Friday, October 25, 2013

जिसने हमेशा जाना चाहा, उसका इंतज़ार कैसा


{ यह गद्य देवयानी भारद्वाज का है. देवयानी कविता लिखती रही हैं इसलिए इस गद्य का लबो-लहजा बहुत दूर तक काव्यात्मक है. इसे देवयानी ने अपनी डायरी के सफ़ों पर मुमकिन किया है. अमूमन ये सफ़े 'निज-बात' की जगह होते हैं. एक लेखिका से ज़्यादा एक स्त्री-मन यहाँ खुलता है. उस मन का उल्लास और उदासी दर्ज़ करती हुई देवयानी.
लेखिका की तस्वीर पद्मजा गुनगुन के कैमरे से.} 




वल्‍नरेबि‍लिटी

लिखना, कहना यह सब हमें एक्‍सपोज करता है. हम वल्‍नरेबल होते जाते हैं. तो क्‍या न लिखें? न कहें? लेकिन तब भी वल्‍नरेबिलिटी कुछ कम तो नहीं होती.


शाम

अक्टूबर की शाम की उदासी जैसी उदासी तारी है... कितनी अपनी-सी लगती है यह उदासी, जैसे बचपन की दोस्त कोई बड़े दिनों बाद मिलने आयी हो... शरद तुम ऐसे ही आना हर बार.


जिन्दगी आ रही हूँ मैं

मैंने कह दिया है....जिन्दगी आ रही हूँ मैं ...बस दो चार साल ठहर जाओ....इधर कोई भी विचार मन में आता है तो यही तो कहती हूँ खुद से...लेकिन यह क्या अब से कह रही हूँ?....जाने कब से यही तो कह रही हूँ...


क्‍या टूटता है कहां

बोलो तो मूर्तियाँ टूट जयेंगी, विध्वंस होगा... न बोलो तो जो टूटता है उसका विध्वंस किसी को दिखायी नही देता... आप कैसे तोड़ दो उन मूर्तियों को जिनसे बहुत प्यार है... तो फिर क्या खुद से प्यार नहीं, यह केसी दुविधा है?


असर

किसी भी बात को कह दिए जाने का असर कम से कम तीन तरह से हो सकता है. एक, जो आप चाहते हैं कि हो. दूसरा, जो आप चाहते हैं कि न हो और तीसरा, जिसकी आपने कल्‍पना भी न की हो. आप कितना भी खुद को तैयार करें, अंततः किसी भी असर के लिए खुद को कुछ कम ही तैयार पाते हैं.


मुहावरा

मेरे पास अपनी कविता का कोई मुहावरा नहीं है. या है भी तो मैंने उसे अभी तक जाना नहीं है. वैसे मुझे लगता है कि जिंदगी को जीने के लिए हर इंसान को अपना मुहावरा चाहिए होता है, जो उस मुहावरे को पा लेते हैं, उनके लिए चीजें आसान तो नहीं होतीं लेकिन वे अपनी कठिनाइयों से जूझना जानते हैं. या कहना चाहिए कि यह जानना ही उनका मुहावरा बन जाता है.


यह माजरा क्‍या है

कोई कैसे जान लेता है कि वह प्रेम में है --- और यह भी कि अमुक व्‍यक्ति के लिए जो भाव मन में उमड़ आता है, वह प्रेम ही है? कोई किसी के प्रेम में हो और खुद को भूल न जाए, यह कैसे हो सकता है? --- कोई किसी के प्रेम में खुद को पूरी तरह भुला दे, यह कैसी बेवकूफी है? – या इलाही यह माजरा क्‍या है ---

Gita Lenz


इंतजार, याद और वीतराग

इंतजार उसका किया जाता है, जिसने आने का पता दिया हो, जिसने हमेशा जाना चाहा हो उसका कैसा इंतजार. यह जाना एक खलिश तो पैदा करता है, पर यह भी अच्‍छा ही है. इस खलिश का होना हमें गढ़ रहा है, और सुंदर बना रहा है – मुझे और मेरे बच्‍चों को – क्‍योंकि हमारे मन प्‍यार में भीगे हैं --- हम उसे याद करते हैं.

