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कला का आलोक : 8 : वामन केंद्रे : व्योमेश शुक्ल







वामन केंद्रे समकालीन भारतीय रंगकर्म की ऐसी प्रतिनिधि शख्सियत हैं जिसे लेकर बहुत से दावे किए जा सकते हैं. वह जितने लोकप्रिय हैं उतने ही भरोसेमंद भी. उनका शिल्प अपनी ही अभिरुचि की कैद में रहने से इनकार करता आया है. आमतौर पर बड़े रचनात्मक मन कुछ ख़ास साँचों और खानों में स्थिर हो जाते हैं और वहीं से पहचाने जाने लगते हैं - शक्ति ही उनकी सीमा बन जाती है. वामन के साथ ऐसा नहीं है. उनके नाटकों की अंतर्वस्तु का यथार्थ हर बार एक अप्रत्याशित अभिनव स्तर पर हमें विचलित करता है. उनके नाटकों का जीवन-संगीत, उद्बोधन और उसी में निहित गंभीर मनोरंजन की पेशकश हमेशा एक अनोखा अनुभव दे जाती है. महाकवि भास के क्लैसिकल संस्कृत आख्यान से लेकर देवदासियों और हिजड़ों की ज़िंदगी तक फैली उनकी दृष्टि के भूगोल में दर्शक आसानी से उनके सामाजिक-राजनीतिक ठिकाने की तलाश कर सकते हैं. तथ्य यह भी है कि वह रंगमंच की दुनिया के लगभग सभी पुरस्कारों और सम्मानों से अलंकृत हैं, लेकिन हिंदी और मराठी भाषी जनमानस से मिले अथाह स्नेह और स्वीकृति की निधि के आगे यह तथ्य ही है. अभावग्रस्त मराठवाड़ा के इस अनोखे किसान कामगार कलाकार के साथ हुई नीचे प्रकाशित बातचीत इसीलिए सूझ और अंतर्दृष्टियों से रौशन है और रंगकर्मियों के साथ-साथ किसी भी माध्यम में रचना का काम करने वाले लोगों को संबोधित है. प्रश्नोत्तर शैली यहाँ स्थगित है. पढ़ने की सुविधा के लिए कुछ विभाग कर दिए गए हैं.


व्योमेश शुक्ल 

भारतीयता का वृक्ष अब तक मेरे हाथ नहीं लगा है


(विख्यात रंगकर्मी वामन केंद्रे से व्योमेश शुक्ल की बातचीत)

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बनारस प्रस्थान-बिंदु है. मेरी भी शुरूआत यहीं से हुई. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से तीन साल का कोर्स करने के बाद, वहीँ से, मुझे दो साल के लिए एक फेलोशिप मिली. फेलोशिप का विषय बड़ा दिलचस्प था : ‘भारतीय रंगमंच में भारतीयता की तलाश’. इन दो सालों में मैं भारतीयता को समझने की कोशिश करता रहा : रंगमंच में बाद में, जीवन और स्वयं में पहले. इस सिलसिले में मैंने पहले वेद फिर पुराण पढ़ा; फिर नाट्यशास्त्र, फिर अभिनव गुप्त की लिखी नाट्यशास्त्र की आलोचना. सौंदर्यशास्त्र पर जो भी टीका-टिप्पणियाँ और लेख वगैरह उपलब्ध थे – सबकुछ, क्योंकि मैं भारतीयता की खोज में निकला हुआ था, अब भी निकला हुआ हूँ; वह खोज आज तक जारी है. वह खोज लगातार चलती रहती है क्योंकि भारतीयता किसी एक व्यवस्था या मूल्यविशेष की बात नहीं करती. वह एक वैविध्यमय मौजूदगी है.

