Tuesday, April 05, 2016

व्योमेश शुक्ल की नई कविता


एक लम्बे अंतराल के बाद व्योमेश शुक्ल ने नई कविता सम्भव की है। 

                                                                                                                                                  photo: anurag vats


पोंSSSSSSSSSSSS 

यार, ख़ूब मन लगाकर शादी कीजिए
फिर ख़ूब मन लगाकर बनारस जाइए
सुनिए उस कारख़ाने के सायरन की आवाज़ जो सन 2000 में ही बंद हो गया
रोज़ाना 8 बजे, 1 बजे, 2 बजे, 5 बजे
धिन धिन धा धमक धमक मेघ बजे 

आइए तो मिलकर पता लगाया जाय कि वह आवाज़ आती कहाँ से है यह भी संभव है कि वह आवाज़ सिर्फ मुझे ही सुनाई देती हो एकाध बार मैंने रमेश से पूछा भी कि कुछ सुनाई दे रहा है आपको तो वह ऐसे मुस्कराए जैसे मेरा मन रखने के लिए कह रहे हों की हाँ 

दिक्क़त है कि लोग सायरन की आवाज़ सुनना नहीं चाहते नए लोग तो शायद सायरन की आवाज़ पहचानते भी हों सायरन बजता है और वे उसकी आवाज़ को हॉर्न, शोर, ध्वनि प्रदूषण और जाने क्या-क्या समझते रहते हैं. नाक, कान, गले के डॉक्टर ने मुझसे कहा कि तुम्हारे कान का पर्दा पीछे चिपक गया है और ढंग से लहरा नहीं पा रहा हैइसकी वजह से तुम्हें बहुत सी आवाज़ें सुनाई नहीं देंगी तो मैंने उनसे कहा कि मुझे तो सायरन की आवाज़ बिलकुल साफ़ सुनाई देती हैरोज़ाना 8 बजे 1 बजे 2 बजे 5 बजे, तो वह ऐसे मुस्कराए जैसे मेरा मन रखने के लिए कह रहे हों की हाँ 

यार, ख़ूब मन लगाकर शादी कीजिए फिर ख़ूब मन लगाकर बनारस जाइए आपमें हीमोग्लोबिन कम है और मुझे सायरन की आवाज़ सुनाई देती रहती है आइए तो मिलकर पता लगाया जाय कि वह आवाज़ आती कहाँ से है 

कारख़ाना बंद है तो सायरन बजता क्यों है जहाँ कारख़ाना था वहाँ अब एक होटलनुमा पब्लिक स्कूल है स्कूल में प्रतिदिन समय-समय पर घंटे बजते हैं लेकिन सायरन की आवाज़ के साथ नहीं बजते. सायरन की आवाज़ के बारे में पूछने के लिए मैंने स्कूल की डांस टीचर को फ़ोन किया तो वह कहने लगी कि पहले मेरा उधार चुकाओ फिर माफ़ी आदि माँगने पर उसने कहा कि उसकी कक्षा में नृत्य चाहे जिस ताल में हो रहा हो, ऐन सायरन बजने के मौक़े पर सम आता ही है. परन, तिहाई, चक्करदारसबसायरन के बजने की शुरूआत के बिंदु पर ही धड़ाम से पूरे हो जाते हैं.
मसलन तिग दा दिग दिग थेई, तिग दा दिग दिग थेई, तिग दा दिग दिग पोंSSSSSSSSS
     (यहाँ - तिग दा दिग दिग - कथक के बोल
      पोंSSSSSSSSS – सायरन की आवाज़)

सायरन की आवाज़ हुई, ब्लैकहोल हो गया. बहुत सी चीज़ों का अंत हो जाता है उस आवाज़ की शुरूआत मेंपिता, पंचवर्षीय योजना, पब्लिक सेक्टर, समूह, प्रोविडेंट फंड, ट्रेड यूनियन और हड़तालसबसायरन के बजने की शुरूआत के बिंदु पर ही धड़ाम से पूरे हो जाते हैं 

कभी-कभी धुएँ और राख़ और पानी और बालू में से उठती है आवाज़. वह आदमी सुनाई दे जाता है जो इस दुनिया में है ही नहीं कभी-कभी मृत पूर्वज बोलते हैं हमारे मुँह से. बहुत सी आवाज़ें आती रहती हैं जिनका ठिकाना हमें नहीं पता. वैसे ही, सायरन बजता है रोज़ाना आठ बजे एक बजे दो बजे पाँच बजे 

जैसे मेरा, वैसे ही सायरन की आवाज़ का, आदि, मध्य और अंत बड़ा अभागा है. बीच में हमदोनों अच्छे हैं और आपसब की कुशलता की प्रार्थना करते हैं. बीच में, लेकिन यही दिक्कत है कि पता नहीं लगता कि हम कहाँ हैं और ज़माना कहाँ है? नींद में कि जाग में, पानी में कि आग में, खड़े-खड़े कि भाग में.


आइए यार तो ढूँढा जाय कि सायरन की आवाज़ कहाँ से आती है और हमलोग कहाँ हैं?   
****                  

13 comments:

Neelotpal Ujjain said...

आवाज़ें स्मृतियों का द्वार है.