पता नहीं कितना खालीपन, कैसा सन्‍नाटा होगा वहां, कैसा वीतराग, जिसे यह सब याद न आता हो --- जिसके अंदर यह उमगता नहीं कि वह इन सब को बांहों में भर ले --- जिसने याद के दरवाजों को इस तरह बंद कर लिया है कि उसे हिचकियां नहीं आतीं!


जीवन

पुरानी तस्‍वीरों में कितना जीवन छुपा होता है, धीरे-धीरे जो हाथों से फिसलता जाता है. समय हमारे चेहरों पर किस कदर उतर आता है. पुरानी तस्‍वीरें न दिखें तो उनका पता ही न चले शायद.


उदासी

उदासी का रोमेंटिसिज्‍म अच्‍छा लगता है, लेकिन उसे ज्‍यादा देर तक झेला नहीं जा सकता.


अधिकार और मुआवजा

कानून सिर्फ अधिकारों को परिभाषित करता है, यह लोगों की जिम्‍मेदारी है कि वे दूसरों के अधिकारों का खयाल रखें, क्‍योंकि अधिकार महज इस बात की आचार संहिता हैं कि इंसान समाज में साथ कैसे रहें. जब अधिकारों का उल्‍लंघन होता है और उन्‍हें हासिल करने के लिए कानून का सहारा लिया जाता है. तब जो मिलता है, वह अधिकार नहीं मुआवजा भर होता है. इसलिए यह सोचना बहुत जरूरी है कि कहीं आप किसी के अधिकारों का हनन तो नहीं कर रहे? दूसरों के अधिकारों का हनन करने वाला खुद अपने प्रति ही अमानवीय होता है.


उसके बाद का सौंदर्य

मेरी पीठ के पीछे सूरज ने झांकना शुरू किया था. उसकी सिंदूरी आंच में सामने बादलों के टुकड़े दहक रहे थे. मैं सड़क के एक छोर गयी और झुरमुटों वाले मार्ग विभाजक के पास से घूम कर उलट दिशा में चलने लगी. अब नारंगी थाली-सा सूरज मेरे चेहरे को और पूरी मुझ को भी अपनी आंच से सेंक रहा था. आसमान मायावी बादलों के टुकड़ों से ढंका था, मानो किसी परिकथा से चुड़ैल का सारा कुनबा निकल कर चारों दिशाओं में फैल गया हो.

किसी भी सुन्दरतम क्षण को जीती हूँ तो ख़याल आता है, इस जीवन को कितना सुंदर बनाया जा सकता था ... लेकिन यह सौंदर्य उसके जाने के बाद पहुँचने लगा है मुझ तक ... यह क्यों भूल जाती हूँ? 


मिस करने में सेन्स ऑफ़ इन्सिक्युरिटी है

याद...
क्या?
बस याद.
आ रही है?
दैट इज द स्टेट ऑफ़ माइन्ड.
आय एम आल्वेज विद यू.
डू यू रिमेम्बर वी हेड अ कन्वर्सेशन अबाउट मेमोरी वेन यू वर हियर.
जिसके खोने का डर नही होता उसकी याद आती है.
यह तनहाई, बेचैनी, इन्तज़ार कब तलक.... मैंने कहा था, मुझे मिस करती हो, तुमने कहा, नहीं याद करती हूँ. मिस करने में सेन्स ऑफ़ इन्सिक्युरिटी है, याद बस याद है, जो आपके साथ रहती है.


'क्‍या तुमने चाँद को देखा?'

'क्या तुमने चाँद को देखा?'
'होल्ड करो, मैं बालकनी में जाकर देखती हूँ.'
'आज उसका रंग तुम्हारी पिंडलियों-सा चमक रहा है.'
'काश कि हम अपने अपने शहर से झुज्झा डालते
और डोर को थाम झूला झूलते और इस तरह कहीं बीच में एक दूसरे को छू जाते. '

'ओह काश!'


