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Showing posts from February, 2013

स्मृतियां जाना नहीं जानतीं

जहां बहुत का 'त' ख़त्म होता हो वहीं से शुरू करना - होना, वहीं से प्रेम.
* हर प्रेम का अपना अलग व्याकरण है, लेकिन वैयाकरण प्रेमी नहीं.
* नहीं की निधि में रोज़ एक उदास सिक्का गिरता है.
* आकांक्षा एक सुंदर फूल है, झर जाने तक, सुंदर और दुर्निवार.
* आदतों की कोई नैतिकता नहीं.
* अलगाव एक मृत्यु है, एक ऐसी मृत्यु, जिसका कोई 'संस्कार' अंतिम नहीं.
* स्मृति-छल मानुष-छल से अलग है, स्मृतियां जाना नहीं जानतीं.
* थकान पहली निराशा है, अंतिम भी.
* अंत में सिर्फ़ अभिनय काम आता है.
****

 [ ऊपर इधर लिखे गए कुछ वाक्य हैं. ]
{ साथ दी गई पेंटिंग Sir William Rothenstein की है. }

तुम सभी रंग हो : के. सच्चिदानंदन की नई कविताएं

मैं तुम्हें याद करता हूं 

मैं तुम्हें याद करता हूँ
जैसे खो गई चाबी
अपने घर को याद करती है

तुम भागती हुई आती हो मेरे पास,
जैसे दफ़्न नदियों का गड़गड़ाता उछाह
शहर के हल्ले के साथ आये

सुनहला और भूरा सपना
कैनवस से गुज़रता, जहाँ देवी का अभ्युदय हो रहा है,
छिपछिपाकर इतिहास में दाखिल हो जाता है

जमे हुए समुद्र के भीतर
पक्षी पंख पसार लेते हैं
आसमान हरा है
लाशें तीरों की मानिंद तेज़ी में

2

तुम सभी रंग हो
तुम लाल और काला हो
खून का गुलाब
रात की इकलौती एकाकी हवा
तुम नीला और हरा हो
समुद्र का अनंत कमल
टिड्डे की पृथ्वी पर सवारी

तुम पीला और भूरा हो
कुमकुम के फूलों का सागर
समुद्र तट का पूरा चंद्रमा
सफ़ेद नहीं, प्लीज़

3

ये आईनाखाना है
हरेक आईने में से
एक खुद झलकता है तुम्हारा

तुम खुद से घिरी हुई
खुद से बाहर खुद की शक्ल बनाती हुई खुद से
यह शक्ल सिमटती है, फैलती है, कई गुना हो जाती है
इन अनगिन छवियों में मैं कौन हूँ
इनका ब्रश या पैलेट

यहाँ, मैं, टूटा हुआ
बस एक अनाथ आत्मा
एक तबाह गाँव
एक बंद गली

4

मुझे खोलो
विस्मृति की बर्फ से बाहर निकालो
तंग गलियों, धान के खेतों,
भारीभरकम शिलाओं, कुलदेवियों,
उनके करीब नाच…

भूलना उसने सिखाया : मनोज कुमार झा की नई कविताएं

प्रस्थान
लुप्त होना दुश्य से
घर ने सिखाया मुझको

भयातुर छिपकलियों का पूंछ फेंकना
मैने के बच्चों का बसाना दूर बसेरा

एक चित्र की जगह दूसरा चित्र
भूल जाना दीवार का रंग पुराना
पुरानी रेडियो बेचकर बिस्कुट खरीदना
कुएं का भर जाना कबाड़ से
ये सब घर ने दिखाये

घर भूल चुका है उस मुँहदुब्बर बच्चे को
मगर मैं लौटूँगा कभी किसी घिस रही शाम में
घर को याद दिलाने
कि भूलना सिखाया उसने।
***

सख्त रेखाएं 

कल क्या होगा
जरा भी पता नहीं
यह जुमला एक नक्शा भर है किसी उठने  वाले भवन का
कुछ लकीरें मात्र जिस पर झोपड़ी कैसे बैठेगी यह अनिशिचत
ठोस कहें तो ऐसे कहें कि कल के खाने का भरोसा वहीं
फिर यह एक दरवाज़ा बन जाएगा उस घर का
जहां रात का रंग फट जाता है सुबह के घंटों पहले।

कल क्या होगा पता नहीं
एक ठूंठ वृक्ष फकत
है दरख्त जिस पर पत्ते नहीं, फूल नहीं और काँटे भी नहीं
उसे देखो जिसने कहा कि आसमान होगा या छप्पर पता नहीं
तब जानोगे कि क्या होता है बरसते काँटों के बीच चलना।
***


अजब अभागों का कुनबा

अशुद्ध उच्चारणों ने कई मित्र दिए
उनमें से एक तो अक्षरों को राख कहता है
पिट कर चुप जाने से भी कई साथी मिले
एक ने तो कहा कि लड़ाई बह…

किसी की इच्छा करना, उसके भीतर इच्छा को रोपना है

मैं उन दिनों कविताएं लिखा करता था. क्यों लिखता था, मुझे नहीं पता. कब से लिखना शुरू किया था, यह भी नहीं पता. मुझे लगता है कि मैं हमेशा से लिखता था. मां के गर्भ के भीतर मैंने स्पर्श लिखा. दुलार लिखा. कुछ हरकतें लिखीं, जिन्हें सिर्फ़ मेरी मां ने पढ़ा. उन्हें पढ़ कर वह ख़ुश हुई. बहुत धीरे-धीरे मैंने देह लिखी. मैं सृष्टि का वह कवि हूं, जिसने बीज से पिंड तक सबकुछ लिखा. मैंने अपना होना लिखा, होने का आकार लिखा.
गर्भ से निकलने के बाद मैंने एक लंबी चुप्पी लिखी. उसके बाद एक दीर्घ रुदन लिखा.
कई बार मैंने सुबक के छंद में लिखा. कई बार गला रुंधने को मात्राओं की तरह प्रयोग किया. हिचकियों को तुक की तरह मिलाया. धरातल पर जैसे मेरे पैर चलते हैं, अ-धरा पर जैसे मेरा मन चलता है, उन तमाम चलने की लय पर लिखा.
मैंने कथ्य को रूप और रूप को कथ्य लिखा.
मैंने अपनी इच्छाओं के व्याकरण में लिखा.
जब मेरे पैदा होने का बीज भी नहीं बोया गया था, तब से मेरे भीतर इच्छाएं पलने लगी थीं. मेरे मां-पिता ने मेरी इच्छा की थी.
किसी की इच्छा करना, उसके भीतर इच्छा को रोपना है.
मैं तब से लिख रहा हूं, जब मैं इस धरती पर आया भी न था. …