Wednesday, June 08, 2016

सबद विशेष : 19 : ज़बिग्नियव हर्बर्ट


आगे विलक्षण पोलिश कवि ज़बिग्नियव हर्बर्ट की 21 कविताओं का अनुवाद दिया जा रहा है। ये अनुवाद हर्बर्ट की कविताओं के अंग्रेज़ी अनुवाद The collected poems 1956-1998 (Translations by Alissa Valles; additional translation by Czeslaw Milosz and Peter Dale Scott) पर आधारित हैं। इन्हें हिंदी में मनोयोग से सम्पन्न किया है युवा कवयित्री मोनिका कुमार ने। सबद पर हर्बर्ट के ये अनुवाद दो हिस्सों में शाया होंगें। यह पहला हिस्सा कवि की छोटी कविताओं का है। दूसरे हिस्से में हर्बर्ट की लम्बी कविताएँ होंगी। 
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                                                                                                                      photo: anurag vats

होनी में मनुष्य की हिस्सेदारी

होनी हमें दारुण लगती है क्योंकि यह हमारी समझ से परे है। हम भी होनी के कारक हैं क्योंकि हमारे साथ ऐसी कोई होनी नहीं हुई जिस में किसी रूप से हमारी भागीदारी नहीं थी पर फिर भी अपनी पराकाष्ठा में यह हमारे सामने हमेशा रहस्य ही बनी रहती है। जब यह घट जाती है तो हम ठगा हुआ महसूस करते है और सहसा कह उठते है कि यह अटल है। ज़बिग्नियव हर्बर्ट की कविता को पढ़ने की बहुत सारी वजहें गिनवाई जा सकती है लेकिन आज आग्रह केवल इतना ही कि हरबर्ट की कविता में इस अबूझ होनी के साथ सहज होने की जो राह दिखाई देती है, उसे जरा रुक कर देखा जाए। 
जब तक हमें लगता है कि दुख केवल हमें सताता है तो दुख बहुत बड़ा लगता है, जब यह दुख सभी को सताता है तो हम इसे नियति की तरह देखने लगते हैं और दुख के प्रति अपनी सहनशीलता को बढ़ाने की कोशिश करते हैं। हर्बर्ट अपनी कविताओं में होनी के जिस पक्ष को रेखांकित करते हैं वह है होनी में मनुष्य की हिस्सेदारी और होनी की वैज्ञानिकता। 
हर्बर्ट ने ये गद्य कविताएं लोक कथाओं और बाल कथाओं की प्रच्छन्न सादगी के कलेवर में लिखी हैं पर इन कविताओं में उपन्यास का वैभव है। अंततः हम सिर्फ दर्जिन, हाथी या मछली की होनी को नहीं बल्कि कांच के गिलास, पर्दे और आरामकुर्सी की होनी से भी वाकिफ़ होते हैं। हर्बर्ट की अनुभूतियाँ बताती हैं कि केवल हाथी का चिड़िया के प्रेम में उदास होकर मर जाना ही नहीं बल्कि कांच के गिलास का टूटना भी दारुण है। 
यह हर्बर्ट की संवेदना का विस्तार है कि जब हम अपने से अलग दूसरे की होनी के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं तो अपनी होनी के साथ भी सहज हो जाते हैं। ‘आइरनी’ हर्बर्ट की कविता की आत्मा है। वक्रोक्ति के अद्भुत प्रयोग से हर्बर्ट ऐसा काव्य-संसार रचते हैं जिसका हर कण जीवंत है, जागृत है और होनी में हिस्सेदार है। यही हर्बर्ट की कविता की कलात्मकता और इसकी नैतिकता भी है। 
______________________________________________________मोनिका कुमार

छोटी कविताएं :
                                                       शंख
मेरे माता पिता के कमरे में आईने के सामने गुलाबी रंग का शंख रखा था। पंजों के बल खड़े होकर मैंने इसे चुराया और फट से अपने कानों पर लगा लिया। मैं इसे तब सुनना चाहता था जब यह अपनी तड़प का वही एकालाप ना कर रहा हो। भले ही मैं छोटा था पर मुझे पता था कि आप चाहे किसी से बहुत प्यार करते हों, कई बार ऐसा होता है कि आप उसके बारे में सब कुछ भूल जाएँ।

चीज़ों को बाहर निकालने के लिए
चीज़ों को उनकी भव्य ख़ामोशी से बाहर निकालने के लिए या तो तिकड़म भिड़ानी होती है या अपराध करना होता है। 

