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Showing posts from May, 2015
सात 
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बहुत ख़ामोशी से सबद सातवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है।
इस अवसर पर युवा कविता के एकदम अलग स्वर अम्बर रंजना पाण्डेय की नई कविता आपके सम्मुख है। अंबर की कविताएं सबद पर यहां भी पढ़ी जा सकती हैं।



इन्दौर के एक बोहरी की सलिलक्वॉय
डबलरोटी के आटे जैसी बाँहें। ऐसी नाज़ुक जैसे बाँहें नहोकर फकत बाँहों का ख़याल हो। जरा पकड़ लो तो उंगिलयां बन जाती। बगलों पे दो-एक सुनहरे रेशे और उसमें पिरोये हुए पसीने के चंद नमकीन मोती। बगल से एक हरी नस चल कर या यूँ कहूँ कि चढ़कर सीने तक गई थी। गुजराती में कोई बेपनाह गन्दी बात फुसफुसा देता उसके कान में तो वह हरी नस बगल के किनारे ऐसे फड़कती जैसे हलाल होने से पहले खानसामे की हथेलियों में कबूतर फड़फड़ाता है।


नानखटाई में जैसे गुलाबकतरी आ जाती है एकाएक, कभी भी वैसे ही कुछ उसकेउरोज थे।एक छाती केथोड़ाऊपर दूसरा नीचे।एक फ़ाख्ते के खून की तरह गुलाबी और दूसरा मेरे दांत के निशान की वज़ह से हमेशा नीला।और उस पर नाखूनों की इबारत-- अब्बामियां खामख्वाह गुस्सा करते रहे कि मेरी उर्दू अच्छी नहीं हुई तो नहीं हुई। ताज़महल पे भी इतनी हसीं नस्ता'लीक न थी जितनी मेरे नाखूनों की उं…

महेश वर्मा की नई कविता

रकीबएक नाम गड़ता है नींद में और उंगली ढूँढने लगती है लिबलिबी का ठंडा लोहा हम दोनो के ख़ाब गुस्सैल तलवारों की तरह टकराते हैं और तीन रातों में चिंगारियां भर देते हैं
उसकी पीठ किसी से भी मिलती हो उसका सीना मेरे जैसा नहीं होना चाहिए. ***
रकीब तुम्हारे शक के घर में रहता है शाहजादे कहकर तीसरी रानी ने जो गज़ल गुनगुनाई वो यूं, के तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किसका था             न था रकीब तो आखिर वो नाम किसका था
फिर मन में लिया आशिक का नाम और मासूमियत से पूछा -  " सुबह कोई जोर से पुकारता था आपका नाम सीढ़ियों पर ?"
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पहली फुर्सत में उसका क़त्ल कर देना चाहिए ऐसी नसीहत देकर ज़हरों के बारे में तफसील से फुसफुसाता है ज़हरफरोश कान के बिलकुल नज़दीक.
सिर्फ़ मेरी बातें सुनकर जैसा नीला यह कान हुआ है हुज़ूर आपका