व्योमेश की यह कविता हिन्दी कविता का बेहतरीन स्वर है. न सीधे बयानी है न सपाटपन. हम जिस तरह से कविता के अंदाज़ को जीते हैं वह सुई में धागे पिरोये जाने की तरह बेहद सूक्ष्म है...

व्योमेश ने यहाँ कई बातों पर रोशनी डाली है. यह भी देखना की एक कविता की वास्तविकता कितनी सघन और सहज है.

बधाई

Umber R. Pande said...

इसकी नक़ल करने का चोरी करने का मन होता है।
Vyomesh Shukla के घर एक दिन मैं डाका डालूँगा।

armaan singh said...

ऐसी कविताओं को सुन्दर और अच्छी कविता नहीं बल्कि जरूरी कविता कहना चाहिए बड़े भाई को धन्यवाद

shekhar singh said...

कविता और गद्य् के सम्मिश्रण का अनूठा प्रयोग। इसको पूर्ण रूप से कविता नहीं कहा जा सकता। क्योंकि छंद मुक्त होने के बावजूद उसके कुछ अनिवार्य तत्व होते हैं जो किसी कविता को और ज़्यादा रस प्रदान करते हैं उदाहरण, संक्षिप्त वर्णन, या एक ही शब्द के एक बार से अधिक के प्रयोग से बचना। ये पूरी तरह से गद्य् भी नहीं है। इसे कविता और गद्य् का अनूठा,मगर रचनात्मक प्रयोग कहा जा सकता है। नई शिल्प के साथ एक अपनी सी पहल की अनुभूति लिए हुए एक प्रयोग।

Avinash Mishra said...

प्रिय भैया,

नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढ़ा। लगभग चार साल बाद, आपकी एक कविता प्रकाशित हुई है। यह मेरे लिए भी उतनी ही तसल्ली और गहरी खुशी का मौका है, जितना आपके लिए।

लेकिन यह अजब है कि यह अंतराल शिल्प के स्तर कोई बड़ा बदलाव लेकर नहीं आया है। जैसे कवि 'जस्ट टियर्स' पर ही ठहरा हुआ है। मैं प्रस्तुत कविता को दो बार पढ़ चुकने के बाद फिलहाल यह तय नहीं कर पा रहा हूं कि अच्छे-बुरे या इससे इतर इसे किस संदर्भ में रेखांकित करूं। अन्य दोस्त शायद इस मामले में कुछ काम आएं।

शेष फिर

आपका
अविनाश

Chandan Pandey said...

Vyomesh Shukla is a chaaampian. his poetry is a chaaampian.

बहुत अच्छी कविता। बधाई। अपनी इस कविता में पहले की तुलना में ज़रा निष्कवच हुए हैं और कविता खूब निखर कर आई है। आवाज एक जगह थी कहीं लेकिन इस कविता में आवाज की जगह को 'लोकेट' कर दिया गया है। या कहें तो, किया गया है। सबकी आवाज के साथ। पुन: बधाई।

Vindhyachal Yadav said...

रंगमंच की समझ उनकी कविताओं की मूल संरचना में, थीम में काम करती है, इसीलिए व्योमेश की कविताओं में अक्सर संवाद, एकालाप और दृश्यमानता रहती है किंतु बहुत इनकंसिस्टेन्ट किस्म की ,कुछ गैप्स होते हैं जैसे प्ले में होते हैं, भावक को उसे अपनी कल्पना से भरना पड़ता है, यही कारण है कि व्योमेश कठिन कवि लगते हैं! पता नहीं क्यों कविता में जितना ऊंचा स्थान उन्हें अब तक मिल जाना चाहिए था, मिल नहीं पाया है, शायद हिंदी आलोचना भटक रही हो!

Kumar Mangalam said...

भैया मैं अक्सर कहता हूँ अब भी हिंदी की समकालीन कविता को समझने के लिये व्याकरण की जरूरत है । व्योमेश भाई की यह कविता उस व्याकरण की आवश्यकता को बल देती है । एक जरूरत यह भी है कि समकालीन कविता पर समकालीनों द्वारा ही बात हो । गुजरात के चर्चित साहित्यकार और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित रचनाकार रघुबीर चौधरी ने कहा था कि कवियों के काव्य सृष्टि में पाठक को घुसना चाहिए । यह एक सामान्य पर अद्भुत वाक्य लगा था । और इस चुनौती को समकालीन लोग ही उठा सकते हैं ।

Arun Sri said...

//पिता, पंचवर्षीय योजना, पब्लिक सेक्टर, समूह, प्रोविडेंट फंड, ट्रेड यूनियन और हड़ताल – सब – सायरन के बजने की शुरूआत के बिंदु पर ही धड़ाम से पूरे हो जाते हैं//

Chaturved Arvind said...

हाँ, है तो यह सायरन की ही पुरकश आवाज. बहुत खूब व्योमेश.

Chandrakala Tripathi said...

लगातार पकती हुई रचनात्मक मेधा ,जिसके लिए चुनौती उसका अपना ही लिखा हुआ है ।व्योमेश आपको फौरी तरीके की बेचैनियों में नहीं छोड़ते ।आपको टिकना ही पड़ता उनकी कविताओं के साथ ।

Manoj said...

अद्भुत कविता... उसी सायरन की तरह देर तक भीतर बजती हुई। व्योमेश को बहुत बहुत बधाई।

chandreshwar said...

एक उम्दा कविता के लिए व्योमेश को बधाई!