दरवाज़े की बर्फीली सतह को राजद्रोही खटखटा कर पिघला सकता है, गिलास को फर्श पर गिरा दो तो ज़ख़्मी पखेरू की तरह चीखता है, घर को आग लगा दो तो वाचाल होकर आग की भाषा में बतियाने लगता है। पलंग, दराज, पर्दे जिन्हें कब से उनके हाल पर छोड़ दिया गया था, किसी दम-घुटे महाकाव्य की भाषा बोलने लगते हैं। 

आंसुओं के कला विज्ञान से
मौजूदा जानकारी के अनुसार केवल झूठे आँसू ही शोध और थोक में उत्पादन करने के लिए उपयुक्त हैं। असली आँसू गर्म होते हैं इसलिए इन्हें चेहरे से छुड़ाना बहुत मुश्किल है। ठोस अवस्था में लाने के बाद इन्होने अपने आप को बेहद नाज़ुक सिद्ध किया। असली आंसुओं का कारोबारी इस्तेमाल तकनीकदानों के लिए सिर दर्द है।

झूठे आंसुओं को फ़ौरन जमाने से पहले आसवन की प्रक्रिया में डाला जाता है, चूंकि ये स्वभाव से अशुद्ध होते हैं तो उन्हें ऐसी अवस्था में ढाल लिया जाता है जहाँ शुद्धता के मामले में ये असली आंसुओं से कमतर नहीं रहते। ये बड़े सख्त और टिकाऊ होते हैं इसलिए ये केवल सजावट के ही नहीं बल्कि कांच काटने के लिए भी योग्य हैं। 

आरामकुर्सियाँ
किसने सोचा होगा कि स्नेहिल गर्दन एक दिन कुर्सी की बाँह बन जाएगी, उड़ने और खुश होने को आतुर टाँगे चार साधारण डंडों में जड़ हो जाएंगी? आरामकुर्सियाँ कभी फूलों पर जीमने वाली नेक दिल प्राणी थीं। फिर उन्होंने आसानी से खुद को पालतू बनने दिया और आज वे चौपायों की सबसे निकम्मी प्रजाति हैं। वे अपना हठ और हिम्मत खो चुकी हैं। अब वे दब्बू बन गई हैं। उन्होंने ना तो कभी किसी को पैर तले रौंदा और ना ही किसी के संग सरपट दौड़ीं। यकीनन, उन्हें व्यर्थ हुए जीवन का भान है। 

आरामकुर्सियों की चरचराहट से इनके अवसाद का पता चलता है। 

मेज़ के साथ ध्यान से
मेज़ के पास आपको शांत होकर बैठना चाहिए ना कि ख़याली पुलाव पकाने चाहिए। आओ फिर से याद करें कि तूफानी समंदर ने अपनी अशांत लहरों को ख़ामोश छल्लों में बदलने के लिए कितनी मेहनत की। एक पल की लापरवाही से सब खत्म हो सकता था। चूँकि मेज़ की टाँगे बहुत संवेदनशील  होती है, इसलिए इनके साथ रगड़ना भी मना है। मेज़ पर किए जाने वाले काम दिमाग को ठंडा रखते हुए तथ्यात्मकता पूर्ण ढंग से करने चाहिए। यहाँ आप कच्चे पक्के अल्हड़ विचार लिए नहीं बैठ सकते। यूँ ही खुली आँखों से सपने देखने के लिए आपको लकड़ी की बनी दूसरी चीज़ें दी गई हैं मसलन जंगल और पलंग।

कवि का घर
इन खिड़कियों पर कभी यहाँ साँसें थी, कुछ पकने की ख़ुशबू और आईने में वही चेहरा था। अब यह अजायबघर है। फर्श पर उगे फूल-बूटे उखाड़ दिए गए हैं, सूटकेस खाली कर दिए गए हैं और कमरों पर लाख चढ़ा दी गई है। खिड़कियाँ दिन-रात के लिए खुली छोड़ दी गई हैं। चूहे इस निर्वात घर से दूर रहते हैं। 

बिस्तर करीने से सजा है। पर यहाँ कोई एक रात भी नहीं बसर करता।

उसकी अलमारी, बिस्तर और कुर्सी के बीच - उसकी अनुपस्थिति का उसके पैने हाथों के आकार जैसा सफेद रेखाचित्र है।

क्रासिंग गार्ड
उसका नाम 176 है और वह बड़ी सी ईंट में रहता है जिस में एक ही खिड़की है। वह बाहर ऐसे आता है जैसे गति का छोटा पादरी हो। उड़ती हुई ट्रेनों को अपनी आटे जैसी भारी बाहों से सलूट मारता है।

