Tuesday, December 12, 2017

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 5 : सारे रास्ते बीच में होते हैं





पिछले दिनों कुछ ऐसे संयोग बने कि दो कवियों पर बार-बार लिखना-बोलना पड़ा। मुक्तिबोध का जन्मशताब्दी वर्ष हाल ही में गुज़रा है। जिस तरह के राजनीतिक-सामाजिक हालात बनते जा रहे हैं, मुक्तिबोध लगातार और प्रासंगिक होते जा रहे हैं। इसलिए लिखत-बोलत में मुक्तिबोध के प्रसंग आना स्वाभाविक भी है, ख़ासकर इसलिए भी कि वह मेरे प्रिय कवि हैं और मैं उन लोगों में शामिल हूं, जो उन्हें हिंदी का सबसे बड़ा कवि मानते हैं। दूसरे, कुँवर नारायण, हमारी भाषा के एक और महान कवि, जिनका अभी तीन सप्ताह पहले 90 साल की उम्र में निधन हुआ। दोनों बार-बार अपनी ओर बुलाने वाले, और प्रविष्ट हो जाने के बाद बार-बार चुनौतियाँ देने वाले कवि हैं।
मुक्तिबोध के बारे में, रज़ा फाउंडेशन द्वारा आयोजित ‘युवा-2’ के तहत, बोलने का अवसर मिला था। मैं मुक्तिबोध को हिंदी कविता पर पड़ने वाली एक विशाल स्पॉटलाइट की तरह देखता हूं। उनसे पहले न उन-सा कोई कवि हुआ, न उनके बाद। एक ऐसा अद्भुत कवि, जिसके पूर्वजों का सही-सही पता हम नहीं बता पाते, जिसके वंशजों का कहीं कोई निशान नहीं खोज पाते। हम भले मुक्तिबोध को एक परंपरा में शामिल करें, उनकी एक परंपरा भी बना दें, जोकि होना-बनना लाज़िमी है, लेकिन वह परंपरा ठीक मुक्तिबोधीय शैली में विकसित नहीं हो पाती। उनके बाद के कुछ कवियों को उनकी परंपरा में खड़ा करने की कोशिश की जाती है, लेकिन साफ़ दिखता है कि वह फाउल प्ले है। उनके जैसा कोई नहीं है। वह अनूठे हैं। वह मध्य बिंदु हैं। पूरी हिंदी कविता को दो भागों में विभाजित करने वाले। उनके पहले की कविता। उनके बाद की कविता।
मुक्तिबोध की जिस बात को सबसे ज़्यादा उद्धृत किया जाता है, वह यह कि हमें अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाने ही होंगे। इस पंक्ति की रोशनी में मैं सोचता हूं कि आख़िर ख़ुद मुक्तिबोध ने अभिव्यक्ति का कौन-सा ख़तरा उठाया था? क्या उन्होंने ऐसी कविताएँ लिखी थीं कि उन पर हमले हों? उनका घर जला दिया गया हो? उनके हाथ-पैर तोड़ दिए गए हों? परसाई पर तो इस तरह के हमले हुए थे। और भी कुछ लेखकों पर हुए थे। तो क्या परसाई व बाक़ी अन्य ने अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाए थे, जो कि ख़ुद मुक्तिबोध ने नहीं उठाए, जबकि कहते बार-बार थे? क्या अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाना इतना सरलीकृत कृत्य है कि आप पर हमले होने लग जाएँ? आप पर हिंसा होने लगे? किसी को गाली दे दीजिए, खिझा दीजिए, तो एक रोज़ वह अपने दल-बल के साथ आप पर हमले करेगा ही, तो क्या गाली देने व खिझाने को अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाना माना जा सकता है? नहीं मान सकते। मानेंगे, तो वह एकांगी व सरलीकृत बात होगी।
मुक्तिबोध को चाहे जो कह लीजिए, उन्हें एकांगी व सरलीकृत कहना पाप होगा। फिर मुक्तिबोध ने अभिव्यक्ति का कौन-सा ख़तरा उठाया था? उनके इर्द-गिर्द लिखी हिंदी आलोचना में इसका कोई स्पष्ट व कन्विन्सिंग उत्तर नहीं मिलता। मैं मुक्तिबोध की कविता को दो रचनात्मक ध्रुवों के मिश्रण की तरह देखता हूं। और अपने इस सवाल का जवाब पाने की कोशिश करता हूं। और इसके लिए मैं एक उदाहरण देना चाहता हूं, जो कि फिजिक्स से है। बहुत मशहूर उदाहरण है।
सन् 1704-05 के आसपास एक वैज्ञानिक हुए न्यूटन, जिन्होंने रिसर्च के बाद कहा कि प्रकाश एक कण है। न्यूटन के तर्क व प्रमाण बहुत शक्तिशाली थे, इसलिए उनके युग के विज्ञान ने उनकी बात को मान लिया। “प्रकाश कण है” इस मान्यता को आधार बनाकर विज्ञान अपनी सारी रिसर्च करने लगा और हम जानते हैं कि उस सदी में विज्ञान कहीं नहीं पहुंचा।
क़रीब सौ साल बाद, एक और वैज्ञानिक आया, उसका नाम था टॉमस यंग। उसने भी लंबी रिसर्च की और न्यूटन के सारे तर्कों को ध्वस्त कर दिया। उसने कहा, प्रकाश कण नहीं, तरंग है। उसकी बातें व प्रमाण इतने शक्तिशाली थे कि उसके युग के विज्ञान ने उसकी बात को मान लिया। “प्रकाश तरंग है” इस मान्यता को आधार बनाकर विज्ञान अपनी सारी रिसर्च करने लगा और हम जानते हैं कि उस सदी में भी विज्ञान कहीं नहीं पहुंचा।
सौ साल और बीत गए, एक नया वैज्ञानिक आया, उसका नाम था अल्बर्ट आइंस्टाइन। वह बैंक में क्लर्क था। नौकरी के बाद बचे घंटों में रिसर्च करता था। उसने भी बहुत लंबी रिसर्च की और कहा कि प्रकाश कण भी है और तरंग भी है। प्रकाश दोनों है। उसे दोनों में से कोई एक-भर मान लेना ऐतिहासिक चूक है। उसका व्यवहार दोहरा है। उसे दोनों मानना होगा। आइंस्टाइन ने तब तक की पूरी सोच को ही ध्वस्त कर दिया था। ज़ाहिर-सी बात है कि उनके तर्क, प्रमाण व नतीजे इतने ताक़तवर थे कि समकालीन विज्ञान को उनकी बात माननी ही पड़ी। “प्रकाश कण भी है और तरंग भी है” इस मान्यता को आधार बनाकर विज्ञान अपनी सारी रिसर्च करने लगा और हम जानते हैं कि उसके बाद के बरसों में विज्ञान ने जितनी तरक़्क़ी की, उतनी कभी नहीं की थी। आइंस्टाइन की सोच ही अपने आप में एक चमत्कार है। विज्ञान की भाषा में इसे वेव-पार्टिकल डुएलिटी (कण-तरंग द्वैत) कहा जाता है। और यही द्वैत, प्रकाश के संदर्भ में कण-तरंग के अद्वैत (नॉन-डुएलिटी) को भी प्रतिष्ठित कर देता है। जैसे ही विज्ञान ने इस द्वैत व अद्वैत को समझा, हमारा जीवन बदल गया। विज्ञान ने बड़ी-बड़ी खोजें कीं। जिस कंप्यूटर पर बैठकर मैं यह सब लिख रहा हूं, उसके बनने में आइंस्टाइन की उस सोच की भी भूमिका है। जिस मोबाइल पर आप यह सब पढ़ रहे हैं, उसके बनने में भी उनकी उसी सोच की ही भूमिका है।
यह हुई फिजिक्स की बात। अब बात करेंगे मेटाफिजिक्स की। कविता एक तरह से मेटाफिजिक्स का ही हिस्सा है। मुक्तिबोध की विचारधारा बहुत स्पष्ट थी। वह मार्क्सवादी थे। इस पर किसी को संदेह नहीं। वह संभवत: काफ़्का को नापसंद करते थे और अस्तित्ववाद के प्रति उनमें ख़ास तरह का संकोच व परहेज़ था। पर इतने बरसों में यह भी लगभग ज़ाहिर हो चुका है कि हिंदी में काफ़्का का कोई योग्य बौद्धिक सहोदर हुआ, तो वह स्वयं मुक्तिबोध थे। दोनों के पास दु:स्वप्न का संत्रास है। दु:स्वप्न का संत्रास, बीसवीं सदी के साहित्य में व्याकरण की तरह इस्तेमाल होता है। दु:स्वप्न का संत्रास एक अस्तित्ववादी उपकरण है। जिस लेखक के भीतर दिखेगा, उसे अस्तित्ववादी उपकरण की तरह ही पहचाना जाएगा, मार्क्सवादी उपकरण की तरह नहीं। और यही कारण था कि उनमें अस्तित्ववादी प्रवृत्तियों की खोज कई आलोचकों ने की जिनमें रामविलास शर्मा प्रमुख रहे। नामवर सिंह ने उनके तर्कों को काटा और लगभग बताया कि मुक्तिबोध में अस्तित्ववाद नहीं है। हिंदी में इस पर बहुत बहसें हो चुकी हैं और मेरा मंतव्य उन बहसों में जाना नहीं है, क्योंकि न तो मैं मुक्तिबोध को मार्क्सवादी साबित करना चाहता हूं और न ही अस्तित्ववादी। क्योंकि ये दोनों बातें पर्याप्त सिद्ध हैं। और यदि उनकी कविता पढ़ी जाए, तो स्वयंसिद्ध दिखेंगी। समस्या यहीं है कि या तो उनकी कविताओं को मार्क्सवादी माना जाता है या कुछ लोग उन्हें अस्तित्ववादी मानते हैं। बात घूमकर वहीं पहुंची- प्रकाश को या तो कण माना जा रहा था या तरंग। प्रकाश कण भी है और तरंग भी है, यह बात मानने में समय लगा था। उसी तरह क्या मुक्तिबोध की कविता को दोनों माना जा सकता है? मेरी नज़र में उनकी कविता दोनों है, क्योंकि प्रकाश की ही तरह उनकी कविता दोहरा व्यवहार करती है। उनकी कविता का बुनियादी कंटेंट जिस तरह मार्क्सवादी है, उनकी शैली उसी तरह अस्तित्ववादी है। दु:स्वप्न का संत्रास उनकी शैली है, तो दु:स्वप्न उनका कंटेंट है, वह दु:स्वप्न, जिसमें यथार्थ छिन्न-भिन्न हो रहा है।
मुक्तिबोध अपनी मानसिक व सामाजिक स्थितियों से लगातार असंतुष्ट रहते थे। यह असंतोष उनके पूरे रचनाकर्म में, उनके निबंधों-पत्रों में मुखर रूप से, दिखाई देता है। “मानसिक द्वंद्व उनके (पढ़ें मेरे) व्यक्तित्व में बद्धमूल” रहा। हम जानते हैं कि आरंभिक बरसों में मुक्तिबोध ने छायावादी कविताएँ लिखी थीं। मार्क्सवाद के प्रति उनमें कोई अनुराग न था। 1942 में तारसप्तक के प्रकाशन के समय वह घोषित मार्क्सवादी थे। हालांकि तारसप्तक में दिये अपने वक्तव्य में भी उन्होंने अपने इस असंतोष को सांकेतिक तौर पर ज़ाहिर कर दिया था। उसके बाद उन्होंने 1947 में ख़ुद को प्रयोगवाद से जुड़ा संकेतित किया। फिर जब नई कविता आंदोलन शुरू हुआ, तो मुक्तिबोध ने अपना जुड़ाव उससे संकेतित किया। यानी  (उन्हीं के शब्दों में) “अपनी विकास-स्थिति के प्रति असंतोष” उनमें लगातार रहा। इन सब बातों में कुछ भी नया नहीं, क्योंकि ये सब पहले भी छपी हुई हैं और कई आलोचकों ने उद्धरणों समेत इन्हें लिखा है। वे बातें भी छपी हैं, जिनमें क़रीबी मित्रों के हवाले से यह बताया गया कि बाद के दिनों में वह मार्क्सवाद से भी निराश रहने लगे थे।
कहने का अर्थ यह है कि मानसिक द्वंद्व और असंतोष उनके भीतर लगातार रहे। यह मानसिक द्वंद्व व असंतोष महज़ सामाजिक प्रश्नों के स्तर पर नहीं थे, बल्कि व्यक्ति की भूमिका, समाज व विचारधारा के साथ उसके संबंधों को लेकर भी थे। और उन्हीं के कारण उनके रचनाकर्म में अस्तित्ववादी तत्वों का आगमन होता जाता है, जिसके बीज तो तभी से थे, जब वह बर्गसाँ से प्रभावित हुए थे। दुनिया की महान अस्तित्ववादी रचनाओं का अध्ययन किया जाए, मसलन नीत्शे, कीर्केगार्द, दोस्तोएव्स्की, कामू, काफ़्का, सार्त्र आदि की रचनाओं का, तो व्यक्ति की भूमिका, समाज के साथ उसके संबंधों पर जिस तरह के संशय व सवाल उठाए गए हैं, उनमें से कई मुक्तिबोध की कविताओं में भी मिल जाते हैं। इन सबका अस्तित्ववाद अलग-अलग है। अस्तित्ववाद क्या है, इसका कोई स्पष्ट जवाब देना बहुत मुश्किल है। इसकी एक सर्वमान्य परिभाषा दे पाने में अतीत के कई लेखक-विचारक ख़ुद को असमर्थ बता चुके हैं। अपना पूरा लेखनकर्म अस्तित्ववादी शैली में ही करने वाले सार्त्र से जब इस पदबंध की परिभाषा देने को कहा गया था, तो उन्होंने जो कहा, उसका आशय यह है कि- लगातार नास्तिकता से मनोजगत में होने वाले जो विभिन्न परिणाम हैं, उन्हें भाषा में कहने की कोशिश अस्तित्ववाद है।
