनि उनके सामने आ जाता है और कहता है, 'हे प्रभो!' और महाशिव भरमाकर पूछ लें— 'तुम कौन हो भाई? अच्छा, पहले यही बता दो कि मैं कौन हूं?' तो पाणिनि की दृष्टि में महाशिव की भव्यता टूटकर बिखर जाएगी और कई दुर्घटनाएं घटित हो जाएंगी. महाशिव को याद ही न रहेगा कि उन्हें इस सृष्टि का संचालन करना है.

कहने का अर्थ यह है कि यह जो अमृततत्व है, यह स्मृति में वास करता है. अमरता की सारी कहानियों में स्मृति की जगह विस्मृति का निवेश कर दीजिए, अमरता भरभराकर गिर जाएगी.

स्मृति ही अमृत है. स्मृति से ही साहित्य और अन्य कलाएं बनती हैं. जो स्मृत है, वही अमृत है. इसीलिए परंपरा में साहित्य को अमृत शब्द से जोड़कर देखा जाता है. तमाम देशीविदेशी विद्वान, दार्शनिक कह गए हैं कि साहित्य, मृत्यु से मुक़ाबला करने की कार्रवाई है. मृत्यु से बड़ा कुछ नहीं मिला, तो हमने मृत्यु से बड़े की रचना शुरू कर दी. जब हिंदू मरने लगते हैं, तब गीता पढ़ने लगते हैं. सारी उम्र नहीं पढ़ते, मृत्यु को क़रीब जानते ही पढ़ने लगते हैं, क्योंकि गीता में आत्मा की सबसे पुष्ट अवधारणा दी गई है. गीता में आत्मा की जो परिकल्पना और विवरण है, वह अमरता की अवधारणा से प्रभावित है. मनुष्य की सबसे आरंभिक बेचैनियों में से एक है कि वह मृत्यु को हरा दे, उस पर विजय प्राप्त कर ले, वह देवताओं के समतुल्य बन जाए. मैं मर जाऊंगा, यह देह मर जाएगी, अंगअंग मर जाएगा, पर मेरे भीतर ऐसा कुछ है, जिसे मृत्यु भी नहीं मार पाएगी. वह है आत्मा. गीता के वे श्लोक याद कीजिए, जिसमें कृष्ण बताते हैं कि आत्मा को न शस्त्रों से काटा जा सकता है, न आग से जलाया जा सकता है आदिआदि. यह पूरी अवधारणा मृत्यु के कारण हममें पैदा हुए भय से आती है. मृत्यु हमारे अस्तित्व को बारबार छोटा बताती है, हम अपने भीतर एक ऐसी चीज़ की तलाश करते हैं, जिसके सहारे हम मृत्यु को ही छोटा बता सकें. आत्मा, मृत्यु के नाम मनुष्य द्वारा जारी की गई एक चुनौती है—  आओ, मृत्यु आओ, मेरी देह को नष्ट कर दो, पर मेरे भीतर की आत्मा का तुम कुछ नहीं बिगाड़ पाओगी, वह किसी चिड़िया की तरह मेरी देह से निकलेगी और फुर्र उड़ जाएगी, तुम उसको छू तक न पाओगी.

इसे ऐसे भी कह सकते हैंमेरे भीतर जब तक आत्मा है, मृत्यु मेरा कुछ भी न बिगाड़ पाएगी.

सबसे पहले ब्रह्म को अमर माना गया, फिर बाक़ी देवताओं को भी, उसके बाद दर्शन में आत्मा की अमरता की अवधारणा आई. ब्रह्म अमर है, और आत्मा भी ब्रह्म ही है, इसलिए आत्मा भी अमर है. इस तरह अमरता का अद्वैत रचित हुआ. भले रूपक में कहें या उपमा, हम बारबार कहते हैं कि साहित्य और कविता हमारी आत्मा हैं. इस तरह हम साहित्य और कविता की अमरता की ओर संकेत करते हैं. और जब भी हम साहित्य और कविता की अमरता की ओर संकेत करते हैं, हम छिपे तौर पर यह भी जता देते हैं कि साहित्य और कविता दरअसल, मृत्यु पर विजय प्राप्त करने के लिए किए गए हमारे उपक्रम हैं.