मीलों मील यहाँ आसपास देखने के लिए कुछ नहीं। बस एक मैदान जिस में एक टीला और बीच में तन्हां पेड़ों का झाड़ है। यह जानने के लिए कि इसकी संख्या सात है, यहाँ तीस बरस रहना जरूरी नहीं।

पौराणिक कथाओं से
पहले पहल वहाँ रात्रि और अंधड़ का एक ईश्वर था, बिन आँखों का काला आराध्यदेव जिसके सामने वे खून से सने नंगे होकर कूदते थे। उसके बाद गणतन्त्र के दिनों में बहुत सारे देवता हुए जिनकी बीवियां थी, बच्चे थे और जिनके पलंग चरचराते थे, वे कोई नुक्सान किये बिना गाज गिराते थे। अंततः केवल कुछ वहमी और विक्षिप्त लोगों ने अपनी जेब में नमक से बनी मूर्तियां रखीं जो वक्रोक्ति के ईश्वर का प्रतीक थी। उस समय इससे अधिक प्रभावशाली कोई ईश्वर नहीं था।

कालांतर में वहाँ वहशी दरिंदे आए। वे भी वक्रोक्ति के छोटे ईश्वर को बहुत मानते थे। उन्होंने इसको अपनी एड़ी के नीचे रौंदा और अपने पकवानों में डाल लिया।

हाथी
सच यह है कि हाथी बहुत संवेदनशील और उच्च अनुभूति वाले प्राणी होते हैं, उनकी कल्पना जंगली होती है जिसके कारण वे कई बार अपना रूप रंग भूल जाते हैं। जब वे पानी में उतरते हैं तो अपनी आँखें मूँद लेते हैं, अपनी टांगों को देख कर निराशा के मारे वे रो देते हैं। 
मैं एक हाथी को जानता था जो मर्मर चिड़िया के प्रेम में पड़ गया। उसका वजन कम होने लगा, नींद उड़ गई और अंत में दिल टूटने से वह मर गया। हाथी की प्रकृति से अनजान लोग यही कहते रहे कि वह मोटा था।

मछलियाँ
मछलियों की नींद कल्पना से परे है। पोखर के सबसे अँधरे कोने में भी, सरकंडों के बीच, उनका आराम भी जागने जैसा है : वे चिरकाल तक एक ही मुद्रा में पड़ी रहती हैं उनके बारे में कुछ भी कह पाना बिल्कुल असंभव है; उनके सिर तकियों से टकराते हैं।

उनके आंसू भी बीहड़ में रुदन करने जैसे हैं – असंख्य। 

मछलियाँ अपनी हताशा किसी इशारे से नहीं बता पातीं। यही उस मुथरी छुरी के तर्क को सिद्ध करता है जो उनकी रीढ़ को लांघते हुए उनकी पीठ के सिलमे-सितारे फाड़ डालता है।

पागल औरत
उसकी तपिश भरी नज़र मुझे ऐसे जकड़ती है जैसे जब कोई बाहों में कस लेता है। वह स्वप्न के साथ गड्ड मड्ड शब्द बोलती है। वह मुझे अपनी ओर खींचती है। वह खुश होगी अगर तुम भरोसा रखकर  अपने छकड़े को किसी सितारे की ओर ले जाओगे। बादलों को अपनी छाती से दूध पिलाते हुए वह कोमल लगती है लेकिन जब शांति उसे अकेला छोड़ देती है तो वह समुद्र किनारे भागती और बाँहों को हवा में झुलाती है। 

उसकी आँखों में झाँकने पर मुझे अपने कन्धों पर दो देवता बैठे हुए दिखाई देते हैं : एक पर पीला बदख्वाह वक्रोक्ति का देवता और दूसरे पर ताक़तवर और प्यारा स्किज़ोफ्रेनिया का देवता। 

बटन
परियों की सबसे प्यारी वे कहानियां हैं जो बताती हैं कि हम भी कभी नन्हें मुन्ने थे। मुझे ऐसी सभी कहानियां पसंद हैं जैसे एक यह कि एक बार मैनें हाथी दांत से बना बटन निगल लिया था। मेरी माँ रो रही थी। 