आमतौर पर यह मान लिया जाता है, और हिंदी में ऐसा मानने की लंबी परंपरा भी रही है कि, मार्क्सवाद व अस्तित्ववाद एक-दूसरे के विरोधी हैं। ऐसा मानने के कई मोटे कारण भी हैं, मसलन- मार्क्सवाद समाज को प्राथमिक महत्व देता है, जबकि अस्तित्ववाद समाज के भीतर व्यक्ति व उसके मनोजगत को। मार्क्सवाद एक विचारधारा है, दर्शन भी है, किंतु अस्तित्ववाद कोई विचारधारा नहीं है, अंशत: दर्शन ज़रूर है, किंतु पूरी तरह दर्शन भी नहीं है। भाषा की सुविधा के लिए भले इसे दर्शन की कोटि में डाल दिया जाता हो, लेकिन इसे दार्शनिक तेवर या समस्या भी कहा जा सकता है और दर्शन की तरफ़ उठाया गया एक सवाल भी। यदि इसे दार्शनिक समस्या की तरह देखा जाए, तो योगवासिष्ठ में भी यह है, शतपथ ब्राह्मण में भी है और होमर की ओडिसी में भी है। उन्नीसवीं और बीसवीं सदी की शुरुआत में लेखकों-विचारकों, ख़ासकर गल्पकारों, ने इसका प्रयोग एक शैली या डिज़ाइन की तरह भी किया है। दोस्तोएव्स्की व काफ़्का, अस्तित्ववादी दर्शन या अस्तित्ववादी विचारधारा के लेखक नहीं, बल्कि अस्तित्ववादी डिज़ाइन या शैली के लेखक हैं।
हिंदी में इसे लेकर एक लंबी राजनीति होती रही है। मार्क्सवादी आलोचक, प्राथमिक तौर पर, साहित्य पर राजनीति को वरीयता देते रहे हैं। वे मानते रहे हैं कि कविता कला के स्तर पर बुरी हो, तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, वह समाज के भीतर पहुंच रही है व मार्क्सवादी राजनीति के साथ खड़ी है, तो वह श्रेष्ठ कविता है। इस सोच से ही पता चल जाता है कि उन्हें कविता की अधिक चिंता कभी नहीं रही। जबकि अस्तित्ववादी डिज़ाइन बिना कला की शर्तों पर खरा उतरे हासिल नहीं की जा सकती। समाज में उसका प्रसार भले कम हो, किंतु उसका कला होना निहायत ज़रूरी है। इसलिए मुक्तिबोध को महज़ मार्क्सवादी या महज़ अस्तित्ववादी साबित करना साहित्यिक नहीं, एक राजनीतिक प्रयास के रूप में ही देखा जाना चाहिए और ये प्रयास मुक्तिबोध की कविता के साथ न्याय नहीं करते। जब कोई आलोचक उन्हें महज़ मार्क्सवादी कवि के रूप में देखना चाहता है, तो उनकी कविता के अस्तित्ववादी गुणों, शैली व डिज़ाइन को नज़रंदाज़ करेगा। उसी तरह अगर कोई उन्हें महज़ अस्तित्ववादी बताना चाहता है, तो वह मुक्तिबोध की कविता में व्याप्त शोषणविहीन, समतामूलक उस समाज के महास्वप्न को नज़रंदाज़ करेगा, जो मार्क्सवाद के कारण उपस्थित होता है और जिसके बारे में मुक्तिबोध अभिधा में भी कह देते हैं। मुक्तिबोध की कविता में दोनों प्रकार के गुण व व्यवहार हैं और हमें उन्हें दोनों तरह से देखना आरंभ करना होगा।
मुक्तिबोध अपने कंटेंट में जिस तरह मार्क्सवादी हैं, उसी तरह अपनी डिज़ाइन में अस्तित्ववादी भी हैं। उनकी कविता प्रकाश की ही तरह दोहरा व्यवहार करती है, क्योंकि वह कण भी हैं, तरंग भी हैं। दोनों माने बिना उनकी कविता को पूरी तरह आत्मसात करना संभव नहीं होगा। और उन्हें दोनों मानना कहीं से ग़लत भी नहीं होगा। हां, कुछ लोगों-समूहों की राजनीति को यह सूट नहीं करेगा, वे इसका विरोध करेंगे, पर उनका बुनियादी काम ही यही है कि जो सचाइयाँ उनकी राजनीति को सूट न करती हों, वे उसका विरोध, दमन, उपेक्षा व उपहास करें। आख़िर वे साहित्य को दोयम मानते हैं, राजनीति को वरीय।
मुक्तिबोध ने भले यह जानते-बूझते किया या अनजाने ही किया, यह नहीं पता, लेकिन उनकी कविता में मार्क्सवाद व अस्तित्ववाद का एक रचनात्मक अद्वैत (शंकर का अद्वैतवाद नहीं) ज़रूर दिखाई पड़ता है। और यही उनके द्वारा उठाया गया अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा ख़तरा है। उनके पहले व बाद में किसी कवि ने यह ख़तरा नहीं उठाया। यह काम अकेले मुक्तिबोध ने किया। वह चाहते, तो अज्ञेय के रास्ते पर चलते, बिना मार्क्सवादी कंटेंट लाये वह अस्तित्ववादी डिज़ाइन व सार-तत्व से काम चला लेते। वह भी प्रचलित था। वह चाहते, तो नागार्जुन या शील के रास्ते पर चलते, बिना अस्तित्ववादी डिज़ाइन का प्रयोग सीधे-सीधे मार्क्सवादी कंटेंट जनता के सामने परोस देते। वह भी प्रचलन में था। किंतु मुक्तिबोध में अपने आप को लेकर जो संशय व असंतोष था, वह उनके द्वारा चुने गए दृष्टिकोणों में व्याप्त था। इसीलिए उन्होंने दो बिल्कुल विपरीत लगने वाले चीज़ों को मिश्रित कर दिया। इस मिश्रण से उन्होंने जो रास्ता निकाला, वह दोनों में से किसी एक ध्रुव पर चलने का नहीं था, बल्कि उनके इस चयन से उनका रचनाकर्म दोनों ध्रुवों के बीच स्थित हो गया। यह अपने रचनाकर्म में बीच का रास्ता पा लेने जैसा है। मुक्तिबोध के भीतर यही मध्य का माहात्म्य है।
पाश की मशहूर पंक्ति है- बीच का रास्ता नहीं होता। उस पंक्ति के संदर्भ बहुत अलग हैं और उसका सीधा अर्थ यह है कि जीवन में आपको एक स्टैंड लेना ही होगा, एक चुनाव करना ही होगा। यह भी सच है। जीवन में कई स्थितियाँ ऐसी आती हैं, जब आपको एक तरफ़ होना ही होता है। लेकिन साहित्य व कला के साथ जुड़ा एक बड़ा सौंदर्य यह भी है कि इसमें कोई भी पंक्ति एबसॉल्यूट नहीं बन पाती। पाश की यह पंक्ति कई संदर्भों में सही हो सकती है, लेकिन हर जगह इसे सही नहीं पाया जा सकता। कला, दर्शन, साहित्य और वृहत् जीवन में कई बार बीच के ही रास्ते चुनने होते हैं। एक विडंबना यह भी है कि सारे रास्ते दरअसल बीच में होते हैं। किनारे का रास्ता भी किनारे नहीं होता, वह किनारे और शेष भाग के बीच में स्थित होता है। रास्तों को देखा जाए, तो उनके बाएँ भी कुछ न कुछ होता है और दाएँ भी कुछ न कुछ। कई बार, रास्ता ही दरअसल किसी खेत या क्षेत्र को दो हिस्सों में बांट देता है। सारे रास्ते दरअसल बीच में ही होते हैं, बीच का कोई रास्ता हो या न हो, यह आपका चयन है। ‘में’ और ‘का’ के प्रयोग से वाक्य के अर्थ में बदलाव हो जाता है। साहित्य में वाक्यों के अर्थ किस क़दर बदल जाते हैं, इसको लेकर कबीर और उनके बेटे से जुड़ी एक किंवदंती याद आती है।
कबीर का एक बेटा था- कमाल। वह भी दोहे लिखता था। अपने पिता से बेहद असंतुष्ट रहा करता। इस क़दर कि उनके दोहों को काटते हुए नए दोहे तैयार करता था और आसपास की जनता में उसके दोहे एक प्रतिपक्ष की तरह प्रचलित हो जाते थे। एक बार कबीर ने एक दोहा कहा, जिसकी एक पंक्ति थी-
कहै कबीर दो नावै चढ़िए। एक बूड़े तो एके रहिए।
थोड़ी ही देर बाद इसका खंडन करते हुए कमाल ने एक दोहा लिखा, जिसकी पंक्ति थी-
कहै कमाल दो नाव न चढ़िए। फटै जाँघ के बूड़ के मरिए।
एक ही स्थिति है, लेकिन दोनों के देखने का तरीक़ा अलग-अलग है। कबीर कह रहे हैं कि जीवन में विकल्प बनाकर रखिए, एक से काम न बने तो दूसरे से आपका काम बन ही जाएगा। यह बिल्कुल व्यावहारिक बात है। कमाल कह रहे हैं कि दो विकल्पों को साथ लेकर मत चलिए, साँसत में पड़ जाएँगे। यह भी व्यावहारिक बात है। लेकिन दोनों बातें अलग-अलग स्थितियों में ही सही हो सकती हैं। दोनों एब्सॉल्यूट नहीं हैं। दोनों मिथ्या नहीं हैं, लेकिन दोनों पूर्ण सत्य भी नहीं हैं। इन पंक्तियों का सही-ग़लत होना स्थिति, दृष्टिकोण व चयन पर निर्भर करता है। इसीलिए कहा जाता है कि श्रेष्ठ साहित्य पूरे जीवन का चित्रण करने की कोशिश नहीं करता, बल्कि वह जीवन से अपने लिए एक हिस्से को चुन लेता है। स्थितियों के हिसाब से दोनों ही पंक्तियों को सही मानना होगा। यह दो के बीच फँसने से ज़्यादा दो के बीच समावेश स्थापित करने जैसी बात है।
मुक्तिबोध यदि दो विपरीत लगने वाली चीज़ों के बीच इस तरह का समावेश कर पाते हैं, तो यह सच में बहुत बड़ी बात है। इसके कारण मुक्तिबोध की प्रतिबद्धता को ख़तरे में पड़ा नहीं मानना चाहिए और ना ही उन्हें किसी भयवश महज़ व्यक्ति के अंतर्मन की भुलभुलैयाओं में फँसा हुआ मानना चाहिए। एक कवि दो साहित्यिक स्थितियों के बीच से अपना रास्ता तैयार कर सकता है। उसे उतनी ही गरिमा के साथ स्वीकार किया जाना चाहिए। यदि बीच का वह रास्ता पाकर उसकी कला कुछ बड़ी उपलब्धियाँ हासिल करती है, तो उनका स्वागत करना चाहिए और उनकी विवेचना करते समय दोनों ही सरणियों को ध्यान में लेना चाहिए। अंतत: कवि की कविता बचती है। वह श्रेष्ठ बनी है, तो उसकी रसोई में चाहे जो चीज़ें रही हों। यहाँ निकारागुआ के कवि एर्नेस्तो कार्देनाल की याद हो आती है। वह मार्क्सवाद से प्रभावित कवि हैं, लेकिन साथ ही रोमन कैथलिक विचारों में भी उनकी गहरी आस्था है। उनका पूरा रचनाकर्म इन दोनों के बीच एक सामंजस्य बिठाने की कोशिश करता है। यह विश्व-कविता में एक बहुत बड़ा प्रयास था और पूरी गरिमा से इसे समझने की कोशिश की जाती है। जीवन की दो विपरीत अवस्थाओं के बीच सुलह बनाने की कोशिश करना वृहत्तर तौर पर रचनात्मक कर्म है। कुँवर नारायण के शब्दों में, जीवन सुंदर सुलहों का नाम है।
एक तरफ़ हो जाने की ज़िद के बरक्स थोड़ी देर रुककर यह भी सोचने का समय है कि क्या सच में एक तरफ़ हो जाना ही सबसे बड़ा समाधान होता है? दुनिया दो ध्रुवों में बंट रही है, बार-बार बंटती रही है, और हमने देखा है कि दोनों ही ध्रुव विनाश की ओर ले जाना चाहते हैं, तब आप किस तरफ़ होना चाहेंगे? किस तरफ़ खड़े होकर आप विनाश को लाना चाहेंगे? और क्या न बेहतर होगा कि आप न इस तरफ़ जाएँ, न उस तरफ़, बल्कि दोनों तरफ़ होने का विरोध करते हुए यह चुनें कि मुझे इन दोनों ध्रुवों के बीच से एक ऐसा रास्ता निकालना है , जो विनाश की तरफ़ न जाए, मनुष्यता को और प्रवर्तित कर सके। ठीक है, दुनिया ध्रुवों में बंट गई है, और आपको ध्रुवों से प्यार है, आप एक ही तरफ़ होना चाहते हैं, लेकिन यह तो सोचिए कि ध्रुवों पर कोई नहीं रह पाता, सिर्फ़ बर्फ़ रहती है। इंसान  को अपने रहने के लिए दोनों ध्रुवों के बीच की जगह को चुनता पड़ता है, क्योंकि उसी जगह से जीवन का सृजन संभव है। स्टैंड लेना बहुत अच्छी बात है, और वह अलग संदर्भ की बात है, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि मध्य का महात्म्य कहीं बड़ा है। वीररस से भरे लोगों के लिए यह बहुत आसान होता है कि वह सोच लें, मध्य की स्थिति कायरता की स्थिति है। दरअसल, ये ऐसे कोमल व संवेदनशील मुद्दे हैं कि कोशिश करनी चाहिए, इन पर युद्ध की शब्दावली में बात न हो। कुँवर जी की ही एक बात याद आती है, जो इसे कहीं सुंदर तरह से कहती है- “यह समय मुझे मुख्यतः सही समझौतों का वक़्त लगता है, टकरावों का नहीं समझौता लड़ाई की भाषा का शब्द नहीं है, विचार और विकास की भाषा का शब्द है।”  शुरू में मैंने कुँवर नारायण को याद किया था, तो इसी कारण कि मध्य के महात्म्य को मुखर तौर पर स्वीकार करने वाले वह हिंदी के दुर्लभ कवि हैं। इस मध्य का प्रयोग मुक्तिबोध ने भी किया, किंतु उन्होंने इसे स्वीकार न किया, शायद और जीते, तो ज़रूर करते। कुँवर नारायण ने इस मध्य का प्रयोग किया और इसे सविनय स्वीकार भी किया। मनुष्यता की बात करना ही मध्य का माहात्म्य है, क्योंकि मनुष्यता, पशुता और दैवत्व के मध्य वास करती है।

