Thursday, November 10, 2016

सबद विशेष : 20 : ज़बिग्नियव हर्बर्ट : लम्बी कविताएं


अनुवाद और टिप्पणी : मोनिका कुमार 
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छोटी गद्य कविताओं में ज़बिग्नियव हर्बर्ट छोटी कविताओं के राजा प्रतीत होते हैं जहाँ उनकी काव्य अभिव्यक्ति परमाणु अवस्था में सुगठित होकर ऐसी बंदिश का निर्माण करती है कि विचार का और परिष्कार सहज संभव नहीं दिखाई देता, शब्द को किसी दूसरे शब्द से नहीं बदला जा सकता और वाक्य को संपादकीय युक्तियों से और छोटा करना कठिन होगा। हर्बर्ट की छोटी पद्य कविताएं अरस्तु की दी गई कथानक की परिभाषा के सर्वथा अनुकूल हैं कि कथानक ताश के पत्तों से बनाए पिरामिड जैसा होना चाहिए कि एक पत्ता बाहर खींच लें तो पिरामिड ढह जाए और कथा के भाव में अभाव हो जाए। 

इस प्रकार देखने से हर्बर्ट की छोटी कविताएं अभिव्यक्ति केसमरथको चिन्हित करती हैं।इनकी छोटी कविताएं पढ़ कर ऐसा लगता है जैसे इस अनिश्चित जीवन को विवेक, संवेदना और बुद्धि से समझा और सुलझाया जा सकता है और तभी हर्बर्ट की लंबी कविताएं इसका प्रतिपक्ष प्रस्तुत करती हैं। 

इनकी लंबी कविताएं मनुष्य की असमर्थतता के प्रति गहरी सहानुभूति प्रकट कर रही हैं। अतिविवेक में कहीं बातें अक्सर सटीक, संक्षिप्त और अभिमंत्रित प्रतीत होती हैं और असामर्थ्य प्रकट करते हुए हम अक्सर विस्तार में चले जाते हैं। हर्बर्ट की लंबी कविताओं में अंदर की आवाज़ की असमर्थता प्रकट होती है जिस आवाज़ को मनुष्य निरंतर अपने अहं के अनुकूल करता चला जाता है, किसी दार्शनिक के असामर्थ्य का शायद ही अन्यत्र ऐसा मार्मिक वर्णन मिले। 

इन कवितायों में युद्ध में चलाई गयी गोली की याद है जो सारी पृथ्वी घूम कर पीठ पर वापिस लगती है। और इन्हीं कविताओं में एक घर है जिसकी चिमनी और खिड़कियों की बात करना तो दूर, कवि के पास गेट की चिटखनी तक की बात करने का सामर्थ्य नहीं है।हर्बर्ट कहते हैं जिसकी व्याख्या नहीं की जा सकती, लाड़ से पुकारा जा सकता है, सो लाड़ वस्तुतः हमारी असर्मथता की भाषा है। 
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अंदर की आवाज़
मेरे अंदर की आवाज़ के पास 
मुझे देने के लिए कोई सलाह नहीं है  
किसी बात से मुझे बचाने के लिए चेतावनी भी नहीं 

मेरे अंदर की आवाज़ 
हाँ नहीं करती 
और ना ही ना बोलती है   
बमुश्किल सुनती है 
और लगभग अस्पष्ट है 

इसे सुनने के लिए अगर आप झुकें भी 
तो आपको अर्थ से कोरा
मात्र कोई शब्दांश सुनाई देता है 

मैं कोशिश करता हूँ इसे अनसुना ना करूँ 
मैं इससे तमीज़ से पेश आता हूँ 

मैं इसे अपने बराबर समझने का अभिनय करता हूँ  
और यह भी 
कि इसके कहने का मुझ पर गहरा असर होता है 

कई बार तो मैं इससे बात करने की भी कोशिश करता हूँ 
- कल ही की बात है 
  मैंने इनकार किया कि ऐसा मैंने कभी किया ही नहीं 
  और अब भी नहीं करूँगा 

- ग्ग्ग्ग्ललग्गग्गल 
- सो तुम मानती हो 
मैंने ठीक किया 

--ग्ग्ग्ग--ग्ग्ग्ग्ग 
मैं खुश हूँ  हम रजामंद है 
म्म्म्म्ममअअआ 
-चलो अब आराम करो 
कल फिर बात करेंगे 

इस आवाज़ का मुझे कोई फायदा नहीं  
मैं इसे आसानी से भूल सकता हूँ  

मुझे इससे कोई उम्मीद नहीं है  
जरा सा पछतावा है   
जब करुणा से भरी  
यह बैठी रहती है 
मुँह खोल कर  
भारी भारी सांस लेती 
अपना निरीह सर उठाने का जतन करती है 
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फलसफे की जुताई
लकड़ी के पटरे के मुलायम बुरादे में
मैनें अनंत के विचार को बोया  
तुमने देखा ! कैसा बढ़िया हो रहा है यह 
-अपने हाथ रगड़ते हुए दार्शनिक बोला  

