Tuesday, April 08, 2014

अविनाश मिश्र की तीन नई कविताएं



                                                                                                                                                                       Rock Garden (Chandigarh) : Photo  by Bhupinder Brar.

पत्थर होना बेहतर है

तुम क्या गईं
मैं बेसुरा हो गया
जीवन-संगीत और वस्तुगत आकर्षण
सब बुरा हो गया
मैं पंक्तियों के खो जाने पर भी रोया हूं
तुम तो समूची स्त्री थीं
***

किस्सा-ए-मुख्तसर

तुम मुझे मिलीं
मैं यह कहता हूं कि जिंदगी मिली
तुम कभी कुछ नहीं कहतीं कि तुम्हें क्या मिला
***

घराना कबीर

मतलब कि अब मुझे हर बात से मतलब

तुम्हारे सर्वमान्य, तुम्हारे प्रख्यात से मतलब
तुम्हारे उसूल, तुम्हारे जज्बात से मतलब
तुम्हारे मजहब, तुम्हारी जाति से मतलब
तुम्हारी चुप, तुम्हारे ख्यालात से मतलब

मतलब कि अब मुझे हर बात से मतलब

तुम्हारी पार्टी, तुम्हारे पार्टनर्स, तुम्हारे पाखंडों से मतलब
तुम्हारे माओ, तुम्हारे कास्त्रो, तुम्हारे प्रचंडों से मतलब
तुम्हारे पैम्फलेट्स, तुम्हारे पोस्टर्स, तुम्हारे धरने, तुम्हारे नारे
मुझे तुम्हारे सब जुलूसों, सब झंडों से मतलब

मतलब कि अब मुझे हर बात से मतलब

जाऊं कहां जाऊं?

तुम्हारे सर्वमान्य, तुम्हारे प्रख्यात में मतलब
तुम्हारे उसूल, तुम्हारे जज्बात में मतलब
तुम्हारे मजहब, तुम्हारी जाति में मतलब
तुम्हारी चुप, तुम्हारे ख्यालात में मतलब
मतलब कि अब तुम्हारी हर बात में मतलब
***

                                                                                                        ( अविनाश मिश्र हिंदी के युवा कवि-समीक्षक हैं। )

25 comments:

madhu said...

अविनाश,
दो कविताएं बहुत मार्मिक और संवेदनशील। आंखों में नमी आना स्‍वाभाविक है। और तीसरी कविता यह हक़ीकत बयान करती कि प्रेमजी अपने अकेलेपन को इस तरह बांट रहे हैं।

बेहतरीन रचनाएं। तुम्‍हें बहुत स्‍नेह अविनाश्‍ा। इत्‍ते से तो हो पर लिखते बहुत अच्‍छा हो।

Kamal Choudhary said...

Bahut khoob!! Avinaash jee kahte hain ghaalib ka hai andaaze byaan aur....Dhanyavaad Sabad!

Vinayak Rajhans said...

उम्दा कवितायेँ...... !

Ajanta Deo said...

अद्भुत

हेमा दीक्षित said...

तीनों ही कवितायें सच्ची है ... अपने संक्षेपण में भी बहुत ज्यादा ही कहती हुई अच्छे से कहीं अधिक अच्छी है ...

परमेश्वर फुंकवाल said...

बेहतरीन कविताएँ..

Sushil Suman said...

बहुत ही अच्छी कविताएँ,अविनाश जी।
और उन पंक्तियों का जिक्र मैं भी करना चाह रहा था,जिनका अनुराग जी ने किया है।

Vinayak Rajhans said...

उम्दा कवितायेँ...... शायद वोह अब भी समूची स्त्री है !

Gurnam Singh Kaiharba said...

behatreen ....

Dipak Mashal said...

teenon kavitaayen badhiya lageen

Manoj Kumar Jha said...

Maarmik

Shridhar Nandedkar said...

अविनाश जी बहुत अच्छी कविता है....अल्पाक्षरी लेकिन गहराई तक का सफ़र करने के लिये मजबूर करती है...अनुराग भाई और आपको बधाई...

Himani Diwan said...

Its really worth reading these poemsAvinash Mishra

Hareprakash Upadhyay said...

बहुत सही अविनाश

Prem Bhardwaj said...

बेहतरीन कवितायेँ

Sarita Sharma said...

संक्षिप्त सारगर्भित कवितायेँ. निराशा के क्षण सबसे उर्वर होते हैं कल्पना के लिए.

मुकेश चन्द्र पाण्डेय said...

बहुत बढ़िया कवितायेँ

Tiwari Keshav said...

bus aah hi kah sakta hoon.

Amey Kant said...

बढ़िया कविताएँ अविनाश जी !

Prabhat Ranjan said...

बहुत ही अलग सी कवितायेँ हैं

Mukesh Nirvikar said...

"मैं पंक्तियों के खो जाने पर भी रोया हूं
तुम तो समूची स्त्री थीं"-बहुत खूब!

"तुम कभी कुछ नहीं कहतीं कि तुम्हें क्या मिला?"--अविनाश जी यह बात पहली बार आप ही ने पूछी है! बधाई!

Prerna Pandey said...

बेहतरीन कविताएँ

सुशील said...

पहली दो बहुत ही संवेदनशील कविताएं...
मैं पंक्तियों के खो जाने पर भी रोया हूं
तुम तो समूची स्त्री थीं....
गज़ब की और बहुत ही अन्तः तक महसूसने वाली पंक्तियाँ ... और अंतिम कविता कितना कुछ में बंट चुके हैं हम , जरूरी नहीं सबका मतलब हो लेकिन बिना मतलब का ज़माना कहाँ.... शानदार कविताएं, बधाई

Vipin Choudhary said...

Avinash ko padhna hamehsa hee sukhad lagta hai in nayee kavitaon se rubru karwane ke liye shabd ka shukariya

Rakesh Mishra said...

बेसक, कवि की तैयारी दीख रही है......छोटी कविताएं की वापसी हिंदी में हो रही है.....सुन्दर.....बधाई.......