Sunday, November 12, 2017

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 4 : अधूरी चीज़ों का देवता



Pic : Anurag Vats 2017



एक मित्र ने पूछा, “इधर क्या-क्या पूरा कर दिया?”
आम तौर पर पूछा जाता है कि क्या कर रहे हो, लेकिन मित्र ने वह चीज़ जाननी चाही, जिसे मैंने पूरा कर दिया हो। मित्र क़रीबी थीं, तो उन्हें मेरे गुणों का अंदाज़ा रहा होगा, इसीलिए उन्होंने सिर्फ़ वह काम जानना चाहा, जिसे मैंने पूरा किया हो। वरना “क्या-क्या कर रहा” की सूचियाँ तो मैं हमेशा ही गिनाता रहता हूँ। 
मैंने बुझकर जवाब दिया, “मैं अधूरी चीज़ों का देवता हूँ।”
अगला ईमेल आने तक, ज़िंदगी के दस काम निपटाते हुए, मेरे ज़हन के बैकग्राउंड में यह अधूरापन तैरता रहा। लगातार यह चलता रहा कि अब तक जितने काम किए हैं, वे सब अधूरे किए हैं। कोई भी काम पूरा नहीं किया। कविताएँ लिखीं। कहानियाँ लिखीं। निबंध लिखे। इनके अलावा भी बहुत सारे काम किए। सब अधूरा किया। हर काम के दौरान मन में अंत की एक अवधारणा व कल्पना रही। मसलन- यह जो कविता मैं लिख रहा हूँ, अंत में यह उस-उस-उस बिंदु तक पहुँचेगी और मुझे इसमें वह-वह-वह बातें कहनी हैं। हक़ीक़त यह है कि मैं उस-उस-उस बिंदु तक कभी नहीं पहुँच पाया, वह-वह-वह बात मैं कभी नहीं कर पाया, क्योंकि मैंने उस कविता या कहानी को कभी पूरा ही नहीं किया। एक दिन लगा कि अब इससे आगे नहीं चला जा सकेगा, वहीं थककर बैठ गया, उसी कविता या कहानी को बाहर निकाल दिया, वह छप गई, उसे पूरी हो गई रचना की तरह पढ़ा गया। किसी भी कविता के साथ यह नहीं छपा कि- “गीत चतुर्वेदी की नई अधूरी कविता”। जबकि वैसा छपा होता, तो वह सच होता। जो चीज़ छपकर लोक को अर्पित हो गई, यदि उसके अधूरे होने का अलग से उल्लेख न किया जाए, उसे पूरा ही मान लिया जाता है।
अंग्रेज़ी की लेखिका ज़ेडी स्मिथ ने अपने एक निबंध में बहुत सुंदर तरह से कहा था, ठीक इन्हीं शब्दों में नहीं, पर इन्हीं आशयों में, हम जो लिखना चाहते हैं, वह कभी नहीं लिख पाते। उसके बदले क्या करते हैं? हमसे जो लिखाsss गया है, उसी को सामने रखकर हम दावा करते हैं कि हम ठीक यही तो लिखना चाहते थे।
यह अजब क़िस्म का खेल है। जो लिखा, वह अधूरा है, लेकिन पूरे की तरह प्रस्तुत कर दिया। मैं आपके सामने प्रस्तुत हूँ, अपने आप में अधूरा हूँ, लेकिन पूरे की तरह प्रस्तुत हूँ। ख़ुद के साथ यह खेल चलता ही रहता है। पूरा तो किसी स्थिति में नहीं होऊँगा, थककर एक दिन मैं ख़ुद या आप पूरा मानने लग जाएँगे। आईने के सामने खड़ा होता हूँ और जोश मलीहाबादी का एक शेर अपने आप ज़बान पर आ जाता है –
बिगाड़कर बनाये जा, उभारकर मिटाये जा
कि मैं तेरा चिराग़ हूँ, जलाये जा, बुझाये जा।
इस शेर में भी जो हालात बनते हैं, वे पूरे नहीं हैं। बिगाड़ दिया, तो भी अधूरा ही लगूँगा। पूरा करने के लिए बनाओगे। तो भी अधूरा ही लगूँगा। फिर बिगाड़ने लग जाओगे। बुझा हुआ रहूँगा, तो पूरा करने के लिए जलाओगे। जलता रहूँगा, तो फूँक मारकर बुझा दोगे। हर कोई अपना ख़ुद का चिराग़ है। ज़िंदगी में सबसे ज़्यादा खेल ख़ुद से खेले जाते हैं।
इसीलिए हम चीज़ों को पूरा मान लेते हैं। जीवन गणित की तरह है। मान लेना सबसे महत्वपूर्ण है। मान लिया, तो आगे के सारे समीकरण हल होते हैं। पूरा मान लिया, तो अगले काम की ओर बढ़ने में आसानी होती है। लोगों को अपना मान लेते हैं। पता नहीं, वे अपने हैं कि नहीं हैं, लेकिन अपना मानना होता है। न मानें, तो पचास झंझटों में पड़े रहेंगे। जो हमारे लिए हर रोज़ गड्‌ढे खोद रहा हो, उसे भी अपना मान लेते हैं। और अपना मान लिया, तो उसे बुरा मानना मुश्किल हो जाता है। पुराने ज़मानों के मशहूर नाटककार राधेश्याम कथावाचक की मशरिक़ी हूर का एक संवाद है- “जिन्हें अपना समझता हूँ, उन्हें अच्छा समझता हूँ।”
एक बहुत पुराना क़िस्सा याद आ रहा है। किशोरावस्था के दिनों में इस पर ख़ूब हँसते थे।
एक राजा था। बेटे से परेशान रहता था कि यह ऐसा बैरागी क्यों है, संन्यासी जैसा क्यों है? उसके आसपास लड़कियों की फ़ौज खड़ी कर दी कि किसी से तो प्रेम कर ले, शादी कर ले, ताकि मेरा वंश चले, पर राजकुमार तो बस अपनी ध्यान-साधना में लगा रहता। किसी की ओर झाँककर भी न देखता। राजा ने बहुत कोशिश की, पर हमेशा नाकाम ही रहा। एक दिन राजकुमार को प्रेम हो गया, पर उन लड़कियों से नहीं, जो बाप ने उपलब्ध कराई थीं। प्रेम हुआ, तो पड़ोसी देश की राजकुमारी से। आकर सबको बता दिया। रानी माँ बहुत ख़ुश हुईं। शादी की तैयारियाँ करने लगीं, पर राजा को यह प्रेम बिल्कुल पसंद न आया। अब वह अड़ गया कि बेटा, किसी और से कर ले, उससे तो शादी न होने दूँगा। कई दिनों तक ज़िद की तलवारें खिंची रहीं। बेटे के बार-बार पूछने पर राजा ने बताया, “बरसों पहले पड़ोस की रानी के साथ मेरा गुप्त प्रेम-संबंध था। सिर्फ़ मैं और वह रानी जानते हैं कि वह राजकुमारी उसी प्रेम का फल है। सो बेटा, वह तेरी बहन हुई। उससे शादी का सपना छोड़ दे। मुझसे सहन न होगा।” सुनकर राजकुमार रोने-धोने लगा। जीवन में बमुश्किल एक लड़की से प्रेम हुआ और वह भी बहन निकली। सांत्वना पाने के लिए माँ की गोद में सिर रखकर रोने लगा। माँ ने कहा, “बेटा, बरसों पहले मेरा भी एक गुप्त प्रेम-संबंध था। तू उसी प्रेम का फल है। जा, बिंदास उसी से शादी कर। कोई बहन ना लगे है तेरी।”
लतीफ़ा है। लतीफ़े कई बार फ़लसफ़ों पर भारी पड़ते हैं। मोटी किताबें जो बात नहीं समझा पातीं, छोटा-सा एक लतीफ़ा वह बात समझा जाता है। असल क्या है, किसी को नहीं पता। या जिस एक को पता था, वह हमारी कहानी से निकलकर दूर जा चुका है, तब तो और न पता चलेगा कि असल क्या था। तो ऐसे में, बस मान लेना ही एक उपाय बचता है। उसी तरह, पूरा या पूर्ण क्या है, किसी को नहीं पता, बस मान लेना होता है कि अब यह पूरा है। कोई भी कहानी जहाँ ख़त्म होती है, उसके आगे से एक नई कहानी कहना शुरू किया जा सकता है। जैसे ही यह होगा, पिछली कहानी अपने आप अधूरी साबित हो जाएगी।
सारा खेल इस ‘अ’ में है। अ से अधूरा। अ से अपूर्ण। हमारी वर्णमाला का पहला वर्ण। दुनिया की कई भाषाओं में पहला वर्ण अ या इसी से मिलती-जुलती ध्वनि से निकला है। फिर एक कहानी याद आती है। बहुत पहले, जाने कितना पहले, जब भाषा नहीं थी, लोगों के सामने सबकुछ स्पष्ट था। जवाब हर किसी के पास थे, सवाल किसी के पास नहीं था। सौंदर्य चारों ओर था, लेकिन कोई रहस्य नहीं था। रहस्य न हो, तो सौंदर्य का अचार भी नहीं डाला जा सकता। इतना सबकुछ जाना हुआ था कि लोग ऊबने लगे। तब भाषा की रचना हुई। जाने कौन जादूगर था वह, जिसने दुनिया के सारे जवाबों को इकट्‌ठा किया और भाषा के भीतर छिपा दिया। लोगों को जीने में मज़ा आने लगा। वह भाषा के पास जाते, वह उन्हें नया सवाल देती। लोग जवाब तलाशने लगते। जो भी जवाब मिलता, वह दरअसल एक नये सवाल की ओर इशारा होता। जादूगर ने कहा, भाषा के भीतर ही असली जवाब है, किसी एक वर्ण में छिपा हुआ है। लोग सारे वर्णों को खंगालने लगे, जबकि जादूगर ने पहले ही वर्ण में जवाब छिपा दिया था। और वह था अ। उसने किसी को नहीं बताया कि दुनिया के हर रहस्य की कुंजी अ के पास है। उसे समझो। अ से अनार, अ से अमरूद की पढ़ाई तो होने लगी, लेकिन अ को चाभी की तरह इस्तेमाल करने का हुनर बहुत कम लोगों को आया।
हमारे यहाँ हर विस्तार का सार प्रस्तुत करने की परंपरा है। हम विस्तार की भी आराधना करते हैं और सार की भी। तभी सात सौ श्लोकों वाली गीता का सार सात श्लोकों में प्रस्तुत कर देते हैं। वाल्मीकि की रामायण में क़रीब चौबीस हज़ार श्लोक हैं, लेकिन एकश्लोकी रामायण में उसका सार दे दिया गया है। यह पूर्णता की नहीं, अपूर्णता की स्थापना है। कोई चीज़ अगर चौबीस हज़ार श्लोक में भी पूर्ण है और एक श्लोक में भी पूर्ण है, तो वह असल में अपूर्ण है। उसे आप कितना भी बड़ा कर सकते हैं, कितना भी छोटा कर सकते हैं।
अपूर्णता के इस विचार को अ की महिमा के बिना नहीं जाना जा सकता। इसी अ में बोध है। जो अबोध है, बोध उसी को चाहिए होता है। बिना अ लगे बोध की कोई आकांक्षा भी नहीं होती। इसीलिए बुद्ध ने अ को बहुत महत्वपूर्ण माना था।
बौद्ध धर्म की महायान शाखा का बेहद प्रसिद्ध सूत्र है- प्रज्ञापारमिता। यह उनके सबसे बड़े सूत्रों में से है। एक नेपाली मान्यता है कि प्राचीनतम समय में यह सूत्र सवा लाख श्लोकों से बना था। बाद में उसे घटाकर एक लाख श्लोकों का किया गया। इसका घटाना चलता रहा, बाद में पचीस हज़ार, दस हज़ार, आठ हज़ार श्लोकों तक इसे घटाया गया। और संक्षेप करने पर यह ढाई हज़ार, फिर सात सौ, फिर तीन सौ श्लोकों तक आया।  अंत में यह एक शब्द तक सीमित हो गया। बुद्ध ने कहा, अगर तुम सवा लाख श्लोक नहीं समझ सकते, उससे कम भी नहीं समझ सकते, तो लो, मैं एक शब्द में उस पूरे ज्ञान को कहता हूं। वह वर्ण है- अ!
अब इस अ को बूझना, सवा लाख श्लोकों को बूझ लेने के बराबर ही हुआ। है न!
यह अ नकार का है। नकार में न होता है, लेकिन हर वर्ण में अ होता है। न का अ देखना ही उसे समझना है। बुद्ध ने अ को महत्व दिया, क्योंकि वह नकारात्मक हैं। बौद्ध धर्म कोई सकारात्मक दर्शन नहीं है, वह बेहद नकारात्मक है। हर चीज़ के लिए ना कह देता है। बुद्ध ने अपने से पहले की ज्ञान-परंपरा को ना कहा। उन्होंने वेदों को ना कह दिया। उन्होंने ईश्वर को ना कह दिया। तपस्या की जो सारी प्रणालियाँ उस समय मान्य थीं, उन सबको एक-एक बार छुआ और उन्हें अपर्याप्त बताते हुए ना कह दिया। उनके पिता ने उन्हें ऐश्वर्य दिया। उसे भी उन्होंने ना कह दिया। साथियों ने ज्ञान देना चाहा। उसे भी ना कह दिया। यह ना उन्होंने अ की मदद से किया।
अपने से पहले के ज्ञान के आगे अ उपसर्ग लगा दिया और उसे अज्ञान बना दिया। वैदिक नित्य के आगे अ लगा दिया और अनित्य बना दिया। लोग द्वय में फँसे हुए थे। उन्होंने आकर अ लगा दिया। अद्वय बना दिया।  एक साधारण अ, उपसर्ग की तरह लग जाए, तो बना-बनाया अर्थ उलट जाता है। बाग़ी क्या करता है? यही करता है। समाज जिसे न्याय कहता है, बाग़ी आता है और बताता है कि नहीं, यह न्याय नहीं, अन्याय है। और बग़ावत कर देता है। इसीलिए बुद्ध बाग़ी थे। विद्रोही थे। जो पूर्ण है, जिसे सब लोग पूर्ण मानते थे, बुद्ध ने उसके आगे अ लगा दिया और उसे अपूर्ण घोषित कर दिया। एक नया रास्ता दिखा दिया, जो कि एक नया अपूर्ण होगा।
रागी और बाग़ी, दोनों ही अ से शुरू करते हैं। रागी आलाप लेता है, अ की ध्वनि के साथ शुरू करता है। बाग़ी एक स्टैंड लेता है और एक बने-बनाए सत्य के आगे अ उपसर्ग लगाकर लेता है। रागी और बाग़ी, दोनों ही अपने-अपने समय की कलात्मक कृतियाँ होते हैं। कलाएँ पूर्णता का आवाह्न नहीं करतीं, अपूर्णता की प्राण-प्रतिष्ठा करती हैं। कोई भी ईश्वर हो, वह एक कलाकृति ही है। देवता भी कलाकृति हैं। इनकी रचना मनुष्य करता है। अपने काल-समय के अनुसार अपने ईश्वर, अपने देवताओं की रचना करता है। इसलिए ये सब भी अधूरे होते हैं। इनमें लगातार विस्तार होता रहता है। एक उपनिषद का शांति-पाठ कहता है कि पूर्ण में से पूर्ण को घटा दो, तो भी पूर्ण बचेगा। पूर्ण में पूर्ण जोड़ दो, तो भी पूर्ण मिलेगा। किसी भी वस्तु में, विचार में, अगर कुछ जोड़ा या घटाया जा सके, तो इससे उसकी अपूर्णता साबित होती है, पूर्णता कैसे साबित हो सकती है?
तो क्या वह शांति-पाठ ग़लत है? नहीं, न तो गणित के स्तर पर ग़लत है न ही दर्शन के स्तर पर ग़लत है। क्योंकि वहाँ अपूर्ण को पूर्ण मान लिया जाता है। गणित के हर अंक को पूर्ण मान लिया जाता है, जैसे उसके आगे कुछ नहीं होगा। पर हर अंक के आगे कोई दूसरा अंक है। इस तरह हर अंक को पूर्ण मानने वाला गणित अंतत: कहाँ पहुँचता है? कहीं नहीं पहुँचता, अंत में हाथ खड़े कर लेता है और कहता है- इनफिनिटी है भाई, इनफिनिटी। यह क्या है? इनफिनिटी भी तो अपूर्णता ही है। जो अनंत है, वह यक़ीनन अपूर्ण है। हर अंक को पूर्ण मानकर भी तुम अपूर्णता की ओर ही बढ़ रहे हो। कहा जाता है कि यह ब्रह्मांड पूर्ण है, पर क्या सच में? यह सृष्टि अपने आप में एक अपूर्णता है। यदि पूर्ण है, तो उसका एक आरंभ होगा, एक अंत होगा। इस सृष्टि का न तो आरंभ पता है, न ही अंत पता है। क्या पता है? महज़ बीच का हिस्सा पता है। बीच के जिस हिस्से में हम हैं, उसका एक अंश पता है। तो पूरा कहाँ पता है? महज़ अधूरा पता है। यह हमारा हुनर है कि अधूरे पते पर भी चिटिठयाँ पहुँच जाती हैं।
