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गीत चतुर्वेदी की सात नई कविताएं


Photo: © Anurag Vats, 2016






गीत चतुर्वेदी

दुनिया का पहला कवि

बहुत पहले, बहुत-बहुत पहले, एक कवि था : दुनिया का पहला कवि : उसका नाम हमें नहीं पता : वह कविता लिखता : फिर उसे पत्‍थर की तरह ज़ोर से उछालकर चांद को दे मारता : उसकी कविताएं नहीं बचीं : पर चांद के निशानों के रूप में उनकी स्मृति बची है : जैसे कई शहर अब विलुप्‍त हो चुके हैं : लेकिन खंडहरों में उनकी स्‍मृतियां बची हुई हैं :

मनुष्‍य सिर्फ़ उतना होता है,
जितना वह किसी की स्‍मृति में बचा रह जाए

स्‍मृति सिर्फ़ उतनी होती है,
जितनी वह किसी को मनुष्‍य के रूप में बचा ले जाए

कवि                                                                               कवि  
अपनी कविता से                                                               अपनी कविता से 
एक घर बनाता है                                                               अपना घर उजाड़ता है 
और ख़ुद दर-ब-दर हो जाता है                                             और मलबे पर बैठ उबासी लेता है
लोग आते हैं                                                                     लोग दूर से देखते हैं
और उस घर में रहने लगते हैं                                               और उसे मलबे का गुंबद मानते हैं

साल में एक रात ऐसी आती है
जब एक कविता किताब के पन्‍नों से निकलती है
और जुगनू बनकर जंगल चली जाती है

जब सूरज को एक लंबा ग्रहण लगेगा
चांद रूठकर कहीं चला जाएगा
जंगल से लौटकर आएंगे ये सारे जुगनू
और अंधेरे से डरने वालों को रोशनी देंगे

कल मौसम की पहली बारिश पड़ी : हाईवे के किनारे फुटपाथ पर बोरी बिछाकर सोया था मेरी भाषा का सबसे बूढ़ा कवि : पूरी तरह भीग गया : बहुत ज़ोर देकर उसने याद किया : बुदबुदाते हुए बोला : ‘‘इसी तरह भीगा था दुनिया का पहला कवि : प्रेम में : बारिश में : आंसू में : निराशा में : ज़ख़्मों से बहते ख़ून में : रक्‍त–पिपासुओं की लार में : राजा के दिल के काले अम्‍ल में : राजकुमारी की नकचढ़ी क्षार में : इतनी गीली हो गई थीं उसकी कविताएं : कि उन्‍हें सुखाने के लिए वह रेगिस्‍तान चला गया : ऐसा रेगिस्‍तान जहां दूर-दूर तक कोई पौधा नहीं उगता : वहां से फिर कभी लौटकर नहीं आया : एक बहुत बड़ा विस्‍फोट हुआ था जिससे टूटकर छर्रा-छर्रा बिखर गई थी उसकी आत्‍मा : दुनिया के पहले कवि की आत्‍मा : उसके बाद जितने कवि हुए : सबके दिल में उसकी आत्‍मा का एक छर्रा गड़ा रहता है’’

दुनिया एक गहरा घाव है
सारे कवि गहरे घाव की संतान हैं

कविता की हर पंक्ति का
कम से कम एक पूर्वज होता है
अनाथ नहीं होता कोई भी विचार

कुछ कवियों को                                                                 कुछ कवियों को  
गीली कविताओं से                                                             सूखी कविताओं से  
दाद हो जाता है                                                                 खांसी आती है  
वे सूखी कविताएं लिखते हैं                                                   वे गीली कविताएं लिखते हैं
और ख़ुद को                                                                     और ख़ुद को
असली वारिस कहते हैं                                                        असली वारिस कहते हैं