बोटैनिकल गार्डन
यह पौधों का छात्रावास है जिसे कान्वेंट स्कूल की तरह बड़ी सख्ती से चलाया जाता है। घास, पेड़ और फूल यहाँ शालीनता से उगते है ना कि यूँ ही इधर उधर पैर फैलाते जाएँ, ये भौरों के साथ अंतरंग ना होने की वर्जना का भी पालन करते हैं। अपने भारी भरकम लैटिन नामों से ये निरंतर शर्मिंदा होते हैं और इस बात से भी कि उन्हें उदहारण की तरह अपने आप को पेश करना पड़ता है। यहाँ तक कि गुलाब भी अपने होंठ सिल कर रखते हैं। वे उस संग्रहालय का सपना देखते हैं जहाँ सूखे हुए फूल और पत्तियां रखी जाती हैं। 

बूढ़े लोग किताब साथ लेकर यहाँ आते हैं और सुस्त धूप घड़ियों की टिक टिक में झपकी लेते हैं।

फरिश्ता बनने के अलावा कुछ भी
अगर वे मरणोपरांत हमें हवाओं के संग जलती बुझती इक छोटी सी लौ बना देने चाहते हैं तो हमें बगावत करनी होगी। हवा के सीने पर सदा ऐश्वर्य से रहने का क्या सुख, किसी पीताम्बरी तेजोमंडल की छाया तले, सपाट सा गाने वाली भजन मंडली की बड़बड़ाहट के बीच ? 

घुस जाना चाहिए किसी पत्थर, लकड़ी, पानी या गेट की दरारों के बीच। बेहतर होगा फर्श की चरचराहट बन जाना बनिस्बत तीखी पारदर्शी सिद्धि हो जाने के। 

संतुलन
यह एक पंछी था बल्कि परजीवियों द्वारा खाया हुआ पंछी का बचा खुचा दयनीय टुकड़ा था। पंख उधड़े हुए, नीली चमड़ी दर्द और हताशा से कांपती हुई और यह फिर भी अपने आप को बचाने के लिए अपनी चोंच से सफेद कीड़े पकड़ने की कोशिश कर रहा था जिन्होंने इसकी देह को अपने वज़न के नीचे दबा रखा था। 

मैंने इसे रुमाल में लपेटा और इसे एक जानकार प्रकृति विद के पास ले गया। उसने क्षण भर इसका मुआयना किया और फिर कहा : 

सब ठीक है। जो कीड़े इसे खा रहे हैं, उन्हें भी कोई परजीवी खा रहे हैं जो हमें दिखाई नहीं देते और शायद उन परजीवियों की कोशिकायों में तेजम तेज कोई काम चल रहा है। इस तरह एक सीमित तन्त्र की यह शास्त्रीय उदाहरण है जहाँ एक अनंत कण पूरे तन्त्र के संतुलन की शर्त कायम रखने के लिए विरोधी भाव से दूसरों पर निर्भर करता है। और हमें जो दिख रहा होता है उसे देखने की बजाए यह देखते हैं कि कोई फल शरमा रहा है और जीवन सुर्ख गुलाब की तरह है।   

हमें ज़रूर इस बात का ख़याल चाहिए कि सांस लेने और सांस घुटने का मोटा ताना-बाना यूँ ही कहीं पर भी ना फट जाए क्योंकि ऐसा होने पर हमें कुछ ऐसा दिखाई देगा जो मौत से कहीं बदतर और जीवन से अधिक भयावह होगा। 

भोर
भोर होने से पहले के गहन क्षण में पहली आवाज़ गूंजती है जो चाकू के घाव की तरह कुंद और तीखी होती है। फिर रात की ठूंठ से मिनट दर मिनट सरसराहट बढ़ती है।

ऐसा लगता है जैसे कोई उम्मीद नहीं बची। 

जो भी उजाले के लिए संघर्ष कर रहा है हद दर्जे तक कमज़ोर है। 

और जब क्षितिज पर पेड़ की रक्ताभ, स्वप्निल, विराट और दर्दीली फांक दिखाई देती है तो हमें चाहिए कि हम इस चमत्कार को आशीष देना ना भूलें। 

राक्षस
बतौर राक्षस वह एकदम फेल है। यहाँ तक कि उसकी दुम भी फेल है क्यूंकि ना तो यह लंबी है और ना ही गुदगुदी, पिछवाड़े पर रोएंदार काले बाल तक नहीं बल्कि उसकी दुम तो खरगोश की दुम जैसी  छोटी थुलथुली और हास्यास्पद ढंग से चिपकी हुई है। चमड़ी उसकी गुलाबी है, सिर्फ बाएँ कंधे के नीचे सोने के सिक्के के आकार जैसा निशान है। सींग तो सबसे बदतर है। ये दूसरे राक्षसों की बाहर को नहीं बल्कि अंदर दिमाग की तरफ उगते हैं। इसीलिए उसे अक्सर सर दर्द की शिकायत रहती है। 