और यही कला है। हमारी हर कलाकृति एक अधूरा पता है, लेकिन फिर भी वह किसी जगह पहुँच जाती है, इसी में कला है। मान लीजिए, मैंने एक कविता लिखी। पढ़ने वाले को लगता है कि इसकी शुरुआत पहली पंक्ति से हो रही है। पर सच में वैसा नहीं है। उस पहली पंक्ति को मैंने सबसे बाद में लिखा था। वह तो हक़ीक़त में अंत की पंक्ति थी, जो मैंने सबसे पहली पंक्ति के रूप में लिख दी। तो शुरुआत का बिंदु क्या है? अंत का बिंदु क्या है? कुछ नहीं है। किसी भी कलाकृति का, किसी भी विचार का आदि और अंत पता करना असंभव है। हम महज़ अपनी बुद्धि की सुविधा के लिए आदि और अंत को मान लिया करते हैं। चाहे जीवन हो या कला, वह बीच में मौजूद है। एक विशाल मध्य-भाग है। कला वहीं रहती है। विचार वहीं पर रहते हैं। कौन कहाँ से आया, रहस्य है। कौन कहाँ को जाएगा, रहस्य है। जितनी देर साथ है, सामने है, उतनी देर तक वह है और, यक़ीनन है।
उत्तर-आधुनिक फ्रेंच विद्वानों दिल्यूज़ और गुआत्तरी के राइज़ोम को याद करना चाहूँगा। राइज़ोम एक पौधा होता है, जिसमें कोई तना नहीं होता, बस जड़ ही जड़ होती है। एक जड़ से दूसरी जड़ उत्पन्न हो जाती है। एक तरह का कंद होता है। वनस्पति-शास्त्र में देखा जाए, तो राइज़ोम परिवार में बहुत सारे दूसरे पौधे भी आते हैं। जैसे हल्दी, अदरक, कंद ये सब अलग-अलग तरह के राइज़ोम हैं। दिल्यूज़ और गुआत्तरी अपने राइज़ोम को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं- इस जड़ की कोई शुरुआत नहीं है, इस जड़ का कोई अंत नहीं है। हमारे सामने बस मध्य-भाग होता है।
हम जिस जगह को छुएँगे, वह एक नया मध्य-भाग होगा। हमने उसे काट लिया, काट के मेज़ पर रख दिया, तो हमें उसके दो सिरे दिख जाएँगे और हम मान लेंगे कि यह उसके शुरू और अंत के बिंदु हैं, पर वैसा सिर्फ़ मानेंगे, वह हक़ीक़त नहीं होगी। बस, ख़ुद के साथ किया गया हमारा एक नया खेल होगा।
और प्रेम में हम ऐसे बहुत सारे खेल करते हैं। आपके जीवन में एक प्रेमी आया। आप यह भूल जाते हैं कि उसके पास एक पूर्व-जीवन भी रहा होगा। कल को वह आपके जीवन से निकल जाएगा। आप इस कल्पना से भी भयभीत होते हैं कि उसके बाद एक पश्चात-जीवन भी बचेगा। आपके लिए उसका जीवन महज़ उतना होता है, जितने में आप उसके साथ हैं। उसे आप पूरा मान लेते हैं। इसीलिए प्रेमी क़िस्म के लोग ऐसे भावुक उद्गार सबसे ज़्यादा प्रकट करते हैं कि – मैं अधूरा था, तुम भी अधूरी थी। हम दोनों मिलकर पूरे हो गए। दो महीने बाद प्रेमी का चक्कर कहीं और चल जाता है, प्रेमिका किसी और के साथ व्यस्त हो जाती है। तब वह पूरापन कहाँ चला जाता है? बस यह कि उतनी देर के लिए उन्होंने मान लिया था कि वे पूरे हो गए हैं। एक दिन नए सिरे से उनमें अधूरापन आ जाता है और वे नए साथी को तलाशने लग जाते हैं, पूरा हो जाने के लिए। इंसान जो नहीं होता है, वह हो जाना चाहता है। वह पूरा नहीं होता, इसीलिए पूरे हो जाने की तलाश करता रहता है। जबकि होता वह अधूरा है, लेकिन अधूरा होने की तलाश नहीं करता।  हर आदमी आत्म की खोज में लगता है, स्व को पा लेना चाहता है, अध्यात्म की तमाम किताबें पढ़ता है, दाढ़ी वाले बाबाओं की शरण में जाता है। यह भी नहीं सोचता कि बाबाओं में दाढ़ी का फैशन इतना कॉमन क्यों है? इतनी-सी बात नहीं सोचता, लेकिन सोच के सबसे ऊँचे धरातल पर पहुँच जाना चाहता है- ख़ुद को पा लेना चाहता है। बताइए, ग़लत पते पर सही चिट्‌ठी कैसे पहुँच सकती है? वह ख़ुद को पाना चाहता है, ख़ुद अधूरा है, यानी क़ायदे से उसे अपने अधूरेपन को पाने की यात्रा करनी चाहिए थी, लेकिन दौड़ रहा है वह पूरेपन की तरफ़? जो कि वह है नहीं। अगर वह पूरा होता, तो पूरेपन की तलाश को आत्म की खोज कह सकते थे, लेकिन है वह अधूरा, तो पूरेपन की तलाश को आत्म की खोज कैसे कह सकते हैं?
ठीक यह बिंदु है, जहाँ प्रेमीगण एक अद्भुत कलाकृति में तब्दील होने से वंचित रह जाते हैं। एक श्रेष्ठ कलाकृति बन सकने की सारी सामग्री होने के बाद भी वे श्रेष्ठ कलाकृति नहीं बन पाते, क्योंकि वे ग़लत पते की ओर चलने लगते हैं। जाना दिल्ली है, बैठ गए मुंबई की ट्रेन में। जाओ, अब इंडिया गेट की जगह गेटवे ऑफ इंडिया देखकर कन्फ़्यूज़न का आनंद पाओ। यात्रा का आनंद तो ख़ूब आएगा, लेकिन अंत में पाएँगे कि कहीं नहीं पहुँच पाए।
ठीक यही बिंदु है, जहाँ पर कोई कविता, उपन्यास या कोई भी कलाकृति श्रेष्ठ होने से वंचित हो जाती है, क्योंकि वह ग़लत पते पर ख़ुद को खोजने लगती है। कलाकृतियों को अपूर्णता की आराधना करनी चाहिए, करने लगती हैं वे पूर्णता की आराधना। जब आराध्य ही ग़लत चुनोगे, तो वरदान कैसे सही मिल जाएगा?
श्रेष्ठ प्रेमकथाओं में अपूर्णता का तत्व बहुत बारीकी से मिलता है। सारी प्रेमकथाओं का ज़िक्र नहीं कर सकते, एक प्रेमकथा मुझे अक्सर याद आती है, शायद अपनी सिंधी पृष्ठभूमि के कारण, जो कि आंशिक तौर पर मेरी भी पृष्ठभूमि है। यह सस्सी-पुन्नू की प्रेमकथा है। पुन्नू एक राजकुमार था। सस्सी एक धोबी की बेटी। किसी तरह दोनों में प्रेम हो गया। राजकुमार का परिवार इस विजातीय प्रेम-संबंध के ख़िलाफ़ था। फिर भी दोनों ने शादी कर ली। राजपरिवार ने क्रोध में आकर षडयंत्र किया और शादी की रात पुन्नू को बहुत शराब पिलाई। फिर उसे किडनैप कर अपने साथ ले गए। यहाँ सस्सी नींद में भी पुन्नू की प्रतीक्षा करती रही। सुबह उठी, तो पाया कि पुन्नू सुहागरात को भी कमरे में ना आया था। अब वह ग़ायब हो गया है। उसे लगा, पुन्नू बेवफ़ा निकला। वह उसकी तलाश में दौड़ पड़ी। कच्छ का रेगिस्तान पार करना बहुत मुश्किल था। भूख-प्यास से बदहाल हो गई। तभी रास्ते में दो ऊँटसवार मिले। उस रूपसी को देख उसका फ़ायदा उठाने की कोशिश करने लगे। सस्सी ने धरती से पुकार की। धरती फट गई। सस्सी उसमें समा गई। उसका दुपट्‌टा आधा ही दफ़न हुआ। आधा ज़मीन के ऊपर लहराता रहा। जब पुन्नू को होश आया, वह उल्टे पैर उसी राह दौड़ा आया और रास्ते में उसे वह दुपट्‌टा दिखा। उसके होश उड़ गए। शायद वह भी वहीं मर गया।
हम चीज़ों को जिस तरह पूरा मानते हैं, उस तरह यह कहानी भी पूरी है, पर क्या सच में यह पूरी है? सूफ़ी सिंधी कवि शाह अब्दुल लतीफ़ की किताब में यह कहानी विस्तार से है। आप इंटरनेट पर भी अंग्रेज़ी में खोजकर पढ़ सकते हैं। शुरू से ही यह कहानी एक अधूरेपन की ओर बढ़ती दिखाई देती है- एक ऐसा अधूरापन, जिसे हम स्वीकार नहीं कर पाते। उनका प्रेम अधूरा है। उनका मिलना अधूरा है। उनका बिछड़ना भी अधूरा है। राजपरिवार का षडयंत्र अधूरा है। ऊँटसवारों की कुत्सा अधूरी है। सस्सी का मरना अधूरा है। पुन्नू का बिलखना अधूरा है। और यह अधूरापन घटनाओं के स्तर पर नहीं, अनुभूतियों के स्तर पर है।  इस अधूरेपन को आप भाषा के भीतर विश्लेषित नहीं कर सकते, सिर्फ़ अनुभूत कर सकते हैं। ज़मीन में आधा दफ़न, लहराता हुआ दुपट्‌टा इस अधूरेपन का पर्याप्त इशारा दे देता है।
प्रेम क्या होता है? ज़मीन में आधा दफ़न, लहराता हुआ दुपट्‌टा ही तो होता है। उसे पूरा मान लो या अधूरा मान लो। जो भी मान लो, आधा दुपट्‌टा नज़र से ओझल ही रहेगा। आधा दिखते को पूरा मान लेना होगा। दुनिया की सारी कहानियाँ अधूरी होती हैं। कविताएँ अधूरी होती हैं। प्रेम भी अधूरा होता है। प्राचीन साहित्य का इतिहास देख लिया जाए, कितनी सारी अधूरी रचनाएँ दिखती हैं। बाण की कादंबरी अधूरी रह गई। कहानी को आगे बढ़ाने का काम उनके बेटे भूषण ने किया। कालिदास की कुमार सम्भव को अधूरा ही माना जाता है, जाने किसने उसे पूरा किया। रघुवंश अपूर्ण है, यह मानने वाले भी कम नहीं। मेरी प्रिय पुस्तकों में से एक श्रीहर्ष की नैषध के बारे में भी विद्वान अपूर्णता के उदाहरण खोज लाते हैं। वेद व्यास ने महाभारत का नाम जय रखा था और उसकी शुरुआत में ही कह दिया है कि इस ग्रंथ में मैंने चौबीस हज़ार श्लोक ही लिखे हैं, लेकिन अब किताब में एक लाख श्लोक मिलते हैं। वेद व्यास को लगा था कि उन्होंने कहानी पूरी कर दी है, जाने कौन बीच में आ गया, जो उसने बाक़ी पौने लाख श्लोक उसमें जोड़ दिए? व्यास के पूर्ण काम को अपूर्ण साबित कर दिया? उसी में हरिवंश पुराण जुड़ गया। उसी में गीता जुड़ गई। जुड़ता ही गया। जिसमें कुछ भी नया जुड़ता जाए, वह हमेशा अपूर्ण रहता है। पुणे के भंडारकर इंस्टीट्यूट में बरसों रिसर्च चलती रही कि महाभारत के कौन-से हिस्से भाषा और शैली के हिसाब से अलग हैं और बाद में जोड़े गए हैं, उन्हे निकालकर एक अलग पाठ बनाया जाए। जाने कौन लोग होंगे, जो उस पाठ से संतुष्ट हो जाएँगे। यह भी जीवन की एक विडंबना ही है। आपको लगता है कि आप पूरे हैं, आपका काम पूरा हो गया, लेकिन समाज और दुनिया बता देती है कि आप अभी भी पूरे नहीं हैं। वेद व्यास को लगा था कि वह पूरे हैं, उनके बाद के लेखकों ने बता दिया कि नहीं, अधूरे हो। बुद्ध और गांधी को लगा कि वे पूरे हैं, काम पूरा कर दिया, पर दुनिया ने बता दिया कि ना, पूरे नहीं हो सकते। हम नई-नई विधियों से हिंसा करेंगे, नए-नए छल करेंगे, करुणा को भी एक बम की तरह फोड़कर लोगों की जान ले लेंगे और ऐसा कर-करके, ओ बुद्ध-ओ गांधी, हम बता देंगे कि तुम भी अधूरे ही रहे। जो पूरे होते, तो हम लोग तुम्हारे सपनों जैसा समाज बना ही देते। हम न बनाएँगे। हम तुम्हें पूरा ही नहीं होने देंगे।    
इस दुनियावी पूरेपन से पश्चिम के लोग ज़रा सावधान रहे। भले होमर की ईलियड और ओडिसी के भी अधूरे होने की चर्चा सुनाई देती हो, वे लोग अपनी किताबों के पाठ को लेकर शुरू से ही सतर्क रहे, इसलिए शायद उनमें नई कथाएँ नहीं जुड़ पाईं। 18 लाख शब्दों वाली महाभारत, होमर की किताबों से दस गुना बड़ी है। जो आकार में जितना बड़ा होता है, उसकी अपूर्णता भी उतनी ही बड़ी होती है। जिसके पास ज़्यादा ज्ञान होता है, उसी के पास ज़्यादा अज्ञान भी होता है।
ज्ञान और अज्ञान के संबंध को एक वृत्त की तरह समझा जा सकता है। ज्ञान, रोशनी का एक वृत्त है। उसके अंदर सब रोशन है। वृत्त के बाहर जो कुछ है, वह अज्ञान है। अज्ञान उस वृत्त की परिधि पर बैठा हुआ अंधेरा है। ज्ञान के वृत्त का आकार बढ़ाते जाइए, उसकी परिधि बढ़ती जाएगी और परिधि पर अज्ञान बैठा है, यानी अज्ञान का आकार बढ़ता जाएगा। जिन लोगों को लगता है कि बहुत पढ़-लिखकर, ध्यान-साधना कर वे अपना ज्ञान बढ़ा रहे हैं, दरअसल, वे अपना अज्ञान बढ़ा रहे हैं। महज़ इसी उदाहरण से यह समझा जा सकता है कि ज्ञान और अज्ञान के बीच किस तरह निरंतर बदलते रहने वाला एक अपूर्ण क़िस्म का संबंध है। इसी तरह का संबंध जीवन और कला के अन्य क्षेत्रों में भी खोजा जा सकता है।
श्रेष्ठ कलाएँ कभी पूर्णता की दौड़ नहीं दौड़तीं। अगर उन्हें कुछ अभीष्ट होता है, तो वह उस दुनियावी पूर्णता से अलग कोई चीज़ होती है। वे लगातार एक अपूर्णता की तरफ़ बढ़ रही होती हैं। दुनिया उसे पूर्ण की तरह देखने लगती है। यहीं पर दोनों के बीच द्वंद्व होता है। एक-दूसरे को ग़लत समझ लेने की दारुणता पैदा होती है। दुनिया की रफ़्तार बहुत तेज़ है। उसे कहीं नहीं जाना, इसलिए वह बहुत तेज़ दौड़ती है, दौड़ते-दौड़ते बहुत आगे निकल जाती है। कविता शनि ग्रह की तरह है, स्वभावत: धीरे चलेगी, ठहरकर देखेगी। दोनों का साथ चलना मुश्किल है। दुनिया आगे चली जाया करेगी, कविता पीछे से आवाज़ देती रहेगी कि ओ दुनिया, तुम ग़लत जा रही हो, सुनो, थोड़ा यू-टर्न लो, इस तरफ़ जाना है। कुछ लोग पूछते हैं कि जैसे पुराने समयों में कविता समाज का नेतृत्व करती थी, अब क्यों नहीं करती? उन्हें इस दृश्य से जवाब मिल जाना चाहिए—कविता अब भी नेतृत्व कर रही है, लेकिन आगे से नहीं, पीछे से। एक नेता आगे चलता है, हज़रत मूसा की तरह, सबसे आगे चलता हुआ सबको कहीं ले जाता है। दूसरा नेता जीसस जैसा होता है, जो सबसे पीछे खड़ा होता है और वहाँ से पुकारता है कि लौट आओ, ग़लत राह चले गए। कविता इस दूसरे नेता की तरह होती है। वह करुण स्वर में पुकारती है, लौट आने और राह बदलने की आर्त पुकार। कि आओ, हम दोनों एक साथ अधूरे बन जाएँ। देखो, तुम भी पूरे हो, मैं भी पूरी हूं, आ जाओ, जुड़कर हम एक नया अधूरापन गढ़ेंगे।
मैं क्या, किसी भी कवि या लेखक का डीएनए जाँचा जाएगा, तो वह अधूरी चीज़ों का देवता ही निकलेगा। जैसा साहिर कह गए थे- वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमक़िन, उसे एक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा। हम सब अपने जीवन में इसी ख़ूबसूरत मोड़ को तलाशते हैं।
सोचिए, हम साथ-साथ चल रहे हैं। हमें पता है कि हम कभी पूरे नहीं हो सकते, लेकिन किसी एक मोड़ पर मुड़ ज़रूर जाएँगे। हम एक गली के पास से गुज़रेंगे। मैं बिना बताए उस गली में मुड़ जाऊँगा। फिर कभी दिखाई नहीं दूँगा। मेरा कोई निशान नहीं बचेगा। मैं अपने अधूरेपन में खो जाऊँगा। क्या तुम दो पल को मुझे महसूस करोगे? गली जो आगे मुड़ती है, उसके मुहाने पर खड़े होकर इंतज़ार करोगे या आगे बढ़ जाओगे? मुझे याद कर-करके मेरे अधूरेपन में नए क़िस्से जोड़ोगे या मुझे भूलकर मेरे अधूरेपन की समिधा चढ़ा दोगे? इतना ही साथ था। साथ आधा छोड़कर चला जाऊँगा। उसे पूरा कह पाओगे? तब महसूस करोगे, जीवन की गली कभी पूरी नहीं होती, बस, आगे जाकर मुड़ जाती है।