कविता ही हमारी आत्मा है, तो इस तरह भी कह सकते हैं कि जब तक हमारे भीतर कविता है, मृत्यु हमारा कुछ भी नहीं बिगाड़ पाएगी.

यहीं पर मुझे गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की एक कविता याद आती है, जो उन्होंने आदिकवि वाल्मीकि पर लिखी थी. आदिकवि को जब छंद का साक्षात्कार हुआ, तो उनके मन में चिंता हुई कि इसका सबसे अच्छा उपयोग क्या हो सकता है. बहुत सोचने के बाद उन्होंने तय किया कि इस छंद के बल से मैं मनुष्य को देवता और देवता को मनुष्य बना सकता हूं. कविता के भीतर मैं वे स्मृतियां भर सकता हूं, जो मनुष्य को देवता होने जैसा आभास दे सकें. गुरुदेव के इस आदिकवि ने भी यहां कविता का उपयोग मृत्यु के ख़िलाफ़ एक शस्त्र की तरह किया है. मनुष्य को देवता बनाने के संकल्प से भरा हुआ शस्त्र.

सबसे पुराना सवाल है, क्या मृत्यु को जीता जा सकता है? क्या उसके आने को रोका जा सकता है? ऋषिमनीषी से लेकर वैद्यडॉक्टर तक, कलाकारसंगीतकार से लेकर लेखककवि तक, सब अपनीअपनी तरह से मृत्यु पर विजय प्राप्त करना चाहते हैं. सब उसकी कोशिश कर रहे हैं. साहित्य मृत्यु से होने वाली इसी लड़ाई का एक तरीक़ा है.

पुराने ज़माने में एक विद्या हुआ करती थीवाजपेय विद्या. इसी से जुड़ा एक वाजपेय यज्ञ भी हुआ करता था. यज्ञ का उद्देश्य तो थोड़ा और विस्तृत था, वाजपेय विद्या एक तरह से मृत्यु को जीत लेने की विद्या मानी जाती थी, चिरयौवन प्राप्त कर लेने की विद्या. 'वाज' शब्द का प्रयोग ऋग्वेद में कई बार होता है. ऋग्वेद की अपनी टीका में सायण ने इसका अर्थ दिया हैअन्न, लेकिन जैसा कि संस्कृत का स्वभाव है, एक ही शब्द के कईकई अर्थ हो सकते हैं.

