सबद
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चार नई कविताएं : कुॅंवर नारयण






नया सपना

समय की बरबादी है
उस गुत्थी को सुलझाने की कोशिश 
जो बेहद उलझ गई हो...

इससे अच्छा है एक नयी गॉंठ डालें 
और शुरू करें बुनना 
कोई नया सपना
***

आहट का उजाला

बिल्कुल अॅंधेरा था कि अचानक
उसके आने की आहट का उजाला 
                              सुनाई दिया 

जैसे सन्नाटे में 
दूर से आती 
किसी संगीत की ध्वनि 

अॅंधेरे में किसी 
माचिस की तीली जलाई 
***

आवाज़ें

यह आवाज़ 
लोहे की चट्टानों पर 
चुम्बक के जूते पहन कर 
दोड़ने की आवाज़ नहीं है 

यह कोलाहल और चिल्लाहटें 
दो सेनाओं के टकराने की आवाज़ है,

यह आवाज़ 
चट्टानों के टूटने की भी नहीं है 
घुटनों के टूटने की आवाज़ है

जो लड़ कर पाना चाहते थे शान्ति
यह कराह उनकी निराशा की आवाज़ है,

जो कभी एक बसी बसाई बस्ती थी 
यह उजाड़ उसकी सहमी हुई आवाज़ है,

बधाई उन्हें जो सो रहे बेख़बर नींद
और देख रहे कोई मीठा सपना,
यह आवाज़ उनके खर्राटों की आवाज़ है,

कुछ आवाज़ें जिनसे बनते हैं 
हमारे अन्त:करण
इतनी सांकेतिक और आंतरिक होती है 
कि उनके न रहने पर ही 
हम जान पाते हैं कि वे थीं 
सूक्ष्म कड़ियों की तरह 
आदमी से आदमी को जोड़ती हुई
अदृश्य श्रृंखलाऍं

जब वे नहीं रहतीं तो भरी भीड़ में भी 
आदमी अकेला होता चला जाता है 

मेरे अंदर की यह बेचैनी 
ऐसी ही किसी मूल्यवान कड़ी के टूटने की 
आवाज़ तो नहीं?
*** 

सूर्योदय की प्रतीक्षा में 

वे सूर्योदय की प्रतीक्षा में 
पश्चिम की ओर 
मुॅंह करके खड़े थे 

दूसरे दिन जब सूर्योदय हुआ 
तब भी वे पश्चिम की ओर 
मुॅंह करके खड़े थे 

जबकि सही दिशा-संकेत के लिए 
ज़रूरी होता है देखना 
अपने चारों तरफ़ 

सूरज न तो निकलता है
न डूबता है 
दुनिया घूमती है अपने और उसके चारों तरफ़।

'हमारे साम्राज्य में सूर्यास्त नहीं होता' --
कभी एक साम्राज्य ने कहा था गर्व से
साम्राज्य डूब गया,
सूर्योदय होता रहा पूर्ववत... 
***

( कुॅंवर नारायण की कुछ और कविताएं यहां )
8 comments:


Anupama Pathak 'हमारे साम्राज्य में सूर्यास्त नहीं होता' --
कभी एक साम्राज्य ने कहा था गर्व से
साम्राज्य डूब गया,
सूर्योदय होता रहा पूर्ववत...
*** *** ***
आभार इस प्रस्तुति के लिए.... !!

*** *** ***
सबद की यात्रा चलती रहे सूर्योदय सूर्यास्त की तरह ही पूर्ववत... अनवरत... !!


बहुत सुंदर कविताएं हैं।
खासकर, आवाजें कविता आज के युद्धरत दुनिया में एक कलाकार की आवाज का जिन्दा रहना कितना जरुरी है दर्शाती है।
हर पल, हर बात पर मारकाट के लिये आतुर इस दुनिया में एक कलाकार अकेला होने को ही अभिशप्त है।


इससे अच्छा है एक नयी गॉंठ डालें

और शुरू करें बुनना

कोई नया सपना

bahut shukriya in kavitaon ke liye


इन्हें हम तक पहुँचाने के लिए धन्यवाद


कुँवर नारायण जी की कविता में जीवन, जगत और प्रकृति के पुनर्सृजन की कोशिशें तथा उनका आह्वान जिस विविधता के साथ अभिव्यक्त होता मिलता है, वह एक कवि के रूप में उनके सतत् अन्वेषी होने के भरोसे को और पुख्ता करता जाता है ।


अदभुत। हर बार अपनी कविता के जादू से कुंवर जी अवाक कर देते हें।


अंतिम पंक्तियाँ जबरदस्त


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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

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