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न नींद टूटती है न भरम : गीत चतुर्वेदी की नई कविताएं



a still from Wong Kar Wai's movie : Days of being wild.


तुम इतनी दूर पहुंच चुकी हो
स्मृति की दृष्टि से भी ओझल
कि अब तुम्हारा चेहरा नहीं पहचान सकता

तुम्हें सिर्फ़ एक चेहरे से याद भी नहीं कर सकता

इस तरह बनता है अतीत से हमारा रिश्ता कि
जिन चीज़ों को देख तुम्हारी याद आती है
वे चीज़ें तुम्हारे चले जाने के बाद वजूद में आई थीं

बस एक रेखाचित्र है सर्द सुबह का
एक आकृति है बिंदुओं से बनी हुई
आज एक आंख है कल एक दृश्य
दोनों के बीच धुंधला-सा एक ध है   

कोहरे का नक़ाब तुम पर फबता है
                                         * * *
समाधि

मेरे भीतर समाधिस्थ हैं
सत्रह के नारे
सैंतालिस की त्रासदी
पचहत्तर की चुप्पियां
और नब्बे के उदार प्रहार
घूंघट काढ़े कुछ औरतें आती हैं
और मेरे आगे दिया बाल जाती हैं

गहरी नींद में डूबा एक समाज
जागने का स्वप्न देखते हुए
कुनमुनाता है

गरमी की दुपहरी बिजली कट गई है
एक विचारधारा पैताने बैठ
उसे पंखा झलती है

न नींद टूटती है न भरम टूटते हैं
* * *
दूध के दांत

देह का कपड़ा
देह की गरमी से
देह पर ही सूखता है
- कृष्णनाथ

मैंने जिन-जिन जगहों पे गाड़े थे अपने दूध के दांत
वहां अब बड़े-खड़े पेड़ लहलहाते हैं

दूध का सफ़ेद
तनों के कत्थई और पत्तों के हरे में
लौटता है

जैसे लौटकर आता है कर्मा
जैसे लौटकर आता है प्रेम
जैसे विस्मृति में भी लौटकर आती है
कहीं सुनी गई कोई धुन
बचपन की मासूमियत बुढ़ापे के
सन्निपात में लौटकर आती है

भीतर किसी खोह में छुपी रहती है
तमाम मौन के बाद भी
लौट आने को तत्पर रहती है हिंसा

लोगों का मन खोलकर देखने की सुविधा मिले
तो हर कोई विश्वासघाती निकले
सच तो यह है
कि अनुवाद में वफ़ादारी कहीं आसान है
किसी गूढ़ार्थ के अनुवाद में बेवफ़ाई हो जाए
तो नकचढ़ी कविता नाता नहीं तोड़ लेती

मेरे भीतर पुरखों जैसी शांति है
समकालीनों जैसा भय
लताओं की तरह चढ़ता है अफ़सोस मेरे बदन पर
अधपके अमरूद पेड़ से झरते हैं

मैं जो लिखता हूं
वह एक बच्चे की अंजुलियों से रिसता हुआ पानी है
* * *
काव्य-न्याय

जिस आदम को स्वर्ग से बेआबरू निकाला गया
उसकी नियति देख लीजिए
आदम के आंगन में बाल-बच्चे किलक रहे
स्वर्ग ख़ुद ही नेस्तनाबूद हो गया
* * * 
( गीत की अन्य रचनाएं यहां । )
22 comments:

adbhut.. visheshkar antim...


कोहरे का नक़ाब तुम पर फबता है


Gyasu Shaikh said: मेरे भीतर पुरखों जैसी शांति है
समकालीनों जैसा भय
लताओं की तरह चढ़ता है अफ़सोस मेरे बदन पर
अधपके अमरूद पेड़ से झरते हैं

मैं जो लिखता हूं
वह एक बच्चे की अंजुलियों से रिसता हुआ पानी है / kavitaein hai ya ek jeevant guftagu...Geet ji, aapka likha kahin kuchh zaaya nahin jaata...shabd kitne khil uthte hain aapki qalam se nikal kar...jaise prakriti ka shabnami uchchhwas ! hakka bakka bhi hote hain kabhi aapko padh kar aur kabhi mantramugdh se bhi...aapka kavita likhna zaaya nahin jaata vaise hi hamara aapki kavitaein padhna bhi zaaya nahin jaata...aapki kavitaein padh kar aapse khush rahte hain ...


