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Showing posts from October, 2014

सबद विशेष : 16 : वीस्वावा शिम्बोर्स्‍का का गद्य

1996 के बाद वीस्वावा शिम्बोर्स्‍का का परिचय जितनी बार भी लिखा जाता है, उन्हें दुनिया-भर में मशहूर कवि और नोबेल पुरस्कार विजेता कहा जाता है। कोई ग़लत भी नहीं, क्योंकि दोनों ही तथ्य हैं। लेकिन 1996 से पहले ये दोनों बातें तथ्य नहीं थीं। नोबेल पुरस्कार मिलने से पहले अंतर्राष्ट्रीय पटल पर शिम्बोर्स्‍का की प्रसिद्धि नाममात्र की ही थी। यह अल्पकीर्ति भी एक तथ्य ही है, अत: इसका उल्लेख भी कोई अनुचित बात नहीं। किंतु 2014 में इसका उल्लेख क्यों करना? इसलिए कि यह उल्लेख भी एक कि़स्म की प्रासंगिकता है। इस साल भी साहित्य का नोबेल पुरस्कार एक ऐसे लेखक (फ्रेंच भाषा के पैट्रिक मोदियानो) को दिया गया है, जिसके पास अल्पकीर्ति है। अल्पकीर्ति को कुछ लोग रोग या एक कि़स्म का डिसएडवांटेज/डिसमेरिट मान लेते हैं। कोई लेखक यदि अल्पकीर्त है, तो उसकी श्रेष्ठता को संदेह से देखा जाता है। यशाकांक्षी तो पहले से था, इक्कीसवीं सदी के इस दूसरे दशक में हमारा साहित्यिक समाज पहले की अपेक्षा कहीं ज़्यादा यशाक्रांत भी हो गया है।

एक छोटा-सा कि़स्सा याद आता है। हैरल्ड पिंटर अपने जीते-जी महान मान लिए गए थे। नोबेल मिलने से बरसों प…