Tuesday, May 12, 2015

महेश वर्मा की नई कविता

Joe-Webb-Mixed-Media-Collages

रकीब

एक नाम गड़ता है नींद में
और उंगली ढूँढने लगती है लिबलिबी का ठंडा लोहा
हम दोनो के ख़ाब गुस्सैल तलवारों की तरह टकराते हैं
और तीन रातों में चिंगारियां भर देते हैं

उसकी पीठ किसी से भी मिलती हो
उसका सीना मेरे जैसा नहीं होना चाहिए.

***

रकीब तुम्हारे शक के घर में रहता है शाहजादे
कहकर तीसरी रानी ने जो गज़ल गुनगुनाई वो यूं, के
            तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किसका था
            न था रकीब तो आखिर वो नाम किसका था

फिर मन में लिया आशिक का नाम
और मासूमियत से पूछा -
 " सुबह कोई जोर से पुकारता था आपका नाम सीढ़ियों पर ?"

***

पहली फुर्सत में उसका क़त्ल कर देना चाहिए
ऐसी नसीहत देकर
ज़हरों के बारे में तफसील से फुसफुसाता है ज़हरफरोश
कान के बिलकुल नज़दीक.

सिर्फ़ मेरी बातें सुनकर
जैसा नीला यह कान हुआ है हुज़ूर आपका
ऐसे ही  दुश्मन के नाखून न हो जाएँ
तो ज़हर की बजाये कांवर पर शहद बेचूंगा : यहीं आपकी गलियों में.

***

रकीब सतरों के बीच से बोलता है
वो अक्सर माशूका की आवाज़ में बोलता है
वो एक दोमुहां सांप है
एक ज़हर आलूदा तीर

मैं उसकी इस चाल से क़त्ल हुआ
            कि मुझसे डरकर पीछे हटना
            और पीछे हटते
            मेरे इश्क के बिलकुल करीब पहुँच जाना

मैंने खुद माँगा उससे वो तीर
खुद अपना सीना चाक किया

और बाकी क्या था ?

***


आधी सदी से बैठा हूँ इन झाड़ियों में
के उसका सर कलम कर ही के लौटूंगा

मैंने उसे मार डाला है
सभी दरख़्त यही कह रहे हैं
यही फुसफुसा रही थी घास
यही सरगोशियाँ हवा की

कोई न कोई उसे बता देगा
कौन चाहेगा एक कातिल को ?

***

हम एक ही मौसम की हवाएं थे
एक ही आग को पीकर अंधे हुए दो लोग
एक ही बिजली से दागी गई जीभ लेकर
बोसों को भूले हुए दो लोग

हमें धूलभरी  हवाओं और कांटेदार झाड़ियों ने चाहा है

अगरचे इसने पहले दे दी जान
जीते जी मर जाऊंगा शिकस्त से
***

(महेश वर्मा हिंदी के चर्चित कवि हैं। उनकी कई कविताएं सबद पर पहले भी शाया हो चुकी हैं।)

8 comments:

Anonymous said...

lover of the beloved ! beautiful creation...

Jyotsna Kumari said...

मैंने खुद माँगा उससे वो तीर
खुद अपना सीना चाक किया.....

Deepak Mishra said...

बड़े गुढ़ और गहराई भरा है,, बेहतरीन।।!!

Pratibha gotiwale said...

उसकी पीठ किसी से भी मिलती हो
उसका सीना मेरे जैसा नहीं होना चाहिए.
…इन बेहतरीन कविताओं को पढ़वाने के लिए धन्यवाद अनुराग

Reva Bodas said...

Disturbing but beautiful !

Shruti Gautam said...

कोई दोस्त है न रकीब है,
तेरा शहर कितना अजीब है...

शक के घर में रहने वाले अपना नाम सुन क्यों न चौंक जायें भला | उदासियों और शिकस्तो के गहन तानेबाने को बुनती सुंदर कविताये | "और बाकी क्या था", शुक्रिया :)

चन्दन said...

बन गया रकीब आखिर .... बेहतरीन कविताएँ. स्मृतिवान कविताएँ हैं.

अगरचे इसने पहले दे दी जान
जीते जी मर जाऊंगा शिकस्त से

Sandhya Kulkarni said...

बेहतरीन कवितायें