Friday, October 27, 2017

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 3 : जाते हैं जिधर सब, मैं उधर क्यों नहीं जाता






जो सभी लोग करते हैं, आप भी अगर वही करेंगे, तो आपको कभी विशेषण नहीं मिलेंगे। अधिकतर विशेषण हास्यबोध से निकलकर आते हैं। जिनका बहुत मज़ाक़ उड़ाया जाता है और जो बहुत महान होते हैं (और दोनों अमूमन एक ही होते हैं और यह भी एक कारण है कि महान शब्द अब मख़ौल के लिए ज़्यादा प्रयुक्त होता है), वे अपने अधिकांश काम उस तरह नहीं करते, जिस तरह बाक़ी दूसरे लोग करते हैं। किसी को पागल इसलिए भी कहा जाता है कि वह समाज के प्राकृतिक नियमों का पालन नहीं करता। समाज और प्रकृति के साथ उसका अलग और निजी रिश्ता होता है। यही रिश्ता एक ‘जगह’ की निर्मिति करता है। सिर्फ़ भौगोलिक जगह नहीं, सिर्फ़ मानसिक जगह नहीं, बल्कि दोनों क़िस्म की जगहों का एक अमूर्त-सा मिश्रण। एक ऐसा निजी मिश्रण, जो बहुत विशिष्ट होता है। कला का वास इसी अमूर्त-सी ‘जगह’ में होता है।

जैसे दिल्ली में लाखों शायर हुए होंगे, नामदार, गुमनाम और ज़्यादातर ने दिल्ली को अपनी शायरी में जगह दी, लेकिन जो ग़ालिब की दिल्ली है, वह किसी और की दिल्ली नहीं। जो मीर की है, वह भी किसी और की नहीं। एक ही दिल्ली दो लोगों के भीतर नहीं रह सकती। हम इन लोगों को पढ़ते हैं और इनकी दिल्ली को खोजते हैं। जहाँ वह हमारे भीतर की दिल्ली से मैच हो जाती है, हम पा लेने के भाव से भर जाते हैं। तब हम पढ़ रहे होते हैं दिल्ली, लेकिन समझ रहे होते हैं भोपाल। मीर लिख रहे हैं अपने दिल का हाल, हमें लगता है, हमारे दिल का अहवाल। कविता एक ऐसी ‘जगह’ है, जहाँ ग़लत समझकर भी, दरअसल, हम कितना सही समझ रहे होते हैं।

दिल की बस्ती भी शहर दिल्ली है / जो भी गुज़रा उसी ने लूटा

किसी दूसरे की भौगोलिक जगह हमारी अपनी भौगोलिक जगह बन जाती है। काफ़्का प्राग की गलियों में चलता था, लेकिन यह वह प्राग नहीं था, जो उसके पूर्वज यान नेरूदा (जिनके नाम पर पाब्लो नेरूदा ने अपना नेरूदा रखा) अपनी ‘प्राग टेल्स’ में लिख गए थे। काफ़्का के प्राग का नक़्शा, काफ़्का के मन में बना हुआ था। काफ़्का को पढ़कर आप किसी पर्यटक की तरह प्राग में नहीं घूम सकते, लेकिन काफ़्का को पढ़कर आप उसके प्राग को खोज निकालने की इच्छा से भी बच नहीं सकते। कला के भीतर यही ‘जगह’ है। भूगोल नहीं है, मानस नहीं है, मानसिक भूगोल कह लीजिए, सुविधा होगी, पर है यह महज़ एक ‘जगह’।

नीचे की ये पंक्तियाँ कहते समय मीर लखनऊ पहुँच चुके हैं, वहाँ के शायरों को इशारे में अपना परिचय दे रहे हैं, जिस्म लखनऊ में है, दिल दिल्ली में है, लेकिन कविता में यह कौन-सी जगह है? यह विडंबना नाम की जगह है, दर्द है, उजड़ जाने की वीरानगी है, आप ख़ुद महसूस कीजिए कि हम अपने जीवन में इस बर्बाद जगह को कितना जीते आते हैं, जो उनकी दिल्ली है, हमारी कुछ और है--

दिल्ली जो एक शहर था आलम में इंतिख़ाब

रहते थे मुंतख़ब ही जहाँ रोज़गार के

उसको फ़लक ने लूट के बर्बाद कर दिया

हम रहने वाले हैं उसी उजड़े दयार के


तो ज़फ़र कहते हैं –

लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में

किसकी बनी है आलम-ए-नापाएदार में


दयार इस क़दर उजड़ा हुआ है, लुटा हुआ है, बर्बाद है, दिल-ए-दाग़दार में हसरतों तक की जगह नहीं बची है, फिर भी वह एक ‘जगह’ है। मीर फिर उस भूगोल में लौटते हैं और कहते हैं –

दिल व दिल्ली दोनों अगर हैं ख़राब

प: कुछ लुत्फ़ उस उजड़े घर में भी हैं


तो मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी को लुत्फ़ नाम की इस जगह का पता बहुत अच्छे से पता है। वह कहते हैं  -


ऐ मुसहफ़ी तू इनसे मुहब्बत न कीजियो

ज़ालिम ग़ज़ब की होती हैं ये दिल्ली वालियाँ।


ये जो अलग-अलग शेरों की दिल्लियाँ हैं, ये चार अलग-अलग ‘जगहें’ हैं। भौतिक तौर पर सबका नाम दिल्ली हो सकता है, लेकिन मानसिक तौर पर सब अलग-अलग दुनियाँ हैं। अमूर्त दुनियाँ हैं। इनका कोई आकार नहीं है। आप इन्हें महसूस कर सकते हैं, लेकिन इनका कोई नक़्शा नहीं बना सकते। आप इन ‘जगहों’ पर रह सकते हैं, , लेकिन अपने विजिटिंग कार्ड पर इन जगहों का पता नहीं छाप सकते। उसके बाद भी कुछ लोग इन जगहों पर पहुँच जाते हैं, आपको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते पहुँच जाते हैं, या यहाँ पहुँचने के बाद आपको ढूँढ़ निकालते हैं- सब लोग नहीं, कुछ लोग। सब लोग पहुँच जाएँ, तो कविताएँ सबकी समझ में आने लग जाएँ, लेकिन जिन जगहों पर सब लोग पहुँच जाएँ, वह कला की नहीं, पर्यटन व व्यवसाय की जगहें होती हैं।

कला, कविता, दर्शन आदि के बारे में बात करते हुए एक बड़ी समस्या यह होती है कि आप अमूर्त होने से नहीं बच सकते। हमारे संस्कार ऐसे होते हैं कि हम बचपन से ही अमूर्त चीज़ों की आराधना करते हैं, लेकिन अमूर्त होने से दूर भागते हैं। हमें मूर्तियों की आदत है। हमें पूजा के लिए भी मूर्ति चाहिए और तोड़ने के लिए भी मूर्ति चाहिए। बुतकश हों या बुतपरस्त, बिना बुत के काम नहीं चल पाता। जबकि जीवन की सचाई यह है कि मूर्तियों में जितनी भी जान होती है, वह अमूर्त होती है। जान या प्राण एक अमूर्त शब्द है। उसे आप महसूस कर सकते हैं, उसके उदाहरण दे सकते हैं, लेकिन उसका आकार नहीं बता सकते। मान लीजिए कि इस दुनिया में सबकुछ मूर्त हो, अमूर्त कुछ भी न हो, तो यह दुनिया कैसी होगी? निर्जीव वस्तुओं का सर्कस होगी। मिट्‌टी और चट्‌टान तो मंगल पर भी हैं, लेकिन उनमें अमूर्त की प्रतिष्ठा करने वाला वह कलाकार नहीं है, जिससे जीवन की उत्पत्ति होती है। किसी भी मूर्ति की जान उसके अमूर्त में होती है। यह अमूर्त हटा दिया जाए, तो जीवन, लाश में बदल जाएगा। जब जीवन से अमूर्त को नहीं हटाया जा सकता, तो कला से अमूर्त को कैसे हटाया जा सकता है? बिना अमूर्त के आप जीवन को नहीं समझ सकते, तो बिना अमूर्त को जाने आप कला को क्यों समझ लेना चाहते हैं?

