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आशुतोष दुबे की ६ नई कविताएं

8:02 pm


Jordi Fornies
देखने वालों के दो हिस्से हो जाते हैं

यह नदी दोनों तरफ बह रही है
तुम जिस तरफ देखते रहोगे
बह जाओगे उसी तरफ

देखते रहना ही बह जाना है
अक्सर देखने वालों के दो हिस्से हो जाते हैं
एक साथ अलग-अलग दिशाओं में बहते हुए
उनका आधा हमेशा अपने दूसरे आधे की तलाश में होता है
दो अधूरेपन विपरीत दिशाओं में बहते हुए
एक-दूसरे को खोजते रहते हैं
समुद्र इस नदी का इंतज़ार करता रह जाता है

***

प्रेक्षक          

जैसा वह था
नहीं रहा
बत्तियाँ जल जाने के बाद
वह, जो सिर झुकाए उठ रहा है
बाहर निकलने के लिए
कहीं का कहीं निकल गया है
जल में गिरा है कंकर
बन रहे हैं वर्तुल
अंत में क्या थिरेगा
अंत में क्या रहेगा
घर जो पहुँचेगा
कौन होगा?
वह जो बोलेगा
उसमें किसकी आवाज़ होगी?
वह, जो किसी और की कथा
देख आया है अंत तक
अपनी कथा अधबीच से
बदल सकेगा?
चाहे भी,तो
सिर्फ प्रेक्षक रह सकेगा?
***

James Mc Gills

किसी दिन
         
बहुत पुरानी चाबियों का एक गुच्छा है
जो इस जंग लगे ताले पर आजमाया जाएगा
जो मैं हूँ
मुझे बहुत वक़्त से बंद पड़ी दराज़ की तरह खोला जाएगा
वह ढूंढने के लिए जो मुझमें कभी था ही नहीं

जो मिलेगा
वह ढूंढने वालों के लिए बेकार होगा

जो चाबी मुझे खोलेगी
वह मेरे बारे में नहीं, अपने बारे में ज़्यादा बताएगी

मैं एक बड़ी निराशा पर जड़ा एक जंग लगा ताला हूँ
मुझे एक बाँझ उम्मीद से खोला जाएगा
झुंझलाहट में इस दराज़ को तितरबितर कर दिया जाएगा
शायद उलट भी दिया जाए फर्श पर
कुछ भी करना,
झांकना, टटोलना, झुंझलाना,
फिर बंद कर देना
मैं वहाँ धड़कता रहूँगा इंतज़ार के अंधेरे में 

मुझे एक धीमी-सी आवाज़ खोलेगी किसी दिन
***


सेंध

मन में सेंध लगाने में
जान से ज़्यादा का खतरा है

पढने के बाद
बंद करके नहीं रखी जा सकती
किसी और की डायरी
हमेशा फड़फड़ाते रहेंगे
अँधेरे में कुछ सफ़े

डसेंगे अक्षर वे
साँपों की तरह लहराते-चमकते हुए

प्यास से सूखेगा कंठ
पसीना छलछला आएगा माथे पर
रह जाएगा जीवन
पँक्तियों के पहाड़ के उस तरफ
और लौटना होगा असंभव

आखिरी वक़्त होगा यह
जो बहुत लम्बा चलेगा
आखिरी साँस तक

यह वह नहीं
उसकी लिखत है

माफ नहीं करेगी यह
***


Google

स्थगन
(उस अभिनेत्री के लिए, जो अब खुद को भी दिखाई नहीं देना चाहती)

अदृश्य होने के लिए मृत्यु के अलावा कोई मददगार नहीं होता
और अगर वहाँ से इमदाद न मिले तो
घर को ही ताबूत में बदला जा सकता है
खुद को एक धड़कते हुए शव में

यह न लौटना है, न आगे बढ़ना है
यह एक स्थगन में रहना है
कोई घूमता है प्रेत की तरह
बीत चुके के रेगिस्तान
और मौजूद के बियाबान में
जबकि आगत के लिए सारे दरवाज़े बन्द कर दिए गए हैं
और उनसे सिर टकराते हुए वह
ज़ख्मी और मायूस हो चला है
दिमाग की खिड़कियों के शीशों पर
गुज़रे हुए कल की बारिशों का शोर है
उसमें खड़े रहना है
ज़रा भी भीगे बगैर

बाहर का संसार दरवाज़े पर कान लगाए है
कि कोई हलचल, कोई आहट सुनाई दे
भीतर यह जानलेवा कोशिश
कि किसी सेंध से कुछ भी न आ सके-
न तालियों की गड़गड़ाहट,
न किसी की पुकार
न कोई याद
भीतर से बंद दरवाज़ों से  एक प्रार्थना टकराती रहती है
संसार की याददाश्त चली जाए

वह दरवाज़े खोल दे
और कोई उसे पहचान न पाए
***


कितने एकांत!

हमारी बेखबरी में
हमारे एकांत इतने क़रीब आ गए
कि हम ज़रा-ज़रा एक-दूसरे के एकांत में भी आने-जाने लगे
इस तरह हमने अपने सुनसान को डरावना हो जाने से रोका
निपटता की बेचारगी से खुद को बचाया
और नितांत के भव्य स्थापत्य को दूर से सलाम किया
दोनों के एकांत की अलबत्ता हिफाज़त की दोनों ने
उनके बीच की दीवार घुलती रही धीरे-धीरे
फिर एक साझा घर हो गया एकांत का
उसकी खिड़कियों से दुनिया का एकांत दिखता था
हम टहलते हुए उस तरफ भी निकल जाते हैं अक्सर
ताज्जुब से देखते हुए
कितने एकांतों की दीवारें विसर्जित होती हैं लगातार
तब कहीं संसार का एकांत होता है
****






[ हिंदी के चर्चित कवि आशुतोष दुबे अपनी नई कविताओं के साथ सबद पर पहली दफा हैं। ]

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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

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