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दरअसल हम बेहद दिलचस्प देश हैं. सोलह सौ से ज़्यादा भाषाएँ. इतने वेश, इतने प्रदेश, इतने पकवान. मिथकों, किंवदंतियों, दंतकथाओं और लोकवार्ताओं की अनंत श्रृंखलाएँ. अकेले रंगमंच – जो अंततः वृहत्तर मनुष्यता का एक छोटा सा हिस्सा है – में ख़ुद को अभिव्यक्त करने की पारंपरिक रंगमंच, क्लैसिकल रंगमंच, लोक रंगमंच, आदिवासी रंगमंच और आधुनिक रंगमंच जैसी न जाने कितनी पद्धतियाँ. जीवन जीने के न जाने कितने तरीक़े. यही सब समझने के लिए तब, दो साल तक देश-भर में घूमता रहा. मैंने केरल के अनुष्ठानपरक नाट्य के बारे में यह समझने की कोशिश की कि वहाँ अनुष्ठान को संप्रेषित करने के लिए नाटक का इस्तेमाल कैसे-कैसे हुआ है. अक्सर यह कहा जाता है कि नाटक को ऊँचा उठाने के लिए समय-समय पर उसमें नाट्यशास्त्र, लोकरूपों, रामलीला, रासलीला, तमाशा और नौटंकी के तत्वों का विन्यास किया गया. यह सच है, लेकिन इसी देश में एक जगह इसका उल्टा भी हुआ है. वहाँ अनुष्ठानों और विधियों को लोकप्रिय होने के लिए नाट्य की ज़रूरत पड़ी है या उस विधि में ही भीतर-भीतर नाट्य-निर्माण होता गया है. थय्यम, उडियट्टू, कुडियट्टम, महाराष्ट्र का गोंधड या दशावतार जैसे अनेक रूप इस धारणा का जीता-जागता साक्ष्य हैं. मूलतः ये विधियाँ हैं. इन विधियों और अनुष्ठानों को और ज़्यादा आकर्षक बनाने के लिए, समाज में श्रद्धा की भावना के निर्माण के लिए, ईश्वर और मनुष्य के रिश्ते को और गहरा करने के लिए किसी दार्शनिक युक्ति का सहारा लिए बिना, कितने आसान और दिलचस्प तरीक़े से रंगमंच के ज़रिये, नाटक के बुनियादी तत्वों की मदद से बहुत कुछ कह दिया जाता रहा है. नाटक के माध्यम से ही इन विधियों को जीवन का हिस्सा बनाया जा सका और उनमें रोचकता का अधिष्ठान हुआ. इन्हीं वजहों से हमलोग इतने विविध हैं. भारतीय जीवन को समझने के लिए दस ज़िंदगियाँ कम पड़ेंगी, दसों ज़िन्दगियों को दाँव पर लगाकर जीना पड़ेगा. तब मैं या कोई भारत को समझ सकेगा.

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हमारे दोनों महाकाव्यों को ही देखें – दुनिया की कहानी इनके बाहर नहीं है; सबकुछ इनके भीतर है. आज की तारीख़ में भी कोई नई से नई रचना भी महाकाव्यों के पार नहीं जाती. वह रामायण और महाभारत के भीतर ही परिक्रमा करती रहती है. उनके अलग-अलग पहलू अलग-अलग रचनाओं की वजहें हैं. ज़िंदगी का समग्रतामूलक पर्सपेक्टिव, उसके विभिन्न आयाम, मनुष्य पर पड़ रहे सभी संभव प्रभाव, भिन्न-भिन्न स्वभाव, प्रवृत्तियाँ और विकृतियाँ, इंसान की भलाई का दर्शन – सबकुछ महाकाव्यों में है. इनसब से होकर गुज़रते हुए मुझे कुछ-कुछ भारतीयता समझ में आने लगी. उसकी महक. ठीक है कि भारतीयता का वृक्ष मेरे हाथ नहीं लगा है, उसका कंदमूल अब तलक ज़मीन से निकलता जा रहा है, लेकिन उसके अनुभव से मैं परिचित हूँ. मेरे नाटकों में वह कुछ-कुछ रेफ्लेक्ट भी होती होगी.

