Monday, June 22, 2015

सुधांशु फ़िरदौस की कविताएं


Photo : André Kertész


रतजगाई

रात चांद के हंसुए से आकाश में घूम-घूम
काट रही थी तारों की फ़सल
खिड़की से नूर की बूंदें टपक रही थीं  
हमारे स्वेद से भीगे नंगे बदन पर
रतिमिश्रित प्रेम के सुवास से ईर्ष्यादग्ध रात की रानी
अपने फूलों को अनवरत गिराए जा रही थी 
भोर होने वाली थी और नींद से कोसों दूर हम दोनों
एक दूसरे के आकाश में
आवारा बादलों की तरह तितर रहे थे
***

अमृतपान

शरद की पूर्णिमा 
कतिका धान की दुधाई गमक
ओस से भीगी दूब पर
ज़ामिद दो नंगे पैर

चांद को छू लेने की चाह में
गड़हे से बाहर उछल
छटपटा रही हैं
मछलियां 
***

गुलज़ारिश 

तुम्हारे गालों और ठोढ़ी के बीच ये जो तीन तिल हैं ना
काव्यशास्त्र में वर्णित कवियों के तीन गुण हैं

तुम्हारी आंखों में देखते हुए भूल सकता हूं 
सबसे भयानक तानाशाह की सबसे डरावनी हंसी 

मेरे हाथों को अपने हाथों में लिए
तुम्हारा यूं दिल्ली की सड़कों पर बेलौस चलना
सत्ता के दमन के खिलाफ़ किसी जुलूस में चलना है

तालाब के पानी में पैरों को डाले
बतखों के झुंड से अठखेलियां करते हुए
तुम्हारा नेरुदा की कविता 'चीड़ के पेड़ों का गीत' सुनाने का अनुरोध करना
कविता और स्त्री में मेरी अक़ीदत को कितना मज़बूत करता है

बस अड्डे के इंतज़ारी कमरे में मुझे अपनी गोद में लिटा 
धीमे-धीमे कान में तुम्हारा एक सौ सोलह चांद की रातें सुनाना
एक बार गुलज़ार को भी रश्क करने पर मज़बूर कर सकता है 

तुम्हारा साढ़े चार पहर मेरे साथ इतने रंगों इतने ढंगों में यूं रहना
जीवन की एकरसता में इतने रस घोल गया है कि
हृदय संतूर
मन मृदंग हो गया है
***

मेहनताना

उसका ऊपरी होंठ मेरे दोनों होंठों के बीच 

मेरी भाप उसकी भाप से मिलकर 
लफ़्ज़ों के चावल को भात मे बदल रही है

उसने कविता सुनने की इल्तिज़ा की थी
अब मैं उसके भीतर अपनी कविता के मानी तलाश रहा हूं 

बातों-बातों में ही वह हार गई थी मुझसे एक हज़ार चुंबनों की शर्त
और अब मैं उसका मेहनताना चुका रहा हूं   

अब जबकि वह निशाहारी सो चुकी है
कौन ज़्यादा खुशफ़हम है
मेरी कविता या उसके बदन पर उतरती
पूस की सुबह की अलसायी धूप
***

रातों-रात

नंगे पीपल की टहनियों पर
रातों-रात निकल आई पीकें  
घोंसलों के बाहर रातों-रात फुदकने लगे चूजे
रातों-रात दन दिया दैत्याकार थ्रेशर ने पूरा का पूरा खलिहान
सूदखोरों से तंग आकर एक परिवार रातों-रात पार कर गया गांव का सीवान 
रातों-रात काट गायब कर दिया लोगों ने बावन फीट के अंदर उग आए उस सेमल के पेड़ को
जिसके फूलों को देखकर हम पहचानते थे वसंत को
नदी की धार में बह गई रातों-रात तरबूज की कई बीघे फ़सल
बह गया उसी के साथ वह जवान
रखा था फ़सल के लिए
जिसने रेहन पर अपना मकान
****


(सुधांशु हिंदी के युवा कवि हैं।
सबद पर उनकी कविताएं पहली  बार। )

8 comments:

amit dubey said...

