Saturday, February 27, 2016

मिला धूल में लेकिन अब भी चमक रहा है




















महेश वर्मा : तीन सॉनेट

एकाकी था कर्णफूल 

एकाकी था कर्णफूल जब मिला राह की
धूल ठोकरों से क्षत-विक्षत. अपने जोड़े
का उसको कुछ भान नहीं था.बचा डाह की
लपटों से या उसको फेंका. कितने थोड़े

रुपयों में तो नया मिलेगा, यही सोचकर
नयी नवेली दुलहनिया ने मान दिखाया
होगा शायद. या रक्खा हो इसे बेचकर 
छोटे बुंदे लूंगी. प्रिय को नहीं बताया

होगा.कुछ भी हो सकता है. बहरहाल यह
मिला धूल में लेकिन अब भी चमक रहा है.
प्रिय बिछोह से क्या कुछ इसका कसक रहा है?
रखूँ? फेंक दूं? सोना? पीतल? यह अथवा वह.

कुछ संशय था उलट पुलट कर उसे देखते.
विफल भाग्य हूँ, नहीं डिगा मन,वहीं फेंकते.
 ***
  
हठयोगी है सूर्यकान्त

हठयोगी है सूर्यकान्त. सीने पर पत्थर
रख कर बड़े हथौड़े से उसको फुड़वाना,
कील कांटियाँ, शीशे,चाकू, टीन चबाना
उसे सहज है.प्रेम तुम्हें करता हूँ कहकर

कोमल सी कन्या के सम्मुख खड़ा रहूँगा
ऐसी हिम्मत जुटा रहा है तीन वर्ष से .
कन्या को कुछ ज्ञात नहीं है.अभी सहूँगा
प्रेम वेदना. कभी कहूँगा. सोच हर्ष से

पुलकित होना, ह्रदय धड़कना, शरमा जाना
यही सिलसिला चलता रहता अगर खबर ये
उसे न मिलती कन्या की इक निकट सखी से-
वर सुयोग्य वे ढूंढ रहे हैं. आना जाना

भी जारी है इस चक्कर में. सूर्यकान्त को
दिल की कहने का बल आये,चाहे जो हो !
*** 

बन जाने दो रमता जोगी 

कवि  हो हिंदी के तो  कैसे यह है मुमकिन
नाम त्रिलोचन का तुमको कुछ अनजाना सा
जान पड़े औ  अनजाने  होने से  निसदिन
मगन रहो कि भैय्या हम तो बिलकुल ऐसा

नहीं  मानते  पढ़ना औ  पढ़ते ही रहना
आवश्यक है,इतना कहकर कवि अम्बरजी
रुके रहे. उनकी  यह  चुप्पी सहते रहना
ही निश्चयतः हास्यबोध को उनकी मरजी

की सीमा तक तीक्ष्ण करेगा.आख्याता ने
यही  सोचकर गद्य लिखा है. ताने बाने
को कविता के यह कितना संतुष्ट करेगा,
मोद  किसे देगा किसको यह रुष्ट करेगा,

इस सब की चिंता जायज है, वह भी होगी.
अभी गद्य को बन  जाने दो रमता जोगी.

***

                                                                         ( महेश वर्मा की सबद पर अन्य कविताएं यहां  )