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इन मुद्दों पर दो-साला शोधकार्य करके मैं दिल्ली लौट गया. मेरा लिखित काम पूरा हो गया. एक नाटक भी मैंने करके दिखा दिया, फिर भी तीन-चार महीने बाक़ी थे. अब क्या हो? मैंने निदेशक बी. एम. शाह जी से कहा कि अब मुझे छोड़ दीजिए. उन्होंने कहा कि नहीं, तीन महीने पूरे करो. तो फिर बनारस के डा. शिवसुंदर गांगुली और उनकी संस्था गोकुल आर्ट्स के बनारस में ही कार्यशाला करने के एक प्रस्ताव को मैं मान गया. मैंने और विजय दलवी ने वह कार्यशाला की. ख़ुद शाह साहब उसके उदघाटन में आये और दो-तीन दिन बच्चों के साथ उस कार्यशाला में रहे. उस कार्यशाला में 7-8 साल से लेकर 15-16 साल तक के कुल अस्सी बच्चे थे. मुझे याद है कि तब मैं सवा महीने बनारस में रहा था. मैंने भारतेंदु का ‘अंधेर नगरी’ मंचित किया था. तो, मेरे कैरियर और रचनात्मक जीवन की शुरूआत ही बनारस और भारतेंदु के साथ हुई है. इसे चाहें तो काशी का, बाबा का और गंगा जी का आशीष कह लें कि खोज के उस रास्ते से मैं कभी भटका नहीं. मैं निरंतर थिएटर करते हुए अपनी और भारतीयता की खोज करता रहा. एक नई अंतर्वस्तु में पुराने शिल्प का वैभव कैसे गूँजे, रंगमंच के छंद को कैसे उल्टा-पलटा जाये, कैसे प्राचीन और अर्वाचीन का संश्लेषण किया जाय. यों, अब तक जो भी सत्तर-अस्सी नाटक मैंने किये हैं, सबकी नींव में बनारस की चेतना है. इस अध्ययन के क़रीब साल-भर बाद मैं फिर बनारस आया – रामनगर की रामलीला देखने. वह भी शोध का हिस्सा था. तब फिर मैं सवा महीने बनारस रहा. हर शाम नाव से रामनगर की लीला देखने जाता था और जब रामलीला छूटती थी – तीन-चार-पाँच बजे भोर-तक – नाव से ही लौटता था. लौटना भी अद्भुत था. सैकड़ों नावों पर बैठे हुए मस्त, विभोर रामलीला-प्रेमी – जिन्हें ‘नेमी’ कहा जाता है. नेमी का मतलब नियमपूर्वक लीला देखने वाले. वे एक से बढ़कर एक कलाकार थे – ज़्यादातर के भीतर छिपा हुआ एक लोकगायक था. वह गाते-ताल देते हुए लौटते थे. कोई चैती गा रहा है, कोई और कवित्त गुनगुना रहा है. शरद की चांदनी रातों में चारों दिशाओं से आकर एक हो जाती हुई आवाज़ें. मुझे लगता था कि स्वप्न में नौकाविहार कर रहा हूँ. वह जादू था.

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बनारस की एक ख़ास अपनी संस्कृति है. बहुत दिलचस्प और जटिल. उसे क्रमशः ही समझा जा सकता है. उसमें संस्कृत, खड़ीबोली और भोजपुरी की अलग-अलग धाराएँ हैं. संगीत की अलग धार है. इसे समझने के लिए एक पूरी उम्र चाहिए. मेरे लिए तीस साल पहले कुलमिलाकर दो-तीन महीने का वह साक्षात एक उपहार है. बनारस एक लगातार आकर्षण है. पिछले तीस बरस से मैं बनारस आने का इंतज़ार कर रहा था. इत्तेफाक़ से अब मौक़ा मिला. लेकिन आज के बनारस में भी मैं तीस साल पहले का अपना बनारस देख ले रहा हूँ. वह मेरे लिए ज़रा भी नहीं बदला. बनारस अपना कुछ भी भूला नहीं. यह बड़ा मूल्य है. भूलने के तुरंत बाद यूरोपियन होना आपका इंतज़ार कर रहा है. मैंने कई शहर और गाँव उजड़ते हुए देखे हैं. अपने आप को रिजेक्ट करके दूसरे जैसा हो जाने के लिए हर कोई बेताब है. वह बेताबी बनारस में बिल्कुल नहीं है. मैंने इस सभ्यता के साथ अपनी टूटी श्रृंखला जोड़ ली है.        

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रामलीला का हूबहू अनुकरण आधुनिक रंगमंच में मुमकिन नहीं है. हमारे पास बीस गुना तीस का स्टेज है. रामलीला के पास पंद्रह किलोमीटर का मैदान है. जन्म एक जगह हो रहा है, बचपन कहीं और बीत रहा है, यौवन का स्पेस कहीं और है. एक संवाद यहाँ बोला गया, फिर राम को कन्धों पर उठाकर पाँच किलोमीटर दूर ले जाया जाता है और लाखों की भीड़ उनके पीछे चलते हुए आती है. इस संस्कृति को, इस अनुभव को दूसरे माध्यम में पलटा नहीं जा सकता. यह अनुभव अध्यात्म के पार है, कला के भी पार है. रामनगर की रामलीला कला में सीमित नहीं है. वह विशुद्ध भारतीय परंपरा है. इतना पागलपन भारत में ही हो सकता है. इसमें दो और दो चार जैसा कोई गणित नहीं है. जो आएगा, श्रद्धा भाव से – पुण्य कमाने. कुछ नहीं तो वानर ही बन जायेगा. औपचारिक-अनौपचारिक, व्यक्ति और चरित्र, दर्शक और कलाकार के बीच इतनी सघन बारम्बार आवाजाही किस आधुनिक नाटक में संभव है? और अंत में यह सबकुछ यथार्थ से आबद्ध है. वही शामिल आदमी बाहर आकर कचौड़ी खा रहा है, पान जमा रहा है. हनुमानजी मुखौटा उतारकर बग़ल में दबाए चाय पी रहे हैं. इन सब को जोड़कर जो समग्र दृश्य बनता है वह हमें अचम्भे में डाल देता है कि हम कहाँ आ गए हैं? इस विश्व की पुनर्प्रतीति, इसका दोबारा अनुभव का विषय बन सकना मुश्किल था और अब भी है. अलबत्ता संभावना है. जैसे रिचर्ड शेखनर आए, रामलीला देखकर पागल हो गए और एक नया थिएटर इसी में से कर लिया – ‘थिएटर ऑफ़ इन्वायरमेंट’ – उसमें ज़्यादा से ज़्यादा क्या हुआ? एक पार्टी का दृश्य है तो उसमें ऑडियंस को भी पार्टी का हिस्सा बना लिया; उनके हाथ में भी बीयर के ग्लास पकड़ा दिए. ऐसी कोशिशों से रामनगर की रामलीला का अनुभव ट्रांसफॉर्म नहीं होता. कहीं न कहीं श्रद्धा की केंद्रीयता है लीला में. वहाँ जाना अपरिहार्य है और कोई वहाँ जाने के लिए आपको विवश नहीं करता. लीला-स्थल पर साधुओं के जो अखाड़े लगते हैं या हमारे आप जैसे जो लीलाप्रेमी हैं – उन्हें किसी ने भेजा नहीं है. वे इस विरल अनुभव को आत्मसात करने के लिए आते हैं. ऐसा थिएटर भले संभव हो, ऐसे थिएटर की नक़ल असंभव है. उस विराट का अनुकरण बेमानी है.