(
संस्कृत बड़ी प्यारी और समृद्ध भाषा है. एक ही शब्द के क़रीब ग्यारह सौ पर्यायवाची या अर्थबोधी शब्द हो सकते हैं. इसीलिए इस भाषा में अपने नायकों के, देवताओं के 108 नाम, 1008 नाम या उनसे ज़्यादा नाम गिनाते हुए छंद रचने की परंपरा थी, क्योंकि यह भाषा इस तरह से अनेक शब्द रचने की सुविधा देती है.  नाम गिनाने वाले ऐसे तमाम काव्य और छंद, एक तरह से, इस भाषा के 'मसल्स' या डोलेशोले का प्रदर्शन हैं.  यह प्राकृतिक भाषा नहीं है. दुनिया की कई भाषाएं प्राकृतिक हैं यानी लोगों के बोलनेबतियाने से बनती हैं, उसी हिसाब से परिवर्तित हो जाती हैं, देशकाल के हिसाब से बदल भी जाती हैं. दूसरी भाषाओं में घुलकर खो जाती हैं. भारत में भी ऐसी भाषाएं थीं, उन्हें प्राकृत कहते हैं. संस्कृत, प्राकृत नहीं है, वह संस्कृत है, यानी संस्कारित है, यानी बाक़ायदा बनाई गई है. हज़ार क़िस्म के नियमों के साथ बांधी गई है, उसे अपने मूल रूप में सुरक्षित बनाए रखने के लिए सैकड़ों जतन हैं. यही कारण है कि हज़ारों बरसों से यह बनी हुई है. इतने बरसों में जाने कितनी भाषाएं आईं और गईं, संस्कृत वहीं बनी हुई है. दो हज़ार साल पहले की संस्कृत और आज की संस्कृत में कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं है, जबकि चार सौ साल पहले की अंग्रेज़ी आज आपके पल्ले नहीं पड़ेगी. वह क्या, हिंदी ही इतनी बदल चुकी है कि सौ साल पहले की हिंदी समझना टेढ़ी खीर हो जाता है, शब्दकोश पलटे या माथे पर बल डाले बिना, भारतेंदु और प्रसाद को पढ़ा नहीं जा सकता. इसीलिए मैं कहता हूं कि संस्कृत परंपराओं पर हिंदी और अंग्रेज़ी में ठीक से बात करना कठिन हो जाता है, क्योंकि दोनों भाषाओं में संस्कृत के वैराट्य को झेल सकने लायक़ संपन्नता ही नहीं है. अब शब्दों के अर्थ इतने सूक्ष्म रूप से बदल गए हैं कि सावधानी न बरती जाए, पूर्वग्रहों को दूर न रखा जाए, तो अर्थ का अनर्थ होने की तमाम आशंकाएं रहती हैं.)

तो बात हो रही थी 'वाज' शब्द की, सायण ने इसका अर्थ अन्न दिया है, लेकिन इसके कुछ और स्पष्ट अर्थ भी होते हैंजैसे शक्ति या अधिक स्पष्ट कहें तो, मनुष्य की आंतरिक शक्ति. संस्कृत में इसे वीर्य भी कहते हैं. इसे हिंदी के वीर्य या सेक्स वाले वीर्य में रिड्यूस करके न देखा जाए. यह वीरता से बना है, यानी अभय होने की शक्ति. वीर्य यानी किसी भी चीज़ से न डरने का भाव. मनुष्य की यह शक्ति बाहर नहीं होती, भीतर होती है. उसे बचाए रखना बड़ी मेहनत और जतन का काम है. उस ज़माने के ऋषि या मनीषी मनुष्य की आंतरिक शक्ति को बड़ी महत्ता देते थे. वे ऐसी साधानाएं किया करते थे, कि उनके भीतर की शक्ति का क्षय न हो, वे जब चाहें, तब उसका आवाह्न करें और उसका महत्तम उपयोग कर सकें. भीतर की इस शक्ति, जिसका नाम वाज है, का जब क्षय होने लगता था, तो जाने कैसे वे इसे पी जाया करते थे. इसी कारण वे 'वाजपेयी' कहलाए. जो इस शक्ति को लगातार अपने भीतर भरे रखते थे, वे भरद्वाज कहलाए. वाज से भरे हुए यानी भरद्वाज. इस आंतरिक शक्ति का एक उपयोग मृत्यु से मुक़ाबला करना भी था. इसके लिए वे तमाम तरह की आध्यात्मिक, वैज्ञानिक व कलात्मक साधानाएं किया करते थे.

तो वाजपेय विद्या के प्रवर्तक वाजपेयी और भरद्वाज कहलाए. साहित्य और कलाओं को इस दृष्टिकोण से देखा जाए, तो उन्हें वाजपेय विद्या के अंतर्गत ही आना चाहिए, क्योंकि साहित्य और कलाएं अंतत: मनुष्य की आंतरिक शक्ति का प्रगटीकरण हैं. साहित्य और तमाम तरह की कलाएं मनुष्य को चिरयौवन ही देती हैं. नेरूदा ने 'ट्वेंटी लव पोएम्स' बीस साल की उम्र में लिखी थीं, हम आज उन्हें पढ़ते हैं, तो नेरूदा हमें बीस के ही महसूस होते हैं और हम भले चालीस के हों, ख़ुद को भी बीस का ही मानने लगते हैं. अगर कालिदास आज ज़िंदा होते, तो शायद उनकी उम्र 1600 साल होती, लेकिन मेघदूतम का कालिदास तीसपैंतीस से ज़्यादा का क्या लगता होगा? आज भी उतने का ही लगता है.