और यह सचमुच बढ़ता है
सेम के डंठल की तरह 
अनंत के तीन चार मौसम और
यह अपने ही सिर के ऊपर से निकल जाएगा 

-दार्शनिक कहता है
मैंने सिलेंडर और इसके सिरे पर जो पैंडुलम है
इसे भी ठोंका है
मुझे यकीन है आप समझ रहे होंगे यह (विषय)कहाँ जा रहा है 
सिलेंडर एक जगह है
पैंडुलम समय है
टिक टिक टिक
ठहाका मारते हुए दार्शनिक
अपने नाटे हाथ हिलाता है

अंततः मैं शब्द निकालता हूँ अस्तित्व 
एक खुरदरा और बेरंग शब्द
तुम लंबे समय तक इन चुस्त हाथों से स्नेहिल पत्तियां बटोरना 
तुम्हें कई धारणाएं तोड़नी होंगीं
जैसे सूर्यास्त को अद्भुत घटना कहना होगा
तब जाकर तुम्हें 
दार्शनिक की दुधिया पारसमणि मिलेगी 

अब हम उम्मीद करते हैं
दार्शनिक अपनी ऐसी बुद्धि पर रोए
पर वह नहीं रोता 
अंततः अस्तित्व को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता
ना इससे जगह पिघलेगी
और ना ही समय अपने निष्ठुर प्रवाह में रुकेगा 
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तुम्हारे बारे में कभी नहीं 
मेरी बगल के विशाल आकाश 
तुम्हारे बारे में बात करूं 
यह साहस मुझ में कभी नहीं आता 
छत के बारे में बात करने का भी नहीं 
जो हवा के झंझावात रोक कर रखती है
ये प्यारी ढलाननुमा नरम छत
जो सिर के बालों की तरह घर का शीर्ष स्थान है
तुम्हारे बारे में भी बात नहीं करता 
चिमनियों 
तुम जो दुख की प्रयोगशाला हो 
चन्द्रमा की फटकार सुनकर 
तुमने जो अपनी गर्दन बाहर लटकाई है
तुम्हारे बारे में भी नहीं 
बंद और खुली खिड़कियो
वही खिड़कियो 
जो चटकने लगती हो 
जब हम परदेस में मर रहे होते हैं

मैं तो घर की व्याख्या तक नहीं कर सकता 
जो मेरे हर पलायन और सभी वापसियों का हमराज़ है 
घर जबकि इतना छोटा है 
कि बंद आँख में समा जाता है 
हरे पर्दे से आती गंध का फिर भी अनुवाद नहीं कर सकता   
हाथों में जलता हुआ दिया लेकर मैं जिन सीढ़ियों पर चढ़ता हूँ
उसकी चरचराहट का भी वर्णन नहीं कर सकता 
गेट की ऊपर उगी हरियावल का भी नहीं 

असल में मैं घर के गेट की चिटखनी के बारे में लिखना चाहता हूँ 
इसके खुरदुरे स्पर्श और इसकी दोस्ताना चरचराहट के बारे में 
बेशक मैं इसके बारे में बहुत कुछ जानता हूँ 
फिर भी निष्ठुर होकर 
इसके लिए घिसे पिटे शब्द चुनता हूँ  
दो साँसों के बीच अनेक भावनाएं समा जाती हैं 
कितनी तो चीजें पकड़ी जा सकती हैं दो हाथों में

हैरान मत हो कि हम इस दुनिया की व्याख्या नहीं कर सकते 
और चीजों को बस लाड़ से पुकार लेते हैं 
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कैसे हमारा प्रवेश हुआ
(धोखेबाज़ सरपरस्तों के लिए)
मैं बाहर गली में खेल रहा था 
मेरी तरफ किसी का ध्यान नहीं था 
मैं रेह्म्बो की कविता बुदबुदाता
रेत की कचौरियां बनाने में मगन था

किसी दिन एक उम्रदराज़ आदमी ने मुझे सुना
तुम तो कवि हो बालक
हम लोग तृणमूल साहित्यिक आन्दोलन
का संगठन कर रहे हैं 
मेरे मैले सर को सहलाते हुए 
उसने मुझे बड़ा सा लालीपॉप दिया
जवानी के छद्म चटख रंगों वाले
नए कपड़े भी दिलवाए 

अपने पहले कम्यूनिऑन संस्कार के बाद
मैंने ऐसे अच्छे कपड़े नहीं पहने थे 
ऊंची पतलून और
नाविकों की शानदार कालर वाली कमीज़ 

बढ़िया चमड़े के काले जूते 
उस पर बकसुए और सफ़ेद जुराबें 
बूढ़ा आदमी मेरा हाथ पकड़कर  
मुझे जश्न की जगह ले गया 

वहाँ और भी लड़के थे 
मेरे जैसे
ऊंची पतलून पहने 
चेहरे सफाचट थे उनके 
और वे पाँव इधर उधर फेंट रहे थे  

मज़े करो लड़को 
किनारे पर क्यूँ खड़े हो 
- बूढ़े आदमियों ने हमें पूछा 
तुम लोग एक घेरा क्यूँ नहीं बनाते 
पर हम नहीं खेलना चाहते थे 
वही छुपन छुपाई  
आँख मिचौनी का खेल 
पकाऊ बुड्ढों से हमारी बस हो रही थी   
और हम भूख से तड़प रहे थे 