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ऐसा अनोखा तत्व अन्य लोकनाट्यरूपों में भी है. यक्षगान में मंच पर चरित्रों की चेष्टाओं के समांतर एक कलाकार राक्षस बना हुआ कथा के निश्चित क्षण में सहसा दर्शकों के बीच से उठता है और सबको भयाक्रांत करता हुआ मंच तक दौड़ता हुआ आता है. कितना दिलचस्प है कि ऐसे सभी नाट्यरूपों में व्यक्ति दर्शक और कलाकार साथ-साथ है. वह दो भूमिकाओं में है. लुंगी पहना आदमी वानर भी है, दर्शक भी है और बाज़ार का उपभोक्ता भी. दरअसल भारतीय अनुभूति में ऐसी दोहरी भूमिका का अनोखा संगम है. वह सौंदर्यशास्त्र या अध्यात्म की बजाय सीधे इस लौकिक जीवन से मुखातिब है. उसका अनुभव हमारी स्मृति में शाश्वत हो जाता है. यह आसान नहीं. आधुनिक थिएटर के लिए ऐसा कर पाना नामुमकिन है. हमें इनके जादू को समझना दरकार है. इनके रहस्यों को कैनेबलाइज़ करके ही उस रूप का आविष्कार संभव है जिसमें हमारा लोकतत्व सही अर्थों में झिलमिलाता हो. स्थूल अनुकरण से काम नहीं चलेगा. उस अनुभव को अपनी मूल्यदृष्टि में आयत्त करना होगा. बड़ा चैलेंज यह है कि आधुनिक निर्देशक अपने दर्शक के मन को रामलीला की ही तरह, उस ज़मीन पर ले जा पा रहा है कि नहीं, जो अध्यात्म और कला दोनों के पार बनती है. तब हम यह कह सकेंगे कि वाक़ई रामलीला के अनुभव की आत्मा तक पहुँचा जा सका, अन्यथा सब कलेवर है. महज़ ढाँचा. उस ढाँचे की पूरी कीमत पश्चिम वसूल कर चुका है. हमें उसके आगे जाना होगा.