यही अमूर्त कई बार अर्थ की तरह कविता के भीतर व्याप्त होता है, तो कई बार उस अनुभूति की तरह, जिसे मैं ‘जगह’ कह रहा हूँ। जो लोग शिकायत करते हैं कि उन्हें कविता समझ में नहीं आती, दरअसल, वे उन ‘जगहों’ तक पहुँच पाने में अपनी असफलताओं को स्वीकार कर रहे होते हैं। और इसमें कोई दोष भी नहीं है। हम ताउम्र मूर्तियों के प्रेम में होते हैं। चलते-फिरते मिट्‌टी के पुतलों के रूप में इंसानों की मूर्तियाँ।  अगर लाशों को बचाए रखने की सुविधाएँ बन जाएँ, तो श्मशानों और क़ब्रस्तानों की जगह लाश रखने वाले लॉकर किराए पर मिलने लगेंगे। जैसा कि पुराने राजा, ख़ासकर इजिप्त के, करते भी थे। वे अपने प्रियजनों की लाशों को हमेशा के लिए संभालकर रखना चाहते थे। शरीर भी एक जगह है, और उस जगह के साथ हमारा रिश्ता बना रहता है। मान लीजिए, मिस्टर एक्स का शरीर मर गया और उसकी आत्मा ने आकर हमें सूचना दी कि मैं एक पेड़ के रूप में जन्म ले रहा हूँ, तब? हमने तो ताउम्र दावा किया है कि मैं तुम्हारे जिस्म से नहीं, तुम्हारी अच्छी आत्मा से प्रेम करता हूँ। तो इस दावे के आधार पर क्या हम उस पेड़ से भी उतना ही प्रेम कर पाएँगे? आप चाहें जो कहें, मुझे तो लगता है कि नहीं कर पाएँगे। क्योंकि हमारी ट्रेनिंग इस तरह से नहीं होती। हमारी ट्रेनिंग ऐसी है कि हम अमूर्त से प्रेम का दावा करें, लेकिन प्रेम मूर्ति से करें। हमें वे दावे करने की ट्रेनिंग मिली होती है, जिनका असलियत से कोई ख़ास लेना-देना नहीं होता। मूर्ति के अंदर एक अमूर्त भगवान रहता है, उससे हम लाख छल कर लेंगे, किसी को पता भी न चलने देंगे, लेकिन अगर मूर्ति का किसी ने ग़लती से भी अपमान कर दिया, तो हम मार दंगा मचा देंगे।

इस तरह इंसानों की बुनियादी ट्रेनिंग ही एक तरह से कला-विरोधी होती है। अमूर्त को अमान्य करना, और यदि मान्य भी किया, तो उसके साथ छप्पन छल करना, कला-विरोधी मानसिकता है।

हमारे समय में कविता काग़ज़ पर लिखी जाती है। लेकिन काग़ज़ को कविता नहीं कह सकते। काग़ज़ को लेकर ग़ालिब का एक मशहूर शेर याद आता है। वह शेर एक उदाहरण है कविता में ‘जगहों’ के इस्तेमाल का। भौतिक और मानसिक दोनों क़िस्म की जगहें। पहले शेर, फिर उसका अर्थ, फिर ‘जगह’ की बात।

नक़्श फ़रियादी है किसकी शोख़ी-ए-तहरीर का

काग़ज़ी है पैरहन, हर पैकर-ए-तस्वीर का।


चूँकि यह ग़ालिब का शेर है, एक स्तर पर यह बहुत आसान है, दूसरे स्तर पर बहुत जटिल। पहला अर्थ ऐसे बनता है- कोई तो है जिसने अपनी शरारत-भरी लिखावट से कुछ ऐसी बातें लिखी हैं, जिससे दुनिया की हर रेखा, हर निशान, टेढ़ा-मेढ़ा, जटिल हो गया है, इस तस्वीर या सृष्टि का हर इंसान काग़ज़ के कपड़े पहनकर फ़रियादी बना हुआ है। यानी इंसान का शरीर तो ख़ुद ही नश्वर है लेकिन वह किसी और से या ख़ुदा से फ़रियाद कर रहा है।

दूसरा अर्थ इसी का विस्तार है। एक ज़माने में ईरान में परंपरा थी कि अगर कोई शाह के सामने फ़रियाद लेकर जाता, तो काग़ज़ के कपड़े पहनकर जाता था। उसी से पता चल जाता था कि वह फ़रियाद करने आया है। इसी कहानी की ओर इशारा करते हुए ग़ालिब ने यह शेर कहा था – हम सब इंसानों ने काग़ज़ के लिबास पहन रखे हैं, जो कि कट-फट जाएँगे, टूट जाएँगे, ख़त्म हो जाएँगे, और यह जानते हुए भी हम फ़रियादी बने हुए हैं, और तुर्रा यह कि किसने सामने फ़रियादी बने हुए हैं? उसके सामने, जिसने अपनी शरारत भरी लिखावट से हमारे जीवन में दस तरह की जटिलता डाल दी है। और कल्पना कीजिए कि यह फ़रियाद क्या होगी? शायद यह होगी कि जो यह जटिलता है, समाप्त हो जाए। अब यह जो शरारती लिखवैया है, वह क्या करेगा? उसने तो जटिलता लिख दी है। अब सरलता कहाँ से लावेगा? ग़लत फ़रियाद कर रहे हो, ग़लत आदमी के सामने कर रहे हो, जो तुम्हारा गुनहगार है, उससे तुम फ़रियाद करके इंसाफ़ की उम्मीद कर रहे हो? सही कर रहे हो? मान लो, उसने सरलता लिख दी, तब क्या करोगे? तब नई फ़रियाद लेकर आओगे कि उसका ज़्यादा सरल लिख दिया, मेरा कम सरल है। सरलता तो सबके लिए अलग-अलग होती है न। बीस साल के आदमी के लिए सात का पहाड़ा बहुत सरल है, लेकिन जिसकी उम्र पांच ही साल है, उसने तो सात का पहाड़ा रटने में ही सात महीने लगा दिए थे। उस तिफ़्ल के लिए तो वही सबसे कठिन है।

इस तरह इस शेर का अर्थ और गहरा, और गहरा, और गहरा होता जाएगा। लेकिन महज़ उसके लिए, जो उन सारी जगहों तक पहुँच सकता हो। कविता पाठक से एक ख़ास क़िस्म की लियाक़त माँगती है। सुंदरताओं का आनंद उठाने के लिए योग्यता चाहिए और अच्छी कविता हमारी योग्यताओं की परीक्षा लेती है। ग़ालिब इस शेर में एक ख़ास जगह बैठे हुए हैं। वह दिल्ली में बैठे हैं। हिंदुस्तान में हैं। जिसका बहुत क़रीबी रिश्ता ईरान से रह चुका है। जिस भाषा में वह बोल रहे हैं, उसका संबंध ईरान से रह चुका है। यह तो हुई भौतिक जगह। अगर हमें इन जगहों के बारे में, इनकी परंपराओं के बारे में पता है, तो हम यह पहला पड़ाव पार कर लेते हैं कि इसका रिश्ता उस ईरानी परंपरा से है। इस शेर में ग़ालिब कुछ मानसिक जगहों पर भी बैठे हैं। जैसे एक जगह मुहब्बत की है, एक जगह दर्शनशास्त्र की है, एक जगह व्यंग्य की भी है और एक जगह विडंबना की भी है। ग़ालिब हमें आमंत्रित करते हैं कि इस शेर में हम उन सभी जगहों तक जाएँ।

आजकल सभी के हाथ में स्मार्टफोन है। उसकी भाषा का एक शब्द है सिन्क होना। यानी सिन्क्रोनाइज़्ड होना। यानी दो जगहों का एक सुर में आ जाना। उनमें तालमेल बन जाना। कविता में यह सिन्क होना बहुत ज़रूरी है। कवि के भीतर की जगह और पाठक के भीतर की जगह—दोनों में सिन्क होना चाहिए। नहीं होगा, तो कविता का अधिकतम आनंद नहीं पाया जा सकेगा। यह कैसे होता है? अपने अंदर की जगहों का विस्तार करके ही, उनका संशोधन करके ही हम कवि के भीतर की उस जगह तक पहुँचने की कोशिश कर सकते हैं। शत-प्रतिशत पहुँच जाएँ, यह कोई ज़रूरी नहीं, लेकिन परिहास में कहें, तो हमने अपने जीवन में पैंतीस प्रतिशत पासिंग मार्क की सुविधा बना रखी है। उतने तक तो पहुँच ही सकते हैं।

हर अच्छा कवि अपने भीतर ऐसी कई जगहें बनाता है। वह जिन जगहों पर छिपता है, उन्हीं जगहों पर उजागर होता है। हर अच्छा कवि अपनी कविता के भीतर एक कलात्मक लुका-छिपी खेल रहा होता है। वह अपनी कविता में एक जगह जाकर छिप जाता है, फिर प्रतीक्षा करता है कि पाठक आएगा और धप्पा कहकर उसकी पीठ पर एक धौल मारेगा और उसे पकड़ लेगा। यक़ीन कीजिए, वह सदियों तक यह इंतज़ार कर सकता है। उसके शरीर की मूर्ति नष्ट हो जाए, तो भी उसकी कविता के भीतर की यह अमूर्ति प्रतीक्षा करती रह सकती है। हर अच्छा कवि समझ लिए जाने की आकांक्षा से भरा हुआ होता है। हर अच्छा कवि ग़लत समझे जाने की आशंका से त्रस्त रहता है। उसके बाद भी वह अपनी कविता के भीतर जानी-पहचानी नहीं, बल्कि अनजानी जगहों पर रहना चाहता है, क्योंकि वे जगहें हमें ज़्यादा बुलाती हैं, जिन्हें हम नहीं जानते।

बात फिर वहीं पहुँची, जहाँ से शुरू हुई थी। एक अच्छा कलाकार जाने-पहचाने काम करने, जानी-पहचानी चीज़ें लिखने से बचना चाहता है। समाज और प्रकृति के साथ उसका एक निजी रिश्ता होता है, जो बहुत जाना-पहचाना नहीं होता, वह इतना निजी होता है कि लगभग विशिष्ट होता है। भौतिक जगहें उसके भीतर मानसिक भूगोल बनाती हैं। तभी तो जो ग़ालिब दिल्ली छोड़कर कहीं जाना नहीं चाहते थे, एक ऐसी जगह जाकर का सोचने लगे जहाँ कोई न हो। बेदरो-दीवार का एक घर बनाना चाहते थे। वह कौन-सी जगह है? वह घर कहाँ बन सकता है? कविता के भीतर ही एक ऐसी जगह हो सकती है।

यह जो जगह है, जिसे मैं बार-बार ‘जगह’ कह रहा हूं, वही बेदरो-दीवार का घर है। पूरी दुनिया दरो-दीवार का घर बनाने के लिए हलाकान हो रही, कवि बे-दरो-दीवार का घर बना लेना चाहता है। वह कहता है कि वह वहाँ अकेला रहेगा, पर ऐसा कहकर चाहता क्या है? वह चाहता है कि इससे यह समझा जाए कि उसे वहाँ अकेले नहीं रहना है। कहना एक ‘जगह’ है। समझना भी एक ‘जगह’ है। कविता दोनों ‘जगहों’ के बीच की आवाजाही है। यही जगहें हमें ताक़त और प्रेरणा देती हैं। यही जगहें हमें तमाम दुनिया से अलग बनाती हैं। जैसे निदा फ़ाज़ली का एक शेर है –

मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा

जाते हैं जिधर सब, मैं उधर क्यों नहीं जाता


(गीत चतुर्वेदी का पिछला कॉलम यहां पढ़ें)

Friday, October 06, 2017

इशिगुरो और नोबेल : कुछ फ़ौरी बातें - गीत चतुर्वेदी



कज़ुओ इशिगुरो


पिछले कुछ बरसों से अक्टूबर के महीने की शुरुआत के तीन रिचुअल्स रहे हैं- साहित्य के नोबेल पुरस्कार के पूर्वानुमानों में हारुकि मुराकामी को सबसे प्रबल दावेदार बताना, नोबेल समिति द्वारा अपने कॉन्फ्रेंस रूम का बड़ा-सा दरवाज़ा खोलकर माइक लिए खड़े पत्रकारों के सामने किसी एक नाम का उच्चारण करना और उसके बाद दुनिया के अधिकांश हिस्सों  में हारुकि मुराकामी के प्रति एक शोकगीत का सामूहिक गायन शुरू हो जाना। मुराकामी के प्रशंसकों को यह समझ में ही नहीं आ रहा है कि आख़िर उनमें ऐसी कौन-सी कमी है, जिसके कारण नोबेल पुरस्कार उनसे छिटक जा रहा है। इस समय वह दुनिया के सर्वश्रेष्ठ लेखकों में से हैं। अपनी हर नई किताब से वह अपनी श्रेष्ठता को पुख़्ता कर देते हैं। पिछले दो दशकों में वह एकमात्र ऐसे लेखक हैं, जिन्हें इतने अधिक लोग चाहते हैं कि वह नोबेल पा लें। इतना प्रेम इस दौर में किसी साहित्यिक लेखक को नहीं मिला।

ऊपर के इस पैराग्राफ़ को अगर एक संकेत की तरह पढ़ा जाए, तो इसमें सिर्फ़ एक बदलाव करना होगा- मुराकामी की जगह आप अपने लेखक का नाम रख लीजिए. कोई चाहे, तो न्गुगी वा थियोंगो का नाम रख सकता है, तो कोई फिलिप रॉथ का। को उन, अदूनिस से लेकर आन्त्यूनेज़ तक का नाम रख सकते हैं, क्योंकि हर साल यह उम्मीद लगती है कि शायद इन्हें या इनमें से किसी एक का मिल जाएगा, पर मिलता वह किसी और को है।

खेल का आनंद, मात्र रहस्यों से बढ़ता है। इसे एक पटकथा की तरह देखा जाए-  किसी काम के लिए प्रेमिका अपने प्रेमी को बहुत आशा से देखती है,  प्रेमी टाल जाता है, प्रेमिका नाराज़ होकर सवाल पर सवाल करती है, प्रेमी किसी भी सवाल का जवाब नहीं देता और आंखों से ओझल हो जाता है। प्रेमिका ख़ूब रोती है। अकेली रह जाती है। वह अकेले में ख़ुद से वही सवाल पूछती है, जो उसने प्रेमी से पूछा था। अगले दिनों में उसे जो कोई मिलता है, उससे वह सवाल करती है। लोग अपनी तरह से जवाब दे देते हैं, लेकिन प्रेमी ने तो कोई जवाब ही नहीं दिया था। वह चुपचाप चला गया था। प्रेमिका उसे खोजने के लिए निकल पड़ती है। उसे खोजकर अपने सवालों के जवाब वह उससे मांगेगी। प्रेमी ग़ायब हो चुका है, लेकिन प्रेमिका के भीतर का प्रेम और जवाबों को पा लेने की आकांक्षा समाप्त नहीं हो रही। क्यों? क्योंकि सवाल अनसुलझे छूट गए। जिस प्रेम में भी प्रश्न, अनुत्तरित रह जाते हैं, वह प्रेम कभी समाप्त नहीं होता, ताउम्र ज़िंदा रहता है। प्रश्नों का रहस्य प्रेम को जिलाए रखता है।

नोबेल का खेल, प्रेम के इस खेल की तरह है। जिन सवालों को हम लोग बार-बार, हर साल उठाते हैं, उसी प्रेमी का भेस धरे हुए, नोबेल समिति उनमें से किसी सवाल का जवाब नहीं देती, और कुछ नए सवाल हमें पकड़ाकर चली जाती है। जो सवाल मुराकामी के संबंध में पूछा जा रहा है, वही सवाल बोर्हेस और नबोकफ़ के संबंध में भी पूछा जा सकता है। यह प्रक्रिया अनवरत चलती रहेगी। बीस साल बाद मुराकामी जैसे ही अवसर किसी और के होंगे और उसके बारे में भी यही सवाल पूछे जाते रहेंगे। जवाब कभी नहीं आने वाला।