जायदाद
के झगड़े
पीढ़ी-दर-पीढ़ी
चलते हैं
* * *


सामूहिक आत्‍मकथा 

हम ज़मीन में दबे अदृश्‍य बीजों की तरह 
पानी की प्रतीक्षा कर रहे हैं. 
एक बूढ़ा सैनिक हमें आलमारी में रखता है 
जंग के मैदान से जमा किए ख़ाली कारतूसों की तरह. 
दौड़ते समय जेब में पड़े छुट्टे पैसों की तरह 
हम शोर करते हैं. 
हम शर्ट में लगे वे बटन हैं 
जिनके लिए काज बनाना दर्जी़ भूल गया. 
हम अन्‍य हैं. हम इत्‍यादि हैं. हम अन्‍यत्र हैं. 
हम वह नमस्‍ते हैं जिसका जवाब कभी नहीं दिया गया. 
लकदक कपड़ों से सजा है हमारा समय. 
हम समय के फटे हुए अंतर्वस्‍त्र हैं. 
हमसे कहा जाएगा: 
अपनी ही परछाईं की छांव में विश्राम करो. 
जो कोई हमारी आंखों में झांकेगा 
उसे विशाल जलप्रपातों का पोस्‍टर दिखेगा. 
हमारी देह पर्यटन स्‍थल होगी. 
हमारी कोख में फेंक जाएंगे सैलानी अपनी प्‍लास्टिक की बोतलें. 
एक दिन हम कहेंगे कि हम नंगे हैं. 
और राजा को लगेगा कि हमने उसे नंगा कह दिया. 
वह हमारी पीठ पर कोड़े मारेगा. 
उन ज़ख़्मों से फूल खिलेंगे. 
राजा को उपाधि मिलेगी- 'ईश्‍वर का सबसे प्रिय माली
और हमें किसी मंदिर की मूरत पर चढ़ा दिया जाएगा. 
मुस्‍कराते हुए जिस बिन्‍दु पर हम ख़त्‍म होंगे 
ठीक वहीं से फिर शुरू हो जाएगी हमारी कविता. 
हम फिर अदृश्‍य बीज बन जाएंगे. 
धरती हमारी उगन का आख्‍यान रचेगी. 
इकतारा बजाकर एक जोगी हमारी कहानी गाएगा 
किसी नदी के घाट पर. 
जलते दियों की तरह हम तैरते रहेंगे 
उसी नदी के पाट पर. 

सौदागर

मैंने चुन-चुनकर घाटे के सौदे किए 
मैं अच्‍छा सौदागर 
कभी नहीं रहा. 

मैंने किसिम-किसिम के, तरह-तरह के गीत बेचे 
पर कविता-पाठों में जाने से इनकार कर दिया 
मैंने अपने गीत पहाड़ों को बेचे 
पत्‍थरों को बेचा समंदर को बेचा 

पत्‍थरों की स्‍मृति सबसे मज़बूत होती है 
खेल-खेल में ही बचाए रखता है वह 
हज़ारों साल पुराने निशान 
और बदले में दरारों का कंठहार पाता है 
हथौड़ों का पारितोषिक. 
मैंने पत्‍थर को अपना गुरु बनाया 
एक मामूली कवि और बेहद ख़राब सौदागर बन पाया. 

अपनी रातों से बेहद सस्‍ता सौदा किया मैंने. 
कई बार सिर्फ़ आधी पंक्ति के दाम 
पूरी की पूरी रात ही बेच दी. 

अपना प्रेम मैं कभी बेच नहीं पाया. 
मैंने कोई बहुत ज़्यादा क़ीमत भी नहीं मांगी थी कभी. 

एक दिन मैं अनजान शहरों 
अनजान बस्तियों, अनजान लोगों, अनजान स्त्रियों 
और अनजान बच्‍चों की तरफ़ गया 
और अपना सारा प्रेम वहां लुटा आया 
मेरे प्रेम के बदले प्रेम 
या कोई चीज़ 
देने का कभी मन भी करेगा उनका 
तो वे मुझे कभी खोज नहीं पाएंगे. 
मैंने अपना पता कहीं नहीं छोड़ा 
मेरे पास कोई बिज़नेस कार्ड भी नहीं था. 

इस तरह हल्‍का किया मैंने 
पांच फुट आठ इंच की इस दुकान का वज़न. 
बुद्ध का ख़ालीपन 
मेरे ख़ीसे में रहता है. 

