Friday, June 13, 2014

न नींद टूटती है न भरम : गीत चतुर्वेदी की नई कविताएं



a still from Wong Kar Wai's movie : Days of being wild.


तुम इतनी दूर पहुंच चुकी हो
स्मृति की दृष्टि से भी ओझल
कि अब तुम्हारा चेहरा नहीं पहचान सकता

तुम्हें सिर्फ़ एक चेहरे से याद भी नहीं कर सकता

इस तरह बनता है अतीत से हमारा रिश्ता कि
जिन चीज़ों को देख तुम्हारी याद आती है
वे चीज़ें तुम्हारे चले जाने के बाद वजूद में आई थीं

बस एक रेखाचित्र है सर्द सुबह का
एक आकृति है बिंदुओं से बनी हुई
आज एक आंख है कल एक दृश्य
दोनों के बीच धुंधला-सा एक ध है   

कोहरे का नक़ाब तुम पर फबता है
                                         * * *
समाधि

मेरे भीतर समाधिस्थ हैं
सत्रह के नारे
सैंतालिस की त्रासदी
पचहत्तर की चुप्पियां
और नब्बे के उदार प्रहार
घूंघट काढ़े कुछ औरतें आती हैं
और मेरे आगे दिया बाल जाती हैं

गहरी नींद में डूबा एक समाज
जागने का स्वप्न देखते हुए
कुनमुनाता है

गरमी की दुपहरी बिजली कट गई है
एक विचारधारा पैताने बैठ
उसे पंखा झलती है

न नींद टूटती है न भरम टूटते हैं
* * *
दूध के दांत

देह का कपड़ा
देह की गरमी से
देह पर ही सूखता है
- कृष्णनाथ

मैंने जिन-जिन जगहों पे गाड़े थे अपने दूध के दांत
वहां अब बड़े-खड़े पेड़ लहलहाते हैं

दूध का सफ़ेद
तनों के कत्थई और पत्तों के हरे में
लौटता है

जैसे लौटकर आता है कर्मा
जैसे लौटकर आता है प्रेम
जैसे विस्मृति में भी लौटकर आती है
कहीं सुनी गई कोई धुन
बचपन की मासूमियत बुढ़ापे के
सन्निपात में लौटकर आती है

भीतर किसी खोह में छुपी रहती है
तमाम मौन के बाद भी
लौट आने को तत्पर रहती है हिंसा

लोगों का मन खोलकर देखने की सुविधा मिले
तो हर कोई विश्वासघाती निकले
सच तो यह है
कि अनुवाद में वफ़ादारी कहीं आसान है
किसी गूढ़ार्थ के अनुवाद में बेवफ़ाई हो जाए
तो नकचढ़ी कविता नाता नहीं तोड़ लेती

मेरे भीतर पुरखों जैसी शांति है
समकालीनों जैसा भय
लताओं की तरह चढ़ता है अफ़सोस मेरे बदन पर
अधपके अमरूद पेड़ से झरते हैं

मैं जो लिखता हूं
वह एक बच्चे की अंजुलियों से रिसता हुआ पानी है
* * *
काव्य-न्याय

जिस आदम को स्वर्ग से बेआबरू निकाला गया
उसकी नियति देख लीजिए
आदम के आंगन में बाल-बच्चे किलक रहे
स्वर्ग ख़ुद ही नेस्तनाबूद हो गया
* * * 
( गीत की अन्य रचनाएं यहां । )