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फिर से अंधेरे में : गीत चतुर्वेदी की नई कविता





(मुक्तिबोध को समर्पित यह कविता मेरी अधिकांश कविताओं की तरह असमाप्‍त है. इसमें मुक्तिबोध की कुछ पंक्तियों का प्रयोग है, जिन्हें  इन्वकर्टेड कॉमा में इंगित किया गया है.                                                                                   गीत चतुर्वेदी)


 फिर से अंधेरे में 
(मुक्तिबोध के लिए एक अबोध-गीत)


यह अमावस की रात है. चारों तरफ़ गहरा अंधेरा. फिर भी 'आसमानी फ़ासलों से एक चतुर संवाददाता चांद' मुझको देखता है. मुस्‍कराता चांद ओवरटाइम पर है आज. मेरे 'संस्‍कार और विचार को परिष्‍कृत और परि‍मार्जित करने के प्रयासो' में लगा है. 'हृदय को देता है बिजली के झटके.मेरे देश ने अपना सबसे बड़ा उस्‍तरा एक बंदर के हाथ दे दिया. लोकतंत्र की दाढ़ी बढ़ी हुई है, झांटें भी. यह हज्‍जाम गला रेतेगा या शिश्‍न काटेगा? तुम्‍हारे 'हृदय की धक-धक पूछती' थी, 'वह कौन, जो सुनाई तो देता है, पर नहीं देता दिखाई'. मेरे हृदय की धक-धक कहती है, लो, अब दिख भी गया वह. फिर भी जिनको नहीं है दिखता. दृष्टि पर झिल्‍ली है, इसीलिए धुंधली है. दिवाली पर घर की करने से बेहतर है कि आंख की सालाना सफ़ाई की जाए. 

जो उनके लिए, उन सबके लिए विष था
मैंने उसका आहार किया
विष जमा हो गया गले में

मैं कवि नीलकंठी

जब कभी मेरी सियाही सूख जाती है
मैं अपने गले में भोंक लेता हूं क़लम
और उस विष से लिखता हूं

मेरे बोल उन्‍हें चुभते हैं

तो क्‍या लिखना बंद कर दिया जाए? उनके पास भी व्‍याख्‍याकारों की कमी नहीं. जब तक मेरा काग़ज़ सफ़ेद रहेगा, वे उसकी व्‍याख्‍या आत्‍मसमर्पण के श्‍वेत ध्‍वज की तरह करते रहेंगे. 'द्वार पर सांकल ही रह-रहकर बजती' है. हाथ में झाड़ू लिए राजा खड़ा है. कहता है, मेहतर हूं. पूरी दुनिया साफ़ करने निकला हूं. तुम अपनी गली साफ़ करना. 'मेरी बात मुझे बताने के लिए ही बुलाता है.' मेरी ही बात पर नहीं रहा हक़ मेरा तक. लुटेरा है. चोट्टा है. खड़े-खड़े आंख का काजल ही चुरा गया. यह जो अंधेरा है, तुम सबकी आंखों का सामूहिक काजल है. अपना-अपना काजल उससे तुरत वापस ले लो. 'पीतालोक प्रसार में काल चल रहा है'. महाकाल मचल रहा है.  

शाम हो ही गई है 
मेरी मानो, अभी रात आएगी 

बड़ी गहरी रात आएगी 

दूतावासी मुस्‍कान ओढ़े खड़ा है लंबे अंधेरे का नाटा राजदूत 

एक शख़्स इस कमरे में दौड़ेगा बदहवास 
और फर्निचरों से टकराएगा 
और बाल्‍कनी में खड़ा होकर चिल्‍लाएगा -
1947 आ गया? अरे भाईकोई तो बता दो ज़रा घड़ी देखकर, कैलेंडर देखकर कि 
1947 आ गया

जिस आशंका में तुमने पचास साल पहले लिखी थी कविता 
वह अंधेरा आ गया है 
और हम तानसेन का राग दीपक खो चुके हैं. 
बिलावल, ख़माज और पूर्वी में जो है 
उसमें जाने कौन-सी मात्रा छूटी हुई कि 
कितना भी गाओ, दिया जल नहीं पाता

संकट में हसन है 
चौपट राजा प्रहसन है 
अंधेर नगरी को दिया चाहिए 
बहुत मर चुके अब जिया चाहिए. 

*

सबद पर गीत चतुर्वेदी की अन्‍य कविताएं यहां पढ़ी जा सकती हैं. ऊपर लगी पेंटिंग पोलिश पेंटर हाना वेनेरोव्‍स्‍का काली की हैं, जो अपनी कृतियों पर हिन्‍दू देवी काली के नाम से हस्‍ताक्षर करती थीं.
 


16 comments:

गीत यह आज के अंधेरे समय की बहुत डिस्टर्बिंग कविता है. 'कितना भी गाओ, दिया जल नहीं पाता.' शब्द बहुत धारदार हथियार हैं. जरूरत है उन्हें उन तक पहुंचाने की जिनके लिए वे लिखे गये हैं. प्रतिरोध की सशक्त अभिव्यक्ति के लिए शुक्रिया


संकट में हसन है
चौपट राजा प्रहसन है
अंधेर नगरी को दिया चाहिए
बहुत मर चुके अब जिया चाहिए.

क़लम में इस विष की ज़रूरत है इस वक्त को ... नये आग़ाज़ और बुलन्द आवाज के साथ एक बेहतरीन कविता ...


बेहतरीन... हथियारों से सख्त शब्द...


तीखी और बोल्ड कविता। बस गले में कलम भोंक लेने वाला बिंब थोड़ा खटकता है।


कमाल! Geet Chaturvedi


गीत चतुर्वेदी को सलाम।


सलाम, गीत ।


मैं कवि नीलकंठी

जब कभी मेरी सियाही सूख जाती है
मैं अपने गले में भोंक लेता हूं क़लम
और उस विष से लिखता हूं

मेरे बोल उन्‍हें चुभते हैं ......... bahut khoob


कविता वास्तव में गजब की है


।संध्या

गीत हमेशा एक अलग भाव लेकर आते हैं ...सच बहुत बढ़िया कविता .


गीत अद्भुत हैं... जितनी तुर्शी उतनी ही नजाकत भी।
उन्‍हें किसी की नजर न लगे।
सलाम गीत ।


एक बेहतरीन कविता ...


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