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ढाँचे के भीतर प्रवेश करना है. भारतीयता के वृक्ष के मूल में. पिछले पचास साल के रंगकर्म का इतिहास ही देखें, वही नाट्यकर्मी, वही नाटक कालजयी सिद्ध हुए जिनमें कहीं न कहीं मिटटी की गंध थी. चाहे हबीब तनवीर साहब हों, जस्मा ओडन हो, कारंतजी का जो कुमारस्वामी हो, अंधायुग, तुगलक, रतन थियम का चक्रव्यूह, पणिक्करजी का मध्यम व्यायोग और कर्णभारम, भानु भारती का पशु गायत्री, एम. के. रैना का कबिरा खड़ा बजार में, अलख नंदन का चंदा बीडनी. कहाँ है पश्चिम? वहाँ का एक भी उदाहरण अगर नहीं है तो क्यों नहीं है? भारतीयता को रिजेक्ट नहीं किया जा सकता. उसकी मूल्यप्रणालियों, उसकी अभिव्यक्ति के जादू को ख़ारिज नहीं किया जा सकता. उसका ट्रांसफॉर्मेशन संभव है, उसका निंदन भी किया जा सकता है. लेकिन सामयिकता और अतिसामयिकता के उत्साह में उसका निरसन मूर्खता और घमंड ही हो सकता है. थिएटर एक लोकतांत्रिक संस्था है. असहमत और भिन्न होने का, अपनी-अपनी रंगभाषा खोजने का सबको अधिकार है, लेकिन आपका शिल्प ही एकमात्र विकल्प है, यह तानाशाही नहीं चलेगी. जान लीजिये, आप हद से हद, अनेक में से एक हैं. हमारे रंगकर्म के पचास चेहरे हैं. आप भी उनमें से एक हैं. एक अकेले आप के चेहरे को सच मानकर बाक़ी उनचास चेहरों पर कालिख नहीं मली जा सकती. हमें सबकी रक्षा करनी है. इस बहुवचन का सम्मान करना है. दरअसल हरबार इन पचास को आपस में हिलामिलाकर इक्यावनवाँ चेहरा खोजना चैलेंज है. नए-पुराने सबके लिए.

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भारतीय रंगमंच के पास क्या नहीं है? मैं यह नहीं कह रहा कि हम महानतम हैं, लेकिन हम कम भी तो नहीं हैं. दुनिया से कमतर होने की वृथा ग्रंथि को हम कब तक झेलते रहेंगे? हम टेक्नोलॉजी में, टेक्नोलॉजिकल डेवलपमेंट में कम हो सकते हैं, क्योंकि हम एक विकासमान देश हैं. ब्रॉडवे का सारा तामझाम रात-भर में हमें उपलब्ध हो जाय और हम करिश्मा करके दिखा दें, यह संभव नहीं है, उचित भी नहीं है. हम अपनी गति से आगे बढ़ेंगे. जो पचास साल पहले विकसित हो चुका है उससे हम पचास साल पीछे हैं, तो हैं; लेकिन हमारे थिएटर की ताक़त क्या है? आज यह समझना ज़रूरी है. हमारी ताक़त है टेक्स्ट. उस टेक्स्ट को पेश करने का तरीक़ा भी हमारी ताक़त है. मंच पर उस टेक्स्ट की व्याख्या हम कैसे करेंगे, यह हमारी एक और ताक़त है. ज़रूरी नहीं कि टेक्स्ट में स्टोरी लाइन हो ही. बड़बड़ाये जाने वाले डायलॉग ही टेक्स्ट हैं, यह भी नहीं. नॉन-वर्बल भी थिएटर हो सकता है, लेकिन उसके पीछे भी एक टेक्स्ट होता है. आप कन्हैयालाल का पे बेथ देखें, जिसकी वजह से उन्हें राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय कीर्ति हासिल हुई. उस नाटक में एक भी डायलॉग नहीं था, लेकिन नाटक ख़त्म होने पर कोई दर्शक ऐसा नहीं होता था जो रोते हुए बाहर न निकले. वह एक रूपक था – एक पक्षी, उसके चार-पाँच बच्चों और एक दूसरे पक्षी का. लेकिन जिस तरीक़े से वह उस मौन में अपनी मातृभाषा की वेदना को खेलते थे, वह किसी को भी रुला देने के लिए काफी था. टेक्स्ट का कोई एक मतलब नहीं है. वह चुप हो सकता है. फ्रैग्मेण्टेड भी हो सकता है, जैसा पोस्टमॉडर्न विचार मानता है. वह अमूर्त हो सकता है. अमूर्तन भारतीय सभ्यता का अविभाज्य अंश है. एक उदाहरण देता हूँ : केरल में कालीऊता नामक एक जनपदीय नाट्यरूप है. उसमें महिषासुर के पीछे उसका वध करने के लिए काली भागती हैं – पूरे गाँव में. आगे-आगे महिषासुर भाग रहा है, उसके पीछे काली और उनके पीछे पूरा गाँव भाग रहा है. यह रामनगर की रामलीला से मिलता-जुलता शिल्प है. इसके बाद भागते-भागते थककर महिषासुर नारियल के वृक्ष के गूदों से बने एक मचान पर – जिसपर सीढियों से चढ़ा जाता है – बैठकर हाँफने-सुस्ताने लगता है. दूर एक मचान पर देवी भी वैसा ही करने लगती हैं. यह अद्भुत दृश्य है. कुछ देर आराम के बाद दोनों उतरते हैं और फिर वही भागमभाग. अन्ततः काली महिषासुर को पकड़ लेती हैं. अब वध होना है. एक कलाकार दूसरे का सचमुच वध तो करेगा नहीं. यहाँ वध का अमूर्तन किया जाता है. काली महिषासुर का शिरस्त्राण उतारकर ज़मीन पर रख देती हैं और ग्रामवासी मान लेते हैं कि वध हो गया. इसके बाद एक बड़ा कद्दू लाया जाता है. काली अपनी तलवार से उसके दो टुकड़े कर देती हैं. यह वध का एक और प्रकार है. इसके भी बाद केले का एक वृक्ष लाया जाता है और काली अपने शस्त्र से केले के गुच्छे को काटकर पेड़ से अलग कर देती हैं. यों इन तीन अमूर्त तरीकों से वहाँ वध संभव होता है. ऐसी निधियों के बावजूद अपनी अज्ञता में हम यह मानकर चल रहे हैं कि हम बिल्कुल जड़ और ठोस हैं और हमारे यहाँ तरलता का तत्व है ही नहीं. रहस्य और अमूर्तन हमारी हरेक अभियक्ति में अंतर्भूत हैं.