गीत की कविता सदियों से समाधिस्‍थ शब्‍दों को जगा देने की क्षमता रखती है। इधर के कवियों में जिन कवियों ने सर्वाधिक ध्यान खींचा है, जिनकी भाषा और अतर्वस्तु में संवेदना और मार्मिकता की सबसे अनछुई ताजगी है वह प्रभात और गीत चतुर्वेदी हैं। प्रभात और गीत दोनों कविता में सुबह की मानिंद हैं तरोताजा, धारोष्णु कथ्य और बिम्बों के कवि। वे कविताओं में हालात की रपट नहीं लिखते न किसी विषय के चरित्र चित्रण को कविता की फलश्रुति मानकर बैठ जाते हैं। जबकि आज ज्यादातर कवि यही कर रहे हैं।

अपने समय के अचूक कथ्य से वाबस्ता गीत चतुर्वेदी यों तो कविता में अक्सर लंबा आलाप भरने वाले कवि हैं पर हर बार वे कविता में अपनाया अपना ही रास्ता बदलने का कौशल भी रखते हैं। एक रहस्यलोक में छलांग लगाती गीत की कविताएं कभी समसामयिकता की हड़बड़ी में नहीं दिखतीं। थकान से ऊब के लिए उन्हें गति चाहिए। बस कोई उनके पैरों में कोई पहिया बन जाए।

गीत की कविताएं अपनी हदें नहीं जानतीं। वह जीवन हो, समाज हो, दर्शन हो, प्रेम और अनुराग की विवृति हो, यातना भरे प्रसंग हो, या जलाए जाते पुस्तकालय हों, गीत कविता के दैहिक और आत्मििक कलेवर को हर बार नया-नया सा कर देते हैं, वे नीति-अनीति और रीति की सारी संभावनाएं खंगालने वाले कवि हैं। उनकी अनेक पंक्तियॉं सूक्तियों की-सी शुचिता से मंडित दिखती हैं। ‘’मुझे चूमो नख से चूमो शिख तक चूमो/आदि से चूमो अंत तक चूमो/मैं सादि हूँ सांत हूँ/सो अनंत तक नहीं करनी होगी तुम्हेंि कोशिश/ इसी देह में मेरे खुलने की कुंजी है/हर अंग चूमो हर कोई चूमो/एक सच्चा चुंबन पर्याप्त है मुझे खोल देने के लिए।‘’(जीसस की कीलें) । सोचिए गीत ने कविता की अनुभूति को कहां पहुंचा दिया है और कहॉं खड़े हैं आज के कवि शव्दशक्तिदयों के किन कोने अँतरों में दुहराई और जुठारी गयी अभिव्यक्‍तियों से केलि करते हुए।

न नींद टूटती है न भरम---में इस सदी के करकने की आवाज़ सुनाई देती है।


आनंद आ गया / एक वाक्य में कहा जाय तो '' गीत चतुर्वेदी की कवितायेँ भीतरी दरवाज़ों को खटखटाने की औचारिकता छोड़ सीधे उसे ठेल कर आत्मिक ज़मीन पर अपनी सहज उपस्थिति से सुरभि बिखेर देने वाली कवितायेँ हैं ---
--रतीनाथ योगेश्वर


गीत मोस्ट कोटेबल हिंदी लेखक बनते जा रहे हैं. स्मृतियां कोहरा है जिसमें अतीत धुआं धुआं है. हम भरम और नींद से भरी जिन्दगी में यादों की समाधि लगाये रहते हैं. हमारा इतिहास और वर्तमान हममें घुले हुए हैं. 'दूध के दांत' कविता सुन्दर बिम्बों की कड़ी है. बचपन से बुढ़ापे की फिर फिर पीछे मुड़कर देखने की यात्रा. हम वही हैं तो उम्र का विभाजन अमान्य है क्योंकि हम जिस क्षण में वास्तव में जी रहे होते हैं उस समय मन किसी और समय और स्थान पर होता है. आदम की तरह और अनेक महान लोगों को बिरादरी से निकाला गया. उन्होंने अपनी लगन से खुद को बृहत्तर परिप्रेक्ष्य में स्थापित किया. वे समाज के लिए अनुकरणीय या ईर्ष्या के पात्र बन गए. स्वर्ग मौलिक सोच के लोगों के लिए उपयुक्त स्थान नहीं.


geet ji ...hamesha ki tarah ...nayee aur taazee abhivyakti.. naye bimbon , romanchak amoortataa ke sath... badhaaeee....om ji ki tippani satya hai...


Geet ji ...Most quotable hindi lekhak ! Sahmat hain aapse Sarita Sharma ji..


बच्चे की अंजुलियों से रिसता हुआ पानी...bahut sundar!


perfection!!
uff aap hamen sochna sikha rahe ho !!


Kya baat hai Geet Bhai !!Beautiful!


गीत के बिंबों में ताजगी है और सबसे अलग ढंग से बात करने की शैली है जो भाता है


hamesha ki tarah zaruri kavitaye..........


bahut sundre rachnayen hai sir ji ummid hai aage bhi hum yun he apko padhte rhenge or soubhagya hoga ki aapse mil paye....


यादो में हम वही ठहर जाते हे , जो गुजरता है वो तो बस समय हें ............


में क्या कहूँ ---निशब्द हो जाती हूँ बस आपको पढ़कर


गहरी नींद में डूबा एक समाज
जागने का स्वप्न देखते हुए
कुनमुनाता है

_________________
अच्छी कविता


hamesha ki tarah sunder aur marmik!


Jitni baar padhta hun Geet Ki kavitayen utni baar we apni nayi-si deh se chhooti hain.


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अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :

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