सबद
vatsanurag.blogspot.com

मिला धूल में लेकिन अब भी चमक रहा है




















महेश वर्मा : तीन सॉनेट

एकाकी था कर्णफूल 

एकाकी था कर्णफूल जब मिला राह की
धूल ठोकरों से क्षत-विक्षत. अपने जोड़े
का उसको कुछ भान नहीं था.बचा डाह की
लपटों से या उसको फेंका. कितने थोड़े

रुपयों में तो नया मिलेगा, यही सोचकर
नयी नवेली दुलहनिया ने मान दिखाया
होगा शायद. या रक्खा हो इसे बेचकर 
छोटे बुंदे लूंगी. प्रिय को नहीं बताया

होगा.कुछ भी हो सकता है. बहरहाल यह
मिला धूल में लेकिन अब भी चमक रहा है.
प्रिय बिछोह से क्या कुछ इसका कसक रहा है?
रखूँ? फेंक दूं? सोना? पीतल? यह अथवा वह.

कुछ संशय था उलट पुलट कर उसे देखते.
विफल भाग्य हूँ, नहीं डिगा मन,वहीं फेंकते.
 ***
  
हठयोगी है सूर्यकान्त

हठयोगी है सूर्यकान्त. सीने पर पत्थर
रख कर बड़े हथौड़े से उसको फुड़वाना,
कील कांटियाँ, शीशे,चाकू, टीन चबाना
उसे सहज है.प्रेम तुम्हें करता हूँ कहकर

कोमल सी कन्या के सम्मुख खड़ा रहूँगा
ऐसी हिम्मत जुटा रहा है तीन वर्ष से .
कन्या को कुछ ज्ञात नहीं है.अभी सहूँगा
प्रेम वेदना. कभी कहूँगा. सोच हर्ष से

पुलकित होना, ह्रदय धड़कना, शरमा जाना
यही सिलसिला चलता रहता अगर खबर ये
उसे न मिलती कन्या की इक निकट सखी से-
वर सुयोग्य वे ढूंढ रहे हैं. आना जाना

भी जारी है इस चक्कर में. सूर्यकान्त को
दिल की कहने का बल आये,चाहे जो हो !
*** 

बन जाने दो रमता जोगी 

कवि  हो हिंदी के तो  कैसे यह है मुमकिन
नाम त्रिलोचन का तुमको कुछ अनजाना सा
जान पड़े औ  अनजाने  होने से  निसदिन
मगन रहो कि भैय्या हम तो बिलकुल ऐसा

नहीं  मानते  पढ़ना औ  पढ़ते ही रहना
आवश्यक है,इतना कहकर कवि अम्बरजी
रुके रहे. उनकी  यह  चुप्पी सहते रहना
ही निश्चयतः हास्यबोध को उनकी मरजी

की सीमा तक तीक्ष्ण करेगा.आख्याता ने
यही  सोचकर गद्य लिखा है. ताने बाने
को कविता के यह कितना संतुष्ट करेगा,
मोद  किसे देगा किसको यह रुष्ट करेगा,

इस सब की चिंता जायज है, वह भी होगी.
अभी गद्य को बन  जाने दो रमता जोगी.

***

                                                                         ( महेश वर्मा की सबद पर अन्य कविताएं यहां  )
7 comments:

अभी गद्य को बन जाने दो रमता जोगी ….


अतिविलक्षण कविद्वय हैं ये अम्बर और महेश/ कविताई में मिताई है,राजनीति में क्लेश


सुबह ही पढ़ा तीनों को एक से बढ़ कर एक। हालांकि सौनेट का शाब्दिक अर्थ अभी तक नहीं मालूम हिंदी में मुझे!!


भई हम तो का कविता में आ गए। हम अब अमर हो गए। देवता भी तरसते है। शुक्रिया Maheshबाबू & Vatsजी


बढ़िया साॅनेट महेश भाई। लेकिन तीसरे वाले मे वह लय नही बन पा रही थी।


गौतम राजरिशी: महेश भाई की कविताओं का प्रशंसक रहा हूँ । लेकिन क्या महज तयशुदा मिसरों को राइम कर देने से कोई चौदह मिसरों वाली कविता सॉनेट कहलायेगी ? क्या मिसरों को मुकम्मल नहीं होना चाहिये ?