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मैं आक्षेप नहीं कर रहा हूँ. लेकिन अपने फॉर्म को लेकर कोई जिद न होनी चाहिए. जैसे हमारे पूर्वजों ने नई रंगभाषा ढूंढी, वैसे ही हम भी करें. हबीब साहब, रतन थियम, कारंत जी – सब अपनी-अपनी मातृभूमियों में गए और वहाँ के जीवन शिल्प को दुनिया के सरोकारों के साथ मिलाकर नाटक में एक चमत्कार किया. कालजयित्व की हमारी सूची में बेशक़ शेक्सपियर, इब्सन और ब्रेख्त भी हो सकते हैं. यह हमारी उदारता का साक्ष्य है. सर्वोत्तम का अकुंठ विनम्र स्वीकार और उसके ज़रिये आत्मविकास – यह भारतीयता है. इतने आक्रमणों, इतने प्रभावों, इतने वैविध्य को आभ्यंतरीकृत कर सकना हमारे स्वभाव की शक्ति है. हम लोचदार और नमनीय हैं. नाटक करते समय इस बात को याद रखना चाहिए. अपने उत्कृष्ट का विन्यास और अन्य के उत्कृष्ट का स्वीकार, यह एजेंडा है हमारा. हमारा भविष्य इन दोनों के फ्यूज़न में से ही आएगा. सरल उदाहरण देखें : बाहर से आया से पैंट-शर्ट हमारी पहचान है और पंजाब का सलवार-कुरता पूरे देश की स्त्रियों का राष्ट्रीय परिधान बन गया. यह स्वीकार सभी क्षेत्रों में है – साहित्य, संगीत, चित्रकला, वास्तुशिल्प, वेशभूषा, खानपान और जीवन-पद्धतियों में हुए संश्लेषण इसके प्रमाण हैं. रतन थियम का रंगकर्म इसका अनोखा उदाहरण है : अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी और निहायत पारंपरिक देहभाषा और सामयिक जीवन की प्रबल गूँज. उनके नाटक में अतीत का गहरा नाता आज के जीवन से है. ऐसे अनेक मूर्धन्य हैं.


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ग्लोबल होने की जल्दबाज़ी उचित नहीं है. प्राथमिकता कुछ और होनी चाहिए. जो ईमानदारी से लोकल होगा, वही ग्लोबल हो पाएगा और वही कला की अपनी शर्तों पर विश्व के साथ संवाद कर सकेगा.                    
   
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सिर्फ़ मनोरंजन नहीं. मैंने सिर्फ़ मनोरंजन के लिए कोई नाटक नहीं किया. मैं दर्शकों को सवालों और जिरहों में डालना चाहता हूँ. एक वृहत्तर संदर्भ में ही थिएटर में मनोरंजन हो सकता है, किसी तात्कालिकता में नहीं.

