Sunday, April 27, 2014

स्मृति-शेष : ताद्यूश रूज़ेविच


[ पोलिश कवि ताद्यूश रूज़ेविच का 24 अप्रैल को 92 वर्ष की आयु में देहांत हो गया। मूर्धन्य हिंदी कवि
कुंवर नारायण ने
रूज़ेविच की कई कविताओं का वक़्त-वक़्त पर हिंदी में अनुवाद किया है। हम श्रद्धांजलि स्वरूप उनमें से 4 काव्यानुवाद प्रकाशित कर रहे हैं।  ]



तमाम कामकाज के बीच

तमाम कामकाज के बीच
मैं तो भूल ही गया था
कि मरना भी है

लापरवाही
में उस कर्त्तव्य से कतराता रहा
या निबाहा भी
तो जैसे तैसे

अब कल से
रवैया बिल्कुल फ़र्क़ होगा

बहुत ही संभल-संभल कर मरना शुरू करूंगा
बुद्धिमत्ता से ख़ुशी-ख़ुशी
बिना समय बरबाद किये।
***

प्रूफ़


मौत नहीं ठीक करेगी
कविता की एक भी पंक्ति
वह प्रूफ़-रीडर नहीं है
न किसी संपादिका की तरह
हमदर्द

घटिया रूपक अमर हो जाता

एक रद्दी कवि मरणोपरान्त भी
मरा हुआ रद्दी कवि ही रहेगा

एक बोर मर कर भी बोर ही करता
एक मूर्ख क़ब्र के उस पार से भी
अपनी मूर्ख बकवास जारी रखता
***

सौभाग्य

कैसा सौभाग्य कि जंगलों में
रसभरियां चुन सकता हूं
मेरा ख़याल था कि
न अब जंगल हैं न रसभरियां

कैसा सौभाग्य कि पेड़ की छाया में
लेटा रह सकता हूं
मेरा ख़याल था कि पेड़
अब छाया नहीं देते।

कैसा सौभाग्य कि मैं तुम्हारे साथ हूं
और मेरा दिल इतना धड़क रहा है
मेरा ख़याल था कि आदमी
अब बेदिल हो गया है।
***

अब
एक समय था
कि प्रतीक्षा करता
कब मुझ पर कविता का हमला हो
एक अस्थिर बिंब के पीछे
भागते-भागते हांफ जाता

और अब मैं
कविताओं को अपने बिल्कुल पास से
निकल जाने देता
वे मुरझा कर मर कर
बेजान हो जातीं

और मैं उधर ध्यान भी नहीं देता
कुछ नहीं करता
***

9 comments:

अभिव्यक्ति said...

Thnks fr sharing these poems

himani said...

Thnks fr sharing these poems

Nishpriha Thakur said...

और मेरा दिल इतना धड़क रहा है
मेरा ख़याल था कि आदमी
अब बेदिल हो गया है।

बेहतरीन !

Anju Sharma said...

अद्भुत कवितायेँ ....ये दूसरी वाली हमेशा से मुझे प्रिय है। इन्हें साझा करने के लिए शक्रिया

vandana gupta said...

लाजवाब कवितायें अलग कलेवर की

दीपशिखा वर्मा / DEEPSHIKHA VERMA said...

अच्छी हैं सभी कविताएँ :)
और साथ ले जा रही हूँ यह पंक्तियाँ:

कैसा सौभाग्य कि मैं तुम्हारे साथ हूं
और मेरा दिल इतना धड़क रहा है
मेरा ख़याल था कि आदमी
अब बेदिल हो गया है।

anu said...

बहुत ही अच्छी कविताएँ हैं। मैंने आज से पहले रोज़ेविच को कभी नहीं पढ़ा। आज अहसास हुआ कि क्या miss कर दिया।

Avinash Kumar said...

उम्दा।
सबद का सदैव जिन्दा रहना जरुरी होता जा रहा है

महेश वर्मा said...

बेहतरीन चयन.मैं समझता था कि चौथी कविता सिर्फ मुझे ही पसंद है :)