तुम्हारी आँखें, तुम्हारे चुम्बन

'तुमने क्या आँखों में काजल लगा रखा है'
'नहीं तो'
'जब प्यार करते हो तुम
तुम्हारी पलकों का रंग कितना गहरा काला हो जाता है
तुम्हारी पुतलियाँ इस तरह चमकती हैं जैसे
अँधेरी रात में
रेत समंदर के ऊपर चमक रहा हो दूधिया चाँद'
'पर अँधेरी रातों में तो चमकते सितारों से घिरा होता है चाँद'
'मेरी देह पर झिलमिलाते तुम्हारे चुम्बन वे सितारे ही तो हैं
जिनसे मिल कर चाँद इतना खिला-खिला नज़र आता है'


यदि तो

'कभी-कभी मुझे लगता है, अगर मैं लड़का होती और तुम लड़की होते, तो मैं अब तक तुम्हें दुनिया की सैर करा लाती.'
'तुम ऐसा ही करो, अगर हमारे बीच भी मैं लड़का ही रहा और तुम लड़की ही रही, तो हम में और दूसरों में फर्क ही क्या रह जायेगा.'


जब मैं नहीं रहूंगी

कभी जब मैं नहीं रहूंगी, कैसा होगा यह संसार मेरे बिना? सबके हैं रोजाना कारोबार, लेकिन क्‍या मैं किसी की याद में अटकी रहूंगी? कितने सारे लोग होते हैं, जो हमारे सामने नहीं होते लेकिन यह भरोसा होता है कि वे हैं इस वक्‍त, इसी पृथ्‍वी पर किसी काने में. मसरूफ हैं किसी बहुत जरूरी काम में. या हो सकता है कुछ भी न कर रहे हों अभी, बैठे हों बस यूं ही, फूंक रहे हों सिगरेट, चाय पी रहे हों, शायद रोटी बना रहे हों, या खा रहे हों या कुछ भी ऐसा कर रहे हों. क्‍या जब वे मेरे सामने नहीं हैं और जब वे मर जाएंगे तब और अब के अहसास में कोई फर्क न होगा? जैसे इस वक्‍त मैं यहां घर की बालकनी में अकेली बैठी हूं, सुबह की ठंडी हवा को महसूस कर रही हूं, ऐसा लग रहा है कि दबे पांव जाड़ा आने वाला है, इस बार खूब बारिश हुई है, क्‍या ठीक इसी वक्‍त मैं कहीं किसी के खयाल में हूं? क्‍या इस वक्‍त किसी के खयाल में होना ठीक वैसा ही रहेगा, उसके खयाल में जब मैं नहीं रहूंगी?

****

Tuesday, October 22, 2013

मनोज कुमार झा की दो नई कविताएं



Himmat Shah

सूखा

जीवन ऐसे उठा
जैसे उठता है झाग का पहाड़
पूरा समेटूं तो भी एक पेड़ हरियाली का सामान नहीं
जिन वृक्षों ने भोर दिया, साँझ दिया, दुपहरी को ओट दिया
उसे भी नहीं दे सकूँ चार टहनी जल
तो बेहतर है मिट जाना
मगर मिटना भी हवाओं की संधियों के हवाले
मैं एक सरकार चुन नहीं पाता
तुम मृत्यु चुनने की बात करते हो !
****


बाँधना एक सुन्दर क्रिया थी

उठ के न जाए कहीं रात में माँ
मैं शर्ट के कोने को माँ के आचल से बाध लेता था
और जब वह उठती
तो जगाते थपथपाते  कहती कि मैं बन्धन खोल रही हूं
कई बार तो मुझे याद भी नहीं रहता था सुबह में
सोचता हूँ काँपता हूँ कि मझनींद में माँ बच्चे को उठा रही है
स्तुति करूँगा कि वह जानती थी भरोसे को खोलना
अभी सुबह के चार बजे दरभंगा स्टेशन पर भटकते सोचते संशय में हूँ
कि किसी गाड़ी पर बैठ हो जाऊँ अज्ञात
या इन्तजार करूँ उस प्यारी ट्रेन का जो मुझे सही जगह पहुंचा देगी।
****

{ सबद पर मनोज कुमार झा की अन्य कविताएं यहां पढ़ें। }