हारुकि मुराकामी
मुराकामी साल-दर-साल नोबेल से जिस तरह दूर जा रहे हैं, उनका क़द उतना ही बढ़ता जा रहा है। उन्हें नोबेल न मिला, तो देखिएगा, आने वाले बरसों में वह अपने आप प्रूस्त, जॉयस, नबोकफ़ और बोर्हेस की पंगत में बैठे हुए मिलेंगे। महज़ इसलिए नहीं कि इन सबको ही यह पुरस्कार नहीं मिला, बल्कि इसलिए कि नकारी गई श्रेष्ठताओं की मान्यता ज़्यादा पुख़्ता होती है। मुराकामी ने अपने साहित्य में जो नई ज़मीनें तोड़ी हैं, उन्हीं को आधार बनाकर कुछ लोग नए उपन्यास लिखेंगे और नोबेल पा लेंगे। जैसे प्रूस्त, जॉयस और बोर्हेस की ज़मीनों पर लिखने वालों ने पाए हैं। जैसे प्रूस्त की ज़मीन पर लिखने वाले कज़ुओ इशिगुरो को मिला है, लेकिन यह पुरस्कार प्रूस्त से दूर ही रहा। परिहास में यह कहा जा सकता है कि विडंबना है, फूल हमेशा भँवरा ही खिलाएगा लेकिन उस फूल को कोई राजकुँवर ले जाएगा।

इस निबंध की शुरुआत होनी चाहिए थी कज़ुओ इशिगुरो से, लेकिन हो गई मुराकामी से। ‘किसे नहीं मिला’ ने ‘किसे मिला’ को आच्छादित कर दिया। किंतु इसका अर्थ यह नहीं लेना चाहिए कि इस बार का नोबेल पुरस्कार किसी अयोग्य को मिल गया है। इशिगुरो दुनिया के श्रेष्ठतम लेखकों में से हैं और उन्हें नोबेल पुरस्कार मिलना एक योग्य और बड़े लेखक को मिला सम्मान ही है। सवाल बस इतना है कि यदि इशिगुरो को यह सम्मान मिल सकता है, तो मुराकामी को क्यों नहीं मिल सकता? क्या न अच्छा होता कि पहले मुराकामी को मिल जाता, बाद में इशिगुरो को मिल जाता? और इस इशिगुरो के साथ मुराकामी को न मिलने का ही सवाल क्यों उठाया जा रहा है, थियोंगो को न मिलने का सवाल क्यों नहीं उठाया जा रहा? जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, इन सारे सवालों का कोई जवाब नहीं हो सकता, और जो भी जवाब नोबेल समिति या किसी की ओर से आए, संभवत: उन जवाबों पर सहमत भी नहीं जा सकता। योरप में इशिगुरो को पर्याप्त मान्यता प्राप्त है और इस नाते उनको मिले पुरस्कार का स्वागत ही किया जाएगा, जिसमें कुछ भी ग़लत नहीं है, लेकिन इस बात से भी कम ही लोग इनकार कर पाएँगे कि यह पुरस्कार उन्हें उस समय दिया गया है, जब उनसे बेहतर कुछ लेखक प्रतीक्षालय में बैठे हुए थे।

इशिगुरो और मुराकामी में कुछ भिन्नताएं हैं और कुछ ख़ास अभिन्नताएं भी हैं। जैसे कि दोनों ही जापान से रिश्ता रखते हैं। मुराकामी पूरी तरह जापानी हैं।  वह उन अर्थों में जापानी हैं, जिन अर्थों में कुरोसावा जापानी थे। कुरोसावा ने अपनी थीम और शैली पश्चिम से प्राप्त की थी, उन्होंने पश्चिम के कला-जगत को कुछ नया नहीं सिखाया, बल्कि पश्चिम की शैलियों से सीख पाकर उसे अपनी कला में पिरोया। जापान की स्थानीय, अति-नाटकीय, भावुक, प्राचीन काबुकी नाट्यशैली को थोड़ा आधुनिक रूप देते हुए अपनी फिल्मों में शामिल किया। इस तरह उनकी फिल्मों में कला का एक मिश्रित संसार बना। उनके सिनेमा से स्थानीय जापानी भी प्रभावित हुए और पश्चिम में भी उन्हें तुरत लोकप्रियता मिली। कलाओं और शैलियों का ऐसा मिश्रण मुराकामी में भी दिखाई देता है। उनके नैरेशन का तरीक़ा और उत्तर-आधुनिक शैली पूरी तरह पश्चिमी है, लेकिन सोचने का तरीक़ा और परिवेश जापानी है। ‘नॉर्वेजियन वुड’, ‘वन क्यू एट फोर’ में चरित्रों का जो मूल्य-संकट है, वह न केवल जापानी बल्कि ठेठ एशियाई है, पूर्वी है। मुराकामी को भी स्थानीय और वैश्विक दोनों ही स्तरों पर लोकप्रियता मिली।

इशिगुरो सिर्फ़ नाम से जापानी हैं, बाक़ी पूरी तरह ब्रिटिश हैं। छह साल की उम्र में ही उनका परिवार इंग्लैंड आ गया था और तब से वह पूरी तरह ब्रिटिश हैं, लेकिन परिवार से उन्हें जापानी संस्कृति का एक ख़ास हिस्सा भी मिला है। उनका नैरेशन ज़ाहिर तौर पर पश्चिमी है, लेकिन सोचने का उनका तरीक़ा कहीं-कहीं जापानी संकेत दे देता है। उनके पास ठेठ ब्रिटिश या यूरोपीय तरीक़ा-मात्र नहीं है। उनके उपन्यासों का दार्शनिक स्वाद शायद उस जापानी स्पर्श के कारण आता है।

दोनों में कलात्मकता है, दोनों के पास लोकप्रियता है, और उनमें पहले भी कई बार तुलना होती रही है। ज़ाहिर है, दोनों एक-दूसरे के काम के प्रति सम्मान से भरे हुए रहते हैं। कुछ बरस पहले जब मुराकामी से पूछा गया कि वह अपनी पसंद के दो-तीन अंतर्राष्ट्रीय लेखकों के नाम बताएं, तो उन्होंने सबसे पहले इशिगुरो का ही नाम लिया था। उसके कई साल पहले ही इशिगुरो कह चुके थे कि मुराकामी, वर्तमान दुनिया के पांच श्रेष्ठतम लेखकों में से एक हैं।

इशिगुरो के उपन्यास विशालकाय हैं। आकार से ज़्यादा अपनी महत्वाकांक्षा में विशालकाय। मनुष्य के जीवन में दुख से पैदा होने वाली विसंगतियों और उसकी आध्यात्मिक विवशताओं को छूना अपने आप में एक विशालकाय महत्वाकांक्षा होती है। उपन्यास दरअसल एक जंक्शन होता है, जहाँ कई दिशाओं से ट्रेनें आकर रुकती हैं और आगे कई दिशाओं की ओर बढ़ जाती हैं। आत्म-संधान, दुख, हानिबोध और मृत्यु- उपन्यास नाम के इस जंक्शन के चार प्रमुख प्लेटफॉर्म हैं। और यही जीवन का चक्र भी है। इसका क्रम आगे-पीछे होता रहता है। पुरानी कहावत है कि हमारा जीवन, दरअसल जीवन नहीं है, यह हमें मिला हुआ एक मृत्युदंड है, एक क़ैद है। जिस क्षण कोई शिशु पैदा होता है, उसी क्षण उसे मृत्युदंड मिल जाता है। तुम पैदा क्यों हुए? पैदा होना एक अपराध है। तुमने यह अपराध कर दिया है। अब तुम्हें मरना ही होगा। लो, तुम्हें जीवन-रूपी मृत्युदंड दिया जाता है। सब अपनी-अपनी सज़ा भुगतते हैं। कोई बीस साल की उम्र तक भोगता है और मृत्यु के रूप में आख़िरी दंड पाता है, तो कोई सत्तर साल की उम्र तक भोगता है। सज़ा घोषित होने और सजा पूरी होने के दो बिंदुओं के बीच पूरी यात्रा चलती है। मनुष्य बार-बार यह पता करना चाहता है कि वह कौन है, इस क्रम में उसे जीवन में कई तरह की हानियों को झेलना पड़ता है और उसके पास दुख आता है। दुखों से अनुभूतियाँ बनती हैं, अनुभूतियाँ विचार में बदल जाती हैं और विचार के आने के साथ ही फिर से ख़ुद की तलाश शुरू हो जाती है। सारे विचार दरअसल, दुख के वंशज होते हैं। सारी कलाएँ अंतत: दुख की ही आराधना करती हैं। दर्शन के मूल में दुख है। जीवन में मृत्यु के कई व अद्वितीय तरीक़े होते हैं, लेकिन साहित्य उन तरीक़ों में से महज़ कुछ को ही अपनाता है, और कई बार मृत्यु के नए तरीक़ों की कल्पना करता है।

दुख और हानिबोध इशिगुरो के उपन्यासों का मूल स्वर है। ‘द रिमेन्स ऑफ द डे’ के लिए उन्हें बुकर पुरस्कार मिला था। नायक एक बड़े मालिक के घर में नौकर है। वहां एक महिला सहकर्मी के साथ उसकी निकटता है। दोनों में ख़ूब बातें होती हैं, वे प्रेम के क़रीब तो पहुंचते हैं, लेकिन उनमें से कोई भी हाथ बढ़ाकर प्रेम के कक्ष का द्वार नहीं खोल पाता। इस तरह हर बातचीत में वे प्रेम के क़रीब पहुंचकर भी छूछे हाथ लौट आते हैं। बरसों बाद नायक को उस सहकर्मी का ख़त मिलता है, जिसमें वह अपनी शादी का वर्णन करती है। नई नौकरी की तलाश, पुराने मालिक के प्रति वफ़ादारी के क़िस्सों को याद करते, नाज़ियों के साथ अपने संबंधों को बताकर भी छिपा ले जाते हुए नायक किन्हीं परिस्थितियों में उस सहकर्मी के जीवन में वापस पहुंचता है। महिला की शादी को बीस साल हो चुके हैं और जल्द ही उसे एक नाती होने वाला है। वे आधे से अधिक उपन्यास में अपने पुराने रिश्ते और दूसरे विश्व युद्ध के पहले के बरसों को याद करते हैं। महिला कहती है कि उसे लगता है, शादी करके उसने ग़लती की, और इसी के आसपास नायक को अपना हानिबोध समझ में आता है कि वह जिसे पा सकता था, उसे न पा सकना ही उसकी सबसे बड़ी हानि है। यह हानिबोध उसके अवचेतन में पहले से ही है, इसीलिए वह बहुत धीरे-धीरे अफ़सोस करता है कि उसने बरसों तक जिस मालिक की इतना सेवा की, वह कोई बहुत अच्छा आदमी, शायद, नहीं था। उसकी सेवा करने में उसने ख़ुद को इस तरह खपा दिया कि उसके पास अपने ख़ुद के जीवन व आध्यात्मिक विकास के लिए कोई समय ही न बच पाया। जिस औरत के प्रति वह आकर्षित था, वह उसे नहीं पा सकता, क्या वह अब भी उसके प्रति आकर्षित है या शायद नहीं है। अवचेतन का यह हानिबोध उसके व्यक्तित्व को बदलता है और उपन्यास के आधे होने तक एक नई आदत विकसित कर लेता है- वह सबसे हंसी-मज़ाक़ करना चाहता है। हानिबोध कई बार आपको विवश करता है कि आप हास्यबोध में शरण खोजें। हंसाने का हुनर उन्हीं के पास आता दिखता है, जिन्होंने जीवन में बहुत कुछ खोया हो।

ऊपरी तौर पर यह प्रेम के खो जाने की एक साधारण कहानी है, लेकिन साहित्यिक कहानियों का सौंदर्य उनके प्लॉट में नहीं, कथा कहने के तरीक़े में छिपा होता है। इशिगुरो ने यह कथा बहुत अच्छे से कही है। उनकी भाषा भव्य नहीं है, वह सपाट लेखक हैं। इस सपाटपन को सादगी मानने में हिचक हो सकती है, क्योंकि उनके चरित्रों का अंतर्द्वंद्व इस सादगी के विलोम में खड़ा होता है। सादगी जटिलताओं को जटिल रूप में चित्रित नहीं कर पाती, जबकि इशिगुरो में जटिलताएं पर्याप्त हैं, बस, वे अक्सर सपाट जटिलताएं होती हैं। यह सिर्फ़ मैं नहीं कह रहा, बल्कि दुनिया के कई आलोचक, बहुत पहले ही कह चुके हैं कि इशिगुरो, रूढ़ियों या क्लीशे का बेहद निडर और प्रचुर प्रयोग करते हैं। कला के भीतर यह कोई अच्छी आदत नहीं है, लेकिन जैसा कि आजकल क्रिकेट में कहा जाता है, रन आने ज़रूरी हैं, कहां से आएं, बैट के स्वीट स्पॉट पर लगकर आएँ या किनारा लगकर, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता- इसी बात के आधार पर यह सोचा जा सकता है कि कथा का अच्छा बन जाना ज़रूरी है, भले वह अच्छाई छप्पन तरह के क्लीशे का प्रयोग करके ही क्यों न आए।