*

Mahesh Verma: भाई मेरी कोशिश तो थी कि कोई प्रसंग कह पाऊँ।लेकिन ऐसा नहीं हो पाया हो तो बताइये कहाँ अधूरापन है आगे दुरुस्त किया जाएगा।शुक्रिया आपने इन्हें पढ़ा और अपनी बात भी रखी।

*

Padmnabh Mishra : बड़ी महारथ लगती है। राइम करना, मात्राओं को मिलाना, और महेश भाई की कविता शैली भी झांक रही इसमें। क्लास पूरा है।

*

गौतम राजरिशी: मैंने तो आपसे जानना चाहा महेश भाई । छंद का पाठक हूँ और छात्र हूँ तो जिज्ञासा जगी । मेरे जानते रचना में मिसरों को मुकम्मल होना मांगता है । किसी मिसरे को अधूरा छोड़कर, उसे नीचे दूसरी पंक्ति से शुरू करना कुछ अटपटा सा लग रहा है ।

एकाकी था कर्णफूल जब मिला राह की
धूल ठोकरों से क्षत-विक्षत. अपने जोड़े
का उसको कुछ भान नहीं था.बचा डाह की
लपटों से या उसको फेंका. कितने थोड़े

रुपयों में तो नया मिलेगा, यही सोचकर
नयी नवेली दुलहनिया ने मान दिखाया
होगा शायद. या रक्खा हो इसे बेचकर
छोटे बुंदे लूंगी. प्रिय को नहीं बताया

होगा.कुछ भी हो सकता है. बहरहाल यह
मिला धूल में लेकिन अब भी चमक रहा है.
प्रिय बिछोह से क्या कुछ इसका कसक रहा है?
रखूँ? फेंक दूं? सोना? पीतल? यह अथवा वह.

"अपने जोड़े का उसको कुछ भान नहीं था" या फिर "कितने थोडे रुपयो में तो नया मिलेगा" या एक और पंक्ति कविता की "प्रिय को नहीं बताया होगा" ..... इन पंक्तिओं को कहीं से काट कर दूसरी पंक्ति से शुरू करना क्या सॉनेट के अनुसार जायज है ? मेरा अल्प ज्ञान कहता है कि मिसरों का मुकम्मल होना चार चार के तीनों चौपाइयों में और आख़िर के द्विपदी में एक जरूरी अवयव है सॉनेट का ।

*

Mahesh Verma: सॉनेट को मैंने त्रिलोचन के लिखने से ही जाना। उनका ही अनुसरण करने कि चेष्टा की है।अंग्रेजी और इटैलियन के सॉनेट का मुझे अधिक ज्ञान नहीं है। आपका कहना भी ठीक है इसलिए कि शेक्सपियर ने भी मिसरे में मुकम्मल वाक्य रखे हैं लेकिन कहीं कहीँ उनके यहाँ भी वाक्य दूसरे मिसरे में पूरा हुआ है।

त्रिलोचन ने यह खूब किया है कि वाक्य कहीं पूरा हो और छंद कहीं और।मुझे यही इसमें आकर्षक लगा।

*

गौतम राजरिशी: आभाए महेश भाई जानकारी के लिए...यही जिज्ञासा थी !

*

Mahesh Verma: त्रिलोचन का एक सॉनेट : http://googleweblight.com/?lite_url=http%3A%2F%2Fwww.hindisamay.com%2FcontentDetail.aspx%3Fid%3D4242%26pageno%3D1&ei=AWRwHsNo&lc=en-IN&s=1&m=555&host=www.google.co.in&ts=1456661467&sig=ALL1Aj4XlGoe5fuyKIeYe7nb-kojpyvS7A




अनुराधा सिंह

मेरी थोड़ी सी जानकारी के अनुसार त्रिलोचन शास्त्री का जन्मशती वर्ष आरंभ होने जा रहा है। ऐसे में उनकी रचनाओं की अधिक से अधिक संगत मिलनी चाहिए।


सबद से जुड़ने की जगह :

सबद से जुड़ने की जगह :
[ अपडेट्स और सूचनाओं की जगह् ]

आग़ाज़


सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

पिछला बाक़ी

साखी


कुंवर नारायण / कृष्‍ण बलदेव वैद / विष्‍णु खरे / चंद्रकांत देवताले / राजी सेठ / मंगलेश डबराल / असद ज़ैदी / कुमार अंबुज / उदयन वाजपेयी / हृषिकेश सुलभ / लाल्‍टू / संजय खाती / पंकज चतुर्वेदी / आशुतोष दुबे / अजंता देव / यतींद्र मिश्र / पंकज मित्र / गीत चतुर्वेदी / व्‍योमेश शुक्‍ल / चन्दन पाण्डेय / कुणाल सिंह / मनोज कुमार झा / पंकज राग / नीलेश रघुवंशी / शिरीष कुमार मौर्य / संजय कुंदन / सुंदर चंद्र ठाकुर / अखिलेश / अरुण देव / समर्थ वाशिष्ठ / चंद्रभूषण / प्रत्‍यक्षा / मृत्युंजय / मनीषा कुलश्रेष्ठ / तुषार धवल / वंदना राग / पीयूष दईया / संगीता गुन्देचा / गिरिराज किराडू / महेश वर्मा / मोहन राणा / प्रभात रंजन / मृत्युंजय / आशुतोष भारद्वाज / हिमांशु पंड्या / शशिभूषण /
मोनिका कुमार / अशोक पांडे /अजित वडनेरकर / शंकर शरण / नीरज पांडेय / रवींद्र व्‍यास / विजय शंकर चतुर्वेदी / विपिन कुमार शर्मा / सूरज / अम्बर रंजना पाण्डेय / सिद्धान्त मोहन तिवारी / सुशोभित सक्तावत / निशांत / अपूर्व नारायण / विनोद अनुपम