जल्दी से उन्होंने हमें  
आलीशान मेज़ की ओर बिठा दिया 
हम सभी को एक टुकड़ा केक 
और मीठी शिकंजी दी गई 

अब लड़के अपने पैरों पर खड़े हो गए 
और व्यस्कों की तरह बात करने लगे 
घुटनों पर धौले मारते 
भर्राए स्वर में हमारी तारीफ करने लगे 

हमें कुछ सुनाई नहीं दिया 
कुछ महसूस नहीं हुआ 
अपनी खुली फटी आँखों से 
हम केक के टुकड़ों को घूर रहे थे 
जो हमारे व्याकुल हाथों की गर्मी से 
फटाफट पिघल रहे थे 
और जीवन की पहली मिठास 
गहरे आस्तीन में खो गई थी
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एक छोटा दिल
प्रथम विश्व युद्ध में 
मैनें जो गोली दागी
सारी पृथ्वी घूम कर 
मेरी पीठ में वापिस कर लगी  

वह भी ऐसे बेमौके 
जबकि मैं निश्चित हो गया था 
कि मैं उसके और अपने अतिक्रमण को भूल चुका हूँ  

आखिर मैं भी हर किसी की तरह 
घृणा के चेहरे वाली 
स्मृति को मिटा देना चाहता था 

इतिहास ने मुझे दिलासा दिया 
-मैं हिंसा के विरुद्ध लड़ रहा था 
पर पोथी ने कहा  
-मैं कैन* से लड़ रहा था 

धीरज के कई बरस  
कई बेकार गए वर्ष 
मैंने करुणा की नदी में 
कालिख सना खून धोया
ताकि सुंदरता का वैभव 
अस्तित्व की गरिमा 
या शायद नेकी भी
मुझ में निवास कर सके 

आखिर मैं भी तो सभी की तरह 
बचपन की खाड़ी की ओर 
मासूमियत के देश 
लौटना चाहता था  

एक साधारण सी बंदूक से  
मैनें जो गोली दागी 
गुरत्व बल के बावजूद 
सारी पृथ्वी घूम कर 
वापिस मेरी पीठ पर लगी 
जैसे मुझे जतलाना चाहती हो 
- किसी को कुछ भी मुफ्त नहीं मिलता   

अब मैं एकांत में 
पेड़ के कटे हुए तने पर बैठा हूँ 
भूली बिसरी जंग के ठीक केन्द्र बिंदु पर 
मैं एक धूसरित मकड़ी बुन रहा हूँ 
कटु चिंतन कर रहा हूँ 
उस स्मृति पर जो बहुत बड़ी है 
और एक दिल पर बहुत छोटा है 
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* बुक ऑफ जैनिसिज़ अनुसार आदम और हव्वा के दो पुत्रों में से एक जिसने ईर्ष्या के कारण अपने भाई एबल का कत्ल किया।



4 comments:

pushpesh kranti said...


अब मैं एकांत में
पेड़ के कटे हुए तने पर बैठा हूँ
भूली बिसरी जंग के ठीक केन्द्र बिंदु पर
मैं एक धूसरित मकड़ी बुन रहा हूँ
कटु चिंतन कर रहा हूँ
उस स्मृति पर जो बहुत बड़ी है
और एक दिल पर बहुत छोटा है
.....
....शानदार.
साड़ी कविताएं एक से एक..😊😊

Shruti Gautam said...

'हम इस दुनिया की व्याख्या नहीं कर सकते
और चीजों को बस लाड़ से पुकार लेते हैं..'

वैसे ही कभी कभी कुछ कविताओं को पढ़ कर समीक्षा नही की जाती बस मुस्कुरा लिया जाता है, बस एक ज़र्रा भर उदासी पलकों पर आ ठहरती है, बस मन के किसी कोने में कुछ बदल सा जाता है। एक खुरदरा और बेरंग शब्द 'अस्तित्व' अपने मायने तलाश ही लेता है। और जैसा कवि कहता है-

'अंततः अस्तित्व को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता
ना इससे जगह पिघलेगी
और ना ही समय अपने निष्ठुर प्रवाह में रुकेगा।'

और 'उस स्मृति पर जो बहुत बड़ी है/ और एक दिल पर बहुत छोटा है।' कविता मुकम्मल बयान है कि इसकी मिठास लफ़्ज़ों की आस्तीन में खोई नहीं, बरकरार है, बेहद है। अनुवादक को ढेरों शुभकामनाये। :)

महेश वर्मा said...

शानदार!मुझे यह परिचयात्मक टिपण्णी बहुत गहरी और बौद्धिक लगी। सधी हुई भाषा और विवेकपूर्ण विश्लेषण के लिये मोनिका कुमार को बधाई!कवितायें पढ़ना अभी बाकी है।

Anonymous said...

शुक्रिया अनुराग । पुष्पेश, श्रुति और महेश जी का भी हार्दिक धन्यवाद ��
मोनिका