Friday, April 11, 2014

अपने व्याकरण में प्रेम और अनुवाद एक जैसे होते हैं



Pic : Guy Bourdin, French Photographer

प्रेम और अनुवाद : एक संक्षिप्‍त निबंध
आंद्रेस न्‍यूमान
अनुवाद – गीत चतुर्वेदी

अपने व्‍याकरण में प्रेम और अनुवाद एक जैसे होते हैं. किसी से प्रेम करने का अर्थ है, उसके शब्‍दों को अपने शब्‍दों में ढाल लेना. उसे समझने का प्रयास करना, और अनिवार्यत:, उसे ग़लत समझना. दोनों के बीच एक साझा अस्थिर भाषा की रचना करना. किन्‍हीं शब्‍दों का संतोषपूर्ण अनुवाद करने के लिए ज़रूरी है कि आप उन शब्‍दों की इच्‍छा करें. उनके अर्थ के भोग का लोभ करें. उसकी ध्‍वनि को ख़ुद पर क़ाबिज़ होने देने की चाह करें. इस संवाद के दो सिरे होते हैं- नित्‍य और सम्‍मोहन. एक पूर्व-अर्जित ज्ञान है, दूसरा प्रक्रिया में अर्जित ज्ञान है. आप पाते हैं कि दोनों सिरों में संशोधन होने लगता है.

आप ख़ुद को अपने प्रेमी के भीतर देखने लगते हैं. दोनों को भिन्‍न करने वाले बिंदुओं को भी समानता के बिंदुओं की तरह देखते हैं. हर छोटी खोज को अपनी साझा भाषा में अभिव्‍यक्‍त करते हैं. इसके बावजूद, उसकी भाषा को पकड़ लेने की आप कितनी भी कोशिश क्‍यों न करें, अंत में आप पाते हैं कि आपने जो कुछ सीखा, अपनी भाषा के बारे में सीखा, उसकी भाषा के बारे में नहीं. इन दोनों भाषाओं का सह-अस्तित्‍व ही उनका हठीला सम्‍मोहन है.

जो व्‍यक्ति अनुवाद कर रहा है, वह दरअसल उस अपरिचित उपस्थिति को खटखटाता है, जिसमें वह अपना प्रतिबिंब देख पाता हो. पाठ उसके सम्‍मुख एक ऐसा रहस्‍य रचता है, जो आंशिक अबूझ है, उसके बाद भी अत्‍यंत परिचित रहस्‍य है. जैसे कि पाठ और अनुवादक के बीच पहली मुलाक़ात से पहले ही बातचीत होती रही हो.

अनुवादक और प्रेमी, दोनों के भीतर एक उन्‍मादी संवेदनशीलता आ जाती है. वे हर शब्‍द पर, हर भावमुद्रा पर संदेह करते हैं. हर फुसलाहट, हर भेद को टेढ़ी नज़र से देखते हैं. वे जो कुछ सुनते हैं, उस पर ईर्ष्‍याजन्‍य संदेह भी करते हैं: क्‍या सच में तुम मुझसे यही कहना चाहती हो?

प्रेम करके और अनुवाद करके, हम दरअसल, सामने वाले के अर्थ और अभिप्राय को अपने सीमित अस्तित्‍व के भीतर प्रवाहित करने लगते हैं. तुम्‍हें पढ़ते हुए दरअसल मैं ख़ुद को पढ़ता हूं. मैं तुम्‍हें इस तरह सुनता हूं, जैसे कि तुम जानती हो कि मुझसे किस तरह बात की जानी चाहिए. अगर मैं कुछ बोल पाता हूं, तो महज़ इस कारण कि तुमने मुझसे बात की है. मैं तुम्‍हारे शब्‍दों पर निर्भर हूं और तुम्‍हारे शब्‍दों को मेरी ज़रूरत है. मेरे सही जवाबों के भीतर वे सुरक्षित रह जाते हैं, वे मेरी ग़लतियों से पार निकल जाते हैं. यह प्रक्रिया ठीक-ठीक चलती रहे, इसके जिए ज़रूरी है कि हम बाधाओं को भी स्‍वीकार कर लें: मसलन, हम कभी भी एक-दूसरे को पूरी तरह पढ़ पाने में समर्थ नहीं हो सकेंगे. मैं अपनी अच्‍छी नीयत के साथ तुम्‍हारे शब्‍दों में जोड़-तोड़ करता रहूंगा. रही बात मूल भावनाओं की, तो वे वैसी ही रहेंगी, उन पर कोई मोल-भाव नहीं.   
* * *


1977 में बेनस आयर्स में जन्‍मे आंद्रेस न्‍यूमान स्‍पैनिश कवि व उपन्‍यासकार हैं. स्‍पैनिश में उनके पांच कविता संग्रह और पांच उपन्‍यास प्रकाशित हैं. पिछले साल अंग्रेज़ी में अनूदित होकर उनका पहला उपन्‍यास छपा है, ‘ट्रैवलर ऑफ द सेंचुरी’, जिसकी इन दिनों बहुत चर्चा है. यहां दिया गया संक्षिप्‍त निबंध दरअसल न्‍यूमान के ब्‍लॉग-लेखन का हिस्‍सा है, जो उनके कथेतर गद्य की एक किताब में संकलित है.