साहित्य व कलाएं मनुष्य की आंतरिक शक्ति से बनते हैं और यह आंतरिक शक्ति किससे बनती होगी? इसके कई जवाब हो सकते हैं, पर मुझे प्रमुखत: जो सूझती हैं, वे स्मृति, कल्पना और स्वप्न. एक चौथी चीज़ भी है, वह है इच्छा, जो कि सबसे बलशाली तत्व है, लेकिन उस पर अगले कॉलमों में. अभी स्मृति, कल्पना और स्वप्न के विषय में कुछ बातें.

उन्नीसवीं और बीसवीं सदी का अधिकांश साहित्य यथार्थ और उसके आसपास घूमता है. यथार्थ ही धुरी है. यथार्थवाद एक आधुनिक अवधारणा है. पुराने ज़मानों में यह ठीक ऐसे ही नहीं हुआ करती थी. हमें साफ़साफ़ नहीं पता कि दान्ते या होमर या कालिदास की रचनाएं उनके समकालीन यथार्थ को रेखांकित या चित्रित करती थीं या नहीं. इनकी किताबों में जो घटनाएं हैं, वे सच हैं या नहीं, यह भी नहीं पता. हो सकता है कि वे महज़ कल्पना हों, लेकिन उनमें भी सच होने जैसा आभास है. इसलिए इन्हें कल्पना द्वारा रचा गया साहित्य माना जाता है. आधुनिक यथार्थवादी साहित्य में जो घटनाएं दी जाती हैं, वे भी सच में घटित हुई थीं या नहीं हुई थीं, यह पता करना भी बहुत मुश्किल है, और ग़ैरज़रूरी भी, लेकिन उन घटनाओं के भी सच होने का आभास मिल जाता है. आभास ज़रूरी है, होना ज़रूरी नहीं है. पूरी तरह यथार्थवाद के सहारे रहकर तो इस सदी में भी कला की रचना नहीं हो सकती, जो कोशिशें हुई भी हैं, वे बहुत कम सफल हो पाई हैं. स्मृति, कल्पना और स्वप्न के तत्वों को उनमें मिलाना ही पड़ता है. चूंकि सारी रचनाएं भाषा के भीतर लिखी जाती हैं और भाषा एक स्मृति ही होती है, इसलिए सारे यथार्थवाद के बाद भी स्मृति तो उसमें दिख ही गई.

मैं इस मुद्दे पर पहले भी बोलता रहा हूं और इसे स्पष्ट करने के लिए किताब को उदाहरण की तरह प्रस्तुत करता हूं; भौतिक किताब. एक वस्तु के रूप में किताब. वह मेरे लिए कला का रूपक है. एक किताब को ध्यान से देखिए. वह तीन तरफ़ से खुलने वाली दुनिया है. चौथी ओर से नहीं खुलती, बंधी रहती है. अगर चौथी तरफ़ से भी खुल जाए, तो वह काग़ज़ का पुलिंदा होगी, वस्तु के रूप में किताब नहीं होगी. जिन तीन तरफ़ से वह खुलती है, उसमें एक हैस्मृति, दूसरी है कल्पना और तीसरा है स्वप्न. चौथी तरफ़ बाइंडिंग का स्पाइन है, वह यथार्थ है. यानी कोई भी किताब स्मृति, कल्पना और स्वप्न से खुलती है और इन तीनों को बांधे रखने का काम चौथी तरफ़ से होता है यानी यथार्थ करता है. कोई भी किताब यथार्थ की तरफ़ से नहीं खुलती, खुले तो फट जाएगी. स्मृति, कल्पना और स्वप्ननिर्बंध होते हैं, उन्हें एक बंधन की ज़रूरत होती है. यथार्थ से उन्हें बांधा न जाए, तो तीनों अपनीअपनी दिशा में आपको ले उड़ेंगे, आप उन्हें रोक भी न पाएंगे, बस भटक जाएंगे. यथार्थ किसी भी स्थिति में उड़ता नहीं है, वह ठस होता है, ज़मीन पर ही रहता है, इसलिए स्पाइन वाला बाज़ू ही यथार्थ कहला पाएगा, शेष तीनों बाज़ू यथार्थ नहीं हो सकते, क्योंकि उनमें उड़ जाने का, उड़ा ले जाने का गुण है.