वह उदास है। दिनों तक सोया रहता है। अच्छी या बुरी कोई भी चीज़ उसे आकर्षित नहीं करती। जब वह गली में चलता है तो आपको उसके फेफड़ों के गुलाबी पंखों की चहलकदमी साफ़ साफ़ दिखाई देती है। 

भेड़िया और मेमना
 ये पकड़ा- भेड़िया बोला और जम्हाई ली। मेमने ने अपनी पनियल आँखें भेड़िये की तरफ घुमाई -  क्या तुम मुझे खाना चाहते हो? क्या यह इतना ज़रूरी है ? 

- मुझे दुःख है लेकिन हाँ, मुझे खाना होगा। परियों वाली कहानियों में ऐसा ही होता है। एक बार की बात है कि एक शरारती मेमना आवारागर्दी करते हुए अपनी माँ से बिछुड़ गया। जंगल में उसका सामना भारी भरकम दुष्ट भेड़िये से हुआ और. . .

- माफ़ करना, यह जंगल नहीं है। यह तो मेरे मालिक का आँगन है। मैं अपनी माँ से भी बिछड़ा हुआ नहीं हूँ। मैं अनाथ हूँ। मेरी माँ को भी एक भेड़िये ने खा लिया था। 

- कोई बात नहीं। तुम्हारे मरने के बाद आध्यात्मिक साहित्य लिखने वाले लेखक तुम्हारा ख्याल  रखेंगे। वे कहानी की रूप रेखा, उद्देश्य और उस में निहित उपदेश तय कर लेंगे। मेरे बारे में बुरा मत सोचो। तुम्हें अंदाज़ा नहीं कि बुरा भेड़िया बनना कितनी बेहूदा बात है। अगर हमें ईसप* का ख्याल न होता तो हम दोनों अपनी पिछली टांगों के बल बैठ कर सूर्यास्त निहार रहे होते। ऐसा करने से मुझे मज़ा आता है। 

हाँ, प्यारे बच्चो। भेड़िये ने नन्हें मेमने को खा लिया और अपने होंठ चाट लिए। तुम भेड़िये के पीछे मत लगना। किसी नीति को सिद्ध करने के लिए अपनी कुर्बानी मत देना। 
* प्राचीन एथेंस के नीतिकथाकार 

दर्जिन
सुबह से बारिश हो रही है। गली के उस पार रहती एक औरत को दफनाया जाना है। दर्जिन को। वह ऊँगली में शादी की अंगूठी पहनने का सपना देखती थी लेकिन मरते वक़्त उसकी ऊँगली में सुई की धार से बचाने वाला अंगुश्ताना था। सभी को लगता है यह मखौल वाली बात है। बारिश किसी आदरणीया की तरह आसमान को धरती से रफू कर रही है। लेकिन अब उससे भी कुछ नहीं होगा। 

पियक्कड़
पियक्कड़ वे लोग होते हैं जो एक ही घूँट में गिलास के पेंदे तक पी जाते हैं। लेकिन तब वे घबरा जाते हैं क्योंकि तल में उनको फिर से अपनी छवि दिखाई देती है। बोतल के कांच में से उनको दूर-दराज के देश दिखाई देते हैं। अगर उनके सिर ताक़तवार होते और उनका स्वाद बेहतर होता तो वे खगोल विज्ञानी होते। 

पूर्ण विराम
दिखने में प्रियतम के चेहरे पर गिरी बारिश की बूँद, तूफ़ान की आहट से पत्ते पर दुबका बैठा भौंरा जैसे। ऐसी वस्तु जिसमें उत्साह भरा जा सके, मिटाया जा सके, मोड़ा जा सके। हरी परछाईं वाला पड़ाव ना कि अंतिम स्टेशन। 

असल में जिस पूर्ण विराम को हम किसी भी सूरत-ए-हाल में पालतू बना लेना चाहते हैं वह रेत से बाहर निकल रही हड्डी है, टूटता हुआ दरवाज़ा, विनाश का संकेत है। यह तत्वों का विराम चिह्न
 है। लोगों को इसे विनम्रता से बरतना चाहिए, उसी एहतियात से जैसी हम खुद को भाग्य को सौंपते हुए बरतते हैं।
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