बीजक


ग़ालिब / मिर्जा़ हादी रुस्‍वा / शमशेर / निर्मल वर्मा / अज्ञेय / एम. एफ. हुसैन / इस्‍मत चुग़ताई / त्रिलोचन / नागार्जुन / रघुवीर सहाय / विजयदेव नारायण साही / मलयज / ज्ञानरंजन / सर्वेश्‍वर दयाल सक्‍सेना / मरीना त्‍स्‍वेतायेवा / यानिस रित्‍सोस / फ्रान्ज़ काफ़्का / गाब्रीयल गार्सीया मारकेस / हैराल्‍ड पिंटर / फरनांदो पेसोआ / कारेल चापेक / जॉर्ज लुई बोर्हेस / ओक्टावियो पाज़ / अर्नस्ट हेमिंग्वे / व्लादिमिर नबोकोव / हेनरी मिलर / रॉबर्टो बोलान्‍यो / सीज़र पावेसी / सुजान सौन्टैग / इतालो कल्‍वीनो / रॉबर्ट ब्रेसां / उम्बेर्तो ईको / अर्नेस्‍तो कार्देनाल / ज़बिग्नियव हर्बर्ट / मिक्‍लोश रादनोती / निज़ार क़ब्‍बानी / एमानुएल ओर्तीज़ / ओरहन पामुक / सबीर हका / मो यान / पॉल आस्‍टर / फि़राक़ गोरखपुरी / अहमद फ़राज़ / दिलीप चित्रे / के. सच्चिदानंदन / वागीश शुक्‍ल/ जयशंकर/ वेणु गोपाल/ सुदीप बैनर्जी /सफि़या अख़्तर/ कुमार शहानी / अनुपम मिश्र

सबद पुस्तिका : 1

सबद पुस्तिका : 1
भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार के तीन दशक : एक अंशत: विवादास्‍पद जायज़ा

सबद पुस्तिका : 2

सबद पुस्तिका : 2
कुंवर नारायण का गद्य व कविताएं

सबद पुस्तिका : 3

सबद पुस्तिका : 3
गीत चतुर्वेदी की लंबी कविता : उभयचर

सबद पुस्तिका : 4

सबद पुस्तिका : 4
चन्‍दन पाण्‍डेय की कहानी - रिवॉल्‍वर

सबद पुस्तिका : 5

सबद पुस्तिका : 5
प्रसन्न कुमार चौधरी की लंबी कविता

सबद पुस्तिका : 6

सबद पुस्तिका : 6
एडम ज़गायेवस्‍की की कविताएं व गद्य

सबद पुस्तिका : 7

सबद पुस्तिका : 7
बेई दाओ की कविताएं

सबद पुस्तिका : 8

सबद पुस्तिका : 8
ईमान मर्सल की कविताएं

सबद पुस्तिका : 9

सबद पुस्तिका : 9
बाज़बहादुर की कविताएं - उदयन वाजपेयी

सबद पोएट्री फि़ल्‍म

सबद पोएट्री फि़ल्‍म
गीत चतुर्वेदी की सात कविताओं का फिल्मांकन

सबद फिल्‍म : प्रेम के सुनसान में

सबद फिल्‍म : प्रेम के सुनसान में
a film on love and loneliness

सबद पोएट्री फिल्‍म : 3 : शब्‍द-वन

सबद पोएट्री फिल्‍म : 3 : शब्‍द-वन
किताबों की देहरी पर...

गोष्ठी : १ : स्मृति

गोष्ठी : १ : स्मृति
स्मृति के बारे में चार कवि-लेखकों के विचार

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते
लिखने-पढ़ने के बारे में चार कवि-लेखकों की बातचीत

सम्‍मुख - 1

सम्‍मुख - 1
गीत चतुर्वेदी का इंटरव्‍यू

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :
मुक्तिबोध के बहाने हिंदी कविता के बारे में - गीत चतुर्वेदी