मुझे लगा, अब मैं शून्‍य हुआ. 
ख़त्‍म हो जाए ये सौदागरी. 
पर प्रेम तो जैसे छिपकली की पूंछ है 
जितनी बार कटती है, नई उग आती है. 

मूल भाषा 

हम एक ही भाषा बोलते हैं
पर अलग-अलग भाषा सुनते हैं 
बोलने की भाषा सबकी एक ही 
समझने की भाषा सबकी अलग हो जाती 

जब वह कहता - 
'लोग कहते हैं कि मैं चाय अच्छी बनाता हूं
तो इस वाक्य को एक अनुवादक की दरकार होती 
जो मूल के साथ न्याय करे और 
शब्दों का अर्थ खोजने की जगह इस वाक्य को बना दे - 
'आओ, मेरे साथ चाय पी लो'

जब वह कहता - 
'बरसात हुए कई दिन बीते
तो यह वाक्य हो सकता - 
'आज, कम से कम आज, सिर्फ दो घंटे तुम मुझसे 
प्यार से बात कर लो 
बातें जिनमें कोई गाली, शिकायत या ग़ुस्सा न हो 
बातें जो तुम्हारे रोने और मेरे रोना रोकने पर न ख़त्म हों'

जब वह कहता - 
'हुम्म'
तो वह हो सकता था - 
'हां, मैं भी तुम्हारे बिना बेहद अकेला महसूस करता हूं 
उस दिन जब तुम चली गई थीं 
मैंने आत्महत्या के पांच विकल्पों पर विचार किया था'

वह अनकहे को ताक़तवर मानता था
उसे अनकहा ही छोड़ देने को सुंदर 
अनकहे का अर्थ जानने के लिए कविता को चार बार पढ़ा जा सकता
जीवन को नहीं 

यह बोलने की मूल भाषा की ही नहीं
सुनने की मूल भाषा की भी नाकामी है 

परंतु 
ऐसे अनुवाद हो न पाए 
ज़रूरी होता है कई बार 
अपनी भाषा से अपनी ही भाषा में अनुवाद : 
एक अच्छा अनुवादक बना सकता है जीवन को कई गुना बेहतर.


प्राचीन रूप-काव्‍य-परंपरा की स्‍तुति में

तुम्‍हारी पलकें वैसे ही झपकती हैं
जैसे कालिदास मंदाक्रांता में छंद लिखते हों

तुम अमीख़ाई की लरज़ती हुई पंक्ति हो 
फ़ैज़ का भर्राया हुआ शेर 
होलुप का छूटा हुआ कॉमा हो 
मान्‍देलस्‍ताम की अबूझ छवि

तुम टेड ह्यूज़ के अनुवाद पर 
मीवोश की प्रस्‍तावना हो

वास्‍को पोपा की नन्‍ही डिबिया
तुम्‍हारी मुस्‍कान में को उन का संक्षेप है
तुम्‍हारी जि़द में शमशेर का प्रक्षेप 
जो काल से भी होड़ ले ले 

इस दुनिया में ऐसे रहती हो 
जैसे हिकमत रहे थे जेल में 
तुम्‍हारा कमरा वह द्वीप है 
जहां ओविड ने गुज़ारे थे अंतिम बरस 

तुम्‍हारा हृदय होल्‍डरलिन-सा गहरा कुआं है 
जिसकी गहराई में दिन में सुबकती है सैफ़ो 
बेआवाज़
रात में ललद्यद रोती है 

रूज़ेविच और हेर्बेर्त
तुम्‍हारी मौन शिकायतों के लिपिक हैं 
उनके चश्‍मों के कांच पर उत्‍तरी ध्रुवों की धुंध 
तुम्‍हारी कठिन यात्राओं का कथेतर गद्य है

तुम्‍हारा दिल कोई अंग नहीं 
तुम्‍हारा दिल धड़कता हुआ एक घाव है 
आधी रात ईश्‍वर झांकता है वहां से 
फिर पॉल सेलान की कविता में जा छिपता है 

तुम्‍हारे माथे पर जो बचपन की चोट का निशान है 
वह मीर का कलाम है 
तुम्‍हारे आंगन की दीवार पर ग़ालिब सब्‍ज़ा बनकर उगते हैं 