महान लेखक रोबेर्तो बोलान्‍यो ने निबंधों की अपनी किताब ‘बिटवीन पैरेनथिसेस’ में आंद्रेस न्‍यूमान के बारे में लिखा है : ‘न्‍यूमान ने हर कि़स्‍म की परीक्षा उत्‍तीर्ण कर ली है. जब मैं इन युवा लेखकों से मिलता हूं, तो मेरा मन रोने को करता है. मुझे नहीं पता, किस कि़स्‍म का भविष्‍य इनकी प्रतीक्षा कर रहा है. मुझे नहीं पता, आने वाली किसी रात कोई शराबी ड्राइवर इन्‍हें अपने ट्रक से कुचलकर मार देगा या किसी दिन ये ख़ुद ही लिखना-पढ़ना बंद कर कहीं चले जाएंगे. अगर ऐसी कुछ अनहोनी नहीं हुई, तो मैं कह सकता हूं कि इक्‍कीसवीं सदी का साहित्‍य न्‍यूमान और उसके जैसे, उसके कुछ सगे भाइयों के नाम होगा.’

किसी नए लेखक को इससे बड़ी शस्ति और क्‍या मिलेगी ! ग़ौरतलब है कि बोलान्‍यो ने ये शब्‍द तब लिखे थे, जब वह ख़ुद शनै:-शनै: मृत्‍यु की ओर बढ़ रहे थे और अपने भविष्‍य के प्रति अत्‍यंत आशंकित थे.

5 comments:

अपर्णा मनोज said...

अनुवादक और प्रेमी, दोनों के भीतर एक उन्‍मादी संवेदनशीलता आ जाती है. वे हर शब्‍द पर, हर भावमुद्रा पर संदेह करते हैं. हर फुसलाहट, हर भेद को टेढ़ी नज़र से देखते हैं. वे जो कुछ सुनते हैं, उस पर ईर्ष्‍याजन्‍य संदेह भी करते हैं: क्‍या सच में तुम मुझसे यही कहना चाहती हो? ...
shandar post ke liye sabad ka shukriya.

ravindra vyas said...

bahut sunder!

sarita sharma said...

आंद्रेस न्यूमान का यह निबंध अनुवाद करने की तुलना प्रेम करने से करके हमें और विधाओं के अंतर्संबंधों पर सोचने के लिए विवश कर देता है. किसी भी गहन कृति को पढ़ते समय लेखक के मन के भीतर उतरना होता है. समीक्षा के लिए पुस्तक को बार- बार पढ़कर समझने के लिए लेखक से तारतम्य स्थापित करना होता है. किसी कलाकृति या फिल्म को सराहने की प्रक्रिया लगभग इसी प्रकार की होती है. अनुवाद में मूल लेखक और अनुवादक दोनों की सहभागिता और विधाओं से अधिक है क्योंकि अनुवादक को किसी और भाषा में कही गयी बात को अपने शब्दों में पाठकों तक पहुंचाना होता है. जब तक वह लेखक के शब्दों को पूर्णतः आत्मसात नहीं कर लेगा तब तक वह उसके भावों का अनुवाद नहीं कर पायेगा. अनुवाद के लिए प्रेरणा, प्रेम और परिश्रम की आवश्यकता है. संवाद की सीमा है. प्रेम हो या अनुवाद एक दूसरे को समझ कर उसे सही शब्द दे पाना कुछ हद तक ही संभव है.

सन्मार्ग said...

अनुवादक और प्रेमी के परस्‍पर अंतर्संबंधों पर इस टिप्‍पणी से जितने अर्थ खुलते नजर आते हैं उससे ज्‍यदा किसी धुंधलके के आगोश में सिमटते...ठीक प्रेम की तरह इसे कोई जितना ही परिभाषित करने का प्रयास करता है उससे ज्‍यादा हमेशा अपरिभाषेय ही रह जाता है...परंतु असली मजा तो इससे जुझने में ही है. एक अनुवादक भी दरअसल भेद खोलने का यही प्रयास करता है.....

Pramila Maheshwari said...

prem aur anuvad ek jaise ,sahi hai lekhak aur anuvadak lekhni ko ek naya aayam dete hain jaise do premi mil ke ham ko janam dete hain , anuvad karte samye anuvadak prem main hota hai , bahut he sundar relation hai