प्रभात की तीन नई कविताएं



David Croitor
कस्बे का कवि

वह कोई अधिकारी नहीं है कि लोग
जी सर, हां सर कहते हुए कांपें उसके सामने
नेता नहीं है कि इंसानों का समूह
पालतू कुत्तों के झुण्ड में बदल जाए उसे देखते ही

ब्याज पर धन देकर
ज़िन्दगी नहीं बख्श सकता वह लोगों को
कि लोगों के हाथ गिड़गिड़ाते हुए मुड़ें

वह तो एक छोटा-सा कवि है इस कस्बे का
रहता है बस स्टॉप की कुर्सियों
बिजली के खम्भे-सा
टीन का बोर्ड अजनबियों को
पते बताता हुआ
अपने होने को कस्बे से साझा करते हुए
सुबह-शाम सड़क किनारे के पेड़ों-सा दिखता

साइकिल पर दौड़ता प्लम्बर
ठहर जाता है उसे देखकर
अरे यार नहीं आ सका
नल की टोंटी ठीक करने
दरअसल क्या है न
कि मोटे कामों से ही फुर्सत नहीं मिलती
पर आऊंगा किसी रोज
अभी किसी तरह काम चला

प्रेमी जोड़े जिन्होंने कविताएं पढ़ी हैं उसकी
देखा है उसे डाकघर की तरफ आते-जाते
साल में एकाध जोड़े उनमें से
उसकी कविताओं की खिड़की से कूद कर
सुरक्षित निकल जाते हैं कस्बे से
***

 जैसे

जैसे पेड़ को नहीं बताना पड़ता
मैं क्यों बैठा हूं उसकी छांव में
जैसे राह को नहीं बताना पड़ता
मैं क्यों चल रहा हूं उस पर
जैसे नदी को नहीं बताना पड़ता
मैं क्यों जा रहा हूं दूसरे किनारे पर
जैसे बादलों को नहीं बताना पड़ता
कहां तक चलूंगा उन्हें देखता

जैसे तुम्हारे चेहरे को नहीं बताना पड़ता
क्यों पड़ा हूं उसमें, घास में नाव की तरह
जैसे तुम्हारी आंखों को नहीं बताना पड़ता
क्यों तोते की तरह लौटता हूं इन्हीं कोटरों में
जैसे तुम्हारे कानों को नहीं बताना पड़ता
क्यों सुनाई देता हूं फूलों के टपकने की तरह
जैसे तुम्हारे पांवों को नहीं बताना पड़ता
क्यों घर में घुसने से पहले फटकारी जाने वाली धूल हूं मैं
जैसे तुम्हारे बदन को नहीं बताना पड़ता 
क्यों तुम्हारे नहाने का पानी हूं मैं
***  


बिछुड़ने के बाद

बिछुड़ने के बाद तीस साल
कोई कम अंतराल नहीं
मिल भी जाएं तो पहचानना मुश्किल
पहचान भी जाएं तो बच निकलने से बढ़िया कुछ न लगे

याद करो तीस बरस पहले के जीवन को
जिसे अभी खिलना था
याद करो उसके तीस बरस बाद को
जब यह जीवन खिल भी चुका और झर भी गया
कुछ और झरना शेष है

तुम्हारा जीवन भी इतना तो झर ही गया
कौन जाने समूचा ही झर गया हो
हवा बुहार ले गई हो यादों के अवशेष भी
पर जैसे कि मैं किसी अनहोनी का शिकार नहीं हुआ
और जीवित हूं
तुम्हारे जीवित होने के कामना करता हूं

तुमने इस संसार में रुचि बनाए रखने के लिए
क्या-क्या जतन उठाए
जैसे कि मैंने उदासियों को
किताबों की उदासियों के साथ घुला मिला दिया

नहीं, कोई पीड़ा नहीं
मलाल जैसा कुछ भी नहीं
पर जीवन में यादों को उगाना भी कम मुश्किल नहीं
याद करके रो सकने की तो बात ही दूसरी है
***

                                



 { चर्चित कवि प्रभात की ताज़ा कविताएं सबद पर पहली दफ़ा . }

Comments

Neel Parmar said…
कवि कर्म, प्रेम मर्म
और अंत में
'नहीं, कोई पीड़ा नहीं
मलाल जैसा कुछ भी नहीं
पर जीवन में यादों को उगाना भी कम मुश्किल नहीं
याद करके रो सकने की तो बात ही दूसरी है'
बेहतरीन.
ये सटीकता का कोई दावा नही करती और शायद इसीलिए इतनी अचूक हैं ये कवितायें.
bahut achhi kavita hai anurag bhai ...badhai prabhat ji ko...
seema vijay said…
kyon sunaayee detaa hun phulon ke tapakne ki tarah.....














Anupama Tiwari said…
बेहद खूबसूरत तरीके से अपनी उपस्थिति दर्ज करती कविताएं !
sree. sreedevi said…
किसी का न होना उसके वजूद का एहसास उसके होने से कंही अधिक दर्ज कराती है ...........एक खूबसूरत से एहसास के लिए धन्यवाद
प्रभात की कविताओं को मैं सदैव ही उत्‍सुकता से देखता रहा हूँ। यहॉं भी ये कविताऍं उस उम्‍मीद के साथ देखी जा सकती हैं जो युवतर लोगों से लगाई जा सकती है।
Leena Malhotra said…
Prbhat ki kvitaye aatma ko sahlati hain..

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