मुझे पता है तुम्‍हारे पास असली बंदूक़ नहीं है 
होती, तो वह तुम पर ही चलती जैसे चली थी लोर्का पर 
मुझे पता है
तुमने वे फिल्‍में देखी हैं जिनमें साहिर ने कविताएं लिखी थीं
उन्‍हें देख तुम्‍हारी कल्‍पना में एक बंदूक़ रहती है 
ऑड्रिएन रिच को तुम गोली की तरह नहीं
एक सवाल की तरह दाग़ती हो 

ओ मेरी मरीना मेरी मिस्‍त्राल 
मेरी शिम्‍बोर्स्‍का मेरी अख़्मातोवा 

कवियों के महासागर में मैं कवि नाम की लहर 

मैं इन सब चीज़ों को भूल भी सकता हूं 
पर तुम्‍हें इसलिए भी सराहूंगा 
कि तुम्‍हारी बुकशेल्‍फ़ में 
बोर्हेस और नेरूदा चिपककर रहते हैं 
अपनी ऐतिहासिक कटुता भुलाकर 

और तुम्‍हारे प्रिय कवियों की सूची देख
मुझे भरोसा मिलता है 
कि अच्‍छे दिन भले न आएं 
अच्‍छी कविताएं हमारा साथ नहीं छोड़ेंगी 


उपहास की पोस्‍ट स्क्रिप्‍ट

पहले वे तुम्‍हारा स्‍वागत करेंगे
तुम्‍हें गले से लगाएंगे
जब तुम स्थिर होकर सोफ़ा पर बैठ जाओगे
वे ख़ुद चाय पिएंगे और तुम्‍हारी उपेक्षा करेंगे.
तुम कुछ बोल पाओ
उससे पहले ही वे तुम्‍हें पीटना शुरू कर देंगे.
उनमें से एक हाथ बढ़ाकर तुम्‍हें उठाएगा ताकि
दूसरे तुम्‍हें धक्‍का मारकर गिरा देवें फिर से.
फिर सब एक साथ हंसने लगेंगे.
तरह-तरह से हंसेंगे किसिम-किसिम से हंसेंगे.
कंखौरियां खुजाते हंसेगे लोटपोट होते हंसेंगे.
तुम धीरे-धीरे खड़े होगे
तुम्‍हारी रीढ़ अब भी सीधी है यह देख उन्‍हें अचरज होगा.
फिर तुम वहां से चले जाओगे.
वे ख़ुद को हारा जानेंगे और तुम पर फिर हंसेंगे.
स्‍वागत. उपेक्षा. पिटाई. उपहास.  समकालीन वाहन के चार पहिये हैं.
फिर वे तितर-बितर हो जाएंगे.
बाथरूम की लादी पर अकेले बैठ उकड़ूं
उनमें से हर एक सुबकता रहेगा देर तक
और सोचेगा:
इतने दिनों तक किसी पर हंसने के बाद भी
रोने की यह इच्‍छा कमबख़्त चली क्‍यों नहीं जाती?

* * *

27 नवंबर मेरा जन्‍मदिन होता है. जीवन में ख़ुद कभी उत्‍सव जैसा कुछ नहीं मनाया, हां, दोस्‍त मना देते हैं. उत्‍सव मुझे क्रीम बिस्‍किट की तरह लगते हैं, जिसकी दो फांकों के बीच क्षणभंगुरता की क्रीम लगी हो. छोटे बच्‍चों की तरह वह क्रीम मुझे ज़्यादा स्‍वादिष्‍ट लगती है. पिछले साल इसी रोज़ क्षणभंगुरता का यह अहसास अधिक तीव्र हो गया. मेरे जीवन का 39वां साल शुरू हो गया था. मैं 38 साल तक जीवन जीता आया. मुझे लगने लगा, इस साल शायद मैं नहीं बचूंगा, मेरी मृत्‍यु बहुत क़रीब है. आपने कितना भी लंबा जीवन जिया हो, मरने के लिए महज़ एक पल पर्याप्‍त है. जीवन जीने का कितना भी लंबा अनुभव हो, वह मृत्‍यु के सामने काम नहीं आता. और अभी कुछ दिन पहले, 20 नवंबर को मृत्‍यु मेरी बग़लों को छूती हुई गुज़र गई. मैं बचा रहा, लेकिन साल-भर पहले शुरू हुई यह कविता (27 नवंबर 2015) मुझसे संवाद करती रही, जैसे इस कविता के भीतर मैं किसी प्रिय से संवाद कर रहा. मैं जि़द्दी बच्‍चे-सा खड़ा हूं, इस भरोसे के साथ कि जि़ंदगी मेरे लिए चॉकलेट ख़रीद लाएगी.     - गीत    