यथार्थ क्या होता है? कुछ भी नहीं होता, सिर्फ़ एक अर्थ होता है. कुछ लोग रियलिटी को यथार्थ मानते हैं, जबकि दोनों दो अलगअलग भाषाओं के अलगअलग अर्थ देने वाले शब्द हैं, जिनका प्रयोग समार्थी के रूप में कर दिया जाता है. सचाइयों को यथार्थ मान लिया जाता है, वास्तविकताओं को भी, घटनाओंपरिस्थितियों को भी, पर ये सब यथार्थ के कारक हो सकते हैं, यथार्थ नहीं होता. इस पर एक पूरा कॉलम लिखने की संभावना है, इसलिए अधिक विस्तार में जाए बिना महज़ इतना कहूंगा कि यथार्थ यानी यथा + अर्थ यानी जो जैसा है उसका अर्थ यानी कोई एक अर्थ यानी जो अर्थ आप निकालना चाहते हैं, वह अर्थ. किसी परिस्थिति से निकलने वाला कोई अर्थ. उसे मैं अपनी तरह से निकाल सकता हूं, आप अपनी तरह से. जैसे ही घटनाएं और अनुभूतियां आएंगी, यथार्थ अपने आप बनने लगेगा और आपकी अगली कल्पनाओं को निर्दिष्ट करता चलेगा. विचारधारा और दृष्टिकोण के अनुसार यथार्थ बदल जाता है, क्योंकि यथा का अर्थ बदल जाता है.

हमने ऊपर देखा कि आत्मा एक कल्पना की तरह रची जाती है, मृत्यु की विराटता को लांघ देने का भान देने वाली कल्पना. स्मृति का प्रयोग भी मृत्यु को पराजित करने के लिए होता है. बचा स्वप्न, जो कि मुख्यत: नींद में रहता है. नींद क्या है? मृत्यु का दैनिक अभ्यास है. ड्रेस रिहर्सल है. स्वप्न उसके भीतर या बाहर रहता है. साधारण स्वप्न की तरह भी, तो मनुष्यता के महास्वप्न की तरह भी, जो कि प्राचीन काल के महाभारत से लेकर पमुक के नए उपन्यास द रेड हेयर्ड वुमन तक में व्याप्त है. यदि नींद के भीतर स्वप्न न हों, तो नींद, मृत्यु की सगी बहन ही लगेगी, लेकिन स्वप्न इस सगेपन में एक शुभबाधा की तरह मौजूद रहते हैं.

और मनुष्य की आंतरिक शक्ति इन तीनों से मिलकर ही बनती है. इन तीनों से मिलकर ही साहित्य और कलाओं की रचना होती है. हम लगातार मृत्यु की ओर बढ़ते हैं, लेकिन हमारी आंतरिक शक्तियां मृत्यु के पार हो जाना चाहती हैं. कई बार वे मृत्यु की विराटता को लघुता में बदल देती हैं.


(गीत चतुर्वेदी का पिछला कॉलम यहां पढ़ें)