Dear Shudhanshu,loved every single word of your poem and amazed with your command over giving words to deeply hidden emotions..

Mai likh nahi pata kavitayen,par inko padhne ka maza bahut hai,
lagta hai jaise bewafa ho to payegi nahi meri, par use mahsoos karne ka maza bahut hai.

Dayanand Arya said...

"बस अड्डे के इंतज़ारी कमरे में मुझे अपनी गोद में लिटा
धीमे-धीमे कान में तुम्हारा एक सौ सोलह चांद की रातें सुनाना
एक बार गुलज़ार को भी रस्क करने पर मज़बूर कर सकता है

तुम्हारा साढ़े चार पहर मेरे साथ इतने रंगों इतने ढंगों में यूं रहना..."

मंद बयार सी सहलाती कविता !

सौरभ शेखर said...

सुधांशु की कविताओं की सहज ताज़गी, उसकी देशज अंतर्ध्वनि और उनका कटिबद्ध प्रतिरोध पहले पाठ में साथ रह जाते हैं। ये जितनी प्रेमोन्माद की गहन अनुगूंजें हैं, उतना ही अपने कठिन समय की राज़फाश। और यही संतुलन कविता है।

चन्दन said...

बहुत अच्छी कविताएँ. पलट कर देखने जैसी महसूसियत वाली कविताएँ.

आशुतोष कुमार said...

हर पीढ़ी अपनी प्रेम कविताएँ ले कर आती हैं . सुधांशु की पीढी के रूमान में भी एक सयानापन है . इनके लिए प्रेम उस तरह की युद्धभूमि नहीं है , जैसा पिछली पीढ़ियों के लिए था . दिल्ली के सडकों पर किसी का हाथ हाथों में लिए बेलौस चलना सिर्फ प्यार नहीं , राजनीतिक कार्रवाई भी है . ख़ास तौर पर सामाजिक फासीवाद के इस दौर में . इस कविता में समय की बारीक पहचान मौजूद है . सब से आशाजनक यह है कि इन कविताओं में न प्यार और राजनीति के बीच कोई अटूट विभाजन है , न गाँव और शहर के बीच . फिर भी इन कविताओं में एक गुलजारिश सरलता है , खुद को पार करने की चुनौती देती हुई . सुधांशु फिरदौस पर नज़र रखिए.

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

सुधांशु फ़िरदौस की कविताओं का अपना ग्रामर और एक अलग सिंटैक्स है. यही नहीं इनकी शब्दावली भी अनोखी है! लिहाजा कविताओं को पढ़ते वक़्त चाहे पाब्लो नेरूदा की परछाईं या गुलज़ार के एहसास भले रिफ्लेक्ट हों, कविता सुधांशु की आइडेंटिटी बनकर उभरती है. अलग अलग मूड की कवितायेँ होकर भी एक ताज़गी और गहरे एहसास के अंडरकरेंट के साथ सारी कवितायेँ प्रभावित करती हैं!
कम से कम लफ़्ज़ों में कहें तो सिम्पली ग्रेट!!

dinesh tripathi said...

सारी कविताओं ने प्रभावित किया । भाव और शब्दों के साथ सुधांशु का ट्रीटमेंट गज़ब का है । संभावना से भरे इस जबरदस्त युवा कवि को बधाई ।

Smriti said...

Kawitaye nahi lagta hai kisi yuva aur naye premi ki bhawnaye samaj ke thapedo se takra kar jiwan se samwad karti hun. Kawita padh kar laga jaise jiwan ki aapa dhapi pe hum prem, sneh, rang, romance se kitna pichhe chor aaye hain. Sach kahu to sudhanshu ke kawita ne khud ke ranghin banne ka ehshash bhi kara diya hai aur ek ullash bhi bhar diya hai. Inshah Allah tumhara prem mukarrar ho.