27 नवंबर 2015

दो पंक्तियों के बीच जो ख़ाली जगह है 
वहां की हवा को अपने फेफड़ों में भरता हूं 
सांस ही नहीं, नाक से अर्थ भी लेता हूं. 
पढ़ना, जि़ंदगी के साथ गाया डुएट है 
लिखना, हर बार अपने लिए एक नई मृत्‍यु की तलाश. 
जब भी पूर्ण विराम लगाता हूं 
ख़ुद को अलविदा कहता हूं. 
इस जि़ंदगी को तीर्थयात्रा की तरह जीता हूं. 
जी लिया तो ठीक. वरना किसको पड़ी है. 
तीरथ पर गए लोगों का इंतज़ार नहीं किया जाता. 
मैं मीठा नहीं बोल पाता
क्‍योंकि मैं नदियों से नहीं आया. 
मैं समंदर से आया हूं. 
समंदर के शहर में जन्‍मा और नदियों के शहरों में भटका.
मैंने अपनी यात्राएं उल्‍टे चलकर की हैं. 
मैंने बड़े-बड़े पुल पार किए, अनदेखे, असोचे. 
तब मेरे हाथ में कोई सूटकेस नहीं होता था 
मन में चलती रहती थी एक कविता. 
मैंने बड़ी से बड़ी दूरी महज़ कविता के ज़रिए पार की. 
और कुछ नहीं
मेरे पास फ़क़त एक दिल है 
किसी महिला की ना जितना मज़बूत. 
जिसके नीचे मधुमक्खियां 
फूलों की स्‍मृतियां जमा करती हैं. 
जाने-पहचाने स्‍टेशनों से चुपचाप निकल जाती है 
अनजान खेतों को देख हॉर्न बजाती है मेरी ट्रेन. 
हवा अपनी नीली आवाज़ में गाती है. 
भटकता हुआ एक अज्ञात शहर पहुंच जाऊं 
ग़ौर से देखूं हर गली और बुदबुदाऊं : 
'ख़ुदाया ! रस्‍ता तो भूल गया
पता पूछने के लिए कहीं दस्‍तक दूं तो दरवाज़ा खोले 
बचपन की मेरी प्रिय लड़की जो अब भी बड़ी नहीं हुई 
पोल्‍का डॉट्स की फ्रॉक पहने उनींदी खड़ी हो. 
जितनी भाषाएं जानता हूं 
उतनी में घर की याद आती है 
और अलग-अलग वर्तनी में आती है. 
जबकि हर भाषा के भीतर मैं बेघर हूं. 
मेरे पास जीवन जीने का 38 साल का अनुभव है. 
हो सकता है, 39वें साल किसी एक रोज़ 
यह सारा अनुभव धरा का धरा रह जाए. किसी काम न आए. 
ज़्यादा सोचो मत. 
जि़ंदगी तो हमेशा ऐसी ही होती है 
पर आज शाम मैं तुम्‍हें चॉकलेट ख़रीद दूंगा.

(गीत चतुर्वेदी की अन्‍य कविताएं यहां पढ़ सकते हैं.)



39 comments:

Lovely poems. Mind blowing. Once a genius always a genius! Hats off to you Geet Chaturvedi !

I am perennially hungry for your poems. Madly in love with them. <3


सभी कवितायेँ अच्छी हैं, 'मूल भाषा' मुझे बहुत पसंद आयी।


वाह... प्रेम छिपकली की पूँछ....