पिछले साल इशिगुरो की सबसे चर्चित किताब आई – ‘द बेरीड जाएंट’। दुनिया-भर में इस किताब का जमकर प्रचार हुआ था और इसकी बहुत प्रतीक्षा भी की गई थी। इशिगुरो को नोबेल पुरस्कार मिलने में संभवत: इसी किताब की महत्वपूर्ण भूमिका है। यह उपन्यास ऐतिहासिक विस्मृति को केंद्र में रखता है। छठी या सातवीं सदी का इंग्लैंड है, जो अब से बहुत अलग है। एक ऐसा नैरेटर है, जो संभवत: दोनों कालखंडों में एक साथ विचरण करता है और शुरुआत में दोनों के बीच के अंतर को बताता है और फिर जैसे ग़ायब ही हो जाता है। किंतु वह कई इशारे दे जाता है, जो आगे चलकर खुलते हैं। उस ज़माने में सैक्सन और ब्रिटिश लोगों में संघर्ष होता रहता था। एक भयानक महायुद्ध के बाद कहानी का असली प्लॉट सामने आता है। दोनों समुदाय आराम से रह रहे हैं, और तभी उनका ध्यान जाता है कि वे सभी एक विस्मृति का शिकार हो रहे हैं। पुरानी बातें तो उन्हें याद ही नहीं आतीं, और एक-डेढ़ महीने जितनी नई बातें भी लोग धीरे-धीरे भूलने लगते हैं। एक अधेड़ दंपति, एक्सल और बिआट्रिस पाते हैं कि वे भी सबकुछ भूल रहे हैं। उनका एक बेटा था और अब वह उन्हें मिल नहीं रहा। वे उसे भूलने लगते हैं। इस भूलने के बाद भी उन्हें उसकी याद है और वे उसे खोजने निकल पड़ते हैं, यह विचित्र है। वे लोग इस विस्मृति के लिए एक नया शब्द गढ़ते हैं- मिस्ट, धुंध या कोहरा। यानी एक कोहरे के कारण स्मृति और विस्मृति में दो फाँक बन गई है। बेटे को खोजने के दौरान उनकी मुलाक़ात कई लोगों से होती है, कहानी में ड्रैगन्स, राक्षस, अजीब मिथकीय जानवर भी आते हैं, जादुई यथार्थवाद की तरह नहीं, बल्कि सीधे तिलिस्मी शैली में। एक्सल और बिआट्रिस को पता चलता है कि विस्मृति की यह धुंध कुछ और नहीं है, बल्कि एक मादा ड्रैगन द्वारा छोड़ी गई साँस है। वह जितनी बार साँस छोड़ती है, वहाँ के मनुष्यों की स्मृति का उतना लोप होता है, विस्मृति उतनी बढ़ती जाती है। स्मृति चाहिए, तो उस मादा ड्रैगन को मारना होगा। और किसी न किसी तरह वे उसे मारने में सफल हो जाते हैं। स्मृति लौट आती है। प्यार की भी स्मृति लौट आती है, तो आपसी नफ़रत की भी। ब्रिटिश और सैक्सन, जो विस्मृति में शांति से रह रहे थे, स्मृति लौट आने से एक दूसरे के प्रति अपनी शत्रुता को फिर से जान लेते हैं और लड़ पड़ते हैं। इस तरह स्मृति का आना भयावह ही साबित होता है। जो जाएंट यानी दानव, बेरीड यानी दफ़न था, वह फिर उभरकर आ गया है।

जीवन का सुख अतीत को भूलने से भी पाया जा सकता है। अतीत को याद करने से दुख ही दुख है। यह इस उपन्यास का कथा-सार है। इसमें हॉबिट है, हैरी पॉटर है, प्रूस्त हैं, चेखव हैं, बोर्हेस हैं, दोस्तोएव्स्की हैं, और जाने क्या-क्या है, इशिगुरो ने कई जगहों से चीज़ें प्राप्त की हैं और इस उपन्यास में निवेश किया है। लेकिन मेरी नज़र में, यह निवेश बहुत ज़्यादा डिविडेंड नहीं देता, क्योंकि ऐसी थीम पर बोर्हेस, कम पन्नों में कहीं बड़ा काम करके जा चुके हैं, प्रूस्त ने मनोविज्ञान की एक पूरी शाखा बना दी है। चेखव की एक कहानी में मुख्य पात्र अपने मरे हुए बेटे को इसी तरह भूल जाता है। ड्रैगन्स का मायाजाल, जीवन की विस्मृतियों के साथ जुड़े जीवन-दर्शन को हम हॉबिट और हैरी पॉटर में देख-पढ़ चुके हैं। फिर इशिगुरो इस उपन्यास में हमारे लिए नया क्या देते हैं? कुल मिलाकर वह एक प्रतीक-कथा की प्रस्तावना करते जान पड़ते हैं कि स्मृति के विशाल दानव को ज़मीन के नीचे अच्छी तरह दफ़न कर दो, तो जीवन शांतिपूर्वक व्यतीत हो सकता है। इक्कीसवीं सदी के एक पाठक के तौर पर मेरी दिलचस्पी प्रतीक-कथा पढ़ने में नहीं रहती। मैं उसके लिए मिथॉलजी पढ़ लिया करता हूं, क्योंकि उसे पढ़ते समय मेरा मन मुझे बार-बार बताता है कि यह भले मैं इक्कीसवीं सदी में पढ़ रहा, यह तीन हज़ार साल पहले की कल्पनाएं हैं। किसी भी सुंदर कहानी को प्रतीक-कथा में तब्दील करके ख़त्म किया जा सकता है। जैसे ही लेखक अपनी ओर से प्रतीकों का निवेश करता है, वह पाठक की कल्पनाशक्ति को कुंद करता है, उससे कहता है कि दूसरी दिशाओं में जाकर मत सोचो, उतना ही सोचो, जितना मैं तुम्हें बताना चाहता हूं। और यह श्रेष्ठ कला का गुण क़तई नहीं हो सकता। इसीलिए, पिछले साल इस उपन्यास को पढ़ने के बाद मैंने इसे उनकी एक विराटकाय असफलता माना था, और आज जब उन्हें नोबेल पुरस्कार की घोषणा हुई, तो मुझे थोड़ा आश्चर्य भी हुआ। यह भी सही है कि दुनिया के कई आलोचक इस उपन्यास को एक सफलता भी मानते हैं। साहित्य हमेशा से आस्वाद का विषय रहेगा।

चूंकि इशिगुरो के पास सुलझा हुआ क्राफ्ट है, कहानी कह जाने की कला है, वह इस किताब को हमारे भीतर  से गुज़ार देते हैं। पर गुज़रकर वह ऐसी जगह पहुंचती है, जो हमारे लिए नई नहीं होती। कहीं न पहुंच पाने का भाव श्रम का व्यय है।

उनकी सबसे अच्छी किताब ‘नेवर लेट मी गो’ है। ‘द बेरीड जाएंट’ के प्रकाशन के पूर्व जो उत्सुकता व्याप्त थी, उसका प्रमुख कारण ‘नेवर लेट मी गो’ की विचारगत सुंदरता ही थी। इसकी कहानी ऐसे है- सरकार क्लोनिंग के ज़रिए कुछ बच्चों का ‘उत्पादन’ करती है। उन्हें एक हॉस्टल में रखा जाता है। बाक़ायदा स्कूल भी भेजा जाता है। वे बड़े भी होते रहते हैं। साधारण क्रिया-कलापों में लगे हुए हैं। पढ़ रहे हैं। प्रेम कर रहे हैं। जीवन के सौंदर्य को अनुभूत कर रहे हैं। और बड़े सपने भी देख रहे हैं। लेकिन उनका ‘उत्पादन’ एक ख़ास उद्देश्य के लिए किया गया है। उनके शरीर के सारे अंग स्वस्थ हैं। जब साधारण ब्रिटिश नागरिकों को अंगों की ज़रूरत होती है, इन बच्चों के अंग निकालकर उनमें प्रत्यारोपित कर दिए जाते हैं। ज़ाहिर है, अंग निकल जाने के बाद उस बच्चे की या तो जान चली जाएगी या वह अनुपयोगी हो जाएगा और सरकार उसे ढोने के बजाय मार डालेगी। यह प्लॉट ही अपने आप में भयावह मानवीय स्थितियों की ओर ले जाता है। फ़सल की तरह मनुष्य का उत्पादन। जैसे आप मुर्ग़ियाँ व अन्य जानवर पालते हैं, ताकि इंसान उसे व उसके अंडों को खाने के लिए उपयोग करे। विशिष्ट तकनीक के प्रयोग से मनुष्य का जानवर की तरह प्रयोग करना, हमारे भीतर के पशु का फोटो खींचकर दिखा देने जैसा है। बच्चों को पता है कि वे मारे जाएंगे, लेकिन वे कोई विरोध नहीं करते। वे लगातार अपनी नियति के आगे समर्पण करते हैं। यह इतना ताक़तवर प्लॉट है कि इशिगुरो की मुरझाई हुई, बेचमक, सपाट अंग्रेज़ी के बाद भी हम पूरी किताब पढ़ डालते हैं और अंत में लेखक की प्रशंसा ही करते हैं, मानवता के विशाल महास्वप्न में उसकी आस्था के कारण। एक बार एक पत्रिका ने सूची बनाई थी और पाठकों से आमंत्रित किया था कि वे अपने पढ़े उपन्यासों के दस सबसे उबाऊ दृश्यों को नामांकित कर उसके पास भेजें। ‘नेवर लेट मी गो’ के कुछ हिस्से उबाऊपन की उस प्रतिस्पर्धा में शामिल किए गए थे। इतने दिलचस्प प्लॉट के बाद भी इशिगुरो इस उपन्यास में अपने पाठक को झिलवा देते हैं, तो अपनी भाषाई मंथरता के ही कारण।

एक पाठक के तौर पर इशिगुरो के उपन्यासों के मुक़ाबले मैं कहानियों की उनकी किताब ‘नॉक्टर्न्स’ से अधिक मुतास्सिर हुआ था, जहां उनकी कल्पनाशीलता अनर्गल ‘वाइल्ड’ नहीं होती, उसमें वह जापानी कला-पद्धति वाबी-साबी के नज़दीक जाते हैं। आपस में जुड़ी हुई वे पांच कहानियां अलग तरह का इशिगुरो है। मनुष्य की बुनियादी अनुभूतियों के अधिक निकट खड़ा लेखक। मुझे लगता है, और ज़ाहिर है कि यह मेरी निजी सोच है, कि साहित्यिक लेखकों को भरसक मनुष्य के आसपास ही रहना चाहिए। उसे उन दुर्लभ कलाकारों में शामिल होना चाहिए जो मानते हों कि अब भी, भूख पूरी न होने पर मृत्यु हो सकती है, प्यास के बेहद हो जाने पर भी, और कोई प्रेम में डूबकर भी आत्महत्या कर सकता है, एक बम फटने,  ट्रेन के पलट जाने या ग़लत दवा की चार बूंदें पी लेने से भी हज़ारों लोग मारे जा सकते हैं। ज़रूरी नहीं कि इक्कीसवीं सदी की कला के भीतर सारी मौतें बाहर से आई उड़नतश्तरियों, दूसरे ग्रहों के अजीब सैनिकों, प्राचीन युग से इस युग में आ गए किसी डायनासॉर या गॉडज़िला या अनाकोंडा से ही हों। नए-नए व अविश्वसनीय तरीक़ों से होने वाली मृत्यु की कल्पनाओं के बजाय, मृत्यु के एग्जिस्टंग रूपों पर फिर से सोचा जाए। यह हमारी अनुभूतियों के ज़्यादा क़रीब होगा। और दूसरी बात-  व्यावसायिक कलाएँ तो उस रास्ते पर ‘ऑलरेडी’ चल ही रही हैं, साहित्यिक व गंभीर कलाओं को तो कम से कम मनुष्यता की असली उंगलियों को पकड़े रखना चाहिए।

‘नॉक्टर्न्स’ में वह जिस तरह वाबी-साबी को छूते हैं, उसी तरह अपने उपन्यासों में मूजो का स्पर्श करते हैं। दोनों ही जापानी कला-पद्धतियां हैं। दोनों का रिश्ता प्राचीन बौद्ध धर्म से है। बौद्ध भिक्षुओं के पास कला के कम ही औज़ार होते थे, इसलिए वे कम से कम चीज़ों के प्रयोग के साथ यथार्थ को हल्का-सा विरूपित, लगभग आदिम रूप में, अशुद्ध-सा दिखा देते थे। जैसे- एक गिलास। जब उसे कोई व्यावसायिक कंपनी बनाएगी, तो उसका आकार बहुत शुद्ध होगा, उसमें कोई दोष नहीं होगा, बेहद नपा-तुला, उसके किनारे तीखे होंगे, और उसकी रेखाएं एकदम सीधी होंगी। लेकिन जब एक कलाकार हाथ से गिलास को बनाएगा, तो उसकी रेखाओं को टेढ़ा-मेढ़ा कर देगा, उसके रूप को अशुद्ध कर देगा, क्योंकि रूप की अशुद्धि कला को सुंदर बनाती है। शुद्धतम रूप में व्यावसायिक मूल्य हो सकते हैं, कलात्मक मूल्य कम होंगे। ‘नॉक्टर्न्स’ में इशिगुरो इसी कला-रूप के पास जाते हैं। उस किताब में अनुभूतियां और चरित्र अशुद्ध हैं। प्रेम ठीक प्रेम जैसा नहीं है, और संगीत तो कभी संगीत जैसा होता ही नहीं। संगीत तो हमेशा एक कल्पना की तरह हमारे मन में बजता है, बाहर तो केवल ध्वनियाँ तैरती हैं।

उनके उपन्यासों में भी उनके चरित्र, नैरेशन के दौरान अपनी कमज़ोरियों और अक्षमताओं को उजागर करते चलते हैं। यह भी एक तरह का वाबी-साबी है। दूसरी चीज़ है मूजो। बौद्ध धर्म में जिसे ‘अनित्य’ कहा जाता है, उसी को जापानी में मूजो कहा जाता है। यानी हर चीज़ एक दिन नष्ट हो जाएगी, तुम भी और मैं भी, तो आख़िर संघर्ष कैसा? चीज़ों को उनके हाल पर छोड़ देने, उन्हें स्वीकार कर लेने, नियति के आगे चुप हो जाने की स्थिति का नाम भी मूजो है। इशिगुरो के उपन्यास एक ऐसी जगह जाकर ख़त्म होते हैं, जहां चरित्र अपने अतीत व वर्तमान के साथ एक ख़ास क़िस्म का सामंजस्य बना लेता है, अपने परिवेश में घुल-मिल जाता है, दुखों को उपेक्षित करके आगे बढ़ जाता है। यह कोई नकारात्मक भाव नहीं है, बल्कि जीवन में आगे बढ़ते रहने के भाव का सम्मान ही है। अधिक दुखद स्थिति का मूजो, भले हमारे ऊपर क्षणिक तौर से नकारात्मक प्रभाव छोड़े। दुख की अवस्था में दुख पर बात न करना, एक किस्म का मूजो है। यह कुरोसावा के जापानी सिनेमा में कम दिखाई देता है, लेकिन यासुजिरो ओज़ू की फिल्मों में ऐसे प्रयोग बहुत हैं, जब, अभी-अभी एक गहरे दुख से निकला व्यक्ति, दूसरे से कहता है, “कितनी अच्छी हवा चल रही है!”

इशिगुरो के उपन्यासों में बीच-बीच में ऐसे कितने ही मूजो प्रसंग आते हैं। ‘द बेरीड जाएंट’ में दोन किहोते या डॉन क्विग्जोट जैसा एक किरदार है, सर गैविन, उसकी उपस्थिति एक किस्म का मूजो है। वहीं ‘द रिमेन्स ऑफ द डे’ में नायक द्वारा बीच-बीच में किया जाने वाला परिहास भी मूजो है। इस तरह के मूजो-प्रसंग इशिगुरो को एक दार्शनिक स्पर्श भी दे देते हैं।
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