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मेरे नाटक ‘जुलवा’ का एक पुरुष चरित्र सभी देवदासी बन गई लड़कियों के गुरु और महंत की तरह है. लेकिन उसे भी ख़ुद को लड़कियों की ही तरह ईश्वर को समर्पित करना होता है, साडी पहननी होती है, लंबे बाल रखने होते हैं और स्त्रियोचित बर्ताव करना पड़ता है. उस जैसे लोग स्वयं को संस्कृति का संरक्षक मानते हैं, लेकिन लड़कियों का शोषण करते हैं और ख़ुद भी समाज के हाथों विभिन्न स्तरों पर शोषण का शिकार होते हैं; शारीरिक शोषण के भी. खैर, बहुत से दर्शकों ने मेरे नाटक के उस किरदार को हिजड़ा मानना और कहना शुरू कर दिया. मैं उनसे कहता रहा कि वह चरित्र हिजड़ा नहीं है. तब वे मुझसे पूछते कि आख़िर हिजड़ा और क्या होता है? अपनी समझ को साफ़ करने और इस सवाल का जवाब ढूँढने के इरादे से मुझे ख़ुद ही हिजड़ों की जिंदगियों का अध्ययन करने, उस विशद उपेक्षित, अवमानित समुदाय से बात करने और प्रत्यक्ष अनुभव हासिल करने के लिए आगामी लगभग दसेक वर्षों के लिए एक नए और परिचित संसार में उतरना पड़ा. यह हिजड़ों के जीवन-समर और विडम्बनाओं पर एकाग्र मेरे नाटक ‘जानेमन’ की पृष्ठभूमि है. उस नाटक को कम से कम दस बार अथ से इति तक लिखा गया है. अपने आख़िरी ड्राफ्ट में ही वह एक नाटक है, जो न सिर्फ़ लोकशिक्षण की पुरानी नैतिकता का पालन करता है, बल्कि एक गंभीर मनोरंजन की पेशकश भी नाटक के दर्शकों से करता है. मैंने जानबूझकर दर्शकों को उत्साहित और प्रेरित करने की गरज से इस नाटक का नाम ‘जानेमन’ रखा, ताकि शीर्षक से खिंचकर लोग प्रेक्षागृह तक आएँ. बाक़ी का काम नाटक की अंतर्वस्तु और कलाकारों को करना था.

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मैं खेतिहर समुदाय से आया हूँ. मेरा बचपन लोकसंगीत से घिरा हुआ बीता है. हमारी समूची लोकसंस्कृति कृषि से आबद्ध है और खेती के मौसमों के अनुरूप उसमें तब्दीलियाँ होती हैं. लोक कलाकार भरण-पोषण के लिए किसानों पर निर्भर हैं. अल्लसुबह वे गाते-बजाते किसानों के दरवाज़ों पर कुछ मांगने पहुँच जाते हैं. मेरे पिता भी एक लोक गायक थे, भले ही पेशेवर नहीं. महीने में एक बार अपने मित्रों के साथ उनकी बैठकी जमती थी और वहाँ ख़ूब भजन गाये जाते थे.
लेकिन लोक की ताक़त का अभिज्ञान कारंत जी के सानिध्य में हुआ. उन्होंने ही यह अनुभव सौंपा कि अपनी पृष्ठभूमि के कारण तुम बेहद समृद्ध हो. सैकड़ों गानों और हज़ारों धुनों की स्थायी निधि तुम्हारे पास है. संगीत को निरस्त करके एक संपूर्ण रंग अनुभव की कल्पना नहीं की जा सकती.

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(व्योमेश शुक्ल हिंदी के चर्चित कवि और रंगकर्मी हैं। इस स्तंभ की पिछली कड़ियां यहां
6 comments:

बहुत ही सटीक ,जानकारीपूर्ण और दिलचस्प बातचीत |(हालाकी प्रश्नों की कमी खली यदि प्रशन भी दिए जाते तो बातचीत अपनी सम्पूर्णता में व् स्पष्ट होती )|जब ज़िक्र दशावतार और केरल का आया तो लगा कि अगली ही किसी पंक्ति में मलयालम के सुविख्यात लेखक,रंगकर्मी, संगीतग्य आदि के पारंगत श्री कवलम नारायण परिक्कर और सुविख्यात मोहिनीअत्तम न्रात्यांगना भारती शिवाजी (जिनका दशावतार नृत्य मशहूर है ) का ज़िक्र ज़रूर होगा लेकिन आख़िरी हिस्से में पणिक्कर जी का ज़िक्र आ ही गया |मुझे श्री पणिक्कर और भारती शिवाजी के निर्देशन में अभिनय करने का सौभाग्य मिला था अवसर था उज्जैन में कालिदास समारोह | ‘’दूतवाक्यम’’ व् ‘’भाग्वाज्जुकियम’’ मूल संस्कृत में तैयार किये गए नाटक थे जो इस कार्यशाला में तैयार किये गए|नृत्य संगीत प्रधान इस नाटक की नृत्य निर्देशिका थीं भारती शिवाजी और संगीत निर्देशक पी कालिदास | इस नाटक में डायलोग्स को सीधे २ न बोलकर एक धुन में गाया जाता था एवं नृत्य नाटक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था ! !चित्र पटम का इस्तेमाल किया गया था !मुझे याद है कि कृष्ण का विराट स्वरुप दिखाने के लिए मंच पर चार कृष्ण दिखाए गए थे ,जिनमे प्रकाश और संगीत का अद्भुत संयोजन किया गया था .!.वो द्रश्य मन्त्र मुग्ध कर देने वाला था,एक अभूतपूर्व ,अलौकिक चमत्कार था ! मैंने काफी निकट से देखा था उसका प्रभाव !कुछ वक़्त के लिए महसूस हुआ कि हम उसी काल उसी स्थिति में हैं |एन एस डी के भूतपूर्व निर्देशक श्री बी एम् शाह के निर्देशन में मुहम्मद तुगलक (गिरीश कार्नाड लिखित), और त्रिशंकु जो बी एम् शाह द्वारा ही लिखित और निर्देशित था में मुख्य किरदार निभाने का अवसर भी मुझे मिला रेपेट्री की एक कार्यशाला में विजय दलवी भी हमारे सह कलाकार थे |दौनों ही निर्देशकों के निर्देशन में काफी फर्क था लेकिन अपने अपने ढंग में अद्भुत और अविस्मरनीय |
बहरहाल ...उक्त बातचीत में एक खुलापन दिखा | प्रयोगधर्मिता का स्वागत और उससे कुछ आगे का सोचना एक वास्तविक कलाकार की पहचान है |(‘’जुलवा ‘’ और ‘’जानेमन’’ नाटकों में उनकी इस फितरत का अक्स दिखाई देता है )वास्तव में ‘’पे बेथ’’ , पनिक्कर जी के एक ख़ास शैली में मूल संस्कृत नाटक,या फिर वसंत पोद्दार या इंदौर की सुमन धर्माधिकारी के एकल नाटक हों,हबीब तनवीर के लोक कलाकार व् लोक नाटक ऐसी प्रयोगधर्मिता ही आने वाले कलाकारों के लिए पद चिन्ह बनाती चलती है | वस्तुतः एक जेनुइन कलाकार में अछे के स्वीकार्य के इतर एक जिद्द और संकल्प की दरकार भी होती है जो यहाँ स्पष्टत देखने को मिल रही है और जिसे मैंने सबसे पहले बी एम् शाह के निर्देशन में काम करते हुए महसूस किया | सबद और व्योमेश शुक्ला जी का धन्यवाद वामन केंद्रे जी के साथ इतनी सारगर्भित बातचीत पढवाने के लिए |


"भारतीय जीवन को समझने के लिए दस ज़िंदगियाँ कम पड़ेंगी, दसों ज़िन्दगियों को दाँव पर लगाकर जीना पड़ेगा. तब मैं या कोई भारत को समझ सकेगा."

"बनारस अपना कुछ भी भूला नहीं. यह बड़ा मूल्य है. भूलने के तुरंत बाद यूरोपियन होना आपका इंतज़ार कर रहा है. मैंने कई शहर और गाँव उजड़ते हुए देखे हैं. अपने आप को रिजेक्ट करके दूसरे जैसा हो जाने के लिए हर कोई बेताब है. वह बेताबी बनारस में बिल्कुल नहीं है. मैंने इस सभ्यता के साथ अपनी टूटी श्रृंखला जोड़ ली है. "

"....उस विराट का अनुकरण बेमानी है."

संग्रहणीय पोस्ट!
Thanks to Shabad...
Choicest wishes to Shabad for its glorious journey!


"ग्लोबल होने की जल्दबाज़ी उचित नहीं है. प्राथमिकता कुछ और होनी चाहिए. जो ईमानदारी से लोकल होगा, वही ग्लोबल हो पाएगा और वही कला की अपनी शर्तों पर विश्व के साथ संवाद कर सकेगा..."

एब्सोल्यूटली.. महाभारत में लिखा भी है-
'धर्मे च अर्थे च कामे च, मोक्षे च भर्तर्षभ:,
यदिहास्ति तदन्यत्र, यन्नेहास्ति न च क्वचित!'
सब कुछ यही है, यही खोजना होगा. बाकि जिसे सहजता में मिलना है उसे विलग नही कर सकते , प्रभाव स्वीकार्य है अनुकरण नही. और बनारस तो बस 'बना रहे रस'... जन्म मृत्यु के संधि स्थल पर निर्लिप्त बैठा है ये शहर...! बेहद सुंदर अभिव्यक्ति.. शुक्रिया सबद. :)


Brilliant piece on being Indian ! Read it twice. Ramleela jitna hi gazab uska varnan hai. Aur jaaneman naatak to kamaal hai. Maine govind Pandey ke lead role wala play dekha tha. I have never seen a play as dense as janeman's that show. For this piece congrats to Vyomesh bhai !


वाह
- ज्योतिष जोशी


धन्यवाद, केंद्र जी की रंगयात्रा और विचार से हम परिचित हुए।


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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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