बेहतरीन कविताएँ गीत । दुनिया का पहला कवि और मूल भाषा विशेषकर अच्छी लगी ।


शुभकामनाएँ


कमाल की कविताएँ


शाहनाज़ इमरानी

अच्‍छे दिन भले न आएं
अच्‍छी कविताएं हमारा साथ नहीं छोड़ेंगी ....... सत्य।


वाह उत्तम चयन और कविताएं, बधाई गीत और अनुराग


पर प्रेम तो जैसे छिपकली की पूंछ है/ जितनी बार कटती है, नई उग आती है.. 👍👍


आपकी कविताओं का इंतज़ार रहता है.धन्यवाद.


कविता में जादूपन और हिलोरें मारने वाला एहसास है।
आप मेरे इस समय के प्रिय कवि हैं


शुभकामनाएँ। आपके 100वें जन्म दिन पर भी हम इसी तरह की कविताएँ पढ़े.


सातों कविताएँ एक से एक हैं 👌


bilkul alg aapko khda krti hui


शब्दों में आत्मा होती है,
आपकी हर पंक्ति कहती है।


नए उपमान। वाह गीत भाई।


....आपको पढ़ना जीवन को पढ़ने के समान है। हर शब्द जीवन्त....


गीत तुम मन के परत दर परतों के नीचे दबे अहसासों को इतने सटीक शब्द कैसे दे पाते हो ये तो मेरे लिए गूंगे का गुड़ होता है जो क्ष रही हूँ न उसका बहुत सा अनकहा ही है वो भी ऐसा अनकहा जिसे शिद्दत से मैं जोर से कहना चाहती हूँ पर एहसासों की धक्काम्पेली में शब्द नहीं पहचाने जाते। जाने तुम्हारे शब्द जादूगर है जाने उनका चुनाव जादूगर है या तुम्हारे अहसास ही गजब के सशक्त है। बहुत घालमेल है और ये हम 60 से ऊपरवालों के बस की बात भी नहीं। दशरथ के आँगन में रुनझुन पैंजनिया पहने राम के आँगन में घूमते से शब्द। हाँ एक बात जरूर हमारे हाँथ में है और वो है तुम्हारे लिए ढेर सा आशीष।खुश रहिये ।


आपका अपना एक सिग्नेचर स्टाइल है। जिसे केवल लाजवाब कहना बहुत कम होगा। ये मौन से निकली कविताएं मौन में ही समाहित हो जाती हैं। शेष रह जाती है प्रतिध्वनि.....देर तक।

इन नई रचनाओं के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई गीत जी।


नया कहन, बधाई


अनकहे का अर्थ जानने के लिए कविता को चार बार पढ़ा जा सकता
जीवन को नहीं ......... बढ़िया कविता।


जीवन का अनकहा नही पढा जा सकता , ! वाकई एक अच्छा अनुवादक जीवन को सही बना सकता है


बेहतरीन कविता..बोलने की भाषा सबकी एक ही..समझने की अलग अलग..


Tumhari kavitaon me ek change dikh rahaa hai....bahut achcha lag rahaa hai


बहुत अच्छी कविता!


अति उत्तम सर .....


Tum Bahut sundar likhte ho.


Sundar Kavita..


हमेशा की तरह अति उत्तम


मैं निःशब्द हूँ कविताओं को पढ़कर।हो सके तो मेरे मौन का अनुवाद कर लें।


pahali kavita ne mujhe udas kar diya geet bhai.


दुनिया का पहला कवि. The poem I would love to read again and again.


भौंचक्का रह जाने की हद तक आप निःशब्द करते हैं ......अद्भुत


आपकी नयी कविताओं का इंतज़ार रहता है और इनसे गुज़र कुछ नया मिलने का एहसास होता है। ये बात हो सकता है पहले भी कह चुका होऊँ लेकिन मेन बात है ही यही


बहुत सुन्दर कवितायें..


'Duniya ka Pahla kavi' evam 'Mool bhasha' kavitaen ati sunder or sargarbhit lagi. Dheron shubhkamnaen.


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सम्‍मुख - 1

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